(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ जीवन यात्रा – कहीं न कहीं हरे-भरे पेड़ अवश्य ही होंगे… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
(कथा बिम्ब में छः वर्ष पूर्व प्रकाशित मेरी आत्मकथा)
बहुत वर्ष पहले ‘कथा बिम्ब’ के भाई अरविंद ने आत्मकथ्य लिखने का प्रेमपूर्वक आग्रह किया था । तब लिख नहीं पाया । पत्रकारिता ने बहुत कुछ पीछे ठेल रखा था । अब पूरी तरह सेवानिवृत्त और स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन का समय मिला तो अपने बारे में लिखने का अवसर भी मिल गया ।
मैं मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा जिले से हूं । इसमें शहीद भगतसिंह का पैतृक गांव खटकड कलां भी शामिल होने के कारण पंजाब सरकार ने अब इस जिले का नाम शहीद भगतसिंह नगर कर दिया है । मुझे बहुत गर्व है कि शहीद भगतसिंह की स्मृति में पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा खोले गये गवर्नमेंट आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सन् 1979 में मुझे हिंदी प्राध्यापक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला । सन् 1985 में मुझे कार्यवाहक प्रिंसिपल बना दिया गया । इस तरह शहीद के परिवार सदस्यों से मुलाकातें भी होती रहीं । मेरा लेख ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुआ : शहीद भगतसिंह के पुरखों का गांव ।
खैर । पढाई से बात शुरू करता हूं । जो लडका बड़ा होकर स्कूल प्रिंसिपल बना और स्कूल को सर्वश्रेष्ठ स्कूल का पुरस्कार दिलाया , वही लड़का कभी पांचवीं कक्षा तक स्कूल का भगौड़ा लड़का था । पिता जी छोड़ कर जाते और कुछ समय बाद बेटे को देखने आते तो पता चलता कि बरखुरदार फट्टी बस्ता रख कर भाग चुके हैं । पिताजी का माथा ठनकता और उनकी छठी इंद्री बताती कि हो न हो , यह लड़का छोटी जाति के नौकर के घर जा छिपा है । वे वहां पहुंचते और थप्पडों से मुंह लाल कर घर ले आते । फिर ठिकाना बदलता और फिर खोजते । फिर वहीं थप्पडों से बेहाल । पिता जी , दादी और घर के लोग यह मानते कि यह बच्चा नहीं पढ़ेगा । दादा जी कहते कोई बात नहीं । गांव में तीन तीन भैंसे हैं । बस । कोई गम नहीं । खेतों में चराने चले जाना । मैं मन ही मन इस काम से भी कांप जाता । भैंस चराने का गुण आया ही नहीं।
थोड़ा बड़ा हुआ तो दादी को हमारे चचा के लडके शाम ने बताया कि दादी, एक बह्मीबूटी आती है । इसे रोज सुबह पिला दो । उसने पंसारी की दुकान से ला दी । दादी ने खूब घोट कर पिलाई । साथ में वृहस्पतिवार के व्रत ताकि देवता की कृपा हो जाए । पता नहीं , देवता खुश हुए या बूटी असर कर गयी कि मैं मिडल क्लास में सेकेंड डिवीजन में पास हो गया । दादी ने परात में लड्डू रखे और खुशी में मोहल्ले भर में बांटे ।
यह है मेरी पढ़ाई का हाल । ग्यारहवीं तक मेरे पिता, दादा और दादी का निधन हो चुका था जो मुझे पढाई में सफल देखना चाहते थे । मैं इतना सफल हुआ कि तीनों वर्ष कॉलेज में प्रथम रहा । पर अफसोस अब कोई परात भर कर लडडू बांटने वाला नहीं था । मैं कमरा बंद कर खूब रोता अपनी ऐसी सफलता पर जिसे कोई देखने वाला नहीं था । महाविद्यालय की पत्रिका का छात्र संपादक भी रहा । यहीं से संपादन में रूचि बढ़ी । फिर बीएड में भी छात्र संपादक । इसी प्रकार गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की प्रभाकर परीक्षा में स्वर्ण पदक पाया । हिंदी एम ए की हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में ।
बात साहित्य की करें । मेरे परिवार का साहित्य से दूर दूर तक नाता नहीं था लेकिन ‘हिंदी मिलाप’ अखबार प्रतिदिन घर में आता था , जिसे मैं जरूर पढता था । उसमें फिक्र तौंसवीं का व्यंग्य काॅलम ‘प्याज के छिलके’ बहुत पसंद आता । ‘वीर प्रताप’ अखबार ने मुझे नवांशहर का बालोद्यान का संयोजक बना रखा था । यह अखबार इस नाते फ्री घर में डाला जाता था । इस तरह दो अखबार पढने को मिलते । रेडियो खूब सुनता । बाल कहानियों को जरूर सुनता । दादी भी सर्दियों में अंगीठी के आसपास बिठा कर कहानियां सुनाती । वही राजकुमार, राजकुमारियों के किस्से । पर हर राजकुमार किसी न किसी राजकुमारी को राक्षस की चंगुल से छुडाकर लाता । बस । ‘दरवाजा कौन खोलेगा’ कथा संग्रह में मैंने भूमिका में यही लिखा कि हर जगह राक्षस है । राजकुमारी कैद है । राजकुमार का संघर्ष है । यही जीवन है ।
मेरी पहली रचना ‘नयी कमीज’ जनप्रदीप समाचार-पत्र में प्रकाशित हुई । पिता जी मेरी पुरानी कमीज नौकर के बेटे के लिए ले गये थे । वह गांव भर में नाचता फिरा और मन ही मन शर्मिंदा होकर सोचता रहा कि हमारी उतरन भी नौकर के बेटे की खुशी का कारण बन सकती है ? समाजसेवा का भाव जगा । मैं सन् 1979 से लेकर 1990 तक खटकड कलां में प्रिंसिपल रहा । साथ में चंडीगढ से प्रकाशित ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का आंशिक संवाददाता भी । मेरी रूचि साहित्य के साथ साथ पत्रकारिता में जुनून की हद तक बढती चली गयी । मेरे पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर लिखी : एक संवाददाता की डायरी कहानी को सारिका में तो नीले घोडे वाले सवारों के नाम’, कहानी को धर्मयुग ने जुलाई, 1982 के अंकों में प्रकाशित किया । पहली बार पता चला कि लेखक की फैन मेल क्या होती है । प्रतिदिन औसतन दो तीन पत्र इन कहानियों पर मिलते । तब मैंने सोचा कि कम लिखो और कोशिश कर अच्छा लिखो । इसी प्रकार ‘कथा बिम्ब’ में प्रकाशित कहानी : सूनी मांग का गीत पर भी अनेक पत्र मिले । कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, अज्ञेय व श्रीपत राय के संपादन में कहानियां प्रकाशित होने का सुख मिला । श्रीपत राय ने तो एक वर्ष में मेरी आठ कहानियां प्रकाशित कीं । मुलाकात के दौरान उलाहना दिया कि बारह कहानियां क्यों नहीं लिखीं ? इस प्रोत्साहन से ज्यादा क्या चाहिए ? ज्यादा लेखन का कोई तुक नहीं । मेरे कथा संग्रह बडे़ रचनाकारों के सुझावों पर प्रकाशित हुए । बिना कुछ रकम दिए ।
सन् 1975 में मैं केंद्रीय हिंदी निदेशालय की ओर से अहिंदी भाषी लेखकों के अहमदाबाद में एक सप्ताह के लिए लगने वाले लेखक शिविर के लिए चुना गया । तब राजी सेठ वहीं रहती थीं और उन्होने भी इस शिविर में भाग लिया और उनकी पहली कहानी ‘क्योंकर’ कहानी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । राजन सेठ के नाम के नाम से । लड़कों जैसा नाम होने के कारण उन्होंने अपना नाम राजी सेठ कर लिया । विष्णु प्रभाकर हमारी कहानी की क्लास लेते थे । इन दोनों से मेरा व्यक्तिगत परिचय तब से चला आ रहा है । विष्णु जी के बाद उनके परिवार से जुड़ा हुआ हूं । विष्णु जी के अनेक इंटरव्यूज प्रकाशित किए । तीन बार आमंत्रित भी किया क्योंकि संयोगवश हिसार पोस्टिंग हो जाने पर पता चला कि हिसार में अपने मामा के पास विष्णु जी ने पढ़ाई की । नौकरी की और साहित्यिक यात्रा शुरू की । बीस वर्ष यहीं गुजारे पर सीआईडी के पीछे लग जाने से दिल्ली चले गये और फिर नहीं लौटे । हां , हिसार के प्रति लगाव बहुत अधिक । आमंत्रण पर नंगे पाँव दौड़े आते । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के कथा समारोह में आए । जब उन्हें मान सम्मान की राशि का लिफाफा सौंपा तो स्नेह से भावुक होकर बोले -तेरे जैसा शिष्य भी सौभाग्य से मिलता है ।
मेरे जीवन में कहानी लेखन में रमेश बतरा का बहुत बडा योगदान है । चंडीगढ हम लोग इकट्ठे होते और रमेश का कहना था कि यदि एक माह में एक कहानी नहीं लिखी तो मुंह मत दिखाना । लगातार नयी कहानी। फिर वह ‘सारिका’ में उपसंपादक बन कर चला गया । जहां भी संपादन किया मेरी रचनाएं आमंत्रित कीं । ‘कायर’ लघुकथा उसके दिल के बहुत करीब थी । वह कहता था कि यदि मैं विशव की श्रेषठ लघुकथाओं को भी चुनने लगूं तो भी इसे रखूंगा । वरिष्ठ कथाकार राकेश वत्स की चुनौती भी बडी काम आई । वे एक ही बार नवांशहर आए और देर रात शराब के हल्के हल्के सरूर में जब चहलकदमी के लिए निकले तब वत्स ने मुझे और मुकेश सेठी को कहा कि मैं आपको कहानीकार कैसे मान लूं ? आपकी कहानियां न सारिका में , न धर्मयुग और हिंदुस्तान में आई हैं । फिर रमेश को बताया । उसने भी कहा कि वत्स की इस बात को और चुनौती को स्वीकार करो । फिर क्या था ? सारिका, नया प्रतीक, कहानी में स्थान मिला । अनेक अन्य भाषाओं में कहानियां अनुवादित हुईं । रमेश असमय चला गया । अब कोई दबाव नहीं । कोई चुनौती भी नहीं । कहानी भी नहीं । पहला कथा संग्रह ‘महक से ऊपर’ राजी सेठ के स्नेह से डाॅ महीप सिंह ने प्रकाशित किया : अभिव्यंजना प्रकाशन से । ‘महक से ऊपर’ । रॉयल्टी भी मिली और पंजाब भाषा विभाग से सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार भी । पहली कृति पर पुरस्कार और रॉयल्टी । नये कथाकार को और क्या चाहिए ?
सन् 1990 में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक राधेश्याम शर्मा और समाचार संपादक सत्यानंद शाकिर दैनिक ट्रिब्यून में मुझे पूर्णकालिक चाहते थे । मार्च माह की पहली तारीख को प्रिंसिपल, शिक्षण व अध्यापन को अलविदा कहने के बाद पत्रकारिता में आ गया । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का कथा कहानी पन्ना संपादित करने का अवसर मिला । कश्मीर से दिल्ली तक के कथाकारों से काफी जानने और मिलने का मौका मिला । कथा व लघुकथा को विशेष स्थान दिया । इस बीच मेरे लघुकथा संग्रह मस्तराम जिंदाबाद, इस बार तो कथा संग्रह मां और मिट्टी, जादूगरनी , शो विंडो की गुडिया आदि प्रकाशित हुए । मजेदार बात है कि साहित्य में मुझे लघुकथाकार ही समझा जा रहा है जबकि मेरे छह कथा संग्रह हैं । जहां तक कि ग्रंथ अकादमी के लिए कथा संकलन संपादित करने वाले ज्ञान प्रकाश विवेक मेरा कथा संग्रह दरवाजा कौन खोलेगा पढ कर हैरान रह गये और फोन पर कहा कि यार , मुझे बहुत हैरानी हुई कि लोग आपको लघुथाकार ही क्यों मानते हैं ?
मुझे हिसार में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के स्टाफ रिपोर्टर के रूप में अवसर मिला एक नये प्रदेश और संस्कृति को जानने का । इस दौरान डाॅ नरेंद्र कोहली के सुझाव पर मेरा कथा संग्रह ‘एक संवाददाता की डायरी’ तो डाॅ वीरेंद्र मेंहदीरता के सुझाव पर जादूगरनी , ‘शो विंडो की गुडिया’ कथा संग्रह चंडीगढ के अभिषेक प्रकाशन से आए । ऐसे थे तुम , इतनी सी बात , मां और मिट्टी, दरवाजा कौन खोलेगा जैसे संकलन भी पाठकों तक पहुंचे ।
इस तरह अब तक मेरे सात कथा संग्रह और पांच लघुकथा संग्रह हैं । ‘एक संवाददाता की डायरी’ को अहिंदी भाषी लेखन पुरस्कार योजना में प्रथम पुरस्कार मिला और सबसे सुखद क्षण जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों यह पुरस्कार मिला । किसी रचनाकार के हाथों पुरस्कार मिलना आज भी पुलक से भर देता है । अटल जी ने वह संग्रह पढ़ने के लिए मंगवाया भी ।
काॅलेज छात्र के रूप में खुद की पत्रिकाएं प्रयास, पूर्वा और प्रस्तुत प्रकाशित कीं । दैनिक ट्रिब्यून से त्यागपत्र दिलवा कर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुझे नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष बना कर ले गये । नयी अकादमी की कथा पत्रिका ‘कथा समय’ का संपादन किया । नये रचनाकारों को स्थान देना सदैव मुझे अच्छा लगता है । वरिष्ठ रचनाकारों की कहानियां भी दीं । नेहा शरद, शेखर जोशी , अमरकांत, नरेंद्र कोहली, राजी सेठ, वीरेंद्र मेंहदीरता, निर्मल वर्मा, रविंद्र कालिया, ममता कालिया की चुनी हुई कहानियां दीं ।
अब अकादमी के पद से मुक्त हूं । हिसार के एक प्रतिष्ठित सांध्य दैनिक नभछोर में प्रतिदिन संपादकीय आलेख और साहित्य हिसार का देखता हूं । अनेक यात्राएं करता हूं । साहित्यिक संस्थाओं के आमंत्रण पर अलग अलग मित्र बनते हैं । सीखने की कोशिश करता हूं । पुरस्कारों की सूची से कोई लाभ नहीं होगा । जो मुझे पढ़ते हैं , वही मेरा पुरस्कार हैंं । मेरे लघुकथा संग्रह ‘इतनी सी बात’ का फगवाड़ा के कमला नेहरू काॅलेज की प्रिंसिपल डाॅ किरण वालिया ने ‘ऐनी कु गल्ल’ के रूप में पंजाबी में अनुवाद करवा कर प्रकाशित करवाया । इसी प्रकार मेरा कथा संग्रह ‘मां और मिट्टी’ नेपाली में अनुवाद हुआ । यह सुखद अनुभूति किसी पुरस्कार से कम नहीं । मैं एक बात महसूस करता हूं और कहता भी हूं कि मैंने कम लिखा क्योंकि सन् 1982 में मंत्र मिल गया लेकिन मुझे उससे ज्यादा सम्मान मिला । मेरी इंटरवयूज की पुस्तक : यादों की धरोहर जालंधर के आस्था प्रकाशन से आने के बिल तीन तीन संस्करण आ चुके हैं । इसमें एक पत्रकार के रूप में अच्छे , नामवर साहितयकारों , रंगकर्मियों , पत्रकारों व संस्कृति कर्मियों के इंटरव्यूज शामिल हैं जो समय समय पर ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के लिए किए गए थे । शीघ्र ही इंडियानेटबुक्स से महक से ऊपर का दूसरा संस्करण आयेगा । पत्रकारिता में भी ग्रामीण पत्रकारिता पर हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से तो साहित्यिक पत्रकारिता पर हरियाणा साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिले । रामदरश मिश्र की ये पंक्तियां बहुत प्रिय हैं :
मिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारी
मोहब्बत मिली है मगर धीरे-धीरे
जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे, ,,
इसी प्रकार अज्ञेय जी की ये पंक्तियां भी बहुत हौंसला देती हैं :
कहीं न कहीं
हरे-भरे पेड़ अवश्य ही होंगे
नहीं तो थका हारा बटोही
अपनी यात्रा जारी क्यों रखता ,,,,,
सच साहित्य ने क्या नहीं दिया ? जब मेरी बडी बेटी रश्मि रोहतक के पीजीआई में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी तब पुस्तक मेले से पुस्तकें लाकर उसके पास बैठ कर पढ़ता था । जब छोटी बेटी प्राची चंडीगढ़ के पीजीआई में तेइस दिन ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रही थी तब मैने तीन कहानियां लिखी थीं । यह साहित्य ही है जो दुख के समय मेरे काम आता रहा है । जब पिता , दादा और दादी नहीं रहे थे तब एक चौदह वर्ष के बालक को साहित्य ने सहारा दिया ।
सच अज्ञेय जी सही लिखते हैं : दुख सबको मांझता है । अमोघ शक्ति है साहित्य । साहित्यकार का सपना होता है कि कुछ लिखकर समाज को संदेश दे ।
मुंशी प्रेमचंद का मंत्र है कि साहित्यकार सुलाने के लिए नहीं , समाज को जगाने के लिए है ।
(श्री अजीत सिंह जी, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन द्वारा वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब की वेब विचार गोष्ठी में “साहित्य और पत्रकारिता” विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी से की गई परिचर्चा को ई -अभिव्यक्ति के पाठकों के साथ हमने 31 अक्टूबर 2020 को साझा किया था। आज श्री कमलेश भारतीय जी के जन्म दिवस पर पुनर्पाठ में आपसे पुनः साझा करना प्रासंगिक है।)
☆ परिचर्चा ☆ आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान कह सकते हैं: श्री कमलेश भारतीय ☆ श्री अजीत सिंह ☆
🙏 आज श्री कमलेश भारतीय जी को उनके जन्मदिवस पर ‘ई-अभिव्यक्ति’ एवं ‘पाठक मंच’ परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
जाने माने कथाकार व हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष श्री कमलेश भारतीय का कहना है कि साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों व कहानियों में जिस तरह ग्रामीण जीवन व दलित वर्ग की पीड़ा का वर्णन किया गया है, वह मुझे हूबहू अपने गांव का वर्णन लगता था ।
” इसी वर्णन ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है और मेरी कहानियों व लघुकथाएं में भी प्रेमचंद के चरित्रों से मिलते जुलते दलित व वंचित लोगों का ज़िक्र बहुतायत से मिलता है”।
कमलेश भारतीय ने यह बात वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब की वेब विचार गोष्ठी में “साहित्य और पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए कही।
“मेरे कमरे में मुंशी प्रेमचंद की फोटो देखकर कुछ लोग मुझसे पूछते थे, क्या यह आपके पिताजी की तस्वीर है? मैं गर्वित हो कहता था आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान मान सकते हैं”।
श्री कमलेश भारतीय
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
एक रोचक किस्सा सुनाते हुए भारतीय ने कहा कि पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था।
“मैं स्कूल से अक्सर भाग जाता था । अध्यापकों व पिताजी से पिटाई होती थी। दादा जी कहते थे, पढ़ेगा नहीं तो भैंसें चराएगा।
आठवीं में हुआ तो दादी कहीं से ब्रह्मीबूटी लाई। सुबह सवेरे रोज़ पिलाती थी। बृहस्पतिवार को व्रत रखवाती थी। अब पता नहीं यह ब्रह्मीबूटी का कमाल था या बृहस्पतिवार के व्रत का या दादी की तपस्या और मन्नत का, कि मैं आठवीं में सेकंड डिविजन में पास हो गया। दादी ने लड्डू बांटे। मुझे भी कुछ हौसला सा मिला और मेरी पढ़ाई में रुचि बन गई। उसके बाद मैंने सभी परीक्षाएं फर्स्ट डिवीजन में पास की। अपने काॅलेज में तीनों वर्ष फर्स्ट और प्रभाकर परीक्षा में गोल्ड मेडल । यहीं से साहित्य में भी रुचि बनी।
कमलेश भारतीय पिछले 45 वर्षों से लिखते आ रहे हैं। उनके दस कथा संग्रह छप चुके हैं जिनमें चार लघु कथा संग्रह हैं। प्रमुख साहित्यकारों से उनके इंटरव्यू बड़े मकबूल हुए हैं। इन्हीं पर आधारित उनकी पुस्तक “यादों की धरोहर” पिछले साल अाई थी और अब उसका दूसरा संस्करण आकर भी समाप्त । इसी महीने उनकी नई पुस्तक “आम रास्ता नहीं है” अाई है ।
भारतीय ने चार भाषाओं इंग्लिश, हिंदी, पंजाबी व संस्कृत के साथ बी ए की और बी एड कर पंजाब के नवां शहर के स्कूलों में 17 वर्ष अध्यापन किया। साथ में लेखन भी करते रहे और उनके लेख जालंधर के अखबारों में छपते रहे। सन् 1990 से उन्होंने स्कूल प्रिंसिपल की नौकरी छोड़ दैनिक ट्रिब्यून में पहले उपसंपादक और फिर हिसार में प्रिंसिपल संवाददाता के रूप में पत्रकारिता और साहित्य लेखन साथ साथ ही किया। उन्हे साहित्य लेखन के लिए अनेक पुरस्कार भी मिले जिनमें हरियाणा साहित्य अकादमी का देशबंधु गुप्त साहित्यिक पत्रकारिता का एक लाख रुपए का पुरस्कार तथा गैर – हिंदी राज्यों के हिंदी लेखकों के लिए केंद्र सरकार का 50 हज़ार रुपए का पुरस्कार उनकी पुस्तक “एक संवाददाता की डायरी” पर मिलना भी शामिल है।
वे तीन साल तक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष के पद पर रहते हुए लालबत्ती की गाड़ी में भी चले।
एक प्रश्न के उत्तर में भारतीय ने कहा कि बेशक घटिया संवादों के लिए सोशल मीडिया बदनाम है, पर इसमें साहित्य को लोकप्रिय बनाने की भी भरपूर संभावनाएं हैं। हर भाषा का पूरा साहित्य इंटरनेट पर मौजूद है। लेखकों, खास तौर पर बड़े लेखकों, को अपने साथ युवाओं को जोड़ कर उनमें साहित्यिक रुचि विकसित करनी चाहिए। अध्यापक और माता पिता भी बच्चों को स्कूल और कॉलेज के दौरान अच्छे साहित्य से परिचित करा सकते हैं।
” सोशल मीडिया पर डाले गए मेरे लेख को कई हज़ार लाइक और फॉरवर्ड मिल जाते हैं। जितनी संख्या में पुस्तक बिकती है उससे कई गुणा पाठक नेट पर मिल जाते हैं। लगभग हर लेखक का साहित्य नेट पर फ्री उपलब्ध है। सोशल मीडिया का उपयोग साहित्य प्रसार के लिए अच्छी तरह हो रहा है तथा इसके विस्तार की और बड़ी संभावनाएं हैं”।
रोचक साहित्य का ज़िक्र करते हुए कमलेश भारतीय ने कहा कि वे भी शुरू में स्कूल टाइम में जासूसी नॉवेल पढ़ते थे।
“मेरे स्कूल टीचर सरदार प्रीतमसिंह ने मुझे मुंशी प्रेमचंद की ओर मोड़ दिया। कॉलेज में अंग्रेज़ी के टीचर एच एल जोशी ने “ओल्ड मैन एंड द सी” नॉवेल के साथ अंग्रेज़ी साहित्य से रूबरू कराया और बस साहित्य की लगन लग गई, पढ़ने से शुरू हुई और लेखन तक पहुंच गई”।
इंटरव्यू की विधा का ज़िक्र करते हुए भारतीय ने कहा कि
वैसे तो हर पत्रकार इंटरव्यूअर होता है, पर साहित्यकार के इंटरव्यू के लिए उसके साहित्य का ज्ञान भी होना चाहिए और लेखन की साहित्यिक शैली भी आनी चाहिए, तभी बात में गहराई आएगी। अच्छे लेखन के लिए अच्छा साहित्य पढ़ना बहुत ज़रूरी है।
पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप से भारतीय बड़े निराश हैं, खास तौर पर टेलीविजन पत्रकारिता से। सिर्फ सनसनी और चिल्लाना पत्रकारिता नहीं है। ऐसा व्यावसायिक और राजनैतिक दबावों के चलते हो रहा है। प्रिंट मीडिया कुछ बचा हुआ है पर वहां भी साहित्य के परिशिष्ट समाप्त प्राय हैं। कादम्बिनी और नंदन जैसी पत्रिकाएं हाल ही में बंद हो गयीं । पाठक, श्रोता व दर्शक को विवेक से काम लेते हुए मीडिया का उपयोग करना चाहिए”।
एक तरह से यह गोष्ठी एक इंटरव्यूअर का इंटरव्यू भी रही।
🙏💐आज श्री कमलेश भारतीय जी को उनके जन्मदिवस पर ‘ई-अभिव्यक्ति’ एवं ‘पाठक मंच’ परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏
शिक्षा- एम. ए., एम.फिल., पी-एचडी, बी.एड., डी-लिट. हेतु अध्ययनरत.
पी-एचडी.का शोध विषय डॉ.शिवप्रसाद सिंह के उपन्यासों में जीवन मूल्यों का चित्रण – एक समीक्षात्मक अध्ययन. (शोध प्रबंध), नीला चांद उपन्यास में जीवन-मूल्य, (लघु शोध प्रबंध.), रामेश्वर शुक्ल अंचल के खंडकाव्य अपराधिता का अध्ययन, (लघु शोध प्रबंध.)
शैक्षणिक अनुभव 1990 से 97 तक हवाबाग महिला महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्य.
चार साल दैनिक समाचार पत्र नवभारत, जबलपुर के संपादकीय विभाग में कार्य., जबलपुर के ऐतिहासिक संदर्भ में 20 से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन.
वर्तमान में वरिष्ठ व्याख्याता पद पर क्राईस्ट चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जबलपुर में अध्यापनरत.
दो शोध छात्राओं को पीएचडी हेतु शोध सहयोग
5 से अधिक पत्रिकाओं का संपादन.
मानव संसाधन विभाग नई दिल्ली द्वारा श्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार 2018.
जबलपुर की शैक्षणिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान।
नई पीढ़ी को जबलपुर की साहित्य धारा से परिचित कराने हेतु आईसीएससी एवं सीबीएससी हिंदी परियोजना के अंतर्गत 500 से अधिक क्षेत्रीय साहित्यकारों पर लघु शोध पत्र छात्रों द्वारा तैयार करवाए हैं।
जबलपुर पुरातत्व पर्यटन एवं संस्कृति परिषद द्वारा आयोजित पर्यटन क्विज़ प्रतियोगिता हेतु क्राईस्ट चर्च स्कूल के छात्रों का मार्गदर्शन। फलस्वरूप छात्रों द्वारा 2016 से लगातार जबलपुर जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
☆ जीवन यात्रा ☆ एक चंदन चरित्र डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ – श्रद्धा स्मरण ☆
डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’
आज जबलपुर की साहित्यिक पत्रकारिता लोकधर्मी प्रतिष्ठा की जिस अधित्यका पर जा पहुंची है, उसकी चढ़ाई का सूत्रपात करने में डॉ.राजकुमार तिवारी सुमित्र का यशस्वी योगदान है।
उन्होंने हिंदी के नव लेखकों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से तो किया ही साथ ही काव्य की कुंज गली से बाहर निकल निबंध ,नाटक, उपन्यास ,आलोचना, समालोचना आदि के विभिन्न क्षेत्रों में नव साहित्य साधकों को आगे बढ़ाने का स्तुत्य प्रयास भी किया था।
जबलपुर की हिंदी पत्रकारिता, पाथेय प्रकाशन उनके व्यक्तिगत प्रयत्न एवं प्रोत्साहन की हमेशा ऋणी रहेगी ।
आज देवलोक से, वार्धक्य की विस्मित रेखाओं से जब वह जबलपुर का हिंदी समाज देखते होगें तब उन्हें आत्मिक संतोष अवश्य होता होगा कि उन्होंने सांस्कृतिक पथ प्रदर्शक का कार्य बहुत ईमानदारी से किया।
इक चंदन चरित्र डॉ.राजकुमार तिवारी सुमित्र जी से मेरा परिचय 1990 के पूर्व हुआ जब मैं छायावादोत्तर काल के महाकवि श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के खंडकाव्य अपराधिता पर लघु शोध प्रबंध लिख रहा था और शोध की प्रक्रिया और प्रविधि को ठीक तरह से जानने हेतु मुझे अंचल जी ने सुमित्र जी के पास भेजा।
95,96 से यह परिचय आत्मीयता में बदल गया क्योंकि मैं नवभारत के संपादकीय विभाग में कार्य करने लगा और वहां डॉ.सुमित्र जी का आना अक्सर होता था, वहीं डॉ. तिवारी के हिन्दी की अभिवृद्धि को संजीवित और प्रसृत करने के वाक्य मेरे कर्ण पटल पर आशीर्वाद स्वरुप सुनाई देते थे। कुछ ही दिनों में उनकी पुत्रियों डॉ.भावना जी एवं डॉ.कामना जी बेटे डॉ.हर्ष तिवारी जी के व्यक्तित्व व्यवहार से भी परिचित होता गया।
मुझे स्मरण आ रहा उनका सानिध्य जानकीरमण कॉलेज की एक संगोष्ठी से लौटते समय आदरणीय डॉ.गायत्री तिवारी जी एवं सुमित्र जी ने मुझे सेवा का अवसर दिया और वह मेरी कार में बैठकर कोतवाली तक आए। ममतामयी कथाकार श्रीमती तिवारी का वह आंचलिक वार्तालाप और संवाद आज भी मुझे याद आता है। गायत्री जी की कहानियाँ हर्षित प्रेम की दृष्टि से घरेलु जीवन के मधुरतम क्षणों ,राष्ट्रीय कामना और भावना से उत्प्रेरित थी।
1996-97 में क्राईस्ट-चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हिंदी व्याख्याता नियुक्त होने पर हमारी सीनियर श्रीमती निर्मला तिवारी जी ने राजू भैया के प्रशंसनीय कार्यों को महत्त्व देते पुनः उनके साथ साहित्यिक परिचय कराया ।
मुझे कोतवाली के उस बाडे में बैठाकर कुछ सत्संग-सानिध्य का समय देकर साहित्यिक प्रेरणा के महापात्र बने थे डॉ.तिवारी ! उनके गद्यात्मक काव्य और कविता मय गद्य को सुना था।
मेरे स्कूली छात्रों ने जब जबलपुर के पत्रकारों-साहित्यकारों पर शोध आलेख लिखना शुरू किया तब डॉ. सुमित्र ने मेरे लघु प्रयासों की प्रशंसा और हिन्दी सेवा को महत्व देते हुए जबलपुर के अनेक साहित्यकारों से परिचय कराया, मार्गदर्शन दिया और मेरा मनोबल बढ़ाया ।
आज उनकी जिजीविषा सपृक्त लेखन शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली दो पुस्तकें, शब्द अब नहीं रहे शब्द और आदमी तोता नहीं के काव्यादर्श मेरे आदर्श बन गये हैं, मेरी हृदय से कामना थी कि डॉ. सुमित्र पर साहित्यकार हमेशा लिखते रहें याद करते रहें क्योंकि, लेखन ही उनके जीवन का धर्म-कर्म और अध्यात्म था। वही उन्हें जिंदा रखने वाली, प्राणवायु थी ।
डॉ.सुमित्र कोरे कवि ,पत्रकार मौजी जीव नहीं बल्कि समाज सेवा के व्यावहारिक पहलुओं को संस्थापित, शिक्षित करने वाले ऐसे लेखक थे जिनकी कीर्तिवर्धनी लेखनी समाज को हमेशा उत्प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहेगी।
मैं जानता हूँ कि उनकी भस्मीभूत देह का पुनरागमन कहाँ, उनकी आत्मा अनंत की विपुलता में है आत्मानुभव के आत्म प्रकाश में है।
☆ जीवन यात्रा – 30 वर्ष का हुआ हिंदी आंदोलन परिवार – श्री संजय भारद्वाज, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे ☆
(भारतीय भाषाओं को रोटी से जोड़ने के लिए आंदोलन)
30 सितम्बर 2025, हिंदी आंदोलन परिवार का 31वाँ स्थापना दिवस। सच कहूँ तो हिंआप केवल शब्द या संस्था भर नहीं है। हमारी संतान है हिंआप।
विवाह के लगभग ढाई वर्ष बाद हिंआप का जन्म हुआ। बच्चे के जीवन में गिरने-पड़ने-संभलने, उठने-चलने-दौड़ने के जो चरण और प्रक्रियाएँ होती हैं, वे सभी हिंआप के जीवन में हुईं। हमारी संतान अब नयनाभिराम युवा हो चुकी।
(श्रीमती सुधा संजय भारद्वाज)
स्मृतिचक्र घूम रहा है और लेखनी चल रही है। ईश्वर की अनुकम्पा, माता-पिता के आशीष और आत्मीय जनो की शुभकामनाओं के चलते सार्वजनिक जीवन में छोटी-सी ही सही, स्थापना मिली। इसके चलते प्रायः विभिन्न आयोजनों में जाना होता है। स्वागत/ सम्मानस्वरूप मिला पुष्पगुच्छ घर लाकर रख देता हूँ। ऊपर से बेहद सुंदर दिखते पुष्प तीन से चार दिन में पूरी तरह सूख जाते हैं। जड़ों से कटने पर यही स्थिति होती है।
हिंआप ने अपनी स्थापना के समय से ही काटने या तोड़ने के मुकाबले खिलने और जोड़ने की प्रक्रिया को अपनाया। हमने बुके के स्थान पर पौधे देने की परंपरा का अनुसरण किया, विनम्रता से कहूँ तो कुछ अर्थों में सूत्रपात भी किया। पौधे मिट्टी से जुड़े होते हैं। इनमें वृक्ष बनने की संभावना अंतर्निहित होती है।
(साक्षात्कार लेतीं सुश्री वीनू जमुआर )
(प्रसिद्ध साहित्यिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे द्वारा अपने सफल 27वें वर्ष में प्रवेश करते समय पुनर्पाठ के अंतर्गत 30 सितम्बर 2019 (रजत जयंती वर्ष ) को संस्था के संस्थापक अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज जी से सुश्री वीनु जमुआर जी की बातचीत आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं )
इसी संभावना को हिंआप में संगठन के स्तर पर लागू करने का प्रयास भी किया। सभी साथियों की प्रतिभा को यथासंभव समझकर उन्हें स्वयं को मांजने- तराशने के समुचित अवसर देते गए। इसमें वाचन,लेखन, प्रस्तुति से लेकर व्यवस्थापन कुशलता, समूह में काम करने की वृत्ति, नेतृत्व, सहयोग, समयबद्धता, संचालन जैसे अनेक आयाम समाविष्ट हैं। मिट्टी से जुड़े रहने का लाभ यह हुआ कि कुछ वृक्ष बन चुके, कुछ पौधे हैं, कुछ अंकुर फूट रहे हैं, कुछ बीज बोये जा चुके। अत्यंत नम्रता से कहना चाहता हूँ कि इस प्रक्रिया के चलते आज हिंआप के पास भविष्य की टीम भी तैयार है।
संस्था के सामूहिक प्रयासों ने ‘आंदोलन’ शब्द जिस अर्थ में ढल चुका था, उससे बाहर निकाल कर उसे ‘अभियान’ का अर्थ देने में सफलता पाई।
धारा के विरुद्ध काम करते समय प्राय: उपजने वाली निराशा और थकान का हिंआप सौभाग्य से अपवाद रहा। हर बीज से नया वृक्ष खड़ा करने की जिजीविषा इस उपवन को निरंतर विस्तृत करती रही।
(गांधी जी की सहयोगी रहीं डॉ. शोभना रानाडे और भारत को परम कंप्यूटर देने वाले डॉ विजय भटकर, साहित्यकार डॉ दामोदर खडसे द्वारा हिंदी आंदोलन परिवार के वार्षिक अंक ‘हम लोग’ का विमोचन. इस पत्रिका में प्रतिवर्ष १०० से अधिक रचनाकारों को स्थान दिया जाता है.)
हिंआप आशंका में संभावना बोने का मिशन है। नित विस्तृत होती परिधि में बीज से वृक्ष होने की संभावना को व्यक्त करती हिंआप के जन्म के आसपास के समय की अपनी एक रचना स्मरण हो आई।
*
जलती सूखी ज़मीन,
ठूँठ-से खड़े पेड़,
अंतिम संस्कार की
प्रतीक्षा करती पीली घास,
लू के गर्म शरारे,
दरकती माटी की दरारें,
इन दरारों के बीच पड़ा
वो बीज…,
मैं निराश नहीं हूँ,
यह बीज मेरी आशा का केन्द्र है,
यह,
जो अपने भीतर समाये है
असीम संभावनाएँ-
वृक्ष होने की,
छाया देने की,
बरसात देने की,
फल देने की,
और हाँ;
फिर एक नया बीज देने की,
मैं निराश नहीं हूँ,
यह बीज
मेरी आशा का केन्द्र है।
*
आशा बनी रही, भाषा टिकी रहे, हमारी संस्था, इस क्षेत्र में कार्यरत हर संस्था चलती रहे उस दिन तक, जिस दिन भारतीय भाषाएँ शासन- प्रशासन, शिक्षा-दीक्षा, न्याय-अनुसंधान, हर क्षेत्र में वांछित स्थान पूरी तरह बना लें।
तथास्तु!
संजय भारद्वाज
अध्यक्ष – हिंदी आंदोलन परिवार
(भारतीय भाषाओं को रोटी से जोड़ने के लिए आंदोलन)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
☆ दस्तावेज़ # ३३ – हरिशंकर परसाई: आम आदमी का लेखक और प्रतिनिधि – डॉ० कमला प्रसाद ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक स्मृतियाँ सहेजने का प्रयास है। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है डॉ कमला प्रसाद जी (तत्कालीन अध्यक्ष हिंदी विभाग, रीवा विश्वविद्यालय) से श्री जगत सिंह बिष्ट जी की ३५ वर्ष पूर्व ली गई लंबी बातचीत जो सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के अंतरंग पहलुओं को स्पर्श करती है. यह मूल्यवान दस्तावेज़ डॉ. मधुसूदन पाटिल द्वारा संपादित, व्यंग्य की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘व्यंग्य विविधा’ में प्रकाशित हुआ था. इस ऐतिहासिक दस्तावेज को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.)
10 अगस्त 1995 को हरिशंकर परसाई का निधन हुआ। तब मैं रीवा में पदस्थ था। डॉ. कमला प्रसाद रीवा विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। उनसे मेरी परसाई जी के बारे में लंबी बातचीत हुई। अब, पैंतीस वर्षों के उपरांत, न परसाई जी और न डॉ. कमला प्रसाद हमारे बीच हैं लेकिन सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के अंतरंग पहलुओं को स्पर्श करता यह मूल्यवान दस्तावेज़ हमारे पास संरक्षित है। यह तब, डॉ. मधुसूदन पाटिल द्वारा संपादित, व्यंग्य की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘व्यंग्य विविधा’ में प्रकाशित हुआ था। अब आपके समक्ष प्रस्तुत है। परसाई जी को उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि!
– श्री जगत सिंह बिष्ट
डॉ० कमला प्रसाद
(डॉ० कमला प्रसाद प्रख्यात समालोचक; ‘वसुधा’ के सम्पादक; परसाई रचनावली के सम्पादक मण्डलके सदस्य; ‘आँखन देखी’ के सम्पादक; केशव शोध संस्थान, और अन्तर्भारती’ के निदेशक हैं। रीवा विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं। वे परसाई के अन्तरंग मित्र रहे हैं। उन्हें परसाई पर ‘अथॉरिटी’ माना जाता है। अतः जगतसिंह बिष्ट का डॉ० कमला प्रसाद से परसाई विषयक साक्षात्कार एक सार्थक संवाद है और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज। सं०)
हरिशंकर परसाई का हिन्दी-गद्य स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। सुप्रसिद्ध कथाशिल्पी भीष्म साहनी ने उनके बारे में कहा है, “परसाई की लंबी यात्रा आसान नहीं रही है, इसमें उन्होंने अपना सब कुछ होम कर दिया है, ऊपर से हल्के-फुल्के लगने वाले व्यंग्य, एक ऐसे व्यक्ति द्वारा रचे गए हैं, जिसने अपनी अपनी आस्थाओं और निष्ठा के लिए बड़ी यातनाएं झेली हैं। उनकी आस्था उनकी लेखकीय देन को चार-चाँद लगाती है। उनका प्रखर, निष्ठावान व्यक्तित्व भी प्रेरणा का उतना ही बड़ा स्रोत है, जितना उनका लेखन ।”
लब्ध-प्रतिष्ठ आलोचक कमला प्रसाद उनसे आजीवन अनुजवत जुड़े रहे। “पहल” के संपादन से लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले कमला प्रसाद ने हरिशंकर परसाई द्वारा संस्थापित पत्रिका “वसुधा” का संपादन उनके जीवन-काल में ही संभाल लिया था और उनकी आँखों के सामने ही इसे साहित्य जगत् की अनिवार्य पुस्तक बना दिया । कमला प्रसाद ने हरिशंकर परसाई पर केंद्रित “आँखन देखी” का संपादन कर पहला गंभीर प्रयास किया था उन्हें जानने का। परसाई रचनावली के संपादक कमला प्रसाद से जब मैं हरिशंकर परसाई पर बात-चीत करने गया तो उस समय तक वे परसाई के न रहने के दुख से उबर नहीं पाए थे। उनसे हुई बात-चीत पाठकों के सामने अविकल प्रस्तुत है :
जगत सिंह बिष्ट:
हरिशंकर परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व का आपने गहन अध्ययन किया है। उन्हें बहुत नजदीक से जाना है। परसाई जी पर आप “अथॉरिटि” माने जाते हैं। वर्ग संघर्ष उनके व्यंग्य का मूल स्वर रहा है और किसी भी तरह के अतिरेक पर उन्होंने प्रखर प्रहार किया है। कृपाकर उनके व्यंग्य के मूल स्वर और तेवर पर विस्तारपूर्वक कहें।
कमला प्रसाद:
बिष्ट जी, आपने बहुत सी बातें एक साथ पूछ लीं। हरिशंकर परसाई ने पूरे जीवन अपने आपको मनुष्य बनाने की कोशिश की । उनका सारा लेखन खुद के खिलाफ उतना ही संघर्ष है जितना समाज की विकृति के और विसंगतियों के खिलाफ। वे एक ऐसे लेखक हैं जो अपने संस्कारों, इर्द-गिर्द के प्रभावों, और उन रूढ़ परंपराओं के खिलाफ संघर्ष करते रहे जो किसी आदमी में स्वतः संस्कारों-प्रभावों से आकर संचित हो जाती है और जिनके कारण आदमी स्वाभाविक रूप से नहीं रह पाता । मनुष्य के बारे में वे कहते थे कि उसकी प्राकृतिक जिदगी के विरोध में उसमें बहुत सा अप्राकृतिक आकर जमा जो जाता है। मनुष्य का काम यह है, और लेखक का काम खास तौर से, कि उसमें जो अप्राकृतिक है उसे छाँट दे और यह तभी किया जा सकता है जब स्वयं की अप्राकृतिकता को वह निर्मूल करे। परसाई जी ने यह किया ।
उनके व्यक्तित्व की बहुत सी बातें मैं क्या बताऊँ आपको । मेरा जब पहले उनसे साक्षात्कार हुआ, उत्सव का मौका था । छतरपुर आए थे, अपने जबलपुर के दोस्तों के साथ और घर ठहर गए लोग। भवानी प्रसाद तिवारी थे, हरिशंकर परसाई थे और नर्मदा प्रसाद खरे, मायाराम सुरजन, हनुमान वर्मा थे। छतरपुर में हिन्दी साहित्य का सम्मेलन होने वाला था। सब लोग आए, घर के अंदर गए और नहाने-धोने लगे। परसाई जी घर के भीतर घुसे नहीं । उन्होंने कहा कि इन्हें सजने दो। आओ, तुम्हारे साथ छतरपुर घूमते हैं।
करीब २-३ किलोमीटर पैदल और उसके बाद फिर रिक्शे से पूरा शहर घूम आए, पूरी बस्ती देख आए, और जब लौटकर आए तो छतरपुर के बारे में पूछने लगे । इस तरह से उन्होंने कई काम एक साथ किए । एक तो जिस कस्बे में आए, वहां के लोगों की जीवन-प्रणाली, जीवन-स्तर का अनुभव हुआ, दूसरे वे मेरे भीतर घुस गए और टटोलने लग गए कि इसके भीतर कौन-सा तत्त्व है। न जाने कैसे उन्होंने मेरे भीतर, मध्यवर्गीय जीवन होते हुए भी, आम आदमी की ओर का झुकाव देख लिया। किसी तरह की उनकी मेरे साथ दोस्ती हो सकती है, दोस्ती क्या, स्नेह-भाव हो सकता है उनका मेरे ऊपर, ऐसा उनको लग गया ।
फिर, पत्राचार शुरू हुआ। उसकी एक लंबी कहानी है। आप यह देखें कि एक ऐसा लेखक जिसकी दिलचस्पी, उस शहर के बड़े अभिजात वर्ग के लोगों से मिलने में होने की बजाए, शहर के चरित्र को, उसकी जिदगी को जानना जिसका मक्सद हो, जो कहता है कि मैं ट्रेन में हमेशा तीसरे दर्जे से सफर करता रहा हूँ ताकि मैं उनकी बातें, उनका जीवन, उनकी मुद्राएं, उनकी शिकायतें, जमाने का उनके भीतर रचा-बसा चरित्र मालूम कर सकें। यह सब पढ़ना, जानना उनके जीवन का मक्सद है। गोर्की जैसे कहते थे कि ये पूरी जिंदगी ही मेरी यूनिवर्सिटी रही है, उसी तरह मैं मानता हूँ कि परसाई हिन्दी का वह लेखक है, प्रेमचन्द के बाद, जो सारी दुनिया को, सारे समाज को, अपने अंचल को, अपने स्थान को और वातावरण को ही अपनी सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी मानते रहे जीवन भर, वही उनके व्यक्तित्व के विकास का आधार है। इसी में उनकी रचना की सामग्री पैदा होती है। इसी में से वे रचना का सारा स्वरूप तैयार करते हैं, रचना की प्रकृति तैयार करते हैं। आप देखेंगे कि स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज का सच्चा इतिहास अगर कहीं मिल सकता है तो इतिहास की पुस्तकों में नहीं, परसाई की रचनाओं में मिलता है।
जगत सिंह बिष्ट:
वर्ग संघर्ष की बात और किसी भी तरह के अतिरेक पर उनके प्रहार । इनका कुछ और खुलासा करेंगे आप ?
कमला प्रसाद:
एक कहावत आपने सुनी होगी कि किसी पौधे में अगर पीपल का पेड़ उग जाता है तो उसे लोग छाती का पीपल कहते हैं। उस पौधे का सारा रस पीपल चूस लेता है और बिना नीचे तक गए, लहराता रहता है। समाज में यही वर्ग की स्थितियां हैं। जो श्रम करता है, जो उत्पादन करता है, वो नीचे खड़ा है। उसकी छाती पर मध्यवर्ग और उच्च वर्ग, अमीर वर्ग लहरा रहा है। यह बात इतिहास सिद्ध है। वर्गों का विकास तभी हुआ जबसे उत्पादन और वितरण के अधिकार अलग-अलग हुए। यह समाज, आदिम रूप को छोड़ दें तो, बाद में लगातार वर्ग में बंटता गया – एक अमीर वर्ग और एक गरीब वर्ग। इन दोनों के बीच में खाई बढ़ती चली गई और दोनों की संस्कृति अलग हुई। अमीरों की संस्कृति अलग। आपने निराला की कविता “वह तोड़ती पत्थर” पढ़ी होगी जिसमें मजदूरनी हथौड़ा चलाती है और सामने उसके अट्टालिका है, जहां तथाकथित सुखी लोग सो रहे हैं। निराला केवल उस चित्र को आपके सामने अंकित कर देते हैं :
सामने अट्टालिका
तरुमालिका प्राचीर
वह तोड़ती पत्थर ।
ये जो चित्र हैं, इसमें निराला कुछ कह नहीं रहे, अपनी तरफ से । केवल एक चित्र अंकित कर देते हैं। ये चित्र देखते ही, अगर आप संवेदनशील हैं, तो एक-बारगी आपको समाज की विसंगति नजर आ जाएगी। फोटोग्राफी भी साहित्य में बड़ी महत्वपूर्ण होती है। दिक्कत यह है कि जो घटित हो रहा है, उसी को लोग नहीं देख रहे। परसाई जी ने जो घटित हो रहा है, जो विसंगतियाँ जिस तरह हैं समाज में, उनको सबको, अपनी खुली आंखों से देखा। परसाई का पूरा लेखन, समाज की विसंगतियों को देखना और उनकी चित्रावली, उनकी छवियाँ लोगों के सामने, समाज के सामने रखता है। ऐसी छवियों रखने में निर्मम होने की जरूरत है, बहुत सर्तक होने की जरूरत है। कभी-कभी ठेठ और बहुत आक्रामक भाषा की जरूरत है क्योंकि बहुत सारा ऐसा रहस्य बना दिया गया है जिसको भाषा में व्यक्त करना, असभ्यता और असंस्कृति कहा गया है। वर्जित इलाका इतना हो गया है, प्रतिबंधित इलाका हो गया है कि वहां आंखें उठाकर देखने की हिम्मत नहीं होती किसी की। आप देखें कि मुक्तिबोध लिखते हैं:
एक कमरा,
उसके अंदर एक कमरा,
उसके अंदर एक कमरा,
उसके अंदर एक कमरा
और एक रहस्यमय लोक !
ये जो हमारी व्यवस्था है जहाँ राजाओं, अमीरों, सामंतों, पूंजीपतियों की किल्लोलभूमि है, वहां तक पहुंचना किसी के लिए दूभर है। इस पूरे को देखना, सर्तक निगाहों से देखना और अंदर रहस्य की जो पूरी दुनिया है, उसको भेद देना । आप परसाई की रचना “भोलाराम का जीव” को ही देखें । एक आदमी की आत्मा तड़प रही है कि उसकी पेंशन तो मिल जाए और वह मर जाता है। अब उसको “फैंटसी” बनाकर, क्योंकि समाज की सारी विसंगतियों को बिना फंतासी के व्यक्त करना मुश्किल है, क्योंकि इतना बड़ा यह साजिश का लोक है कि उसके ब्यौरे में आप जाएंगे, अभिधा में अगर आप जाएंगे तो “रिपोर्टिंग” हो जाने का खतरा है। उसमें समग्रता नहीं आ पाएगी। इसीलिए परसाई जी ने उसको फंतासी में व्यक्त किया है।
(यादों के झरोखे से – बाएं से दायें : डॉ. द्विवेदी, श्री जगत सिंह बिष्ट, प्रो ज्ञानरंजन, डॉ. कमला प्रसाद, श्रीमती राधिका बिष्ट, डॉ. दिनेश कुशवाह)
जगत सिंह बिष्ट:
मुक्तिबोध और परसाई दोनों बड़े मित्र हैं। दोनों फंतासी में लिखते हैं…
कमला प्रसाद:
एक फंतासी में कविता लिखता है और दूसरा फंतासी में गद्य लिखता है, फंतासी में दूसरा कहानियां लिखता है, निबंध लिखता है। इसलिए कि दोनों की सोच की दुनिया मिलती है। एक अंधेरे में कविता लिखता है और उसमें एक ऐसा नायक है, जो रात के घनघोर अंधेरे में, इस मायाजाल के भीतर जो कुचक्र है जिसमें डाकू और पुलिस, न्यायाधीश और बदमाश, एक साथ एक जुलूस में चलते हैं, उसमें घुसकर वह आदमी जुलूस को देख लेता है और वही उसका अपराध है। उसने देख लिया यानि वह जासूस है। परसाई का जो लेखक है वह भी एक जासूस है। उससे कुछ नहीं छिपा होता । मुक्तिबोध की कविता में भी एक जासूस है जो सारे मायाजाल को चीर देता है, देख लेता है। यही अपराध है कि वह देख लेता है। परसाई के यहाँ भी यही अपराध है कि परसाई के यहां कुछ छिपा नहीं होता ।
अब आप देखें कि ये जो दोनों की दोस्ती का और दोनों की समझ का धरातल है, वह कैसे एक जगह मिल जाता है। जो वर्ग संघर्ष की बात आपने की, वर्गों का जाल बड़ा भ्रामक है। जैसे, आप भाषा के क्षेत्र में देखें, बड़ी मधुर भाषा होती है सामंतों की, लेकिन वो जहर होती है। सीधे-सीधे वो सामंत और खुराफाती दिख जाएं तो बड़ा आसान हो जाए उनको समझ लेना, पकड़ लेना। चालाकी से भरे माधुर्य को वे संस्कृति कहते हैं, मधुर वाणी कहते हैं। मधुर वाणी उनकी संस्कृति है और जो ठेठ बोलता है गांव का गंवार, वह असंस्कृत है। जब आप वर्ग को ठीक से समझने लगते हैं तो तथाकथित इस गंवार को उसकी ठेठ भाषा में उसे पेश करना पड़ेगा और इनकी जो मधुर भाषा है, उनके भीतर की जो असंस्कृति है, उसको चीरना पड़ेगा। ये जो आप करते हैं, सहानुभूति के आलंबन को बदल देना है। परम्परागत महाकाव्यों में जो नायक हैं, जो राजकुंवर है, सहानुभूति उसकी तरफ जाती है।
परसाई के गद्य को पढ़ते हुए, सहानुभूति उस नायक के बजाए, उस ठेठ गंवार आम नायक की तरफ चली जाती है। यह ट्रांसफर है। सहानुभूति का ट्रांसफर । नायक जिसे आप कहते हैं वो खलनायक हो जाता है और खलनायक नायक हो जाता है। ट्रांसफर, करुणा का ट्रांसफर, करुणा इधर नहीं है, उधर है। करुणा औरत की तरफ है, सबसे त्रासद स्थितियों में जो जीती है, दूसरे नंबर की नागरिक मानो जाती है जो समाज की । करुणा को औरत की तरफ ले जाना है, करुणा को गरीब की तरफ ले जाना है। ये जो पिछड़ा वर्ग है, जो गरीब तबका है, जो शोषित-पीड़ित है, उसको “स्टैंड” देना । उसको साहस देना, उसको आत्मविश्वास देना । उसकी जिजीविषा और पौरुष को ललकारना। तू छोटा नहीं है, तू बड़ा है, तू नियंता है, तू उत्पादक है, तू सर्जक है।
उत्पादक और सर्जक – शब्दावली में सम्बन्ध है। जिसे आप सर्जक कहते है, दरअसल वह उत्पादक है। खेती का सर्जक और दूसरी तरफ कलम का सर्जक । सर्जक बड़ा होता है, वितरक बड़ा नहीं होता। दो अलग-अलग सत्ताएं हो गई। सर्जक की अलग, वितरक की अलग। वितरक हिंसक हो जाता है। इस पूरे “सोशियोलॉजिकल पैटर्न” को बदल देना वर्ग संघर्ष का काम है। इसमें कला कौशल भी है, कला की ऊँचाई है और दूसरी तरफ सामाजिक, समाज-शास्त्रीय विदग्धता, पैनापन भी है, खरा-खरा भी है। तो ये परसाई का मूल आधार है चिंतन का ।
जगर्तासंह बिष्ट:
व्यंग्य की परंपरा में जो उनके पूर्ववर्ती लेखक हैं, परसाई उनसे इसी मामले में सबसे पहले अलग दिखाई पड़ते हैं ।
कमला प्रसाद:
परसाई कहते हैं कि व्यंग्य औजार है, मेरा व्यंग्य मेरा रोजगार है । व्यंग्य मेरा औजार है, मैंने इसे सारे कामों के विकल्प में चुना है। इससे मैं सारे काम करता हूँ, मैं इससे खेती भी करता हूं मैं इससे लड़ाई भी लड़ता हूँ, मैं इससे अपनी रोटी भी कमाता हूं, मैं इससे लेखक भी बनता हूं, मैं इससे क्या नहीं बनता ? जैसे किसी का पैर टूट जाए तो हाथ उसका भी विकल्प होता है। हाथ का मतलब होता है पैर का भी विकल्प होना । उसी तरह से, अगर समाज में कोई कलमकार है तो कलम को उसे सारी चीजों का विकल्प बनाना पड़ेगा। अपनी शक्ति के सारे “डाइमेंशन” को कलम पर लाकर केंद्रित करना पड़ेगा। कलम कलम होती है। कलम औजार होती है। कलम आपको ऊंचाई भी देती है। कोई भी लेखक तब तक बड़ा लेखक नहीं बनता जब तक उसकी पूरी आत्मिक, वैचारिक, बौद्धिक, शारीरिक, सारी शक्तियों का विकल्प न बने कलम । तब तक कलम कलम नहीं होती ।
जगत सिंह बिष्ट:
कुछ लोगों का मानना है कि वैचारिक प्रतिबद्धता से कभी-कभी व्यंग्य की मारकता में बाधा आती है। परसाई वामपंथी विचारधारा को लेकर चले थे, प्रतिबद्ध थे। क्या आपको लगता है कि इससे परसाई के व्यंग्य में कहीं कोई अवरोध आया है?
कमला प्रसाद:
बीसवीं शताब्दी में, मैं जानना चाहूँगा, दुनिया का वो महान लेखक, जो महान भी हो और प्रतिबद्ध न हो। हिन्दी में पिछले पचास वर्षों में, मैं जानना चाहूँगा, उस बड़े कवि का नाम जो बड़ा भी हो और प्रतिबद्ध न हो और जो पचास वर्ष तक जीवित रहे इतिहास में। मैं जानना चाहूँगा उस गद्यकार का नाम, बड़ा लेखक हो जो, काल के भीतर भी हो और कालजयी भी हो, जिसने अपनी प्रतिबद्धता तय न की हो । प्रतिबद्धता दरअसल बंधन नहीं है। प्रतिबद्धता अपने बारे में और अपने समाज के बारे में एक दिशा है । मुक्तिबोध कहते थे, पार्टनर पहले अपनी “पॉलिटिक्स” तो तय करो। तुम गरीब की तरफ हो कि अमीर की तरफ हो। प्रतिबद्धता का मतलब है सर्जक की तरफ होना, कम की तरफ होना। तुलसीदास क्या नहीं प्रतिवद्ध थे ? तुलसीदास, बहुत बड़ा लोकमंगल का कवि है। अपने को तिरोहित कर दिया जिसने, अपने को मिटा दिया जिसने और इतना बड़ा कवि हुआ ।
परसाई की जो प्रतिबद्धता है, दरअसल अराजकता के खिलाफ संगठित, अनुशासित मानवीयता का पर्याय है। ये जो “मीडियोकर” हैं, ये अपने को, अपनी हीनताग्रन्थि को छिपाने के लिए आरोपों में जीते हैं। ऐसे आरोपों से वे बड़े लेखकों का कद छोटा करने की कोशिश करते हैं लेकिन इतिहास बड़ा निर्मम होता है। आप अनुभव करेंगे बड़ी-बड़ी बौद्धिक जुगालियाँ धरी रह जाती हैं, काल उनको अस्वीकार कर देता है, “रिजेक्ट” कर देता है काल । तो, प्रतिबद्धता का गलत व्याख्यान करने वाले लोग ऐसा कहते हैं।
सार्त्र को पूंजीवादी समाज ने बहुत पसंद किया । नोबल पुरस्कार दिया। जब पुरस्कार मिला तो उसने कहा कि ये हत्यारों का पुरस्कार मुझे नहीं चाहिए। लोग गलतफहमी में न हों, मैं “मार्क्सिस्ट” हूँ । यानि, उसने अपने सारे चिंतन का प्रेरणा स्रोत मार्क्सवाद को कहा, अर्थात् मार्क्सवाद का विस्तार किया । पूंजीवादी उस विस्तार को न जान पाए कि इसका स्रोत क्या है? इसको अपनी दुनिया का लेखक मानने लगे। सार्त्र ने कहा कि ये जो बीसवीं शताब्दी है इसमें कोई “इंटेलेक्चुअल” होगा, वह “वाम” होगा, वह “लैफ्ट” होगा। मैं समझता हूँ कि काल से उत्तर ले लिया जाए इसका । पिछले सौ वर्षों की रचनाशीलता से इसका उत्तर ले लिया जाए । कमला प्रसाद क्यों उत्तर दें इसका ?
जगत सिंह बिष्ट:
इसमें एक बिंदु आता है शाश्वत व्यंग्य लेखन बनाम क्षणभंगुर या सामयिक व्यंग्य लेखन । परसाई ने कहीं लिखा भी है कि मैं अपने व्यंग्य को रोज मरते हुए देखता हूँ। क्या व्यंग्य में कालजयी जैसी कोई बात या कृति हो सकती है?
कमला प्रसाद:
बिष्ट जी, कालजयी अगर कुछ होता है तो जीवन होता है और काल जिसे डस लेता है, काल जिसे निगल लेता है, वह भी जीवन होता है। आदमी मर जाता है, आदमियत कालजयी होती है। रचना के भीतर का जो मानवीय पहलू होता है, वह कालजयी होता है। मनुष्य की आत्मा को, मनुष्य की परंपरा को, मनुष्य की जिजीविषा को, ऊर्जा को, जो रचना भर ले अपने में वह कालजयी होती है। जैसे घड़ा नहीं होता कालजयी, घड़े के भीतर का जल होता है कालजयी । जल तत्व कभी नष्ट नहीं होता। इसी तरह, शरीर मर जाता है लेकिन शरीर के भीतर जो आत्मा है – इसमें आत्मा को इस अर्थ में मत समझिए, भाववादी अर्थ में, आत्मा का मतलब होता है, आदमी के भीतर की ऊर्जा, जिजीविषा, ताकत – वो कालजयी होती है। आप देखिए न, प्रेमचन्द मर गए पर प्रेमचन्द का साहित्य कालजयी है। तुलसीदास मर गए, तुलसीदास का साहित्य कालजयी है। साहित्य के जीवित होने की शर्तें पूछी जानी चाहिए। साहित्य को कौन जीवित करता है ? मनुष्य ! तो मनुष्य का भला, बुरा, अच्छा, उसकी संवेदना जहां मिलेगी, उसके पास बार-बार वह जाएगा। वही कालजयी हो जाएगा । जो घड़ा, जो झील कभी नहीं सूखती गर्मी के दिनों में भी, आदमी वहीं जाता है। इसी तरह से जिस रचना में कभी रस नहीं सूखता, उसी के पास आदमी जाता है। क्या बात है कि रामचरित मानस के पास लोग बार-बार जाते हैं ? नया से नया आदमी भी जाता है, पुराने से पुराना आदमी भी जाता है। निराला की कविता के पास आदमी जाता है।
दरअसल कालजयी होने की चिंता करके जो लेखक रचना करता है, वो तत्काल मर जाता है। जो लेखक काल के भीतर काल की बारीकियों को, काल में रह रहे आदमी को और अपनी स्थानीयता को, अपनी जिंदगी की विसंगतियों को, उनकी चिंता करके, उनको संजोने की कोशिश करता है, अपनी अनुभूति में, तो वो अनचाहे कालजयी हो जाता है।
जगत सिंह बिष्ट:
प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध और तुलसी – ये नाम तो अपने आप आ गए चर्चा के दौरान । हिन्दी के अन्य ऐसे कौन से कवि और लेखक रहे हैं जिनके लेखन को, या जिनकी दृष्टि को, आप परसाई की दृष्टि के नजदीक पाते हैं ? जैसे, तुलसी की अभी बात चली । तुलसी और कबीर दोनों नामों से वे कॉलम लिखते थे । मुझे लगता है, कबीर के रूप में उन्होंने जो लिखा है वो ज्यादा प्रभावशाली और प्रखर है। तुलसी के दर्शन से परसाई की “स्पिरिट” या उनके पूरे साहित्य का “अंडरकरेंट” मेल नहीं खाता। आपका सोचना शायद भिन्न हो ।
कमला प्रसाद:
परसाई जी की प्रेरणा भूमि है मध्ययुग के संत। संतों का जीवन – फक्कड़, यायावरी, मस्तमौला, बेपरवाह। परसाई जी ने एक इंटरव्यू में कहा है, कि मैंने हमेशा लापरवाही से अपनी जिदगी की जिम्मेदारियां पूरी की हैं। परवाह करते हुए मैं अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी कभी पूरी नहीं कर सका । संतों में, आप देखते हैं कि कबीर का भी बेटा था, तुलसीदास की पत्नी थी, संतों में ऐसे भी मिलेंगे जो गृहस्थ थे पर पति भी संत और उनकी सहचरी भी संत । निकल पड़े । तो, संत स्वभाव क्या है, निस्पृह होना, संचयवृत्ति के विपरीत होना, यह उनका स्वभाव था। ये भी आश्चर्यजनक नहीं है कि संतों के बाद, अर्थात् मध्ययुग के बाद, जो भी बड़ा लेखक हुआ है, उसने बीच के सारे साहित्य को छोड़ दिया और उछलकर इतिहास में संतों के पास चला गया। हजारी प्रसाद द्विवेदी को देखिए, संतों के पास चले गये । रामचंद्र शुक्ल, संतों के पास चले गये। निराला ने संतों के पास जा जाकर प्रेरणा ली। हरिशंकर परसाई की भी जो प्रेरणा भूमि है वह मध्ययुग के संत हैं।
दूसरी बात ये है कि परसाई के जो प्रिय लेखक थे, वो निराला थे । निराला पर बहुत बात करते थे। वो चेखव को बहुत प्यार करते थे, गोर्की की चिंता अक्सर करते थे और अपने स्तंभ के लिए तुलसीदास का जो उन्होंने शीर्षक चुना “तुलसीदास चंदन घिसै”, यहां तुलसीदास संत हैं। इसमें बड़ी व्यंजना है- “तुलसीदास चंदन घिसै” या कबीर की उक्ति “माटी कहे कुम्हार से”। तुलसीदास या कबीर वाचक परंपरा के कवि हैं, ये सीधे अपनी वाणी से संबोधित करते हैं जनता को । इनके सामने कागज नहीं है और इस युग में तो कागज ही कागज है। परसाई जी कागज में लिखते हैं लेकिन संबोधित जनता को करते हैं। “सुनो भाई साधो” उनका एक कॉलम है। यह अकेले कॉलम नहीं है, निगाहें उनकी जनता की तरफ हैं। कलम का दायित्व है कि वह जनता की तरफ हो, जो वे कहना चाहते हैं, उसे वह लिखे, अंकित करे। लिखित समाज के भीतर रहते हुए भी, अलिखित समाज को संबोधित करते रहना हमेशा, यह परसाई का तार है जो कबीर से और तुलसी से अपने को जोड़ता है, वाचक परंपरा से जुड़ी जो विशाल जनता है, उससे जोड़ता है। बीच में बहुत सारे रचनाकार हैं, भारतेन्दु युग के जो निबंधकार हैं बालमुकुंद गुप्त, बालकृष्ण भट्ट और भारतेन्दु हरिश्चंद्र स्वयं।
एक बार उन्होंने कहा कि मैं बनारस गया तो मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी कि मैं भारतेंदु हरिश्चंद्र का मकान देखूं और अक्सर वे “अंधेर नगरी” का जो प्रसंग है, “टके सेर भाजी, टके सेर खाजा” इसको दोहराते थे। मैं जब सतना में था, तो वो इलाहाबाद से लौटकर, सतना उतर गए और खबर भेजी कि मैं पवन होटल में हूं। मैं दौड़ा-दौड़ा गया। दो बजे का समय था । किवाड़ा खुला हुआ था, वे कमरे में चक्कर लगा रहे थे, “हम न मरिहैं, मरिहैं संसारा, हम न मरिहैं, मरिहैं संसारा”, ये पंक्ति बार-बार दोहरा रहे थे। मैं सीधे खड़ा हो गया । बड़ा लिहाज करते थे हम उनका उस समय । बाद में उन्होंने धीरे-धीरे हमारे लिहाज को कम किया और मैत्रीभाव की तरफ हमको ज्यादा लाए । खड़ा रहा मैं दो मिनट कि कैसे उनको आवाज दूं और मेरी तरफ उन्होंने देखा नहीं। दो-तीन मिनट बाद निगाह पड़ी उनकी, तो बोले, “आ गए? बैठो।” बैठ गए वे भी, सारा चेहरा सुर्ख था, लाल, लगा कि बड़े तनाव में हैं। कारण मेरी समझ में आया कि आज सीधे घर नहीं आए वे, होटल में जाकर रुक गए क्योंकि वे बच्चों के सामने, छोटे-छोटे बच्चों के सामने, तनावग्रस्त होकर परिवार में नहीं आना चाहते थे।
मैंने कुछ छेड़ा उनको, बातचीत की, लेकिन वे सहज नहीं हुए। बोले, मैं खाना खाके सोता हूँ । तुम अब शाम को आना। शाम को हम दो-चार लोग गए तो काफी ठीक थे। धीरे-धीरे पता चला कि इलाहाबाद में कुछ लोगों से उनका विवाद हुआ था, किसी गोष्ठी में, जो अपने को प्रतिबद्ध और मार्क्सवादी कहते हैं, उन लोगों से, और वे लोग खड़े हो गए दूसरे पाले में। कुछ मुक्तिबोध को लेकर भी उलझन थी। वैचारिक और साहित्यिक बहस में, अपने वर्ग की चिंता में रहकर जो स्नायविक तनाव होता है, यह कितने लोगों में होता है ? लोग अपनी विचारधारा को अपनी शारीरिक चिंता का अंग नहीं बना पाते, केवल गोष्ठियों की बहस में ही वह चिंता होती है। जीवन के संघर्ष की तरह वह चीज लोगों में शामिल नहीं होती। मोटे तौर पर कहें कि अगर किसी रिक्शे वाले की कोई पिटाई कर रहा है, बहुत धनवान आदमी और वहां से आप गुजर रहे हैं, तो उसके लिए लड़ जाना उसकी तरफ़दारी है। मैं कह रहा था कि तब काफी तनाव भरा था उनमें । उसी को लेकर वे बहस करने लग गए तो हम लोगों की समझ में आ गया। हमने पूछा कि क्या बात थी ? उन्होंने कहा कमला प्रसाद: कि जो हमारे साथ हैं, वे हमारे साथ रहें और जो हमारे साथ नहीं हैं, वो रहें जहाँ रहें। यही हो जाए तो बहुत है।
बहुत सारे प्रतिबद्ध लोगों के दोगलेपन को परसाई जी सह नहीं पाते थे और इस घाव को वे अकेले में भी झेलते थे। जिस शहर में रहते थे, आप जानते हैं, उस शहर में ऐसे बहुत सारे प्रतिबद्ध लोगों के दोगलेपन के घाव को वे अपने घर में रहकर झेलते थे और इसका उन्हें तनाव होता था । वैचारिक रूप से सार्थक जीवन जीने के लिए उनको सतत् संघर्ष करना पड़ा जीवन में। इस तरह के बहुत सारे उद्धरण हैं, बिष्ट जी, उनके जीवन के । हम संपर्क में आए और हमको लगा कि परसाई को हम लोग “रिसीव” जितना कर सकते हों, करें, किया भी, लेकिन उनके जैसा जीवन हम लोग नहीं जी पाएंगे, नहीं जी पा रहे हैं।
जगत सिंह बिष्ट:
दो रचनाकारों की तुलना करना कहां तक उचित है, यह मैं नहीं जानता, लेकिन परसाई जी के समकालीन रहे शरद जोशी। एक प्रतिबद्ध, दूसरा उन्मुक्त । क्या दोनों के पीछे व्यंग्य के दो स्कूल आज भी चल रहे है ? परसाई और शरद जोशी के बारे में क्या कहना चाहेंगे ?
परसाई और शरद जोशी बड़े मित्र थे । भोपाल जब परसाई जी जाते थे तो शरद जोशी के घर ठहरते थे। शरद जोशी ने अपना गुरू कहा भी आरंभ में। दोनों में बहुत अच्छा पत्राचार था। बाद में दोनों अलग हुए। कहीं-कहीं, एकाध बार, शरद जोशी ने परसाई जी पर कटाक्ष भी किया। शरद जोशी बाद में मीडिया की तरफ भी झुक गए और लिखा। एक तो परसाई ने बहुत लिखा है और उनके लेखन के बहुत आयाम हैं । परसाई को जितना इतिहास का और दुनिया के साहित्य का ज्ञान था, वह आप उनके तमाम लेखन से जान सकते हैं।
“पूछिये परसाई से” एक कॉलम “देशबन्धु” में था। लोगों की आश्चर्य हुआ कि इतना इतिहास-बोध है उनका, सौंदर्य-बोध है। उनके ज्ञान का और भाव-बोध का क्षेत्र बहुत व्यापक था । बड़ी पारदर्शी और पैनी निगाह थी । छुपता नहीं था कुछ उनसे । मेरी राय ये है कि शरद जोशी का क्षेत्र तुलनात्मक रूप से सीमित है। इसका उत्तर पाने के लिए आप किसी बच्चे को तीन रचनाएं शरद जोशी की पढ़ने को दे दीजिए और तीन रचनाएं परसाई की। फिर चार साल बाद आप उस बच्चे से पूछिये कि तुम्हें क्या याद है दोनों में से और तुम पर क्या असर है दोनों का? उत्तर आपको मिल जाएगा ।
जगत सिंह बिष्ट:
जहाँ तक शिल्प या शब्दों की जादूगरी की बात है, वहां पर तुलना की जाए तो जो प्रयोग शरद जोशी ने किए हैं…
कमला प्रसाद:
शरद जोशी ने प्रयोग बहुत किए लेकिन एक सीमा के बाद क्या “मैनरिज्म” नहीं लगने लगता उसमें? भाषा – एक फव्वारे का उछाल होती है, एक झरने का उछाल होती है । दोनों में कुछ फर्क होता है ? भाषा का मैनरिज्म नए रीतिवाद को जन्म देता है।
जगत सिंह बिष्ट:
आप परसाई जी के बहुत ही अंतरंग रहे हैं । उनको अपना बौद्धिक गुरु भी मानते हैं…..
कमला प्रसाद:
हाँ, बिल्कुल!
जगत सिंह बिष्ट:
हम लोग सभी मानते हैं। अंतिम दिनों में उनसे आपकी मुलाकात हुई थी । लगता है, उस विषय में आपके पास काफी कुछ कहने को है। जो अनुभव है, अनुभूतियां हुईं, उनमें से कुछ पाठकों से “शेयर” करने के लिए…
कमला प्रसाद:
बिष्ट जी, १० अगस्त को वे नहीं रहे ! एक संयोग है, ६ और ७ अगस्त को मैं उनके साथ था। ट्रेन लेट हुई तो मैं एक बजे पहुंचा। बारह बजे उनके सोने का टाइम होता था। सीता दीदी ने बताया कि उन्हें सूचना मिल गई थी कि मैं आऊंगा तो एक दिन पहले रात में उन्होंने हाजमे का चूर्ण नहीं लिया। दीदी ने कहा, ले लो, तो बोले- कल कमला प्रसाद आएगा, कहीं गड़बड़ न हो जाए, दस्त न लग जाए। फिर बारह बजे सोए तो पिक्की से बोले कि जब कमला प्रसाद आए, तभी जगा देना । कितना बड़ा लेखक, मेरे जैसे छोटे आदमी की ये चिंता!
इन दोनों ने मुझे ये बातें बताई जब मैं १० अगस्त को उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर गया और रात को श्मशान घाट से लौटकर उनके घर आया। मैं और सेवाराम (त्रिपाठी) थे । दोनों ने ये बातें बताई, उस दिन नहीं बताई थी । दीदी ने ये चूर्ण वाली बात बताई जब, तो बिष्ट जी, मैं संभाल नहीं सका अपने आपको । सारा वृत्तांत इतना “इमोशनल” है कि बहुत-सी बातें हैं, बहुत बातें थीं और मुझे लगता है दीदी ने कहा बहुत से प्रसंग हैं.. पिछले करीब दो महीने से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था, बहुत बेचैन रहते थे और शक्ति इतनी क्षीण हो गई थी कि कुल तीन-चार वाक्य ही बोलते थे वो ।
छः तारीख को बहुत बोले । एक बार दीदी ने अंदर बुलाया और कहा कि भैया बहुत बोल रहे हैं तो मैंने सोचा कि उनसे कहूँ। मैंने कहा, परसाई जी मैं घूम आता हूं, मित्रों से मिल आता हूँ, आप थोड़ा आराम कर लीजिए। वे बोले, बैठो। मैंने कहा, आप थक रहे हैं। कहने लगे, मैं थोड़ी आंख मूंद लूंगा, ठीक हो जाएगा। तुम बैठो। तो, बार-बार दो-तीन मिनट के लिए आंख मूंद लें, फिर बोलने लगें और पूछने लगें ।
परसाई जी साहित्य की चर्चा नहीं शुरू करते थे। बिटिया कैसी है ? वो बेटा, छोटा वाला, कैसा है? उसको “जॉन्डिस” हो गया था, अब कैसा है। राजीव की चिट्ठी आई थी, अच्छा दामाद है तुम्हारा। तो, ये जिदगी से हमेशा अपने को संलग्न करना । मुझे लगता है कि कहानी की चर्चा तो हम घर बैठे भी कर सकते हैं, उसके लिए हमको जबलपुर जाने की आवश्यकता नहीं है। जिदगी की चर्चा के लिए हम लोगों को मिलना चाहिए । साहित्य की चर्चा तो, आज इतनी सामग्री, इतना लेखन उपलब्ध है, कि घर में कर सकते हैं। जिंदगी की चर्चा करनी चाहिए।
एक बात बताऊं, परसाई जी इधर लोगों के बारे में व्यक्तिगत प्रतिक्रिया व्यक्त करने से अपने को रोकते थे । किसी लेखक पर व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं करते थे। उस दिन उन्होंने कुछ कीं। मैं उन बातों को अभी, व्यक्तिगत बातों को अभी न कहूंगा, “कन्ट्रोवर्सी” होगी लेकिन मैं ये कहूंगा कि मेरे जीवन का यह चरम, एक तरह से सुख मिश्रित दुख का क्षण है कि मैं ये कहूं कि परसाई जी से मैं ६-७ अगस्त को मिला और चलते हुए दीदी ने कहा था, मैंने “वसुधा” के संपादकीय में लिखा भी है, हाँ भैया, बहुत अच्छा हुआ आ गए, बहुत हल्का हुआ जी उनका। तो इस तरह की और बहुत-सी बातें हुई। बहुत-सी बातें हैं दिमाग में लेकिन अभी ऐसा लगता है कि उनसे, परसाई जी से अपने आपको मुक्त करके ही उन बातों को कहा जा सकता है ।
जगत सिंह बिष्ट:
अंत में, एक और बात स्पष्ट हो जाए। परसाई जी की मृत्यु के पश्चात् , प्रभाष जोशी ने “कागद कारे” में, विवादास्पद कहें, या “पुअर टेस्ट” में बातें लिखी थीं जो कि श्रद्धांजलि लेख में साधारणतः लिखते नहीं हैं । उनमें जो बिंदु उठाए थे उन्होंने, वो आप जानते हैं, उनके बारे में कुछ स्पष्ट करना चाहेंगे आप?
कमला प्रसाद:
प्रभाष जोशी ने अपने आपको बहुत छोटा कर दिया उस लेख से। आप देखेंगे कि परसाई पर वह लेख कम है, प्रभाष जोशी का खुद के बारे में ज्यादा है। मसलन, जबलपुर हवाई जहाज नहीं जाता था, नहीं तो मैं जाता। इंदौर और मालवा से आने वाले लोगों ने मुझे बताया कि वो ऐसा करते हैं। एक ओर इंदौर और मालवा से आने वाले लोग और दूसरी तरफ परसाई । अगर आपके मन में परसाई से मिलने की तमन्ना थी तो आपने उस तमन्ना को इसीलिए रोका कि जबलपुर हवाई जहाज नहीं जाता ? अगर उस लेखक से मिलने की आपको इच्छा थी और उससे कुछ बात करने की इच्छा थी तो पैदल जाना था। “जनसत्ता” के संपादक का जो दंभ है वह पंक्ति पंक्ति से बोलता है। ऐसा व्यक्ति क्या मूल्यांकन करेगा परसाई का? कबीर कहता था न कि लकुटी और कमरिया रख के आओ, तब आओ!
यह जो लेखन की दुनिया है और लेखन में आम आदमी का लेखक और प्रतिनिधि होना, संसद में सांसद का प्रतिनिधित्व नहीं है यह। खुली जनता की अदालत है, उसमें जनता का प्रतिनिधि होना लेखन है। वहाँ आप हवाई जहाज से आएंगे? तब आप उनसे संवाद करेंगे ? बहुत छोटा कर दिया प्रभाष जोशी ने अपने आपको । परसाई का “एक्सपोज़र” नहीं बल्कि प्रभाष जोशी का “एक्सपोज़र” है और इस पर तमाम व्यापक प्रतिक्रिया हुई है हिन्दी जगत में। जिस दिन यह छपा था, मैं संयोग से दिल्ली में था, हम लोगों ने दिल्ली में उसी दिन प्रतिक्रिया व्यक्त की। प्रतिक्रियाएं तमाम हुईं। मैं कहूँगा कि यह बहुत पूर्वाग्रही दिमाग से उपजा लेखन है ।
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है जीवन यात्आरा स्पतम्काभ के अंतर्गत आपका एक आलेख “स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी”।)
☆ जीवन यात्रा ☆ “स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
संघर्ष-साधना से भरे सात्विक जीवन के साथ अध्ययन, चिंतन-मनन से प्राप्त परिपक्वता और आभा के तेज से जिनका मुखमंडल सदा दीप्त रहता था उन्हें हम सब कवि-साहित्यकार, अनुवादक, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद प्रो.चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” के नाम से जानते हैं। हिंदी, अर्थशास्त्र एवं शिक्षा में स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त करने के साथ ही आपने साहित्य में विशेष रुचि के कारण साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त की थी। विभिन्न नगरों के विद्यालयों में अपनी विद्वता एवं अध्यापन कौशल से इन्होंने अपने सहयोगियों और छात्रों से सदा विशिष्ट आदर व स्नेह प्राप्त किया। प्रो. चित्रभूषण जी केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 1, जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य थे। वे प्रान्तीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
1948 में देश की प्रतिष्ठित पत्रिका सरस्वती में विदग्ध जी की प्रथम रचना प्रकाशित हुई थी फिर निरन्तर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं के प्रकाशन का सिलसिला जारी रहा। आकाशवाणी केन्द्रों एवं दूरदर्शन से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण जब-तब होता रहा। ईशाराधन, वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाएं, आदर्श भाषण कला, कर्मभूमि के लिए, बलिदान, जनसेवा, अंधा और लंगड़ा, मुक्तक संग्रह, समाजोपयोगी उत्पादक कार्य, शिक्षण में नवाचार, मानस के मोती आदि उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। प्रो.चित्रभूषण जी ने भगवतगीता, मेघदूतम एवं रघुवंशम के हिंदी अनुवाद के साथ ही संस्कृत एवं मराठी के अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का हिंदी अनुवाद भी किया। सम सामयिक घटनाओं पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले गांधीवादी साहित्यकार “विदग्ध”जी के प्रशंसकों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी भी शामिल थे। शिक्षा विभाग की अनेक समितियों में पदाधिकारी/सदस्य रहे प्रो.चित्रभूषण जी जबलपुर सहित जिन-जिन नगरों में सेवारत रहे वहां की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य भी करते रहे। उन्होंने मंडला में रेडक्रॉस समिति की स्थापना की। छात्र जीवन में हॉकी एवं वालीबॉल के खिलाड़ी रहे विदग्ध जी नई पीढ़ी को संदेश देते हुए कहते थे कि “नियमित एवं सादा जीवन मनुष्य को शारीरिक-मानसिक व्याधियों से दूर रखता है। ” वे गीता को धर्म विशेष का ग्रंथ न मान कर इसे समस्त मानव जाति का पथ प्रदर्शक मानते थे। उनके अनुसार जीवन में क्या उचित, क्या अनुचित है यही गीता में बताया गया है।
ज्ञान-साधना से प्राप्त अनुभवों को आजीवन उदारता पूर्वक समाज को वितरित करते रहने वाले प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” जी अब हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनके द्वारा रचित साहित्य एवं उनका जीवन दर्शन सदा समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा।
(आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सरस्वती पुत्र स्मृति शेष प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
☆ कहाँ गए वे लोग # ५६ ☆
☆ “सरस्वती पुत्र प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध” ☆ श्री सुरेश पटवा ☆
प्रोफेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी ने अपने लगभग 99 वर्ष के जीवन में कला और साहित्य के कई स्वरूपों में कार्य करते हुए गीत को जिया है। वे शिक्षा शास्त्री के साथ एक समाज शास्त्री भी थे। उनकी आध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक चेतना उन्नत स्तर की थी। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में कई विधाओं में यथा छंदबद्ध और मुक्तक रचना में निरंतर लिखा। वे आध्यात्मिक तथा राष्ट्रीय भावधारा की रचनाओं में सिद्धहस्त थे। उन्होंने दोहा, गीत, नवगीत और शायरी पर एक सी कलम चलाई। उन्होंने गद्य के क्षेत्र में निबंध, भाषा विज्ञान, विश्लेषण पर उत्कृष्ट लेखन किया। उनके लेखन में पाणिनि, वेदव्यास, वाल्मिकी, गोस्वामी तुलसीदास, रामधारी सिह दिनकर, मैथली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी के लेखन के दर्शन होते हैं।
श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव ने शिक्षा विभाग में विभिन्न प्रशासनिक दायित्वपूर्ण पदों जैसे प्राध्यापक, प्राचार्य, संचालक का उत्तरदायित्व सफलता पूर्वक निर्वाह किया। राज्य व केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानो में कार्यरत रह कर अनेक समितियों में सलाहकार तथा महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह करते रहे हैं। एक दैदिप्यमान नक्षत्र के रूप में वे शिक्षा जगत में सुविख्यात हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, शिक्षा विशेषज्ञ, सरल सहज किंतु दृढ़, क्रियाशील व ऊर्जस्वी, अध्यनशील, परम ज्ञानी तथा सच्चे सरस्वती पुत्र विदग्ध जी अक्षर साधक व साहित्य सेवी के रूप में न केवल प्रतिष्ठित है बल्कि अनेक पीढ़ियों के रचनाकारो के लिए गहन आदर के पात्र व प्रेरणा स्रोत हैं।
वे जितने गंभीर हैं उतने ही उच्च विचारों के तथा विशाल ह्रदय के व्यक्तित्व रहे। उनके निर्विवाद जीवन में गतिशीलता, प्रवाह, सरसता हमेशा बनी रही। उनका जीवन अनेकों के लिये दृष्टांत बन गया है।
सामाजिक ,साहित्यिक, सांस्कृतिक ,शैक्षिक , भार तीय भावधारा, आध्यात्मिक, मानवीय, नारी उत्थान, शोध विषयों, पर साधिकार विशेषज्ञ के रूप में लिखने वाले आदरणीय विदग्ध जी हिंदी अंग्रेजी संस्कृत मराठी में महारत रखते हैं। वे अनुवाद के रूप में विशिष्ट इसलिये हैं क्योंकि वे मात्र शब्दानुवाद ही नही करते, वे मूल रचना के भावों का अनुवाद करते हैं, इतना ही नही वे काव्य में अनुवाद करते हैं। यह विशेष गुण उन्हें सामान्य अनुवाद कर्ताओं से भिन्न विशिष्ट पहचान दिलाती है। उन्हें भारतीय अनुवाद परिषद द्वारा सर्वोच्च गार्गी सम्मान से सम्मानित किया गया है।
वय के नो दशक पूर्ण कर लेने के बाद भी उतने ही क्रियाशील बने रहे। विभिन्न विषयो की तीन दर्जन से ज्यादा मौलिक क़िताबों के रचनाकार एक सक्षम सम्पादक के रूप में भी क्रियाशील रहे हैं। अनेक युवा लेखको को प्रोत्साहित कर उनके मार्गदर्शन का यश भी उनके खाते में दर्ज है। वे आंतरिक शुचिता, सांस्कृतिक मूल्यों, समाजिक समरसता, सद्भाव, सौहार्द्र, सहिष्णुता, नारी समानता के ध्वजवाहक रचनाकार हैं। उनके सारस्वत रचनाकर्म अभिवंदना योग्य हैं।
ऐसे व्यक्तित्व कम ही हैं जिनका समग्र जीवन लेखन और समाज निर्माण के लिए समर्पित हुआ हो, जिन्होंने जो कुछ लिखा उसे अपने जीवन में उतारने का आदर्श भी प्रस्तुत किया हो। वे सदा सादा जीवन उच्च विचार के मूल्यों को अपनी लेखनी से व्यक्त ही नही करते थे वरन अपने आचरण से उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत भी करते रहे। उन्हें समय समय पर देश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित कर अलंकरण, पुरस्कार, मानपत्र भेंट कर स्वयं संस्थाएं गौरव अनुभव करती थीं। वे जितने अच्छे कवि औऱ लेखक हैं उतने ही प्रवीण वक्ता भी हैं। वे जिस आयोजन में अतिथि होते हैं वहां उन्हें सुनने के लिए लोग लालायित रहते हैं। उनका आभामण्डल बहुमुखी था।
उन्हें यह दक्षता उनके गहन अध्ययन। चिंतन मनन से मिली है। उनके शैक्षणिक शोध कार्य अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सराहना अर्जित कर चुके हैं। उनके निजी ग्रन्थालय में सैकड़ों पुस्तकें हैं। अनेक स्कूलों को उन्होंने स्वयं अपनी व अन्य ढेर पुस्तकें बांटी हैं। वे सचमुच साहित्य रत्न हैं।
आकाशवाणी व दूरदर्शन से उनकी रचनाएं प्रसारित होती रही। दूरदर्शन ने उन पर एक व्यक्तित्व ऐसा भी, डॉक्यूमेंट्री बनाई है। सरस्वती सी प्रतिष्ठित पत्रिका में 1946 में उनकी पहली रचना छ्पी तभी से उनके लेखन प्रकाशन का यह क्रम अनवरत जारी रहा। उनकी बाल साहित्य की पुस्तकें नैतिक शिक्षा, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान, जनसेवा आदि प्रदेश की प्रायः प्राथमिक शालाओ व ग्राम पंचायतों के पुस्तकालयों में सुलभ हैं।
कविता उनकी सबसे प्रिय विधा है, ईशाराधन में जन कल्याणकारी प्रार्थनाएं हैं, तो वतन को नमन में देश राग है, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व अटलजी ने भी सराहा था। अनुगुंजन में उनके मन की विविधता की अनुगुंजित कवितायें हैं, वसुधा के सम्पादक कमला प्रसाद जी ने पुस्तक की भूमिका में ही कवि की भूरि भूरि प्रशंसा की है। स्वयं प्रभा तथा अंतर्ध्वनि बाद के संग्रह हैं, अक्षरा के सम्पादक श्री कैलाश चन्द्र पन्त ने विदग्ध जी की पंक्तियों को उधृत किया है, व लिखा है कि इन पंक्तियों में कवि ने सरल शब्दों में भारतीय दर्शन की व्यख्या की है।
प्रकृति में है चेतना हर एक कण सप्राण है
इसी से कहते कण कण में बसा भगवान है
चेतना है उर्जा एक शक्ति जो अदृश्य है
है बिना आकार पर अनुभूतियो में दृश्य है
भगवत गीता का हिन्दी काव्य अनुवाद तो इतना लोकप्रिय है कि उसके पांच संस्करण छप कर समाप्त हो गए हैं। मेघदूतम व रघुवंश के अनुवाद कालिदास अकादमी उज्जैन के डॉ कृष्ण कांत चतुर्वेदी जी द्वारा सराहे गए हैं। मेघदूतम पर कोलकाता में नृत्य नाटक हो चुके हैं। उनके ब्लाग संस्कृत का मजा हिंदी में पर दुनिया भर से हिट्स मिलते हैं। वे शिक्षा शास्त्री हैं, समाज उपयोगी कार्य, माइक्रो टीचिंग, शिक्षण में नवाचार आदि किताबे उनके इस पहलू को उजागर करती हैं।
जरूरत है कि समय रहते उनके लेखन पर शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित हो। उनकी अनेकानेक रचनाये जैसे रानी दुर्गावती, शंकरशाह, रघुवीरसिंह, महराणा प्रताप , भारत माता, आदि स्कूली व महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने योग्य हैं। उनके चिंतन युवा पीढ़ी के मार्गदर्शक हैं। कई अखबार उनके हिंदी अनुवाद कार्य धारावाहिक रुप से प्रकाशित कर रहे हैं। नर्मदा जी पर उनके गीत का आडियो रूप में प्रस्तुतिकरण सराहा गया है। यह टी सीरीज से तैयार हुआ है।
उनकी इच्छा शक्ति, जिजीविषा ने उन्हें उसूलों के लिए संघर्ष का मार्ग दिखाया। वे दृढ संकल्प होकर उस पर चलते रहे, औऱ ऐसे राहगीर अनुकरण योग्य मार्ग बनाने में सफल होते ही हैं। यथार्थ यह है की वे निष्ठावान गांधीवादी हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि प्रतिष्ठा पूर्ण रही है पर उन्होने यश अर्जन अपने सुकृत्यों से और सफल लेखन से ही किया है। उनकी जीवन संगनी भी एक विदुषी शिक्षा शास्त्री थी, जिनके साथ ने विदग्ध जी को परिपूर्णता दी। श्रीमती दयावती श्रीवास्तव की स्वयं की किताबें संस्कृत मंजरी कभी शालेय पाठ्यक्रम में थी। प्रोफेसर श्रीवास्तव भावुक सहृदय हैं ,पर दुर्बल नही। उनकी सात्विकता सम्यकता उन्हें क्षमतावान बनाती है, वे प्रणम्य हैं।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है डॉ. आनंद तिवारी जी के 75वें जन्मदिवस पर आपका विशेष आलेख “स्नेही-कर्मयोगी डॉ. आनंद तिवारी ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 10 ☆
☆ जीवन यात्रा 🟣 स्नेही-कर्मयोगी डॉ. आनंद तिवारी 🟣 श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
(7 जुलाई को 75 वें जन्म दिवस पर विशेष)
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उनके गांव के युवा शासकीय चिकित्सक का ट्रांसफर हो गया है, जैसे ही यह खबर गांव में फैली, न सिर्फ उस गांव के वरन आसपास के भी अनेक छोटे-छोटे गांव के लोगों में दुःख की लहर फैल गई। ग्रामवासी दूर-दूर से उस युवा चिकित्सक से मिलने और आग्रह करने आने लगे कि वे उन्हें छोड़कर न जाएं। अनेक ग्रामवासियों के हाथों में अपने प्रिय डॉक्टर के लिए प्रेम से भरी भेंटें भी थीं। एक वृद्धा अपनी पोटली में डॉक्टर के लिए गुड़ की एक छोटी डली लाई थी, उसकी आँखों में आँसू थे। डॉक्टर के विदा लेने का दिन भी आ गया। उन्हें विदा करने पास के छोटे से रेलवे स्टेशन पर आसपास के गांवों से सैकड़ों लोग उपस्थित थे। आपको लग रहा होगा कि यह किसी बम्बइया फिल्म की शुरूआत या अंत का दृश्य है। जी नहीं, यह दृश्य है सन 1980 में मध्यप्रदेश के सिवनी बानापुरा ने निकट, बाबडिया भाऊ गांव से वहां के शासकीय चिकित्सक डॉ. आनंद तिवारी की विदाई का।
श्यामवर्ण के ऊँचे-पूरे, खुशमिजाज, भव्य व्यक्तित्व के धनी डॉ आनंद तिवारी जितने खुलकर ठहाका लगाते हैं उतनी ही सहजता से अपने प्रेम की अभिव्यक्ति भी करते हैं और लोगों के दुःख में द्रवित भी होते हैं। गांव से विदा लेते हुए उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि वे अपने पिता पंडित नर्मदा प्रसाद तिवारी जी जो कि जबलपुर के विख्यात समाजसेवी, उद्योगपति एवं प्रतिष्ठित किसान के रूप में जाने जाते थे उन्हें व अपनी माता श्रीमती रेवारानी जी को सच्ची जनसेवा का जो वचन देकर आये थे उस संकल्प में खरे उतरे। लगभग 40-45 वर्ष पहले बाबडिया भाऊ गांव एवं आसपास के कुछ अन्य गांव प्रमुख रूप से पांडववंशी कौम की सीमित जनसंख्या वाले गांव थे। सीमित जनसंख्या वाली किसी भी कौम में कुछ विशिष्ट विकृतियां आ जाती हैं। उन्हें दूर करने के लिए डॉ. आनंद तिवारी ने क्षेत्र में पैदल घूम-घूम कर काम किया। बूढ़ों, बच्चों और युवाओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये, कुछ ही दिनों में इन्हें पहचान कर आत्मीयता पूर्वक उनके नाम से संबोधित करना शुरू किया। सफाई और स्वास्थ्य का महत्व समझाया। काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत ग्रामीणों से ही श्रम करवाकर गांव में एक खेल का मैदान व स्कूल भवन तथा 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण करवाया। उल्लेखनीय है कि काम के बदले अनाज योजना में डॉ. तिवारी द्वारा इस गांव में कराए गए कार्य को “सर्वाधिक तेज गति से हुआ कार्य” माना गया तथा उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया।
डॉ. तिवारी ने क्रमशः बड़ेरा एवं बड़वारा (कटनी) मैं भी समर्पित मन से पीड़ितों की सेवा की। सदा सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे आनंद तिवारी के नगर के बाहर सेवारत हो जाने के कारण उनके सानिध्य से वंचित उनके मित्र और प्रशंसक चाहते थे कि वे जबलपुर आकर ही सेवा कार्य करें। अंततः मित्रों की इच्छा पूरी हुई, उन्होंने नगर में विक्टोरिया चिकित्सालय, गोरखपुर, हाईकोर्ट एवं सिटी डिस्पेंसरी कोतवाली में न केवल एक आदर्श चिकित्सक के रूप में सेवाएं दीं वरन स्वास्थ्य संबंधी तमाम शासकीय योजनाओं को नगर की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से प्रभावी ढंग से लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। डॉ. तिवारी ने तत्कालीन राज्यसभा एवं लोकसभा सदस्यों श्रीमती रत्नकुमारी देवी, पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी, शिवकुमार चनपुरिया, श्रीमती जयश्री बैनर्जी एवं समाजसेवियों के साथ विभिन्न संस्थाओं अस्तु, समाज कल्याण परिषद, समाधान, सावधान एवं गुंजन कला सदन के विभिन्न पदों पर रहते हुए सामाजिक व सांस्कृतिक जागरण के कार्य किये। अनेक चिकित्सा शिविर लगाए। नगर में दवा एकत्रीकरण एवं वितरण योजना को अंजाम दिया। गन्दी बस्तियों में स्वच्छता अभियान चलाए। मित्रों के साथ दूध के दाम घटाने आंदोलन भी किया। डॉ. तिवारी के इन कार्यों में उनकी पत्नी श्रीमती ममता तिवारी एवं बाद में उनके सुपुत्रों हिमांशु-सुधांशु व पुत्र वधुओं डॉ. प्रियंका एवं डॉ. गार्गी का भी पूरा सहयोग मिला। सामाजिक कार्यों के बढ़ते दायरे और रोग मुक्त सुसंस्कृत समाज के निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए डॉ. आनंद तिवारी ने दिसंबर 2003 में स्वयं को शासकीय सेवा से मुक्त कर लिया।
डॉ. आनंद तिवारी ने अपने मित्रों के साथ मिलकर गोलबाजार, जबलपुर में नेशनल हॉस्पिटल एवं ओमेगा चिल्ड्रंस हॉस्पिटल की स्थापना की जिसकी गिनती आज देश के उत्कृष्ट चिकित्सालयों में की जाती है। वे भारतीय एवं क्षेत्रीय साहित्य, कला, संस्कृति के संरक्षण व विकास के लिए सजग और सक्रिय हैं। गुंजन कला सदन के प्रांतीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नगर की तरुणाई को नई दिशा और प्रतिभा विकास के लिए एक सशक्त मंच दिया। विषम कोरोना काल में डॉ. आनंद तिवारी सभी परिचितों से निरंतर संपर्क में रहते हुए उन्हें हौसला और मार्गदर्शन देते रहे। नेशनल अस्पताल के माध्यम से उन्होंने रोगियों की सेवाएं जारी रखीं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. आनंद तिवारी के परामर्श न केवल रोग निवारण में वरन जीवन के विविध क्षेत्रों में आई समस्याओं का भी चुटकियों में समाधान करने वाले साबित होते हैं।
आज 7 जुलाई को उनके जन्म दिवस पर मैं उनके सभी मित्रों, परिचितों, शुभचिंतकों और गुंजन कला सदन परिवार की और से उन्हें स्वस्थ, सुदीर्घ, सक्रिय एवं यशस्वी जीवन की शुभकामनायें समर्पित करता हूँ। 💐
8 जुलाई को नगर की 50 से अधिक संस्थाएं उनका सम्मान, समारोह पूर्वक आयोजित कर रहीं हैं।
💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ. आनंद तिवारी जी को उनके 75वें जन्म दिवस पर अशेष हार्दिक शुभकमनाएं 💐
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है जीवन यात्रा के अंतर्गत एक विमर्श – “इर्द गिर्द बिखरा यथार्थ – हर शख्स एक उपन्यास” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 356 ☆
जीवन यात्रा – इर्द गिर्द बिखरा यथार्थ – हर शख्स एक उपन्यास श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
घर के सामने एक मैदान है। सरकारी कालोनियो में ही तो बची है अब खुली जगह, वरना आड़े टेढ़े प्लाटो पर भी मकान उगा दिए गए हैं। प्रायः शाम के समय में किसी शादी या रिसेप्शन के लिए रंगीन प्रकाश से नहाये हुए टेंट तन जाते हैं मैदान में। देर रात टेंट हट जाते हैं, सुबह से मोहल्ले के ही नहीं दूर दूर से आये बच्चों के प्ले ग्राउंड में तबदील हो जाता है मैदान। बच्चे क्रिकेट खेलते हैं।
महिलाये दोपहिये वाहन और कार चलाना भी सीखती हैं, यहीं। मैं घर के सामने छोटी सी बगिया में लगे झूले में बैठा ये तरह-तरह के नजारे देखता रहता हूँ।
मैदान के किनारे बचा हुआ है एक वृक्ष अभी भी, वरना शहर में तो वृक्षारोपण ही होते दीखते हैं वृक्ष नही।
आज जब मैं बगिया में सुबह के अखबार के साथ ग्रीन टी का लुत्फ़ उठा रहा था तो नथुने एक बहुत पुरानी जानी पहचानी सी गन्ध से भर गए। गन्ध कण्डे के ताप में पकती हुई बाटी, और भुजंते हुए भटे की। ठीक वही गन्ध जो दादी की रसोई से आती थी, जहां हमारा खेलते कूदते बाहर से सीधे आना वर्जित था। जहाँ दादी का अनुशासन चलता था, और हमें पीने का पानी लेने के लिए भी देहरी के बाहर से दादी को आवाज देनी पड़ती थी।
मैं बाटी पकने की सोंधी गन्ध की तलाश में अनायास ही अखबार छोड़ गेट की तरफ बढ़ आया। देखा की मैदान के किनारे लगे पेड़ के नीचे एक रिक्शा खड़ा है, और वहीँ पास से धुँआ उठ रहा है। एक अधेड़ सा व्यक्ति कण्डे फूंक रहा था। मुझे अपनी ओर मुखातिब देख वह रिक्शेवाला एक बिसलरी की खाली बॉटल लिए हमारी तरफ चला आया पानी लेने। पत्नी गार्डेन में सिंचाई कर रही थी। उसने सटीक से बॉटल में पानी भर दिया। और रिक्शे वाले से बातें करने लगी। वार्तालाप से मुझे पता चला कि रिक्शेवाला पास के ही एक गाँव से है। वह 5 एकड़ जमीन का मालिक है। रिक्शा चलाकर ही उसने खेत में पम्प भी लगवा लिया है। पत्नी ने उससे पूछा अचार लोगे ? बिना उसकी स्वीकृति की प्रतीक्षा किये ही वह भीतर चली गई अचार लाने। अब बातचीत का सूत्र मैंने सम्भाला।
मुझे पता चला की रिक्शे वाले के दो शादीशुदा बेटे हैं। बड़ा कोई काम नही करता, शराब पीकर पड़ा रहता है। छोटे का भी खेती में मन नही लगता वह हाइस्कूल तक पढ़ गया है और नोकरी करना चाहता है। एक छोटी लड़की भी है रिक्शेवाली की, जो दसवी मे पढ़ती है, और उसकी शादी ही अब रिक्शेवाले की प्राथमिकता है। इसी लिए वह यह किराए का रिक्शा चलाकर दिन भर में 400 से 500 रूपये कमा लेता है।
रात को रिक्शे पर ही सो जाता है। कहीं बैठ कर बाटी भरता बना लेता है और इस तरह उसका दिन भर का भोजन हो जाता है।
मैंने उसे बिन मांगी सलाह दी की वह खेती ही करे, उत्तर मिला काश्तकारी के लिए भी बहुत नगदी लगती है। मैंने कहा सरकारी ऋण ले लो, कान पकड़ते हुए उसने तौबा कर ली। उसके अनुभव के सम्मुख उसे समझा पाने में मैं असमर्थ रहा। तब तक पत्नी अचार तथा एक पीस मिठाई ले आई थी और मुझे बातचीत रोकनी पड़ी। पत्नी के चेहरे पर बिना मांगे किसी को कुछ दे पाने का सुख झलक रहा था, और रिक्शे वाले के चेहरे पर मुस्कान थी।
मैं रिक्शेवाला उपन्यास बन सकता हूँ, इतना कलेवर तो मुझे मिल गया था, इस छोटी सी बातचीत से। पर इतना लिखने का समय कहाँ है अभी मेरे पास। और मैं लिख भी दूँ तो आपके पास इतना पढ़ने का समय नही है आज। हाँ, मैंने रिक्शेवाले की आसमान की छत वाली रसोई तक पहुंच कर उसकी एक फोटो जरूर ले ली है, जो साझा कर रहा हूँ।
(ई-अभिव्यक्ति में हम समय-समय पर साहित्य एवं कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठित महान विभूतियों के जीवन से संबन्धित जानकारी अपने प्रबुद्ध पाठकों को देने का प्रयास करते रहते हैं। आज इस संदर्भ में प्रस्तुत है आज प्रस्तुत है संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध संगीत साधक लोकगंधर्व पं. रुद्रदत दुबे जी की जीवन पर आधारित संस्मरणात्मक आलेख। साहित्य, संस्कृति एवं संगीत को समर्पित गूँज अंतर्राष्ट्रीय कलामंच, जबलपुर द्वारा लोकगंधर्व पं रुद्रदत्त दुबेजीवंत सम्मान स्थापित किया गया है। विगत 25 मई को यह सम्मान दतिया निवासी आकाशवाणी ग्वालियर की सुप्रसिद्ध सुश्री गायिका रजनी अरजरिया जी को प्रदान किया गया है। 💐🙏)
☆ जीवन यात्रा ☆ “सुप्रसिद्ध संगीत साधक लोकगंधर्व पं. रुद्रदत दुबे” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
बचपन के हमारे मित्र श्रवण कुमार नामदेव के पूज्य पिता एवं सुप्रसिद्ध सितार वादक श्री राजाराम जी नामदेव जब प्रतिदिन सितार बजाते तो हम लोग बड़े ध्यान से उनके पास बैठकर सितार सुनते और उत्सुकता से उनकी ओर देखा करते। एक दिन मैंने पूछ ही लिया कि सितार का संगीत में क्या मायने होता है। तब उन्होंने कहा कि संगीत को मनमोहक और मधुर बनाने में जैसे तबला, हारमोनियम, बांसुरी, गिटार इत्यादि मददगार बनते हैं वैसे ही सितार वादन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि जीवन को मनमोहक बनाने में सितार भी संगीत में जरुरी होता है।
आज जब मैं श्रद्धेय श्री रुद्रदत जी दुबे की संगीत साधना के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे मित्रवर श्रवण के पूज्य पिता की बातें रह रह कर याद आ रही हैं और मैं सोच रहा हूं कि उनकी सारगर्भित बातों पर श्री रुद्रदत दुबे जी की संगीत साधना पूरी तरह तरह खरी उतरती है। तभी तो उनकी संगीत साधना के कारण उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो ख्याति मिली, उस पर हम सभी गोरवान्वित और हर्षित हैं।संगीत को मनमोहक और लोकप्रिय बनाने में उसके वाद्य यंत्रों का महत्वपूर्ण योगदान होता है और अगर किसी संगीतकार का व्यक्तित्व और कृतित्व ही मनमोहक हो तो उसकी प्रभावशीलता में चार चांद लग जाते हैं। कुछ ऐसा ही आदरणीय श्री रुद्रदत दुबे जी के साथ भी है। उनकी सादगी, सरलता और व्यवहार की मधुरता किसी भी व्यक्ति के मन को बड़े गहरे तक प्रभावित करती हैं। उनके सितार वादन के जादू और मनमोहक एवं निस्वार्थ बातचीत ने साहित्य, समाज और संगीत के क्षेत्र में उनको जो पहचान दी है वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है।
संगीत सृजन के अंतर्गत सुरमोही, रसनू, झपतारी, निरगारी, राजीवसुरा, पूरन अंशी जैसे लोक रागों के सृजन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करने वाले श्री रुद्रदत दुबे जी का जन्म 20 अप्रैल 1941 को जबलपुर के पाटन क्षेत्र के लुहारी ग्राम में हुआ।जीवन में प्रगति के सोपान गढ़ने की प्रेरणा उन्होंने अपने पूज्य पिता पं. पूरनलाल जी दुबे और पूज्यनीया मातृ श्री श्रीमती फूलमती देवी दुबे से मिली। शिक्षा के क्षेत्र में एम . एक., एम . लिट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके संगीत प्रभाकर और भाव संगीत विशारद की उपाधि भी अर्जित की।आदरणीय श्री दुबे जी ने संगीत के क्षेत्र में राज्य स्तरीय सम्मान तो प्राप्त किए ही साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सम्मान प्राप्त कर संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने राष्ट्रीय लोक कला गौरव सम्मान, कटक, गंर्धव सम्मान पश्चिम बंगाल, नेशनल संगीत महारथी सम्मान, उड़ीसा, राष्ट्रीय लोक कला साधक सम्मान उत्तर प्रदेश, व्रज तेजस्वी सम्मान वृंदावन जैसे सम्मानों से सम्मानित होकर संगीत समाज को गौरवान्वित किया।
श्री रुद्रदत दुबे जी आज अपनी संगीत साधना से राष्ट्रीय ही नहीं वरन् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित हो चुके हैं। संगीत सेवा साधना से प्रभावित होकर उन्हें नेपाल, मलेशिया, इंग्लैंड, थाइलैंड, रुस और अमेरिका जैसे देशों ने भी संगीत गौरव के रुप में अभिनंदित किया है और उन्होंने इन देशों में विभिन्न संगीत आयोजनों में भाग लेकर भारत का गौरव बढ़ाया है। आज हम अंत्यंत गौरवशाली हैं कि जबलपुर का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाले श्री दुबे जी की संगीत साधना पर शोध कार्य भी किए जा रहे हैं। दुबे जी ने अनेक मनमोहक और प्रभावी काव्य रचनाएं लिखी हैं और उनकी विभिन्न काव्य कृतियां प्रकाशित होकर हम सबके बीच आ चुकी है। साहित्य जगत में भी अनेक साहित्यिक संस्थाओं उनका सम्मान कर स्वयं अभिनंदित हुई है।आदरणीय श्री रुद्रदत जी दुबे ने साहित्य, संगीत और समाज में अपनी सक्रियता से सभी को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है और उनकी ये सराहनीय गतिविधियां राष्ट्र कवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करती नजर आती हैं –