श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जाने कब बदला जमाना?)

☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“हमारे जमाने में कितना अच्छा था, सबको एक दूसरे के लिए फुर्सत थी। सब अपने आरुषि पड़ोसी तो छोड़ो पूरे मोहल्ले का हाल-चाल बता देते थे एक दूसरे के दुख- सुख में खड़े भी रहते थे।

चूल्हे में खाना बनाते थे और हर त्यौहार को एक साथ   मिलजुल कर मानते थे।

क्या हो गया माँजी आज फिर अपने जमाने की यादें ताजा हो गई क्या?

नहीं बहू बस यूं ही याद आ गई थी पता नहीं तुम्हारी बाई कब आएगी? खाना बनाएगी कि नहीं? तो तुम लोग मोबाइल से आर्डर कर देते हो।

माँ जी आपके जमाने में इतनी सुविधा कहां थी?

मां-बाप लड़कियों को पढ़ाते कहां थे. अब हम तो लड़कों से आगे निकल गए हैं। आप थोड़ा बाहर निकलो दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है मां. बहुत खूबसूरत यह दुनिया है और अगर जमाना ना बदला होता तो आपको हम लोग यहाँ इसी मोबाइल में बाबा जी के घर बैठे प्रवचन जो आप सुनते हो यह सब कैसे सुनाते? पुराने जमाने में तो आपको भी काम करना पड़ता और मुझे भी अब हम दोनों आराम से है ना।

हां बहु तुम ठीक कह रही हो. यह जमाना ज्यादा अच्छा है हम तो तुम्हारे बाबूजी के सामने कुछ कह भी नहीं पाते थे. बदलाव हमेशा अच्छा होता है जाने कब जमाना बदल गया और जमाने के साथ हम भी बदल गये।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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