श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – “चलो! मोहल्ले में कुछ रैंकिंग हो जाए” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 220 ☆
☆ व्यंग्य – चलो! मोहल्ले में कुछ रैंकिंग हो जाए ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
साहित्यकारों की रैंकिंग देखकर मुझे जितनी प्रसन्नता हुई उतनी दूसरों को नहीं हुई होगी। यह प्रसन्नता इसलिए नहीं हुई कि इसमें मेरा नाम नहीं था। बल्कि इसलिए हुई कि किसी ने इतनी हिम्मत तो की है कि साहित्यकारों की रैंकिंग की जाए।
हमने रैगिंग के बारे में सुना था। कॉलेज में हमारी रैगिंग हुई थी। कुछ सीनियर छात्रों ने हमें लड़की बनाकर दूसरों के चरण स्पर्श करने के सौभाग्य से गुजरा था।
मगर, यह तो रैंकिंग का मामला था। हम बहुत उत्साहित थे। साहित्यकारों की तरह हमने भी रैंकिंग करने का मन बनाया। तब हमने सोचा कि यह काम हमारे मोहल्ले से ही करना चाहिए। प्राथमिकता उसे ही मिलनी चाहिए जो अपने सबसे नजदीक हो। हमरा जान-पहचान वाला हो। ऐन-केन-प्रकरण बोलने में चर्चित रहता हो। इसलिए हमने इस कार्य के लिए मोहल्ले को चुना।
चूंकि मैं साहित्यकार के साथ-साथ शिक्षक भी हूं इसलिए मुझसे बेहतर मोहल्ले को कौन जान सकता है? यह सोचकर मैंने मोहल्ले की रैंकिंग शुरू की। सबसे पहले उस व्यक्ति का नाम लिखा, जो मोहल्ले में प्रतिष्ठित, पैसे वाला और सुलझा हुआ था।
दूसरे नंबर पर किसी का नाम लिखना था। तब मोहल्ले में नजर दौड़ाई। किसका नाम लिखूं? तब मोहल्ले में स्थित दो किराने की दुकानदार पर जाकर निगाहें अटक गई। दोनों दुकानदार महत्वपूर्ण थे। एक किराने का अच्छा सामान देता था। मगर किसी से कोई वास्ता नहीं रखता था।
दूसरा, किराना व्यापारी व्यावहारिक था। सभी से बोलचाल रखता था। मगर, किराने के सामान में बहुत ज्यादा मिलावट करता था। इन दोनों में से एक का रैंकिंग में नाम लिखना था। तब बड़ी मुश्किल से सोच-समझकर दूसरे वाले का नाम लिखा। कारण, जो सर्वहिताएं काम करें, वही श्रेष्ठ है।
इस तरह, धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले की रैंकिंग पूर्ण कर ली गई। अपनी जान-पहचान वाले, खास दोस्त, जो स्वयं रामराम करते थे, जिन्हें मुझसे ज्यादा मोहब्बत थी। उन सभी को रैंकिंग में शामिल किया गया। तब सोचा कि इस रैंकिंग को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
चूंकि रैंकिंग बनाने में मेरे 15- 20 दिन बिगड़े थे इसलिए इसे सार्वजनिक करने में, मैं ज्यादा उत्साहित था। ताकि लोगों में मेरी चर्चा हो। मेरा सम्मान बढ़े। साथ ही लोग मेरी पुस्तक खरीद कर पढ़ सके। यह लालच मन में था।
इसे आप मेरा स्वार्थ कर सकते हैं। मगर यह मेरी मेहनत का सार था। जो मैंने बहुत सोच-समझकर तैयार किया था।
यह सब सोचकर मैं उसे सूची को लेकर घर से बाहर निकाला। ताकि पहले उसे मोहल्ले के सार्वजनिक स्थान पर चस्पा करूं। उसके बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दूं।
यह सोचकर जैसे ही सूची व गोंद की शीशी हाथ में लेकर घर से बाहर आया, वैसे ही सामने से एक छुट भैया नेताजी आते हुए मिल गए। जिन्हें मैं रोज झुक-झुक कर सलाम किया करता था। मगर आज नहीं किया था। क्योंकि मैंने आज एक महत्वपूर्ण कार्य किया था, उसी की जोश, जज्बे व जुनून से भरा हुआ था।
इस पर उस छुट भैया नेता ने कहा, “क्यों गुरुजी! आज ना दुआ ना सलाम।” यह कहते हो उसने हाथ में पकड़े हुए कागज की ओर इशारा करके पूछा, “इसमें क्या है?”
जैसे ही उसने पूछा तो मेरी घिग्घी बंध गई। क्योंकि इसमें इस छुट भैया नेता का नाम नहीं था। यह मोहल्ले के हरेक व्यक्ति का काम, नेतागिरी के बल पर करा दिया करता था।
यह बात दूसरी है कि वह झूठ बोलने, मक्कारी करने के साथ-साथ, चमचागिरी करने में सबसे अव्वल था। उस व्यक्ति का नाम सूची में नहीं था। यह याद आते हमारी रूह कांप गई, ‘तुमने इसका नाम कैसे छोड़ दिया?’ हमारी छठी इंद्री ने हमें सचेत किया।
‘इसे जानते हो? यह मोहल्ले का खास छुट भैया नेता है। सांसद और मंत्री के यहां इसकी तूती बोलती है। यदि इसका नाम सबसे ऊपर नहीं रखा तो जानते हो, यहां से तुम्हारा स्थानांतरण ही नहीं होगा, कई तरह की परेशानी भी झेलनी पड़ेगी।
यह याद आते ही हम ऊपर से नीचे तक कांप गए। झट से दूसरे हाथ में पड़ी गोंद की शीशी बगल में दबाई। सूची हाथ में ली। झट से फाड़ दी। तब छूट भैया नेता ने पूछा, “भाई! यह क्या है?”
“कुछ नहीं नेताजी! यह हमारे मन की कुंठा थी, जिसे हम बाहर निकल रहे थे।” जैसे ही हमने कहा तो वे बोले, “गुरुजी! हम समझे नहीं। कृपया विस्तार से समझाइए। यह क्या बोला है?”
मगर, हम इस बला को नेताजी के माथे मढ़ कर अपने लिए बला नहीं बनना चाहते थे। इसलिए छोटे भैया नेताजी से बहाना बनाकर उनसे इजाजत ली। वहां से झट से फुट लिए। मगर सच मानिए, इसके बाद हमने रैंकिंग के बारे में कभी सोचा तक नहीं है।
——
© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
29/11/2024
संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226
ईमेल – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




