(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सबक…“।)
अभी अभी # ९३२ ⇒ आलेख – सबक श्री प्रदीप शर्मा
सीखने और सिखाने को सबक कहते हैं ! बच्चे बहुत ज़ल्दी सीखते हैं। बचपन में स्कूल में जो भी सबक दिया जाता है, उसे उन्हें सीखना पड़ता है। अगर सबक ठीक से याद नहीं हुआ, तो गुरु जी को सबक सिखाना भी आता है। पढ़ा हुआ सबक भले ही हम बड़े होकर भूल जाएं, लेकिन वह सबक ज़रूर याद रहता है, जिसमें बेंत से हथेलियां गर्म हो जाया करती थीं, और मुर्गा बनाकर पीठ पर डस्टर रख दिया जाता था।
सबक को पाठ भी कहते हैं ! पाठशाला शब्द भी पाठ से ही बना है। वैसे बच्चे की पहली पाठशाला तो उसकी माँ ही होती है। माँ सा प्यार देने वाली माँ मासी कहलाती है और मदर-सा पाठ पढ़ाने वाली संस्था मदरसा कहलाती है। काश ! सभी मदरसों में मदर-सा पाठ पढ़ाया जाता, तो किसी भी कौम को सबक सिखलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।।
जो सबक हमारे लिए सबक है, एक पाठ है, वही अंग्रेज़ी का lesson है। आज की पीढ़ी सबक याद नहीं करती, पाठ नहीं पढ़ती, वह lesson याद करती है। अगर lesson याद नहीं होता, तो कांवेंटी मेम बच्चे को उनकी भाषा में punish करती है, कुछ इस तरह – I will teach you a lesson. और बालक वह lesson ज़िन्दगी भर नहीं भूलता।
सबक ठीक से याद करने से ज़िन्दगी बन जाती है। जो सबक इंसान अपनी ज़िंदगी में सीखता है, वही सबक वह दूसरों को सिखाता है। गुरु-शिष्य संबंध भी सीखने सिखाने का ही रिश्ता है।
अगर अपना भविष्य उज्जवल बनाना है तो पाठशाला और मदरसे से कुछ नहीं होता, कोचिंग संस्थान की शरण भी लेनी पड़ती है।।
आश्चर्य तो तब होता है, जब ज़िन्दगी के सभी सबक एक तरफ हो जाते हैं, और सास दाँतों तले उंगली दबा कहती है – बहू ने न जाने कैसी पट्टी पढ़ा दी है कि बबलू हाथ से ही निकल गया। फ़िल्मी भाषा में शायद इसे ही प्यार का सबक कहते हैं।
कितनी विचित्र बात है ! हमारे समय में सबक की शुरुआत पट्टी से ही होती थी। एक पट्टी पेम ही हमारा बस्ता होता था। जो अक्षर और अंक हमने बचपन में पट्टी पर लिख लिखकर सीख लिए, उससे ज़िन्दगी की एक इबारत बन गई। या तो ज़िन्दगी का गणित सुलझ गया या उलझ गया। किसी ने एक शब्द प्यार सीख लिया तो वह मसीहा बन गया और किसी ने अगर ज़िहाद सीख लिया तो वह आतंकी बन गया।।
अच्छा सबक ज़िन्दगी देता है, ज़िन्दगी बनाता है। जो हमें एक नेक इंसान बनाये, वही शिक्षा ! अगर हर पढ़ा लिखा इंसान नेक बन जाता तो क्या आज संसार में अमन चैन नहीं होता ? दुर्योधन, कंस, रावण, हिटलर और लादेन को ऐसी क्या घुट्टी पिलाई गई कि वे मानवता के लिए कलंक साबित हुए।
एक समझदार कौम वही, जो ग़लतियों से सबक ले ! किसी एक हैवान के जुनून से बर्बाद जापान जैसे देश ने दुनिया को जतला दिया कि दृढ़ संकल्प, परिश्रम, निष्ठा और देश के प्रति समर्पण से कितना ऊपर उठा जा सकता है। हमें किसी से सबक सीखना भी है, और किसी को सबक सिखलाना भी है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भौंकने का अधिकार…“।)
अभी अभी # ९३२ ⇒ आलेख – भौंकने का अधिकार श्री प्रदीप शर्मा
∆ BARKING RIGHT ∆
दुनिया बनाने वाले ने सभी प्राणियों को कुछ जन्मसिद्ध अधिकार दिये हुए हैं, इनमें बोलना, काटना और भौंकना भी शामिल है। मनुष्य तो खैर, इन सभी में आय एम द सर्वश्रेष्ठ है ही, क्योंकि वह दिमाग की खाता है। केवल उसमें ही नर से नारायण बनने की संभावना निहित है और केवल यही गुण जहां उसके उत्थान का कारण बनता है वहीं यही घमंड उसके पतन के लिए भी उत्तरदायी होता है।
जुबां और दिमाग का धनी यह इंसान इतना चालाक है कि इसने सभी प्राणियों से कुछ न कुछ गुण/अवगुण अपने जीवन में उतार लिए हैं। बिना कारण रात भर जागना, कुत्ते की तरह भौंकना और अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के संसाधनों का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही इसमें शामिल है।।
बिना कारण सृष्टि के किसी जीव का जन्म नहीं होता। एक फूल के खिलने में जितना हाथ एक तितली का है, उतना ही एक भंवरे का भी। एक मधु मक्खी किसके इशारे पर छत्ते में शहद का निर्माण करती है, कोई नहीं जानता। मुर्गी किससे पूछकर अंडे देती है, गाय भैंस क्यों दूध देती है। एक रेशम का कीड़े से यह बुद्धिमान मनुष्य रेशम तक निकाल लेता है। और शायद इसीलिए वह इस सृष्टि का मालिक भी बन बैठा है।
अब आप एक श्वान को ही ले लीजिए ! उल्लू की तरह वह रात भर जागने के लिए अभिशप्त है। वह बिना वेतन का एक चौकीदार है। चूंकि वह बोल नहीं सकता, अतः पहरेदारी करते वक्त उसे भौंकने का अधिकार मिला है। उसके हाथ में कोई डंडा अथवा बंदूक नहीं, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए वह किसी को काट भी सकता है।।
आज का नर, जो नारायण भी बन सकता है, कभी वानर ही तो था। आज भी उसकी नकल करने की आदत नहीं गई। सांप की तरह डंसना और कुत्ते की तरह भौंकना भी उसमें शामिल है। हम अगर कुत्ते की भाषा समझते तो शायद उसके भावों को पकड़ पाते। वह हमसे ज़्यादा समझदार है। जैसा आप सिखाओ, सीख ही लेता है। जो इंसान खुद एक बंदर की तरह नाचता फिरता है, वह मदारी बन, पहले सड़कों पर बंदरों का नाच करता है और बाद में पढ़ लिखकर नच बलिए में शामिल हो जाता है।
बंदर से नाचने का और कुत्ते से भौंकने का अधिकार भी आज इंसान ने छीन लिया है। कुत्ता मालिक का हो या सड़क का, जिस तरह भौंकना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, आज राजनीति में भी भौंकने का अधिकार जितना विपक्ष के पास है उतना ही सत्ता पक्ष के पास भी।।
अंतर सिर्फ इतना है किसी के गले में सत्ता का पट्टा है तो कोई निर्विघ्न सड़क पर घूम रहा है। Have और have nots की लड़ाई हमने इन मूक प्राणियों से सीखी या इन्हें सिखाई यह कहना बड़ा मुश्किल है।
इंसान के साथ रह रहकर श्वान, इंसानों के तौर तरीके सीख गया। एक इशारे पर चुप रहना, दुम हिलाना सीख गया। काश इंसान भी इन मूक प्राणियों से कुछ सीख पाता। अपनी भाषा छोड़ इनकी भाषा में भौंकना न तो राजा को शोभा देता है और न ही प्रजा को। मीठी जुबां दी बोलने को, इसमें जहर कौन घोल गया। मैं देशभक्त, वह देशद्रोही, कानों में यह कौन बोल गया।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६८ ☆ देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆
चाय की चाहत तो हर समय रहती हैं। मोबाइल के आ जाने से चाहत कुछ कम तो हो गई है, परन्तु चाय अभी भी सबसे पसंदीदा पेय हैं।
चाय के भी अनेक नाम, रंग रूप और स्वाद होते हैं। प्रातः काल खटिया पर पी जाने वाली चाय अंग्रेज हमें “बेड टी” के नाम से छोड़ गए हैं। दूसरा चाय का कप “हैंगओवर ब्रेक टी” के नाम रहता हैं। ब्रेकफास्ट टी के बिना ब्रेकफास्ट अधूरा कहलाता हैं।
11 बजे ऑफिस की पहली चाय के बाद ही सरकारी दफ्तरों में कार्य करने के लिए मानस बनाना आरंभ होता हैं। दोपहर के भोजन पश्चात “नींद भगाओ चाय” के बाद ही सरकारी कर्मचारी अपना आसन ग्रहण करते है। सांय के चार बजे के लिए अंग्रेज़ “इवनिंग टी” का ज्ञान दे कर चले गए थे।
सांय छः बजे पत्नी के हाथ से बनी हुई घर की चाय के साथ हल्का नाश्ता आपकी रात्रि भोजन की मात्रा को कम करने का राम बाण फार्मूला हैं।
चाय के बहुत सारे रंग तो हम सब जानते ही हैं, जिनमें लाल, काली, सफेद चाय यानी शुद्ध दूध में थोड़ी सी पत्ती को उबाल कर पिया जाता हैं। विगत कुछ वर्षों से “हरी चाय” भी हम सब के घरों में अपने पैर जमा चुकी हैं।
कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने पूछा नीली चाय पियोगे क्या ? वज़न कम हो जाता हैं। उसके भाव सुनकर ही हमारी जेब का वजन अवश्य कम हो गया हैं। मित्र ने हंसते हुए बोला कोई बात नहीं तुमको “ठंडी चाय” ही पिलाते हैं। आप गलत दिशा में विचार करने लगें है। मित्र ने बिना दूध की चाय को ठंडा कर उसमें बर्फ के कुछ टुकड़े डाल कर “आइस टी” परोस कर इतिश्री कर ली।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – कविता में विज्ञान…, आत्मकथ्य🙏
(कुछ वर्ष पूर्व किसी पत्रिका ने कविता में विज्ञान पर आत्मकथ्य मांगा था। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर आज उसे विनम्रता से साझा कर रहा हूँ।)
विज्ञान को सामान्यतः प्रत्यक्ष ज्ञान माना गया है जबकि कविता को कल्पना की उड़ान। ज्ञान, ललित कलाओं और विज्ञान में धुर अंतर देखनेवालों को स्मरण रखना चाहिए कि राइट बंधुओं ने पक्षियों को उड़ते देख मनुष्य के भी आकाश में जा सकने की कल्पना की थी। इस कल्पना का परिणाम था, वायुयान का आविष्कार।
सांप्रतिक वैज्ञानिक काल यथार्थवादी कविताओं का है। ऐसे में दर्शन और विज्ञान में एक तरह का समन्वय देखने को मिल सकता है। मेरा रुझान सदैव अध्यात्म, दर्शन और साहित्य में रहा। तथापि अकादमिक शिक्षा विज्ञान की रही। स्वाभाविक है कि चिंतन-मनन की पृष्ठभूमि में विज्ञान रहेगा।
विलियम वर्ड्सवर्थ ने कविता को परिभाषित करते हुए लिखा है, ‘पोएट्री इज़ स्पॉन्टेनियस ओवरफ्लो ऑफ पॉवरफुल फीलिंग्स।’ कविता स्वत: संभूत है। यहाँ ‘स्पॉन्टेनियस’ शब्द महत्वपूर्ण है। कविता तीव्रता से उद्भुत अवश्य होती है पर इसकी पृष्ठभूमि में वर्षों का अनुभव और विचार होते हैं। अखंड वैचारिक संचय ज्वालामुखी में बदलता है। एक दिन ज्वालामुखी फूटता है और कविता प्रवाहित होती है।
अपनी कविता की चर्चा करूँ तो उसका आकलन तो पाठक और समीक्षक का अधिकार है। मैं केवल अपनी रचनाप्रक्रिया में अनायास आते विज्ञान की ओर विनम्रता से रेखांकित भर कर सकता हूँ।
‘मायोपिआ’ नेत्रदोष का एक प्रकार है। यह निकट दृष्टिमत्ता है जिसमें दूर का स्पष्ट दिखाई नहीं देता। निजी रुझान और विज्ञान का समन्वय यथाशक्ति ‘मायोपिआ’ शीर्षक की कविता में उतरा। इसे नम्रता से साझा कर रहा हूँ।
वे रोते नहीं
धरती की कोख में उतरती
रसायनों की खेप पर,
ना ही आसमान की प्रहरी
ओज़ोन की पतली होती परत पर,
दूषित जल, प्रदूषित वायु,
बढ़ती वैश्विक अग्नि भी,
उनके दुख का कारण नहीं,
अब…,
विदारक विलाप कर रहे हैं,
इन्हीं तत्वों से उपजी
एक देह के मौन हो जाने पर…,
मनुष्य की आँख के
इस शाश्वत मायोपिआ का
इलाज ढूँढ़ना अभी बाकी है..!
(कवितासंग्रह ‘योंही’ से)
आइंस्टिन का सापेक्षता का नियम सर्वज्ञात है। ‘ई इज़ इक्वल टू एम.सी. स्क्वेयर’ का सूत्र उन्हीं की देन है। एक दिन एकाएक ‘सापेक्ष’ कविता में उतरे चिंतन में गहरे पैठे आइंस्टिन और उनका सापेक्षता का सिद्धांत।
भारी भीड़ के बीच
कर्णहीन नीरव,
घोर नीरव के बीच
कोलाहल मचाती मूक भीड़,
जाने स्थितियाँ आक्षेप उठाती हैं
या परिभाषाएँ सापेक्ष हो जाती हैं,
कुछ भी हो पर हर बार
मन हो जाता है क्वारंटीन,
….क्या कहते हो आइंस्टीन?
(कवितासंग्रह ‘क्रौंच’ से)
कविता के विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है,” कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य ही होगी। इसका क्या कारण है? बात यह है कि संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में फंसे रहने से मनुष्य की मनुष्यता के जाते रहने का डर रहता है। अतएव मानुषी प्रकृति को जाग्रत रखने के लिए ईश्वर ने कविता रूपी औषधि बनाई है। कविता यही प्रयत्न करती है कि प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पाए।’
न्यूक्लिअर चेन रिएक्शन की आशंकाओं पर मानुषी प्रकृति की संभावनाओं का यह चित्र नतमस्तक होकर उद्धृत कर रहा हूँ,
वे देख-सुन रहे हैं
अपने बोए बमों का विस्फोट,
अणु के परमाणु में होते
विखंडन पर उत्सव मना रहे हैं,
मैं निहार रहा हूँ
परमाणु के विघटन से उपजे
इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन,
आशान्वित हूँ हर न्यूक्लियस से,
जिसमें छिपी है
अनगिनत अणु और
असंख्य परमाणु की
शाश्वत संभावनाएँ,
हर क्षुद्र विनाश
विराट सृजन बोता है,
शकुनि की आँख और
संजय की दृष्टि में
यही अंतर होता है।
(कवितासंग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता’ से)
अपनी कविता के किसी पक्ष की कवि द्वारा चर्चा अत्यंत संकोच का और दुरूह कार्य है। इस सम्बंध में मिले आत्मीय आदेश का विनयभाव से निर्वहन करने का प्रयास किया है। इसी विनयभाव से इस आलेख का उपसंहार करते हुए अपनी जो पंक्तियाँ कौंधी, उनमें भी डी एन ए विज्ञान का ही निकला,
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
क्या हमारे कारण किसी ने अपने को अधिक सुरक्षित, अधिक प्रसन्न या अधिक हल्का अनुभव किया?
और उतना ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न—क्या हमारे शब्दों, कर्मों या विचारों से किसी का मन आहत हुआ, किसी को भय लगा, या किसी की गरिमा को ठेस पहुँची?
नैतिक जीवन की शुरुआत यहीं से होती है। ऊँचे सिद्धान्तों या बड़े उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने वचन, आचरण और मन पर सजग पहरे से। यदि ये तीनों निर्मल रहें, तो जीवन में शान्ति का प्रवाह बना रहता है। यदि इन्हें असावधान छोड़ दिया जाए, तो प्रतिभा और सफलता भी दुःख से नहीं बचा सकतीं।
आइए, इन तीन द्वारों पर ठहरकर विचार करें।
🍀वचन का अनुशासन : ऐसे शब्द जो जोड़ें, तोड़ें नहीं
वाणी तीव्र होती है। एक बार निकला शब्द लौटकर नहीं आता। वह सीधे किसी के हृदय तक पहुँचता है।
इसलिए बोलने से पहले स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या यह सत्य है?
क्या यह हितकारी है?
क्या यह कोमल है?
क्या यह उचित समय है?
कटु वचन पत्थर से भी गहरा घाव कर सकते हैं। असत्य क्षणिक लाभ दे सकता है, पर विश्वास खो देता है। आधा-सच, बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात, या जान-बूझकर तथ्य छिपाना—ये भी उतने ही हानिकारक हैं जितना प्रत्यक्ष झूठ। किसी की प्रतिष्ठा को गिराने या अपने लाभ के लिए सत्य को तोड़-मरोड़ देना अपने ही चरित्र को कलुषित करना है।
एक घटना स्मरणीय है।
एक युवक क्रोध से भरे शब्दों की वर्षा करता रहा। सामने खड़े शांत पुरुष ने सब सुना, पर प्रतिक्रिया नहीं दी। अंत में उन्होंने पूछा, “यदि कोई तुम्हें उपहार दे और तुम उसे स्वीकार न करो, तो वह किसके पास रहता है?”
युवक ने कहा, “देने वाले के पास।”
उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारे क्रोध को स्वीकार नहीं करता। वह तुम्हारे पास ही रहेगा।”
कितना सरल, कितना गहरा संदेश!
हम दूसरों के शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, पर अपने शब्दों का चयन अवश्य कर सकते हैं।
सही वाणी केवल असत्य से बचना नहीं है। यह ऐसी भाषा चुनना है जो विश्वास जगाए, मेल कराए, और हृदयों को जोड़े। जहाँ मौन शान्ति बचा सकता हो, वहाँ मौन ही श्रेष्ठ है।
शब्द सेतु भी बन सकते हैं, शस्त्र भी। निर्णय हमारे हाथ में है।
🍀कर्म का अनुशासन : शक्ति जो आश्वस्त करे, भयभीत नहीं
हमारा आचरण ऐसा हो कि कोई भी हमारे कारण भयभीत न हो।
सच्ची शक्ति दबाती नहीं, संरक्षण देती है। वह अधिकार का प्रदर्शन नहीं करती, वह विश्वास जगाती है।
नैतिक जीवन का अर्थ है—किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा न पहुँचाना। बल, पद या सामर्थ्य का उपयोग स्वार्थ के लिए न करना। किसी को डराकर, दबाकर या आहत करके प्राप्त की गई सफलता अन्ततः खोखली होती है।
कल्पना कीजिए, जब हम किसी कक्ष में प्रवेश करें तो बच्चों, बड़ों, यहाँ तक कि पशुओं के मन में भी सहजता का भाव हो। यह हमारी वास्तविक शक्ति का संकेत है।
एक प्रसंग में एक कुख्यात डाकू ने एक निर्भीक साधु को रोका। डाकू ने धमकी दी, “रुक जाओ!”
साधु ने शांत स्वर में कहा, “मैं तो रुक चुका हूँ—मैंने हिंसा छोड़ दी है। तुम अभी तक नहीं रुके।”
इन शब्दों ने डाकू के भीतर गहरा परिवर्तन जगा दिया।
यह है अहिंसा की शक्ति—जो बिना शस्त्र के भी हिंसा को शांत कर दे।
ऐसा आचरण जिसमें चोरी, छल, दुरुपयोग या किसी भी प्रकार की हिंसा न हो—वही समाज में विश्वास का आधार बनता है।
🍀मन का अनुशासन : मूल स्रोत
वाणी और कर्म मन से उत्पन्न होते हैं।
यदि मन अशांत है, तो वाणी कठोर और कर्म असावधान होंगे। यदि मन निर्मल है, तो वाणी मधुर और कर्म उदात्त होंगे।
कहा गया है—
“हम जो कुछ हैं, वह हमारे विचारों का परिणाम है। यदि कोई अशुद्ध मन से बोलता या करता है, तो दुःख उसका अनुसरण करता है जैसे बैल के पाँव के पीछे पहिया। यदि कोई शुद्ध मन से बोलता या करता है, तो सुख उसकी छाया की तरह साथ चलता है।”
क्रोध पहले विचार है, बाद में शब्द।
हिंसा पहले भावना है, बाद में कर्म।
इसलिए वास्तविक साधना भीतर से आरम्भ होती है।
मन की रक्षा का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है, बल्कि उन्हें पहचानना है। जब ईर्ष्या उठे, उसे देखें। जब रोष जागे, उसे समझें। जब द्वेष आए, उसे पोषण न दें। जिन विचारों को हम खाद-पानी नहीं देते, वे धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं।
यदि हम मन में सद्भावना का संकल्प रखें—कि सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित रहें—तो भीतर की भूमि बदलने लगती है।
निर्मल मन भोला नहीं होता, वह सजग होता है। वह द्वेष को स्थान नहीं देता।
🍀जीवन में इसका अभ्यास
यह शिक्षा केवल ग्रंथों के लिए नहीं, जीवन के लिए है।
किशोरों के लिए इसका अर्थ है—
🌱उपहास या बदनामी का हिस्सा न बनना।
🌱सोशल मीडिया पर अफवाह न फैलाना।
🌱दबाव में आकर असत्य न कहना।
साहस से सत्य का साथ देना।
वयस्कों के लिए इसका अर्थ है—
🌱लाभ के लिए सत्य को न तोड़ना।
🌱अधिकार का उपयोग विनम्रता से करना।
🌱यह स्मरण रखना कि बच्चे हमारे आचरण से सीखते हैं।
🌱ऐसा वातावरण बनाना जहाँ कोई स्वयं को छोटा या भयभीत न महसूस करे।
हम सबके लिए इसका अर्थ है—प्रतिक्रिया देने से पहले एक क्षण ठहरना।🌱
वह एक क्षण वर्षों के पछतावे को रोक सकता है।
🍀नैतिक जीवन की अविरल धारा
जब वाणी सत्य और कोमल हो, तो सम्बन्ध गहरे होते हैं।
जब कर्म अहिंसक और आश्वस्तकारी हों, तो विश्वास बढ़ता है।
जब मन निर्मल हो, तो भीतर शान्ति खिलती है।
इस मार्ग के लिए धन, पद या असाधारण प्रतिभा की आवश्यकता नहीं। केवल सजगता चाहिए।
कल्पना कीजिए—यदि प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प करे:
🌱“मैं अपने वचन से किसी को आहत नहीं करूँगा।
🌱मैं अपने कर्म से किसी को भयभीत नहीं करूँगा।
🌱मैं अपने मन में किसी के लिए द्वेष नहीं पालूँगा।”
तो घरों में शान्ति होगी, विद्यालयों में करुणा, और समाज में विश्वास।
विश्व की शान्ति मन की शान्ति से आरम्भ होती है।
मन की शान्ति विचारों की पवित्रता से।
विचार से वाणी जन्म लेती है।
वाणी से कर्म।
और कर्म से हमारा भाग्य।
हम सबके भीतर यह कोमल शक्ति विद्यमान है।
जब हम इसे सजगता से सँभालते हैं, तो हमारा जीवन ही नहीं, हमारे संपर्क में आने वाला प्रत्येक प्राणी भी उससे आलोकित हो उठता है।🌷
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दृष्टि दोष…“।)
अभी अभी # ९३१ ⇒ आलेख – दृष्टि दोष श्री प्रदीप शर्मा
Man is a bundle of habits. इंसान आदतों का एक पुलिंदा है। उसमें अगर खूबियां हैं तो विकार भी। वह कहीं मजबूत है तो कहीं कमज़ोर भी। कमजोर होते ही उसे रोग घेर लेते हैं और वह बीमार होने लगता है। भले ही उसकी नीयत साफ हो, समय के साथ उसकी नज़र कमज़ोर होने लगती है, जिसे दृष्टि दोष अथवा नेत्र रोग कहते हैं।
जो लोग नियमित रूप से विटामिन सी और डी के साथ नींबू, आंवला, त्रिफला, शहद, बादाम और डाबर च्यवनप्राश का सेवन करते हैं, उनकी नेत्र ज्योति तेज होती है। नैनों में कजरा और सुरमा, आजकल वैसे भी कौन लगाता है। रात रात भर जागना, अधिक ऑनलाइन व्यस्त रहना और अधिक पढ़ने लिखने से आंखों को दो से चार होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता, अर्थात् आंखों पर जल्द ही चश्मा चढ़ जाता है।।
चश्मे नजर के भी होते हैं और धूप के भी। जिन्हें नजर लगती है उनकी पहले नजर उतारनी पड़ती है फिर उन्हें चश्मा पहनाना पड़ता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे मोटे चश्मे आजकल नहीं लगते। मोतियाबिंद होने पर, आंखों के अंदर ही आजकल लेंस लगा दिया जाता है जिससे आपकी दूर पास की दृष्टि ठीक हो जाती है।
ईश्वर ने हमें दो आंखें दी हैं, फिर भी हम वही देखते हैं, जो हमें देखना होता है। ऐ भाई जरा देखकर चलो, आंख वाले को ही बोला जाता है। बाजू ! समझो इशारे, हाॅरन पुकारे, और पलट, तेरा ध्यान किधर है, जैसे संबोधन भी आंख वालों के लिए ही तो होते हैं।।
मजरूह तो कह गए हैं कि तेरी आंखों के सिवा, दुनिया में रखा क्या है, यानी जहां आंख नहीं, वहां जीवन में अंधेरा ही अंधेरा ! और यह भी एक कटु सत्य है कि दुनिया के तीन करोड़ नेत्रहीनों में से एक करोड़ नेत्रहीन तो हमारे भारत में ही हैं। है न विचित्र बात, हमारी आंखें होते हुए भी हमें यह दिखाई नहीं देता। लेकिन ईश्वर को सब दिखाई देता है। परमात्मा का प्रकाश इनकी आत्मा तक भी पहुंचता है। दुनिया में कई सेवाभावी लोग और पारमार्थिक संस्थाएं इस अंधेरी दुनिया को जगमगाने में दिन रात एक कर रही हैं। जहां नेत्र नहीं, वहां उनकी मन की आँखें सब देखती हैं, अब सुनती हैं और आत्म विश्वास से इस दुनिया में, अपने कर्म, शुभ संकल्प और आत्म बल की एक ऐसी मिसाल पेश करती है कि हम आंख वालों की भी नजरें सम्मान, तारीफ, गर्व और प्रशंसा से सहसा झुक जाती हैं।
आंखों का संसार तो हमने देखा है लेकिन एक संसार ऐसा भी है, जहां तेरे मस्त मस्त दो नैन के अलावा भी बहुत कुछ है। जिसे हम दृष्टि कहते हैं, उसका इन दिखाई देने वालों चक्षुओं से कुछ लेना देना नहीं है। आप इन आंखों को बंद कर लीजिए। आंखों पे भरोसा मत कर ! दुनिया जादू का खेल है। आइए आपको दृष्टि के एक और ही लोक की सैर करवा दें।।
जिस दृष्टि की हम बात कर रहे हैं, वह तीन प्रकार की है। अंतर्दृष्टि, दूरदृष्टि और दिव्य दृष्टि। जाहिर है, इनका हमारी आंखों से कोई लेना देना नहीं है।
हमारे अंदर नजर डालने के लिए आज तक दुनिया में न तो कोई मशीन बनी है और न ही कोई आंख। हमारे शरीर विज्ञान में किसी मन की आंख का कोई जिक्र नहीं है। जब जरा गर्दन झुकाई, देख ली तस्वीरे यार।
हमारे आसपास एक दुनिया दृष्टिबाधित, मूक बधिर, दिव्यांग और स्पेशल चाइल्ड की भी है, जिन्हें ईश्वर ने वरदान स्वरूप छटी इंद्रिय भी दी है, उनकी अंतर्दृष्टि इतनी सशक्त होती है कि वे ऐसे ऐसे काम कर गुजरते हैं, जो हम कथित साधारण आम इंसान नहीं कर सकते।
सूरदास हों या अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन। हमारे कवि हृदय संगीतकार रवींद्र जैन भी तो प्रज्ञा चक्षु ही थे।
वैसे भी प्रज्ञा का संबंध हमारी अंतर्दृष्टि से ही अधिक होता है। आँखें होते हुए, वे बाहर तो ताका झांकी कर लेंगे, लेकिन उन्हें कभी अपने अंदर झांकने की फुर्सत नहीं मिलती।।
अब आते हैं हम दूर दृष्टि और पक्के इरादे पर। दृष्टि को विजन (vision) भी कहते हैं। एक कलाकार जिस दृष्टि से सृजन करता है, उसका संसार उसके अंदर ही निहित होता है।
कवि की कल्पना, राग, सुर, ताल, सृजन का संसार और एक कलाकार के कैनवस की कोई सीमा नहीं होती।
अच्छे दिनों के सपने देखना और दिखाना क्या दूर दृष्टि नहीं।
और अब अंत में हम आखिरकार दिव्य दृष्टि तक पहुंच ही गए। आखिर जहां न पहुंचे वहां पहुंचे रवि, क्या है। क्या डिजिटल युग में हम दिव्य नहीं हो रहे। जो काम संजय ने धृतराष्ट्र के लिए किया, वह काम तो हमारा टीवी और मोबाइल रोज कर रहा है।
लेकिन फिर भी अगर हमारी नीयत में खोट है, हम बेईमान और भ्रष्ट हैं तो क्या यह हमारा दृष्टि दोष नहीं। खुद पर हमारी नजर नहीं, और दूसरों की नजर में हम ऊपरउठना चाहते हैं, सम्मान पाना चाहते हैं।
भव्य और दिव्य में अंतर है ।।
नज़र कमजोर हो चलेगा, मंदबुद्धि हों, चलेगा, गरीब हो, तो भी चलेगा, लेकिन बुरी नजर वाला, दिल में खोट वाला, स्वार्थी, खुदगर्ज, पाखंडी और नफरत से भरा इज्जतदार, सफेदपोश इंसान नहीं चलेगा। कर्ता से दृष्टा की है यह महायात्रा ;
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
।। माँ सरस्वत्यै नमः।।
☆ संजय उवाच # ३२६ ☆ शुष्क गले की ओर…
कुछ दिन पहले राजस्थान के ग्रामीण अंचल में परिवार के एक विवाह समारोह में जाना हुआ। यह मेरा पैतृक प्रदेश है। परदेसी हो जाने पर भी यहाँ का सांस्कृतिक वैभव, माटी की सोंध, खान-पान का स्वाद और उसका सुवास भीतर गहरे तक बसे हैं। बचपन में देखे धूल उड़ाते टीबे या बालू के टीले अब दिखाई नहीं देते पर स्मृतियों पर धूल अभी नहीं जमी नहीं है।
स्मृतियों की इस मधुर शृंखला को तब एकाएक झटका लगा, जब पैर से आकर कुछ टकराया। दृष्टि झुकी तो हतप्रभ रह गया। पैरों में मिनरल वाटर की एक सीलबंद बोतल पड़ी थी।
हुआ यूँ कि समारोह में विविध प्रकार के व्यंजनों के काउंटर लगे थे। एक काउंटर पर हजारों की संख्या में मिनरल वाटर की 200 मिलीलीटर वाली बोतलें थीं।
देखता हूँ कि कुछ बच्चे काउंटर से पानी की सीलबंद बोतल लेकर उन्हें खोले बिना, उनसे फुटबॉल खेल रहे हैं। मैं जड़वत हो गया। पानी को सिर नवाने वाला समाज, पानी को पैरों से ठोकर लग रहा है।
स्मृतिचक्र फिर बचपन में ले गया। पिताजी सेना में थे। उनका, भारत के विभिन्न राज्यों में स्थानांतरण होता रहता। हमारी वार्षिक छुट्टियों में माँ, हमें हमारे ननिहाल लेकर जाती। सामान्यतः यह विवाह का भी मौसम हुआ करता। इस अवधि में अनेक विवाह समारोहों में जाने का अवसर मिलता।
आज से लगभग पाँच दशक पूर्व के इन समारोहों में रामझरे से पानी से पिलाया जाता। रामझरा पानी संग्रह करने का लोटेनुमा पर आकार में बड़ा पात्र होता है, जिसमें जल पिलाने के लिए एक नली भी लगी होती है। उन दिनों काँसे से बने रामझरे उपयोग में लाए जाते थे। हमें पानी हथेलियों को आपस में जोड़कर चुल्लू से पीना होता था। राजस्थान में इसे ओक से पीना कहते हैं। हथेलियों को ठीक से बंद नहीं कर पाते तो बुज़ुर्गों से डाँट पड़ती कि पानी बर्बाद नहीं किया जा सकता।
नीति कहती है, ‘अति सर्वत्र वर्ज्येत।’ अति अंततः संकट का कारण बनती है। मरुधरा में पानी को ठोकर लगाई जा रही है। पंचतत्वों में से एक है पानी। मनुष्य पंचतत्वों से बना है। मनुष्य पंचतत्वों को नष्ट करने पर तुला है। भावार्थ है कि मनुष्य भस्मासुर हो चला है।
बच्चों को मीठी झिड़की दी। पानी की बोतलें एक स्थान पर जमा करने के लिए कहा। बच्चे खेल बंद करके भाग गए।
प्रश्नों से दूर भागने से प्रश्न समाप्त नहीं होते। विकास हो, वस्तुएँ उपलब्ध हों, सुविधा बढ़ें, यह सहज मानवीय भाव है पर विपुलता, जीवनावश्यक तत्वों का अपव्यय करे तो यह आशंका को जन्म दे सकता है। स्मरण रखा जाना चाहिए कि इसी अपव्यय के चलते जोहानिसबर्ग, विश्व में पहला बिना पानी का शहर होने के मुहाने पर है।
सिगरेट और अन्य तंबाकूयुक्त पदार्थों पर वैधानिक चेतावनी छपी होती है कि उनका सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। सोचता हूँ, समय आ गया है कि मिनरल वॉटर की बोतलों पर छपा हो कि पानी की एक भी बूँद का अपव्यय, शुष्क गले की ओर एक क़दम है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुम्हार का गधा…“।)
अभी अभी # ९३० ⇒ आलेख – कुम्हार का गधा श्री प्रदीप शर्मा
एक समय था जब गधा इतना अकेला नहीं था। सबसे बड़ा बोझ अकेलेपन का होता है। क्या दिन थे वे भी, जब एक गधा भी पीठ पर बोझा लादे शान से कुम्हार के साथ चलता था। लेकिन समय का फेर देखिए। आज कुम्हार भी उसका साथ छोड़ गया। एक कुत्ते की तरह वह भी न कुम्हार के घर का रहा, न ईंट के भट्टे का। एक कुत्ते के तो फिर भी दिन बदल गए, लेकिन बेचारे गधे को तो किसी ने घास तक नहीं डाली।
अगर आपकी याददाश्त अच्छी हो तो आपने भी यदाकदा एक गधे को कुम्हार के मटकों के साथ सजा धजा सड़कों पर निकलते देखा होगा। गधे की पीठ पर एक रस्सियों की जाल में ठंडे पानी के मटके लदे हुए रहते थे। कुम्हार पति पत्नी दोनों मटके बेचने, गधे के साथ ही निकलते थे। कुम्हार पति मटकों की होम डिलीवरी करता और कुम्हार की पत्नी गधे और मटकों की रखवाली करती हुई आवाज लगा लगाकर मार्केटिंग करती थी।।
गधा शुरू से ही मेहनती रहा है। गधा हम्माली के लिए तो वह अभिशप्त है ही, लेकिन आज उसके नसीब में बोझा ढोना भी नहीं लिखा है। जो पूछ परख उसकी गांव में कभी थी, वह आज शहरों में कहां। बेचारी गऊ माता तक को इन शहरियों ने आवारा पशु समझ गोशाला में पहुंचा दिया तो उसकी क्या औकात। उसकी हालत तो एक कुत्ते और सुअर से भी गई बीती हो गई है। कुछ कस्बे टाइप जिलों में उसे आज भी सड़कों पर विचरने की छूट मिली हुई है, लेकिन वह कोई गाय या कुत्ता नहीं, जो कोई उस पर तरस खाकर दो रोटी ही डाल दे। वह तो पूरी तरह से घास पर ही निर्भर है। सबका मालिक एक होगा, लेकिन आज एक गधे का कोई मालिक नहीं।
जब आज मजदूर को ही मजदूरी नहीं मिल रही है तो बड़े बड़े डंपर, और आइशर वाहन छोड़, कौन गधे की पीठ पर ईंटें लादेगा। कुम्हार ने भी एक चार पहिए वाला ठेला खरीद लिया है, ऐसे में यह चार पांव वाला गधा किस काम का।
एक गधे से तो टट्टू और खच्चर अच्छा जो किसी काम तो आता है। एक व्यस्त घोड़ा भले ही घास से यारी ना करे, लेकिन एक उपेक्षित गधे के पास तो घास से यारी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। सरकार को सबके रोजगार की चिंता है, एक गधा कहां का मतदाता है जो सरकार उसके भी रोजगार की घोषणा करे।।
केवल एकमात्र कृश्न चंदर ही ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने न केवल एक गधे की आत्मकथा लिख इस प्राणी को अमर किया, अपितु उसे संसद तक में प्रवेश दिलवा दिया।
ईश्वर की इस सृष्टि में कोई प्राणी अनुपयोगी नहीं। अतः कोई आश्चर्य नहीं अगर पुस्तक मेले की तरह गधों का भी मेला लगता हो, उनकी भी खरीद फरोख्त होती हो। अजी गधों की तो बोली भी लगती है। जरूर गधों में भी कुछ श्रेष्ठ गधे होंगे, जो पारखी निगाहों से बच नहीं पाते होंगे।।
गधा न तो किसी सम्मान का भूखा है तथा न ही इसमें अस्मिता बोध ही है। एक कुम्हार शायद इसके मनोविज्ञान से वाकिफ हो, वैसे किसी कुत्ते अथवा गाय की तरह इसे इसके नाम से पुकारा जाए, तो भी यह किसी को ज्यादा भाव नहीं देता।
काश इसे यह पता होता कि इसकी कुछ खूबियों के कारण कुछ इंसानों की इस प्राणी से तुलना की जाती है। अगर इसे यह बात पता भी चल जाए, तो भी शायद इसके मुंह से ये शब्द तो फिर भी कतई ना निकले ;
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहंकार व संस्कार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३११ ☆
☆ अहंकार व संस्कार… ☆
अहंकार दूसरों को झुका कर खुश होता है और संस्कार स्वयं झुक कर खुश होता है। वैसे यह दोनोंं विपरीत दिशाओं में चलने वाले हैं, विरोधाभासी हैं। प्रथम मानव को एकांगी व स्वार्थी बनाता है; मन में आत्मकेंद्रितता का भाव जाग्रत कर, अपने से अलग कुछ भी सोचने नहीं देता। उसकी दुनिया खुद से प्रारंभ होकर, खुद पर ही समाप्त हो जाती है। परंतु संस्कार सबको सुसंस्कृत करने में विश्वास रखता है और जितना अधिक उसका विस्तार होता है; उसकी प्रसन्नता का दायरा भी बढ़ता चला जाता है। संस्कार हमें पहचान प्रदान करते हैं; दूसरों से अलग करते हैं, परंतु अहंनिष्ठ प्राणी अपने दायरे में ही रहना पसंद करता है। वह दूसरों को हेय दृष्टि से देखता है और धीरे-धीरे वह भाव घृणा का रूप धारण कर लेता है। वह दूसरों को अपने सम्मुख झुकाने में विश्वास करता है, क्योंकि वह सब करने में उसे केवल सुक़ून ही प्राप्त नहीं होता; उसका दबदबा भी कायम होता है। दूसरी ओर संस्कार झुकने में विश्वास रखता है और विनम्रता उसका आभूषण होता है। इसलिए स्नेह, करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, त्याग व उसके अंतर्मन में निहित गुण…उसे दूसरों के निकट लाते है; सबका सहारा बनते हैं। वास्तव में संस्कार सबका साहचर्य पाकर फूला नहीं समाता। यह सत्य है कि संस्कार की आभा दूर तक फैली दिखाई पड़ती है और सुक़ून देती है। सो! संस्कार हृदय की वह प्रवृत्ति है; जो अपना परिचय स्वयं देती है, क्योंकि वह किसी परिचय की मोहताज नहीं होती।
भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में सबसे महान् है; श्रद्धेय है, पूजनीय है, वंदनीय है और हमारी पहचान है। हम अपनी संस्कृति से जाने-पहचाने जाते हैं और सम्पूर्ण विश्व के लोग हमें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं; हमारा गुणगान करते हैं। प्रेम, करुणा, त्याग व अहिंसा भारतीय संस्कृति का मूल हैं, जो समस्त मानव जाति के लोगों को एक-दूसरे के निकट लाते हैं। इसी का परिणाम हैं…हमारे होली व दीवाली जैसे पर्व व त्यौहार, जिन्हें हम मिल-जुल कर मनाते हैं और उस स्थिति में हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन हो जाता है; शत्रुता का भाव तिरोहित व लुप्त-प्रायः हो जाता है। लोग इन्हें अपने मित्र व परिवारजनों के संग मना कर सुक़ून पाते हैं। धर्म, वेशभूषा, रीति-रिवाज़ आदि भारतीय संस्कृति के परिचायक हैं, परंतु इससे भी प्रधान है– जीवन के प्रति सकारात्मक सोच, आस्था, आस्तिकता, जीओ और जीने का भाव…यदि हम दूसरों के सुख व खुशी के लिए निजी स्वार्थ को तिलांजलि दे देते हैं, तो उस स्थिति में हमारे अंतर्मन में परोपकार का भाव आमादा रहता है।
परंतु आधुनिक युग में पारस्परिक सौहार्द न रहने के कारण मानव आत्मकेंद्रित हो गया है। वह अपने व अपने परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के बारे में सोचता ही नहीं और प्रतिस्पर्द्धा के कारण कम से कम समय में अधिकाधिक धन-संपत्ति अर्जित करना चाहता है। इतना ही नहीं, वह अपनी राह में आने वाले हर व्यक्ति व बाधा को समूल नष्ट कर देता है; यहां तक कि वह अपने परिवारजनों की अस्मिता को भी दाँव पर लगा देता है और उनके हित के बारे में लेशमात्र भी सोचता नहीं। उसकी दृष्टि में संबंधों की अहमियत नहीं रहती और वह अपने परिवार की खुशियों को तिलांजलि देकर उनसे दूर… बहुत दूर चला जाता है। संबंध-सरोकारों से उसका नाता टूट जाता है, क्योंकि वह अपने अहं को सर्वोपरि स्वीकारता है। अहंनिष्ठता का यह भाव मानव को सबसे अलग-थलग कर देता है और वे सब नदी के द्वीप की भांति अपने-अपने दायरे में सिमट कर रह जाते हैं। पति-पत्नी में स्नेह-सौहार्द की कल्पना करना बेमानी हो जाता है और एक-दूसरे को नीचा दिखाना उनके जीवन का मूल लक्ष्य बन जाता है। मानव हर पल अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने में प्रयासरत रहता है। इन विषम परिस्थितियों में संयुक्त परिवार में सबके हितों को महत्व देना–उसे कपोल-कल्पना -सम भासता है, जिसका परिणाम एकल परिवार-व्यवस्था के रूप में परिलक्षित है। पहले एक कमाता था, दस खाते थे, परंतु आजकल सभी कमाते हैं; फिर भी वे अभाव-ग्रस्त रहते हैं और संतोष उनके जीवन से नदारद रहता है। वे एक-दूसरे को कोंचने, कचोटने व नीचा दिखाने में विश्वास रखते हैं। पति-पत्नी के मध्य बढ़ते अवसाद के परिणाम-स्वरूप तलाक़ की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है।
पाश्चात्य सभ्यता की क्षणवादी प्रवृत्ति ने ‘लिव- इन’ व ‘तू नहीं और सही’ के पनपने में अहम् भूमिका अदा की है…शेष रही-सही कसर ‘मी टू व विवाहेतर संबंधों’ की मान्यता ने पूरी कर दी है। मदिरापान, ड्रग्स व रेव पार्टियों के प्रचलन के कारण विवाह-संस्था पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। परिवार टूट रहे हैं, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। वे एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं। ‘हेलो- हाय’ की संस्कृति ने उन्हें उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां वे अपना खुद का जनाज़ा देख रहे हैं। बच्चों में बढ़ती अपराध- वृत्ति, यौन-संबंध, ड्रग्स व शराब का प्रचलन उन्हें उस दलदल में धकेल देता है; जहां से लौटना असंभव होता है। परिणामत: बड़े-बड़े परिवारों के बच्चों का चोरी-डकैती, लूटपाट, फ़िरौती, हत्या आदि में संलग्न होने के रूप में हमारे समक्ष है। वे समाज के लिए नासूर बन आजीवन सालते रहते हैं और उनके कारण परिवारजनों को बहुत नीचा देखना पड़ता है
आइए! इस लाइलाज समस्या के समाधान पर दृष्टिपात करें। इसके कारणों से तो हम अवगत हो गए हैं कि हम बच्चों को सुसंस्कारित नहीं कर पा रहे, क्योंकि हम स्वयं अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। हम हैलो-हाय व जीन्स कल्चर की संस्कृति से प्रेम करते हैं और अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूलों में शिक्षित करना चाहते हैं। जन्म से उन्हें नैनी व आया के संरक्षण में छोड़, अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं और एक अंतराल के पश्चात् बच्चे माता-पिता से घृणा करने लग जाते हैं। रिश्तों की गरिमा को वे समझते ही नहीं, क्योंकि पति-पत्नी के अतिरिक्त घर में केवल कामवाली बाईयों का आना-जाना होता है। बच्चों का टी•वी• व मीडिया से जुड़ाव, ड्रग्स व मदिरा-सेवन, बात-बात पर खीझना, अपनी बात मनवाने के लिए गलत हथकंडों का प्रयोग करना… उनकी दिनचर्या व आदत में शुमार हो जाता है। माता-पिता उन्हें खिलौने व सुख-सुविधाएं प्रदान कर बहुत प्रसन्न व संतुष्ट रहते हैं। परंतु वे भूल जाते हैं कि बच्चों को प्यार-दुलार व उनके स्नेह-सान्निध्य की दरक़ार होती है; खिलौनों व सुख-सुविधाओं की नहीं।
सो! इन असामान्य परिस्थितियों में बच्चों में अहंनिष्ठता का भाव इस क़दर पल्लवित-पोषित हो जाता है कि वे बड़े होकर उनसे केवल प्रतिशोध लेने पर आमादा ही नहीं हो जाते, बल्कि वे माता-पिता व दादा-दादी आदि की हत्या तक करने में भी गुरेज़ नहीं करते। उस समय उनके माता-पिता के पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प शेष नहीं रह जाता। वे सोचते हैं– काश! हमने अपने आत्मजों को सुसंस्कृत किया होता; जीवन-मूल्यों का महत्व समझाया होता; रिश्तों की गरिमा का पाठ पढ़ाया होता और संबंध-सरोकारों की महत्ता से अवगत कराया होता, तो उनके जीवन का यह हश्र न होता। वे सहज जीवन जीते, उनके हृदय में करुणा भाव व्याप्त होता तथा वे त्याग करने में प्रसन्नता व हर्षोल्लास का अनुभव करते; एक-दूसरे की अहमियत को स्वीकार विश्वास जताते; विनम्रता का भाव उनकी नस-नस में व्याप्त होता और सहयोग, सेवा, समर्पण उनके जीवन का मक़सद होता।
सो! यह हमारा दायित्व हो जाता है कि हम आगामी पीढ़ी को समता व समरसता का पाठ पढ़ाएं; संस्कृति का अर्थ समझाएं; स्नेह, सिमरन, त्याग का महत्व बताएं ताकि हमारा जीवन दूसरों के लिए अनुकरणीय बन सके। यही होगी हमारे जीवन की मुख्य उपादेयता… जिससे न केवल हम अपने परिवार में खुशियां लाने में समर्थ हो सकेंगे; देश व समाज को समृद्ध करने में भी भरपूर योगदान दे पाएंगे। परिणामत: स्वर्णिम युग का सूत्रपात अवश्य होगा और जीवन उत्सव बन जायेगा।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नाड़ी दोष…“।)
अभी अभी # ९२९ ⇒ आलेख – नाड़ी दोष श्री प्रदीप शर्मा
कबीर कोई नाड़ी वैद्य नहीं थे और ना ही कोई ज्योतिषी, जो लोगों की जन्म पत्री में नाड़ी दोष निकालते बैठते। वे कोई हठयोगी भी नहीं थे, महज एक जुलाहे थे, जो ताना बाना बुनते थे और सहज रूप से ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बातें करते थे। साधो ! सहज समाधि भली।
जितनी कृष्ण की रानियां थीं, उससे अधिक तो हमारे शरीर में नस -नाड़ियां हैं। हम श्रीकृष्ण नहीं, हमें सिर्फ या तो नारियों में दोष दिखाई देता है, या फिर इंसानों में नाड़ी – दोष ! ठीक है, अगर किसी में नाड़ी दोष है तो किसी नाड़ी – वैद्य को बताओ। नहीं ! वे नाड़ी – दोष के लिए किसी ज्योतिषी की सलाह लेते हैं। बस यहीं कबीर का दिमाग खराब हो जाता है। वह अपने कुल को ही दोष देने लग जाता है :
बूढ़ा वंश कबीर का,
उपजा पूत कमाल।।
ज्योतिषी कुंडली में विवाह के पूर्व वर – वधू के गुण मिलाते हैं। नक्षत्रों का मिलान करते हैं। दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन, पहले बत्तीस गुण, फिर सगाई और उसके बाद बारात। अगर फिर भी बात ना बने तो ! नाड़ी दोष और क्या। महाराज कोई निदान ? हां यजमान गऊ दान, तुरंत समाधान।
पहले उन्हें नाड़ी वैद्य कहते थे, विज्ञान उन्हें न्यूरो सर्जन कहता है। कलाई गोरी हो या काली, उसे थामने का अधिकार सिर्फ डॉक्टर, वैद्य अथवा एक चूड़ी वाले को ही होता है। नाडी वैद्य अगर नाड़ी देखकर मर्ज पहचान जाता है तो डॉक्टर अपने यंत्र द्वारा पल्स रेट और दिल की धड़कन जानकर। डॉक्टर आपके दिल पर हाथ नहीं रखता, बस यंत्र द्वारा बीमारी को टटोल लेता है। ज़ोर से सांस लो, छोड़ो। आंखों से आंखें नहीं मिलाता, टॉर्च से रोशनी फेंकता है। इन आंखों का रंग हो गया, गुलाबी गुलाबी ! कहीं कंजेक्टिवाइटिस तो नहीं ? नहीं, नहीं सब ठीक है। हल्की सी हरारत है। सब ठीक हो जाएगा एंटीबायोटिक से।।
तब लक्स अंडरवियर और बनियान का प्रचलन नहीं था। बंबइया पट्टेदारी चड्डी और जेब वाले बनियान मां घर पर ही सीती थी। बाहर के लिए कुर्ता पायजामा। तब भी हम नाड़ी दोष से परेशान रहते थे। पुराने टूथ ब्रश की डंडी से ही नाड़ी दोष दूर हो जाता था। बाद में तो इस धर्म संकट से बचने के लिए एक सेफ्टी पिन पायजामे के साथ ही नत्थी कर दी जाती थी। आज इलेस्टिक ने एक आम इंसान की इज्जत बचा ली। उसे नाड़ी दोष से मुक्त कर दिया।
आज सी टी स्कैन और एम आर आई जैसी आधुनिक तकनीक से रीढ़ की हड्डी से लेकर मस्तिष्क तक की सभी नस नाड़ियों की जांच संभव है, फिर भी मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यूं ज्यूं दवा की।
कहीं नाड़ी दोष तो कहीं पितृ दोष। दान पुण्य, ज्योतिष, नीम हकीम। क्या क्या न किए हमने खट करम आपकी खातिर।।
नाड़ी वैद्य ना सही, उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम नियमित व्यायाम और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी कर सकते हैं। नाड़ी दोष से भी अधिक खतरनाक आजकल राजनीतिक दोष हो गया है जहां कहीं भी किसी को गुण नजर ही नहीं आता। किसी की कलाई मरोड़ी तो किसी की कलाई खोली। काश कोई नाड़ी वैद्य इन बीमारों की बीमारी जड़ से पकड़ ले तो समाज का नाड़ी दोष दूर हो जाए। हमारी संस्कृति और सभ्यता की गाड़ी वापस रास्ते पर आ जाए। डर है, कहीं कोई यहां भी पितृ दोष ना निकाल दे ..!!!