हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 63 ☆ परिचर्चा – व्यंग्य कोई गणित नहीं है – श्री आलोक पुराणिक ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  की  परिचर्चा – व्यंग्य कोई गणित नहीं है – श्री आलोक पुराणिक। ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 63

☆ परिचर्चा – व्यंग्य कोई गणित नहीं है – श्री आलोक पुराणिक ☆ 

देश के जाने-माने व्यंग्यकार श्री आलोक पुराणिक जी से महत्वपूर्ण बातचीत –

जय प्रकाश पाण्डेय – 

किसी भ्रष्टाचारी के भ्रष्ट तरीकों को उजागर करने व्यंग्य लिखा गया, आहत करने वाले पंंच के साथ। भ्रष्टाचारी और भ्रष्टाचारियों ने पढ़ा पर व्यंग्य पढ़कर वे सुधरे नहीं, हां थोड़े शरमाए, सकुचाए और फिर चालू हो गए तब व्यंग्य भी पढ़ना छोड़ दिया, ऐसे में मेहनत से लिखा व्यंग्य बेकार हो गया क्या ?

आलोक पुराणिक –

साहित्य, लेखन, कविता, व्यंग्य, शेर ये पढ़कर कोई भ्रष्टाचारी सदाचारी नहीं हो जाता। हां भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनाने में व्यंग्य मदद करता है। अगर कार्टून-व्यंग्य से भ्रष्टाचार खत्म हो रहा होता श्रेष्ठ कार्टूनिस्ट स्वर्गीय आर के लक्ष्मण के दशकों के रचनाकर्म का परिणाम भ्रष्टाचार की कमी के तौर पर देखने में आना चाहिए था। परसाईजी की व्यंग्य-कथा इंसपेक्टर मातादीन चांद पर के बाद पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। रचनाकार की अपनी भूमिका है, वह उसे निभानी चाहिए। रचनाकर्म से नकारात्मक के खिलाफ माहौल बनाने में मदद मिलती है। उसी परिप्रेक्ष्य में व्यंग्य को भी देखा जाना चाहिए।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

देखने में आया है कि नाई जब दाढ़ी बनाता है तो बातचीत में पंच और महापंच फेंकता चलता है पर नाई का उस्तरा बिना फिसले दाढ़ी को सफरचट्ट कर सौंदर्य ला देता है पर आज व्यंग्यकार नाई के चरित्र से सीख लेने में परहेज कर रहे हैं बनावटी पंच और नकली मसालों की खिचड़ी परस रहे हैं ऐसा क्यों हो रहा है  ?

आलोक पुराणिक –

सबके पास हजामत के अपने अंदाज हैं। आप परसाईजी को पढ़ें, तो पायेंगे कि परसाईजी को लेकर कनफ्यूजन था कि इन्हे क्या मानें, कुछ अलग ही नया रच रहे थे। पुराने जब कहते हैं कि नये व्यंग्यकार बनावटी पंचों और नकली मसालों की खिचड़ी परोस रहे हैं, तो हमेशा इस बयान के पीछे सदाशयता और ईमानदारी नहीं होती। मैं ऐसे कई वरिष्ठों को जानता हूं जो अपने झोला-उठावकों की सपाटबयानी को सहजता बताते हैं और गैर-झोला-उठावकों पर सपाटबयानी का आऱोप ठेल देते हैं। क्षमा करें, बुजुर्गों के सारे काम सही नहीं हैं। इसलिए बड़ा सवाल है कि कौन सी बात कह कौन रहा है।  अगर कोई नकली पंच दे रहा है और फिर भी उसे लगातार छपने का मौका मिल रहा है, तो फिर मानिये कि पाठक ही बेवकूफ है। पाठक का स्तर उन्नत कीजिये। बनावटी पंच, नकली मसाले बहुत सब्जेक्टिव सी बातें है। बेहतर यह होना चाहिए कि जिस व्यंग्य को मैं खराब बताऊं, उस विषय़ पर मैं अपना काम पेश करुं और फिर ये दावा ना  ठेलूं कि अगर आपको समझ नहीं आ रहा है, तो आपको सरोकार समझ नहीं आते। लेखन की असमर्थता को सरोकार के आवरण में ना छिपाया जाये, जैसे नपुंसक दावा करे कि उसने तो परिवार नियोजन को अपना लिया है। ठीक है परिवार नियोजन बहुत अच्छी बात है, पर असमर्थताओं को लफ्फाजी के कवच दिये जाते हैं, तो पाठक उसे पहचान लेते हैं। फिर पाठकों को गरियाइए कि वो तो बहुत ही घटिया हो गया। यह सिलसिला अंतहीन है। पाठक अपना लक्ष्य तलाश लेता है और वह ज्ञान चतुर्वेदी और दूसरों में फर्क कर लेता है। वह सैकड़ों उपन्यासों की भीड़ में राग दरबारी को वह स्थान दे देता है, जिसका हकदार राग दरबारी होता है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

लोग कहने लगे हैं कि आज के माहौल में पुरस्कार और सम्मान “सब धान बाईस पसेरी” बन से गए हैं, संकलन की संख्या हवा हवाई हो रही है ऐसे में किसी व्यंग्य के सशक्त पात्र को कभी-कभी पुरस्कार दिया जाना चाहिये, ऐसा आप मानते हैं हैं क्या ?

आलोक पुराणिक –

रचनात्मकता में बहुत कुछ सब्जेक्टिव होता है। व्यंग्य कोई गणित नहीं है कोई फार्मूला नहीं है। कि इतने संकलन पर इतनी सीनियरटी मान ली जायेगी। आपको यहां ऐसे मिलेंगे जो अपने लगातार खारिज होते जाने को, अपनी अपठनीयता को अपनी निधि मानते हैं। उनकी बातों का आशय़ होता कि ज्यादा पढ़ा जाना कोई क्राइटेरिया नहीं है। इस हिसाब से तो अग्रवाल स्वीट्स का हलवाई सबसे बड़ा व्यंग्यकार है जिसके व्यंग्य का कोई  भी पाठक नहीं है। कई लेखक कुछ इस तरह की बात करते हैं , इसी तरह से लिखा गया व्यंग्य, उनके हिसाब से ही लिखा गया व्यंग्य व्यंग्य है, बाकी सब कूड़ा है। ऐसा मानने का हक भी है सबको बस किसी और से ऐसा मनवाने के लिए तुल जाना सिर्फ बेवकूफी ही है। पुरस्कार किसे दिया जाये किसे नहीं, यह पुरस्कार देनेवाले तय करेंगे। किसी पुरस्कार से विरोध हो, तो खुद खड़ा कर लें कोई पुरस्कार और अपने हिसाब के व्यंग्यकार को दे दें। यह सारी बहस बहुत ही सब्जेक्टिव और अर्थहीन है एक हद।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

आप खुशमिजाज हैं, इस कारण व्यंग्य लिखते हैं या भावुक होने के कारण ?

आलोक पुराणिक –

व्यंग्यकार या कोई भी रचनाशील व्यक्ति भावुक ही होता है। बिना भावुक हुए रचनात्मकता नहीं आती। खुशमिजाजी व्यंग्य से नहीं आती, वह दूसरी वजहों से आती है। खुशमिजाजी से पैदा हुआ हास्य व्यंग्य में इस्तेमाल हो जाये, वह अलग बात है। व्यंग्य विसंगतियों की रचनात्मक पड़ताल है, इसमें हास्य हो भी सकता है नहीं भी। हास्य मिश्रित व्यंग्य को ज्यादा स्पेस मिल जाता है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

वाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर में आ रहे शब्दों की जादूगरी से ऐसा लगता है कि शब्दों पर संकट उत्पन्न हो गया है ऐसा कुछ आप भी महसूस करते हैं क्या ?

आलोक पुराणिक –

शब्दों पर संकट हमेशा से है और कभी नहीं है। तीस सालों से मैं यह बहस देख रहा हूं कि संकट है, शब्दों पर संकट है। कोई संकट नहीं है, अभिव्यक्ति के ज्यादा माध्यम हैं। ज्यादा तरीकों से अपनी बात कही जा सकती है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

हजारों व्यंग्य लिखने से भ्रष्ट नौकरशाही, नेता, दलाल, मंत्री पर कोई असर नहीं पड़ता। फेसबुक में इन दिनों” व्यंग्य की जुगलबंदी ” ने तहलका मचा रखा है इस में आ रही रचनाओं से पाठकों की संख्या में ईजाफा हो रहा है ऐसा आप भी महसूस करते हैं क्या  ?

आलोक पुराणिक –

अनूप शुक्ल ने व्यंग्य की जुगलबंदी के जरिये बढ़िया प्रयोग किये हैं। एक ही विषय पर तरह-तरह की वैरायटी वाले लेख मिल रहे हैं। एक तरह से सीखने के मौके मिल रहे हैं। एक ही विषय पर सीनियर कैसे लिखते हैं, जूनियर कैसे लिखते हैं, सब सामने रख दिया जाता है। बहुत शानदार और सार्थक प्रयोग है जुगलबंदी। इसका असर खास तौर पर उन लेखों की शक्ल में देखा जा सकता है, जो एकदम नये लेखकों-लेखिकाओं ने लिखे हैं और चौंकानेवाली रचनात्मकता का प्रदर्शन किया है उन लेखों में। यह नवाचार  इंटरनेट के युग में आसान हो गया।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

हम प्राचीन काल की अपेक्षा आज नारदजी से अधिक चतुर, ज्ञानवान, विवेकवान और साधन सम्पन्न हो गए हैं फिर भी अधिकांश व्यंग्यकार अपने व्यंग्य में नारदजी को ले आते हैं इसके पीछे क्या राजनीति है ?

आलोक पुराणिक –

नारदजी उतना नहीं आ रहे इन दिनों। नारदजी का खास स्थान भारतीय मानस में, तो उनसे जोड़कर कुछ पेश करना और पाठक तक पहुंचना आसान हो जाता है। पर अब नये पाठकों को नारद के संदर्भो का अता-पता भी नहीं है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

व्यंग्य विधा के संवर्धन एवं सृजन में फेसबुकिया व्यंगकारों की भविष्य में सार्थक भूमिका हो सकती है क्या ?

आलोक पुराणिक –

फेसबुक या असली  की बुक, काम में दम होगा, तो पहुंचेगा आगे। फेसबुक से कई रचनाकार मुख्य धारा में गये हैं। मंच है यह सबको सहज उपलब्ध। मठाधीशों के झोले उठाये बगैर आप काम पेश करें और फिर उस काम को मुख्यधारा के मीडिया में जगह मिलती है। फेसबुक का रचनाकर्म की प्रस्तुति में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #57 ☆ हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
मित्रो,
हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया के अंतर्सम्बंधों पर पिछले दिनों एक इंटरव्यू दिया था। मुद्रित रूप में पत्रिका में प्रकाशित होने पर अंक साझा करूँगा। आज इस इंटरव्यू की सॉफ्ट कॉपी आप सबके अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
☆ संजय उवाच –हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया ☆

प्रश्न – सोशल मीडिया से हिंदी साहित्य के प्रसार में कुछ बढ़ावा मिला है?

उत्तर – केवल हिंदी साहित्य ही नहीं अपितु हर भाषा और बोली के साहित्य को सोशल मीडिया से लाभ हुआ है। इससे पहले अपने सृजन को लोगों तक पहुँचाने के पारम्परिक माध्यम सीमित थे। अभिव्यक्ति के लिए पत्र-पत्रिकाओं, सरकारी प्रसार माध्यमों और सार्वजनिक मंचों तक सीमित रहना पड़ता था। यहाँ तक पहुँचना प्रत्येक के लिए संभव भी नहीं था। सोशल मीडिया एक ऐसे मंच के रूप में उभरा जहाँ हर कोई अपने मन की बात कह सकता है।

प्रश्न – सोशल मीडिया पर प्रसारित होनेवाले हिंदी साहित्य का दर्जे के बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तर- जहाँ तक बात स्तर की है, मैं इसे कुछ हद तक सापेक्ष या रिलेटिव टर्म कहूँगा। संभव है कि किसी पत्र या पत्रिका की एक विशिष्ट सोच या विचारधारा अथवा व्यावसायिक हितों के चलते एक ही तरह का साहित्य प्रकाशित करने की प्रवृत्ति हो। ऐसे में दूसरी धारा का साहित्य उस पत्रिका में स्थान नहीं पाएगा। क्या इसका अर्थ यह है होगा कि दूसरी धारा के साहित्य का कोई स्तर नहीं है? स्थूल तौर पर इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि सोशल मीडिया एक ऐसा मंच है जो नवोदितों से लेकर लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकारों तक सबके लिए खुला है। हाँ यह अवश्य है कि स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता नहीं होना चाहिए। अश्लील और वीभत्स लेखन से बचा जाना चाहिए। यूँ देखा जाए तो इस श्रेणी का लेखन समाज के हित में न होने के कारण साहित्य ही नहीं है। अश्लील लेखन पर  नियंत्रण रखने का दायित्व सम्बंधित व्यक्ति के साथ-साथ सोशल मीडिया पर उससे जुड़े उसके मित्रों का भी है।

प्रश्न – लिखने वालों को लिए क्या यह एक बड़ा व्यासपीठ उपलब्ध हुआ है?

उत्तर- लिखने वालों के लिए सोशल मीडिया  एक बहुत बड़ा मंच है। लेखक होने के नाते मैं इस बात को बेहतर समझ सकता हूँ कि अनुभूति का लिखित या टंकित शब्दों  में अभिव्यक्त होना रचनाकर्म का एक भाग है। दूसरा भाग है, रचनाकार की अपनी रचना को पाठकों के साथ साझा करने की इच्छा। इसके बाद पाठक की प्रतिक्रिया आती है।  पारम्परिक पद्धति में लम्बा समय लेनेवाली यह प्रक्रिया अब एक क्लिक के द्वारा हो जाती है। यह बहुत बड़ा सकारात्मक और क्रांतिकारी परिवर्तन है।

प्रश्न – क्या कुछ ख़ामियाँ भी आपको नज़र आती हैं?

उत्तर- जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप शत-प्रतिशत सही कह सकें। फिर सही, गलत भी सापेक्ष होता है और अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार परिभाषित होता है। सर्वसामान्य रूप से देखने का प्रयास करें तो सोशल मीडिया की अपनी ख़ामियाँ निश्चित तौर पर हैं। बहुत बार जल्दी से अभिव्यक्त करने की कोशिश में अपरिपक्व, बेहद अपरिपक्व साहित्य आ जाता है। इसे मैं ‘इमैच्योर बेबी’ कहूँगा। दूसरी बड़ी ख़ामी प्रत्यक्ष नियंत्रण की अपनी सीमाओं के कारण साहित्य के नाम पर अश्लील और विकृत लेखन परोस देने की वृत्ति भी है। कुछ अन्य ख़ामियाँ भी हैं।

प्रश्न- सोशल मीडिया और साहित्य विषयक गंभीरता इस पर आपकी क्या राय है?

उत्तर- आज अनेक नए स्तरीय रचनाकार जो चर्चा में हैं, वे सोशल मीडिया की देन हैं। बदले दौर में गंभीर साहित्य को मुख्यधारा तक पहुँचाने और युवतर पाठकों को मुख्यधारा तक लाने का का श्रेय सोशल मीडिया को ही है। जिन पुस्तकों को ढूँढ़ने में महीनों बीत जाते थे,  आज ऐसे अनेक प्लेटफॉर्म है जिन पर वे पुस्तकें यूनिकोड या पीडीएफ फॉर्मेट में सहज उपलब्ध हैं। वेद, उपनिषद से लेकर इस क्षण रचा गया साहित्य, सभी कुछ उपलब्ध है इस महाकुम्भ में। संत कबीर ने लिखा है, ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।’ पाठक को तय करना है कि उसे क्या चाहिए और कितनी गहरी डुबकी लगानी है।

प्रश्न-  सोशल मीडिया पर प्रसारित होनेवाले हिंदी साहित्य में व्याकरण एवं शुद्धलेखन की स्थिति कैसी है?

उत्तर- मेरे पास अनेक पुस्तकें भूमिका या अभिमत लिखने के लिए आती हैं। स्वयं भी प्रकाशन के व्यवसाय से जुड़ा हूँ। जहाँ तक बात व्याकरण और वर्तनी की त्रुटियों की है तो सोशल मीडिया नहीं था, क्या तब व्याकरण और वर्तनी की त्रुटियाँ नहीं थीं? इन त्रुटियों का सोशल मीडिया से क्या संबंध? यह तो संबंधित व्यक्ति के भाषाई ज्ञान पर निर्भर करता है। मेरे पास आने वाली पुस्तकों के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि अधिकांश पांडुलिपियों में वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ होती हैं। पाठशाला या महाविद्यालय के स्तर पर देवनागरी को दुय्यम रखने और जिज्ञासु की अनास्था, दोनों का समवेत दुष्परिणाम है यह। इसे सोशल मीडिया के मत्थे मढ़ना तर्कसंगत नहीं। यदि इसका दूसरा पहलू देखें तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर ऑटो स्पेलचेक की सुविधा शुद्ध वर्तनी के प्रयोग का अवसर उपलब्ध कराती है।

एक बात और, सोशल मीडिया साधन है साध्य नहीं। दूसरे, इसका प्रयोग करने की किसी पर बाध्यता नहीं है। सोशल मीडिया की महत्ता को समझने के लिए एक प्रयोग करें। कल्पना करें कि सोशल मीडिया का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया है। अब आप फिर से कागज पर लिखें। फिर से कुछ चुनिंदा पत्र-पत्रिकाओं को भेजें। फिर से सरकारी प्रसार माध्यमों के चक्कर लगाएँ। क्या आप यह सब करने के लिए तैयार हैं? 130 करोड़ के देश में कितने लोगों को मंच उपलब्ध होगा? कितनी प्रतिभाएँ दम तोड़ जाएँगी?

गरदन, एक सीमा तक ही पीछे घुमाई जा सकती है। ईश्वर ने मनुष्य को आँखें आगे देखने के लिए दी हैं। संकेत स्पष्ट है, अतीत के मुकाबले भविष्य की ओर देखा जाए। आज सोशल मीडिया, साहित्यकारों और सृजनशील लोगों के लिए घर बैठे एक क्लिक पर उपलब्ध अभिव्यक्ति का अद्भुत प्लेटफार्म है। आनेवाला समय, इससे अधिक गतिशील और अधिक उपयोगी प्लेटफार्म का होगा। स्मरण रहे कि परिवर्तन एकमात्र नियम है जो कभी परिवर्तित नहीं होता। परिवर्तन के साथ चलें, समय के साथ चलें।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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