डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘कायदे का काम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 299 ☆
☆ व्यंग्य ☆ कायदे का काम ☆
मंत्री जी ने अपने विभाग में अंधाधुंध नियुक्तियां कीं। जब सरकार गिरी तो जांच पड़ताल में बात सामने आयी कि लाखों का लेन-देन हुआ। पत्रकारों ने पूर्व मंत्री जी से पूछा तो उन्होंने हथेली पर तंबाकू ठोकते हुए इत्मीनान से जवाब दिया, ‘सब बकवास है। हमने तो जनसेवा की है। हजारों लोगों को रोजगार दिया है। हवन करने में घी चुराने का आरोप लग रहा है। विरोधियों को शिकायत है तो जांच करा लें।’
उधर पूर्व मंत्री जी के द्वारा नियुक्त नये कर्मचारियों का एक विशेष सम्मेलन हुआ जिसमें सभी ने शपथ ली कि किसी भी हालत में और किसी भी दबाव में यह स्वीकार नहीं करना है कि उन्होंने नौकरी के लिए कोई रिश्वत दी, अन्यथा लगी लगायी नौकरी छूट सकती है। सम्मेलन में पूर्व मंत्री जी को धन्यवाद दिया गया और यह कामना की गयी कि वे बार-बार मंत्री बनें और बार-बार इसी तरह बेरोजगारी हटाने की मुहिम चलायें।
नये मंत्री ने शपथ लेते ही घोषणा की कि अब सब काम कायदे से और पारदर्शी तरीके से होगा और जो कर्मचारी कायदे के खिलाफ जाएगा उस पर सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही होगी।
घोषणा होते ही विभाग के हलकों में चर्चा शुरू हो गयी कि कायदे से काम का मतलब क्या है। अनेक टीकाकारों ने कायदे से काम के अनेक अर्थ प्रस्तुत किये। लोगों की शंका यह थी कि क्या अभी तक काम कायदे से नहीं होता था? जब फाइलें बाकायदा चली हैं और जब उनमें बाकायदा टीपें दी गयी हैं तो काम कायदे से कैसे नहीं हुआ?
तब विभाग के आला अफसर ने दोयम दर्जे के अफसरों को एक दिन बताने की कृपा की कि कायदे से काम का मतलब यह है कि नियुक्तियों और दूसरे कामों में कोई लेन-देन नहीं होगा और जो अधिकारी या कर्मचारी मुद्रा या वस्तु के रूप में घूस लेगा उसे बिना रू-रियायत के पुलिस को सौंप दिया जाएगा। उसके बाद भले ही वह घूस देकर छूट जाए।
बात आला अफसर से चलकर नीचे तक आयी और पूरे विभाग में फैल गयी। फिर विभाग से चलकर पूरे प्रदेश में फैल गयी। चिन्तित चेहरे सड़कों पर घूमने लगे। यह कायदे का काम क्या होता है? क्या अब पुराने कायदे से काम बिलकुल नहीं होगा? विभाग के सभी दफ्तरों में लोग आ आकर पूछताछ करने लगे। जो पढ़ने-लिखने में थोड़ा पिछड़े, लेकिन धन-संपत्ति के मामले में अगड़े हैं, उनकी नैया अब कैसे पार होगी? क्या सिर्फ योग्यता ही नौकरी का आधार बनकर रह जाएगी?
लोग विभाग के कर्मचारियों से हमदर्दी जताने लगे— ‘हमें अपनी परवाह नहीं है। हमारा जो होगा सो होगा। इस विभाग में नौकरी नहीं लगी तो दूसरे में लगेगी। लेकिन आपका और आपके बाल-बच्चों का क्या होगा?’ सुनकर अधिकारियों- कर्मचारियों की आंखों से अश्रु प्रवाहित होने लगे। हमदर्द उनकी दुखती रग छू रहे थे। बहुत से काम रुके पड़े हैं। किसी को मकान की तीसरी मंज़िल बनानी है तो किसी को पुत्र की शादी में पचास लाख खर्च करना है। किसी ने साले के नाम से ट्रक खरीदने की योजना बनायी है। कायदे से काम हुआ तो सब काम रुक जाएंगे।
दुख का आवेग बढ़ा तो कर्मचारियों के आंसुओं से फाइलें गीली होने लगीं। विभाग ने तुरन्त आदेश जारी किया कि सभी फाइलों पर प्लास्टिक के कवर चढ़ा दिये जाएं।
कायदे से काम वाला आदेश जारी होने के एक महीने के भीतर तीन चार कर्मचारी फूलपत्र लेते हुए पकड़े गये और मुअत्तल कर दिये गये। वे ऐसे आसानी से पकड़ लिये गये जैसे कोई शिकारी घायल पक्षी की गर्दन पड़कर ले जाता है। वजह यह थी कि उन्हें अभी कायदे से काम करना नहीं आया था। बहुत से ऐसे थे जो बुढ़ापे में राम-राम बोलना सीख ही नहीं सकते थे।
‘कायदे से काम’ लागू होने से जनता कुछ प्रसन्न हुई। नये मंत्री जी का अभिनन्दन हुआ, तारीफ हुई। लेकिन विभाग की हालत चिन्ताजनक हो गयी। अफसरों-कर्मचारियों की जैसे जान निकल गयी थी। दफ्तरों में मनहूसी फैल गयी। काम करने के लिए किसी का हाथ ही नहीं उठता था। कर्मचारी उदास चेहरा लिये धीरे-धीरे दफ्तर में आते और मेज पर सिर टिका कर बैठ जाते। कुछ मुर्दों की तरह बाहर पेड़ों के नीचे पड़े रहते। आला अफसर परेशान थे। किस-किस के खिलाफ कार्रवाई करें? कर्मचारियों से कुछ कहते तो वे आंखों में आंसू भरकर जवाब देते, ‘क्या करें सर! हाथ में जान ही नहीं रही। शरीर लुंज-पुंज हो गया है। जो सजा देनी हो दे दीजिए। जो भाग्य में होगा, भोगेंगे।’
मंत्री जी के पास रिपोर्ट पहुंची कि ‘कायदे से काम’ वाला आदेश लागू होने से कर्मचारियों के मनोबल में भारी गिरावट हुई है। दफ्तरों में उत्पादकता पहले से आधी भी नहीं रह गयी है। पहले जो काम एक दिन में पूरा होता था वह अब दस दिन में भी नहीं होता। अफसरों कर्मचारियों में प्रेरणा का पूर्ण अभाव हो गया है।
मंत्री जी ने चिन्तित होकर दौरा किया तो पाया कि विभाग के ज्यादातर कार्यालय श्मशान जैसे हो गये हैं। सब तरफ धूल अंटी पड़ी है। हवा चलती है तो सब तरफ धूल उड़ती है। फाइलों पर मकड़जाले तन गये हैं। चूहे धमाचौकड़ी मचाते घूमते हैं। कमरों में कुत्ते सोते हैं, उन्हें कोई नहीं भगाता। कोई काम न होते देख जनता ने आना बन्द कर दिया था।
मंत्री जी ने हर कार्यालय में मीटिंग की। कर्मचारी धीरे-धीरे आकर सिर लटकाये बैठ गये। मंत्री जी ने ‘कायदे से काम’ के फायदे गिनाये तो वे ऐसे सिर हिलाते रहे जैसे मुर्दों में बैटरी लगी हो। मंत्री जी मुर्दों को संबोधित कर, परेशान होकर उठ गये। कर्मचारी फिर धीरे-धीरे चलते हुए अपनी कुर्सियों पर सिर लटका कर बैठ गये।
दफ्तरों की चिन्ताजनक हालत की खबर अखबारों में छपी। मुख्यमंत्री जी ने मंत्री जी को तलब किया। उनकी ‘कायदे से काम’ की योजना की बखिया उधेड़ी। जब कोई काम ही नहीं होता तो कायदे से काम का क्या मतलब? मंत्री जी को हिदायत दी गयी कि किसी भी कीमत पर विभाग की कार्यक्षमता बढ़ायी जाए, अन्यथा उनका पोर्टफोलियो बदल दिया जाएगा।
दूसरे दिन आला अफसर को गोपनीय संदेश गया कि भविष्य में लकीर का फकीर होने के बजाय व्यवहारिक हुआ जाए और एक महीने के भीतर विभाग की कार्यक्षमता पुराने स्तर पर लायी जाए। अफसरों कर्मचारियों ने संदेश के भीतर निहित संदेश को पढ़ा और गुना, और फिर कुछ ही दिनों में दफ्तरों की धूल छंटने लगी। चूहों कुत्तों को अन्यत्र शरण लेने के लिए हंकाला जाने लगा। कर्मचारियों के शरीर में जान और मुख पर मुस्कान लौट आयी। जनता फिर दफ्तरों के काउंटरों पर दिखायी देने लगी।
विभाग के सभी दफ्तरों में कर्मचारियों ने मीटिंग करके मंत्री जी को अपनी नीति में व्यवहारिक परिवर्तन करने के लिए धन्यवाद दिया और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे अब निश्चिंत होकर सब कुछ कर्मचारियों पर छोड़ दें और देखें कि कर्मचारी अब विभाग को कहां से कहां पहुंचा देते हैं।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




