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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 4 – ☆ मन – कवयित्री बहिणाबाई चौधरी ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस   (सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “मन – कवयित्री बहिणाबाई चौधरी” । इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.)   ☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 4 ☆   ☆ मन – कवयित्री बहिणाबाई चौधरी ☆    मनोव्यापार....माणसाचं मन हा अतिशय गूढ, गहन,  अनाकलनीय आणि तितकाच गुंतागुंतीचा विषय आहे. बहुरूपी, बहुढंगी मनाचे विभ्रम तर बघा जरा, घरी असलो तर बाहेर मोकाट, बाहेर असलो तर घरी सुसाट, देवासमोर श्लोक म्हणतांना देखील आजूबाजूच्या हालचाली टिपण्याचं त्याचं कसब विलक्षण ! कितीही रंजक पुस्तक हातात असू दे खिडकीतून दिसणा-या झाडाच्या फांद्या न्याहाळण्यात ते दंग ! परीक्षा संपण्याधीच त्याचे सुट्टीतले मनसुबे तयार. अप्रिय विषयाला पूर्णविराम न देता त्याचा चघळचोथा करण्यात आनंद मानावा तो त्यानेच ! एखाद्याबद्दलचा आकस, पूर्वग्रह गोंजारत त्याला अढळपद देण्याची दिलदारी दाखवावी ती देखील त्यानेच ! पा-यालाही मागे टाकणारी त्याची चंचलता, वा-यालाही लाजवेल असा त्याचा वेगवान मुक्त संचार, प्रसंगी खुपणारा त्याचा...
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मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प अठरावे # 18 ☆ प्रेमा तुझा रंग कसा? ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते   (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज श्री विजय जी  का आलेख है  “प्रेमा तुझा रंग कसा?”। ऐसे ही  गंभीर विषयों पर आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प अठरावे # 18 ☆   ☆ प्रेमा तुझा रंग कसा? ☆   या विषयावर विचार प्रकट करताना, आठवतात ओळी, 'पाण्या तुझा रंग कसा? ' एखाद्या व्यक्तीवर जीव जडतो. त्याचं शारीरिक, मानसिक, वैचारिक सौंदर्य मनाला भुरळ घालत.  अशा व्यक्तीच्या सहवासात मन रमत.  आणि...
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मराठी साहित्य – नवरात्र विशेष लेख – ☆ नवरात्र महोत्सव. . .  एक सृजन ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

नवरात्र विशेष लेख कविराज विजय यशवंत सातपुते   (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। नवरात्र के अवसर पर प्रस्तुत है उनका मराठी आलेख - नवरात्र महोत्सव. . .  एक सृजन)   ☆ नवरात्र विशेष लेख – नवरात्र महोत्सव. . .  एक सृजन ☆   आज नवरात्र महोत्सवाचे निमित्ताने  एक सुंदर विषय चर्चेत  आला आहे.  आपण  सर्वजण  या  बदलत्या  काळाचे प्रतिनिधीत्व करतो  आहोत.  केवळ  उलट सुलट विचार,  विधाने करून आपण  श्रद्धा आणि अंधश्रद्धा यांच्यातील तफावत वाढवीत  आहोत. *नवरात्रीचे धार्मिक महत्त्व समजून घेताना आपण स्वतः धार्मिक आहोत का? याचा विचार करण्याची गरज निर्माण झाली आहे*. हिंदू धर्माव्यतिरिक्त अन्य कोणत्याही धर्मात सण,  उत्सव, परंपरा यांची टिंगल,  टिका केली जात नाही.  आज केवळ आपले नाव चर्चेत यावे म्हणून  धार्मिक कर्मकांडावर टिका करणारे...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #22 – ☆ मनोरंजन ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते   (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी मनोरंजन…. सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  मनोरंजन के कई साधन हैं जैसे सिनेमा, नाटक, संगीत, नृत्य, बागवानी, समाजसेवा, टी वी देखना, शिक्षा का प्रचार करना, व्यंजन बनाना, पठन-पाठन, साहित्य निर्माण, लेखन, वाचन, मनन, भजन, कीर्तन,  योगा, गपशप, पर्वतारोहण आदि. सुश्री आरुशी जी का विमर्श अत्यंत सहज है.  प्रत्येक व्यक्ति के मनोरंजन का तरीका अपना और विविध होता है. सार यह है कि मनोरंजन वही होना चाहिए जिससे मन को शान्ति मिले और हमें अपने दैनंदिन कार्यों के लिए ऊर्जा मिले. शायद छुट्टियां भी तो इसीलिए दी जाती हैं. सुश्रीआरुशी जी के संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़ ...
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मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प सतरावे # 17 ☆ जीवनांतील गुरूचे स्थान ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते   (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज श्री विजय जी ने  “जीवनांतील गुरूचे स्थान” चुना है।  श्री विजय जी ने  इस आलेख  के माध्यम से जीवन में गुरु के स्थान पर चर्चा की है.  जीवन में हम अपने प्रथम गुरु माता-पिता से ज्ञान प्राप्त करते हैं  फिर जीवन पर्यन्त हम सब से कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करते ही हैं. ऐसे ही  गंभीर विषयों पर आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )   ☆ साप्ताहिक...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 2 – ☆ लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले – स्व सुधीर मोघे ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस   (सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले – स्व सुधीर मोघे ” । इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.)   ☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # २ ☆   ☆ लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले – स्व सुधीर मोघे ☆    कवितेची दालनं पार करत असतांना, अचानक सुधीर मोघेंची ही सुंदर रचना नजरेस पडली. तिच्या शब्दांनी मनाची पकड घेतली, नव्हे मनाचा तळच गाठला, आरपार सारं ढवळून निघालं आणि स्वत:चाच स्वत:शी मूक संवाद सुरू झाला.   *लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले*   लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले ओंजळी पसरावया पण हात नसती मोकळे   स्वच्छंद वाटा धावत्या,डोळे दिवाणे शोधती रेशमी तंतूत पण हे पाय पुरते  गुंतले   सागराच्या मत्त लाटा साद दुरूनी घालती ओढतो जिवास वेड्या जीवघेणा तो ध्वनी   शीड भरल्या गलबतातून शीळ वारा घुमवितो तीच वाटे येतसे जणू हाक अज्ञातातूनी   सांग ओलांडू कसा पण हा वितीचा उंबरा झेप घेण्याला...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #21 – ☆ मैत्री… स्वतःची स्वतःशीच… ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते   (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी मैत्री... स्वतःची स्वतःशीच....  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  मित्रता स्वयं की स्वयं सेसुश्री आरुशी जी का विमर्श अत्यंत सहज किन्तु गंभीर है.  सुश्रीआरुशी जी के  संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।)    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #21 ☆   ☆ मैत्री... स्वतःची स्वतःशीच...☆   मैत्री... स्वतःची स्वतःशीच... हम्म, पचायला थोडं जड आहे पण अतिशय आवश्यक... ही मैत्री साधायचा प्रयत्न चालू आहे... गेल्या काही महिन्यात घडलेल्या घडामोडी ह्या मैत्रीला कारणीभूत आहेत... नक्कीच... वेळ प्रसंगी कुटुंबीय, ऑफिस कलीग, अनेक मित्र मैत्रिणी सपोर्ट करायला असतात... पण आडात नसेल तर पोहऱ्यात कुठून येणार... असो... आपण हल्ली खूप busy असतो, नाही का?? आधी शिक्षण, नोकरी, मग छोकरी, मग...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 7 ☆ डोंगर दऱ्या ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी  भावप्रवण कविता  डोंगर दऱ्या.  श्रीमती उर्मिला जी  के द्वारा ग्राम्य परिवेश का शब्द चित्र अत्यंत मोहक है  एवं  नेत्रों के सम्मुख  एक सुन्दर ग्राम का सम्पूर्ण  दृश्य परिलक्षित होता है. श्रीमती उर्मिला जी  को ऐसी सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई. )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 7 ☆   ☆ डोंगर दऱ्या ☆   माझ्या म्हायेरास्न आईनं सांगावा धाडला! सुटीत पोरास्नी घिऊन ये की, महाडला !   आठव आली मला माज्या देखन्या गावाची ! लगबगीनं तयारी केली मी आईकडं जान्याची ! आई म्हनं वाट वळनावळनाची  लागती तुला गाडी ! रित्यापोटी नग निगूस ,खा आवळ्याची वडी !!   निसर्गातल्या कुशीतलं देखनं माज गाव ! हायती धा बारा...
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मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प सोळावे # 16 ☆ वेड सेल्फीचे ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते   (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज श्री विजय जी ने एक गंभीर विषय “सेल्फी” चुना है।  श्री विजय जी ने  इस आलेख  “वेड सेल्फीचे ” में सेल्फी के कारण होने वाली मृत्यु जैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा की है।  ऐसे ही  गंभीर विषयों पर आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प सोळावे # 16 ☆   ☆ वेड सेल्फीचे ☆   बाह्य रूप छायांकन सुंदरता चित्रांकन भारवाही.... !   छबी काढण्यात सान थोर मोहावले झणी वेडावले सेल्फीपायी.... ! या...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 1 – ☆ तरिही वसंत फुलतो – स्व सुधीर मोघे ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस   (सुश्री ज्योति  हसबनीस जी  का  ई-अभिव्यक्ति  में पुनः स्वागत है. सुश्री ज्योति जी ने ई-अभिव्यक्ति में  मराठी साहित्य की नींव डाली है, एवं  एक नई ऊंचाइयों  पर पहुँचाया है . उनके योगदान को कभी भी नहीं भुलाया जा सकता. हम उनके ह्रदय से आभारी हैं , जो उन्होंने  "साप्ताहिक स्तम्भ - काव्य दिंडी " के हमारे आग्रह को स्वीकार  किया है. इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “तरिही वसंत फुलतो  - स्व सुधीर मोघे ” । इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.)   ☆साप्ताहिक स्तम्भ - काव्य दिंडी # १ ☆   ☆ तरिही वसंत फुलतो  - स्व सुधीर मोघे ☆    आज आपल्यात सामिल होतायत अष्टपैलू व्यक्तिमत्व लाभलेले सुधीर मोघे आपल्या *तरिही वसंत फुलतो*ह्या अर्थपूर्ण क वितेला घेऊन. किर्लोस्करवाडीत जन्मलेला, पुण्यात स्थिरावलेला आणि आपल्या कवितासखीला सोबत घेऊन कवी, लेखक, गीतकार, संगीतकार, निवेदक, चित्रकार,लघुपट निर्माता, दिग्दर्शक अशा...
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