(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६१ ☆ देश-परदेश – झूठ के पांव नहीं होते ☆ श्री राकेश कुमार ☆
ये किवदंती सुनकर भी हम लोगों ने झूठ बोलना बंद नहीं किया है। सदियों से इस बात की जानकारी होते हुए भी झूठ बोलते ही रहते हैं। ऊपर लगी समाचार पत्र की कटिंग भी शायद ये ही कुछ कह रही है।
एक व्यक्ति ने पैर दर्द के कारण अवकाश लिया था, परंतु उसी दिन उस व्यक्ति ने 16 हजार कदम भी चले। इस कारण उसकी नौकरी जाती रही।
निजी तौर से हमें ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा है। 16 हजार कदम चलने के लिए उसे पुरस्कृत किया जाना चाहिए था। हम तो विगत 16 वर्षों से 16 हजार कदम चलने की योजना तक नहीं बना पा रहें हैं। स्वास्थ्य विज्ञान के ज्ञानी लोग तो कम से कम दस हज़ार कदमों की वकालत करते आ रहें हैं। हम अभी तक एक दिन में अधिकतम आठ हजार कदम चले थे, उसकी खुशी में आठ गुलाब जामुन डाकर गए थे।
कभी कभी तो हम अपने सहायक को कदम नापने वाली घड़ी पहना देते हैं। हमारे इस एक कदम से उसके द्वारा लिए गए कदम, हमारे खाते में जुड़ जाते हैं। क्या करें हम से तो कदमताल भी नहीं की जा सकती है, फिर ये पांच अंकों के आंकड़े को एक दिन में प्राप्त करना, अत्यंत कठिन होता है।
हमारे एक शुभ चिंतक तो हमें सांत्वना देते हुए कहते हैं, दिन भर में मोबाइल पर यदि दस हजार बार उंगली भी चल जाए, तो उसको कदम के बराबर माना जाता हैं।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए पैदल चलना ही सर्वोत्तम है। ऐसा कह देना या व्हाट्स ऐप पर लिख देने से कोई लाभ नहीं होता है। हम तो अब आज की रात्रि सैर करेंगे, आप भी अब मोबाइल बंद कर देवें।
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख “दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं”।
☆ आलेख/पुस्तक चर्चा ☆ दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं ☆ श्री मनजीत सिंह ☆
पुस्तक – बंद दरवाजे ( दलित-चिंतन की कविताएं)
कवि – जयपाल
समीक्षक – मनजीत सिंह
प्रकाशन – यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र
क़ीमत –150/- पेपर बैक
पिछले दिनों हरियाणा के चर्चित कवि जयपाल जी द्वारा लिखित काव्य पुस्तक-‘बन्द दरवाज़ें’–पढ़ने का अवसर मिला । इस पुस्तक में दलित चिंतन की कविताएं हैं। दलित चिंतक/कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान को समर्पित “जूठी पत्तल’ की पंक्तियों में भूख का यथार्थ देखिए–
जूठी-पत्तल
हम तो बस टूट पड़ते थे
मिली-जुली सतरंगी मिठाइयों पर
घुली-मिली दाल-सब्जियों पर
कटे-फटे फल-फ्रूटों पर
कभी कभार ही मिलते थे हमें ये छत्तीस व्यंजन
माँ बहुत खुश होती थी
कभी-कभी दुःखी भी होती थी
दलित साहित्य के बारे में अलग-अलग लेखक अलग-अलग राय रखते हैं। हर लेखक ने अपनी हर रचना में बदलाव और विकास को अलग-अलग तरीके से दिखाया है। कुछ दलित लेखक ऐसे भी हैं जो देवी-देवताओं को मज़ाक के साथ नकारते हैं । कुछ लेखक ऐसे हैं जो आम लोगों की लोक संस्कृति को एक नई ज़िंदगी देने वाली दुनिया के तौर पर देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मिथकों और कहानियों को समुदाय की क्रिएटिविटी से बने रूपक मानते हैं ,उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मार्क्सवाद को बहुत नफ़रत से देखते हैं, और कुछ दलित ऐसे हैं जिन्हें इस बात का अफ़सोस है कि मार्क्सवादी अभी तक हमारी मदद के लिए क्यों नहीं आए l कुछ सोचते हैं कि मार्क्सवाद ही एकमात्र रास्ता है जो जात-पात को सही अर्थों में समाप्त कर सकता है और गैर-बराबरी मिटा सकता है lसभी लेखकों की अलग-अलग सोच है लेकिन सारे लेखकों में कहीं न कहीं एक जगह जाकर समानता देखने को मिलती है कि जाति पर आधारित अमानवीय भेदभाव और जाति समाप्त होनी चाहिए।
श्री जयपाल
‘उसका गांव’ कविता आज के सन्दर्भ में पूर्णतया सटीक बैठती है… उदाहरणार्थ यदि मैं गांव जाता हूं तो सबसे पहले मेरा नाम पूछा जाता है फिर मोहल्ला , पाना,ठोला,ठिकाना, बाप,दादा आदि ताकि जाति का पता चल जाए। शहर में भी यही हाल है, केवल मकान नं की पहचान काफी नहीं है जाति तो शहर में भी देखी जाती है । कुछ पंक्तियां आप भी देखिये–
वे जाति नहीं पूछते
आज कल कोई किसी से जाति नहीं पूछता
जाति मिट सी गई है मानो
जैसे पढ़ लिख से गए हैं सब
इसीलिए जाति नहीं पूछते
हालांकि बाकी सब अते-पते,
आग्गा- पिच्छा गली-मौहल्ला
वे अच्छी तरह पूछ लेते हैं
बार-बार पूछते हैं
पूछते ही रहते हैं कुछ न कुछ
जब तक पानी पूरी तरह साफ ना हो जाए
और पता ना लग जाए
कौन कितने पानी में हैं!
‘हम क्या करते रहे’ कविता में कवि ने दलित वर्ग से प्रश्न पूछे हैं कि वे क्या करते रहे ? जयपाल जी सीधे तौर पर कविता के माध्यम से अनेक सवाल कर रहे हैं–
वे गा रहे थे
हम नाच रहे थे
वो बोल रहे थे
तो हम सुन रहे थे
सदियां गुज़र गई
कुछ इसी तरह
पता ही नहीं चला
वे क्या कहते रहे
हम क्या करते रहे
दलितों-पिछड़ों और वंचित समाज ने कभी नहीं सोचा आखिरकार वे कर क्या रहे थे! अर्थात केवल अनुसरण कर रहे थे ! आदेश मान रहे थे!!
‘दलित बस्ती’ कविता एक बेहतरीन कविता है जिसमें दलित बस्ती स्वयं अपने बारे में कहती है कि मेरे पास तो न तो ढंग से सूर्य पहुंचा है न ही ढंग से कोई कवि । ‘आशा’ नामक कविता में दलित-स्त्री कहती है कि बीता हुआ कल मेरा कभी नहीं हुआ और जो चल रहा है वह किसी और का है और भविष्य पहले ही तय हो चुका है।
दलित स्त्री का दुःख कवि के शब्दों में—
मैं तोड़ देना चाहती हूँ वे पैर
जो दलकर मुझे दलित बनाते हैं
दफ़न कर देना चाहती हूँ उस बचपन को
जो मेरे जख्मों पर नमक छिड़कता है
भूल जाना चाहती हूँ वह जवानी
जो मुझ पर बिजली बन कर गिरी थी
बंद कर देना चाहती हूं वे पवित्र कुएं
जिनमें मेरी लाश तैरती रहती है
पटक देना चाहती हूँ वे व्यवस्थाएं
जो मेरा सिर सबके पैरों में रख देती है
छोड़ देना चाहती हूं वे रास्ते
जो सिर्फ मेरे लिए ही बनाए गए हैं
मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं
जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती हैं
पलट देना चाहती हूं वे सारी परंपराएं
जो मेरे गले में लटका दी गई हैं
इसी तरह ‘मैं किसको क्या कहूं’- कविता में भारतीय गांव में दलित महिला की स्थिति देखिए —
मैं क्या कहूं
उस गांव को
जो सबका है पर मेरा नहीं
उन गांव के कुत्तों को
जो मुझे ही देखकर भौंकते हैं
उन गाय भैंसों को
जिनका गोबर-मूत भी मेरे हाथों से पवित्र है
उस गाय- माता को
जिसके के नाम पर माबलिंचिंग हुई
और मैं विधवा हो गई
क्या कहूँ
उन देवताओं को
जो मुझे हमेशा शाप ही देते हैं
उन पवित्र पुजारियों को
जिनका धर्म मेरी परछाई पर टिका है
उन धार्मिक चरणों को
जिनके नीचे मुझे कुचला ही गया
उस हवेलियों को
जिसके दरवाजे हमेशा बन्द ही रहते हैं
उन महाजनों को
जिनके पास मेरी आत्मा गिरवी है
वर्ण-व्यवस्था को लेकर उपरोक्त कविता कुछ तीखे सवाल उठाती है और बेचैन करती है।
संस्कृत से लिया गया “दलित” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “टूटा हुआ,” “कुचला हुआ,” “बिखरा हुआ,” या “उत्पीड़ित,” जो भारत में इन समुदायों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक अधीनता, हाशिए पर धकेले जाने और अधिकारों से वंचित किए जाने को दर्शाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से “अछूत” माना जाता था और जाति व्यवस्था से बाहर रखा गया था । यह शब्द अब सामाजिक/ राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया है,जो ज्यादातर कविताओं में झलकता है। इन कविताओं में दलित समाज की पीड़ा को गहरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त किया गया है । देश के वर्तमान जातिवादी और साम्प्रदायिक माहौल में ये कविताएं बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं । मनुष्यता को बचाने का आह्वान करती हैं और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करती हैं।
आशा है पाठकों को श्री जयपाल जी की पुस्तक बंद दरवाजे की कविताएं दलित समस्या पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी ।
श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर संवेदन और पूर्वाभास…“।)
अभी अभी # ८८६ ⇒ आलेख – दूर संवेदन और पूर्वाभास श्री प्रदीप शर्मा
क्या किसी की अनायास याद आना महज एक संयोग है। आज दूर संचार के माध्यमों ने हमारी वैचारिक तरंगों का स्थान ले लिया है। जब मन किया, कॉल कर लिया। जिन लोगों को कॉल से तसल्ली नहीं होती, वे वीडियो कॉल लगा लेते हैं। आज के डिजिटल इंडिया में राष्ट्र के हर नागरिक के पास संजय की दिव्य दृष्टि है।
केवल कवि की पहुँच ही रवि तक नहीं होती, जब मन के घोड़े सरपट दौड़ते हैं, तो सात समंदर पार बैठा पिया, मल्हारगंज में बैठी मानसी के मन में ऐसा समा जाता है, कि इधर खयाल आया और उधर फोन की घंटी बजी। इसे कहते हैं टेलीपेथी। ।
बड़ी उम्र है आपकी ! क्या विचित्र संयोग है, अभी अभी बस आपको याद ही किया था और आप हाजिर। हिचकी को हम कभी गंभीरता से नहीं लेते। क्या किसी के महज स्मरण मात्र से हिचकी आना बंद हो सकती है। कहीं यह टेलीपेथी तो नहीं ! मन पर अगर लगाम लगा ली जाए, तो बड़ा काम का है यह मन। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसी मन की अवस्था से तो हम कभी फकीरी और कभी अमीरी का लुत्फ उठा सकते हैं।
हमारी संवेदना का स्तर जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होता चला जाता है, हमारे मन के द्वार खुलते चले जाते हैं। अन्नमय, मनोमय प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष में वह सब है, जो कुबेर के खजाने में भी नहीं। रावण और राम में बस यही अंतर है। ।
हमारा मन चेतन हो अथवा अवचेतन, आगे आने वाली घटनाओं का भी हमें पूर्वाभास होता रहता है। गणित का अध्ययन और धारणा ध्यान का मिला जुला स्वरूप ही है ज्योतिष और नक्षत्र विज्ञान। मंगल पर आप जब जाना चाहें जाएं, हम तो मंगलनाथ कल ही होकर आ गए। परा, पश्यन्ती , मध्यमा और वैखरी जैसी विद्याएं कहीं बाहर नहीं, हमारे अंदर ही मौजूद हैं। जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। बस इधर मन चंगा हुआ, उधर कठौती में गंगा प्रकट।
शरीर ही हमारा विज्ञान है और प्रकृति हमारी प्रयोगशाला। सभी वैज्ञानिक हाड़ मांस के पुतले ही थे, जब जिज्ञासा जुनून बन जाती है तब ही आविष्कार संभव होते हैं। ।
घर के जोगी बने रहें, अगर आन गांव में सिद्ध होने की कोशिश की, तो महात्मा बनने का खतरा है। अपनी सिद्धियों को छुपाए रखिए, उनका प्रदर्शन नहीं, सदुपयोग कीजिए, ज्ञानार्जन बुरा नहीं, ज्ञान का मार्केटिंग भ्रमित करने वाला है।
डोनेशन से एडमिशन और कोचिंग क्लासेस का ज्ञान ही आज हमारी धरोहर है, काहे की टेलीपेथी और इंटुइशन की मगजमारी।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख ‘थोड़ा विचार कीजिए ना…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # ९१ ☆ आलेख – थोड़ा विचार कीजिए ना…☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
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अभी हाल ही में, इंदौर में प्रदूषित पानी सप्लाई होने से अनेक मौतें हो गई. अनेक लोग बीमार हो गए, अनेकों जगह अभी भी प्रदूषित पानी की सप्लाई जारी है. लोगों को पानी ही नहीं मिल रहा है. हम कोसने लगते हैं सिस्टम को. जब समाज में भ्रष्टाचार होता है, तो, कोसने लगते हैं, समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को. स्वास्थ्य सेवाओं में कमियां है, कि अनेक शहरों से बीमार को बड़े शहरों के लिए रेफर कर दिया जाता है, क्योंकि शहरों में स्वास्थ्य की अच्छी सेवाएं उपलब्ध नहीं है.
हम कोसते हैं, हमारी शिक्षा प्रणाली को, हमारे बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाते हैं. अच्छे जॉब के लिए विदेश जाते हैं. क्यों? क्यों हम उन्हें अपने देश में अच्छी शिक्षा और अच्छा जॉब मुहैया नहीं कर सकते? शिक्षा विभाग में पहले भ्रष्टाचार को क्यों कोसते हैं? अरे हमें वही मिला है, जो हमने चाहा था हमने कभी अपने बच्चों के लिए, अच्छी शिक्षा नहीं चाही. अपने लिए कभी अच्छा स्वास्थ्य नहीं मांगा. हमने कभी स्वच्छ पानी अपने लिए नहीं चाहा, क्योंकि हम आदी हो गए बोतल बंद पानी पीने के. इसमें कितनी मात्रा में प्रिजर्वेटिव मिला रहता है, नहीं मालूम, हमारे लिए कितना नुकसानदायक है, हमें कोई चिंता नहीं है. क्योंकि हमारे पास बोतल बंद पानी है, हम बहुत खुश हो जाते हैं, प्लास्टिक की बोतलों के ढेर लगा देते हैं जो नष्ट नहीं होता, हमने जल का संरक्षण नहीं किया,हमारे तालाब, हमारी नदियां, प्रदूषित हो गईं, वायु में प्रदूषण है, हम कोसने लगते हैं कि वायु में प्रदूषण हो गया, अरे हमने स्वच्छ वातावरण के कल्पना ही कब की है. हमने चाहा ही नहीं, कि हम एक स्वच्छ वातावरण में, स्वच्छ पानी पीकर, अच्छी शिक्षा प्राप्त कर, अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना करें. हमने जो चाहा हमें मिल गया, हमारी चुनाव प्रणाली जिससे हम अपने नेता तय करते हैं, हम धर्म और जाति के आधार पर चुनते हैं. कितने नेताओं ने अपनी जाति का भला किया है. हमने उनकी योग्यता के आधार पर कभी उनका चुनाव ही नहीं किया, तो जैसा हम चाहते हैं वैसा हमें मिलता है फिर हम किसी को क्यों कोसते हैं.
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
विश्व हिंदी दिवस पर विशेष
☆ संजय उवाच # ३१९ ☆ चक्षो: सूर्यो अजायत…
वैदिक दर्शन सूर्य को ईश्वर का चक्षु निरूपित करता है। हमारे ग्रंथों में सूर्यदेव को जगत की आत्मा भी कहा गया है। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं द्वारा सूर्योपासना के प्रमाण हैं। ज्ञानदा भारतीय संस्कृति में तो सूर्यदेव को अनन्य महत्व है। एतदर्थ भारत में अनेक प्राचीन और अर्वाचीन सूर्य मंदिर हैं।
भारतीय मीमांसा में प्रकाश, जाग्रत देवता है। प्रकाश आंतरिक हो या वाह्य, उसके बिना जीवन असंभव है। एक-दूसरे के सामने खड़ी गगनचुंबी अट्टालिकाओं के महानगरों में प्रकाश के अभाव में विटामिन डी की कमी विकराल समस्या हो चुकी है। केवल मनुष्य ही नहीं, सम्पूर्ण सजीव सृष्टि और वनस्पतियों के लिए प्राण का पर्यायवाची है सूर्य। वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण या फोटो सिंथेसिस के लिए प्रकाश अनिवार्य घटक है।
सूर्यचक्र के अनुसार ही हमारे पूर्वजों का जीवनचक्र भी चलता था। भोर को उठना, सूर्यास्त होते-होते भोजन कर सोने चले जाना। सूर्यकिरणें भोजन की पौष्टिकता बनाए रखने में उपयोगी होती हैं।
वस्तुतः जीवन की धुरी है सूर्य। सूर्य से ही दिन है, सूर्य से ही रात है। सूर्य है तो मिनट है, सेकंड है। सूर्य है तो उदय है, सूर्य है तो अस्त है। सूर्य ही है कि अस्त की आशंका में पुनः उदय का विश्वास है। सूर्य कालगणना का आधार है, सूर्य ऊर्जा का अपरिमित विस्तार है। सूर्यदेव तपते हैं ताकि जगत को प्रकाश मिल सके। तपना भी ऐसा प्रचंड कि लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर होकर भी पृथ्वीवासियों को पसीना ला दे।
सूर्य सतत कर्मशीलता का अनन्य आयाम है, सूर्य नमस्कार अद्भुत व्यायाम है। शरीर को ऊर्जस्वित, जाग्रत और चैतन्य रखने का अनुष्ठान है सूर्य नमस्कार। ऊर्जा, जागृति और चैतन्य का अखंड समन्वय है सूर्य।
‘सविता वा देवानां प्रसविता’…सविता अर्थात सूर्य से ही सभी देवों का जन्म हुआ है। शतपथ ब्राह्मण का यह उद्घोष अन्यान्य शास्त्रों की विवेचनाओं के भी निकट है। गायत्री महामंत्र के अधिष्ठाता भी सूर्यदेव ही हैं।
सूर्यदेव अर्थात सृष्टि में अद्भुत, अनन्य का आँखों से दिखता प्रमाणित सत्य। सूर्यदेव का मकर राशि में प्रवेश अथवा मकर संक्रमण खगोलशास्त्र, भूगोल, अध्यात्म, दर्शन सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
इस दिव्य प्रकाश पुंज का उत्तरी गोलार्ध से निकट आना उत्तरायण है। उत्तरायण अंधकार के आकुंचन और प्रकाश के प्रसरण का कालखंड है। स्वाभाविक है कि इस कालखंड में दिन बड़े और रातें छोटी होंगी।
दिन बड़े होने का अर्थ है प्रकाश के अधिक अवसर, अधिक चैतन्य, अधिक कर्मशीलता।
अधिक कर्मशीलता के संकल्प का प्रतिनिधि है तिल और गुड़ से बने पदार्थों का सेवन।
निहितार्थ है कि तिल की ऊर्जा और गुड़ की मिठास हमारे मनन, वचन और आचरण तीनों में देदीप्यमान रहे।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।
इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम:
ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(पूर्णिका’ के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)
☆ आलेख – पूर्णिका की परिभाषा… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
(ई-अभिव्यक्ति में प्रस्तुत “पूर्णिका की परिभाषा” पूर्णिका के जनक डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ द्वारा प्रस्तुत मौलिक परिभाषा है. यह पढ़कर उत्सुकतावश मुझे लगा कि आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (A I) इस सन्दर्भ में क्या कहता है? तो लीजिये आप स्वयं ही पढ़ लीजिये –
“पूर्णिका हिंदी साहित्य की एक आधुनिक काव्य विधा है, जिसमें न्यूनतम पांच नेह (पंक्तियों के छोटे-छोटे खंड) से अधिकतम बीस नेह तक भावपूर्ण रचना की जाती है। यह स्वतंत्र रूप में पूर्ण अनुभूति प्रस्तुत करती है।
परिभाषा
पूर्णिका को डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ द्वारा शोधित माना जाता है, जो न्यूनतम 5 से 20 नेह तक सजी काव्य रचना है। इसमें छंदबद्ध या मुक्तक शैली में भाव, रस और अलंकारों का समावेश होता है, जो स्वयं में पूर्ण होती है। यह मुक्तक काव्य से प्रेरित है, किंतु विशिष्ट नेह संरचना पर आधारित।
इतिहास
पूर्णिका का प्रारंभिक शोध जबलपुर, मध्य प्रदेश के डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ने किया। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने इसे विश्ववाणी हिंदी की लोक हितैषी काव्य भंगिमा कहा। यह हालिया विधा है, जो 21वीं सदी में हिंदी साहित्य में लोकप्रिय हो रही है, विशेषकर दोहा, मुक्तक और ग़ज़ल जैसी विधाओं को समाहित कर।”
उपरोक्त जानकारी AI tool – Perplexity द्वारा प्रस्तुत की गई है.
– हेमन्त बावनकर, सम्पादक – ई-अभिव्यक्ति, पुणे
☆
पूर्णिका पांच नेह से लेकर बीस नेह तक में सजा कर कही जाए, पहली नेह को प्रारम्भी, अंतिम नेह को परचयी कहा जाए।
दो सुधि ( पंक्ति ) को मिला कर नेह रची जाए, ऊपर की पंक्ति अर्थात नेह की पहली पंक्ति को पूर्ण सुधि और नेह की – दूसरी पंक्ति को संपूर्ण सुधि कहा जाए। संपूर्ण सुधि के अंत में परिवर्तनीय और स्थानीय लगाकर लिखी जाए और जब किसी नेह की संपूर्ण सुधि में अंत में स्थानीय की जगह परिवर्तनी हो, तब इसे स्थानीय विहीन पूर्णिका कहा जाए। जब पूर्णिका के एक या दो नेह पढ़े जाएं तो उसे पूर्णिकांश कहा जाए। यथा नेह में मात्रा का विशेष ध्यान रखे बिना, बिना अटके बोलकर, गाकर पढ़ी जा सके यही सही पूर्णिका होगी।
पूर्णिका दुनिया के हर क्षेत्र, हर विषय, हर प्राणी, हर भाव-भाषा को विषय बना कर कही / लिखी जा सकती है।
अर्थात पूर्णिका कहने/ लिखने के लिए पूर्णिका – कार कोई भी विषय चुन सकते हैं ।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जड़ भरत…“।)
अभी अभी # ८८५ ⇒ आलेख – जड़ भरत श्री प्रदीप शर्मा
आज हम दशरथनंदन, राम लक्ष्मण के भाई महात्मा भरत का नहीं, ऋषभदेव जी के सबसे श्रेष्ठ पुत्र भरत जी का स्मरण करने जा रहे हैं। ये बड़े भगवत भक्त थे और इनके ही नाम पर हमारे देश का नाम भरत खण्ड पड़ा।
कैसा होगा वह सनातन युग, जहां राजा हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते थे, और तत्पश्चात् संसार छोड़कर वानप्रस्थ और सन्यास भी ग्रहण कर लेते थे। हमारे भरत महाराज भी राजपाट और समस्त राजसी सुख वैभव त्याग अपने आश्रम में एक तपस्वी का जीवन बिता रहे थे कि एक दिन एक मृगशावक पर इनका मन पसीज गया और उसकी सेवा आसक्ति में इतने जड़वत हो गए कि आज की भाषा में इनकी मति मारी गई। हिरण के बच्चे के मोह में प्राण इतने अटके कि पहले एक जन्म हिरण का लिया और बाद में एक जन्म जड़ भरत का। अपने मोह और आसक्ति से जब दो जन्मों बाद छूटे तब अपनी पुनः अपनी वास्तविक अवस्था को प्राप्त हुए। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में जड़ भरत की कथा का वर्णन है। ।
हम अपने आदर्श अवतारों और महापुरुषों तक ही सीमित रखते हैं। उनकी पूजा, भक्ति, आराधना और उनकी चरण रज हमारे माथे पर लग जाए, और हमें क्या चाहिए। हम गृहस्थ, संसारी जीव हैं, अपनी सीमाएं और प्रतिबद्धताएं भली भांति जानते हैं। मोह और आसक्ति हमारे जीवन में आसानी से आ तो सकती है, लेकिन इतनी आसानी से जा नहीं सकती।
फिर भी अगर कोई हमें जड़ भरत अथवा गोबर गणेश कहे तो हम बुरा मान जाते हैं। इच्छा होती है, दो मिलाकर जड़ दें। जब कि हम यह भी जानते हैं कि जड़ भरत की हम दस जन्मों तक बराबरी नहीं कर सकते और गोबर तो कितनी पवित्र चीज है। अब गणेश जी के बारे में भी मुंह खुलवाओगे क्या।
उनका तो हमें इष्ट है।
क्यों आखिर सब गुड़ गोबर करने पर तुले हो। ।
यह एक गंभीर पोस्ट है। मैं जब आत्म चिंतन करता हूं, तो अनायास पिछली कई घटनाएं स्मृति में आ जाती हैं और मुझे यह आभास होता है कि हमारी वर्तमान स्थिति भी किसी जड़ भरत से बेहतर नहीं।
मेरा कॉलेज का एक मित्र था, मुझसे अधिक बुद्धिमान और साधन संपन्न ! जीवन में दोस्ती बराबरी वालों से करना चाहिए, लेकिन स्कूल कॉलेज में जिससे दोस्ती होती थी, वही बराबरी का हो जाता था। वह दोस्त भी कुछ ऐसा ही था। वैसे हमने कभी एक दूसरे के लिए जान नहीं छिड़की लेकिन उसके बड़े से बंगले में हमेशा एक विदेशी किस्म का कुत्ता रहता था, जिस पर वह जान छिड़कता था। ।
समय ही हमें मिलाता है और हमारे बिछड़ने में भी समय का ही हाथ होता है।
एक नौकरीपेशा आदमी जीवन के साठ वर्षों के संघर्ष के बाद जब जिंदगी जीना शुरू करता है तो कभी बीमारी तो कभी कोविड – 19 दस्तक दे देती है। मेरे मित्र ने अपनी रुचि अनुसार सेवा निवृत्ति का समय काटने के लिए विदेशी किस्म के श्वान पाल लिए थे। कुत्ता स्वामिभक्त होता है, घर की रखवाली भी करता है, लेकिन कालांतर में वह घर का एक महत्वपूर्ण सदस्य हो जाता है, उसका भी एक नाम होता है, पहचान होती है। क्या उसके प्रति हमारी आसक्ति स्वाभाविक नहीं। तो क्या हम एक जड़ भरत से बेहतर हुए ?
यह प्रश्न शायद मेरे जेहन में कभी आता ही नहीं, अगर एकाएक मेरा यह अभिन्न मित्र, मेरी जिंदगी से हमेशा के लिए कोराना पॉजिटिव का शिकार बन, इस दुनिया से विदा नहीं हो जाता।
जड़ भरत के जीवन में तो बस एक हिरण का बच्चा आया था। हमारी स्थिति क्या है। क्या समय हमें संभलने अथवा जागने का मौका देता है, कभी नहीं।
एक परीक्षक की तरह आता है वह पल, प्रश्न पत्र हाथ से छीन ले जाता है और कह देता है, your time is over . मेरे दोस्त के साथ यही हुआ, उसे कहां संभलने अथवा कुछ भी संभालने का मौका दिया। हमारे साथ भी यही होना है। कितना अच्छा हो, एक क्लियर ऑल का बटन दबा दिया जाए, सभी माया, मोह, ममता और आसक्ति को डिलीट कर दिया जाए और जगजीत सिंह को गुनगुनाया जाए ;
कुछ ना कुछ तो ज़रूर होना है।
सामना आज उनसे होना है।।
लेकिन हमें किसी भी हाल में, जड़ भरत नहीं बनना है..!!
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ अम्मा कहती हैं बेटियाँ अब नहीं आती ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
अम्मा कहती हैं बेटियाँ अब आती नहीं. वह अपने घर में इस कदर खो गई कि मायेके की मिट्टी ही भूल गई
अरे भला कैसे अम्मा भूल गई?
बेटियाँ मायेका क्यों नहीं आती, तो सुनिए बताती हूं –
जैसे अक्सर आप आंगन, तो कभी दरवाजे पे सुलगती हुई चिड़चिड़ी बन अपने भीतर की सांसें भीतर ही रोक लिया करतीं थीं और अक्सर मामा के घर जाने के लिए मन मसोस लिया करतीं थीं, उसी पगडंडी पे बैठीं हूई बेटियां वैसे ही सुलग रही है.
हां विदाई के बाद बेटियाँ जानतीं है कि वह अब मायेके में केवल एक मेहमान है और बिना कुछ कहे ही वह अधिकार की देहरी पर पसरी नज़र आती है.
अपने किरदार में खो जातीं बेटियाँ धीरे धीरे अर्धांगिनी व मातृत्व में बंध जातीं दो घरों की नींव में खड़ी होकर भी केवल एक दीए के भांति ही होती है जो प्रकाशित तो होती है लेकिन उसके हिस्से में केवल मौन -दर्द होता है जो शब्द में नहीं लिखा जा सकता है बल्कि एक एहसास भर है फिर भी,
अम्मा कहती हैं
बेटियाँ अब आती नहीं बल्कि वह खो चुकी है अपने हिस्से की गृहस्थी में,
बेटियों के गृहस्थी में
अम्मा होता बहुत कुछ है
जैसे मंदिर की घंटी, पूजा के बर्तन घर की बरकत और बच्चों की जिम्मेदारी, पति का आंगन माथे पे पल्लू और रोटी की गंध.
बस, नहीं होती है तो केवल एक ही बात और वह बात है अम्मा तेरी नरमी और उपस्थिति क्योंकि ससुराल और पीहर के छत के नीचे के आहट में केवल एक ही अंतर है और वह अतंर ही अतंस में सदा जीवित होकर एक अदृश्य डोर से बांधे हुए रखता है व बेटियाँ दुआओं में अपने हिस्से की खुशी भी अपने मायके के लिए ही मांगती है फिर भी, बेटियाँ नहीं जा पातीं क्योंकि वह चूड़ियों के साथ ही कैद हो जाती है ससुराल में और अम्मा कहती हैं –
☆ आलेख ☆ ~ बेटी के विदाई से बहू बनने की कथा, भारतीय संस्कृति का अनुपम एक उदाहरण ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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बेटी की विदाई कितनी कारूणिक होती है, इसको शब्दों में तो बयां किया ही नही जा सकता है। मैंने अपनी कई बड़ी रचनाओं में इस भाव को सजाने और समझने की कोशिश की है। लेकिन बेटी के बिछुडन – वियोग भाव की गहराई इतनी है कि मै इसमे अपने शब्दों की रस्सी डालता जाता हूँ, डालता जाता हूँ, वह छोटी ही पड़ती जाती है।
बेटी के विदाई की बेला, बाबुल से बिछड़ने की, भाई से लिपटकर रोने की, चाचा ताई को याद करने की, सहेलियों के साथ मुस्कुराने की, गांव परिवार के लोगों के बीच हंसी की ठिठोली करने की, आदि आदि जीवंत दृश्यो के यादों को शब्दों में बांधने के लिए लेखक के पास शब्द कम पड़ जाते हैं।
बेटी अनेकानेक स्नेहिल रिश्तो को त्याग कर जब एक नए घर की ओर प्रस्थान करती है, एक नए आशियाने की ओर कदम बढ़ाती है तो उस वक्त उसके और उसके परिजनों के दिल की पीड़ा, उस माहौल में उठने वाले रुदन की ध्वनि कलेजे को फाड़ कर रख देती है।
बाबुल घर से निकलकर, पिया घर में पहुंचने तक, पुराने रिश्तों से निकल कर नए रिश्तों तक पहुंचने की कठिन यात्रा पर बेटी के कदम जब निकल पड़ते हैं तो इस वृत्तांत को लिखते लिखते लेखक कलम भी स्वयं रो पड़ती है है।
लेकिन मां-बाप की जीविषिका सिर्फ इस बात पर निर्भर होती है कि मेरी प्राणों से प्रिय सिया कहीं अन्यत्र नही जा रही है है बल्कि वह किसी अवधपति दशरथ नंदन राम की प्राण प्रिया और उनके कुल की लक्ष्मी बनने जा रही है तब जाकर ये आंसू कहीं थमते हैं।
विदाई की बेला पर न सिर्फ परिजन, पुरजन एवं परिवारजन आँखे नम हो उठती है, बल्कि बाबुल के घर के सामने खड़े नीम के पत्ते, घर के पीछे की क्यारी में खिले फूल, घर की चौखट, कुंवें की जगत, खूंटे से बधी गाय और बछीया, सदैव दरवाजे पर रहकर दुम हिलाने वाला कुत्ते आदि जैसे बेजुबान जीवों एवं ये तथाकथित निर्जीव कही जाने वाली चीजो को भी लेखक ने विदाई के इस वियोग पल में आंसू बहाते देखता है।
बेटी को विदा कराकर ससुराल की ओर डोली को ले जाने कहारों के बढ़ते कदमों के पद चाप को पीछे से देखकर और या फूलों से सजी हुई कार घूमते चक्को को धीरे-धीरे आंखों से ओझल होने के साथ फिर ही, एक दिन पूर्व शहनाई की धुन से गुजते घर में गजब का सन्नाटा पसर जाता है। मानो सबकुछ ठहर गया हो। यहाँ सबके जुबा से एक ही स्वर निकलता है कि वह चली गई, वह हम सब को छोड़ कर चली गई, अपने प्रीतम के घर गई। फिर मन में एक भाव आता है, मेरी बेटी..तुम जहां भी रहना, सदैव खुश रहना। जिस रूप में रहना, सदा खुश रहना। जब तुम्हें अपने इस घर की याद आए, बिना पूछे चली आना, क्योंकि यह घर तुम्हारा ही घर है और इस घर के दरवाजे सदैव तुम्हारे लिए खुले रहेंगे।
हां मेरी बेटी तुम्हें किसी बुलावे की जरूरत नहीं, तुम तब भी परिवार की एक अंग थी, आगे भी बनी रहोगी। तुम्हारा मायका तुम्हारा वही अपना पुराना किला है, जिसकी तुम जागीर रही हो। जिसमें चलकर तुम्हारे नन्हे पाँव बड़े हुए। बेटी तुम अपरोक्ष रूप से आज भी इस महल की मालकिन हो। बस तुम एक पुराने महल से अपने नये महल में ही गयी हो, सिर्फ इतना ही अंतर है। हाँ एक बात ध्यान रखना, अपने नए महल में जाकर हम सभी को कभी भी मत भूलना। यहाँ बैठा पूरा परिवार हर वक्त बस इस बात की चर्चा करता है कि तुम जहाँ भी रहो खुश रहना।
बेटी अपने बाबुल के घर से बेटी के रूप में तो विदा हो जाती है, और जब उसके कदम किसी नये घर में पड़ते हैं, तो वह उस घर की बहू बन जाती है। बस यह उसका एक नाम का परिवर्तन हुआ। जहां वह बेटी अपने अधिकारों के साथ अपने बाबा के घर में रह रही थी, वहीं वह बहु के अधिकारों के साथ श्वसुर या पति के घर रहने चली जाती है।
यहाँ उसे बहू के अधिकारों के साथ प्रीतम का घर मिलता है, जहां उसके मां-बाप के रूप में उसके सास श्वसुर मिलते हैं, रिश्ते का नाम बदलता है, कुछ थोड़े बहुत फर्ज के अलावा अन्य कुछ भी नही बदलता है।
पिता के घर से विदाकर बहु के रूप में आयी उस बेटी की एक चाहत होती है कि उसका पिता के घर में मिला प्यार, सम्मान और अधिकार तो किसी भी हालत में नहीं बदलना चाहिए, जो उसे एक बेटी के रूप में मिला हुआ होता है। ऐसा ही प्यार, सम्मान एवं अधिकार उसे बहू के रूप में पति के घर में मिलना चाहिए। वहीं उस बेटी के भी मन में ऐसा ही प्यार बना रहना चाहिए कि उसे इस नये घर में सास ससुर के रूप में माता पिता मिले हैं। उनके मान, सम्मान और स्वाभिमान का आदर उसी प्रकार हो जैसा माँ -बाप के प्रति था।
उसके भीतर इस बात गौरव होना चाहिए कि वह इस नये घर की कुलबधु होकर आयी है। पुत्र को तो केवल एक कुल की मर्यादा होने का गौरव प्राप्त होता है, वहीं कन्या दो कुलों की मर्यादा होती है। उसके ऊपर दो कुलों की मर्यादा को निभाने का दायित्व होता है।
यह तो जीवन का एक चक्र है जो कि अपनी धुरी पर घूमता है और पूरा घूम कर वहीं पहुंच जाता है, जहां से वह चला होता है।
बेटी ही बहू होती है और बहू ही बेटी होती है। बस बेटी से बहू के रूप में नाम परिवर्तन की यात्रा में एक मार्मिक पल आता है, जिसे हम विदाई की वेला कहते हैं। बेटी जो आज एक घर की बेटी के रूप में एक परिवार सदस्य होती है, बहु के रूप में दूसरे घर की सदस्य बनती है और फिर व्यस्कता की ओर बढ़ते हुए, उस घर की मालिकिन बन जाती है। फिर वह एक बेटी की माँ बनती है और पुनः उस अपनी जायी बेटी को बेटी के रूप में विदा करती है, जो किसी दूसरे कुल की बहु बनने जा रही होती है। यही वह सामाजिक क्रम है जो लगातार अनवरत चलता रहता है।
बस आवश्यकता इस बात की है कि इस व्यवस्था के भीतर का आदर, प्रेम, सम्मान, मर्यादा, अधिकार, आदि नीति नियमों में कहीं भी घृणा द्वेष, लोभ असम्मान एवं अनीति का समावेश न हो। जब कभी ऐसा होता है तभी वहां सामाजिक व्यवस्था विद्रूप रूप में दिखाई देने लगती है। नहीं तो हमारी सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था है। इसी व्यवस्था को भारतीय सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। यही हमारी भारतीयता है, यही हमारे भारत की सांस्कृतिक व्यवस्था है। यही हमारे बहुरंगी फूलों से सजे गमले सदृश्य भारत की खुशबू है। भारतीय संस्कृति का एक संकल्प है कि उसे किसी भी भाषा, क्षेत्र, समुदाय, संप्रदाय मैं नहीं बदलना है और न ही यह बदलती है। हमारी भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का गान करती है और हमारे भारत को महान बनाती है
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गरीब की जोरू…“।)
अभी अभी # ८८३ ⇒ आलेख – गरीब की जोरू श्री प्रदीप शर्मा
ना तो गरीब कोई गाली है, और ना ही जोरू कोई गाली, लेकिन यह भी एक सर्वमान्य, सनातन सत्य है कि एक गरीब का इस दुनिया में सिर्फ अपनी जोरू पर ही अधिकार होता है। होगा पति पत्नी का रिश्ता, प्रेम और बराबरी का आपके सम्पन्न और शालीन समाज के लिए, गरीब की जोरू तो बनी ही, जोर जबरदस्ती के लिए है।
हमारे समाज ने पत्नी को अगर धर्मपत्नी और अर्धांगिनी का दर्जा दिया है तो एक आदर्श पत्नी भी अपने पति को परमेश्वर से कम नहीं मानती। सात फेरों और सात जन्मों का रिश्ता होता है पति पत्नी का। लेकिन एक गरीब और उसकी जोरू समाज के इन आदर्श दायरों में नहीं आते। ।
हम भी अजीब हैं। बचपन में कॉमिक्स की जगह हमने चंदामामा में ऐसी ऐसी कहानियां पढ़ी हैं, जिनका आरंभ ही इस वाक्य से होता था। एक गरीब ब्राह्मण था। समय के साथ थोड़ा अगर सुधार भी हुआ तो शिक्षकों को गुरु जी की जगह मास्टर जी कहा जाने लगा और उनके कल्याण के लिए एक गृह निर्माण संस्था ने सुदामा नगर ही बसा डाला।
लेकिन वह तब की बात थी, जब लोग सुदामा को भी गरीब समझते थे और एक मास्टर को भी। जिसकी आंखों पर अज्ञान की पट्टी पड़ी हो, उसे कौन समझाए। सुदामा एक विद्वान ब्राह्मण थे, श्रीकृष्ण के बाल सखा थे, और हमेशा पूरी तरह कृष्ण भक्ति में डूबे रहते थे। आज सुदामा नगर जाकर देखिए, आपको एक भी शिक्षक नजर नहीं आएगा। सभी सुदामा नगर के वासी आज उतने ही संपन्न और भाग्यशाली हैं, जितने सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने के बाद हो गए थे। ।
बात गरीब की जोरू की हो रही थी। आप अगर एक गरीब की पत्नी को जोरू कहकर संबोधित करते हैं, तो उसे बुरा नहीं लगता, क्योंकि उसका पति भले ही गरीब है, पर वह उसका मरद है। हमने अच्छे अच्छे मर्दों को घर में घुसते ही चूहा बनते देखा है। लेकिन गरीब की जोरू का मरद तो और ही मिट्टी का बना होता है। वहां मरद को दर्द नहीं होता, लेकिन जब वह अपनी जोरू को मारता है, तब जोरू को दर्द होता है। आखिर एक मरद और जोरू का रिश्ता, दर्द का ही रिश्ता ही तो होता है। गरीबी और मजबूरी वैसे भी दोनों अभिशाप ही तो हैं।
हमारे लिए तो मजबूरी का नाम भी महात्मा गांधी है। जब कि गरीब का दुख दर्द, अभाव और मजबूरी अपने आप में एक मजाक है। जो किसी की गरीबी का मजाक उड़ाता है, उसके लिए किसी गरीब और जोरू के लिए दर्द कहां से उपजेगा। ।
जब रिश्तों में मूल्य नहीं होते तो रिश्ते भी मजाक बन जाते हैं। मजाक और हंसी मजाक में जमीन आसमान का अंतर होता है। क्या गरीबों के लिए हमारा दर्द, मुफ्त राशन की तरह एक मजाक बनकर नहीं रह गया है।
जी हां, यही है हमारे मजाक का स्तर। गरीब की जोरू सबकी भाभी। यहां हम गरीब का ही नहीं, उसकी गरीबी का ही नहीं, उसकी पत्नी का भी मजाक उड़ा रहे हैं। हें, हें ! कैसी बात करते हैं। देवर भाभी में तो मजाक चलता रहता है, और वास्तविकता में भी चल ही रहा है। गरीबी आज मजाक का विषय ही है। गरीब की जोरू सबकी भाभी।।