डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक बेहतरीन व्यंग्य – ‘एक अक्लमन्द बाप‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 292 ☆

☆ व्यंग्य ☆ एक अक्लमन्द बाप

छन्नूलाल अपने युवा बेटे महेश को हमेशा ऐसे पुलक कर देखते थे जैसे कोई सूदखोर अपनी रकम को बढ़ते देखता है। वे लड़के को मुग्ध भाव से निहारते रहते थे। लड़का नौकरी पर लग गया है। कोई तगड़ा लड़की वाला मिल जाए तो दस बीस लाख पक्के। पुत्र को जन्म देने का पुरस्कार मिले।

मुश्किल यही थी कि लड़का उनकी बात नहीं सुनता था। वे अपनी तरफ से हमेशा उसे नसीहत देते रहते थे— ‘बेटा, चार पैसे ऊपर के कमाओ। सच्चाई, ईमानदारी से इस महंगाई के जमाने में काम नहीं चलता। लक्ष्मी अपने आप नहीं आती। उसे थोड़ा फुसलाना पड़ता है।’

कभी नसीहत देते, ‘बेटा, यार-दोस्तों पर ज्यादा खर्च मत किया करो। आज के जमाने में पैसे से बढ़कर कोई सच्चा यार नहीं है। बाकी सब यार मतलब के होते हैं।’

महेश उनकी बात सुनकर झल्ला पड़ता है। कहता है, ‘आप ये ऊटपटांग बातें अपने पास रखो। हमें जो ठीक लगेगा, करेंगे।’

छन्नूलाल खून का घूंट पीकर रह जाते हैं। आज के ज़माने की औलाद को समझाना बहुत मुश्किल है। अकल की बात भी कांटे जैसी लगती है।

लड़की वाले आने लगे हैं। उनके आते ही छन्नूलाल ऐसे अकड़ कर बैठ जाते हैं जैसे किसी मुल्क के सुल्तान हों। मुंह टेढ़ा करके खिड़की की तरफ देखते हुए बातें करते हैं, जैसे किसी प्रेत से वार्तालाप कर रहे हों। सीधे पूछते हैं, ‘कितना खर्चा करेंगे आप?’ वह दस पन्द्रह लाख बताता है तो छन्नूलाल खिड़की की तरफ देखते हुए व्यंग्य से हंसना शुरू कर देते हैं और आधे मिनट तक हिनहिनाते रहते हैं। सामने बैठा आदमी छोटा होता जाता है।

हंसी रूकती है तो छन्नूलाल खिड़की को संबोधित करके कहते हैं, ‘दस पंद्रह लाख में तो कोई चपरासी मिलेगा। यहां तो चालीस पचास लाख वाले रोज चक्कर लगा रहे हैं।’

कुछ मोटी पार्टियां सचमुच चक्कर लगा रही हैं। छन्नूलाल को विश्वास है कि अच्छे फायदे में सौदा पट जाएगा। डर यही है कि कहीं लड़का नखरे न दिखाने लगे।

बुरे लक्षण प्रकट होने लगे। एक दिन महेश आकर कह गया, ‘बाबूजी, सुना है आप मेरी शादी तय कर रहे हैं। मुझे अभी शादी नहीं करनी है। जब करना होगी, बता दूंगा।’

छन्नूलाल खौंखिया कर बोले, ‘तो क्या बुढ़ापे में करोगे?’

महेश बोला, ‘कभी भी करूं। जब करना होगी, आपको बता देंगे।’

छन्नूलाल ने अपने तरकश से पुराने पारंपरिक तीर निकाले। बोले, ‘मां-बाप होने के नाते हमारा धरम बनता है कि तुम्हारी शादी कर दें, इसलिए देख रहे हैं, नहीं तो हमें क्या। फिर बहू आ जाएगी तो तुम्हारी अम्मां को थोड़ा आराम मिल जाएगा। नाती पोते हों तो घर में अच्छा लगेगा।’

महेश ने उनके दांव को काट दिया। कहा, ‘घर में इतना काम नहीं है जिसके लिए अम्मां को परेशानी होती हो। इतनी जल्दी काहे की पड़ी है?’

छन्नूलाल का दिल बैठ गया। लगा, लक्ष्मी दरवाजे पर दस्तक देते देते ‘टाटा’ कहने लगी है। भुन कर बोले, ‘बड़े हो गये हो न, इसलिए बाप की बात बेवकूफ़ी लगती है। जो जी में आये, करो।’

फिर भी उन्होंने आस नहीं छोड़ी। पत्नी को ड्यूटी पर लगा दिया कि रोज़ बेटे को सीधे या संकेतों से बहू की ज़रूरत की याद दिलाती रहे।

लेकिन एक दिन छन्नूलाल पर वज्रपात हो गया। महेश एक दिन माला-वाला पहने एक लड़की को साथ लेकर आ गया। लड़की की मांग में दगदगाता सिन्दूर। मां-बाप के पांव छूकर बोला, ‘बाबूजी, हमें आशीर्वाद दीजिए। हमने शादी कर ली है।’

छन्नूलाल की ज़ुबान को लकवा लग गया। यह कौन से जन्मों के पापों की सज़ा मिली? बीस लाख हवा में तैरकर विलीन होते दिखे। तमतमाये चेहरे से चिल्लाये, ‘कपूत, तेरी हिम्मत कैसे हुई इस लड़की के साथ घर में घुसने की? निकल बाहर।’

उनकी पत्नी ने उन्हें रोका, लेकिन वे उन्माद की हालत में थे। बेटे ने भारी चोट दी थी। बर्दाश्त से बाहर। पत्नी से डपट कर बोले, ‘तुम्हें उनकी तरफदारी करनी है तो तुम भी घर से निकल जाओ।’

पत्नी चुप हो गयी। महेश अपनी पत्नी को साथ लेकर घर से बाहर निकल गया।

छन्नूलाल दिन रात घर में फनफनाते घूमते थे। भूख, नींद सब गायब। पत्नी की लायी थाली को उठाकर फेंक देते। कहते, ‘ऐसी औलाद से तो  बेऔलाद अच्छे होते।’

पत्नी भी दुखी बैठी रहती।

आठ दस दिन बाद पत्नी ने बगावत कर दी। बोली, ‘अब बुढ़ापे में ज्यादा नखरे मत करो। लड़के ने शादी ही की है, कोई हत्या नहीं की है। या तो उन्हें बुलाकर लाओ, नहीं तो मैं उनके पास चली जाती हूं। तुम यहां अकेले पड़े रहना।’

छन्नूलाल चिल्लाये, ‘हां निकलो बाहर। इसी वक्त निकलो।’

पत्नी भी अपनी ओटली- पोटली लेकर चली गयी। छन्नूलाल के लिए घर भूतों का डेरा हो गया। दिन भर खटिया पर मरे से पड़े रहते। रात को करवटें बदल बदल कर चिल्लाते, ‘हे राम, उठा लो।’

पड़ोसियों की नींद हराम होती। भुनभुनाते, ‘यह ससुरा जान खाये लेता है। रात भर सियार की तरह हुआता है।’

ऐसे ही तीन चार रात वे ‘उठा लो’ ‘उठा लो’ चिल्लाते रहे। एक रात कुछ आहट से नींद खुली जो देखा अंगरखा-धोती धारी, सफेद लंबे केश और दाढ़ी वाला एक आदमी उनकी खाट की बगल में खड़ा रस्सी खोल रहा है। छन्नूलाल उठ कर बैठ गये। बोले, ‘कौन हो भैया? चोर वोर हो क्या? हम गरीब आदमी हैं। हमारे घर में कुछ नहीं मिलेगा।’

 

 

वह आदमी अपना काम करते हुए कुछ गुस्से से बोला, ‘हम यमदूत हैं। तुम्हें लेने आये हैं।’

छन्नूलाल का पसीना माथे से बह कर ठुड्ढी तक आया। बोले, ‘क्या हमारी उमर पूरी हो गयी भैया?’

यमदूत बोला, ‘उमर तो पूरी नहीं हुई थी, लेकिन तुमने चिल्ला चिल्ला कर यमराज का चैन हराम कर दिया। तुम्हारे लिए स्पेशल आर्डर निकला है।’

छन्नूलाल बोले, ‘मैं क्या चिल्लाता था भाई?’

यमदूत गुस्से में बोला, ‘रोज ‘उठा लो’ ‘उठा लो’ नहीं चिल्लाते थे? हमारा काम बढ़ा कर रख दिया। वैसइ क्या काम कम था?’

छन्नूलाल घबराये। बोले, ‘अरे भाई, मैं ‘उठा लो’ अपने लिए थोड़इ कहता था। मैंने ‘हमें उठा लो’ कब कहा?’

यमदूत हाथ रोक कर बोला, ‘तो किसके लिए कहते थे?’

छन्नूलाल बोले, ‘वह तो मैं अपने दफ्तर के जुनेजा साहब के लिए कहता था। रोज एक मीमो पकड़ा देते हैं। नाक में दम कर रखा है।’

यमदूत बोला, ‘हमें इस सबसे कोई मतलब नहीं है। यह सब वहीं चलकर बताना।’

छन्नूलाल हाथ जोड़कर आर्त स्वर में बोले, ‘अरे भैया, एक बार चोला छूट गया तो दुबारा उसमें घुसने को नहीं मिलेगा। लोग फौरन फूंक फांक कर बराबर कर देंगे। हमें माफ कर दो। अभी तो हमने पोते का मुंह नहीं देखा। अभी तो लड़के की शादी हुई है। ऐसे कठोर मत बनो।’

यमदूत कुछ द्रवित हुआ। बोला, ‘ठीक है, तो हम वहां जाकर बता देते हैं। अगर आर्डर कैंसिल हुआ तो ठीक, नहीं तो हम कल आकर तुम्हें ले जाएंगे। कल नहीं आये तो समझना कि आर्डर कैंसिल हो गया।’

छन्नूलाल हाथ जोड़कर बोले, ‘भैया, आप तो अपने डिपार्टमेंट में काफी सीनियर होंगे। थोड़ा हमारी सिफारिश कर देना। अब ऐसी गलती नहीं होगी। बाद में जब अपना टाइम आने पर हम आएंगे तो आपकी सेवा करेंगे।’

यमदूत ने व्यंग्य से हंसकर जवाब दिया, ‘आप वहां क्या सेवा करोगे। वहां तो हमीं आपकी सेवा करेंगे।’

छन्नूलाल के लिए रात गुज़ारना मुश्किल हो गया। राम राम करते सवेरा हुआ। सवेरा होते ही भाग कर बेटे के घर पहुंचे। पत्नी उन्हें देखकर प्रसन्न हुई। बोली, ‘आखिर अकल आ ही गयी।’

छन्नूलाल असली बात को दबा  गये। बोले, ‘हां, सोचा बेटा-बहू पर गुस्सा करने से क्या फायदा। घर में मन नहीं लगता। आज यहीं रहूंगा। कल सबको घर ले चलूंगा।’

बहू-बेटे ने उनकी खूब आवभगत की, लेकिन उन्हें चैन नहीं था। आने वाली रात उनके दिमाग पर सवार थी। दिन भर  चुपचाप खाट पर पड़े जेब में रखी माला सटकाते  रहे। शाम होते ही खाट पर पड़े रहना मुश्किल हो गया। बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगे।

रात बढ़ने के साथ उनकी हालत खराब हो रही थी। पसीना पोंछते पोंछते गमछा गीला हो गया। पत्ता भी खड़कता तो चौंक उठते। लगता बुलावा आ गया।

ऐसे ही काफी रात गुज़र गयी। तीन चार बजे सिकुड़कर खाट पर लेट गये।

आंख लग गयी। सपने में देखा, यमदूत रस्सी खोलता हुआ उनके सामने खड़ा है। कह रहा है,  ‘चलो, तुम्हारी अर्जी नामंजूर हो गयी।’

छन्नूलाल ने देखा कि वे भागे और दरवाज़े से टकराकर गिर गये। घबराहट में उनकी आंख खुल गयी। शरीर पसीने से लथपथ था।

आंखें घुमा कर देखा, खिड़की से धूप घुसपैठ कर रही थी और सामने बहू चाय की ट्रे लिये खड़ी थी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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