डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य ‘हिन्दी साहित्य में मेरे समाज का योगदान’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 156 ☆

☆ व्यंग्य – हिन्दी साहित्य में मेरे समाज का योगदान

रोड पर चलते हुए कुछ दूर पर भीड़ सी देखकर उत्सुकतावश रुक गया। पास गया तो देखा भीड़ एक मूर्ति को घेरे थी। आरती और पूजा का कार्यक्रम चल रहा था। भीड़ से छटक कर एक सज्जन निकले तो पूछा, ‘यहाँ क्या हो रहा है?’

जवाब मिला, ‘यह हमारे समाज के कवि जी की मूर्ति है। आज उनका जन्मदिन है, इसलिए समाज का कार्यक्रम चल रहा है। इन्होंने हमारे समाज का नाम ऊँचा किया है।’

मैंने पूछा, ‘इनकी कविताएँ आपने पढ़ी हैं?’

जवाब मिला, ‘अभी पढ़ी तो नहीं हैं, लेकिन इनकी दो किताबें है हमारे पास हैं। समाज ने मँगवा कर सबको बँटवायी थीं।’

मैंने पूछा, ‘आप दूसरे कवियों को पढ़ते हैं?’

वे बोले, ‘अरे भैया, कहाँ घसीट रहे हो? हम व्यापारी आदमी हैं। हमें धंधे से फुरसत मिले तो कविता अविता देखें। ये सब फुरसत वालों के काम हैं।’

घर पहुँचा तो वह घटना दिमाग में घूमती रही। सोचते सोचते अपराध-भाव से घिरने लगा। बार-बार यह विचार कुरेदने लगा कि दूसरे समाजों में लोग जाति-गर्व से फूले हैं, और एक मैं हूँ कि कभी अपनी जाति पर गर्व करने का सोचा नहीं, जबकि हर क्षेत्र में हमारी जाति के झंडे लहरा रहे हैं। शहर में महाराणा प्रताप और सुभद्रा कुमारी चौहान के अलावा हमारी जाति के किसी बड़े आदमी की मूर्ति दिखायी नहीं पड़ी, जो निश्चय ही अफसोस की बात है। इस सबके बीच मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। बुलाये जाने पर भी अपनी जाति के कार्यक्रमों से कन्नी काटता रहा। कभी जाति पर गर्व नहीं किया।

इसलिए सोचा कि फिलहाल हमारे समाज के उन महानुभावों के नाम खोज कर सामने लाऊँ जिन्होंने साहित्य में नाम किया है और हमारे समाज का नाम रोशन किया है। बताना ज़रूरी है कि जैसे हमारे समाज ने वीरता में इतिहास रचा, वैसे ही साहित्य में कम हासिल नहीं किया।

प्रातःस्मरणीय सुभद्रा कुमारी जी का नाम ले चुका हूँ। उनकी ‘खूब लड़ी मर्दानी’ तो आप भूल नहीं सकते। उनसे पहले हमारे समाज के एक और साहित्यकार राधिका रमण प्रसाद सिंह हुए थे जिनकी कहानी ‘कानों में कंगना’ खूब चर्चित हुई।

हमारी जाति का समाज साहित्यकारों की खान रहा है। आलोचना में शीर्षस्थ नामवर सिंह हमारे समाज में ही अवतरित हुए। उनके अनुज काशीनाथ सिंह ने कहानी और उपन्यास में झंडे गाड़े। उनके समधी दूधनाथ सिंह एक और महत्वपूर्ण कथाकार रहे। आलोचना में नामवर जी के अलावा कर्ण सिंह चौहान और चंचल चौहान भी सुर्खरू हुए। इसी काल में हमारे समाज में ‘नीला चाँद’ उपन्यास के रचयिता शिवप्रसाद सिंह भी मशहूर हुए। बताना ज़रूरी है कि ‘आँवा’ उपन्यास की लेखिका चित्रा मुद्गल जी जन्म से हमारे समाज की हैं।

कवियों में ‘ताप के ताए हुए दिन’ के रचयिता महाकवि त्रिलोचन (असली नाम वासुदेव सिंह) और ‘कुरुक्षेत्र’ वाले रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को कौन भूल सकता है? इसी परंपरा में आगे ‘बाघ’ के कवि केदारनाथ सिंह ने खूब यश अर्जित किया।        

हमारे समाज के दो और चमकते सितारे ‘टेपचू’ और ‘तिरिछ’ के लेखक उदय प्रकाश और ‘लेकिन दरवाज़ा’ वाले पंकज बिष्ट हैं। किसी को आपत्ति न हो तो ख़ाकसार को भी इस सूची के अन्त में जोड़ा जा सकता है, यद्यपि अपना योगदान कुछ ख़ास नहीं है।

अभी यह सूची खुली है और खुली ही रहेगी। जो छूट गये हैं वे कुपित न हों। उम्र के साथ मेरी स्मरण-शक्ति कमज़ोर हो रही है, इसलिए भूल सुधार का सिलसिला चलता रहेगा। फिलहाल मैंने ‘हिन्दी साहित्य में क्षत्रियों का योगदान’ पुस्तक की शुरुआत कर दी है। मुकम्मल होने पर जनता-जनार्दन की ख़िदमत में पेश करूँगा।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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