हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८३ – विमर्श: योग दिवस… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – विमर्श: योग दिवस…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८३ ☆

☆ विमर्श: योग दिवस… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

योग क्या?

जोड़ना, संचय करना.

संचय क्या और क्यों करना?

सृष्टि का निर्माण और विलय का कारक है ‘ऊर्जा’, अत: संचय ऊर्जा का… लक्ष्य ऊर्जा को रूपांतरित कर परम ऊर्जा तक आरोहण कर पाना.

ऊर्जा संचय और योग में क्या संबंध है?

योग शारीरिक, मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को चैतन्य कर, उनकी वृद्धि करता है .फलत: नकारात्मकता का ह्रास होकर सकारात्मकता की वृद्धि होती है. व्यक्ति का स्वास्थ्य और चिंतन दोनों का परिष्कार होता है.

योग धनाढ्यों और ढोंगियों का पाखंड है.

योग के क्षेत्र में कुछ धनाढ्य और ढोंगी हैं. धनाढ्य होना अपराध नहीं है, ढोंगी होना और ठगना अपराध है. पहचानना और बचना अपनी जागरूकता और विवेक से ही संभव है, गेहूं के बोर में कुछ कंकर होने से पूरा गेहूं नहीं फेंका जा सकता. इसी तरह कुछ पाखंडियों के कारण पूरा योग त्याज्य नहीं हो सकता.

दैनिक जीवन की व्यस्तता और समयाभाव के कारण योग करने नहीं जाया जा सकता.

योग करने के लिए कहीं जाना नहीं है, न अलग से समय चाहिए. एक बार सीखने के बाद अभ्यास अपना काम करते हुए भी किया जा सकता है. कार्यालय, कारखाना, खेत, रसोई हर जगह योग किया जा सकता है, वह भी अपना काम करते-करते.

योग कैसे कार्य करता है?

योग मुद्राएँ शरीर की शिराओं में रक्त प्रवाह की गति को सुधरती हैं. मन को प्रसन्न करती है. फलत: थकान और ऊब समाप्त होती है. प्रसन्न मन काम करने पर परिणाम की मात्रा और गुण दोनों में वृद्धि होती है. इससे मिली प्रशंसा और सफलता अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देती है.

योग खर्ची ला है.

नहीं योग बिन किसी अतिरिक्त व्यय के किया जा सकता है. योग रोग घटाकर बचत कराता है.

कैसे?

योग से सही आसन सीख कर कार्य करते समय शरीर को सही स्थिति में रखें तो थकान कम होगी, श्वास-प्रश्वास नियमित हो तो रक्त प्रवाह की गति और उनमें ओषजन की मात्रा बढ़ेगी.फलत: ऊर्जा, उत्साह, प्रसन्नता और सामर्थ्य में वृद्धि होगी.

योग सिखाने वाले बाबा ढोंगी और विलासी होते हैं.

निस्संदेह कुछ बाबा ऐसे हो सकते हैं. उन्हें छोड़कर सच्च्ररित्र प्रशिक्षक को चुना जा सकता है. दूरदर्शन, अंतरजाल आदि की मदद से बिना खर्च भी सीखा जा सकता है.

योग और भोग में क्या अंतर है?

योग और भोग एक सिक्के के दो पहलू हैं. ‘दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’, जीने के लिए अन्न, वस्त्र, मकान का भोग करना ही होगा. बेहतर जीवन स्तर और आपदा-प्रबंधन हेतु संचय भी करना होगा. राग और विराग का संतुलन और समन्वय ही ‘सम्भोग’ है. इसे केवल दैहिक क्रिया मानना भूल है. ‘सम्भोग’ की प्राप्ति में योग सहायक होता है. ‘सम्भोग’ से ‘समाधि’ अर्थात आत्म और परमात्म के ऐक्य की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है. अत्यधिक योग और अत्यधिक भोग दोनों अतृप्ति, अरुचि और अंत में विनाश के कारण बनते हैं. ‘योग; ‘भोग’ का प्रेरक और ‘भोग’ ‘योग’ का पूरक है.

योग कौन कर सकता है?

योग हर जीवित प्राणी कर सकता है. पशु-पक्षी स्वचेतना से प्रकृति अनुसार आचरण करते हैं जो योग है. मनुष्य में बुद्धितत्व की प्रधानता उसे सर्वार्थ से दूर कर स्वार्थ के निकट कर देती है. योग उसे आत्म तत्व के निकट ले जाकर ब्रम्हांश होने की प्रतीति कराता है. कंकर-कंकर में शंकर होने की अनुभूति होते ही वह सृष्टि के कण-कण से आत्मीयता अनुभव करता है. योग मौन से संवाद की कला है. बिन बोले सुनना-कहना और ग्रहण करना और बाँट देना ही सच्चा योग है.

योग दिवस क्यों?

योग दिवस केवल स्मरण करने के लिए कि अगले योग दिवस तक योगरत रहकर अपने और सबके जीवन को बेहतर और प्रसन्नता पूर्ण बनाएँ.

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२१.६.२०१८

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५६ – आलेख – सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५६ ☆

☆ आलेख ☆ ~ सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सूर्य की किरणे शरीर को छुकर लौट पड़ी, लगा कि किसी ने जलते लाल तप्त लौह को बदन पर ही रख दिया हो। गनीमत बस इतनी थी कि किरणे छु कर ही निकल गयीं थीं। असंख्य – अनगिनत विषाणु -कीटाणु बिलबिला कर रह गये और यह कहते सुने गये कि हे भगवन् ! जान बची तो लाखों पाए।

हालांकि आधुनिक घोर शीतक यन्त्र से निकली बर्फ़ीली हवाओं से चिल्ड हो रहे कमरे से निकल कर बाहर आने की जुर्रत उसने मज़बूरी में ही कि थी। मन का सुकून शबाश पर था  लेकिन उसे यह पता नही था कि असंख्य दुश्मन भी सुकून से उसे चूस रहे थे। घुटनों और जोड़ों के दर्द से कराहते शरीर के पास बेचारा नींद आने से डर रहा था। एक गिलास दूध में घोल कर पिए गये सेसेस का इतना असर जरूर हुआ कि अगले कुछ दिनों- हफ्तों वह बिना दर्द के सो पाया।

पच्चास वर्ष पहले बचपन में अलगू चाचा को खुली पीठ को घंटों हल जोतते लेखक ने देखा था, जिनके नंगे बदन को सूर्य की यहीं घनघोर किरणे घंटो चूमती रहती थीं और वे ची करना तो दूर की बाद, पूर्बी की धुन में खो गये होते थे। उन असंख्य बिषाणुओं – किटाणुओं का दूर दूर तक पता नही लगता था, यूँ कहे सूर्य की तप्त किरणों में उनका अस्तित्व ही नही बचा था। अलगू चाचा का शरीर बिना बिस्तर बिछे बसखट पर जब एक बार गिरा तो उसके बाद वे चैन की वाली  दुनियां में जाकर भूल गये कि कोई दर्द वाली दुनियां भी होती है।

बैलो के गर्दन में बधे घुघुरुओ की आवाज ने उन्हें हौले से जगाया, तो ठंडी ठंडी भोर ने उनका आलिंगन करते हुए पूछा, अलगू चाचा पक्षियों का कलरव आपको कैसा लगा ?

♥♥♥♥

नोट : तब दादा की पीठ पर सूर्य की किरणे कहर बरसाती थी, लेकिन जिन्दगी रोग रहित चैन की थी, आज पोते के पीठ पर जब ए. सी  बर्फ जमाती है, लेकिन जिंदगी दर्द भरी, पीड़ा में है.

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२४ ⇒ ओज़ोन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ओज़ोन।)

?अभी अभी # १०२४ ⇒ आलेख – ओज़ोन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 OZONE 

मेरे घर से कुछ ही दूर, सर्विस रोड पर एक होटल है जिसका नाम ozone है! जाहिर है, अंग्रेजी नाम है तो हिंदी में तो लिखने से रहे। कभी शहर की सबसे पुरानी एक होटल थी, जिसका नाम लेन्टर्न था, आज यह होटल अतीत हो चुकी है, ठीक उसी तरह जैसे कभी इंदौर में मिल्की वे और स्टार लिट टॉकीज थे। वहीं पास में एक खूबसूरत जगह शबे मालवा भी थी। कुछ फिल्मों के शौकीन दर्शकों को शायद बेम्बिनो टॉकीज भी याद हो।

बाजारवाद और विज्ञापन की दुनिया में हम किसी ब्रांड से इतने जुड़ जाते है, कि उसके नाम को महज एक नाम मानकर आगे बढ़ जाते हैं। एक ईगल फ्लास्क आता था, जो उस समय हर घर की जरूरत था। वीआईपी तब केवल एक सूटकेस का नाम होता था। आजकल हर वीआईपी के हाथ में एक सूटकेस होता है।।

मैं कभी ozone होटल में गया नहीं, लेकिन जब भी इस होटल के सामने से गुजरता हूं, इसका नाम मुझे पर्यावरण की याद दिलाता है। होटल वाले अपने आसपास हरियाली बनाए रखते हैं, और सुरूचिपूर्ण साज सज्जा भी। आइए, इसी बहाने आज ozone की भी संक्षिप्त चर्चा कर ली जाए।

आप चाहें तो इसे ट्राई ऑक्सीजन भी कह सकते हैं। ऑक्सीजन के तीन अणुओं से बनी, एक रंगहीन और गंध हीन गैस है ओजोन, जो पर्यावरण का एक प्राकृतिक हिस्सा है। बोलचाल की भाषा में जितनी क्रीमी लेयर आम है, ओजोन परत, उतनी ही पर्यावरण के संबंध में खास है।

जब भी मौसम बईमान होता है, पहाड़ बर्फ विहीन होकर अपनी जगह छोड़ने लग जाते हैं, प्रकृति तांडव करने लग जाती है। समुद्र अपनी सीमाएं लांघकर, अठखेलियों की जगह उत्पात मचाने लगता है। एक ही मौसम में, गर्मी, आंधी, तूफान और बरसात का सामना एक साथ करना पड़ता है।।

जितनी चिंता हमें इस देश की और इसके पर्यावरण की है, उतनी शायद ही किसी को हो। स्वच्छ भारत अब नारा नहीं, एक हकीकत हो गया है। वृक्षारोपण ने भले ही समारोह की शक्ल ले ली हो, फिर भी आम आदमी हरियाली और पेड़ पौधों से प्यार करता है। लेकिन यह विकास की आंधी, कहीं न कहीं, पहले वृक्षों को उजाड़ती है और फिर वापस उन्हें उगाने की भी चिंता करती है।

प्राकृतिक और धार्मिक स्थानों तक दर्शक, श्रद्धालु ही नहीं, पर्यटक भी पहुंचे, इसलिए इन स्थलों का विकास भी जरूरी हो जाता है। जहां अधिक लोग, वहां अधिक सुविधा और इन सबसे ओजोन परत को बड़ी असुविधा। पहाड़ की ऊंचाइयों पर बर्फ जमता है, ग्लेशियर पिघलते हैं, नदियां निकलती हैं। पूरी सृष्टि का यही चक्र है।।

कुदरत से हम हैं, हम से कुदरत नहीं ! यह अमानत हमें विरासत में मिली है। अमानत में खयानत होगा अपराध, लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ के खिलाफ कोई कानून नहीं, कोई दंड नहीं। और तो और, जब बागड़ ही खेत को खाने लगे, तो खेत की रखवाली कौन करे।

इसलिए प्रकृति खुद कानून अपने हाथ में ले लेती है, वह पहले आगाह करती है, लेकिन जब कथित पर्यावरण का विनाश रथ, रुकने का नाम नहीं लेता, तो कयामत आ जाती है। यही वह दंड है, लेकिन यह लोभी, लालची इंसान कितना उद्दंड है।।

कल सुबह टहलते हुए हमने भी अपनी ozone होटल की खबर ली। कोरोना काल में यह बंद रही। वैसे भी कुछ विशिष्ट व्यक्ति ही यहां आते थे। इस होटल से हमारे जैसे लोगों की दूरी का एक ही कारण था, wine & dine

जो इनके विज्ञापन का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

हमें लगा, शायद यह होटल बंद होने के कगार पर है, लेकिन अचानक यहां फिर से चहल पहल शुरू हुई, पुरानी रौनक लौटी, लेकिन एक मामूली के बदलाव के साथ। जाहिर है, मालिक ही बदले होंगे, क्योंकि ozone होटल के wine & dine स्वरूप को अब थोड़ा बदल दिया गया है। किसी ने wine शब्द को काले रंग से ढंका नहीं, मिटा ही दिया है। अब केवल dine ही दिखाई देता है। मतलब अब यहां भोजन के साथ मदिरा पान नहीं।।

शायद यह एक संकेत है, ओजोन परत के साथ खिलवाड़ अब बंद होना चाहिए। पहाड़ों और तीर्थ स्थलों को अपने मूल स्वरूप में ही रहने दें। हर तरह की खाने पीने और मौज मस्ती की सुविधा मानवता को बहुत भारी पड़ ही रही है। हमारी ozone होटल तो शायद ठोकर लगने के बाद होश में आ जाए, हम कब होश में आएंगे, पूछता है पहाड़, पूछता है ग्लेशियर और पूछती है ट्राई ऑक्सीजन जिसे हम आम भाषा में पर्यावरण कहते हैं ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२६ ☆ बालश्रम निषेध के संदर्भ में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख बालश्रम निषेध के संदर्भ में। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन चढ़ी नाम खुमारी / स्वर- विभा जी योगाश्रम प्रस्तुति, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२६ ☆

☆ बालश्रम निषेध के संदर्भ में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

मज़दूरी इनकी मजबूरी

‘मज़दूरी इनकी मजबूरी’ एक विवादास्पद विषय है, जो अनेक प्रश्नों व समस्याओं को जन्म देता है। अनगिनत पात्र मनोमस्तिष्क में ग़ाहे-बेग़ाहे दस्तक देते हैं, क्योंकि लम्बे समय तक मुझे इनके अंग-संग रहने का अवसर प्राप्त हुआ है। यह पात्र कभी लुकाछिपी का खेल खेलते हैं; कभी करुणामय नेत्रों से निहारते हैं; कभी व्यंग्य करते भासते हैं– मानो विधाता के न्याय पर अंगुली उठा रहे हों।

—कैसा न्याय है यह? जब सृष्टि-नियंता ने सबको समान बनाया है— सब में एक-सा रक्त प्रवाहित हो रहा…तो हमसे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों? एक ओर बड़ी-बड़ी अट्टालिकायों में रहने वाले लब्ध- प्रतिष्ठित धनी लोग और दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले, खुले आकाश के नीचे ज़िन्दगी बसर करने वाले लोगों में इतनी असमानता क्यों? हमारे देश में इंडिया और भारत में वैषम्य क्यों… ये प्रश्न अंतर्मन को निरंतर कचोटते हैं तथा अत्यंत चिंतनीय, व विचारणीय हैं। जब हम मासूम बच्चों को मज़दूरी करते देखते हैं; तो आत्मग्लानि होती है। ढाबे पर बर्तन धोते; चाय व खाना परोसते, रैड लाइट पर गाड़ियां साफ करते; फल-फूल, खिलौने आदि खरीदने का अनुरोध करते; सड़क किनारे अपने छोटे भाई-बहिन का ख्याल रखते; जूठन को देख अधिक पाने के निमित्त एक-दूसरे पर झपटते-झगड़ते, मरने -मारने पर उतारू नंग-धड़ंग बच्चों को देख हृदय में उथल-पुथल ही नहीं होती, एक आक्रोश फूट निकलता। इतना ही नहीं, रेलवे स्टेशन पर बूट- पालिश करते; ट्रेन में अपनी कमीज़ से कंपार्टमेंट की सफाई करते व कंधे पर अखबार व मैगज़ीन का भारी-भरकम बोझ लादे बच्चों को देख, उनकी ओर ध्यान स्वतः आकर्षित हो जाता और हृदय उनकी मजबूरी के बारे में जानने को आतुर-आकुल हो, प्रश्नों की बौछार लगा देता है। बालपन में इन दुश्वारियों से जूझते मासूम बच्चों की अंतहीन पीड़ा व अवसाद के बारे में जानकर हृदय द्रवित हो जाता…कलेजा मुंह को आता। परंतु हम उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने के अतिरिक्त कुछ कर पाने में, स्वयं को विवश, असमर्थ व असहाय पाते हैं।

मुझे स्मरण हो रही है– एक ऐसी ही घटना, जब मैं गुवाहाटी की ओर जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में दिल्ली रेलवे-स्टेशन पर बैठी थी। सहसा बच्चों के एक हुजूम को वेश-भूषा बदलते; स्वयं को मिट्टी से लथपथ करते; घाव दर्शाने हेतु रंगीन दवा व मरहम लगाते; एक जैसी टोपियां ओढ़ते देख… मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पायी और एक बच्चे से संवाद कर बैठी। परंतु वह मौन रहा और थोड़ी देर के पश्चात् एक व्यक्ति उन सब के लिए भोजन लेकर आया। भोजन करने के पश्चात् वे अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए तथा उस बच्चे ने मेरी जिज्ञासा के बारे में अपने मालिक को जानकारी दी। वह मुझे देर तक घूरता रहा… मानो देख लेने की अर्थात् अंजाम भुगतने को तैयार रहने की चेतावनी अथवा धमकी दे रहा हो…और चंद मिनट बाद ही मुझे उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा।

बच्चे ट्रेन के अलग-अलग डिब्बों में सवार हो गए। परंतु उस गैंग के बाशिंदों ने मुझे ट्रेन में नहीं चढ़ने से बहुत समय तक रोके रखा। चार-पांच लोग, जिनमें एक युवती भी थी… वे सब ए•सी• कंपार्टमेंट के दरवाज़े के बीच रास्ता रोक कर खड़े हो गए और बड़ी ज़द्दोज़हद के पश्चात् मैं उनके व्यूह को तोड़, भीतर प्रवेश पाने में सफल हो पायी। मुझे सीट पर पहुंचने में भी उतनी ही कठिनाई का सामना करना पड़ा। टी•टी• के आने के पश्चात् मैंने टिकट निकालने के लिए जैसे ही पर्स में हाथ डाला, मैं सन्न रह गयी। मेरा मोबाइल व पैसे पर्स से ग़ायब हो चुके थे। ट्रेन  चलने के कारण मैं कोई कार्यवाही भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि जहां घटना घटित होती है; शिकायत भी वहीं दर्ज कराई जा सकती है। इस बीच  वे लोग अपने मिशन को अंजाम देकर उस डिब्बे से रफू-चक्कर हो चुके थे।

मैं हैरान-परेशान-सी पूरा रास्ता यही सोचती रही… कितने शातिर हैं वे लोग…जो इन बच्चों से भीख मांगने का धंधा करवाते हैं और यह बच्चे भी डर के मारे उनके इशारों पर नाचते रहते हैं। यह भी हो सकता है कि इनके माता-पिता इन कारिंदों से, रात को बच्चों की एवज़ में पैसा वसूलते हों। वैसे भी आजकल छोटे बच्चों को तो शातिर महिलाएं किराए पर ले जाती हैं …अपना धंधा चलाने के निमित्त और रात को उनके माता-पिता को लौटा जाती हैं… दिहाड़ी के साथ। जहां तक दिहाड़ी का संबंध है, बच्चों व महिलाओं को कम पैसे देने का प्रचलन तो आज भी बदस्तूर जारी हैं। वैसे भी बाल मज़दूरी तो दण्डनीय कानूनी अपराध है। परंतु इन बच्चों के सक्रिय योगदान के बिना तो बहुत से लोगों का धंधा चल ही नहीं सकता।

सुबह जब बच्चे, कंधे पर बैग लटकाए, स्कूल बस या कार में यूनीफ़ॉर्म पहनकर जाते हैं, तो इन मासूमों के हृदय का आक्रोश सहसा फूट निकलता है और वे अपने माता-पिता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर देते हैं। वे उन्हें स्कूल भेजने की अपेक्षा; उनके हाथ में कटोरा थमाकर भीख मांगने को क्यों भेज देते हैं? उनके साथ यह दोग़ला व्यवहार क्यों?

माता-पिता भाग्य व नियति का वास्ता देकर उन्हें समझाते हैं कि यह उनके पूर्व-जन्मों का फल है, सो! यह सब तो उन्हें सहर्ष भुगतना ही पड़ेगा। परंतु बच्चों को उनके उत्तर से संतोष नहीं होता। उनके कोमल मन में समानाधिकारों व व्यवस्था के प्रति आक्रोश उत्पन्न होता है और वे उन्हें आग़ाह करते हैं कि वे भविष्य में कूड़ा बीनने व भीख मांगने नहीं जायेंगे और न ही मेहनत-मज़दूरी करेंगे। वे भी शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं; उन जैसा जीवन जीना चाहते हैं। जब भगवान ने सबको समान बनाया है, तो हमसे यह भेदभाव क्यों? इस स्थिति में उनके माता-पिता मासूम बच्चों के प्रश्नों के सम्मुख निरुत्तर हो जाते हैं।

चलिए! रुख करते हैं–घरों में काम करने वाली बाईयों की ओर…जिन्हें उनके परिचित सब्ज़बाग दिखा कर दूसरे प्रदेशों से ले आते हैं और उन्हें बंधक बना कर रखा जाता है। चंद दिनों देह-व्यापार के धंधे में धकेल दिया जाता है; जहां उनका भरपूर शोषण होता है और वे नारकीय जीवन ढोने को विवश होती हैं। हां! कुछ नाबालिग़ लड़कियों को वे दूसरों के घरों में काम पर लगा देते हैं; जिसकी एवज़ में वे मोटी रकम वसूलते हैं। ग्यारह महीने तक वे उस घर में दिन-रात काम करती हैं। परन्तु जब वे घर छोड़ कर, चंद दिनों के लिए अपने गांव लौटती हैं, तो बहुत उदास होती हैं…भले ही काम करना इनकी मजबूरी होता है। परंतु धीरे-धीरे वे मालकिन की भांति व्यवहार करने लगती हैं, जिसका ख़ामियाज़ा घर के बुज़ुर्गों को ग़ाहे-बेग़ाहे अपने आत्म-सम्मान को दांव पर लगा कर चुकाना पड़ता है, क्योंकि वे तो अनुपयोगी अर्थात् बोझ होते हैं। सारे घर का दारोमदार तो उन काम वाली बाईयों के कंधों पर होता है और वे तो घर-परिवार के लिए प्राण-वायु सम होती हैं। सो! आजकल तो इनकी मांग ज़ोरों पर है। इसलिए वे बहुत  अधिक भाव खाने लगी हैं।

परंतु कई घरों में तो उनका शोषण किया जाता है। दिन-रात काम करने के पश्चात् उन्हें पेट-भर भोजन भी नहीं दिया जाता। साथ ही उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है; मारा-पीटा जाता है और शारीरिक- शोषण तक भी किया जाता है। अक्सर उनकी तनख्वाह भी वे कारिंदे वसूलते रहते हैं। सो! वे मासूम तो अपनी मनोव्यथा किसी से कह भी नहीं सकतीं। जुल्म सहते-सहते, तंग आकर वे भाग निकलती हैं और आत्महत्या तक कर लेती हैं। सो! आजकल तो एजेंटों का यह धंधा भी खूब पनप रहा है। वे लड़की को किसी के घर छोड़ कर साल-भर का एडवांस ले जाते हैं और चंद घंटों बाद, अवसर पाकर वह लड़की अपने साथ कीमती सामान व नकदी लेकर भाग निकलती है। मालिक बेचारे पुलिस-स्टेशन के चक्कर लगाते रह जाते हैं, क्योंकि उनके पास तो उनका पहचान-पत्र तक भी नहीं होता। वहां जाकर उन्हें आभास होता है कि वे ठगी के शिकार हो चुके हैं। सो! उस स्थिति वे प्रायश्चित्त करने के अतिरिक्त कर ही क्या सकते हैं।

परंतु बहुत से बच्चों के लिए मज़दूरी करना, उनकी मजबूरी बन जाती है… विषम पारिवारिक परिस्थितियों व आकस्मिक आपदाओं व किसी अनहोनी के घटित हो जाने के कारण; उन मासूमों के कंधों पर परिवार का बोझ आन पड़ता है और वे उम्र से पहले बड़े हो जाते हैं। यदि उन्हें मज़दूरी न मिले, तो असामान्य परिस्थितियों में परिवार-जन ख़ुदकुशी तक करने को विवश हो जाते हैं। इसलिए भीख मांगने के अतिरिक्त उनके सम्मुख दूसरा विकल्प शेष नहीं रहता। परन्तु कुछ बच्चों में आत्म-सम्मान का भाव अत्यंत प्रबल होता है। वे मेहनत-मज़दूरी करना चाहते हैं, क्योंकि भीख मांगना उनकी फ़ितरत नहीं होती और उनके संस्कार उन्हें झुकने नहीं देते।

चंद लोग क्षणिक सुख के निमित्त अपनी संतान को जन्म देकर सड़कों पर भीख मांगने को छोड़ देते हैं। अक्सर वे बच्चे नशे के आदी होने के कारण अपराध जगत् की अंधी गलियों में अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। वे समाज में अव्यवस्था व दहशत फैलाने का उपक्रम करते हैं तथा वे बाल-अपराधी रिश्तों को दरकिनार कर, अपने माता-पिता व परिवारजनों के प्राण तक लेने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। लूटपाट, फ़िरौती, हत्या, बलात्कार, अपहरण आदि को अंजाम देना इनकी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। मुझे ऐसे बहुत से बच्चों के संपर्क में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। लाख प्रयास करने पर भी मैं उन्हें बुरी आदतों से सदैव के लिए मुक्त नहीं करवा पाई। ऐसे लोग वादा करके अक्सर भूल जाते हैं और फिर उसी दल-दल में लौट जाते हैं। उनके चाहने वाले दबंग लोग उन्हें सत्मार्ग पर चलने नहीं देते, क्योंकि इससे उनका धंधा चौपट हो जाता है।

‘मज़दूरी इनकी मजबूरी’ अर्थात् ऐसे सत्पात्रों पर विश्वास करना कठिन हो गया है, क्योंकि आजकल तो सब मुखौटा धारण किए हुए हैं। अपनी मजबूरी का प्रदर्शन कर लोगों की सहानुभूति अर्जित कर, उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर उन्हें लूटना… उनका पेशा बन गया है। वे बच्चे; जिन्हें मजबूरी  के कारण मज़दूरी करनी है– सचमुच वे करुणा के पात्र हैं। समाज के लोगों व सरकार के नुमाइंदों को उनकी सहायता-सुरक्षा हेतु हाथ बढ़ाने चाहिएं, ताकि स्वस्थ समाज की संरचना संभव हो सके और हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हो सके… मानव- मूल्यों का संरक्षण हो सके तथा संबंधों की गरिमा बनी रहे। स्नेह, प्रेम, सौहार्द, सहयोग,परोपकार, सहनशीलता, सहानुभूति आदि दैवीय गुणों का समाज में अस्तित्व कायम रह सके। इंसान के मन में दूसरे की मजबूरी का लाभ उठाने का भाव कभी भी जाग्रत न हो और समाज में समन्वय, सामंजस्य व समरसता का साम्राज्य हो। मानव स्व-पर और राग-द्वेष से ऊपर उठकर एक अच्छा इंसान बन सके।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगी, यदि हम सब मिलकर प्रयासरत रहें और एक बच्चे की शिक्षा का दायित्व- निर्वहन कर लें, तो हम दस में से एक बच्चे को अच्छा प्रशासक, अच्छा इंसान व अच्छा नागरिक बना पाने में सफलता प्राप्त कर सकेंगे और शेष बच्चे भले ही जीवन की सुख-सुविधाएं जुटाने में सक्षम न हों;  शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् आत्म- सम्मान से जीना सीख जाएंगे और अपराध-जगत् की अंधी गलियों में भटकने से बच पायेंगे। निरंतर अभ्यास, अथक परिश्रम व निरंतर प्रयास के द्वारा, हमारा  मंज़िल पर पहुंचना निश्चित है। सो! हमें इस मुहिम को आगे बढ़ाना होगा, जैसा कि हमारी सरकार इन मासूम बच्चों के उत्थान के लिये नवीन योजनाएं प्रारम्भ कर रही है; जिसके अच्छे परिणाम हमारे समक्ष हैं। परंतु सकारात्मक परिणामों की प्राप्ति के लिए संविधान में संशोधन करना अपेक्षित व अनिवार्य है। हमें जाति-विशेष को प्रदत्त आरक्षण सुविधा को समाप्त करना होगा; जिसे संविधान के अनुसार केवल दस वर्ष के लिए दिया जाना सुनिश्चित किया गया था। परंतु हम आज तक वैयक्तिक स्वार्थ व लोभ-संवरण के विशेष आकर्षण व मोह के कारण उससे निज़ात नहीं पा सके हैं। सो! हमें अच्छी शिक्षा-प्राप्ति व जीवन-स्तर उन्नत करने के निमित्त, उन्हें आर्थिक-सुविधाएं प्रदान करनी होंगी, ताकि उनमें हीन-भावना घर न कर सके। देश की अन्य प्रतिभाओं को भी प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर समान अवसर प्रदत्त हों और प्रतिस्पर्द्धा में निर्धारित अहर्ताओं के मापदंडों पर सब खरे उतर सकें तथा जाति-पाति के भेदभाव को नकार, वे भी  सिर उठा कर कह सकें…’हम भी किसी से कम नही।’

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२३ ⇒ हुस्न और इश्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हुस्न और इश्क।)

?अभी अभी # १०२३ ⇒ आलेख – हुस्न और इश्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ऐ हुस्न ज़रा जाग, तुझे इश्क जगाए ! और अगर हुस्न नहीं जागे, तो इश्क क्या करे। बस, ठंडी आहें भरे। हुस्न जब सोता है, बड़ा मासूम होता है। जागता है, सीधा आईने के पास जाता है। आइना नहीं, हुस्न नहीं। आईने की कोई सूरत नहीं होती, हुस्न को अपनी ही सूरत पर गुमान होता है, गुरूर होता है। हुस्न को यकीन है, आइना झूठ नहीं बोलता।

अगर हुस्न जाग जाए, और इश्क सो जाए, तो इश्क को कौन जगाए। हुस्न एक आग है, जिसमें वह खुद नहीं जलता। सुबह का सूरज उसी हुस्न की एक आग है। वह एक ऐसा आफताब है, जिसे देख कुदरत अंगड़ाई लेती है। इश्क जाग उठता है। इश्क सुबह के सूरज की इबादत करता है। फूल खिलते हैं, कलियां मुस्कुराती हैं, भंवरे गुनगुनाते हैं। हुस्न का जलवा ही सूर्योदय है।।

जैसे जैसे सूरज आसमान पर चढ़ता है, उसका हुस्न परवान चढ़ता है। वह तपकर आग का गोला हो जाता है। हमने जलवा दिखाया तो जल जाओगे। आप उस जलवे से आंख नहीं मिला सकते। हुस्न की आग से नज़रें मिलाई नहीं जाती, नजर झुकाकर भी इश्क किया जाता है।

हुस्ने जाना इधर आ, आइना हूं मैं तेरा। इश्क हुस्न को परदे में रखना चाहता है, उसे पूजना चाहता है। उसके हुस्न को किसी की नजर ना लगे, उसे ताले में बंद करना चाहता है। घूंघट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे। जो हुस्न आग है, आफताब है, पाक साफ है, क्या उससे नज़रें मिलाना इतना आसान है।।

बाल कृष्ण ने मिट्टी क्या खाई, माता यशोदा ने गुस्से में जो नंदलाला का मुंह खोला, तो होश खो बैठी। वहां कृष्ण की लीला थी या जलवा था। माया अपना काम कर गई। यशोदा जान तो गई, लेकिन किसी को बताने की स्थिति में भी नहीं रही।

अर्जुन ने भी देखा था सारथी नटवर श्रीकृष्ण के हुस्न का जलवा कुरुक्षेत्र में, जब वह शस्त्र छोड़, शरणागत हो गया था।

कृष्ण का विराट स्वरूप जब सामने आया तो होश उड़ गए।।

हुस्न से चांद भी शरमाया है।

सूरज अगर आग है तो चंद्रमा

शीतलता का प्रतीक ! चंद्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं। सूरज की ही परछाई है वह। ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें। चांद से बेहतर ही है यह जमीं, क्योंकि यहां सूरज की रोशनी है, जीवन है, प्राण है, प्रेम है, शांति है। जहां भी तेज है, ओज है, रोशनी है, प्रकाश है, सब सूरज का ही जलवा है। हुस्न के कई रूप हैं, कई रंग हैं। कोई सच्चा आशिक ही उसको पहचान पाता है।

सुंदरता में प्रेम है, भक्ति है, समर्पण है। सब में रब तो बाद में होगा, क्यों न सब रब में ही समा जाए। पहले किसी से दिल तो लगे, फिर शुरू हो दिल्लगी। हुस्न का जलवा हो, तो हम भी कर लें बंदगी ;

आशिक हूं तेरे दर का

ठुकरा मुझे ना देना।

आया हूं बन भिखारी

झोली तो भर ही देना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९० ☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९० ☆

☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भारतीय संस्कृति में पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, आध्यात्मिक साधना, आत्ममंथन और पुण्य संचय का विशेष अवसर माना गया है। यह अतिरिक्त मास चंद्र और सौर गणना के संतुलन के लिए जोड़ा जाता है तथा भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण “पुरुषोत्तम मास” कहलाता है। धर्मग्रंथों में इस माह को जप, तप, दान, सत्संग और सेवा के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।

भारतीय परंपरा में धर्म केवल मंदिरों और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति की रक्षा को भी पुण्यकर्म माना गया है। पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित इस सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी आध्यात्मिक साधना का ही एक रूप है। इसलिए पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि के साथ-साथ प्रकृति-संरक्षण का भी संदेश देता है।

इस पावन अवधि में वृक्षारोपण, पौधों की सेवा, पक्षियों के लिए जल-पात्र रखना, जलस्रोतों की स्वच्छता, नदी-तालाबों के संरक्षण का संकल्प लेना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना भी श्रेष्ठ सेवा मानी जा सकती है। जब हम एक पौधे को रोपते हैं या किसी जलस्रोत को स्वच्छ रखने का प्रयास करते हैं, तब वह केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं होता, बल्कि सृष्टि के प्रति हमारी श्रद्धा का भी परिचायक बनता है।

आज जब प्रकृति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पुरुषोत्तम मास हमें यह स्मरण कराता है कि ईश्वर की आराधना और प्रकृति की सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सच्ची भक्ति वही है जो मानव, जीव-जंतु और प्रकृति—सभी के कल्याण का भाव अपने भीतर समेटे। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही पुरुषोत्तम मास की वास्तविक सार्थकता भी।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२२ ⇒ कुएं में भांग..!! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुएं में भांग..!!।)

?अभी अभी # १०२२ ⇒ आलेख – कुएं में भांग..!! ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

याद आया, कॉफी हाउस के उन दिनों, सभी समाचार पत्र चाटने, कई प्याले कॉफी उदरस्थ करने, और घंटों बहस के बाद भी जब कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था तो अंत में सभी पराजित वक्ता इस बात पर आम सहमति व्यक्त करते थे, कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता, पूरे कुएं में ही भांग पड़ी है।

अपनी इस उपलब्धि पर मानो एक दूसरे को बधाई देते हुए, कल फिर मिलने के वादे के साथ, कॉफी हाउस की सुबह की सभा विसर्जित होती थी।

तब लोगों के पास आज की तरह एंड्रॉयड फोन नहीं था और ना ही घर में बुद्धू बक्सा। बस अखबार, रेडियो, लाइब्रेरी और चंद दोस्तों का ही सहारा था, जो बिना मुहूर्त के कभी भी साइकिल पर मुंह उठाए चले आते थे।

कटिंग कराने निकला था, अण्णा के यहां बहुत भीड़ थी, सोचा भाभी के हाथ की गर्मागर्म चाय पी ली जाए।।

हमने कुएं का पानी भी पाया है और भांग भी खाई है। गांव के कुएं का पानी सिर्फ मीठा ही नहीं होता था, पाचक भी होता था। लगता था वाकई उसमें भांग मिली है। दिन भर मस्ती ही मस्ती रहती थी। जो खाओ सब हजम। तब कहीं महंगाई और भ्रष्टाचार नजर नहीं आता था। नीम, आम और पीपल की छांव में कहां का तनाव। ठंडी हवा में घोड़े बेचकर सोते थे।

कब हम गांव से शहर और कुएं से ट्यूब वेल के पानी पर आ गए, पता ही नहीं चला। इंसान की बात छोड़िए, पीने के पानी पर भी भरोसा नहीं रहा। घर घर और दफ्तर में हेमा जी का KENT ब्रांड एक्वागार्ड हमारी प्यास बुझाने लगा।

सार्वजनिक प्याऊ का स्थान बिसलेरी ने ले लिया। मुल्क इतना आगे निकल गया है कि कुएं में भांग ढूंढते रह जाओगे।।

आजकल अधिकतर बहस टीवी पर, और सोशल मीडिया पर होती है जिसमें व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, फेसबुक और ट्विटर का अधिक योगदान है। पहले की बौद्धिक बहस आज सिर्फ राजनीतिक बहस बनकर रह गई है। बिना एक दूसरे को अच्छी तरह जाने पहचाने, फेसबुक पहले तो उन्हें आपस में जोड़ देती है और फिर बाद में उन्हें अकेला छोड़ देती है। कभी घर से बाहर नहीं निकलने वाले इंसान के हवा में हजारों फेसबुक फ्रेंड बन जाते हैं। और फिर दौर शुरू होता है विचारों के आदान प्रदान का। कहीं अपेक्षा तो कहीं उपेक्षा, कहीं व्यर्थ की बहस तो कहीं अनफ्रेंड और ब्लॉक की नौबत।

आज की परिस्थिति के लिए हम किसी कुएं अथवा भांग को दोष नहीं दे सकते। जब हवा और पानी दोनों में ही प्रदूषण हो, खाद्य पदार्थों में मिलावट के साथ साथ ही, केमिकल फर्टिलाइजर का जहर हो, और सामाजिक और राजनीतिक जीवन में धर्म और राजनीति का नशा हो, तो आप किस कुएं को दोष दोगे और बेचारी भांग क्या करेगी।।

कुआं और भांग हमारे जीवन का कभी सात्विक नशा था। वह छोड़कर आज हम वैचारिक रूप से भी इतने प्रदूषित हो गए हैं कि जिस डगर पर कभी प्रेम गगरी छलका करती थी आजकल उस राह पर नफरत के जहर भरे घड़े, सजाकर रखे हुए हैं।

और लोग बेचारे मजबूरन उन्हीं घड़ों से अपनी प्यास और बढ़ा रहे हैं। लोहे को लोहे से काटा जा रहा है। जहर का इलाज भी जहर से ही किया जा रहा है। इसे कहते हैं, कांटे से कांटा निकालना।

ऐसे में कहीं से अगर आवाज आए, कोई पीयो रे पियाला राम रस का, तो किसे फुर्सत जो निंदा रस छोड़ प्रेम रस का पान करे। धर्म और राजनीति के नशे के अलावा यह सरकार सभी नशों के खिलाफ है। जिन कुओं में कभी भांग थी उन्हें बुलडोजर के हवाले किया जा रहा है। सरकारी ठेके की दुकानें हैं नशा करने के लिए देसी और विदेशी दोनों।।

भांग का नशा इंसान को निकम्मा कर देता है। कुएं में भांग थी इन सत्तर सालों में, इसीलिए हम कुछ कर नहीं पाए। नशा रहित शुद्ध जल जल्द ही घर घर पहुंच रहा है। अब किसी कुएं में भांग नहीं है। शुद्ध पेय जल समय की मांग है। होश में आएं। व्यर्थ समय ना गंवाएं..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२१ ⇒ फ़जी़हत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फ़जी़हत…।)

?अभी अभी # १०२१ ⇒ आलेख – फ़जी़हत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

फजीहत अरबी शब्द है !

जौहरि की गति जौहरी जाने, की जिन जौहर होय, की तरह जब तक किसी की फजीहत नहीं होती, वह इसका दर्द नहीं जान सकता। आप चाहें तो इसे शारीरिक संत्रास कह सकते हैं, और चाहें तो मानसिक भी। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में, बिना किसी पूर्व सूचना के, किसी भी पल, कोई भी

इस अवस्था का शिकार हो सकता है।

जहां सभी सुविधा, सावधानी और सूझ बूझ काम नहीं आती तब अचानक ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती है, जिसे आप फजीहत कह सकते हैं। इस अवस्था में कोई भी सर्व गुण संपन्न व्यक्ति लाचार और असहाय, परेशान सा, केवल उसे झेलता रहता है, लेकिन परिस्थिति सामान्य होने पर अपनी उस स्थिति का बखान करना नहीं भूलता, क्योंकि फजीहत में हमारा नुकसान कम, झल्लाहट अधिक होती है।।

किसी जरूरी काम के लिए घर से बाहर निकलना, द्वि – चक्र वाहन को पंक्चर देखना, चार पहिया वाहन की चाबी नहीं मिलना, साइकिल तक में हवा नहीं होना, और किसी तरह ऑटो करके उस काम को सम्पन्न करने की कोशिश करना, लेकिन उसमें भी, अगर किसी अप्रत्याशित घटना के कारण, सफलता हाथ ना लगे, और खाली हाथ वापस घर आना पड़े, तो इसे क्या कहेंगे। चलो, कोई बात नहीं, अगली बार देखेंगे !

जब हमारा मूड अच्छा होता है, तो विपरीत परिस्थितियां भी रास आती हैं, लेकिन अगर हम किसी कारण पहले से ही परेशान हैं, और उसमें अगर ऐसी स्थिति निर्मित होती है, तो हम असहज होकर भड़क उठते हैं। सिस्टम, समय, परिस्थिति और मानसिक संतुलन, सब गड़बड़ा जाता है।।

जब हालात बुरे होते हैं तो समय भी खराब चल रहा होता है। पिछले दस बारह सालों से हमारा समय अच्छा चल रहा है। क्या दिन थे वो भी। गर्मी की उमस भरी रातों में, किसी फॉल्ट के कारण, रात रात भर के लिए बिजली चली जाती थी। इन्वर्टर, इमरजेंसी लाइट, चार्जर और मोबाइल भी कब तक कम करते। परेशान हो, बिजली विभाग को कोसते हुए लोग सड़कों पर निशाचर की तरह, हवा खाने निकल पड़ते। आप क्या जानो डिजिटल इंडिया वालों, फजीहत क्या होती है।

गर्मी के मौसम में देसी खट्टे मीठे आमों से एक स्वादिष्ट मसालेदार व्यंजन बनता है, जिसे फजीता कहते हैं। इसमें आम तो आम, गुठलियों के दाम भी वसूल हो जाते है। इतना शानदार फजीता, कि समझ में ही नहीं आता, पहले गुठलियां चूसें अथवा पहले उंगलियां चाटें। अब गुठली तो आप चम्मच से नहीं चूस सकते ना। हेल्थ, हाइजीन वाले फजीते से बचें, वर्ना उनका फजीता भी बन सकता है।।

फजीहत और फजीते के परिवार में एक सदस्य और है जिसे फालूदा कहते हैं। खाने में यह स्वादिष्ट लगता है। मीठी रसभरी सिवैंया का जब ठंडी, रबड़ी – मलाईदार कुल्फी से मेल होता है, तब फालूदा का जन्म होता है।

नीमा जी की फालूदा कुल्फी खाएं, खुद जान जाएं।

लेकिन परेशानी तब होती है जब किसी की इज्जत का फालूदा निकल जाता है। किसी की फजीहत हो, चलेगी, फजीता बन जाए वहां तक भी ठीक है, लेकिन इज्जत का फालूदा ? ना बाबा ना ! Never, पक्का नको। आई शप्पथ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२० ⇒ वक्त की रफ़्तार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वक्त की रफ़्तार।)

?अभी अभी # १०२० ⇒ आलेख – वक्त की रफ़्तार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरी भाषा एक है, लेकिन परिभाषा अनेक ! मैं कभी बी.आर.चोपड़ा का वक्त हूं तो कभी महाभारत का समय। मैं ही काल हूं, मैं ही महाकाल, और मैं ही कोविड – 19 नाम से डिफेम और बदनाम कोरोना काल। जब आपकी कलाई में घड़ी बनकर शोभायमान होता हूं, तो रोजाना हर पल आपको टाइम बताता हूं। पल पल आपके पास, मैं रहता हूं। वक्त कितना आपके पास, मैं कहता हूं।

मेरी शान में साहिर साहब ने कई कसीदे गढ़े हैं। मैने आपको जितना नहीं डराया, उससे अधिक तो साहिर आपको डरा गए। आदमी को चाहिए, वक्त से डरकर रहे, कौन जाने किस घड़ी, वक्त का बदले मिजाज। इंसान कभी अपने मिजाज को नहीं देखता, वह कितना खराब है, कभी अंदर झांककर नहीं देखता। खुद बड़ा दूध का धुला हुआ है, जो कह उठता है, अभी वक्त बुरा चल रहा है।।

वैज्ञानिक हवा, प्रकाश, और ध्वनि तो ठीक, विद्युत की तरंगों तक की गति नाप लेते हैं, लेकिन कभी मेरी रफ्तार नहीं नाप पाए। विद्वानों ने समय की गणना तो कर ली, मेरे पल पल का हिसाब भी रख लिया, उधर आपने पलक झपकी, इधर मेरा एक पल पूरा हुआ। आप किसी को अपलक निहारते रहे, मानो समय ठहर गया हो, लेकिन मैं नहीं ठहरा। मेरी गति कोई नहीं जान पाया। मेरे आगे भी समय है, और पीछे भी समय। जब खुशी के पल होते हैं, तो मेरे पंख लग जाते हैं। बच्चों की गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्द खत्म हो जाती है। पत्नी मायके कुछ रोज के लिए जाती है। वक्त कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चलता। मजबूरी में बाबुल का घर छोड़ना ही पड़ता है। गोरी ससुराल चली।

अभी ना जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं ! काश वक्त ठहर जाता। कुछ लोग बचपन याद करते हैं तो कुछ अतीत के स्वर्णिम पलों को याद करते हैं। ५० साल पुराना, शादी का एलबम सामने खुला हुआ है, और आईने में आज की खुद की तस्वीर नजर आ रही है। रेडियो पर गीता दत्त का गीत बज रहा है। वक्त ने किया, क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम। वक्त ने बूढ़ा कर दिया, वर्ना गालिब, हम भी कभी जवान थे।।

इसके विपरीत, दुख के पलों में समय ठहर सा जाता है। दुख के, अब दिन बीतत नाहिं ! क्या दिन भी पहाड़ जैसे हो सकते हैं, क्या गम की रातें इतनी लम्बी भी हो सकती हैं, कि कभी उनकी सहर ही ना हो। वक्त के रहते यह मुमकिन नहीं। दुख की रात भले ही लंबी हो, फिर भी सुबह तो होगी ही। वक्त कितना भी खराब चल रहा हो, अच्छे दिन तो आएंगे ही। आपने देखा नहीं, कितना वक्त गुजर गया, अभी भी लोगों को भरोसा है, मेरे करन अर्जुन आएंगे, जरूर आएंगे।

जो समय के साथ चलना जानते हैं, वे कभी समय से नहीं पिछड़ते। जो समय के पाबंद होते हैं, वक्त भी उनकी कद्र करता है। कभी समय को भी अपना साथी बना लें। समय अच्छा कटेगा। सुख दुख में अगर समभाव बना रहे तो समय भी दोस्त बन जाता है ;

चले थे साथ मिलकर

चलेंगे साथ मिलकर

तुम्हें रुकना पड़ेगा

मेरी आवाज सुनकर

जब छोटे थे, तो आपस में स्टेच्यू स्टेच्यू खेलते थे। इधर स्टेच्यू बोला, और उधर उसी स्थिति में सामने वाले को तब तक रहना पड़ता था, जब तक ओवर नहीं बोल दिया जाता। हमारी स्टॉप वॉच घड़ी के समय को रोक सकती है, लेकिन समय की घड़ी को नहीं। आइए, समय की घड़ी से दोस्ती करें। वही अनमोल घड़ी है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८१ – देश-परदेश – गधे पंजीरी खाए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८१ ☆ देश-परदेश – गधे पंजीरी खाए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वर्षों से ये कहावत सुनते आ रहे थे। आज घर के पास वाले उद्यान में नगर निगम द्वारा कुत्तों पर जल से छिड़काव करते हुए देखा, तो गधे पंजीरी खाए वाली कहावत याद आ गई।

इतनी भीषण गर्मी में यदि कुत्तों पर पानी से वर्षा की गई है, तो उसमें कुछ बुराई भी नहीं है। हमारे उद्यान के फुरसतिया साथियों ने तो नगर निगम के बुराईयों के पिटारे खोल दिए। घरों में पानी की सप्लाई बहुत कम है, और यहां कुत्ते पानी में अठखेलियां कर रहे हैं।

एक साथी ने तो झुग्गी झोपड़ी वालों के लिए वकालत कर दी। जितने मुंह उतनी बातें, कोई कहने लगा ये सब उच्चतम न्यायालय के कारण हो रहा है, उन्होंने कुत्तों को कुछ अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इंसानों को छोड़ जानवरों पर न्यायायलय दया दिखा रहा है।

एक बैंकर मित्र बोले हमारा पेंशन का मामला वर्षों से न्यायालय के विचाराधीन है, उस पर उच्चतम न्यायालय ने आंखें मूंद रखी है, और यहां कुत्तों, कबूतरों पर नित नए निर्णय आ रहे हैं।

हम उद्यान के सभी साथियों ने नगर निगम के जल वाहन चालक को घेर लिया, और उसको पूछा इन कुत्तों पर क्यों पानी व्यर्थ कर रहे हो उसने स्पष्ट किया वो तो उद्यान की घास पर जल छिड़काव कर रहा हैं, कुत्ते तो बिन बुलाए बाराती हैं, और बारात में नृत्य कर आनंद ले रहे हैं। आप बुजर्ग लोग क्यों परेशान हो रहे हो, उद्यान का आनंद लो, ओर प्रभु का नाम भजो।

बात, तो उस वाहन चालक की एकदम सही है। हम बुजर्ग हमेशा खामखां ही परेशान रहते हैं।

© श्री राकेश कुमार

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