वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है जीवन यात्आरा स्पतम्काभ के अंतर्गत आपका एक आलेख “स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी”।)
☆ जीवन यात्रा ☆ “स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
संघर्ष-साधना से भरे सात्विक जीवन के साथ अध्ययन, चिंतन-मनन से प्राप्त परिपक्वता और आभा के तेज से जिनका मुखमंडल सदा दीप्त रहता था उन्हें हम सब कवि-साहित्यकार, अनुवादक, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद प्रो.चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” के नाम से जानते हैं। हिंदी, अर्थशास्त्र एवं शिक्षा में स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त करने के साथ ही आपने साहित्य में विशेष रुचि के कारण साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त की थी। विभिन्न नगरों के विद्यालयों में अपनी विद्वता एवं अध्यापन कौशल से इन्होंने अपने सहयोगियों और छात्रों से सदा विशिष्ट आदर व स्नेह प्राप्त किया। प्रो. चित्रभूषण जी केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 1, जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य थे। वे प्रान्तीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
1948 में देश की प्रतिष्ठित पत्रिका सरस्वती में विदग्ध जी की प्रथम रचना प्रकाशित हुई थी फिर निरन्तर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं के प्रकाशन का सिलसिला जारी रहा। आकाशवाणी केन्द्रों एवं दूरदर्शन से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण जब-तब होता रहा। ईशाराधन, वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाएं, आदर्श भाषण कला, कर्मभूमि के लिए, बलिदान, जनसेवा, अंधा और लंगड़ा, मुक्तक संग्रह, समाजोपयोगी उत्पादक कार्य, शिक्षण में नवाचार, मानस के मोती आदि उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। प्रो.चित्रभूषण जी ने भगवतगीता, मेघदूतम एवं रघुवंशम के हिंदी अनुवाद के साथ ही संस्कृत एवं मराठी के अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का हिंदी अनुवाद भी किया। सम सामयिक घटनाओं पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले गांधीवादी साहित्यकार “विदग्ध”जी के प्रशंसकों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी भी शामिल थे। शिक्षा विभाग की अनेक समितियों में पदाधिकारी/सदस्य रहे प्रो.चित्रभूषण जी जबलपुर सहित जिन-जिन नगरों में सेवारत रहे वहां की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य भी करते रहे। उन्होंने मंडला में रेडक्रॉस समिति की स्थापना की। छात्र जीवन में हॉकी एवं वालीबॉल के खिलाड़ी रहे विदग्ध जी नई पीढ़ी को संदेश देते हुए कहते थे कि “नियमित एवं सादा जीवन मनुष्य को शारीरिक-मानसिक व्याधियों से दूर रखता है। ” वे गीता को धर्म विशेष का ग्रंथ न मान कर इसे समस्त मानव जाति का पथ प्रदर्शक मानते थे। उनके अनुसार जीवन में क्या उचित, क्या अनुचित है यही गीता में बताया गया है।
ज्ञान-साधना से प्राप्त अनुभवों को आजीवन उदारता पूर्वक समाज को वितरित करते रहने वाले प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” जी अब हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनके द्वारा रचित साहित्य एवं उनका जीवन दर्शन सदा समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा।
(आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सरस्वती पुत्र स्मृति शेष प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
☆ कहाँ गए वे लोग # ५६ ☆
☆ “सरस्वती पुत्र प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध” ☆ श्री सुरेश पटवा ☆
प्रोफेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी ने अपने लगभग 99 वर्ष के जीवन में कला और साहित्य के कई स्वरूपों में कार्य करते हुए गीत को जिया है। वे शिक्षा शास्त्री के साथ एक समाज शास्त्री भी थे। उनकी आध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक चेतना उन्नत स्तर की थी। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में कई विधाओं में यथा छंदबद्ध और मुक्तक रचना में निरंतर लिखा। वे आध्यात्मिक तथा राष्ट्रीय भावधारा की रचनाओं में सिद्धहस्त थे। उन्होंने दोहा, गीत, नवगीत और शायरी पर एक सी कलम चलाई। उन्होंने गद्य के क्षेत्र में निबंध, भाषा विज्ञान, विश्लेषण पर उत्कृष्ट लेखन किया। उनके लेखन में पाणिनि, वेदव्यास, वाल्मिकी, गोस्वामी तुलसीदास, रामधारी सिह दिनकर, मैथली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी के लेखन के दर्शन होते हैं।
श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव ने शिक्षा विभाग में विभिन्न प्रशासनिक दायित्वपूर्ण पदों जैसे प्राध्यापक, प्राचार्य, संचालक का उत्तरदायित्व सफलता पूर्वक निर्वाह किया। राज्य व केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानो में कार्यरत रह कर अनेक समितियों में सलाहकार तथा महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह करते रहे हैं। एक दैदिप्यमान नक्षत्र के रूप में वे शिक्षा जगत में सुविख्यात हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, शिक्षा विशेषज्ञ, सरल सहज किंतु दृढ़, क्रियाशील व ऊर्जस्वी, अध्यनशील, परम ज्ञानी तथा सच्चे सरस्वती पुत्र विदग्ध जी अक्षर साधक व साहित्य सेवी के रूप में न केवल प्रतिष्ठित है बल्कि अनेक पीढ़ियों के रचनाकारो के लिए गहन आदर के पात्र व प्रेरणा स्रोत हैं।
वे जितने गंभीर हैं उतने ही उच्च विचारों के तथा विशाल ह्रदय के व्यक्तित्व रहे। उनके निर्विवाद जीवन में गतिशीलता, प्रवाह, सरसता हमेशा बनी रही। उनका जीवन अनेकों के लिये दृष्टांत बन गया है।
सामाजिक ,साहित्यिक, सांस्कृतिक ,शैक्षिक , भार तीय भावधारा, आध्यात्मिक, मानवीय, नारी उत्थान, शोध विषयों, पर साधिकार विशेषज्ञ के रूप में लिखने वाले आदरणीय विदग्ध जी हिंदी अंग्रेजी संस्कृत मराठी में महारत रखते हैं। वे अनुवाद के रूप में विशिष्ट इसलिये हैं क्योंकि वे मात्र शब्दानुवाद ही नही करते, वे मूल रचना के भावों का अनुवाद करते हैं, इतना ही नही वे काव्य में अनुवाद करते हैं। यह विशेष गुण उन्हें सामान्य अनुवाद कर्ताओं से भिन्न विशिष्ट पहचान दिलाती है। उन्हें भारतीय अनुवाद परिषद द्वारा सर्वोच्च गार्गी सम्मान से सम्मानित किया गया है।
वय के नो दशक पूर्ण कर लेने के बाद भी उतने ही क्रियाशील बने रहे। विभिन्न विषयो की तीन दर्जन से ज्यादा मौलिक क़िताबों के रचनाकार एक सक्षम सम्पादक के रूप में भी क्रियाशील रहे हैं। अनेक युवा लेखको को प्रोत्साहित कर उनके मार्गदर्शन का यश भी उनके खाते में दर्ज है। वे आंतरिक शुचिता, सांस्कृतिक मूल्यों, समाजिक समरसता, सद्भाव, सौहार्द्र, सहिष्णुता, नारी समानता के ध्वजवाहक रचनाकार हैं। उनके सारस्वत रचनाकर्म अभिवंदना योग्य हैं।
ऐसे व्यक्तित्व कम ही हैं जिनका समग्र जीवन लेखन और समाज निर्माण के लिए समर्पित हुआ हो, जिन्होंने जो कुछ लिखा उसे अपने जीवन में उतारने का आदर्श भी प्रस्तुत किया हो। वे सदा सादा जीवन उच्च विचार के मूल्यों को अपनी लेखनी से व्यक्त ही नही करते थे वरन अपने आचरण से उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत भी करते रहे। उन्हें समय समय पर देश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित कर अलंकरण, पुरस्कार, मानपत्र भेंट कर स्वयं संस्थाएं गौरव अनुभव करती थीं। वे जितने अच्छे कवि औऱ लेखक हैं उतने ही प्रवीण वक्ता भी हैं। वे जिस आयोजन में अतिथि होते हैं वहां उन्हें सुनने के लिए लोग लालायित रहते हैं। उनका आभामण्डल बहुमुखी था।
उन्हें यह दक्षता उनके गहन अध्ययन। चिंतन मनन से मिली है। उनके शैक्षणिक शोध कार्य अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सराहना अर्जित कर चुके हैं। उनके निजी ग्रन्थालय में सैकड़ों पुस्तकें हैं। अनेक स्कूलों को उन्होंने स्वयं अपनी व अन्य ढेर पुस्तकें बांटी हैं। वे सचमुच साहित्य रत्न हैं।
आकाशवाणी व दूरदर्शन से उनकी रचनाएं प्रसारित होती रही। दूरदर्शन ने उन पर एक व्यक्तित्व ऐसा भी, डॉक्यूमेंट्री बनाई है। सरस्वती सी प्रतिष्ठित पत्रिका में 1946 में उनकी पहली रचना छ्पी तभी से उनके लेखन प्रकाशन का यह क्रम अनवरत जारी रहा। उनकी बाल साहित्य की पुस्तकें नैतिक शिक्षा, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान, जनसेवा आदि प्रदेश की प्रायः प्राथमिक शालाओ व ग्राम पंचायतों के पुस्तकालयों में सुलभ हैं।
कविता उनकी सबसे प्रिय विधा है, ईशाराधन में जन कल्याणकारी प्रार्थनाएं हैं, तो वतन को नमन में देश राग है, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व अटलजी ने भी सराहा था। अनुगुंजन में उनके मन की विविधता की अनुगुंजित कवितायें हैं, वसुधा के सम्पादक कमला प्रसाद जी ने पुस्तक की भूमिका में ही कवि की भूरि भूरि प्रशंसा की है। स्वयं प्रभा तथा अंतर्ध्वनि बाद के संग्रह हैं, अक्षरा के सम्पादक श्री कैलाश चन्द्र पन्त ने विदग्ध जी की पंक्तियों को उधृत किया है, व लिखा है कि इन पंक्तियों में कवि ने सरल शब्दों में भारतीय दर्शन की व्यख्या की है।
प्रकृति में है चेतना हर एक कण सप्राण है
इसी से कहते कण कण में बसा भगवान है
चेतना है उर्जा एक शक्ति जो अदृश्य है
है बिना आकार पर अनुभूतियो में दृश्य है
भगवत गीता का हिन्दी काव्य अनुवाद तो इतना लोकप्रिय है कि उसके पांच संस्करण छप कर समाप्त हो गए हैं। मेघदूतम व रघुवंश के अनुवाद कालिदास अकादमी उज्जैन के डॉ कृष्ण कांत चतुर्वेदी जी द्वारा सराहे गए हैं। मेघदूतम पर कोलकाता में नृत्य नाटक हो चुके हैं। उनके ब्लाग संस्कृत का मजा हिंदी में पर दुनिया भर से हिट्स मिलते हैं। वे शिक्षा शास्त्री हैं, समाज उपयोगी कार्य, माइक्रो टीचिंग, शिक्षण में नवाचार आदि किताबे उनके इस पहलू को उजागर करती हैं।
जरूरत है कि समय रहते उनके लेखन पर शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित हो। उनकी अनेकानेक रचनाये जैसे रानी दुर्गावती, शंकरशाह, रघुवीरसिंह, महराणा प्रताप , भारत माता, आदि स्कूली व महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने योग्य हैं। उनके चिंतन युवा पीढ़ी के मार्गदर्शक हैं। कई अखबार उनके हिंदी अनुवाद कार्य धारावाहिक रुप से प्रकाशित कर रहे हैं। नर्मदा जी पर उनके गीत का आडियो रूप में प्रस्तुतिकरण सराहा गया है। यह टी सीरीज से तैयार हुआ है।
उनकी इच्छा शक्ति, जिजीविषा ने उन्हें उसूलों के लिए संघर्ष का मार्ग दिखाया। वे दृढ संकल्प होकर उस पर चलते रहे, औऱ ऐसे राहगीर अनुकरण योग्य मार्ग बनाने में सफल होते ही हैं। यथार्थ यह है की वे निष्ठावान गांधीवादी हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि प्रतिष्ठा पूर्ण रही है पर उन्होने यश अर्जन अपने सुकृत्यों से और सफल लेखन से ही किया है। उनकी जीवन संगनी भी एक विदुषी शिक्षा शास्त्री थी, जिनके साथ ने विदग्ध जी को परिपूर्णता दी। श्रीमती दयावती श्रीवास्तव की स्वयं की किताबें संस्कृत मंजरी कभी शालेय पाठ्यक्रम में थी। प्रोफेसर श्रीवास्तव भावुक सहृदय हैं ,पर दुर्बल नही। उनकी सात्विकता सम्यकता उन्हें क्षमतावान बनाती है, वे प्रणम्य हैं।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है डॉ. आनंद तिवारी जी के 75वें जन्मदिवस पर आपका विशेष आलेख “स्नेही-कर्मयोगी डॉ. आनंद तिवारी ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 10 ☆
☆ जीवन यात्रा 🟣 स्नेही-कर्मयोगी डॉ. आनंद तिवारी 🟣 श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
(7 जुलाई को 75 वें जन्म दिवस पर विशेष)
☆
उनके गांव के युवा शासकीय चिकित्सक का ट्रांसफर हो गया है, जैसे ही यह खबर गांव में फैली, न सिर्फ उस गांव के वरन आसपास के भी अनेक छोटे-छोटे गांव के लोगों में दुःख की लहर फैल गई। ग्रामवासी दूर-दूर से उस युवा चिकित्सक से मिलने और आग्रह करने आने लगे कि वे उन्हें छोड़कर न जाएं। अनेक ग्रामवासियों के हाथों में अपने प्रिय डॉक्टर के लिए प्रेम से भरी भेंटें भी थीं। एक वृद्धा अपनी पोटली में डॉक्टर के लिए गुड़ की एक छोटी डली लाई थी, उसकी आँखों में आँसू थे। डॉक्टर के विदा लेने का दिन भी आ गया। उन्हें विदा करने पास के छोटे से रेलवे स्टेशन पर आसपास के गांवों से सैकड़ों लोग उपस्थित थे। आपको लग रहा होगा कि यह किसी बम्बइया फिल्म की शुरूआत या अंत का दृश्य है। जी नहीं, यह दृश्य है सन 1980 में मध्यप्रदेश के सिवनी बानापुरा ने निकट, बाबडिया भाऊ गांव से वहां के शासकीय चिकित्सक डॉ. आनंद तिवारी की विदाई का।
श्यामवर्ण के ऊँचे-पूरे, खुशमिजाज, भव्य व्यक्तित्व के धनी डॉ आनंद तिवारी जितने खुलकर ठहाका लगाते हैं उतनी ही सहजता से अपने प्रेम की अभिव्यक्ति भी करते हैं और लोगों के दुःख में द्रवित भी होते हैं। गांव से विदा लेते हुए उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि वे अपने पिता पंडित नर्मदा प्रसाद तिवारी जी जो कि जबलपुर के विख्यात समाजसेवी, उद्योगपति एवं प्रतिष्ठित किसान के रूप में जाने जाते थे उन्हें व अपनी माता श्रीमती रेवारानी जी को सच्ची जनसेवा का जो वचन देकर आये थे उस संकल्प में खरे उतरे। लगभग 40-45 वर्ष पहले बाबडिया भाऊ गांव एवं आसपास के कुछ अन्य गांव प्रमुख रूप से पांडववंशी कौम की सीमित जनसंख्या वाले गांव थे। सीमित जनसंख्या वाली किसी भी कौम में कुछ विशिष्ट विकृतियां आ जाती हैं। उन्हें दूर करने के लिए डॉ. आनंद तिवारी ने क्षेत्र में पैदल घूम-घूम कर काम किया। बूढ़ों, बच्चों और युवाओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये, कुछ ही दिनों में इन्हें पहचान कर आत्मीयता पूर्वक उनके नाम से संबोधित करना शुरू किया। सफाई और स्वास्थ्य का महत्व समझाया। काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत ग्रामीणों से ही श्रम करवाकर गांव में एक खेल का मैदान व स्कूल भवन तथा 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण करवाया। उल्लेखनीय है कि काम के बदले अनाज योजना में डॉ. तिवारी द्वारा इस गांव में कराए गए कार्य को “सर्वाधिक तेज गति से हुआ कार्य” माना गया तथा उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया।
डॉ. तिवारी ने क्रमशः बड़ेरा एवं बड़वारा (कटनी) मैं भी समर्पित मन से पीड़ितों की सेवा की। सदा सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे आनंद तिवारी के नगर के बाहर सेवारत हो जाने के कारण उनके सानिध्य से वंचित उनके मित्र और प्रशंसक चाहते थे कि वे जबलपुर आकर ही सेवा कार्य करें। अंततः मित्रों की इच्छा पूरी हुई, उन्होंने नगर में विक्टोरिया चिकित्सालय, गोरखपुर, हाईकोर्ट एवं सिटी डिस्पेंसरी कोतवाली में न केवल एक आदर्श चिकित्सक के रूप में सेवाएं दीं वरन स्वास्थ्य संबंधी तमाम शासकीय योजनाओं को नगर की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से प्रभावी ढंग से लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। डॉ. तिवारी ने तत्कालीन राज्यसभा एवं लोकसभा सदस्यों श्रीमती रत्नकुमारी देवी, पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी, शिवकुमार चनपुरिया, श्रीमती जयश्री बैनर्जी एवं समाजसेवियों के साथ विभिन्न संस्थाओं अस्तु, समाज कल्याण परिषद, समाधान, सावधान एवं गुंजन कला सदन के विभिन्न पदों पर रहते हुए सामाजिक व सांस्कृतिक जागरण के कार्य किये। अनेक चिकित्सा शिविर लगाए। नगर में दवा एकत्रीकरण एवं वितरण योजना को अंजाम दिया। गन्दी बस्तियों में स्वच्छता अभियान चलाए। मित्रों के साथ दूध के दाम घटाने आंदोलन भी किया। डॉ. तिवारी के इन कार्यों में उनकी पत्नी श्रीमती ममता तिवारी एवं बाद में उनके सुपुत्रों हिमांशु-सुधांशु व पुत्र वधुओं डॉ. प्रियंका एवं डॉ. गार्गी का भी पूरा सहयोग मिला। सामाजिक कार्यों के बढ़ते दायरे और रोग मुक्त सुसंस्कृत समाज के निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए डॉ. आनंद तिवारी ने दिसंबर 2003 में स्वयं को शासकीय सेवा से मुक्त कर लिया।
डॉ. आनंद तिवारी ने अपने मित्रों के साथ मिलकर गोलबाजार, जबलपुर में नेशनल हॉस्पिटल एवं ओमेगा चिल्ड्रंस हॉस्पिटल की स्थापना की जिसकी गिनती आज देश के उत्कृष्ट चिकित्सालयों में की जाती है। वे भारतीय एवं क्षेत्रीय साहित्य, कला, संस्कृति के संरक्षण व विकास के लिए सजग और सक्रिय हैं। गुंजन कला सदन के प्रांतीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नगर की तरुणाई को नई दिशा और प्रतिभा विकास के लिए एक सशक्त मंच दिया। विषम कोरोना काल में डॉ. आनंद तिवारी सभी परिचितों से निरंतर संपर्क में रहते हुए उन्हें हौसला और मार्गदर्शन देते रहे। नेशनल अस्पताल के माध्यम से उन्होंने रोगियों की सेवाएं जारी रखीं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. आनंद तिवारी के परामर्श न केवल रोग निवारण में वरन जीवन के विविध क्षेत्रों में आई समस्याओं का भी चुटकियों में समाधान करने वाले साबित होते हैं।
आज 7 जुलाई को उनके जन्म दिवस पर मैं उनके सभी मित्रों, परिचितों, शुभचिंतकों और गुंजन कला सदन परिवार की और से उन्हें स्वस्थ, सुदीर्घ, सक्रिय एवं यशस्वी जीवन की शुभकामनायें समर्पित करता हूँ। 💐
8 जुलाई को नगर की 50 से अधिक संस्थाएं उनका सम्मान, समारोह पूर्वक आयोजित कर रहीं हैं।
💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ. आनंद तिवारी जी को उनके 75वें जन्म दिवस पर अशेष हार्दिक शुभकमनाएं 💐
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है जीवन यात्रा के अंतर्गत एक विमर्श – “इर्द गिर्द बिखरा यथार्थ – हर शख्स एक उपन्यास” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 356 ☆
जीवन यात्रा – इर्द गिर्द बिखरा यथार्थ – हर शख्स एक उपन्यास श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
घर के सामने एक मैदान है। सरकारी कालोनियो में ही तो बची है अब खुली जगह, वरना आड़े टेढ़े प्लाटो पर भी मकान उगा दिए गए हैं। प्रायः शाम के समय में किसी शादी या रिसेप्शन के लिए रंगीन प्रकाश से नहाये हुए टेंट तन जाते हैं मैदान में। देर रात टेंट हट जाते हैं, सुबह से मोहल्ले के ही नहीं दूर दूर से आये बच्चों के प्ले ग्राउंड में तबदील हो जाता है मैदान। बच्चे क्रिकेट खेलते हैं।
महिलाये दोपहिये वाहन और कार चलाना भी सीखती हैं, यहीं। मैं घर के सामने छोटी सी बगिया में लगे झूले में बैठा ये तरह-तरह के नजारे देखता रहता हूँ।
मैदान के किनारे बचा हुआ है एक वृक्ष अभी भी, वरना शहर में तो वृक्षारोपण ही होते दीखते हैं वृक्ष नही।
आज जब मैं बगिया में सुबह के अखबार के साथ ग्रीन टी का लुत्फ़ उठा रहा था तो नथुने एक बहुत पुरानी जानी पहचानी सी गन्ध से भर गए। गन्ध कण्डे के ताप में पकती हुई बाटी, और भुजंते हुए भटे की। ठीक वही गन्ध जो दादी की रसोई से आती थी, जहां हमारा खेलते कूदते बाहर से सीधे आना वर्जित था। जहाँ दादी का अनुशासन चलता था, और हमें पीने का पानी लेने के लिए भी देहरी के बाहर से दादी को आवाज देनी पड़ती थी।
मैं बाटी पकने की सोंधी गन्ध की तलाश में अनायास ही अखबार छोड़ गेट की तरफ बढ़ आया। देखा की मैदान के किनारे लगे पेड़ के नीचे एक रिक्शा खड़ा है, और वहीँ पास से धुँआ उठ रहा है। एक अधेड़ सा व्यक्ति कण्डे फूंक रहा था। मुझे अपनी ओर मुखातिब देख वह रिक्शेवाला एक बिसलरी की खाली बॉटल लिए हमारी तरफ चला आया पानी लेने। पत्नी गार्डेन में सिंचाई कर रही थी। उसने सटीक से बॉटल में पानी भर दिया। और रिक्शे वाले से बातें करने लगी। वार्तालाप से मुझे पता चला कि रिक्शेवाला पास के ही एक गाँव से है। वह 5 एकड़ जमीन का मालिक है। रिक्शा चलाकर ही उसने खेत में पम्प भी लगवा लिया है। पत्नी ने उससे पूछा अचार लोगे ? बिना उसकी स्वीकृति की प्रतीक्षा किये ही वह भीतर चली गई अचार लाने। अब बातचीत का सूत्र मैंने सम्भाला।
मुझे पता चला की रिक्शे वाले के दो शादीशुदा बेटे हैं। बड़ा कोई काम नही करता, शराब पीकर पड़ा रहता है। छोटे का भी खेती में मन नही लगता वह हाइस्कूल तक पढ़ गया है और नोकरी करना चाहता है। एक छोटी लड़की भी है रिक्शेवाली की, जो दसवी मे पढ़ती है, और उसकी शादी ही अब रिक्शेवाले की प्राथमिकता है। इसी लिए वह यह किराए का रिक्शा चलाकर दिन भर में 400 से 500 रूपये कमा लेता है।
रात को रिक्शे पर ही सो जाता है। कहीं बैठ कर बाटी भरता बना लेता है और इस तरह उसका दिन भर का भोजन हो जाता है।
मैंने उसे बिन मांगी सलाह दी की वह खेती ही करे, उत्तर मिला काश्तकारी के लिए भी बहुत नगदी लगती है। मैंने कहा सरकारी ऋण ले लो, कान पकड़ते हुए उसने तौबा कर ली। उसके अनुभव के सम्मुख उसे समझा पाने में मैं असमर्थ रहा। तब तक पत्नी अचार तथा एक पीस मिठाई ले आई थी और मुझे बातचीत रोकनी पड़ी। पत्नी के चेहरे पर बिना मांगे किसी को कुछ दे पाने का सुख झलक रहा था, और रिक्शे वाले के चेहरे पर मुस्कान थी।
मैं रिक्शेवाला उपन्यास बन सकता हूँ, इतना कलेवर तो मुझे मिल गया था, इस छोटी सी बातचीत से। पर इतना लिखने का समय कहाँ है अभी मेरे पास। और मैं लिख भी दूँ तो आपके पास इतना पढ़ने का समय नही है आज। हाँ, मैंने रिक्शेवाले की आसमान की छत वाली रसोई तक पहुंच कर उसकी एक फोटो जरूर ले ली है, जो साझा कर रहा हूँ।
(ई-अभिव्यक्ति में हम समय-समय पर साहित्य एवं कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठित महान विभूतियों के जीवन से संबन्धित जानकारी अपने प्रबुद्ध पाठकों को देने का प्रयास करते रहते हैं। आज इस संदर्भ में प्रस्तुत है आज प्रस्तुत है संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध संगीत साधक लोकगंधर्व पं. रुद्रदत दुबे जी की जीवन पर आधारित संस्मरणात्मक आलेख। साहित्य, संस्कृति एवं संगीत को समर्पित गूँज अंतर्राष्ट्रीय कलामंच, जबलपुर द्वारा लोकगंधर्व पं रुद्रदत्त दुबेजीवंत सम्मान स्थापित किया गया है। विगत 25 मई को यह सम्मान दतिया निवासी आकाशवाणी ग्वालियर की सुप्रसिद्ध सुश्री गायिका रजनी अरजरिया जी को प्रदान किया गया है। 💐🙏)
☆ जीवन यात्रा ☆ “सुप्रसिद्ध संगीत साधक लोकगंधर्व पं. रुद्रदत दुबे” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
बचपन के हमारे मित्र श्रवण कुमार नामदेव के पूज्य पिता एवं सुप्रसिद्ध सितार वादक श्री राजाराम जी नामदेव जब प्रतिदिन सितार बजाते तो हम लोग बड़े ध्यान से उनके पास बैठकर सितार सुनते और उत्सुकता से उनकी ओर देखा करते। एक दिन मैंने पूछ ही लिया कि सितार का संगीत में क्या मायने होता है। तब उन्होंने कहा कि संगीत को मनमोहक और मधुर बनाने में जैसे तबला, हारमोनियम, बांसुरी, गिटार इत्यादि मददगार बनते हैं वैसे ही सितार वादन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि जीवन को मनमोहक बनाने में सितार भी संगीत में जरुरी होता है।
आज जब मैं श्रद्धेय श्री रुद्रदत जी दुबे की संगीत साधना के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे मित्रवर श्रवण के पूज्य पिता की बातें रह रह कर याद आ रही हैं और मैं सोच रहा हूं कि उनकी सारगर्भित बातों पर श्री रुद्रदत दुबे जी की संगीत साधना पूरी तरह तरह खरी उतरती है। तभी तो उनकी संगीत साधना के कारण उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो ख्याति मिली, उस पर हम सभी गोरवान्वित और हर्षित हैं।संगीत को मनमोहक और लोकप्रिय बनाने में उसके वाद्य यंत्रों का महत्वपूर्ण योगदान होता है और अगर किसी संगीतकार का व्यक्तित्व और कृतित्व ही मनमोहक हो तो उसकी प्रभावशीलता में चार चांद लग जाते हैं। कुछ ऐसा ही आदरणीय श्री रुद्रदत दुबे जी के साथ भी है। उनकी सादगी, सरलता और व्यवहार की मधुरता किसी भी व्यक्ति के मन को बड़े गहरे तक प्रभावित करती हैं। उनके सितार वादन के जादू और मनमोहक एवं निस्वार्थ बातचीत ने साहित्य, समाज और संगीत के क्षेत्र में उनको जो पहचान दी है वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है।
संगीत सृजन के अंतर्गत सुरमोही, रसनू, झपतारी, निरगारी, राजीवसुरा, पूरन अंशी जैसे लोक रागों के सृजन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करने वाले श्री रुद्रदत दुबे जी का जन्म 20 अप्रैल 1941 को जबलपुर के पाटन क्षेत्र के लुहारी ग्राम में हुआ।जीवन में प्रगति के सोपान गढ़ने की प्रेरणा उन्होंने अपने पूज्य पिता पं. पूरनलाल जी दुबे और पूज्यनीया मातृ श्री श्रीमती फूलमती देवी दुबे से मिली। शिक्षा के क्षेत्र में एम . एक., एम . लिट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके संगीत प्रभाकर और भाव संगीत विशारद की उपाधि भी अर्जित की।आदरणीय श्री दुबे जी ने संगीत के क्षेत्र में राज्य स्तरीय सम्मान तो प्राप्त किए ही साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सम्मान प्राप्त कर संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने राष्ट्रीय लोक कला गौरव सम्मान, कटक, गंर्धव सम्मान पश्चिम बंगाल, नेशनल संगीत महारथी सम्मान, उड़ीसा, राष्ट्रीय लोक कला साधक सम्मान उत्तर प्रदेश, व्रज तेजस्वी सम्मान वृंदावन जैसे सम्मानों से सम्मानित होकर संगीत समाज को गौरवान्वित किया।
श्री रुद्रदत दुबे जी आज अपनी संगीत साधना से राष्ट्रीय ही नहीं वरन् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित हो चुके हैं। संगीत सेवा साधना से प्रभावित होकर उन्हें नेपाल, मलेशिया, इंग्लैंड, थाइलैंड, रुस और अमेरिका जैसे देशों ने भी संगीत गौरव के रुप में अभिनंदित किया है और उन्होंने इन देशों में विभिन्न संगीत आयोजनों में भाग लेकर भारत का गौरव बढ़ाया है। आज हम अंत्यंत गौरवशाली हैं कि जबलपुर का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाले श्री दुबे जी की संगीत साधना पर शोध कार्य भी किए जा रहे हैं। दुबे जी ने अनेक मनमोहक और प्रभावी काव्य रचनाएं लिखी हैं और उनकी विभिन्न काव्य कृतियां प्रकाशित होकर हम सबके बीच आ चुकी है। साहित्य जगत में भी अनेक साहित्यिक संस्थाओं उनका सम्मान कर स्वयं अभिनंदित हुई है।आदरणीय श्री रुद्रदत जी दुबे ने साहित्य, संगीत और समाज में अपनी सक्रियता से सभी को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है और उनकी ये सराहनीय गतिविधियां राष्ट्र कवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करती नजर आती हैं –
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ जीवन यात्रा – कहीं न कहीं हरे-भरे पेड़ अवश्य ही होंगे… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
(कथा बिम्ब में पांच साल पहले प्रकाशित मेरी आत्मकथा)
बहुत वर्ष पहले ‘कथा बिम्ब’ के भाई अरविंद ने आत्मकथ्य लिखने का प्रेमपूर्वक आग्रह किया था । तब लिख नहीं पाया । पत्रकारिता ने बहुत कुछ पीछे ठेल रखा था । अब पूरी तरह सेवानिवृत्त और स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन का समय मिला तो अपने बारे में लिखने का अवसर भी मिल गया ।
मैं मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा जिले से हूं । इसमें शहीद भगतसिंह का पैतृक गांव खटकड कलां भी शामिल होने के कारण पंजाब सरकार ने अब इस जिले का नाम शहीद भगतसिंह नगर कर दिया है । मुझे बहुत गर्व है कि शहीद भगतसिंह की स्मृति में पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा खोले गये गवर्नमेंट आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सन् 1979 में मुझे हिंदी प्राध्यापक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला । सन् 1985 में मुझे कार्यवाहक प्रिंसिपल बना दिया गया । इस तरह शहीद के परिवार सदस्यों से मुलाकातें भी होती रहीं । मेरा लेख ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुआ : शहीद भगतसिंह के पुरखों का गांव ।
खैर । पढाई से बात शुरू करता हूं । जो लडका बड़ा होकर स्कूल प्रिंसिपल बना और स्कूल को सर्वश्रेष्ठ स्कूल का पुरस्कार दिलाया , वही लड़का कभी पांचवीं कक्षा तक स्कूल का भगौड़ा लड़का था । पिता जी छोड़ कर जाते और कुछ समय बाद बेटे को देखने आते तो पता चलता कि बरखुरदार फट्टी बस्ता रख कर भाग चुके हैं । पिताजी का माथा ठनकता और उनकी छठी इंद्री बताती कि हो न हो , यह लड़का छोटी जाति के नौकर के घर जा छिपा है । वे वहां पहुंचते और थप्पडों से मुंह लाल कर घर ले आते । फिर ठिकाना बदलता और फिर खोजते । फिर वहीं थप्पडों से बेहाल । पिता जी , दादी और घर के लोग यह मानते कि यह बच्चा नहीं पढ़ेगा । दादा जी कहते कोई बात नहीं । गांव में तीन तीन भैंसे हैं । बस । कोई गम नहीं । खेतों में चराने चले जाना । मैं मन ही मन इस काम से भी कांप जाता । भैंस चराने का गुण आया ही नहीं।
थोड़ा बड़ा हुआ तो दादी को हमारे चचा के लडके शाम ने बताया कि दादी, एक बह्मीबूटी आती है । इसे रोज सुबह पिला दो । उसने पंसारी की दुकान से ला दी । दादी ने खूब घोट कर पिलाई । साथ में वृहस्पतिवार के व्रत ताकि देवता की कृपा हो जाए । पता नहीं , देवता खुश हुए या बूटी असर कर गयी कि मैं मिडल क्लास में सेकेंड डिवीजन में पास हो गया । दादी ने परात में लड्डू रखे और खुशी में मोहल्ले भर में बांटे ।
यह है मेरी पढ़ाई का हाल । ग्यारहवीं तक मेरे पिता, दादा और दादी का निधन हो चुका था जो मुझे पढाई में सफल देखना चाहते थे । मैं इतना सफल हुआ कि तीनों वर्ष कॉलेज में प्रथम रहा । पर अफसोस अब कोई परात भर कर लडडू बांटने वाला नहीं था । मैं कमरा बंद कर खूब रोता अपनी ऐसी सफलता पर जिसे कोई देखने वाला नहीं था । महाविद्यालय की पत्रिका का छात्र संपादक भी रहा । यहीं से संपादन में रूचि बढ़ी । फिर बीएड में भी छात्र संपादक । इसी प्रकार गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की प्रभाकर परीक्षा में स्वर्ण पदक पाया । हिंदी एम ए की हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में ।
बात साहित्य की करें । मेरे परिवार का साहित्य से दूर दूर तक नाता नहीं था लेकिन ‘हिंदी मिलाप’ अखबार प्रतिदिन घर में आता था , जिसे मैं जरूर पढता था । उसमें फिक्र तौंसवीं का व्यंग्य काॅलम ‘प्याज के छिलके’ बहुत पसंद आता । ‘वीर प्रताप’ अखबार ने मुझे नवांशहर का बालोद्यान का संयोजक बना रखा था । यह अखबार इस नाते फ्री घर में डाला जाता था । इस तरह दो अखबार पढने को मिलते । रेडियो खूब सुनता । बाल कहानियों को जरूर सुनता । दादी भी सर्दियों में अंगीठी के आसपास बिठा कर कहानियां सुनाती । वही राजकुमार, राजकुमारियों के किस्से । पर हर राजकुमार किसी न किसी राजकुमारी को राक्षस की चंगुल से छुडाकर लाता । बस । ‘दरवाजा कौन खोलेगा’ कथा संग्रह में मैंने भूमिका में यही लिखा कि हर जगह राक्षस है । राजकुमारी कैद है । राजकुमार का संघर्ष है । यही जीवन है ।
मेरी पहली रचना ‘नयी कमीज’ जनप्रदीप समाचार-पत्र में प्रकाशित हुई । पिता जी मेरी पुरानी कमीज नौकर के बेटे के लिए ले गये थे । वह गांव भर में नाचता फिरा और मन ही मन शर्मिंदा होकर सोचता रहा कि हमारी उतरन भी नौकर के बेटे की खुशी का कारण बन सकती है ? समाजसेवा का भाव जगा । मैं सन् 1979 से लेकर 1990 तक खटकड कलां में प्रिंसिपल रहा । साथ में चंडीगढ से प्रकाशित ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का आंशिक संवाददाता भी । मेरी रूचि साहित्य के साथ साथ पत्रकारिता में जुनून की हद तक बढती चली गयी । मेरे पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर लिखी : एक संवाददाता की डायरी कहानी को सारिका में तो नीले घोडे वाले सवारों के नाम’, कहानी को धर्मयुग ने जुलाई, 1982 के अंकों में प्रकाशित किया । पहली बार पता चला कि लेखक की फैन मेल क्या होती है । प्रतिदिन औसतन दो तीन पत्र इन कहानियों पर मिलते । तब मैंने सोचा कि कम लिखो और कोशिश कर अच्छा लिखो । इसी प्रकार ‘कथा बिम्ब’ में प्रकाशित कहानी : सूनी मांग का गीत पर भी अनेक पत्र मिले । कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, अज्ञेय व श्रीपत राय के संपादन में कहानियां प्रकाशित होने का सुख मिला । श्रीपत राय ने तो एक वर्ष में मेरी आठ कहानियां प्रकाशित कीं । मुलाकात के दौरान उलाहना दिया कि बारह कहानियां क्यों नहीं लिखीं ? इस प्रोत्साहन से ज्यादा क्या चाहिए ? ज्यादा लेखन का कोई तुक नहीं । मेरे कथा संग्रह बडे़ रचनाकारों के सुझावों पर प्रकाशित हुए । बिना कुछ रकम दिए ।
सन् 1975 में मैं केंद्रीय हिंदी निदेशालय की ओर से अहिंदी भाषी लेखकों के अहमदाबाद में एक सप्ताह के लिए लगने वाले लेखक शिविर के लिए चुना गया । तब राजी सेठ वहीं रहती थीं और उन्होने भी इस शिविर में भाग लिया और उनकी पहली कहानी ‘क्योंकर’ कहानी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । राजन सेठ के नाम के नाम से । लड़कों जैसा नाम होने के कारण उन्होंने अपना नाम राजी सेठ कर लिया । विष्णु प्रभाकर हमारी कहानी की क्लास लेते थे । इन दोनों से मेरा व्यक्तिगत परिचय तब से चला आ रहा है । विष्णु जी के बाद उनके परिवार से जुड़ा हुआ हूं । विष्णु जी के अनेक इंटरव्यूज प्रकाशित किए । तीन बार आमंत्रित भी किया क्योंकि संयोगवश हिसार पोस्टिंग हो जाने पर पता चला कि हिसार में अपने मामा के पास विष्णु जी ने पढ़ाई की । नौकरी की और साहित्यिक यात्रा शुरू की । बीस वर्ष यहीं गुजारे पर सीआईडी के पीछे लग जाने से दिल्ली चले गये और फिर नहीं लौटे । हां , हिसार के प्रति लगाव बहुत अधिक । आमंत्रण पर नंगे पाँव दौड़े आते । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के कथा समारोह में आए । जब उन्हें मान सम्मान की राशि का लिफाफा सौंपा तो स्नेह से भावुक होकर बोले -तेरे जैसा शिष्य भी सौभाग्य से मिलता है ।
मेरे जीवन में कहानी लेखन में रमेश बतरा का बहुत बडा योगदान है । चंडीगढ हम लोग इकट्ठे होते और रमेश का कहना था कि यदि एक माह में एक कहानी नहीं लिखी तो मुंह मत दिखाना । लगातार नयी कहानी। फिर वह ‘सारिका’ में उपसंपादक बन कर चला गया । जहां भी संपादन किया मेरी रचनाएं आमंत्रित कीं । ‘कायर’ लघुकथा उसके दिल के बहुत करीब थी । वह कहता था कि यदि मैं विशव की श्रेषठ लघुकथाओं को भी चुनने लगूं तो भी इसे रखूंगा । वरिष्ठ कथाकार राकेश वत्स की चुनौती भी बडी काम आई । वे एक ही बार नवांशहर आए और देर रात शराब के हल्के हल्के सरूर में जब चहलकदमी के लिए निकले तब वत्स ने मुझे और मुकेश सेठी को कहा कि मैं आपको कहानीकार कैसे मान लूं ? आपकी कहानियां न सारिका में , न धर्मयुग और हिंदुस्तान में आई हैं । फिर रमेश को बताया । उसने भी कहा कि वत्स की इस बात को और चुनौती को स्वीकार करो । फिर क्या था ? सारिका, नया प्रतीक, कहानी में स्थान मिला । अनेक अन्य भाषाओं में कहानियां अनुवादित हुईं । रमेश असमय चला गया । अब कोई दबाव नहीं । कोई चुनौती भी नहीं । कहानी भी नहीं । पहला कथा संग्रह ‘महक से ऊपर’ राजी सेठ के स्नेह से डाॅ महीप सिंह ने प्रकाशित किया : अभिव्यंजना प्रकाशन से । ‘महक से ऊपर’ । रॉयल्टी भी मिली और पंजाब भाषा विभाग से सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार भी । पहली कृति पर पुरस्कार और रॉयल्टी । नये कथाकार को और क्या चाहिए ?
सन् 1990 में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक राधेश्याम शर्मा और समाचार संपादक सत्यानंद शाकिर दैनिक ट्रिब्यून में मुझे पूर्णकालिक चाहते थे । मार्च माह की पहली तारीख को प्रिंसिपल, शिक्षण व अध्यापन को अलविदा कहने के बाद पत्रकारिता में आ गया । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का कथा कहानी पन्ना संपादित करने का अवसर मिला । कश्मीर से दिल्ली तक के कथाकारों से काफी जानने और मिलने का मौका मिला । कथा व लघुकथा को विशेष स्थान दिया । इस बीच मेरे लघुकथा संग्रह मस्तराम जिंदाबाद, इस बार तो कथा संग्रह मां और मिट्टी, जादूगरनी , शो विंडो की गुडिया आदि प्रकाशित हुए । मजेदार बात है कि साहित्य में मुझे लघुकथाकार ही समझा जा रहा है जबकि मेरे छह कथा संग्रह हैं । जहां तक कि ग्रंथ अकादमी के लिए कथा संकलन संपादित करने वाले ज्ञान प्रकाश विवेक मेरा कथा संग्रह दरवाजा कौन खोलेगा पढ कर हैरान रह गये और फोन पर कहा कि यार , मुझे बहुत हैरानी हुई कि लोग आपको लघुथाकार ही क्यों मानते हैं ?
मुझे हिसार में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के स्टाफ रिपोर्टर के रूप में अवसर मिला एक नये प्रदेश और संस्कृति को जानने का । इस दौरान डाॅ नरेंद्र कोहली के सुझाव पर मेरा कथा संग्रह ‘एक संवाददाता की डायरी’ तो डाॅ वीरेंद्र मेंहदीरता के सुझाव पर जादूगरनी , ‘शो विंडो की गुडिया’ कथा संग्रह चंडीगढ के अभिषेक प्रकाशन से आए । ऐसे थे तुम , इतनी सी बात , मां और मिट्टी, दरवाजा कौन खोलेगा जैसे संकलन भी पाठकों तक पहुंचे ।
इस तरह अब तक मेरे सात कथा संग्रह और पांच लघुकथा संग्रह हैं । ‘एक संवाददाता की डायरी’ को अहिंदी भाषी लेखन पुरस्कार योजना में प्रथम पुरस्कार मिला और सबसे सुखद क्षण जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों यह पुरस्कार मिला । किसी रचनाकार के हाथों पुरस्कार मिलना आज भी पुलक से भर देता है । अटल जी ने वह संग्रह पढ़ने के लिए मंगवाया भी ।
काॅलेज छात्र के रूप में खुद की पत्रिकाएं प्रयास, पूर्वा और प्रस्तुत प्रकाशित कीं । दैनिक ट्रिब्यून से त्यागपत्र दिलवा कर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुझे नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष बना कर ले गये । नयी अकादमी की कथा पत्रिका ‘कथा समय’ का संपादन किया । नये रचनाकारों को स्थान देना सदैव मुझे अच्छा लगता है । वरिष्ठ रचनाकारों की कहानियां भी दीं । नेहा शरद, शेखर जोशी , अमरकांत, नरेंद्र कोहली, राजी सेठ, वीरेंद्र मेंहदीरता, निर्मल वर्मा, रविंद्र कालिया, ममता कालिया की चुनी हुई कहानियां दीं ।
अब अकादमी के पद से मुक्त हूं । हिसार के एक प्रतिष्ठित सांध्य दैनिक नभछोर में प्रतिदिन संपादकीय आलेख और साहित्य हिसार का देखता हूं । अनेक यात्राएं करता हूं । साहित्यिक संस्थाओं के आमंत्रण पर अलग अलग मित्र बनते हैं । सीखने की कोशिश करता हूं । पुरस्कारों की सूची से कोई लाभ नहीं होगा । जो मुझे पढ़ते हैं , वही मेरा पुरस्कार हैंं । मेरे लघुकथा संग्रह ‘इतनी सी बात’ का फगवाड़ा के कमला नेहरू काॅलेज की प्रिंसिपल डाॅ किरण वालिया ने ‘ऐनी कु गल्ल’ के रूप में पंजाबी में अनुवाद करवा कर प्रकाशित करवाया । इसी प्रकार मेरा कथा संग्रह ‘मां और मिट्टी’ नेपाली में अनुवाद हुआ । यह सुखद अनुभूति किसी पुरस्कार से कम नहीं । मैं एक बात महसूस करता हूं और कहता भी हूं कि मैंने कम लिखा क्योंकि सन् 1982 में मंत्र मिल गया लेकिन मुझे उससे ज्यादा सम्मान मिला । मेरी इंटरवयूज की पुस्तक : यादों की धरोहर जालंधर के आस्था प्रकाशन से आने के बिल तीन तीन संस्करण आ चुके हैं । इसमें एक पत्रकार के रूप में अच्छे , नामवर साहितयकारों , रंगकर्मियों , पत्रकारों व संस्कृति कर्मियों के इंटरव्यूज शामिल हैं जो समय समय पर ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के लिए किए गए थे । शीघ्र ही इंडियानेटबुक्स से महक से ऊपर का दूसरा संस्करण आयेगा । पत्रकारिता में भी ग्रामीण पत्रकारिता पर हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से तो साहित्यिक पत्रकारिता पर हरियाणा साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिले । रामदरश मिश्र की ये पंक्तियां बहुत प्रिय हैं :
मिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारी
मोहब्बत मिली है मगर धीरे-धीरे
जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे, ,,
इसी प्रकार अज्ञेय जी की ये पंक्तियां भी बहुत हौंसला देती हैं :
कहीं न कहीं
हरे-भरे पेड़ अवश्य ही होंगे
नहीं तो थका हारा बटोही
अपनी यात्रा जारी क्यों रखता ,,,,,
सच साहित्य ने क्या नहीं दिया ? जब मेरी बडी बेटी रश्मि रोहतक के पीजीआई में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी तब पुस्तक मेले से पुस्तकें लाकर उसके पास बैठ कर पढ़ता था । जब छोटी बेटी प्राची चंडीगढ़ के पीजीआई में तेइस दिन ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रही थी तब मैने तीन कहानियां लिखी थीं । यह साहित्य ही है जो दुख के समय मेरे काम आता रहा है । जब पिता , दादा और दादी नहीं रहे थे तब एक चौदह वर्ष के बालक को साहित्य ने सहारा दिया ।
सच अज्ञेय जी सही लिखते हैं : दुख सबको मांझता है । अमोघ शक्ति है साहित्य । साहित्यकार का सपना होता है कि कुछ लिखकर समाज को संदेश दे ।
मुंशी प्रेमचंद का मंत्र है कि साहित्यकार सुलाने के लिए नहीं , समाज को जगाने के लिए है ।
☆ – The Citizenship journey: A Memoir – ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆
Life has a way of presenting opportunities that shape not just our careers but also our inner selves. My journey with Citizen SBI was one such transformative experience. It began with my selection as faculty for the State Bank Academy, Gurgaon—a position I never assumed. Instead, I was posted as the head of the learning center at Indore, a role that coincided with my appointment as the intervention leader for the Citizen-SBI program.
Citizen SBI was more than a training program. Inspired by Swami Ranganathananda of the Ramakrishna Mission, it aimed to cultivate ‘enlightened citizenship.’ This concept transcended political citizenship—focused on rights and freedoms—and emphasized a deeper engagement with collective welfare and individual fulfillment. The program was the brainchild of our chairman, O.P. Bhatt, who envisioned its impact extending to 200,000 employees and, through them, to 140 million customers.
The foundation of this initiative was engagement—true, deep involvement in one’s work. As I immersed myself in its philosophy, I discovered the transformative power of meaningful contribution. No longer was work just a duty; it became a purpose-driven act of service. This shift in mindset was a spiritual awakening for me.
The journey began with workshops and pilots across locations, from Mumbai to Hyderabad and Gurgaon. I remember vividly my first interaction with V. Srinivas, the visionary CEO of Illumine Knowledge Resources. His conviction was palpable, though his ideas initially seemed abstract to many. Over time, through detailed workshops and apprenticeships, the abstract became tangible, and the facilitators, including myself, underwent a profound transformation.
The program’s influence extended beyond professional training. It created a rich network of facilitators, bonded by a shared purpose. The ‘facilitator gym’ sessions at the Bandra-Kurla Complex honed our skills and deepened our understanding of citizenship. These moments of camaraderie and collective learning were deeply fulfilling.
Back in Indore, I was tasked with implementing Citizen SBI in the State Bank of Indore. Initially, there was resistance—they did not yet see themselves as citizens of SBI. However, with the help of facilitators like Suresh Iyer, Harinaxi Sharma, and Arun Kalway, we gradually earned their trust. The program’s ethos resonated, bringing about a noticeable shift in their attitudes.
The essence of Citizen SBI was not about personal gain but about contributing positively to others. It wasn’t ‘swantah sukhai’—happiness for oneself—but a collective welfare-driven joy. This philosophy became my way of life, influencing not just my work but my personal ethos.
The program’s success was also a testament to the incredible people involved. Intervention leaders like Bijaya Dash, R. Natarajan, and Balachandra Bhat became cherished friends. Vasudha Sundararaman, our deputy general manager, coordinated the program with unmatched efficiency and warmth. Yashi Sinha, general manager, was an epitome of grace and wisdom. Above all, V. Srinivas, with his dedication to the cause, became a source of inspiration—a guru whose example I sought to follow in words and deeds.
As I reflect on this journey, I find myself deeply fulfilled. I have reaped not only the ‘outer fruits’ of professional growth and recognition but also the ‘inner fruits’ of spiritual evolution and the joy of contribution. My experiences as a behavioral science trainer and student of positive psychology further enriched this journey, grounding it in the principles of authentic happiness.
Citizen SBI was not merely a program; it was a movement, a way of life. It taught me that true citizenship is an internal transformation, a continuous journey of growth, contribution, and engagement. It is a journey I carry forward with pride and gratitude, knowing that it has shaped me into not just a professional but a better human being.
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आपकी साहित्यिक एवं संस्कृतिक जगत की विभूतियों के जन्मदिवस पर शोधपरक आलेख अत्यंत लोकप्रिय हैं। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है 85 वें जन्मदिवस पर आपका आलेख – न्याय के संस्कार और मीना भट्ट का सृजन।)
☆ जन्मदिवस विशेष – न्याय के संस्कार और मीना भट्ट का सृजन☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
(30 अप्रैल को जन्म दिवस पर विशेष)
जो व्यक्ति साहित्य, कला, संस्कृति से अथवा किसी भी तरह के सृजन से जुड़ जाता है उसमें न सिर्फ मानव समाज वरन समस्त जड़ – चेतन के लिए प्रेम भाव विकसित हो जाता है। आज हम बात कर रहे हैं सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम करने वाली जबलपुर की ऐसी साहित्य साधिका श्रीमती मीना भट्ट की जिन्होंने अपने सकारात्मक लेखन से सम्पूर्ण देश के साहित्य प्रेमियों के बीच अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।
छतरपुर के नौगांव में जन्मीं मीना भट्ट के पिताश्री स्व. हरिमोहन पाठक आबकारी अधिकारी रहे। माताश्री स्व. सुमित्रा पाठक धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। परिवार से प्राप्त उत्कृष्ट संस्कारों के बीच उच्च अध्ययन करने के उपरांत आपने न्यायिक सेवा प्रारंभ की। आपका विवाह भी न्याय सेवा कर रहे श्री पुरुषोत्तम भट्ट जी से हुआ। जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद से सेवा निवृत्त होने के उपरांत आप डिविजनल विजलेंस कमेटी जबलपुर की चेयर पर्सन रहीं। परिवार के धार्मिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक वातावरण और सत्यमेव जयते व तमसो मा ज्योतिर्गमय के भाव के साथ न्यायिक सेवाओं ने मीना जी का कुछ इस तरह निर्माण किया कि वे अत्याचार, अनाचार, बेईमानी, पक्षपात, असमानता, भेदभाव को देख तुरंत असहज हो उठती हैं किंतु इसके विपरीत सज्जनों, साहित्य कला संस्कृति, धर्म – अध्यात्म जैसे सकारात्मक कर्म से जुड़े लोगों के प्रति अत्यंत स्नेह व सम्मान रखती हैं।
श्रीमती मीना भट्ट की साहित्यिक यात्रा उनके प्रशासनिक और न्यायिक पदों पर रहते हुए ही हो चुकी थी। यद्यपि आपने गद्य सृजन भी किया है तथापि काव्य सृजन आपको प्रिय है। आपकी अनेक रचनाएं छंद युक्त हैं, आपने गजलें भी पूरी दक्षता से लिखी हैं। भक्ति, प्रकृति और प्रेम आपके प्रिय विषय हैं। 2016 में आपकी प्रथम पुस्तक “पंचतंत्र में नारी” प्रकाशित हुई फिर क्रमशः “पंख पसारे पंछी”, “एहसास के मोती” और “ख्याल – ए – मीना (ग़ज़ल संग्रह), “नैनिका” कुंडलिया संग्रह, “मीना के सवैया” एवं “निहारा” (गीत संग्रह) आदि प्रकाशित हुईं। इस बीच मीना जी ने अपने युवा पुत्र सिद्धार्थ भट्ट को खोने का गहन दुःख झेला जो उनकी कलम से बहता रहता है। मीना जी ने पुत्र की स्मृति को अक्षुण्य बनाने अपना उपनाम ही “सिद्धार्थ” रख लिया है। उन्होंने साहित्य कला संस्कृति के संरक्षण संवर्धन के लिए “सिद्धार्थ फाउंडेशन” नामक संस्था की स्थापना भी की है जो गति ग्रहण कर रही है। आपके छोटे पुत्र सौरभ और पुत्र वधु प्रीति सेवाभावी लोकप्रिय चिकित्सक हैं।
मीना जी ने अपना संपूर्ण जीवन अध्ययन,चिंतन – मनन, लेखन, समाज सेवा और प्रतिभाओं की खोज व उनके विकास के लिए समर्पित कर दिया है। इस पावन कार्य में उन्हें उनके पति श्री पुरुषोत्तम भट्ट का पूरा सहयोग प्राप्त होता है। आप साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में सदा उदारता पूर्वक सहयोग करते हैं। मीना जी को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों पर विद्या सागर सम्मान, विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि, गुंजन कला सदन का महिला रत्न अलंकरण व नगर और देश की अनेक संस्थाओं के सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। उनकी कलम निरंतर चलती रहे। आज श्रीमती मीना भट्ट जी के जन्म दिवस पर उनके स्नेहियों, परिचितों, प्रशंसकों की ओर से उनके स्वस्थ, सुदीर्घ, यशस्वी जीवन की अनंत शुभकामनाएं।
(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरक संस्मरणात्मक प्रसंग ‘मेल जोल बढ़ाइए, उम्र भी बढ़ जाएगी…’।)
☆ जीवन यात्रा – मेल जोल बढ़ाइए, उम्र भी बढ़ जाएगी… ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆
(वानप्रस्थ ने मनाया 92 वर्षीय वरिष्ठतम सदस्य एच पी सरदाना का जन्मदिन)
हिसार। बड़ी उम्र के लोगों से अक्सर यह सवाल किया जाता है कि उनकी सेहत का क्या राज़ है। जीवन के 93 बसंत देख चुके हरप्रकाश सरदाना का सीधा सा जवाब है कि दैनिक जिंदगी में खानपान और जीवन शैली में अनुशासन बनाए रखिए और सबसे जरूरी यह कि मेलजोल बनाए रखिए।
वरिष्ठ नागरिकों की संस्था वानप्रस्थ में उन्होंने अपना 93वां जन्मदिन मनाया। संस्था की तरफ से उन्हें एक पौधा, शाल और फूलों के गुलदस्ते देकर सम्मानित किया। उन पर फूलों की वर्षा कर सभी सदस्यों ने हैप्पी बर्थडे टू यू का गीत गाते हुए उनके अच्छे स्वास्थ्य और उनकी दीर्घायु की कामना की।
सरदाना जी ने इस अवसर पर अपने अनुभव सांझा किए। देश के विभाजन के समय वे 16 साल की उम्र में कराची से समुद्री जहाज़ के द्वारा शरणार्थियों के एक दल में गुजरात पहुंचे थे।
“सब कुछ सामान्य था। किसी को यकीन ही नहीं आ रहा था कि उन्हें अपने पुरखों के घर छोड़ कहीं और जाना पड़ेगा। फिर कुछ हिंसक घटनाएं हुई और सरकार ने सभी हिन्दू सिखों को कराची छोड़ गुजरात जाने के लिए कहा और सभी चल पड़े, अपने घरों को ताले लगा कर चाबी पड़ोसियों को देकर। उम्मीद जल्द लौटने की थी, पर यह तो स्थाई विस्थापन था।
गुजरात से आगरा आए। पिता मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस में थे । बाद में सरदाना भी एम ई एस में ही भर्ती हुए और इंडियन एयर फोर्स के कई स्टेशनों पर काम किया। उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश व दिल्ली सहित अनेक राज्यों में काम किया। दार्जिलिंग में एवरेस्ट विजेता तेनजिंग से मिले। बंगाल में कलाईकोंडा एयरफील्ड पर पाकिस्तानी हमले को देखा।
एकमात्र पुत्री सुनीता की शादी सरदाना जी ने एयरफोर्स के अपने एक मित्र के पुत्र नवीन मेहतानी से करा दी जो मैरिन इंजीनियर थे और समुद्री जहाज़ों पर ही दुनिया में घूमते रहते थे। चीफ़ इंजीनियर पद से सिंगापुर से सेवानिवृति के बाद नवीन अब भी कंसल्टेंसी कर रहे हैं । किसी दुर्घटना में फंसे समुद्री जहाज़ को बचाने या निकालने के काम में लगे रहते हैं। सुनीता और नवीन के एक बेटा मन्नन और एक बेटी तारिणी हैं जो जॉब कर रहे हैं।
पिता सरदाना की देखभाल पुत्री सुनीता मेहतानी करती हैं पर उनके जन्मदिन पर पूरा परिवार इकट्ठा होता है। वानप्रस्थ संस्था में वे लंच का इंतजाम करती हैं और संस्था के सदस्य बड़े उत्साह के साथ गीतों और गजलों से उन्हें बधाई देते हैं। वे खास सदस्यों से खास गीतों की फरमाइश भी करते हैं और खुद कोई बांग्ला या इंग्लिश भाषा का गीत सुनाते हैं।
सुनीता मेहतानी कहती हैं कि कुछ वर्ष पहले उनके पिता सरदाना जी की तबियत काफ़ी खराब रहती थी। “हर दूसरे तीसरे दिन उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता था। जबसे वे वानप्रस्थ में आए हैं, उनकी तबियत में बड़ा सुधार हुआ है। अब महीने दो महीने में डॉक्टर से मिलना होता है।”
“सरदाना जी बुधवार व शुक्रवार को वानप्रस्थ की निर्धारित बैठक के लिए 9 बजे ही तैयार होकर बैठ जाते हैं और मुझे कहते हैं कि आज जाना है, जल्दी तैयार हो जाओ।”
“किसी और दिन इनको उदास देखती हूं, तो किसी मित्र को फोन कर कहती हूं, डैडी आपको याद कर रहे हैं। आप के साथ चाय पीने के लिए आना चाहते हैं। मित्र स्वाभाविक रूप से तुरंत बुला लेते हैं और फिर चाय पर गपशप से उदासी फुर्र हो जाती है।”
प्रथम पंक्ति – वरिष्ठतम सदस्य एच पी सरदाना को सम्मानित करते वानप्रस्थ के सदस्य।
द्वितीय पंक्ति – वानप्रस्थ की गोष्ठी का दृश्य, सावन के गीत प्रस्तुत करती प्रो दीप कौर पुनिया व उनकी सखियां
वानप्रस्थ में सरदाना जी के जन्मोत्सव में प्रो दीप कौर पुनिया ने हरियाणा के सावन के लोकगीतों के मुखड़े पेशकर समा बांध दिया। प्रो पुष्पा खरब, सुनीता जैन, संतोष डांग, इंदु गहलावत व कमला सैनी ने उनका साथ दिया। सरदाना जी की फरमाइश पर दूरदर्शन के पूर्व समाचार निदेशक अजीत सिंह ने फैज़ अहमद फैज़ की मशहूर ग़ज़ल, हम देखेंगे गाकर पेश की। आलम यह था कि सभी श्रोता भी स्थायी टेक पर लगातार साथ देने लगे।
प्रो पुष्पा खरब, प्रो राज गर्ग, प्रो स्वराज कुमारी, वीना अग्रवाल, प्रो रामकुमार सैनी, करतार सिंह व एस पी चौधरी ने विभिन्न रंग के गीतों और ग़ज़लों की प्रस्तुति दी।
प्रो सुनीता श्योकंद, सुनीता मेहतानी, प्रो सुनीता जैन तथा वानप्रस्थ के जनरल सेक्रेटरी जे के डांग ने सभा का संचालन किया।
(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक अविस्मरणीय संस्मरण ‘किस्सा मित्र राजेंद्र रॉय की दुखद मृत्यु का…डायबिटीज की अनदेखी न कीजिए…’।)
☆ जीवन यात्रा – किस्सा मित्र राजेंद्र रॉय की दुखद मृत्यु का…डायबिटीज की अनदेखी न कीजिए… ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆
किस्सा मित्र राजेंद्र रॉय की दुखद मृत्यु का…
ऑल इंडिया रेडियो के पूर्व समाचार निदेशक राजेंद्र रॉय का बुधवार को गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 78 वर्ष के थे और कुछ समय से किडनी की बीमारी से पीड़ित थे।
एक हँसमुख व्यक्ति जो अपने ऊपर ही चुटकुले सुनाता था और दूसरों को खुश करता था, रॉय अपने दोस्तों के बीच बेहद लोकप्रिय थे, जिन्होंने उनके चरित्र के गुणों को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि पेश की हैं।
लेकिन राजेंद्र रॉय के कुछ दोस्तों को लगता है कि उन्होंने एक तरह से खुद ही आत्महत्या की है। रॉय इस बात पर अड़े थे कि मधुमेह और बीपी की गंभीर स्थिति के बावजूद वह एलोपैथिक दवाएं नहीं लेंगे। उनका मानना था कि एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली एक माफिया है जहां डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों ने आम लोगों को लूटा है।
वह सादा भोजन लेते थे और भ्रामरी प्राणायाम जैसे व्यायाम करते थे और दोस्तों से उनके उदाहरण का अनुसरण करने का आग्रह करते थे। वह यह दावा करने के लिए अपने लैब परीक्षण पोस्ट करते थे कि उन्होंने बिना किसी दवाई के अपनी शुगर और कोलेस्ट्रॉल को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया है। शायद उन्हें अपनी एचबी1एसी के अत्यधिक उच्च स्तर की रिपोर्ट के निहितार्थ के बारे में पता नहीं था, जिसमें उनके रक्त में शर्करा के तीन मासिक औसत स्तर को दर्शाया गया था। यह वांछित 6.0 के मुकाबले 9.7 था। दोस्तों ने उन्हें इस संबंध में सावधान किया और उन्हें अपने आहार के साथ-साथ मेटफॉर्मिन जैसी एलोपैथिक दवाएं लेने की सलाह दी। एक मित्र ने अपने डॉक्टर के हवाले से कहा कि मधुमेह रोगी की किडनी पर हर बार छोटा या बड़ा निशान बनाता है, जब शुगर सामान्य स्तर को पार करता है। रॉय को कोई परवाह नहीं थी. शायद, उन्होंने इसी की कीमत चुकाई है।
राजेंद्र रॉय कट्टर विचारों के व्यक्ति थे। वे हमेशा कहते थे कि कोविड-19 बड़ी फार्मा कंपनियों द्वारा किया गया एक बड़ा धोखा है, जो बड़ा डर पैदा करके लोगों को लूटने के लिए किया गया है। उन्होंने अपनी बात को साबित करने के लिए बार-बार खुद को गंभीर कोरोना मरीजों के बीच भर्ती होने की पेशकश की। कोई भी ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार कैसे कर सकता था।
वैसे रॉय यारों के यार थे. उन्होंने अपने सेवा सहयोगियों के हितों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक कई कानूनी लड़ाइयाँ लड़ीं। वह किसी ऐसे दोस्त की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे जिसे प्रमोशन या अन्य मुद्दों पर अन्याय महसूस होता हो।
लेकिन सेवाकाल में खुद उन्हें बहुत कष्ट भी सहना पड़ा. भारी काम के बोझ से दबे होने के कारण, उन्होंने आकाशवाणी रांची से क्षेत्रीय समाचार बुलेटिन में एक समाचार प्रसारित किया, जिसमें क्षेत्रीय समाचार इकाई में कर्मचारियों की कमी के कारण खराब स्थिति के लिए सरकार को दोषी ठहराया गया। उन्हें निलंबन का सामना करना पड़ा और बाद में पदोन्नति में रुकावट आ गई। उन्हें अपने कुछ उचित लाभों को बहाल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
कानूनी मामलों में दोस्तों की निःशुल्क मदद करना सेवानिवृत्ति जीवन में उनका पूर्णकालिक शौक बन गया।
मूल रूप से बिहार के एक सुदूर इलाके के रहने वाले रॉय 1970 में भारतीय सूचना सेवा में शामिल हुए। उन्होंने मुख्य रूप से दिल्ली, पटना, भोपाल और रांची में काम किया और 2004 में ऑल इंडिया रेडियो के समाचार सेवा प्रभाग से समाचार निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
रॉय ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीया और कोई अन्याय बर्दाश्त नहीं किया। वे हमेशा मित्रों व परिजनों की यादों में रहेंगे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
राजेंद्र रॉय की कहानी का एक निष्कर्ष यह भी है कि डायबिटीज की बीमारी की अनदेखी मत कीजिए। सदा जीवन, खान पान और प्राणायाम और वर्जिश बेहतर हैं पर दवाई भी लेते रहिए।