डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य ‘किशनलाल की मौत’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 152 ☆

☆ व्यंग्य – किशनलाल की मौत

किशनलाल एकदम मर गया, बिलकुल मर गया। इन छोटे लोगों के साथ यही तो मुश्किल है कि ये जीते तो एक एक कदम दूसरों की परमीशन से हैं, लेकिन मरते हैं तो बिना किसी से पूछे मर जाते हैं।

तो हुआ यह कि किशनलाल सड़क पार कर रहा था और उसकी दाहिनी तरफ से ट्रक आ रहा था। ट्रक वाले  ने सोचा कि किशनलाल सड़क पार कर जाएगा। उसने स्पीड कम नहीं की। लेकिन किशनलाल किसी सोच में खोया था। एकाएक ही ट्रक को देखकर वह हड़बड़ाकर बीच सड़क में रुक गया और ट्रक रुकते रुकते उसे गिराकर उसके ऊपर से गुज़र गया।

हंगामा मच गया और लोग किशनलाल को पास ही एक डॉक्टर के यहाँ ले गये। होश-हवास में किशनलाल उस मँहगे डॉक्टर के दरवाज़े पर नहीं चढ़ पाता, लेकिन उस दिन उसके लिए उस दवाखाने के दोनों दरवाज़े खुल गये। थोड़ी देर में उसकी बीवी भी रोती पीटती आ गयी। उसे भी लोगों ने वीआईपी की तरह लिया और पकड़कर बेंच पर बैठा दिया, जहाँ बैठी वह पागलों की तरह हर किसी से किशनलाल का हाल पूछती रही। लोग उसे धीरज बँधाते रहे, यद्यपि जानते सब थे कि किशनलाल बचेगा नहीं।
भीड़ इतनी बढ़ गयी थी कि सड़क पर ट्रैफिक रुक रुक जाता था। इतने में ही खादी के कुर्ते-पाजामे में स्थानीय विधायक जी वहाँ पहुँच गये। विधायक जी के साथ दो तीन आदमी अटैच्ड थे, जैसा कि ज़रूरी है। विधायक जी ने गेट से घुसते हुए लोगों के चेहरे पर नज़र डाली कि उनके प्रवेश का लोगों पर क्या असर होता है। असर तो होना ही था। सात आठ लोग तुरन्त भीड़ से टूट कर उनकी तरफ लपके।

‘अरे, विधायक जी आये हैं।’

‘वाह साहब, आपने तो कमाल कर दिया।’

‘क्यों न हो। यही तो बात है। सुना और दौड़े आये।’

परम गद्गद होकर उन्होंने हाथ जोड़े, ‘अरे भाई, यह तो हमारा कर्तव्य है। आपकी सेवा के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ।’

‘वाह, जैसे गज ने पुकारा और भगवान दौड़े चले आये सुदरसन चक्र लिये।’

‘कमाल कर दिया साहब।’

एक सज्जन लपक कर एक कुर्सी उठा लाये और उसे रखकर अपने गमछे से झाड़ दिया।

‘पधारिए साहब।’

‘अरे भाई, बैठने थोड़इ आये हैं। यह बताइए एक्सीडेंट कैसे हुआ।’

‘साहब, हम बताते हैं। किशनलाल घर से कुछ सौदा लेने को निकला। सौदा लेकर लौट रहा था कि……’

‘तुम्हें कुछ पता नहीं है। हम बताते हैं साहब।’

‘हमें कैसे पता नहीं?’

‘तुम थे वहाँ जब एक्सीडेंट हुआ था?’     

‘तुम थे?’  

‘हाँ, थे। हम वहीं चौराहे पर खड़े थे।’ 

‘अच्छा तो तुम ही बता लो।’   

‘साहब, किशनलाल सड़क पार कर रहा था। लगता है कुछ सोच रहा था। सोचते सोचते ट्रक को देखकर बीच में एकाएक रुक गया। ट्रक वाला रोक नहीं पाया।’    

‘राम राम! चलिए, ज़रा उसकी पत्नी से मिल लें।’    

‘आइए, आइए।’                     

दो लोगों ने भीड़ में से रास्ता निकाला। विधायक जी ने किशनलाल की बेहाल पत्नी के पास जाकर हाथ जोड़े। उसने अपने दुःख के कारण कोई ध्यान नहीं दिया।विधायक जी के साथ नत्थी एक साहब औरत से बोले, ‘विधायक जी आये हैं।’

औरत ने फिर भी कोई ध्यान नहीं दिया।

दूसरे साहब बड़बाये, ‘एकदम जाहिल है। विधायक जी नमस्ते कर रहे हैं, इसे होश ही नहीं है।’

विधायक जी ऊँचे स्वर में बोलने लगे। लोगों ने अपने कान बढ़ाये। ‘धीरज रखिए। होनी के आगे किसी का वश नहीं है। मेरे योग्य जो सेवा हो बताइए। मैं हमेशा तैयार हूँ।’

विधायक जी ने सबके चेहरों की ओर देखा। सब संतोष से मुस्कुराए। विधायक जी फिर एक बार नमस्कार करके चल दिये।

रास्ते में बोले, ‘क्या किया जाए? कुछ समझ में नहीं आता।’

‘हम बताते हैं साहब। इस सड़क पर ट्रक निकलना बन्द करवा दीजिए। नहीं तो कम से कम गाड़ी-ब्रेकर तो बनवा ही दीजिए।’

‘स्पीड-ब्रेकर बोलो जी।’

‘हाँ हाँ, वही।’                              

‘ठीक है’, विधायक जी बोले।

‘अरे साहब, इस मुहल्ले की एक समस्या थोड़े ही है। आप थोड़ी फुरसत से टाइम दीजिए। घर पर कब मिलते हैं?’

‘सेवा के लिए हमेशा हाजिर हूँ। वैसे सवेरे आठ से दस तक बैठता हूँ।’

‘किसी दिन आऊँगा, साहब। एक तो इस मुहल्ले में पानी की इतनी तवालत है कि क्या बताएँ। प्रेशर इतना कम रहता है कि बूँद बूँद टपकता है। दूसरे, आपसे अपने किरायेदार की बात करनी थी। उसके आजकल बहुत पर निकल रहे हैं। थोड़ा छाँटने पड़ेंगे।’

‘आप आइए। फुरसत से बात करेंगे।’

‘ज़रूर। मेहरबानी आपकी।’

इतने में पता चला कि किशनलाल मर गया। उसकी बीवी की चीखें ऊँची हो गयीं।

विधायक जी बोले, ‘बुरा हुआ। अब क्या होगा?’

‘शायद पोस्टमार्टम होगा।’

‘तो अब हम चलते हैं। मेरे योग्य कोई काम हो तो बताइएगा।’

‘कैसे जाएंगे साहब?’

‘ऑटो से निकल जाऊँगा।’

‘अरे वाह साहब, हमारा स्कूटर किस दिन के लिए है?’

‘देख लो, तुम्हारा स्कूटर ठीक न हो तो हम चले जाते हैं।’

‘अरे वाह! अपना स्कूटर एकदम फिट है। आइए साहब।’

‘नमस्ते साहब।’

विधायक जी ने दोनों हाथ जोड़कर पूरी भीड़ की तरफ घुमाये, जो उनकी तरफ देख रहे थे उनकी तरफ, और जो नहीं देख रहे थे उनकी तरफ भी।

इसके बाद स्कूटर पर बैठकर विधायक जी विदा हो गये। जब तक वे दिखायी देते रहे, आठ दस जोड़ी हाथ उनकी तरफ जुड़े रहे और आठ दस जोड़ी ओठ मुस्कान में खुले रहे। फिर हाथ नीचे गिर गये और ओठ सिकुड़ गये।

बहुत देर हो चुकी थी। लोग अपने अपने घरों को चल दिये। किशनलाल तो मर ही चुका था, अब वहाँ रुकना बेकार था।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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