(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – जीवनसूत्र
पानी उथला हो तो उछाल मारता है, गहरा मंद-मंद बहता है। मनुष्य के शरीर में लगभग 60 प्रतिशत जल होता है।
जो पिंड में, वही बिरमांड में। मनुष्य और पानी का अंतर्सम्बंध समझ लो तो जीवन को जीने का सूत्र मिल जाता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ आलेख ☆ ~ बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(क्रांतिकारियों की कहानी – श्रेयस की जुबानी)
☆
१९ अगस्त बलिया बलिदान दिवस है। यानी १९ अगस्त १९४२ को जब पूरे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का शासन था, यूँ कहे अपना बृहद भारत अंग्रेजी दासता के अधीन गुलाम था।
मैं कहानी कह रहा हूँ उस वक्त की, कि जब पूरे देश में क्रांति की ज्वाला जल उठी थी।
बलिया का अपना एक अलग इतिहास रहा है। पौराणिक काल से लेकर आज तक इस जनपद ने समय-समय पर कुछ नया कर दिखाया है। तभी तो हमारे जिले में आज भी युवाओं के मुंह से एक आवाज निकल जाती है।
“सब जिला जिला ह, हमार जिला बलिया ह”..
और इसके बाद एक नारा लगता है..”बोल बोल भृगु बाबा की जय”
आखिर सब जिला, जिला ह, त बलिया हमार जिला खास काहे ह..
इसका उत्तर मुझे जो समझ में आया वह यह कि-
जैसा कि पुराणो में विदित है कि बलिया भक्त प्रहलाद के पौत्र असुरराज बली की राजधानी हुआ करती थी। वही राजा बलि जिनके १०८ यज्ञॉ के प्रभाव ने देवराज इंद्र के भी सिंहासन को हिला कर रख दिया था, जिसके कारण भगवान विष्णु को वामन स्वरूप में दानवीर बलि के यहाँ याचक के रूप में आना पड़ा था। चूँकि राजा बलि ने १०८ यज्ञ किए थे, जिसके चलते बलिया का नाम बलियाग फिर कालांतर में बलिया पड़ा। महर्षि भृगु और भगवान विष्णु की कहानी को तो हम सभी जानते हैं,। उसके बाद १९५७ में पंडित मंगल पाण्डेय का बाकी तेवर ने मेरठ छावनी में बगावत करते हुए अंग्रेज ऑफिसर को गोली मार दिया। बाद में उन्हें फांसी हुई और आजादी का यह ऐतिहासिक बलिदान बलिया के खाते में जुड़ गया, फिर आता है वर्ष १९४२,.. वर्ष १९४२ में बलिया आज ही के दिन 19 अगस्त को बलिया चार दिनों के लिए आजाद हो गया था। फिर आया इमरजेंसी कॉल जब बलिया के लोकनायक जयप्रकाश नारायण का बिगुल बजा था और तरुणाई जग गई। इसके बाद समय-समय पर कोई न कोई ऐसे महापुरुष हुए, और उन्होंने कुछ ऐसा किया कि उनका नाम इतिहास में जुड़ गया जैसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर जी जैसे महापुरुषों को इस धरती ने जन्मा, जिन्होंने बलिया को अपनी अलग पहचान दी। यह पहचान का सिलसिला अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
आज १९ अगस्त है, अब भी अगस्त का महीना अपनी पहचान पर कायम। बलिया नित नवीन इतिहास और नवभारत का इतिहास लिख रहा। हम ऐसे महापुरुषों को हम नमन करते हैं।
बलिया में क्रांति का बिगुल कैसे बजा? इसके सार संक्षेप में कहते हुए यदि हम आगे बढ़ते हैं तो कहानी कुछ यूँ बनती है-
९ अगस्त को रेडियो की खबरों के द्वारा पता चला कि महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी है, और पूरे देश में जरूर क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। इसमे बलिया पीछे नही था लेकिन बलिया की क्रांति कुछ हटकर हुई, क्योंकि… बात तो वही है कि –सब जिला जिला ह..
इस कहानी को बताने पहले मैं एक ऐसे एक दो जीवित क्रांतिकारी के मुंह से सुनी हुई कहानी से इसका प्रारंभ करना चाहता हूँ जिनके साथ मुझे कुछ वक्त बिताने का अवसर मिला और उनके मुंह से कही हुई बात, उनके पौत्र श्री रजनीश सिंह जी की जुबानी है इसे आपके बीच में रख रहा हूँ, यह हम सभी की जानकारी हेतु जरूर विशेष होगी।
मैं बात कर रहा हूं जनपद बलिया के तहसील बांसडीह के अंतर्गत आने वाले गांव कैथवली के बाबू रामदयाल सिंह की जुबानी। मैं उनके नजदीक इसलिए भी हूं कि उनकी नतिनी (बेटी की बेटी) की शादी मुझसे हुई थी। और जब कभी हम लोग एक पास बैठते थे वे अक्सर वे अपनी पुरानी यादों को साझा किया करते थे.
उस वक्त चंद परिवारों को छोड़कर अन्य सामान्य परिवार आर्थिक तंगी में रहता ही था। कुछ खेती बारी होने के बावजूद भी लोगों को अपनी आर्थिक जरूर पूरा करने के लिए बाहर जाना होता था। विशेष रूप से बलिया की यह विशेषता ही रही। गंगा,सरयू (घाघरा) और तमसा (टोंस) जैसी नदियों से घिरे हुए इस जनपद, के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हुए बार-बार बेघर हो जाया करते थे। हर बार जब घर लौट कर आते तो एक छप्पर डालते, एक छोटा सा नव सृजित फूस के घरों से बने का गाँव को बनाते तो कोई दुबे छपरा, दल छपरा, गोहिया छपरा बन जाता है। मैं प्रवास की बात इसलिए कर रहा हूँ कि यह प्रवास जहां एक तरफ यहाँ के लोगों के लिए अभिशाप होता था तो वहीं, यहां के लिए लोगों के लिए शैक्षिक,आर्थिक,सामाजिक उन्नति का कारण बनता रहा है। यह प्रवास सिर्फ भारत तक नहीं रहा बल्कि भारत के बाहर सुदूर मॉरीशस सहित अन्य करेबियन देशों तक पहुंचता है और वहाँ स्वयं को स्थापित करता था। मॉरीशस की कहानी मैंने अपने साहित्यिक गुरु श्री रामदेव धुरंधर से बार-बार सुनी है। उनके पूर्वज भी वर्ष 1838 में बलिया से ही मॉरीशस गए थे।
स्व.राम दयाल सिंह जी भी मिडिल पास करने के बाद आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों को लेकर कोलकाता नौकरी पर चले गए, अपने मातृभूमि से कई सो किलोमीटर दूर वे कलकत्ता अवश्य गए लेकिन उनके दिल से, उनके मन में मातृभूमि की यादें बनी रहतीं। ६ या ७ वर्ष नौकरी करने के बाद वे बनारस लौट आए, और वहां कहीं किसी सेठ साहूकार के रहकर मुंशी गिरी का काम करने लगे। वाराणसी में गांधी जी की सभा हुई और उन्होंने क्रांतिकारियों के भाषण को सुना उनके मन में क्रांति की आग जल गई और फिर क्या था, बनारस में उन्होंने सेठ की नौकरी को लात मारा और बलिया चले आए। बलिया आकर क्रांतिकारियों के आंदोलन में जमकर जुड़ गए।
श्री राम दयाल सिंह जी (नाना जी)बताते हैं कि उस जमाने में संचार के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। पूरे देश में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उन्हें मात्र रेडियो,वह भी किसी खास बीबीसी न्यूज़ से पता चलती थी। अब युवाओं में जोश कैसे जगे। हर रोज की जानकारी कैसे मिले युवा रामदायल सिंह उस समय एक रेडियो लेकर आते थे और अपने गाँव कैथोलिक में एक जगह बड़की दलान हुआ करती थी, वही बैठकर रेडियो खोलने और स सारे लोग समाचार सुनते थे और उन्हें पता चलता था कि पूरे देश में क्रांति और आजादी की लड़ाई किस ढंग से लड़ी जा रही है और क्या-क्या घटनाएं घट रही है.
इन लोगों के लिए यह सिर्फ एक समाचार नहीं था, यह तो एक जलती हुई चिंगारी थी जो हर वक्त उनके भीतर जल रही थी आखिरकार यह चिंगारी शोले के शक्ल में बदल गई –
अब आगे बढ़ते हुए मैं बलिया के अंदर 1942 कि उसे क्रांति की तिथि वार घटना का वर्णन संछिप्त कर रहा हूं। इसका संदर्भ मैंने बलिया के इतिहास विद श्री शिव कुमार कौशिकेय जी की पुस्तक बलिया विरासत से लिया है –
9 अगस्त को बलिया में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आज की गिरफ्तारी की खबर मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर तत्कालीन नगर मंत्री श्री उमाशंकर सोनार अपने साथी सरजू प्रसाद के साथ मिलकर 10 अगस्त को बलिया में जुलूस निकाले और सभी छात्रों और व्यापारियों ने उसमें भाग लिया।
11 अगस्त को इस जुलूस के बाद एक भाषण शहीद पार्क पर हुआ। इस भाषण के दौरान पंडित राम अनंत पांडे जी को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन की चिंगारी शहर से गांवों की तरफ बढ़ गई। 12 अगस्त को बलिया और बैरिया में विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस और छात्रों के बीच का मार पीट और झड़प हुई। 30 छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया 13 अगस्त को बनारस से बलिया पहुंची ट्रेन को छात्रों ने चित्त बड़ा गांव रेलवे स्टेशन पर फूंक दिया और रेल की पटरी को उखाड़ कर प्रदर्शन किया . खेजूरी बेल्थरा रोड में जनसभाएं हुई 14 अगस्त को चितबड़ागांव ताजपुर में रेल की पटरिया उखाड़ दी गई। बेल्थरा रोड में भी आंदोलन तीव्र हो गया वहां पर भी यही सारी चीजे हुई। सिकंदरपुर में मिडिल स्कूल में जुलूस निकाला गया वहां क्या स्थानीय थानेदार ने क्रूरता दिखाते हुए बच्चों पर घोडों को दौड़ा दिया। सैकड़ो छात्र घायल हुए 15 अगस्त को बलिया जनपद के जहाज घाट, माल गोदाम डाकघर आदि पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लूट पाट करना शुरु किया। चितबड़ागांव में तमसा नदी पर लकड़ी के बने पिपरा घाट पुल को तोड़कर सेनानियों ने सारे रास्ते बंद कर दिए। जहां-जहां क्रांतिकारी आंदोलन करते धीरे-धीरे वहां वह एक सरकारी कार्यालय पर कब्जा करते और अपना शासन चलाने लगे। पंचायत की राज शासन व्यवस्था काम करने लगी बैरिया,नगरा ताखा आदि कई जगहों पर भी क्रांतिकारियों ने ऐसे ही कार्रवाई की। 16 अगस्त को जिला मुख्यालय पर अपनी हनक जमाने के लिए जिला प्रशासन ने धारा 144 का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया लेकिन सेनानियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इसका प्रतिरोध खोरी पाकर गांव के युवा दुखी कोइरी ने किया। पुलिस फायरिंग में दुखी कोईरी समेत 7 लोग शहीद हो गए। चिलकहर रेलवे स्टेशन फूंक दिया गया, नौरंगा घाट पर खड़े माल भाग जहाज को बहा दिया गया। 17 अगस्त 1942 को हुए ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर क्रांतिकारियों ने रसड़ा तहसील को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराया था। इस संघर्ष में चार वीर सपूत अमर हो गए थे। तहसील और थाने पर सेनानियों ने बहुत आसानी से अधिकार जमा लिया। इसी दिन बांसडीह तहसील पर बगैर किसी प्रतिरोध के स्वराज सरकार का अधिकार हो गया। 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ब्रितानी पुलिस के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा था। वह खूनी संघर्ष में बदल गया बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने और स्वराज सरकार के अधिकार को लेकर हुई जंग में 18 सेनानी शहीद हो गए।
अब आया 19 अगस्त 1942 का वह दिन जब बलिया के क्रांतिकारियों ने इतिहास रच दिया। ब्रिटानी दास्ताँ का दंश झेल रहे लोगों के लिए एक नजीर बनी लाखों की साथ-साथ भीड़ में जिला मुख्यालय को घेर लिया। मजबूर होकर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश चंद्र निगम एवं पुलिस कप्तान जियाउद्दीन अहमद ने आत्मसमर्पण कर दिया। जेल में बंद कांग्रेस के तात्कालिक जिला अध्यक्ष पंडित चित्तू पांडे, महानंदा मिश्रा, विश्वनाथ चौबे आदि सभी राजनीतिक कैदियों को जेल से जेल का फाटक खोलकर रिहा कर दिया गया और बलिया आजाद हो गया।
मैं बात श्री राम दयाल सिंह जी की कर रहा था, बॉसडीह कचहरी पर कब्जे के दौरान आंदोलन का कर रहे रामदयाल सिंह और अन्य लोगों को आखिरकार गिरफ्तारी से बचने के लिए फरारी का रास्ता चुना पड़ा लेकिन यह बहुत ज्यादा दिन नहीं रही। श्री रामदयालु सिंह गिरफ्तार करके बनारस जेल भेज दिए गए .
श्री राम दयाल सिंह जी बताते हैं कि जेल में उन लोगों को जी बैरक में रखा गया था। पांच सोटा की सजा सुनाई गई। यानी प्रतिदिन इन क्रांतिकारियों को डंडे से पीटा जाता था, जिसे वे लोग हंसते-हंसते बर्दाश्त करते थे। स्वर्गीय श्री राम दयाल सिंह जी एक और बात बताते थे उसे समय उसे जेल में केवल एक अखबार आता था। वह सब लोग पढ़े लिखे नहीं थे क्योंकि वह पढ़े लिखे थे तो और जेल के साथी कैदी उनसे कहते थे कि ए रामदयाल के खबर पढ कर के सुनाओ। बाबू राम दयाल सिंह उसे पढ़ कर अपने कैदी साथियों को सुनाते थे इस तरह से उनके मुंह से कही हुई बातों को भी मैं यहां रखा।
देश आजाद हो गया,ये क्रांतिकारी रिहा हुए इनको तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत जी ने तराई में जंगलों के बीच कुछ जमीन इनके लिए जमीने आवंटित की और यह वर्तमान में इनका परिवार उधम सिंह जनपद के आनंदपुर नमक के गांव में रहता है
दूसरे बड़े क्रांतिकारी जो बलिया की आजादी की लड़ाई में बड़ा नेतृत्व कर रहे थे उनकी चर्चा भी करना चाहूंगा क्योंकि उनके साथ तो मैं अपने बचपन के बहुत समय बिताए हैं। मेरे गाँव को संवरा नहीं, बोलते हैं संवरा को,संवरा -गोपालपुर बोलते हैं। गोपालपुर और संवरा दोनों जुड़वा नाम के रूप में एक साथ लिया जाता था। इसी गोपालपुर में जन्मे हुए क्रांतिकारी पंडित विश्वनाथ चतुर्वेदी जी, श्री चित्तू पाण्डेय के साथ उस आंदोलन के हिस्सा थे। जिसका वर्णन मैंने पहले भी किया था। आजादी की लड़ाई से जुड़ी हुई बहुत सारी घटनाओं की जानकारी बहुत सारी बातें वे हमसे बताते थे। अत्यंत सरल और सहज प्रकृति के लेकिन अनैतिकता के घोर विरोधी विश्वनाथ चतुर्वेदी जी हमारे सबसे नजदीक के क्रांतिकारियों में से एक थे। पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी उनको बहुत आदर करते थे। जिसे मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है। चंद्रशेखर जी जब हमारे गांव संवरा चट्टी पर आते थे तो वह चट्टी नहीं कहते थे,चौराहा कहते थे। यहां पहुंचते हुए बोलते थे कि चौबे जी (श्री विश्वनाथ चतुर्वेदी) को बुलाओ।
यह बात मेरे बचपन की है। मै एक और क्रांतिकारी की बात करके मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा। वह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो गुमनाम क्रांतिकारी थे। उनकी कहानी को मैं अपने पुस्तक काव्य कथा विथिका के द्वितीय खंड में स्थान दिया है। हमारे गांव के सिंहा मिसिर जो कि कभी जेल नहीं गए नहीं वह क्रांतिकारी घोषित किए गए उनके न पत्नी थी नाही उनके बच्चे थे। वे पूरे जीवन ऐसे ही रह गए वह हमसे कहा करते थे।
बाबू.. हमनी के रेल लाइन के काटी जा और आंदोलन करी जा, लेकिन पुलिस के डर से हम भाग जाईजा।
क्योंकि उनकी गिरफ्तारी नही हुई, उनका नाम डर से भाग जाने वाले क्रांतिकारियों के लिस्ट में था। सबको पेंशन मिलता रहा लेकिन स्व. सिघा मिसिर जी आज वह हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब हम 19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस में क्रांतिकारियों को याद कर रहे हैं तो मैं उन्हें भी याद करता हूँ ऐसे गुमनाम अनेकों क्रांतिवीरों को भी याद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।
योग आज डिजिटल युग में भी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन योग कक्षाएँ सुविधा, समय की स्वतंत्रता और घर की निजता देती हैं, जबकि प्रत्यक्ष योग कक्षाएँ व्यक्तिगत मार्गदर्शन, मानवीय जुड़ाव और निकट से सीखने का अवसर देती हैं।
इनमें से कोई एक अपने-आप में सही या गलत नहीं है। चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि साधक योग से क्या प्राप्त करना चाहता है।
🏠 ऑनलाइन योग — सुविधा और लचीलापन
✔️ सुविधाजनक: अपनी सुविधा के अनुसार समय चुनकर घर के शांत और निजी वातावरण में अभ्यास किया जा सकता है।
✔️ आसानी से उपलब्ध: योग स्टूडियो तक आने-जाने की आवश्यकता नहीं होती। व्यस्त दिनचर्या या सीमित गतिशीलता वाले लोगों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
✘ व्यक्तिगत ध्यान सीमित: बड़ी ऑनलाइन कक्षा में योग प्रशिक्षक के लिए प्रत्येक साधक की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखना और गलत आसनों या गतिविधियों को ठीक करना कठिन होता है।
✘ सबके लिए एक जैसा अभ्यास: प्रायः पूरी कक्षा के लिए एक ही क्रम और निर्देश होते हैं। अलग-अलग आयु, शारीरिक क्षमता और व्यक्तिगत आवश्यकताओं वाले सभी लोगों के लिए एक ही अभ्यास समान रूप से उपयुक्त हो, यह आवश्यक नहीं।
✘ व्यक्तिगत जुड़ाव कम: स्क्रीन निर्देश तो पहुँचा सकती है, लेकिन आमने-सामने मिलने से पैदा होने वाली आत्मीयता, संवाद, प्रोत्साहन और मानवीय संबंधों को पूरी तरह महसूस कराना उसके लिए कठिन है।
✘ परम्परा का एक आयाम छूट जाता है: आभासी माध्यम में प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परा का वह जीवंत अनुभव स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है, जिसमें शिक्षक को देखकर, उसके मार्गदर्शन में और उसके साथ रहकर सीखना शामिल है।
🧘 प्रत्यक्ष योग — व्यक्तिगत मार्गदर्शन और आत्मीयता
✔️ व्यक्तिगत ध्यान: छोटी कक्षा में योग शिक्षक या गुरु प्रत्येक साधक को अधिक ध्यान से देख सकते हैं, उसकी मुद्रा सुधार सकते हैं और आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन कर सकते हैं।
✔️ व्यक्ति के अनुरूप अभ्यास: शिक्षक जब साधक को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, तो उसकी आयु, शारीरिक स्थिति, सीमाओं और आवश्यकताओं के अनुसार अभ्यास में बदलाव कर सकते हैं।
✔️ अधिक सुरक्षित अभ्यास: सभी से एक जैसे आसन करवाने के बजाय शिक्षक किसी साधक को ऐसे आसन से बचने या उसे संशोधित करने की सलाह दे सकते हैं, जो उसके लिए उपयुक्त न हो।
✔️ मानवीय जुड़ाव: आमने-सामने मिलने से शिक्षक और साधकों के बीच आत्मीयता, प्रोत्साहन, मित्रता और सामूहिकता की भावना विकसित होती है।
✔️ जीवंत परम्परा: अनेक साधकों के लिए शिक्षक की प्रत्यक्ष उपस्थिति में सीखना प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परा के उस महत्वपूर्ण पक्ष को जीवंत करता है, जिसमें केवल निर्देश सुनना ही नहीं, बल्कि देखकर सीखना, अभ्यास करना, गलती सुधरवाना और अनुभव के माध्यम से आगे बढ़ना भी शामिल है।
🌿 इसे एक सरल उदाहरण से समझें
ऑनलाइन कक्षा कभी-कभी ऐसी हो सकती है जैसे एक डॉक्टर हजारों मरीजों को एक ही दवा लिख दे—यह सुविधाजनक हो सकती है और बहुतों के लिए उपयोगी भी, लेकिन हर व्यक्ति की अलग आवश्यकता का ध्यान रखना सम्भव नहीं होता।
इसके विपरीत, एक अच्छा प्रत्यक्ष योग शिक्षक प्रत्येक साधक को देखकर, उसकी सीमाओं और आवश्यकताओं को समझकर उसके लिए अधिक उपयुक्त अभ्यास बता सकता है।
निष्कर्ष
ऑनलाइन योग सुविधा देता है।
प्रत्यक्ष योग आत्मीयता देता है।
ऑनलाइन योग पहुँच आसान बनाता है।
प्रत्यक्ष योग व्यक्तिगत मार्गदर्शन देता है।
जो व्यक्ति योग की मूल बातें अच्छी तरह समझता है, सुरक्षित अभ्यास करना जानता है और समय की सुविधा चाहता है, उसके लिए ऑनलाइन योग एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
लेकिन जो साधक निकट से मार्गदर्शन, व्यक्तिगत ध्यान, आसनों में सुधार, आत्मीय संगति और शिक्षक–शिष्य के गहरे अनुभव की तलाश में है, उसके लिए छोटी प्रत्यक्ष योग कक्षा वह अनुभव दे सकती है, जिसे एक स्क्रीन पूरी तरह नहीं दे सकती।
अंततः, सबसे अच्छी योग कक्षा वही है जो आपको नियमित, सुरक्षित, सजग और सार्थक अभ्यास के लिए प्रेरित करे। 🧘♀️🌿
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मलाई-नामा…“।)
अभी अभी # १०७३ ⇒ आलेख – मलाई-नामा श्री प्रदीप शर्मा
कुछ व्यक्तित्व मलाई जैसे होते हैं, मसलन दलाई लामा ! मैं छुटपन से देखता आ रहा हूँ। मैंने मलाई के स्वाद में और दलाई लामा के स्वरूप व स्वभाव में कभी कोई अंतर नहीं पाया।
मलाई दूध का वाष्पीकृत, परिष्कृत स्वरूप है। दलाई लामा भी व्यक्ति, संस्कार, साधना, संयम और सहनशक्ति की पराकाष्ठा है। हमारे शंकराचार्य की तरह दलाई लामा अपने नाम के आगे पीठ और नाम नहीं लगाते। वे अपने व्यक्तित्व को भी एक ही पदवी में, अवस्था में विलीन कर लेते हैं।।
आम इंसान एक साधारण दूध है, जिसे तपाने पर कुछ गाढ़ापन आने लगता है। संघर्ष और तपिश को बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है। अगर तपन की आँच को कम न किया जाए तो व्यक्तित्व में क्रोध का उफान आने की संभावना रहती है, दूध या तो उफन जाता है, या जल जाता है। धैर्य और सहनशक्ति व्यक्ति में परिपक्वता और ठंडक लाता है।
यही दूध में मलाई है, इंसानों में विवेकवान, ज्ञानवान, लामाओं में दलाई लामा, और संतों में श्रेष्ठ महात्मा, शंकराचार्य अथवा सद्गुरु हैं।
हम कुछ सज्जनों को क्रीम ऑफ सोसयटी कहते हैं। जिस तरह खाद्य पदार्थों को क्रीम से गार्निश, अर्थात सजाया जाता है, यह आभिजात्य वर्ग देश के वैभव और सम्पदा को बढ़ाता है। देश की कीर्ति में चार चाँद लगाता है। ललित कला, साहित्य, संगीत और सामाजिक क्षेत्रों में विराजमान प्रतिभाओं को राष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा जाता है।।
सामाजिक असमानता का आलम यह है कि किसी वंचित के नसीब में दूध की एक बूँद नहीं, और कहीं देखो तो मलाई-पाक से नीचे बात नहीं। जो सम्पन्न लोग मलाई का संग्रह कर लेते हैं, उन्हें कालांतर में मलाई से नवनीत और घृत की प्राप्ति होती है, जो शरीर को स्वस्थ व दीर्घायु रखता है। आम आदमी बची हुई छाछ से ही कढ़ी बना संतुष्ट हो जाता है और अपने प्रभु का गुणगान करता रहता है।
दलाई लामा बनना इतना आसान नहीं ! जप, तप, त्याग और संयम ही जीवन की मलाई है, निचोड़ है। सियासती नारे और चुनावी वादे भी एक तरह मलाई का ही प्रलोभन है। मेहनत की, पसीने की कमाई से आप सिर्फ़ दूध की ही आस रख सकते हैं, और कभी दूध से भी जल जाएँ, तो छाछ भी फूँक-फूँककर पी सकते हैं।।
आजकल तो मलाई का भी आरक्षण होने लग गया है। बिल्ली की तरह इंसानों में भी एक प्रजाति होती है, जिसे वीआईपी कहते हैं। जिस प्रकार सात तालों में रखी मलाई पर बिल्ली हाथ साफ़ कर सकती है, मलाई का उत्तम-भोग भी सबसे पहले वीआईपी द्वारा ही लगाया जाता है। हम तो खुरचन से ही संतुष्ट होने वाले लोग हैं …!!!!
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मी टू : अंतहीन सिलसिला। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – यह किराये का मकान है / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३५ ☆
☆ मी टू : अंतहीन सिलसिला… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘मी टू’– एक सार्थक प्रयास, तथाकथित शोषित महिलाओं को न्याय दिलाने की मुहिम; वर्षों से नासूर बन रिसते ज़ख्मों से निज़ात पाने की अचूक मरहम …एक अंतहीन सिलसिला है। शायद यह वर्षों से सीने में दफ़न चिंगारी, ज्वालामुखी पर्वत के लावे की भांति सहसा फूट निकलती है; जो दूसरों के शांत-सुखद जीवन को तहस-नहस करने का उपादान बन; अपनी विजय-श्री का उत्सव मना रही होती है; विजय-पताका फहरा रही होती है… वहीं उसकी अभिव्यक्ति से समाज में व्याप्त संतुलन, समन्वय व सामंजस्य व समरसता का अंत भी संभाव्य है, निश्चित है।
भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने आधी आबादी को समानाधिकारों के प्रति सजग करते हुए, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस जगाया है… श्लाघनीय है। गीता में भी ‘अन्याय व ज़ुल्म सहने वाले को, ज़ुल्म करने वाले से अधिक दोषी व अपराधी स्वीकारा गया है।’ वैसे औरतों की ‘मी टू’ में सक्रिय प्रतिभागिता होने पर, समाज के हर वर्ग के रसूखदार सदमे में हैं; उनके हृदय में खलबली मची है। वास्तव में वे भयाक्रांत हैं, क्योंकि किसी भी पल किसी पर भी अंगुली उठ सकती है और वे निरपराधी होने पर भी हाशिए पर आ सकते हैं।
वैसे तो हर औरत जीवन में ऐसे हादसों की शिकार होती है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक कदम- कदम पर वह निकटतम परिजनों द्वारा प्रताड़ित होती है। घर हो या कार्य-स्थल…वह कहीं भी सुरक्षित नहीं है; हर चौराहे पर दुर्योधन व दु:शासन उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने को आतुर दिखाई पड़ते हैं। चंद माह की मासूम हो या वृद्धा, वह उनकी पल भर की शारीरिक क्षुधा को मिटाने का साधन बनती है। इतना ही नहीं, उस निर्दोष पर इल्ज़ाम लगा कर कटघरे में भी खड़ा कर दिया जाता है, जो अपराध उसने किया ही नहीं। सो! इन विषम परिस्थितियों में समझौता करना, उसकी विवशता बन जाती है और मुंह बंद कर के रहना– उसे ज़िंदा रहने की कीमत के रूप में चुकानी पड़ती है ताकि परिवार का रूतबा समाज में कायम रह सके। परंतु उस झूठी मान-मर्यादा को बरक़रार रखने के लिए उसे आजीवन तिल-तिल कर मरना पड़ता है।
आइए! ज़रा दृष्टिपात करें, इसके स्याह पक्ष पर… बहुत सी महिलाएं अपना स्वार्थ साधने हेतु सम्पन्न व सज्जन पुरुषों पर निशाना दाग़ने से भी नहीं चूकतीं। वे धन-ऐश्वर्य पाने, झूठी पद-प्रतिष्ठा बटोरने व अधिकाधिक सुख-सुविधा जुटाने के निमित्त; लोक- मर्यादा की परवाह न करते हुए; हर सीमा का अतिक्रमण कर गुज़रती हैं। उदाहरणत: 498 ए के अंतर्गत दहेज मांगने के इल्ज़ाम में, पति व ससुराल पक्ष के लोगों को कटघरे खड़ा करना; जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाना या दुष्कर्म व घरेलू हिंसा के झूठे आरोप लगाने का दम्भ भरना; अपनी कारस्तानियों को सबके सम्मुख सीना तानकर बखान करना… सोचने पर विवश करता है कि आखिर इक्कीसवीं सदी की पथ-विचलित नारी किस घने अंधकार में खो गयी है? परंतु ममता की सागर, सीने में अथाह प्यार, असीम वफ़ा व त्याग के भाव संजोए– नि:स्वार्थ, संवेदनशील, प्रसाद की दैवीय गुणों से सम्पन्न श्रद्धेय नारी की तलाश आज भी जारी है। इसके विपरीत आधुनिक समाज में ‘मी टू’ अथवा दुष्कर्म के झूठे आरोप लगाकर प्रतिशोध लेने व नीचा दिखाने का प्रचलन भी बदस्तूर जारी है; जिसके परिणाम-स्वरूप आत्महत्या के मामले भी निरंतर सामने आ रहे हैं, जो समाज के लिए घातक हैं; मानव-जाति पर कलंक हैं। सो! समाज के लिए यह स्थिति अत्यंत शोचनीय हैं, चिन्तनीय हैं, निन्दनीय हैं।
एक प्रश्न मन में अक्सर कुलबुलाता है…आखिर इतने वर्षों के पश्चात् दमित भावनाओं का प्राकट्य क्यों… यह दोषारोपण तुरन्त क्यों नहीं? सो! इसके पीछे उनकी मंशा व प्रयोजन जानने की आवश्यकता है, जिसका ज़िक्र पहले ही किया जा चुका है। इस संदर्भ में उन महिलाओं की चुप्पी के कारणों को उजागर करने की अत्यंत आवश्यकता है…आखिर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के पश्चात् सहसा यह विस्फोट क्यों? पच्चीस वर्ष तक हृदय में दफ़न दर्द के दावानल में विस्फोट क्यों?
प्रश्न उठता है— क्या ‘मी टू’ वास्तव में विरेचन है… उन चिरदमित भावनाओं का, अहसासों का, जज़्बातों का, जो कुंठाओं के रूप में लम्बे समय से उनके हृदय में सुप्तावस्था में दबी पड़ीं थीं और अवसर पाते वे जाग्रत हो गयी हैं? सो! उनका प्रदर्शन होने के पश्चात् दोनों पक्षों का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है? शायद,! ‘मी टू’ शराफ़त का नकाब ओढ़े; समाज में ऊंचे-ऊंचे पदों पर काबिज़ लोगों की हक़ीक़त को उजागर करने का माध्यम हैं; उनके जीवन के कटु यथार्थ को प्रकट करने का मात्र साधन है या महिलाओं को न्याय दिलाने का उपादान भी है?
सो! इस विषय की प्रासंगिकता के साथ-साथ सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। क्या यह दोनों पक्षों के हित में है… शायद नहीं। वास्तव में आरोपी पक्ष पर इल्ज़ाम लगाने से, कीचड़ के छींटे हमारे उजले दामन को भी मलिन करते हैं और इससे केवल दोनों परिवारों की इज़्ज़त ही दांव पर नहीं लगती, उनके घरों का सुख-चैन, शांति व सुक़ून भी नदारद हो जाता है। सो! सुप्रीम कोर्ट के मी-टू के साथ-साथ लिव-इन व विवाहेतर संबंधों पर भी पुन: चिंतन करने की आवश्यकता का विचार मन में सहसा कौंधा, क्योंकि इससे मानसिक आघात व हंसते- खेलते परिवारों में ग्रहण लगने की अधिक संभावना है। सो! हमें अपनी संस्कृति की धरोहर को संजोए रखने का भरसक प्रयास करना चाहिए और मानव-मूल्यों के विघटन के कारणों व समाधान के उपायों-कारकों को भी तलाशना चाहिए। शेष निर्णय व दायित्व आप पर।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – शर्मा जी का पार्किंग स्लॉट।)
☆ चुभते तीर # १२६ – व्यंग्य – शर्मा जी का पार्किंग स्लॉट ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
गुलमोहर अपार्टमेंट में पार्किंग स्लॉट A-102 कोई मामूली जगह नहीं थी। वह सोसायटियों की उस राजनीति का ताज थी, जिसके लिए लोग अपनी पुरानी गाड़ियों की डेंटिंग तक भूल जाया करते थे। शर्मा जी पिछले दो सालों से उस स्लॉट पर नज़र गड़ाए बैठे थे। वजह सीधी थी, वो जगह सीधे उनके फ्लैट की बालकनी के नीचे थी, जहाँ से वे अपनी नई चमचमाती सफेद कार पर चिड़ियों के हमले को दिन में तीन बार चाय की चुस्की के साथ मॉनिटर कर सकते थे।
समस्या सिर्फ इतनी थी कि उस जगह पर पिछले छह महीनों से एक पुरानी लावारिस साइकिल खड़ी थी। उस साइकिल का मालिक कौन था, यह बात पूरी सोसायटी के लिए किसी रहस्यमयी जासूसी उपन्यास से कम नहीं थी। गुप्ता जी कहते थे कि यह बिल्डर के किसी रिश्तेदार की है, तो वहीँ दूसरे तल्ले वाले वर्मा जी का दावा था कि इसमें कोई भूतिया साया बसता है क्योंकि हवा चलने पर उसकी घंटी अपने आप बज उठती थी।
शर्मा जी ने ठान लिया था कि इस रविवार को होने वाली सोसायटी जनरल बॉडी मीटिंग में वे इस मुद्दे को उठाएंगे और पार्किंग अपने नाम करवा कर ही दम लेंगे। पूरे हफ्ते उन्होंने भाषण की तैयारी की। मुहावरों को ऐसे पिरोया जैसे किसी कवि सम्मेलन का आलेख हो। रविवार को मीटिंग हॉल खचाखच भरा था। शर्मा जी अपनी कुर्सी पर इस ऐंठ के साथ बैठे थे जैसे कोई नया-नया चुना गया मंत्री सदन में प्रवेश करता है।
जैसे ही मीटिंग शुरू हुई, शर्मा जी ने अपना दुखड़ा रोना चालू कर दिया, “अध्यक्ष महोदय, वो सड़ती हुई पुरानी साइकिल हमारी सोसायटी की खूबसूरती पर वैसा ही दाग है जैसे किसी नई-नवेली दुल्हन की साड़ी पर दाल का धब्बा! अगर तीन दिन में उसका मालिक सामने नहीं आया, तो उस कबाड़ को फेंका जाए और वो जगह मुझे दी जाए।”
पूरी सोसायटी में फुसफुसाहट फैल गई। अध्यक्ष महोदय ने चश्मा सीधा करते हुए गंतव्य की ओर रुख किया और गंभीर आवाज़ में गार्ड को बुलाया, “रामसिंह, उस साइकिल को तुरंत हटाओ। क्या तुम्हें पता नहीं चला कि वो किसकी है?”
रामसिंह ने अपने दोनों हाथ जोड़े और बहुत ही मासूमियत से कहा, “साहब, वो साइकिल तो तीन महीने पहले हमारे सिक्योरिटी गार्ड्स के फंड से खरीदी गई थी। गुप्ता जी और वर्मा जी ने मिलकर पास किया था ताकि रात को पेट्रोलिंग आसानी से हो सके। और साहब, वो साइकिल शर्मा जी के ही लड़के ने पिछले महीने अपनी कार बैक करते वक्त ठोक दी थी, जिससे उसका चेन कवर जाम हो गया था। हम तो शर्मा जी की भलमनसाहत का इंतज़ार कर रहे थे कि वो कब उसकी मरम्मत करवाएंगे।”
पूरा मीटिंग हॉल सन्नाटे में डूब गया। शर्मा जी का चेहरा ऐसा लाल हो गया जैसे किसी ने गरमा-गरम जलेबी का सिरा उनके गालों पर मल दिया हो। अध्यक्ष महोदय नेमुस्कुराते हुए माइक उठाया और कहा, “तो तय रहा, शर्मा जी साइकिल की मरम्मत कराएंगे और पार्किंग में अपनी कार के साथ गार्ड की साइकिल भी पार्क करेंगे।”
सबके चेहरे पर मुस्कान तैर गई और पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। शर्मा जी ने भी धीमी सी मुस्कान के साथ ताली बजाई, यह सोचते हुए कि पार्किंग तो नहीं मिली, लेकिन जिम्मेदारी का बिल ज़रूर फाड़ दिया गया।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शेर और शेर दिल…“।)
अभी अभी # १०७२ ⇒ आलेख – शेर और शेर दिल श्री प्रदीप शर्मा
शेर तो खैर जंगल का राजा है, और उसका दिल शेर का दिल ही कहलाएगा। हर इंसान जो शेर दिल होता है, किसी राजा से कम नहीं होता। एक शायर भले ही शेर कहता हो, लेकिन उसका दिल कभी शेर दिल नहीं होता। जिसका दिल बार बार टूटे, उसे आप शेर दिल नहीं कह सकते।
शेर दिल को आप दरिया दिल तो कह सकते हैं, लेकिन kind hearted, यानी दयालु नहीं कह सकते। जो आसानी से पिघल जाए, वह कैसा दिल। जिसका दिल दरिया दिल के साथ मजबूत भी हो, वही शेर दिल कहलाने का अधिकारी होता है।
बहादुर बच्चे गिरने पर रोते नहीं, किसी से मार खाने पर घर आकर मम्मी से शिकायत नहीं करते। पूरा हिसाब बराबर करने के बाद ही विजयी मुस्कान लिए घर लौटते हैं, और उनके घर लौटने के पहले ही उनकी बहादुरी के किस्से घर पहुंच जाते हैं। ऐसे होते हैं शेर बच्चे।।
शेर का दिल किसी बच्चे का दिल नहीं होता। एक शायर दिवाना हो सकता है, एक शेर का दीवानगी से क्या काम। हमने नहीं सुना, किसी शेर ने कभी किसी को दिल दिया हो। एक मदारी भले ही पब्लिक में बंदर बंदरिया को रस्सी से बांधकर नचा ले, उनकी शादी करा दे, सर्कस में भी शेर, शेर ही होता है। उसे नचाने के लिए भी हंटर की जरूरत पड़ती है। वैसे असली शेर आजकल जंगल में नहीं संसद में दहाड़ते हैं, जिनकी दहाड़ आज तक में भी सुनी जा सकती है।
कल विश्व शेर दिवस था। हम जंगल तो नहीं जा पाए, लेकिन संसद में कल एक शेर दो घंटे तेरह मिनिट तक दहाड़ा, किसी भी शेर का यह विश्व रेकॉर्ड है। मैने देखा, उसने देखा, सबने देखा, कहां देखा, टीवी पर देखा, अपने मोबाइल में देखा।।
एक शायर बदनाम हो सकता है, लेकिन उसके शेर का भी बहुत नाम होता है। शेर कभी चरित्रहीन नहीं होते, कोई सुंदर हिरनी कभी उसे अपने जाल में नहीं फांस सकती। वह शेर दिल होता है, दिल फेंक नहीं। वह किसी को दिल नहीं देता, उसका कलेजा चीर देता है।
हमने कभी शेर को घास खाते नहीं देखा। गुजरात के गिर में कुछ सफेद शेर होते हैं, जो खेतों में भी घूमते पाए जाते हैं, एक खोजी फोटोग्राफर का तो यह भी कहना है कि ये सफेद शेर इतने शांत होते हैं कि इन्हें वहां मशरूम भी
खाते देखा गया है। हमारे कल के एंग्री यग मैन महानायक और आज के शेर दिल, केबीसी के बिग बी आपको यदा कदा गुजरात आने का निमंत्रण दिया करते हैं।।
अगर आपकी वास्तविक शेर में रुचि हो तो जंगल में नहीं, भारतीय संसद में जाएं, जहां एक अकेला सब पर भारी है और अगर आपकी रुचि शेर दिलों में है तो हमारे पंजाब आइए। यहां आपको शेर, सिंह, सभी मिलेंगे।
जितने शेर आज जंगल में नहीं हैं, उतने सिंह हमारे अकेले पंजाब में हैं और सभी जाबांज, शेरदिल। यहां के सभी सिंह आपको भांगड़ा करते नजर आएंगे। ये सभी सिंह जंगल में मंगल ही करते हैं, दंगल नहीं। अगर ये सिंह गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं तो मुल्क के लिए अपना शीश कटाते भी हैं। इनके राज में कोई प्राणी भूखा नहीं सोता, इनका लंगर सबके लिए है। सेवा ही इनकी सीख है, समर्पण ही इनकी सीख है, बलिदान ही इनकी सीख है, मुल्क की रक्षा ही इनकी सबसे बड़ी सीख है।।
जो निर्भय है, निडर है, अपने मुल्क की रक्षा में सक्षम है, वही सच्चा शेर है। आज शेर दिल लायंस क्लब में नहीं, बहादुर इंसानों में पाये जाते हैं, जो खुद भी चैन से रहते हैं, और सबके अमन चैन की चिंता करते हैं। शेर बनें, शेर दिल बनें, भीगी बिल्ली नहीं ..!!
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सहनशक्ति बनाम दण्ड। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन आन बसो गिरधारी / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३४ ☆
☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘युगों -युगों से पुरुष स्त्री को उसकी सहनशीलता के लिए ही दण्डित करता आ रहा है,’ महादेवी जी का यह कथन कोटिश: सत्य है,जिसका प्रमाण हमें गीता के इस संदेश से भी मिलता है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है’,क्योंकि उसकी सहनशीलता उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एक सीमा तक तो सहनशक्ति की महत्ता स्वीकार्य है,परंतु उसे आदत बना लेना कारग़र नहीं है। इसलिए मानव में विरोध व प्रतिकार करने का सामर्थ्य होना आवश्यक है। वास्तव में वह व्यक्ति मृत के समान है,जो ग़लत बात को ग़लत ठहरा कर विरोध नहीं जताता। इसके प्रमुखत: दो कारण हो सकते हैं– आत्मविश्वास की कमी और असीम सहनशीलता। यह दोनों स्थितियां ही भयावह और मानव के लिए घातक हैं। आत्मविश्वास से विहीन मानव का जीवन पशु-तुल्य है,क्योंकि जो आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता; वह परिवार,समाज व देश के लिए क्या करेगा? वह तो धरती पर बोझ है; न उसकी घर-परिवार में इज़्ज़त होती है,न ही समाज में उसे अहमियत प्राप्त होती है। अत्यधिक सहनशीलता के कारण वह शत्रु अर्थात् प्रतिपक्ष के हौसले बुलंद करता है। परिणामत: समाज में आलसी व कायर लोगों की संख्या में इज़ाफा होने लगता है। प्राय: ऐसे लोग संवेदनहीन होते हैं और उनमें साहस व पुरुषत्व का अभाव होता है।
नारी को सदैव दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है, क्योंकि उसमें अपना पक्ष रखने का साहस नहीं होता और वह शांत भाव से समझौता करने में विश्वास रखती है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहे हों; पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक या उसका समर्पण भाव– सभी नारी को उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देते हैं,जहां वह निरंतर ज़ुल्मों की शिकार होती रहती है। पुरुष दंभ के सम्मुख वह प्रतिकार व विरोध में अपनी आवाज़ नहीं उठा सकती। इस प्रकार पुरुष उस पर हावी होता जाता है और समझ बैठता है कि वह पराश्रिता है; उसमें साहस व आत्म-विश्वास की कमी है। सो! वह उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। इस प्रकार यह सिलसिला चल निकलता है। अवमानना,तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार अर्थात् विवशता बन जाते हैं और उसके जीने का मक़सद व उपादान बन जाते हैं,जिसे वह नियति स्वीकार अपना जीवन बसर करती रहती है।
यदि हम उक्त तथ्य पर दृष्टिपात करें, तो नियति व स्वीकार्यता-बोध मात्र हमारी कल्पना है,जिसे हम सहजता व स्वेच्छा से अपना लेते हैं। यदि व्यक्ति प्रारंभ से ही ग़लत बात का प्रतिरोध करता है और अपने कर्म को अंजाम देने से पहले सोच-विचार करता है,उसके हर पहलू पर दृष्टिपात करता है– शत्रु के बुलंद हौसलों पर ब्रेक लग जाती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, 2007 में प्रकाशित स्वरचित काव्य-संग्रह की अंतिम कविता की पंक्तियां– ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके/ अनगिनत बंधनों में बाँध चुके/ मुझ में साहस ‘औ’ आत्म- विश्वास है इतना/ छू सकती हूं मैं/ आकाश की बुलंदियां।’ जी हाँ! यह संदेश है नारी जाति के लिए कि वह सशक्त,सक्षम व समर्थ है। वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकती है। परंतु वह पिता,पुत्र व पति के बंधनों में जकड़ी,ज़ुल्मों को मौन रहकर सहन करती रही,क्योंकि उसने अंतर्मन में संचित शक्तियों को पहचाना नहीं था। परंतु अब वह स्वयं को पहचान चुकी है और आकाश की बुलंदियों को छूने में समर्थ है। आज की नारी ‘अगर देखना है मेरी उड़ान को/ थोड़ा और ऊंचा कर दो/ आसमान को’ में झलकता है उसका अदम्य साहस व अटूट विश्वास,जिसके सहारे वह हर कठिन कार्य को कर गुज़रती है और ऐलान करती है कि ‘असंभव शब्द का उसके शब्दकोश में स्थान है ही नहीं; यह शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।’
परंतु 21वीं सदी में भी महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय व दयनीय है। वे आज भी पिता,पति व पुत्र द्वारा प्रताड़ित होती है,क्योंकि तीनों का प्रारंभ ‘प’ से होता है। सो! वे उनके अंकुश से आजीवन मुक्त नहीं हो पाती। घरेलू हिंसा,अपनों द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार, फ़िरौती, दुष्कर्म, तेज़ाब कांड व हत्या के सुरसा की भांति बढ़ते हादसे उनकी सहनशक्ति के ही दुष्परिणाम हैं। यदि बुराई को प्रारंभ में ही दबाकर समूल नष्ट कर दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। महिलाएं पहले भी दलित थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। उनके अतीत,वर्तमान व भविष्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता; जब तक वे साहस जुटाकर ज़ुल्म करने वालों का सामना नहीं करेंगी।
वैसे यह नियम बच्चों,युवाओं व वृद्धों सब पर लागू होता है। उन्हें आगामी आपदाओं,विषम व असामान्य परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए,क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी टिक नहीं सकता। ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ सोहनलाल द्विवेदी जी इस कविता के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि यदि आप तूफ़ान से डर कर व लहरों के उफ़ान को देख कर अपनी नौका को बीच मंझधार नहीं ले जाओगे तो नौका कैसे पार उतर पाएगी? संघर्ष रूपी अग्नि में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। इसलिए कठिन परिस्थितियों के सम्मुख कभी भी घुटने नहीं टेकने चाहिएं तथा मैदान-ए-जंग में मन में इस भाव को प्रबल रखने की दरक़ार है कि ‘तुम कर सकते हो।’ यदि निश्चय दृढ़ हो, हौसले बुलंद हों,दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। नैपोलियन बोनापार्ट भी यही कहते थे कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। इस नकारात्मक भाव को अपने ज़हन में प्रविष्ट न होने दें –’जैसी दृष्टि,वैसी सृष्टि तथा नज़रें बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं और नज़रिया बदलते ज़िंदगी।’ यदि नारी यह संकल्प कर ले कि वह अकारण प्रताड़ना सहन नहीं करेगी और उसका साहसपूर्वक विरोध करेगी, ‘तो क्या’ और अब मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि ‘मैं क्या कर सकती हूं।’ उस स्थिति में पुरुष भयभीत हो जायेगा और अपने मिथ्या सम्मान की रक्षा हेतु मर्दांनगी नहीं दिखायेगा। धीरे-धीरे दु:ख भरे दिन बीत जायेंगे व खुशियों की भोर होगी,जहाँ समन्वय,सामंजस्य ही नहीं; समरसता भी होगी और ज़िंदगी रूपी गाड़ी के दोनों पहिए समान गति से दौड़ेंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मियाँ की तोड़ी…“।)
अभी अभी # १०७१ ⇒ आलेख – मियाँ की तोड़ी श्री प्रदीप शर्मा
राजनीति जोड़-तोड़ है, गठ-जोड़ है, तोड़-फोड़ है। राजनीति कुर्सी है, जिस पर बैठकर आसमान सर पर उठा लिया जाता है। संगीत केवल जोड़ है, उसका कोई तोड़ नहीं। सङ्गीत ज़मीन से जुड़ा है, जिसके लिए सदा आसमान अदब से झुका है।
राजनीति में कोई किसी का गुरु नहीं होता ! सङ्गीत में गुरु गुड़ ही रहता है, चेला कभी शक्कर नहीं होता। क्योंकि उसका गुरु, कोई योगगुरु नहीं, उस्ताद होता है।
यह उस्ताद किसी बाबा की तरह तावीज़ और भभूत नहीं, शिष्य को गण्डा बाँधता है, सङ्गीत के ज़रिए उसे ईश्वर से जोड़ता है।।
राजनीति में केवल हिन्दू-मुसलमान होता है, संगीत और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु-शिष्य संबंध होता है। आप भले ही तमाम मुल्क की सराय से मुग़लों को खदेड़ फेंकें, ताजमहल को शिवाला बना दें और कुतुब-मीनार को नेस्तानबूद ही क्यों न कर दें, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से शहनाई अलग नहीं कर सकते, बाप-बेटे उस्ताद अल्ला रक्खा और ज़ाकिर हुसैन से तबले की थाप को जुदा नहीं कर सकते।
अकबर के गले से नवरत्नों की माला नोंच लीजिये, तानसेन की संगीत की दुनिया में आग नहीं लगा सकते, रसखान के पदों में से कृष्ण-भक्ति और बांसुरी की धुन अलहदा नहीं कर सकते।
आत्मा को तो आप अमर समझें और रूह को आप मार नहीं सकते, रानी रूपमती को महान और बाज-बहादुर के प्रेम को लव ज़िहाद का दर्ज़ा दे नहीं सकते। कहाँ कहाँ मज़हबी तोड़-फोड़ करेंगे, मियाँ की तोड़ी को तोड़, सुरों की तान छेड़ नहीं सकते। इस धरती की हरियाली से उसकी हरियाली छीन हरा झंडा और कश्मीर के केसर से उसके केसरिया रंग और खुशबू को मिला केसरिया ध्वज आप भले ही बना लें, उन्हें इस खुले आसमान में साथ-साथ लहराने से किसी को रोक नहीं सकते। चाँद हम सबका है, कभी दूज का, तो कभी चौदहवीं का। सूरज अगर खुशियों की सक्रांति है, तो गुरु पूनम हमारी गुरु पूर्णिमा है। हम सूरज चाँद को मज़हबों में बाँट नहीं सकते।।
जुगलबंदी ही जीवन-संगीत है !
जीवन में कहीं लता का स्वर है तो रफी का गीत। पंडित ओंकारनाथ अगर ठाकुर हैं तो बड़े गुलाम अली खां भी उस्ताद है। रविशंकर के सितार के साथ अल्ला रक्खा के तबले की जुगलबंदी होती है, तो मुँह से वाह ताज ही निकलेगा। मुमताज़ को क्यों बीच में लाते हो।
मियाँ की तोड़ी हो, या राग मेघ मल्हार ! जीवन की इन खुशियों में राग शिवरंजिनी हो, या यमन राग ! जहाँ मालकौंस हो, वहाँ मन तड़फत हरि दर्शन को आज।
कोई भी साज़ हो, कोई भी आवाज़ हो, एक ही रंग, एक ही रूप, बस हो एक ही राग, देस राग।।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – बस लिखता हूँ…
रचना का जन्म सहज उद्वेग से होता है। विचार करके लिखोगे तो विचार नहीं दे पाओगे। किसी दिन या दिनांक विशेष पर बच्चे को जन्म देना है तो सिजेरियन कराना ही होगा। सहज प्रसूति चाहिए तो दिन-दिनांक के बंधनों से मुक्त रहो। सहज लिखो, प्रवाह को उसकी गति, उसकी नीति, उसकी नियति से आने दो। इस प्रवाह से विचार स्वयंमेव अमृत बूँद बनकर छलकेगा।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈