हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३३ ⇒ इत्ती सी खुशी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इत्ती सी खुशी।)

?अभी अभी # १०३३ ⇒ आलेख – इत्ती सी खुशी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खुशी बड़ी छोटी नहीं होती, खुशी, सिर्फ खुशी होती है। प्रकृति का चितेरा कवि विलियम वर्ड्सवर्थ जब हजारों डेफोडिल्स को एक साथ खिला हुआ देखता है, तो अनायास कह उठता है, thousands I saw at a glance ! यानी सिर्फ एक झलक ही काफी होती है, कुदरत के नजारे को आत्मसात करने के लिए ! और वह कह उठता है,

A thing of beauty, is joy for ever. पलक बंद कर लूं, कहीं छलक ही न जाए। मुझे खुशी मिली इतनी, कि मन में न समाए।

बच्चों की छोटी सी बंद मुट्ठी में सपने ही सपने होते हैं, खुशियां ही खुशियां होती हैं। उनकी खुशियों में महल नहीं होते, इत्ती सी चीज के लिए वे मचल जाते हैं, आसमान सर पर उठा लेते हैं।मुझे चांद चाहिए। कितनी बड़ी मांग, कितना बड़ा हठ। बालहठ ! मां समझती है, वह पानी में चांद की परछाई ला देती है। इत्ती सी खुशी। बच्चा खुश। बच्चे छोटी छोटी सी बात पर ताली बजाने लगते हैं, खुश होकर नाचने लगते हैं। बड़े सोचते हैं, इत्ती सी खुशी और इत्ता बड़ा इज़हार। और अगर यही बड़े करें, तो लोग उन्हें पागल समझें। बड़े लोग न इत्ती सी खुशी समझते हैं, और न इत्ती सी बात।।

प्यार में खुशी भी शामिल होती है। प्यार को चाहिए, बस एक नजर, एक नज़र। नजर उठती है, मिलती है, और झुक जाती है।

कितने कम समय में कितना बड़ा काम। ऐ प्यार तुझे सलाम। ढाई आखर ही तो हैं प्यार के।अंग्रेजी में बोलें तो ढाई शब्द ! I love you. इत्ते कम शब्दों में खुशी कहां से कहां पहुंच जाती है। प्यार दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाता है।

दो मीठे शब्द बोलने में क्या जाता है। इत्ता सा काम, और कितना बड़ा ईनाम ! आप चाहें तो राई का पहाड़ बनाएं, अथवा गर्म गर्म कढ़ाई में इत्ती सी राई डालें। इत्ती सी राई कमाल बता देती है। इत्ती सी हींग, इत्ता सा जीरा लेकिन कित्ता सारा स्वाद। इत्ते में कित्ता मज़ा। अधिक तेल, खटाई, मसाला, सज़ा ही सज़ा।।

हमारे पास पैसा, धन दौलत, रुतबा और ओहदा और इज्ज़त सम्मान होते हुए भी कितने गरीब हैं हम, अगर हममें भाव का अभाव है। खुशी और प्यार, भाव का खेल है। बहुत खुश हैं आप, इत्ती सी खुशी बांटें भी। लोग आपको प्यार करते हैं, इत्ता सा प्यार आप भी तो बांटें ! किसी का इत्ता सा दुख भी बांटकर देखें, कित्ता संतोष होता है। गर्मी और उमस में, जब हम पसीने पसीने हो रहे होते हैं, कहीं से इत्ता सा हवा का झोंका आता है, हमारी सब गर्मी दूर कर जाता है। भाव और अभाव में, इत्ता सा अंतर होता है।

आप क्या दे सकते हैं भगवान को। सिर्फ भाव से भोग लगा सकते हैं, वे इत्ता सा भी नहीं खाते। वे सिर्फ भाव के भूखे हैं। आपने जो भोग लगाया, वह ईश्वर का प्रसाद हो गया। इत्ता सा प्रसाद कितनों तक पहुंच जाता है।

सिर्फ भाव का भोग है यह, प्रसाद का नहीं। इत्ता सा प्रसाद, कित्ता सारा भाव।।

एक चिड़िया पल भर के लिए आपके सामने आती है, दाना चुगकर चली जाती है, आप खुश हो जाते हैं। इत्ती सी खुशी दे गई वह आपको। रात को आपके गमले में जो कली मुस्कुराई थी, आज सुबह वह फूल बन गई। आप इत्ती सी खुशी भी किसी के साथ बांटना चाहते हैं। सुना है बांटने से खुशी बढ़ती है, और दुख कम होता है।।

इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें। यह इतना शब्द कितना बड़ा है, कोई नहीं जानता। इत्ती सी बात है, लोग समझ जाएं तो क्या बात है। आप किसी बच्चे की चॉकलेट में से, इत्ती सी चॉकलेट मांगकर देखें, वह नहीं देगा। मेरी है ! बच्चों का इत्ता, कित्ता बड़ा होता है, जितनी उनकी हथेली, जितना उनका कद। जब उनके छोटे छोटे हाथ इशारा करके बताते हैं कि मेरे पास इत्ते सारे खिलौने हैंतब उनकी खुशी देखते ही बनती है।

आप भी तलाशिए अपने अंदर, अपने आसपास, इत्ती सी खुशी, इत्ता सा प्यार। समेट लें, जितना समेट सकें, और हमें भी बांट दें, इत्ती सी खुशी, इत्ता सा प्यार। हमारे आसपास, ना कोई दुखी रहे, ना कोई उदास। लोएक कली मुस्काई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८३ – देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८३ ☆ देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त कहावत का चलन सबसे अधिक हमारे देश में ही होता है। अंग्रेज़ी की कहावत “Prevention is better than Cure” का सदुपयोग पश्चिम के देशों में ही होता है।

देश के किसी भी भाग में कोई आपदा आने से पूर्व कभी कोई तैयारी नहीं होती है। दुर्घटना हो जाने के बाद मात्र कुछ घंटों/ दिनों के लिए हम लोग विश्व के किसी भी देश से अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इस सक्रियता का दसवां हिस्सा भी हम आपदा पूर्व तैयारी में खर्च कर देवें,  तो देश दुर्घटना रहित हो सकता है।

गर्मी के मौसम में आग लगना आम बात होती है। व्यवस्था को दोष मढ़ कर हमारा कार्य पूर्ण हो जाता है। अभी लखनऊ आग की लपटों में ताप बाकी है, मुंबई की पहली वर्षा ने ही समस्याओं का विकराल रूप सामने खड़ा कर दिया है।

किसी भी व्यवस्था के नियमों का पालन ना करने की हमारी आदत, घर से ही आरंभ हो जाती है। सोने के नियत स्थान पर भोजन ग्रहण करना हो या रोज मर्रा के तय नियमों की अनदेखी करना।

पहली बार जब आप कोई भी नियम का उल्लंघन करते हैं, उस दिन के बाद से ही आपके स्वभाव और आदतों में “अनुशासनहीनता” जन्म ले लेती है।

हम स्वयं भी बहुत सारे नियम तोड़ कर जीवन के कष्ट भोग रहें हैं। कॉलेज में मित्र के कहने पर जीवन में जब मदिरा का पहला प्याला ये कहकर उठाया था, कि बस आज पहली और आखिरी बार है। तब स्वयं ली गई प्रतिज्ञा टूट गई थी, उसके बाद हम उसके आसरे से ही, जी पा रहें है। स्वास्थ्य पर इसके विपरीत प्रभाव के हम सब अच्छे खासे जानकार हैं।

होटल में जब कभी छोटे समूह में जाते हैं, तो उस होटल के टेबल कुर्सी आदि को हम अपनी संख्या से लगवा लेते हैं। इससे वहां अव्यवस्था होती है, लेकिन हमको उससे क्या लेना देना?

जब तक हम स्वयं तय शुदा नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं करते हैं, तब प्रशासन, काम काज आदि के क्षेत्र में अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी होगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४२ – कंफर्ट ज़ोन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३४२ कंफर्ट ज़ोन… ? 

प्रकाशन के अपने व्यवसाय के संदर्भ में काग़ज़ के थोक विक्रेताओं के बाज़ार में हूँ। यह मुख्य शहर की एक संकरी गली है। इमारतों के पुनर्विकास के बाद ऊपरी मंज़िलों पर फ्लैट बने हुए हैं और नीचे दुकानें हैं। अपना काम समाप्त कर निकलने ही वाला हूँ कि सड़क पर कुत्तों के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने के स्वर गूँजने लगे हैं।

देखता हूँ कि किसी फ्लैट में रहने वाली एक महिला अपने पालतू कुत्ते को घुमाने निकली हैं। कुत्ते के गले में बंधे पट्टे से लगी साँकल का एक सिरा महिला के हाथ में है। उसके दूसरे हाथ में डंडा है। इसी कुत्ते को देखकर और महिला के हाथ के डंडे के चलते गली के कुत्ते उनसे कुछ दूरी रखकर ही भौंक रहे हैं। गली के कुत्तों को आवारा या स्वतंत्र कहने का विकल्प पाठक अपने-अपने वैचारिक अधिष्ठान के अनुसार चुन सकते हैं।

तथापि इस आलेख का विषय आवारा या स्वतंत्र कुत्तों का भौंकना नहीं है। विषय है पालतू कुत्ते का उनकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखना। वह अपनी मालकिन के आश्रय में साँकल की परिधि में यहाँ- वहाँ कुछ सूँघता, कहीं-कहीं मुँह मारता चला जा रहा है। मेरी विचार-प्रक्रिया के केंद्र में इस घटना के संदर्भ में पालतू कुत्ते का व्यवहार है। क्रिया की प्रतिक्रिया, प्रकृति का नियम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने इसे थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन के द्वारा सिद्ध भी किया है। यह नियम कहता है कि किसी भी क्रिया के लिए हमेशा एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

इस घटना में पालतू कुत्ता, गली के कुत्तों के भौंकने की प्रतिक्रिया में भौंक नहीं रहा है। सोचता हूँ, पराधीनता से मिलता लाभ भी शनै:-शनै: सुविधा के गणित में बदल जाता है। यदि इस पालतू के स्थान पर गली का कुत्ता होता तो प्रतिरक्षा में भौंकता, उस गली में अपना स्थान बनाने के लिए लड़ता या अपने को निर्बल पाकर भाग खड़ा होता, जो भी करता, कोई न कोई प्रतिक्रिया अवश्य देता। यद्यपि हम उपेक्षा को भी प्रतिक्रिया कह सकते हैं पर प्राणी के बौद्धिक स्तर को देखते हुए यह तर्कसंगत नहीं लगता। यहाँ तो साँकल के संरक्षण में भौंकने की प्रक्रिया विस्मृत हो जाना अधिक तार्किक जान पड़ता है। 

परजीविता के इस उदाहरण में अपने स्वामी से प्राप्त भोजन, पोषण, सुविधा ने कुत्ते के लिए एक कंफर्ट ज़ोन तैयार कर दिया है। कंफर्ट ज़ोन भीतर ही भीतर मानसिक ग़ुलामी के लिए तैयार कर देता है।

मानसिक गुलामी की भयावता पर लगभग दो दशक पूर्व लिखी अपनी कविता स्मरण हो आई। ‘मन के हारे’ शीर्षक की यह कविता कहती है,

समय ने ली करवट / पिंजरा अब खुला है,

कैसा मोह है / पंछी अब भी उसी में पड़ा है,

आयु बीती स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में,

आकाश मापने की मनीषा में,

पर-जैसे-जैसे / समय बीतता है,

तन के साथ / मन भी ग़ुलाम हो जाता है,

पंछी हो या मनुष्य / मानसिक ग़ुलामी भयावह है ! 

यूँ भी आसानी से अपना कंफर्ट ज़ोन बिरले ही छोड़ पाते हैं। जबकि तथ्य यह है कि धरती की कक्षा में बने रहने का मोह हो तो अंतरिक्ष में प्रवेश नहीं किया जा सकता। यात्रा लंबी करनी हो, सोद्देश्य करनी हो तो कंफर्ट ज़ोन छोड़ने का साहस करना ही होगा। अपनी प्रकृतिगत विशेषताओं, अपने सिद्धांतों और तदनुकूल आचरण के साथ ‘कदापि समझौता नहीं’ के तत्व को अपनाना ही होगा।

सार है कि अपने मूल के साथ अपने अस्तित्व के अभिन्न संबंध को अनुभव करो और गंतव्य की ओर बढ़ो। यदि ऐसा कर सके तो जीवन रीतने का दुख नहीं अपितु सार्थक बीतने का संतोष होगा। अस्तु!

 

© संजय भारद्वाज 

(प्रात: 6:01 बजे, 27 जून 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त । कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख  – वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन।)

☆ आलेख – वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भक्तिकाल के कवियों में कबीरदास का स्थान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। वे केवल संत या कवि ही नहीं थे अपितु सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्यों और समरसता के प्रतीक विश्वप्रेमी थे, जिस पर मानव समाज का विकास सम्भव है। उनकी साधना वनखण्डों व गुफाओं में ले जाने वाली नहीं, मन के साथ-साथ आचरण से सम्बन्ध रखने वाली लोकसाधना थी। उन्होंने मन की शुद्धि और साधु- सत्संग पर समान रूप से बल दिया। उनको समाज में अच्छे और बुरे दो ही तत्व दिखाई देते थे, इसलिए उन्होंने अच्छे तत्व की प्रशंसा करते हुए बुरे तत्व से बचने का उपदेश दिया। उनका दर्शन किसी विशेष धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग तक सीमित नहीं था। मानवता के कल्याण की भावना उसमें उपलब्ध है। विज्ञान, तकनीक एवं संचार के साधनों ने आज जहाँ विश्व को एक वैश्विक गाँव में परिवर्तित कर दिया हो, सांस्कृतिक विघटन, उपभोक्तावाद, असहिष्णुता, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण जैसी समस्याएँ सामने हों, ऐसे समय में कबीर का मानवतावादी दर्शन अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है।

कबीर की मानवतावादी विचारधारा में मनुष्य को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। उन्होंने धर्म, जाति और सम्प्रदाय की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर मानव की गरिमा को सर्वोपरि मानते हुए कहा– ‘ जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। ‘ कबीर के अनुसार मनुष्य की पहचान उसकी जाति या जन्म से नहीं, उसके ज्ञान और कर्म से होती है। वे जीवमात्र को एक ही परमपिता की संतान मानते हैं और सबको एक ही स्तर पर लाकर खड़ा कर देते हैं, किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार नहीं करते, उदाहरणार्थ– ‘ एक बूँद से सब जग उपजा, कौन ब्राह्मण कौन शूद्र।’ वैश्विक दौर में जहाँ नस्लीय, धार्मिक और आर्थिक असमानताएँ हैं। कबीर का यह संदेश सामाजिक न्याय और समानता का आधार बन सकता है। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों की धार्मिक कट्टरता की आलोचना करते हुए कहा कि ईश्वर किसी एक धर्म की सम्पत्ति नहीं है। वे धार्मिक आडम्बरों का विरोध करते हैं और सच्चे आचरण को महत्व देते हैं। वैश्विक दौर में धार्मिक संघर्ष, आतंकवाद, साम्प्रदायिक तनाव की घटनाएँ घटित हो रहीं हैं, ऐसे समय में ‘ राम- रहीम एक हैं ‘ की भावना वैश्विक शान्ति की दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

कबीर के दर्शन में प्रेम, मानवता का आधार है, वह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। बाह्य आचार प्रेम में बाधक होते हैं, इस कारण वे प्रत्येक प्रकार की उस संस्था का विरोध करते हैं जो प्रेम के मार्ग का रोड़ा बनती है, यथा– ‘ पोथी पढि-पढि जगमुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय।। ‘ वैश्वीकरण के प्रतिस्पर्धा और स्वार्थी दौर में प्रेम और सहअस्तित्व की भावना अत्यन्त आवश्यक है। उपभोक्तावादी संस्कृति में सफलता का मापदंड धन और भौतिक सुख- सुविधाएँ हैं। वहाँ भी वे कहते हैं– ‘ साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।।’ कबीर का यह विचार आज की भोगवादी संस्कृति के लिए एक नैतिक विकल्प है।

अंतत: हम कह सकते हैं कि कबीर का मानवतावाद किसी पश्चिम दार्शनिक अवधारणा का अनुकरण नहीं अपितु भारतीय लोकजीवन और अनुभव की उपज है। यही कारण है कि उनकी वाणी आज भी जनमानस में जीवित है और भविष्य के लिए एक नैतिक व मानवीय मार्गदर्शक है। वे सच्चे अर्थों में मानव समानता के समर्थक, धार्मिक सहिष्णुता के प्रवक्ता, सामाजिक न्याय के पक्षधर, उपभोक्तावाद के विरोधी, प्रेम और करुणा के उपासक, विश्व बंधुत्व के समर्थक, सांस्कृतिक समन्वय के प्रवक्ता हैं। उनका दर्शन मानवाधिकारों, जीवन मूल्यों एवं वैश्विक नागरिकता की अवधारणाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११३ – मुस्कुराओ कि… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मुस्कुराओ कि।)

☆ अभिव्यक्ति # ११३ ☆

☆ मुस्कुराओ कि☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मुस्कुराओ कि जिंदगी लौटे,

रेत की तह पर नमी लौटे,

लबों पर जम गए हैं सन्नाटे,

कुछ किया जाए कि हंसी लौटे,

हमारी जिंदगी में इतनी कटुता कहां से आ गई, बचपन में तो नहीं थी, किसी के बारे में कभी नहीं सोचा कि उन्नति ना करें, कभी नहीं सोचा कि सुखी ना हो, हमारी संस्कृति में भी, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… की बात की है. पर अब क्या हो गया अगर हम त्यौहार भी मनाते हैं तो कटुता से भरे रहते हैं. हम क्यों नहीं उसके घर जाकर उनकी खुशियों में शरीक होते हैं, क्यों नहीं, हम, खुशी को साझा करते हैं, दर्द भी साझा करें, खुशी भी साझा करें.

लेकिन क्या हो गया हम अपने आप में ही सिमट गए, दूसरे की खुशियां हम नहीं बांट सकते, हम दूसरों की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, हम अपने परिवार की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, अकेलापन आप चाहते नहीं हो, तो आप चाहते क्या हो, प्रकृति आपके हिसाब से नहीं चलती, प्रकृति अपनी गति से गतिमान होती है, आपको ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है.

प्रकृति के साथ, बारिश में भीगना छोड़ दिया, छत पर सुबह की धूप लेनी छोड़ दी, जब आप प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं, तब आप खुश होना सीख जाते हैं, खुशियां बांटनी चाहिए, दूसरों के गम में शरीक होना चाहिए, और जब आप खुशियां बांटना शुरू कर देते हैं दूसरों के गमों में शरीक होना शुरू कर देते हैं यकीन मानिए आपको भी कहीं ना कहीं अपार खुशी मिलती है.

कोशिश करके देखिए, जीवन जीने का रवैया बदल जाएगा, हंसिए, हंसाईये दूसरों की हंसी का कारण बनिए ऐसा कोई कार्य न करें, जो आप अपने लिए नहीं चाहते, मुस्कराये और दूसरों की मुस्कराहट का कारण बनिए, बस खुशियों से भरा जीवन जीना सीख लीजिए.

एक पुराने गाने की पंक्तियां याद आ गई,

आईये बहार को हम बांट लें,

जिंदगी के प्यार को हम बांट लें,

मिलकर रोयें, मिलकर मुस्कुराए हम,

आंसुओं की धार को हम बांट लें.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३२ ⇒ पर्दा फिल्मी और फेसमुखी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पर्दा फिल्मी और फेसमुखी।)

?अभी अभी # १०३२ ⇒ आलेख – पर्दा फिल्मी और फेसमुखी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन केवल सच्चाई और वास्तविकता से नहीं जीया जाता ! सपने सच नहीं होते, फिर भी सपने सुहाने लगते हैं। जीवन का सफर कभी सुहाना होता है, तो कभी काँटों भरा। मन को बहलाना ही मनोरंजन है। दुःख को कुछ समय के लिए भुलाना ही क्षणिक निवृत्ति है।

संगीत, कला और साहित्य जीवन को एक दिशा देते हैं, रोजमर्रा की उबाऊ दिनचर्या को रोचक और आकर्षक बना देते हैं। दुनिया फिल्मी हो, साहित्यिक हो, या फिर संगीतमय, जीवन में रस की सृष्टि करते हैं। साहित्य और संगीत अगर खास विधा है तो फ़िल्म एक आम विधा।।

संगीत अगर कानों में रस घोलता है तो दृश्य मन को आनंदित और आंदोलित करते हैं। आलमआरा और जहाँआरा जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह फिल्मी सफर आज उस मुकाम पर आ गया है, जहाँ सिनेमाहॉल का बड़ा पर्दा पहले टीवी का छोटा पर्दा हुआ और अब एंड्रॉयड के जरिये हमारी हथेली में कैद हो गया।

याद कीजिए सहगल, पृथ्वीराज कपूर, महिपाल, दिलीप, देव और राजकपूर की फिल्मों का दौर ! सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़। नर्गिस, मीनाकुमारी, साधना और सायराबानो की फिल्मों के पोस्टर्स। बिनाका गीत माला की धूम। हर पान वाले की दुकान पर बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं, जैसे गानों पर झूमते श्रोतागण। अभिनय सम्राट, संगीत सम्राट और हास्य सम्राट का त्रिवेणी संगम।।

समय का पंछी उड़ता जाए !

संचार क्रांति ने हरित क्रांति को पीछे छोड़ दिया। आज सिनेमाघर गिनती के हैं।जितने पहले शहर में सिनेमाघर थे, उतने आज मॉल हैं। दो आने की मूँगफली से पूरी ढाई घंटे की फ़िल्म देख ली जाती थी। आज 200 ₹ का पॉप कॉर्न कॉम्बो वह स्वाद नहीं देता।

आज मेरे हाथ में कोई बुक नहीं, फेसबुक है। बस इसे खोलने की देर है। एक झाड़ पर बैठे बंदरों से अधिक app मेरी उंगलियों तले दबे बैठे हैं। टीवी की पिक्चर ट्यूब की अब मुझे चिंता नहीं, एक टीवी दीवार से चिपका है तो एक मेरी आँखों से। यू ट्यूब में मैं जब चाहे सङ्गीत की महफ़िल सजा सकता हूँ। 24 x 7 मेरे सामने एक बोन्साई रजतपट है, सभी अभिनेताअभिनेत्रियों की फिल्में खुल जा सिम सिम की तरह केवल एक क्लिक की मोहताज है।।

फिल्मी पर्दे से फेसबुक के पर्दे तक का मेरा यह सफर बड़ा रोचक है। जो काम सन् 70 के दशक में संगीत, फिल्में और किताबें करती थी, वे सब आजकल केवल फेसबुक अकेली कर रही हैं। पहले किताबें बोलती नहीं थीं, आजकल लेखक से आपका जीवंत परिचय और संवाद होता है। रचना प्रक्रिया पर घर बैठे बहस होती है। सभी पुरानी फिल्में और क्लासिकल संगीत यू ट्यूब में उपलब्ध हो चुका है।

बस केवल एक पर्दे की जरूरत है, और वह है आँखों का पर्दा।

फेसबुक ओपन हुई और पर्दा खुला। किसी ने शायद इसी स्थिति को भाँपकर आज से कई वर्ष पहले इस गीत की रचना की होगी ;

पर्दा उठे सलाम हो जाए

बात बन जाये, काम हो जाए

फेसबुक का पर्दा उठ चुका है, आपसे सुबह का सलाम हो ही जाए ! सुप्रभात…

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३१ ⇒ ह र क त ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ह र क त।)

?अभी अभी # १०३१ ⇒ आलेख – ह र क त ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हरकत एक ऐसी सूक्ष्म अथवा स्थूल प्रक्रिया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कहीं कुछ ऐसा चल रहा होता है, जिसका हमें आभास तक नहीं होता। लेकिन अगर किसी ने तनिक इशारा भी कर दिया, तो हमारे कान खड़े हो जाते हैं।

हरकत को स्वस्थ गतिविधि नहीं माना जाता ! अबोध बालकों की कुछ हरकतें गंदी होती हैं, जिनके लिए माता पिता उन्हें अक्सर झिड़कते रहते हैं। बाथरूम में बंद करने तक की धमकी भी देते हैं।।

कांग्रेस, विपक्ष और ममता की सभी हरकतें ओछी होती हैं। पाकिस्तान की घुसपैठ की गतिविधियां भी इसी श्रेणी में आती हैं। अपराधियों के कारनामों की गिनती नीच हरकतों में होती है। कभी कभी किसी अपने की भी कोई हरकत इतनी नागवार गुजरती है कि मन खट्टा हो जाता है। मोहल्ले के कुछ लफंगे टाइप के लड़कों की हरकतों से शरीफ महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो जाता है। चीन की यह कोरोना वाली हरकत से तो, अब चीन क्या चाईनीज तक से नफ़रत हो गई है।

फिल्म हकीक़त का एक खूबसूरत सा गीत है :

ज़रा सी आहट जो होती है

तो दिल सोचता है,

कहीं ये वो तो नहीं !

जी नहीं। हकीकत तो यह है कि आहट का हरकत से कोई लेना देना नहीं। आपने कभी सांप के सरसराने की आवाज़ सुनी है, इसमें कोई आहट नहीं, झाड़ियों में हरकत सी होती है। सांप के चलने से सिर्फ हरकत होती है, बाहर भी, और अपने अंदर भी। मत पूछिए कैसी। हल्की हल्की बयार से पेड़ पौधों में, पत्तियों में एक हरकत होती है। जो देखी जा सकती है, महसूस की जा सकती है।।

आप जब किसी पड़ोसी के आंगन से कुछ फूल तोड़ने की इजाजत मांगते हैं, तो उसका जवाब होता है, कोई हरकत नहीं, आप जितने चाहें तोड़ लीजिए। हरकत यानी उज्र भी होता है। नो ऑब्जेक्शन। नो प्रोब्लम।

आइए, अब एक संयुक्त परिवार का हाल लेते हैं ! सबके चहेते ९०वर्षीय, स्वस्थ, खुशमिजाज, सभी परिजनों के दिलों की धड़कन, दादाजी, बिस्तर में पड़े हैं। अच्छे भले, हंसते खेलते, बातें करते, अचानक उन्हें स्ट्रोक आ गया, और वे कोमा में चले गए। पूरे घर में मातम मना हुआ है। दादाजी मज़ाक में कहते थे, पूरी सेंचुरी मारूंगा, इतनी जल्दी नहीं जाऊंगा।।

घर के सभी सदस्य चिंतित, प्रार्थनारत हैं, उन्हें अपने से अधिक दादाजी पर भरोसा है। उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता। डॉक्टर ने भी बोला है, जब तक दादाजी कोमा में हैं, हम कुछ नहीं कर सकते। आप बस प्रार्थना करें। या तो सबकी प्रार्थना रंग लाती है, या दादाजी का आत्मविश्वास, अचानक उनके शरीर में हरकत होती है, एक बार नहीं, दो तीन बार ! सबके शरीर में आशा का संचार होता है, मानो जग जीत लिया हो। डॉक्टर भी कहते हैं, खुश खबर है। दादाजी अब पुनः स्वस्थ हो सकते हैं।।

सबसे प्यारी हरकत संगीत में होती है। शास्त्रीय गायन और कुछ नहीं, सरगम की हरकत ही तो है। जब रविशंकर सितार के साथ हरकत करते हैं, बिस्मिल्लाह खान की शहनाई जब हरकत करती है, भीमसेन जोशी, पंडित जसराज और कुमार गंधर्व जब तान छेड़ते हैं, तो इबादत हो जाती है। इबादत से बढ़कर कोई हरकत नहीं।

जगजीतसिंह जब सरकती जाए, रुख से नकाब …. गाते हैं, तो कहां कहां हरकत नहीं होती। दर्शक झूम उठते हैं। पूरा हॉल आहिस्ता आहिस्ता से गूंज जाता है। केवल जगजीत की आवाज़ ही नहीं, हर वाद्य यंत्र हरकत में आ जाता है। क्या तबला, क्या वॉयलिन और क्या संतूर।।

शरारत की गिनती भी हरकत में ही आती है। घर में बच्चों की शरारत न होती, तो क्या लॉक डाउन के पहाड़ जैसे दिन आसानी से कटते। हर हरकत ऐसी हो हमारी, जिससे कोई आहत न हो। थोड़े शिकवे भी हों, कुछ शिकायत भी हो। फिर भी अगर कोई बेजा हरकत हो गई हो, तो गुस्ताखी माफ, गुस्ताखी माफ़।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२७ ☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अभिमानी–स्वाभिमानी। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ  / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२७ ☆

☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘अभिमानी और स्वाभिमानी में केवल इतना-सा  फ़र्क़ है कि स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी से कुछ मांगता नहीं और अभिमानी व्यक्ति किसी को कुछ देता नहीं।’ अहंकार में डूबे व्यक्ति को न तो ख़ुद की ग़लतियाँ दिखाई देती है, न ही दूसरों की अच्छी बातें उसके अंतर्मन को प्रभावित करती हैं। उसे विश्व मेंं स्वयं से अधिक बुद्धिमान कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। वैसे भी छिद्रान्वेषण अर्थात् दूसरों में दोष-दर्शन की प्रवृत्ति मानव में स्वाभाविक रूप से होती है। उसे सभी लोग दोषों व बुराइयों का आग़ार भासते हैं और वह स्वयं को दूध का धुला समझता है। दूसरी ओर जहाँ तक स्वाभिमानी का संबंध है, उसमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा होता है और वह स्व अर्थात् मैं में विश्वास रखता है और उसका अहं उसे दूसरों के सम्मुख नत-मस्तक नहीं होने देता। उसे प्रभु में आस्था होती है और वह ‘तुम कर सकते हो’ के विश्वास के सहारे बड़े से बड़ा कार्य कर गुज़रता है, क्योंकि उसके शब्दकोश में असंभव शब्द होता ही नहीं है।

‘सफलता हासिल करने के लिए मानव का विश्वास भय से बड़ा होना चाहिए, क्योंकि असफलता का भय ही सपनों के साकार करने में बाधा बनता है। यदि आप भय पर विजय पा लेते हैं, तो आपकी विजय निश्चित् है’ प्लेटो का यह संदेश अत्यंत कारग़र है। यदि हमारा लक्ष्य निश्चित् और हृदय में आत्मविश्वास है, तो कोई भी बाधा आपका पथ नहीं रोक सकती। इसलिए कहा जाता है,’मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ हमारा मन ही जय-विजय का कारक है। सो! ‘विजयी भव’ एक सर्वश्रेष्ठ भाव है, जिसके साथी हैं– विद्या, विनय व विवेक। इन मानवीय गुणों के आधार पर हम आपदाओं से मुकाबला कर सकते हैं। विनम्रता सर्वोत्तम गुण है, जो अहंनिष्ठ व्यक्ति के हृदय से कोसों दूर रहता है। इसके लिए वस्तुस्थिति का ज्ञान होने के साथ- साथ यथा-समय लिया गया निर्णय भी हमें सफलता की सीढ़ियों पर पहुंचाता है। दु:ख में धैर्य का बना रहना अत्यंत आवश्यक व सार्थक है।

‘कोई भी चीज़ आपके लिए फायदेमंद नहीं हो सकती, जिसे पाने के लिए आपको आत्म- सम्मान से समझौता करना पड़े।’ मार्क्स ऑरेलियस का यह तथ्य आत्म-सम्मान को सर्वश्रेष्ठ समझ समझौता न करने का सुझाव देता है। सो! समझौता परिस्थितियों से करना चाहिए, आत्म-सम्मान से नहीं, क्योंकि जब उस पर आँच आ जाती है; तो व्यक्ति सिर उठा कर नहीं जी सकता। ऐसी स्थिति में प्रभु शरणागति कारग़र उपाय है। मुझे स्मरण हो रही हैं दुष्यंत की यह पंक्तियाँ ‘कौन कहता है आकाश में सुराख हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ से हमें यह संदेश मिलता है कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, सिर्फ़ आप में जज़्बा होना चाहिए उस कार्य को अंजाम देने का। ‘राह  को मंज़िल बनाओ, तो कोई बात बने’ में भी यही सोच व भाव निहित है। जब हम दृढ़-संकल्प कर उन राहों पर  निकल पड़ते हैं, तो हमारा मंज़िल पर पहुंचना निश्चित हो जाता है। लाख आँधी, तूफ़ान व सुनामी भी आपके पथ के अवरोधक नहीं बन सकते।

स्वाभिमान व आत्मविश्वास पर्यायवाची हैं तथा एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनकी महत्ता को नकारना असंभव है। सो! हमारे हृदय में शंका भाव नहीं आना चाहिए, क्योंकि यह तनाव की स्थिति का द्योतक है, जो हमें पथ-विचलित करता है। भगवद्गीता में भी यही संदेश दिया गया है कि सुख का लालच व दु:ख का भय मानव के अजात शत्रु हैं। यदि मानव भविष्य के प्रति आशंकित रहता है, तो वह वर्तमान के अपरिमित सुखों से वंचित हो जाता है, क्योंकि यही है दु:खों का मूल। व्यक्ति जीवन में अधिकाधिक धन-सम्पदा व पद-प्रतिष्ठा पाना चाहता है, परंतु उसको एवज़ में छोड़ना कुछ भी नहीं चाहता; जबकि संसार का नियम है ‘एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले’ अर्थात् जो भी आप इस संसार में देते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। वैसे भी आप एक साँस छोड़े बिना बिना दूसरी साँस नहीं ले सकते। यह संसार का नियम है कि इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ लौट जाना है। केवल सत्कर्म ही उसके साथ जाते हैं। इसलिए मानव हरपल प्रभु का सिमरन तथा समय का सदुपयोग करना चाहिए।

अहंनिष्ठ प्राणी आजीवन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में उलझा रहता है। वे उसे अपना गुलाम बनाए रहती हैं। उसके कदम धरा पर नहीं टिकते। वह केवल दूसरों की भावनाओं को आहत नहीं करता, बल्कि अपना जीवन भी नरक बना लेता है तथा आजीवन इसी उधेड़बुन में खोया रहता है। डॉ वसुधा छवि का यह कथन भी इस तथ्य की सार्थकता सिद्ध करता है कि ‘जब व्यक्ति के पास पैसा होता है, तो वह भूल जाता है कि वह कौन है और जब पैसा नहीं होता, तो लोग भूल जाते हैं कि वह कौन है,’ यही जीवन का कटु यथार्थ है। धन-लिप्सा उसे अपने शिकंजे साथ बाहर नहीं निकलने देती और वह इस भ्रम में अपने जीवन के प्रयोजन को भुला बैठता है। मानव स्वार्थी है और संसार व संबंध मिथ्या। मानव केवल स्वार्थ साधने हेतू संबंध साधता है और उसके पश्चात् उसे भुला देता है। इतना ही नहीं, वह माया महा-ठगिनी के मायाजाल में आजीवन उलझा रहता है और लख चौरासी से मुक्त नहीं हो सकता।

सहारे मानव को खोखला कर देते हैं और उम्मीदें कमज़ोर। मानव को अपने बल पर जीना प्रारंभ करना चाहिए क्योंकि उसका आपसे अच्छा साथी व हमदर्द कोई दूसरा नहीं हो सकता। वैसे भी ‘मंज़िलें बड़ी जिद्दी होती हैं/ हासिल कहाँ नसीब से होती हैं/ मगर तूफ़ान भी वहां हार जाते हैं/ जहां कश्तियां ज़िद पर होती हैं।’ जी हां! यदि मानव का हृदय साहस व धैर्य से लबालब है, तो तूफ़ान भी रुक जाते हैं और व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ सिद्ध होता है। जब मन रूपी कश्ती ज़िद पर होती है, तो तूफ़ानों को अपने रास्ते से हट जाना पड़ता है, क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी नहीं ठहर नहीं सकता। मानव को न तो किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उम्मीद रखनी चाहिए, क्योंकि दोनों स्थितियां उसके मनोबल को तोड़ती हैं। मानव स्वयं अपना साथी व हमदर्द है। इसलिए जीवन में अपेक्षा व उपेक्षा को त्याग कर जीवन पथ पर बढ़ते जाना चाहिए, अन्यथा यह मानव को अवसाद की स्थिति में ले जाती है। मानव को अहं को शत्रु समझ अपने आसपास नहीं आने देना चाहिए और आत्मविश्वास को धरोहर सम संजोए रखना चाहिए, क्योंकि आत्मविश्वास के बल पर आप असंभव कार्य को भी कर गुज़रते हैं। इसलिए आत्मसम्मान से कभी भी समझौता न करें, क्योंकि जिसमें आत्मविश्वास है, वह सिर उठाकर जीता है; किसी के सम्मुख घुटने नहीं टेकता और न ही नतमस्तक होता है। सो! अभिमानी नहीं;  स्वाभिमानी बनें और अपने मान-सम्मान व प्रतिष्ठा को क़ायम रखें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३० ⇒ सिल बट्टा और खलबत्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिल बट्टा और खलबत्ता।)

?अभी अभी # १०३० ⇒ आलेख – सिल बट्टा और खलबत्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपके रसोड़े में आज भी यह जोड़ी मौजूद है ? पत्थर की सिल्ला और पत्थर की ही लोढ़ी,और लोहे का खल और लोहे का ही बत्ता ! जब तक मैं ज़मीन से जुड़ा रहा,ये मुझसे जुड़े रहे। आज मैं जमीन से ऊपर उठ गया हूं,एक फ्लैट में शिफ्ट हो गया हूं। आप कह सकते हैं, न तू ज़मीं के लिए है, न आसमां के लिए। तेरा वजूद है, सिर्फ़ 2BHK, लेट कम अटैच बाथ के लिए। अब मेरे फ्लैट की चार इंच की दीवारें और चमकदार नाज़ुक टाइल्स इनका बोझ नहीं सह सकती। पुराने घर में जहां मन करे, एक कील ठोंको और छतरी टांग दो। यहां तो अपनी ही दीवार में एक कील लगाने के लिए ड्रिलिंग करना पड़ता है। पूरी बिल्डिग जान जाती है, कहीं एक कील ठुक रही है। आज न सिल न बट्टा, और ना ही खलबत्ता। कोई फर्क नहीं अलबत्ता।

सिल अथवा सिल्ला,एक तरह की पोर्टेबल पत्थर की शिला ही तो होती है,जिसके मुंह पर चेचक के दाग की तरह खुरदुरे छेद होते हैं। इन पत्थरों को टांका जाता है। मोहल्ले में एक पत्थर और घट्टी टांकने वाला आवाज लगाता था। घट्टी भी एक पत्थर की छोटी चक्की ही होती थी,जिसमें पक्षियासन की मुद्रा में दोनों पाँव फैलाकर अनाज पीसा जाता था, और दालों को दला जाता था। तब दो ही तो कहावतें मशहूर थी कहासुनी के वक्त ! कौन सी चक्की का आटा खाते हो, और आ जाओ मैदान में, अगर मां का दूध पीया है तो ?

तब कहां घरों में मिक्सर ग्राइंडर होते थे। मेहनत और पसीने की खड़े मसालों की,सिल पत्थर पर पिसी चटनी का स्वाद ही कुछ और होता था। गर्म गर्म मुंगौड़ों के लिए पहले मूंग की दाल भिगोना और फिर उसे सिल बट्टे पर दरदरी पीसना,अदरक,हरी मिर्ची और धनिये के साथ। गणेश चतुर्थी के लड्डू के लिए पहले मुठिया तली जाती, फिर उसे खलबत्ते में कूटा जाता। खलबत्ते की आवाज के साथ मोहल्ले में खुशबू फैल जाती। फुर्सत ही फुर्सत, स्वाद ही स्वाद।

आज समय,स्वास्थ्य और तकनीकी ज्ञान ने सब कुछ कितना आसान कर दिया है। एक वह दिन, जब रसोई घर यानी पाक शाला में बिना स्नान प्रवेश वर्जित। पाक और नापाक का क्या साथ ! चूल्हे में अगर आग नहीं,तो गुलजार साहब पड़ोसी के चूल्हे से आग ले आते। ये मर्द नहीं मानते, उसी से बीड़ी भी जला लेते हैं। सो अनहाइजेनिक। दिन भर धुआं ही धुआं और रात भर रसोई में चिमनी का धुआं। और एक आज, रसोई में बढ़िया स्टैंडिंग किचन, वॉश बेसिन, एक्वा गार्ड, चार बर्नर वाला गैस स्टोव,फिलिप्स का मिक्सर,ग्राइंडर,माइक्रोवेव ओवन और रसोईघर का धुआं और प्रदूषण निकलने के लिए अत्याधुनिक बिजली की चिमनी।।

सब कुछ कितना आसान,आरामदेह और आधुनिक हो गया। जो समय के साथ चला, वह आगे निकल गया,जो साइकिल से आगे नहीं बढ़ा,वो मोरसली गली में ही अटक गया। कांसे और पीतल के बर्तन बिक गए, अनब्रेकेबल क्राकरी भी तेजी से आई और निकल गई। बोन चाइना में हड्डियां पाई गई। दीनदयाल स्टेनलेस स्टील के बर्तन लेकर आए और येरा कांच के बर्तन।

जो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हैं,वे शायद आज भी चांदी के डिनर सेट में खाना खाते हों।

अगर इंसान हो हट्टा कट्टा,तो आजमा ले सिल बट्टा और खलबत्ता का स्वाद खट्टा मीठा। समय और सुविधा का तकाजा तो यही है,स्वाद से समझौता करें,स्वस्थ और तंदुरुस्त रहें। पहले शरीर को आराम देओ और बाद में बाबा रामदेव। सिलबट्टा, खलबत्ता नहीं हंसी ठट्टा, दोनों से कट्टम कट्टा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१८ ☆ आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१८ ☆

☆ इन दिनों लन्दन से ☆

?  आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की राजनीति इन दिनों एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ प्रधानमंत्री निवास एक रैन-बसेरा सा बन गया है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और जनता की अपेक्षाओं का दबाव किस हद तक बढ़ चुका है। बोरिस जॉनसन का जाना हो या फिर हाल ही में कीर स्टार्मर का पद छोड़ना, ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री अब प्रेस और जनता के निरंतर डर के साये में काम करने को मजबूर हैं।

ब्रिटिश राजनीति में जवाबदेही के मानक अत्यंत कड़े हैं। वहां का लोकतान्त्रिक संस्कार किसी भी छोटे से छोटे नैतिक स्खलन को भी स्वीकार नहीं करता। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्रियों के इस्तीफों की सूची को देखें तो कारण अक्सर बड़े नीतिगत संकटों के बजाय व्यक्तिगत नैतिकता और आचरण से जुड़े रहे हैं। कभी कोविड नियमों के उल्लंघन का छोटा सा विवाद (पार्टीगेट), कभी पारिवारिक सदस्य की फीस या निजी खर्चों से जुड़ी पारदर्शिता का अभाव, तो कभी मामूली से प्रतीत होने वाले राजनीतिक फैसलों पर मीडिया का आक्रामक रुख, इन छोटी-छोटी बातों ने सरकार की नींव हिला दी। प्रधानमंत्री बदल गए । यह अस्थिरता दर्शाती है कि वहां का नेतृत्व अब एक ऐसी सूक्ष्म परीक्षा से गुजर रहा है जहाँ कोई भी मानवीय त्रुटि उसके राजनीतिक करियर का अंत कर सकती है।

आज के सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में, जहाँ हर छोटी घटना पल भर में सुर्खियों में आ जाती है, वहां के राजनेताओं की निजता और राजनीतिक आज़ादी लगातार सिमट रही है। प्रेस की भूमिका वहां एक सजग प्रहरी से बढ़कर सीधे तौर पर एक निर्णायक की हो गई है। जब मीडिया किसी व्यक्तिगत आचरण या पारदर्शिता के मुद्दे को राष्ट्रहित का नाम देकर उछालता है, तो वहां के प्रधानमंत्री के लिए अपनी कुर्सी बचाए रखना एक कठिन चुनौती बन जाता है। प्रधानमंत्री की आज़ादी का अर्थ वहां निरंकुशता से नहीं, बल्कि स्थिरता से है, जो अक्सर मीडिया के निरंतर दबाव में बिखरती दिखती है।

भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटिश डेमोक्रेसी की ही जड़ से निकली है, लेकिन इनके काम करने के तरीकों में बड़ा अंतर है। ब्रिटेन में नैतिक आधार पर इस्तीफा देना एक स्थापित राजनीतिक परंपरा है और वहां का जनमत त्वरित परिणामों की मांग करता है, जिससे नेतृत्व पर दबाव बहुत जल्दी बढ़ जाता है। इसके विपरीत, भारत में जवाबदेही की परिभाषा थोड़ा अलग है। यहां की सरकारें अक्सर एक बड़े और व्यापक जनादेश के साथ काम करती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, फिर भी वे स्वयं को सारी आबादी के प्रतिनिधि के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं। भारतीय राजनीति में मीडिया का दबाव और विमर्श तो चलता है, लेकिन हमारा तंत्र अधिक लचीला है। यहां सत्ता को केवल मीडिया के शोर से हिला पाना कठिन है, क्योंकि भारतीय राजनीति का ढांचा नैतिक शुद्धता के साथ-साथ शासन की निरंतरता और स्थायित्व को भी प्राथमिकता देता है।

लोकतंत्र के इस रंगमंच पर एक संतुलन की आवश्यकता है। एक स्वस्थ समाज के लिए प्रेस का स्वतंत्र होना अनिवार्य है, लेकिन उसे जज की भूमिका से निकलकर एक सुझावकर्ता की भूमिका को भी समझना होगा। उसे यह अहसास होना चाहिए कि अत्यधिक अस्थिरता अंततः राष्ट्र के विकास की गति को बाधित करती है। दूसरी ओर, सत्ता में बैठे नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में पारदर्शिता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

अंततः, लोकतंत्र की सार्थकता इसमें नहीं है कि कौन कितनी जल्दी इस्तीफा देता है, बल्कि इसमें है कि व्यवस्था चुनौतियों के बीच भी कैसे निरंतरता बनाए रखती है। ब्रिटेन का उदाहरण हमें सीख देता है कि यदि हम अति-संवेदनशीलता और निरंतर दबाव की संस्कृति को बढ़ावा देंगे, तो प्रशासन केवल अगली हेडलाइन को मैनेज करने में ही उलझा रहेगा। भारत के लिए भी यह एक दिशा-दर्शन है कि उत्तरदायी शासन और स्वतंत्र प्रेस के बीच एक ऐसा सेतु बने, जहां सवाल तो बेबाकी से पूछे जाएं, लेकिन सरकार की स्थिरता और राष्ट्र की कार्ययोजना को दांव पर न लगाया जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में छिपी है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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