श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “संघे शक्ति कलौयुगे…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 152 ☆

☆ संघे शक्ति कलौयुगे…

देश में जब कोई न सुने तो विदेश चले जाना चाहिए। ऐसी मानसिकता कभी सफल नहीं होती क्योंकि  जिसके पास अपनों का साथ नहीं होता उसका पराए भी साथ नहीं देते हैं। हमारे यहाँ ऐसा कहा जाता है कि जब भी घर से निकलो खाकर निकलो नहीं तो उस दिन बाहर भी खाना नहीं मिलता।

ऐसा अब देखने में आ रहा है कि कहीं कोई पूछ परख नहीं बची है। बिना सिर पैर तथ्यों के साथ अपनी बात रखने का नतीजा ऐसा ही होता है। साथ मिलकर चलने की कला केवल चोर- चोर मैसेरे भाइयों में क्यों मिलती है? सद्विचारों से पोषित व्यक्ति क्यों एकजुट होने में इतना वक्त लगाते हैं। दरसल सारी लड़ाई की जड़ मुखिया बनना है; टीम का नेतृत्व करना होता है। बिना परिश्रम सब कुछ मिल जाए यही सोच कार्यों को बाधित करती हैं। सभी का नाम तो हो पर कार्य की जिम्मेदारी लेने से बचना,  निश्चित ही आपको आम से खास नहीं बनने देगा।

सफल व्यक्ति और उसके श्रम को लेने हेतु  कई लोग आगे आते हैं। उसे अपने साथ जोड़कर संगठन को मजबूत करने की सोच आसानी से पूरी नहीं हो सकती। हर व्यक्ति की अपनी निष्ठा होती है, जो किसी व्यक्ति,समाज,धर्म, जाति, संस्था, देश आदि के प्रति होती है। अब आप उसे अपने साथ मिलाने की कोशिश करेंगे तो वो परिणाम नहीं आएगा। क्या तेल और पानी कभी एक हो पाएंगे।

माना संगठन में शक्ति होती है , एक सोच वाले लोगों को समस्त मतभेदों को भुलाकर एक हो जाना चाहिए। घास की बनी हुई रस्सी से बलशाली जानवरों को भी बाँधा जा सकता है। यहाँ विचारों की रस्सी भले जुड़ जाए किन्तु शीर्ष पर कौन विराजित होगा ये तय नहीं हो सकता। अंधों में काना राजा जनमानस  को पसंद नहीं क्योंकि जब हमारे पास सूर्य की शक्ति है तो क्यों विपरीत हवा में जलती – बुझती लौ के स्थिर होने की उम्मीद में टकटकी लगा कर ताकते रहें।

अच्छे लोगों को एकता के साथ रहना होगा, जिसके विचारों में दम हो उसे मुखिया बनाकर सारी संस्थाओं को जोड़ते हुए अग्रसर हों।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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