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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 40 – पत्रलेखन – आये, काळजीत नगं काळजात रहा ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम (श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है  उनके द्वारा शहर में आये एक युवक द्वारा अपनी माँ को  लिखा गया अत्यंत भावुक एवं मार्मिक पत्र  “आये, काळजीत नगं काळजात रहा”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। )  ☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #40 ☆  ☆ पत्रलेखन - 'आये, काळजीत नगं काळजात रहा.' ☆  (कोरोनाच्या संकटामुळे भयभीत झालेल्या  गावाकडील आईस ,  शहरात कामधंद्यासाठी आलेल्या  एका तरूणाने पत्रलेखनातून दिलेला हा बोलका दिलासा जरूर वाचा.) पत्रलेखन 'आये, काळजीत नगं काळजात रहा.' आये. . पत्र लिवतोय तुला. . .  जरा  निवांत बसून...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 43 – समारोप ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक अविस्मरणीय संस्मरण  “समारोप “। वास्तव में जीवन के कुछ अविस्मरणीय क्षण होते हैं जिन्हें हम आजीवन विस्मृत नहीं कर सकते । वे क्षण कुछ भी हो सकते हैं  किन्तु,  हाईस्कूल से कॉलेज में पदार्पण के पूर्व हाईस्कूल का फेयरवेल जिसमें लड़कियां साड़ियां और लडके फॉर्मल्स में  सम्मिलित होते हैं, बेहद रोमांचक क्षण होते हैं। उस समय की मित्रता और  भविष्य के स्वप्न संजोते ह्रदय का स्मरण कर या मित्रों में साझा कर एक रोमांच का अनुभव होता है और लगता है  कि  काश वे दिन एक बार पुनः लौट आते जो कि असंभव हैं।  सुश्री प्रभा जी ने उन क्षणों को अपने इस संस्मरण से सजीव कर दिया है। इस भावप्रवण अप्रतिम  सजीव संस्मरण  साझा करने के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन ।   मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को...
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मराठी साहित्य – आलेख ☆ कोरोना व्हायरसमुळे देशभरात होणारे स्थलांतर,त्याचा वाढता धोका आणि आपली जबाबदारी☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक समसामयिक विषय पर  एक शिक्षाप्रद आलेख  “कोरोना व्हायरसमुळे देशभरात होणारे स्थलांतर,त्याचा वाढता धोका आणि आपली जबाबदारी“।) ☆ कोरोना व्हायरसमुळे देशभरात होणारे स्थलांतर,त्याचा वाढता धोका आणि आपली जबाबदारी ☆ संवाद एक विचार अनेक चर्चा सत्र  कोरोना विषाणू जागतिक संकटातून बचावात्मक प्रतिबंधक उपाय म्हणून हा लाॅकडाऊन याची गांभीर्याने  सर्व प्रथम दखल घ्यायला हवी.  दारिद्र्य रेषेखालील लोकांना  उपासमारी,  बेरोजगारी सहन करावी लागत आहे पण महापालिका प्रशासनाने पुरेशी खबरदारी घेतली आहे.  सध्या स्थलांतर करण्यापेक्षा आहे त्या निवा-यात सुरक्षित राहून कोरोना प्रतिबंधकात्मक उपाय करणे अत्यंत आवश्यक आहे. जसे वारंवार हात धुणे. घरात स्वच्छता ठेवणे. टाॅयलेट बाथरूम स्वच्छ...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 28 ☆ बुकीची सून ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है उनके स्वानुभव  एवं  संबंधों  पर आधारित  संस्मरणात्मक कथा  “बुकीची सून ”। उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। ) ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 28 ☆ ☆ बुकीची सून ☆  (विषय   :- व्यक्तिरेखा ) दिवाळीची सुट्टी सुरू झाली होती त्यामुळे मोठी मुलगी व तिच्या मुली आल्या होत्या.सकाळच्या वेळी मी अंगण झाडत होते माझ्या दोन्ही नाती अश्विनी अक्षया माझ्या मागेपुढे करत होत्या.त्या शहरात रहात असल्याने त्यांना मोठ्ठ अंगण म्हणजे अगदी अप्रूप वाटायचं. दसरा नवरात्रीची धामधूम संपली की आमच्या दारावर...
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मराठी साहित्य – आलेख ☆ उतारवयातील लग्न… ☆ सौ .योगिता किरण पाखले

सौ .योगिता किरण पाखले (आदरणीया सौ .योगिता किरण पाखले जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की  सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी रचनाएँ स्तरीय पत्र पत्रिकाओं / चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित हुई हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  जीवन के संध्याकाळ में विवाह पर एक विचारोत्तेजक आलेख    उतारवयातील लग्न... ।  आपने इस आलेख में  उपरोक्त विषय पर जीवन के संध्याकाळ में होने वाले विवाह का भरे पूरे परिवार पर प्रभाव साथ ही यदि वृद्ध युगल में कोई एक शेष रहता है अथवा वृद्धाश्रम में रहता है तो जीवन पर प्रभाव पर विस्तृत विमर्श किया है।  हम भविष्य में आपकी और चुनिन्दा रचनाओं को प्रकाशित करने की अपेक्षा करते हैं।)     ☆ उतारवयातील लग्न... ☆ काही दिवसांपूर्वी व्हाट्स अप वर एका लेखकाचा प्रेमाविषयीचा लेख वाचला. प्रेमाचे अनेक टप्पे ज्यात त्यांनी मांडले होते. प्रत्येक वयात होणाऱ्या प्रेमाचे स्वरूप ,त्याची कारणं आणि गरज सुद्धा वेगवेगळी असते. मग ते प्रेम किशोर वयातील प्रेमापासून  ते वृद्धत्वा पर्यंत नव्हे तर  शेवटच्या श्वासापर्यंतचे असो.... प्रेमाला वयाचं बंधन कुठे? होय ना...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 39 – त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनके चौदह वर्ष की आयु से प्रारम्भ साहित्यिक यात्रा के दौरान उनके साहित्य  के   'वाङमय चौर्य'  के  कटु अनुभव पर आधारित एक विचारणीय आलेख “त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ………”.  सुश्री प्रभा जी  का यह आलेख इसलिए भी विचारणीय है, क्योंकि  हमारी समवयस्क पीढ़ी को साहित्यिक चोरी का पता काफी देर से चलता था जबकि सोशल मीडिया के इस जमाने में चोरी बड़ी आसानी से और जल्दी ही पकड़ ली जाती है। किन्तु, शब्दों और विचारों के हेर फेर के बाद  'वाङमय चौर्य'  के  अनुभव को आप क्या कहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को अपने तरीके से जीता है।  जैसे वह जीता है , वैसा ही उसका अनुभव होता है।  इस अतिसुन्दर  एवं विचारणीय आलेख के लिए  वे बधाई की पात्र हैं। उनकी लेखनी को सादर नमन ।   मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे....
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मराठी साहित्य ☆ कुसुमाग्रज – जन्म दिवस विशेष – मी मराठी बोलतेय… ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज - जन्म दिवस विशेष कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आज प्रस्तुत है  स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज - जन्म दिवस पर विशेष  आलेख  "मी मराठी बोलतेय...")  ☆ स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज - जन्म दिवस विशेष –  मी मराठी बोलतेय...☆   "होय.. तुमची माय मराठीच बोलतेय! सर्व प्रथम माझ्या वर मनापासून प्रेम करणाऱ्या सर्व सान थोर सुपुत्रांना अनेकानेक शुभाशिर्वाद. आज विष्णू वामन शिरवाडकर  उर्फ कुसुमाग्रज यांचा जन्मदिवस. या दिवशी मला राजभाषा म्हणून माझा गौरव दिन साजरा करण्यात येतो आहे हे पाहून मन भरून आलय. मित्र हो,  आज मला बोलायचय.!" "महानुभाव पंथीय काळापासून आपण माझा प्रचार प्रसार करीत आला आहात.  अकराव्या शतकापासून मी तुम्हाला  आणि तुम्ही...
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मराठी साहित्य ☆ जन्म दिवस विशेष – स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ पुण्य स्मरण ☆ सुश्री स्वप्ना अमृतकर

स्व विष्णु वामन शिरवाडकर जन्म : 27  फ़रवरी 1912, पुणे निधन : 10 मार्च 1999, नाशिक ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध मराठी  साहित्यकार (कवी , लेखक, नाटककार, कथाकार व समीक्षक) स्व विष्णु वामन शिरवाडकर अपने  उपनाम कुसुमाग्रज के नाम से जाने जाते हैं। आपको 1987 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विश्व में  आपके जन्मदिवस को मराठी भाषा गौरव दिन अथवा मराठी राजभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस सन्दर्भ में सुश्री ज्योति  हसबनीस जी का स्व विष्णु वामन शिरवाडकर ' कुसुमाग्रज '  जी  पर आधारित आलेख को  निम्न लिंक पर क्लिक कर अवश्य पढ़ें। यह मेरा सादर आग्रह है।  ☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 6  - अनाम वीरा  – कुसुमाग्रज  ☆  ई-अभिव्यक्ति उनके जन्मदिवस पर उनके गौरवपूर्ण साहित्य सृजन के लिए स्व विष्णु वामन शिरवाडकरजी का  पुण्य स्मरण एवं उन्हें नमन करता है। इस अवसर पर ई-अभिव्यक्ति से सम्बद्ध युवा साहित्यकार स्वप्ना अमृतकर की भावनाएं हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करना चाहते हैं।  ☆ जन्म दिवस विशेष - स्व विष्णु वामन शिरवाडकर 'कुसुमाग्रज' पुण्य...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 35 – आज प्रेम बदलत चाललयं का…? आणि निखळ प्रेम  कसं असावं…? ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है  आपका एक सामयिक एवं विचारोत्तेजक आलेख  “आज प्रेम बदलत चाललयं का...? आणि निखळ प्रेम  कसं असावं...?) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य # 35 ☆   ☆ आज प्रेम बदलत चाललयं का...? आणि निखळ प्रेम  कसं असावं...? ☆ आज प्रेम बदलत चाललयं का ? असा विचार करण्या पेक्षा आपण ज्याला प्रेम समजतो ते प्रेम आहे हे समजून घेण्याची आज खरी गरज आहे. आयुष्यातील अनेक वळणावर आपल्याला अनेक व्यक्ती आवडून जातात, मग ते एखाद्या मित्र असेल, मैत्रीण असेल,एखादा सहकारी असेल, शिक्षक असतील, शिक्षिका असतील किंवा आणखी  कुणी असेल, जीवानात येणाऱ्या प्रत्येकाचा वेगळा रंग,वेगळा ढंग,  वेगळी जीवन शैली, वेगवेगळे स्वभाव, गुण आपल्या...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 36 – वैभव जोशी….. एक वैभवशाली गझलकार ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनका  एक  स्मृति चित्र “वैभव जोशी..... एक वैभवशाली गझलकार”.  अक्सर हमारे जीवन में कुछ लोग मिलते हैं और अपने सहज सौम्य व्यक्तित्व की एक अमिट छाप छोड़ देते हैं। साहित्यिक विभूतियों का जीवन भी कुछ भिन्न नहीं है।  ऐसे ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के  धनी हैं  श्री वैभव जोशी जी। मैं आभारी हूँ , सुश्री प्रभा जी  का जो उन्होंने मेरे आग्रह को स्वीकारा और सुप्रसिद्ध मराठी कवि / ग़ज़लकार / गीतकार श्री वैभव जोशी जी  के सन्दर्भ में अपने आत्मीय विचार उतने ही सहज भाव से हमें हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने का अवसर दिया।    मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 36 ☆ ☆ वैभव जोशी..... एक वैभवशाली गझलकार ☆  कवी / गझलकार...
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