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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #31 – ☆ Generation Gap ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी  'Generation Gap'.  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  सुश्री आरुशी जी का आज का आलेख दो  पीढ़ियों के बीच मानसिक द्वंद्व का पर्याय ही तो है।  यह आलेख पढ़ कर हमें अपनी पिछली पीढ़ी का यह वाक्य  कि "हमारे  जमाने में तो ..." अनायास ही  याद आ जाता है और हम अगली पीढ़ी को भी अपने अनुभव ऐसे ही उदाहरण देकर थोपने की कोशिश करते हैं। यह पीढ़ियों से चला आ रहा है। हम भूल जाते हैं कि हमारे समय मैं वह कुछ नहीं था जो आज की पीढ़ी को मिल रहा है चाहे वह रहन सहन से सम्बंधित हो, रुपये का अवमूल्यन हो या लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ' मीडिया'  का...
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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – ☆ बाबासाहेबांचे महापरिनिर्वाण आणि हृदयात वाहत असलेली दुःखाश्रूची धार ☆ – श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे    (युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हम भविष्य में श्री कपिल जी की और उत्कृष्ट रचनाओं को आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे. आज प्रस्तुत है  उनका  स्वर्गीय डॉ बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर  अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता हुआ विशेष आलेख  "बाबासाहेबांचे महापरिनिर्वाण आणि हृदयात वाहत असलेली दुःखाश्रूची धार"।  )   ☆ बाबासाहेबांचे महापरिनिर्वाण आणि हृदयात वाहत असलेली दुःखाश्रूची धार ☆   साल 1956. डिसेंबर महिन्याचा सहावा दिवस. अन् हृदयत धडकी भरवणारी, उभ्या भारताच्या काळजाचा ठोका चूकवणारी बातमी सुर्य प्रकाशाच्याही अती वेगाने भारतासह जगात पसरते. समतेची, ज्ञानाची आणि न्यायाची ज्योत पेटवून ती अखंडपणे तेवत ठेवण्याची जबाबदारी प्रत्येक भारतीयांवर सोपवून ज्ञानाच्या प्रखर तेजाने तडपणारा क्रांतीचा सुर्य, प्रत्येक भारतीय जनमानसाच्या डोळ्यांचे तेज असणारा एक प्रखर तेजोमेघ...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #30 – ☆ प्रिय तनु ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी  प्रिय तनु   सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  सुश्री आरुशी जी का आज का आलेख, एक पत्र स्वरुप आलेख  है जिसका पात्र तनु है।  यह पात्र इतना भावप्रवण  एवं आत्मीय है कि आप इसे पूरा पढ़ कर आत्मसात करने से नहीं रोक पाते। सुश्री आरूशी  जी  का यह कथन ही काफी है  “first impression is best impression”  पात्र तनु को अपने ह्रदय के उद्गारों से अवगत करने के लिए। सुश्रीआरुशी जी के संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #30 ☆ ☆ प्रिय तनु ☆   प्रिय तनु, विषयलाच हात घालते... आज चक्क...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 15 ☆ श्रीमंती ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनका  एक भावप्रवण  आलेख  श्रीमंती। ) ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 15 ☆ ☆ श्रीमंती ☆ घराबाहेर पडले अन् चालायला सुरुवात केली तेवढ्यात ' आवं ताई..! आवाजाच्या दिशेनं पाहिलं तर रस्त्याकडेला कधीमधी बसणारी वयस्कर बाई मला बोलावीत होती.मी म्हटलं, कां हो..? तशी ती जरा संकोचल्यासारखी झाली न् म्हणाली.."ताई तुमच्या अंगावरलं लुगडं लयी झ्याक दिसतया बगा.!" मी हसून पुढं चालायला लागले तशी ती पट्कन म्हणाली मला द्याल कां वं ह्ये लुगडं..?अक्षी म ऊशार  सूत हाय असलं मला कुनीबी देत न्हाई वं ! हे थंडीच्या दिसांत लयी छान..! आन् आमाला ही असली देत्यात असं म्हणून तिनं अंगावरची सिंथेटिक साडी दाखवली. मी थोडी विचारात...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 9 ☆ दारा बांधता तोरण – कवयित्री इंदिरा संत ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस   (सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “दारा बांधता तोरण – कवयित्री इंदिरा संत”.  यह आलेख साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित सुप्रसिद्ध मराठी कवयित्री इंदिरा संत जी  की रचनाओं पर आधारित है ।  थे। इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.) ☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 9 ☆ ☆ दारा बांधता तोरण – कवयित्री इंदिरा संत☆  विसाव्या शतकातील एक नावारूपाला आलेली, राजमान्यता पावलेली कवयित्री म्हणून ‘इंदिरा संत’ ओळखल्या जातात. ४ जानेवारी १९१४ साली जन्मलेल्या ह्या थोर कवयित्रीने आपल्या संवेदनशील आणि सहजसुंदर लिखाणाने रसिकवाचनांवर मोहिनी तर घातलीच पण आपल्या आशयघन कविता , ललितगद्य लेखनाने मराठी साहित्यविश्व देखील अधिकच समृद्ध केले . ‘कविता हा माझ्या लेखनाचा आणि जगण्याचा गाभा आहे’ असे त्या स्वत:बद्दल म्हणत. ‘शेला’ ’मेंदी’ ’रंगबावरी’ह्या कवितासंग्रहांना राज्य शासनाचा पुरस्कार मिळाला तर त्यांच्या ‘गर्भरेशीम’ ह्या कविता संग्रहाला साहित्य अकादमीच्या पुरस्काराने गौरविले गेले . आज ह्या कवयित्रीची अतिशय गोड कविता घेऊन मी...
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मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प बावीस # 22 ☆ साहित्य संवर्धनात मोबाईलचे योगदान ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते   (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज प्रस्तुत है श्री विजय जी की एक भावप्रवण कविता  “सागर सरीता मिलन – क्षण मिलनाचे ”।  आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प बावीस # 22 ☆ ☆ साहित्य संवर्धनात मोबाईलचे योगदान ☆   सद्य परिस्थितीत माणूस माणसापासून मनाने दुरावत चालला आहे. त्याला  औपचारिक रित्या जोडून ठेवण्याचे महत्वाचे कार्य मोबाईल करतो आहे.  जे प्रत्यक्ष भेटीत बोलता येत नाही ते काम सामंजस्यानं ज्ञानवर्धक ससंदेशवहनातून मोबाईल...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 8– ☆ निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे – कवयित्री इंदिरा संत ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस   (सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे - कवयित्री इंदिरा संत”.  यह आलेख साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित सुप्रसिद्ध मराठी कवयित्री इंदिरा संत जी  की रचनाओं पर आधारित है ।  थे। इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.) ☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 8 ☆ ☆ निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे - कवयित्री इंदिरा संत☆  विसाव्या शतकातील एक नावारूपाला आलेली, राजमान्यता पावलेली कवयित्री म्हणून ‘इंदिरा संत’ ओळखल्या जातात. ४ जानेवारी १९१४ साली जन्मलेल्या ह्या थोर कवयित्रीने आपल्या संवेदनशील आणि सहजसुंदर लिखाणाने रसिकवाचनांवर मोहिनी तर घातलीच पण आपल्या आशयघन कविता, ललितगद्य लेखनाने मराठी साहित्यविश्व देखील अधिकच समृद्ध केले. ‘कविता हा माझ्या लेखनाचा आणि जगण्याचा गाभा आहे’ असे त्या स्वत:बद्दल म्हणत. ‘शेला’ ’मेंदी’ ’रंगबावरी’ह्या कवितासंग्रहांना राज्य शासनाचा पुरस्कार मिळाला तर त्यांच्या ‘गर्भरेशीम’ ह्या कविता संग्रहाला साहित्य अकादमीच्या पुरस्काराने गौरविले गेले. आज ह्या कवयित्रीची अतिशय गोड कविता घेऊन...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #28 – ☆ शिक्षण ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी  शिक्षण.  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  आज का तथ्य शिक्षण!  यह सत्य है कि जन्म के प्रारम्भ से ही हम शिक्षा पाने लगते हैं। शुरुआत तो घर से ही होती है न ।  माँ पिता तो प्रथम कड़ी है फिर सम्पूर्ण जीवन हम सीखते ही रहते हैं कभी शिक्षक से तो कभी आस पास से और अंत में  हमें हमारा अनुभव ही जीना सीखा देता है। सुश्री आरूशी  जी ने बड़े ही सहज शब्दों में शिक्षण की व्याख्या की है। सुश्रीआरुशी जी के संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #28...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 14 ☆ चिंधी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनका  एक भावप्रवण  आलेख  चिंधी  जिसमें उन्होंने  "कपडे के टुकड़ों " का महत्व एवं  उसका धार्मिक, पौराणिक एवं सामाजिक जीवन में योगदान पर विस्तृत चर्चा की है। उन्होंने महाभारत काल में द्रौपदी के चीरहरण, साईँ बाबा के वस्त्र और ग्रामीण महिलाओं द्वारा चिन्दी से गुदड़ी  सिलने के व्यवसाय तक  की चर्चा की है। इस आलेख को पढ़ते वक्त हमें हिंदी की कहावत "गुदड़ी  के लाल" सहज ही याद आ जाती है। )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 14 ☆   ☆ चिंधी ☆ "भरजरी गं पितांबर दिला.... फाडून..! द्रौपदीसी बंधू शोभे नारायण..!! " आचार्य अत्रे दिग्दर्शित 'श्यामची आई '...
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मराठी साहित्य – ☆ वीडियो प्रस्तुति – घर – वास्तू…आणि ती…  ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते   ( महाराष्ट्र  प्रदेश  की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपरा  का  सम्पूर्ण राष्ट्र में अपना एक विशिष्ट स्थान है।  यहां  दीपावली अंकों के प्रकाशन की परंपरा रही है।  प्रदेश के मराठी साहित्यकार दीपावली अंकों में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं। समय के साथ  दीपावली अंकों के प्रकाशन की परंपरा में डिजिटल मीडिया ने क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है।  ऐसे में यदि कोई सेलिब्रिटी  यदि आपकी रचना पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया दे तो आप कैसा अनुभव करेंगे।  निश्चित ही आपका मन मयूर प्रसन्नता से झूम उठेगा। कुछ ऐसा ही  अनुभव सुश्री आरूशी दाते जी  को हुआ जब  सुप्रसिद्ध मराठी गीतकार और ग़ज़लकार श्री वैभव जोशी  जी ने उनकी वीडियो अभिव्यक्ति "घर  - वास्तू... आणि ती... "पर अपनी प्रतिक्रिया दी।  हम उनकी उस प्रसन्नता के क्षण  को ही नहीं अपितु  उनके उस वीडियो लिंक को भी आपसे साझा कर रहे हैं जिसमे उनकी अभिव्यक्ति ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया है और निश्चित ही आप भी  कह उठेंगे  वाह ! ) ☆ घर...
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