हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९६⇒ फूल और पत्थर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और पत्थर …“।)

?अभी अभी # ९९६ ⇒ आलेख – फूल और पत्थर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९६६ में धर्मेंद्र और मीना कुमारी की एक फिल्म आई थी, फूल और पत्थर ! एक पत्थर दिल इंसान और कोमल ह्रदय वाली मीनाकुमारी की यह फिल्म थी । उसके बाद से बहुत कुछ बदला है । और बदले की इस आग में एक नए किस्म का पत्थर, शक्ल ले चुका है,जिसका नामकरण किया गया है नफ़रत का पत्थर ।

कितना भाग्यशाली होगा,वह पत्थर,जो रामजी के नाम लेने से तैरने लगता है और पूरी वानर सेना को पुल बनाकर समुद्र के पार पहुंचाता है ।।

पत्थर अभिशप्त है,रास्ते में पड़े रहने के लिए ! जो ठोकर खाता है पत्थर से,वह पत्थर को कोसता भी है और ठोकर खाने के बावजूद उसी पत्थर को एक ठोकर और मारता है । बेजुबान पत्थर हमें यह समझाता है,तुमने मुझे ठोकर मारी । ठीक है, अब तो संभल जाओ । देखकर चलो ! नहीं तो ज़िन्दगी भर ठोकरें ही खाते रहोगे ।

नसीब अपना अपना ! कोई फूल कहाता,कोई पत्थर । कांटों को तो गुलाब अपने गले लगाता है,पत्थर का ऐसा नसीब नहीं । पत्थर को कोई गले नहीं लगाता ।

जब कोई पहाड़ टूटता है ,तब पत्थर का जन्म होता है । अगर बहती नदी में गिरे, तो घिस घिस कर या तो शालिग्राम हो जाता है या फिर कंकर से शंकर । वही

पत्थर जब किसी मूर्तिकार द्वारा तराशा जाता है,तो किसी मंदिर में विराजमान हो जाता है, लोग उसी पत्थर को पूजने लग जाते हैं ,उस पर फूल चढ़ाए जाते हैं ।

पत्थर से इमारतें बनती हैं तो कोई पत्थर मील का पत्थर कहलाता है । सुना है पत्थर दिल इंसान भी होते हैं । वह पत्थर कितना भाग्यशाली होगा,जिस पर रोजाना फूल चढ़ते होंगे ।।

शिव शंकर तो इतने पत्थर दिल है कि एक पत्थर में ही समा गए । कोई कंकर शंकर कहलाया तो कोई पत्थर शिव लिंग । कभी भोले भंडारी तो कभी रौद्र रूप धारी । हम उसी पत्थर का अभिषेक करते हैं ।

श्रृद्धा और भक्ति को पुष्प द्वारा प्रकट किया जाता है और नफरत को ,पत्थर फेंककर । इसमें पत्थर का कोई दोष नहीं ;

इक लोहा पूजा में राख्यो

एक घर बधिक धरयो ।

पारस गुन अवगुन नहिं परखत

कंचन करत खरयो ।।

ठीक इसी प्रकार वही पत्थर जब मंदिर में रखा जाता है तो पूजा जाता है । पत्थर तो इतना बेबस है कि जब तक हम अपना सर उस पर नहीं पटकें,वह हमें हानि नहीं पहुंचा सकता । हमारी हिंसा ही उसे एक अस्त्र बनाती है ।

पत्थर बचपन में हमने भी फेंका है । गणेश चतुर्थी के चंद्रमा को देखना निषेध है । ऐसी मान्यता है कि कोई आप पर झूठी चोरी का इल्ज़ाम लगा देता है । हमारे लिए यह खेल बन गया था । चन्द्रमा को देखना, और किसी की छत पर पत्थर फेंकना । तब अधिकांश छतें पतरे की होती थी ।

बाद में यही पत्थर पहले कुत्तों पर और बाद में भीड़ में बरसने लगे । पत्थरबाजी,पतंगबाजी की तरह एक शौक हो गया । और आज वही पत्थर पूरी तरह बदनाम हो गया,जब उसे नफरत का पत्थर नाम दे दिया गया । नफ़रत हमारी,और बदनाम पत्थर । पत्थर को पत्थर ही रहने दो,उसे बदनाम ना करो । उसे अपनी नफरत का भागीदार तो मत बनाओ ।

आजकल किसी के घर शीशे के नहीं होते । शब्द बाण भी नफरत का पत्थर ही है । प्रेम और भक्ति में पुष्पों की वर्षा होती है,पुष्पगुच्छ का आदान प्रदान होता है । श्रद्धा में पुष्पांजलि भी अर्पित की जाती है । हमारे मुंह से भी शब्द पुष्प की तरह झरें ।

हमारे हाथों में पत्थर की जगह हमेशा फूल हो । जो पाषाण हृदय हैं,उनका हृदय पिघले । उसमें सदा करुणा का वास हो । आमीन ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

सुविधाओं की दौड़ में हमने सिर्फ पानी नहीं, रिश्तों की मिठास भी खो दी

गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना कुआँ अब बूढ़े आदमी जैसा लगता है।

चुप… थका हुआ… और भुला दिया गया।

उसके किनारों पर अब बच्चों की हँसी नहीं गूंजती। रस्सी की “चर्र-चर्र” वाली आवाज़ अब इतिहास बन चुकी है। जहाँ कभी औरतों की बातें, ठहाके और गीत गूंजते थे, बुज़ुर्ग वहीं बैठकर हुक्का पीते थे। वहाँ अब सिर्फ सूखी पत्तियाँ उड़ती हैं और कभी-कभी कोई छिपकली दीवार पर भागती दिखाई दे जाती है।

कुआँ मरता नहीं है। वह बस इंतज़ार करता है। किसी अपने के लौटने का।

लेकिन अब कौन लौटेगा?

अब तो हर घर में आरओ (RO) लगा है, हर हाथ में प्लास्टिक की बोतल है और हर इंसान खुद को “हाइजीनिक” समझकर मिट्टी की खुशबू से भाग रहा है।

दादी उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं –  मुझे याद है गर्मियों की दोपहरें।

जब सूरज आग उगलता था और खेतों की मिट्टी पैर जला देती थी।

तब एक पीतल की गागर लेकर कुएँ तक जाती थीं। रस्सी फेंकती थीं… बाल्टी “छपाक” से पानी में गिरती थी… और फिर दोनों हाथों से रस्सी खींचती थीं।

वह सिर्फ पानी नहीं निकाल रही होती थीं। वह धरती का दिल बाहर खींच रही होती थीं। उस पानी में ठंडक नहीं, दुआ होती थी। पहला घूंट गले से उतरता नहीं था… आत्मा तक पहुँच जाता था।

आज की बोतल वाला पानी? वह पानी नहीं, प्लास्टिक का घमंड है। उस पर लिखा होगा – “मिनरल वॉटर”, “प्योर”, “हिमालयन”।

कुएँ का पानी इंसान को जोड़ता था। बोतल का पानी इंसान को अकेला कर गया। पहले लोग कुएँ पर मिलते थे। कोई रस्सी पकड़ लेता था, कोई बाल्टी खींच देता था, कोई हालचाल पूछ लेता था। पानी भरते-भरते रिश्ते बन जाते थे। कई प्रेम कहानियाँ वहीं शुरू हुई थीं। कई झगड़े वहीं खत्म हुए थे।

अब?

अब हर कोई अपनी-अपनी बोतल लेकर घूम रहा है जैसे दिल नहीं, “पर्सनल पैकेजिंग” लेकर पैदा हुआ हो। पहले माँ मटके में कुएँ का पानी भरती थीं। उस मटके के ऊपर रखा पीतल का गिलास पूरे घर की प्यास बुझाता था। कोई “माय बोतल”, “योर बोतल” नहीं होता था। आज हर बच्चे के बैग में अलग बोतल है और हर इंसान के दिल में अलग अकेलापन।

कुएँ का पानी सिर्फ शरीर नहीं ठंडा करता था। वह इंसान का दिमाग भी शांत करता था। कुएँ के पास बैठो तो हवा अलग लगती थी। ऐसा लगता था जैसे धरती धीरे-धीरे तुम्हारे सिर पर हाथ फेर रही हो।

अब आरओ (RO) मशीन दीवार पर टंगी रहती है जैसे कोई सरकारी क्लर्क हो। उस मशीन में कोई आत्मा नहीं है। कुएँ में आत्मा थी। कुएँ के पानी में मिट्टी की हल्की-सी खुशबू होती थी।

वही खुशबू जो पहली बारिश में आती है और आदमी को बचपन में पहुँचा देती है। आज के फिल्टर उस खुशबू को “इम्प्योरिटी” बोलकर मार देते हैं।

कितनी अजीब बात है। हमने स्वाद को बीमारी मान लिया और केमिकल को शुद्धता।

अब गाँवों में भी लोग कहते हैं – “कुएँ का पानी मत पीना, सेफ नहीं है।” लेकिन वही लोग पिघला हुआ प्लास्टिक मिला पानी पी जाते हैं।

फिर डॉक्टर के पास जाकर पूछते हैं –  “पता नहीं शरीर में इतनी गर्मी क्यों बढ़ रही है?”

कुआँ गाँव का व्हाट्सऐप  (Whatsapp) था। हर खबर वहीं मिलती थी। किसके घर मेहमान आए, किसकी फसल अच्छी हुई, किसकी बेटी की शादी तय हुई – सब कुछ वहीं पता चलता था।

आज मोबाइल में हजारों कॉन्टैक्ट्स (Contacts) हैं, लेकिन दरवाज़ा खटखटाने वाला एक इंसान नहीं।

हमने सुविधा के चक्कर में जीवन का स्वाद खो दिया।

फ्रिज ठंडा दे सकता है, लेकिन ताज़गी नहीं।

आरओ साफ पानी दे सकता है, लेकिन अपनापन नहीं।

बोतल स्टेटस दे सकती है, लेकिन संतोष नहीं।

और सबसे दुखद बात?

अब कुएँ सिर्फ फिल्मों में दिखते हैं। हीरोइन वहाँ गाना गाती है, लोग फोटो खींचते हैं और फिर वापस मिनरल वॉटर पीने चले जाते हैं। कुएँ को हमने विरासत नहीं रहने दिया। उसे “बैकग्राउंड एस्थेटिक” बना दिया।

जिस कुएँ ने पीढ़ियों की प्यास बुझाई, आज उसी में लोग कूड़ा फेंक देते हैं।

प्लास्टिक की बोतलें… चिप्स के पैकेट… टूटी चप्पलें…

कभी-कभी लगता है, धरती माँ भी थक गई होगी।

वह सोचती होगी –  “मैंने इन्हें नदियाँ दीं, कुएँ दिए, बारिश दी… और इन्होंने बदले में मुझे प्लास्टिक लौटा दिया।”

अगली बार जब आप फ्रिज से बोतल निकालकर पानी पिएँ, तो एक पल रुकिएगा।

आँखें बंद करके उस पुराने कुएँ को याद कीजिएगा।

रस्सी की आवाज़… बाल्टी की छपाक… मटके की ठंडक…और दादी के हाथों का वह पीतल का गिलास।

फिर समझ आएगा –  

प्यास सिर्फ गले की नहीं थी। प्यास रिश्तों की भी थी। और वह प्यास… बोतलों से कभी नहीं बुझ सकती।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९५ ⇒ योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि…“।)

?अभी अभी # ९९५ ⇒ आलेख – योगाग्नि एवं क्रोधाग्नि  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम यहां वेद और आयुर्वेद की चर्चा नहीं कर रहे, ना ही उस जठरग्नि का जिक्र कर रहे, जिसके कारण हमारे पेट मेंअक्सर चूहे दौड़ा करते हैं, और जब कड़ाके की भूख लगती है, तो जो खाने को मिले, उसे कच्चा चबा जाने का मन करता है।

हमारा शरीर हो, अथवा यह सृष्टि, पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश, इन पांच तत्वों का ही तो सब खेल है। अग्नि को साधारण बोलचाल की भाषा में हम आग बोलते हैं। सोलर सिस्टम तक हम भले ही नहीं जाएं, सोलर एनर्जी तक हम जरूर पहुंच गए हैं। गरीब का चूल्हा और एक मजदूर की बीड़ी आज भी आग से ही जलती है। इतनी दूर बैठा सूरज, देखिए कैसा आग उगल रहा है। आपके पास जो आयेगा, वो जल जायेगा।।

अग्नि का धर्म ही जलाना है, खाक करना है। कलयुग में हम कितने सुखी हैं, कोई कितना भी जले, हमें बददुआ दे, हमारा बाल भी बांका नहीं होता। अगर सतयुग होता तो कोई भी सिद्ध पुरुष क्रोध में हमें शाप देकर भस्म कर देता।

आज भी आयुर्वेदिक चिकित्सा में भस्म का बहुत महत्व है। हमने बचपन में अपनी मां को राख से बर्तन मांजते देखा है, और यज्ञ और हवन की भस्म हमने भी माथे पर लगाई है।

एक अग्नि योग की होती है, जहां यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अवस्था के पश्चात योगियों के सारे काम, क्रोध, लोभ और मोह के विकार जल कर खाक हो जाते हैं, और उसमें योगाग्नि प्रज्वलित हो जाती है। हजारों वर्षों तक ये योगी तपस्या किया करते थे, तब जाकर भोलेनाथ प्रसन्न होते थे। मांग वत्स वरदान।।

यह सब सुनी सुनाई गप नहीं, हमारा सनातन धर्म है। मत करो भरोसा, हमें क्या। लेकिन हमारी बात अभी खत्म नहीं हुई। परशुराम, महर्षि विश्वामित्र और दुर्वासा के क्रोध के चर्चे तो आपने सुने ही होंगे। शिव जी के तीसरे नेत्र से कौन नहीं डरता। जहां योगाग्नि होगी, वहीं क्रोधाग्नि भी अवश्य मौजूद होगी। अग्नि तो अग्नि है, उसका काम ही भस्म करना है।

मर्यादा पुरुषोत्तम हों अथवा वासुदेव कृष्ण, कहीं अचूक रामबाण तो कहीं सुदर्शन चक्र, अगर एक बार चल गए तो बिना अपना काम किए, कभी वापस नहीं आते। बहुत सोच समझकर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जाता था।।

हमारे पास आज योगाग्नि तो है नहीं, लेकिन क्रोधाग्नि की कोई कमी नहीं। क्रोध में खुद ही जलते भुनते रहते हैं। शक्ति का प्रयोग उन्हें ही करना चाहिए, जिनमें विवेक बुद्धि हो, तप और स्वाध्याय का बल हो।

अग्नि से ही ओज है,

अग्नि से ही संहार है।

दुधारी तलवार है, योगाग्नि क्रोधाग्नि।

क्रोध आया, किसी पर हाथ उठा दिया, गाली गलौच कर ली, अपने ही कपड़े फाड़ लिए, हद से हद, अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली, लो जी, हो गई तसल्ली। क्या करें योगाग्नि तो है नहीं। ईश्वर समझदार है, कभी बंदर के हाथ में तलवार नहीं देता।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९४ ⇒ मि. एंड मिसेस कोयल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मि.एंड मिसेस कोयल…“।)

?अभी अभी # ९९४ ⇒ आलेख – मि. एंड मिसेस कोयल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो कूकती है, उसे कोयल कहते हैं। बचपन से आज दिन तक मैने केवल दो आवाजें ऐसी सुनी हैं, जिन पर समय, काल और परिस्थिति कोई प्रभाव नहीं पड़ पाया, एक तो स्वयं कोयल और एक कोकिल कंठी, लता मंगेशकर। अक्सर, दिन यही गर्मियों के होते थे, जब अचानक वातावरण में, किसी पेड़ की ऊंची शाखा से, कुहू कुहू की आवाज गूंज जाती थी। हम भी प्रत्युत्तर में उसकी नकल करते हुए कुहू कुहू दोहराते। हम थक जाते, लेकिन वह कभी नहीं थकती। आज भी वही

कोयल है, और वही उसकी चिर परिचित मीठी कूक।

हमने बचपन में एक अंग्रेजी कविता पढ़ी थी, जिसमें कोयल की कूक का जिक्र तो नहीं था, लेकिन एक मुर्गे महाशय का जरूर था।

The cock is crowing

And the birds doth twitter.

समय के साथ भले ही मुर्गे की आवाज दबती चली गई और घर की मुर्गी दाल बराबर हो गई हो, न तो मुर्गे ने बांग देना बंद किया और ने ही मुर्गी ने अंडे देना। कैसे कैसे वॉरियर्स हैं, वॉलंटियर्स हैं प्रकृति में, निष्काम, निःशब्द, निरहंकार।।

कोयल की बात हो, और सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जिक्र ना हो, यह मुमकिन नहीं। जब लताजी ने स्वर्ण सुंदरी का यह खूबसूरत गीत राग यमन में गाया होगा तो कोयल ने भी मुदित मन से ना केवल अपना सिर हिलाया होगा, लता जी के साथ जरूर कुहू कुहू दोहराया होगा। गीत देखिए ;

कुहू कुहू बोले कोयलिया

कुंज कुंज में भंवरे डोले

गुन गुन बोले, अमृत घोले।

इन पक्षियों को राग रागिनी कौन सिखलाता है। जो पक्षी गा सकता है, वह मूक कैसे कहला सकता है।

हम उसकी भाषा नहीं जानते, यह कहना ही ठीक होगा। ऐसा क्या है जिस कारण इन पक्षियों का शोर कलरव कहलाता है और हमारा शोर ध्वनि प्रदूषण। ।

जंगल में मोर नाचा, किसने देखा ! मोर महाशय कभी हमारे लिए नहीं नाचते। वे तो मिसेस मोरनी को प्रभावित करने के लिए अपने मोर पंख फैलाकर गोपीकृष्ण की तरह अपनी छटा बिखेरते हैं। यह एक आम धारणा है कि कोयल भी मादा ही है। बचपन की एक कविता तो यही कहती है ;

कौआ कोयल दोनों काले

पर दोनों के नाम निराले।

कांव कांव कौआ करता है,

कोयल कू कू बहुत सुहाती

डाल डाल पर वह है गाती। ।

अब जो गाती है, वह अगर कोयल हुई, तो कहीं ना कहीं उसके मिस्टर भी तो होंगे ही। जब मामले की तह में जाने की कोशिश की तो विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ कि हम जिसकी आवाज़ पर फिदा हैं, वे तो मिस्टर कोयल निकले। ये मिस्टर कोयल काले जरूर हैं, लेकिन इनकी ही कूक में दम है। यानी यहां भी मोर मोरनी वाला ही मामला दिखता है। हमें मिसेस कोयल से पूरी सहानुभूति है। हम कोई पक्षी विशेषज्ञ नहीं, अधूरा ज्ञान बांटने से अच्छा है, क्यों न किसी जानकार की राय ले ली जाए। हम तो इस विषय में पक्षी विशेषज्ञ सलीम अली को ही अथॉरिटी मानते हैं। इस विषय में क्या कहता है आपका पक्षी ज्ञान, पूछता है भारत।

यह हमारी भी आस्था का सवाल है। क्या नारी विमर्श की तरह पक्षी संगठन में मिसेस कोयल के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठा सकता। जिसकी आवाज मधुर है, जिसकी कुहू कुहू हमें बहुत सुहाती, वह कोयल ही है।

या यहां भी कोई धर्मराज इनकी आवाज को दबा देगा। नरो वा किं मादा वा। निष्कर्ष कुछ भी हो, कोकिल कंठ तो भारत रत्न लता ही हैं और सदैव रहेंगी। ।

स्वर तो स्वर होता है, हमारी भेद बुद्धि ही उसे स्त्री पुरुष के सांचे में ढालती है। नाद ब्रह्म भेद रहित होता है। जब प्रकृति और पुरुष का भी भेद समाप्त हो जाता है, तब ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है। लेकिन हमें इससे क्या।

मूक बेजुबान पशु पक्षियों को पालतू बनाना, उनके साथ अन्याय करना है। कोयल पक्षी भी बहुत समझदार है। दूर के ढोल की तरह वह भी, मनुष्य की पहुंच से ऊपर, वृक्ष की किसी ऊंची डाल पर ही अपना डेरा जमाता है।

इनके बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती है। इनके पास जाएं, इन्हें परखें, अपनाएं, लेकिन इनकी आजादी में बाधा ना पहुंचाए। इतना बड़ा आंचल है इस वसुंधरा का। प्रेम और दया के पात्र इन शांति दूतों की रक्षा और सुरक्षा ही पर्यावरण की सुरक्षा है। कभी आप मिसेस कोयल की आवाज सुनें तो बताएं, यकीनन, मिस्टर कोयल से उन्नीस ही होगी, बीस नहीं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७७ – देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७७ ☆ देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वैसे तो अपने हर शहर की लस्सी प्रसिद्ध होती हैं। लेकिन गुलाबी शहर का ये लस्सीवाला तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पूर्व काल (1944) का है। ये भी कह सकते हैं, अंग्रेजों के जमाने का है।

दही की लस्सी को पंजाब वाले अपना आविष्कार मानते हैं। हरियाणा वाले भी हिसार की भैंसों के दूध की दही की लस्सी को विश्व की सर्वोत्तम लस्सी का खिताब देते हैं। आप इसको चंडीगढ़ जैसा मसला मान सकते हैं, या फिर रसगुल्ला के जन्म स्थान बंगाल और उड़ीसा के बीच के विवाद जैसा समझ सकते हैं।

पुराने जयपुर (walled city) और नए शहर के मध्य में मिर्जा इस्माइल रोड पर ये दुकान स्थित है। आस पास में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी लस्सीवाला के नाम से मिलते जुलते नाम रख कर लस्सी बेचकर चांदी काटे जा रहे हैं।                            

लस्सी का सेवन मिट्टी के छोटे और बड़े सिकोरे (ग्लास) में उपलब्ध रहता है। सुबह सात बजे से तीन बजे दोपहर तक या स्टॉक रहने पर ही इसकी सप्लाई चालू रहती है। लस्सी अपेक्षाकृत गाढ़ी रहती है और लकड़ी की चम्मच से खाई भी जाती है। हमारे जैसे तो एक बार मुंह में ग्लास लगाने के बाद पेंदा देखकर ही रुकते हैं। बचपन से ही परिवार में इसका चलन था। दादाजी का एक कांसे का ग्लास जिसकी क्षमता तीन पाव करीब सात सौ मिलीलीटर थी। हमारा भी प्रिय बर्तन हुआ करता था।

युवावस्था में हमारे बैंक की जबलपुर सिटी शाखा से जुड़ी हुई लस्सी की प्रसिद्ध दुकान हुआ करती थी। सन ’75 के आस पास सवा रुपे का एक ग्लास मिलता था। उन दिनों में रेजगारी की किल्लत हुआ करती थी, इसलिए अकेले ही अनेकों बार चार ग्लास गटक जाया करते थे, ताकि रेजगारी की झंझट ही ना हो।

वर्तमान समय में नींबू के भाव कम करने में लस्सी सबसे अचूक हो रहीं हैं। मन में विचार आया, इसकी चर्चा कर लेते हैं, क्योंकि मीठा का सेवन तो अब प्रतिबंधित हो चुका है। कम से कम चर्चा तो कर ही सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९३ ⇒ व्यास पीठ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “व्यास पीठ…“।)

?अभी अभी # ९९३ ⇒ आलेख – व्यास पीठ ? श्री प्रदीप शर्मा ?

सृष्टि में पहले व्यास पीठ की स्थापना हुई, तत्पश्चात ज्ञानपीठ की ! ज्ञानपीठ तो केवल पुरस्कार प्रदान करता है, भक्ति और ज्ञान की गंगा तो केवल व्यास पीठ से ही प्रवाहित होती है !

ज्ञानपीठ में तो कई विद्वान पीठासीन होते हैं, लेकिन व्यास पीठ पर जो वक्ता विराजमान होते हैं, उसी में साक्षात महर्षि वेदव्यास पीठासीन हो जाते हैं।

हरि अनंत हरि कथा अनंता ! जो कथा है वही साहित्य है, कहानी है। संस्कृत में तो कई महाकाव्य रचे गए हैं, लेकिन रानी केतकी की कहानी ही, हिंदी की पहली कहानी कहलाती है। कथा हक़ीक़त होती है, कहानी में यथार्थ और कल्पना का मिश्रण होता है।।

बुद्धि और ज्ञान का जहाँ मिलन होता है, वह ज्ञानपीठ कहलाता है। ज्ञान और भक्ति का मार्ग वैराग्य का मार्ग है। जहाँ सरस्वती का वास है, वही वास्तव में व्यास पीठ है।

भागवत कथाओं का सागर है ! व्यास पीठ की कुछ मर्यादा है। कथा सामने बैठकर सुनी जाती है, पीछे बैठकर अथवा वक्ता के स्थान से ऊपर बैठकर नहीं। शुकतार में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिनों में जो कथा सुनाई, वही भागवत का सार है। भय से मुक्ति ही मोक्ष का आधार है। तक्षक नाग के काटने से सात दिनों में मृत्यु तो निश्चित है ही, क्यों न समय रहते भागवत कथा के जरिये भगवत स्मरण कर लिया जाए।।

कलयुग में मोक्ष अथवा मुक्ति इतनी आसान नहीं। सात दिनों में अंग्रेज़ी सीखिए की तर्ज़ पर केवल व्यासपीठ से भागवत कथा सुनने से आत्मिक शांति तो मिल सकती है, वैराग्य अथवा मुक्ति नहीं।

भय से मुक्ति और मनोविकारों से छुटकारा ही वैराग्य का आधार है। मृत्यु का भय ही वह तक्षक नाग है। वैराग्य पलायन नहीं, स्थूल संन्यास नहीं, केवल उस परम तत्व की तलाश है। ज्ञानपीठ हो या कोई व्यासपीठ, सत्य की खोज ही इनका आधार है। चिंतन, मनन, ध्यान, धारणा उस अज्ञात और अज्ञेय को पाने की, अथवा जानने की एक सतत प्रक्रिया है, जो अनादिकाल से चली आ रही है। जिन खोजां तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। बुद्धि, ज्ञान और विवेक को पीठ न देना ही ज्ञानपीठ का सम्मान करना है, किसी व्यासपीठ का हृदय से आदर करना है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३५ – मैराथन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३५ ☆ मैराथन… ?

…मैं यह काम करना चाहता था पर उसने अड़ंगा लगा दिया।

…मैं वह काम करना चाहती थी पर इसने टांग अड़ा दी।

…उसमें है ही क्या, उससे बेहतर तो इसे मैं करता पर मेरी स्थितियों के चलते..!

 ….अलां ने मेरे खिलाफ ये किया, फलां ने मेरे विरोध में यह किया…!

स्वयं को अधिक सक्षम, अधिक स्पर्धात्मक बनानेे का कोई प्रयास न करना, आत्मावलोकन न कर व्यक्तियों या स्थितियों को दोष देना, हताशाग्रस्त जीवन जीनेवालों से भरी पड़ी है दुनिया।

वस्तुतः जीवन मैराथन है। अपनी दौड़ खुद लगानी होती है। रास्ते, आयोजक, प्रतिभागी, मौसम किसी को भी दोष देकर पूरी नहीं होती मैराथन।

निदा फाज़ली जी ने लिखा है,

रास्ते को भी दोष दे, आँखें भी कर लाल,

चप्पल में जो कील है, पहले उसे निकाल।

अधिकांश लोग जीवन भर ये कील नहीं निकाल पाते। कील की चुभन पीड़ा देती है। दौड़ना तो दूर, चलना भी दूभर हो जाता है।

जिस किसीने यह कील निकाल ली, वह दौड़ने लगा। हार-जीत का निर्णय तो रेफरी करेगा पर दौड़ने से ऊर्जा का प्रवाह तो शुरू हुआ।

प्रवाह का आनंद लेने के लिए इसे पढ़ने या सुनने भर से कुछ नहीं होगा। इसे अपनाना होगा।

उम्मीद करता हूँ अपनी-अपनी चप्पल सबके हाथ में है और कील के निष्कासन की कार्यवाही शुरू हो चुकी है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९२ ⇒ आप किस मिट्टी के बने हैं ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आप किस मिट्टी के बने हैं…“।)

?अभी अभी # ९९२ ⇒ आलेख – आप किस मिट्टी के बने हैं ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

माना कि इंसान हाड़ मांस का पुतला है, लेकिन जब तक इस तन में सांस है, तब तक ही जीता जागता वन पीस है, बाद में तो इस मिट्टी में मिल ही जाना है। व्हाट्सएप ज्ञान की तरह ही कुछ ज्ञान इल्मी भी होता है, और कुछ फिल्मी भी। इल्म और फिल्म का जब कॉकटेल बनता है, तब यह कहा जाता है ;

माटी के पुतले

इतना ना कर तू गुमान

पल भर का तू मेहमान …

मतलब इस माटी के पुतले को वापस मिट्टी में ही मिल जाना है। यह शरीर ही तो हमारा घर है। यानी घर भी मिट्टी का और यह शरीर भी मिट्टी का। घर बनाते समय तो हम बढ़िया बिल्डिंग मटेरियल लगाते हैं। छांट छांटकर बढ़िया गारा, ईंट, मिट्टी, सरिया और सीमेंट लाते हैं। कहीं सागौन की लकड़ी तो कहीं शीशम के दरवाज़े। बढ़िया फर्नीचर और बढ़िया कांच का सामान। इंटीरियर पर कितना खर्च करते हैं। मकान कहां जिंदगी में बार बार बनता है। इसलिए जिंदगी भर की कमाई हमने शानदार मकान में लगाई।।

और हमारा यह शरीर किस मिट्टी का बना है, कभी सोचा है। जब हमारा शरीर बन रहा था, तब तो हम आराम से सो रहे थे अथवा रो रहे थे, हमें कुछ नहीं पता। जिस तरह मिट्टी को तराशा जाकर, कुम्हार द्वारा, उसे कोई आकार दिया जाता है, वैसे ही हमें भी एक आकार मिला। किस शक्ति ने हममें प्राण फूंके, हमें पता नहीं। लेकिन हम जब पैदा हुए तब किसी की गोद में, हाथ पांव मारते हुए कभी किलकारी मार रहे थे, तो कभी रो रहे थे।

एक पानी के मटके को देखकर आप भले ही यह अंदाज लगा लें कि वह किस मिट्टी का बना है, लाल अथवा काली मिट्टी का। एक मटके में भले ही जान ना हो, लेकिन जब उस मटके का ठंडा पानी, हलक से नीचे उतरता है, तो ऐसा महसूस होता है मानो किसी ने शरीर में प्राण फूंक दिए हों। जल ही जीवन है।।

अगर किसी माटी के घड़े ने रत्ती भर भी यह गुमान कर लिया कि कुम्हार ने जैसा मुझे घढ़ा है और जिस मिट्टी से घढ़ा है, उससे बेहतर कोई मिट्टी नहीं और उससे बढ़िया कोई घड़ा नहीं, तो घड़े में सिर्फ एक छेद ही काफी है उसके अहंकार को पानी पानी करने के लिए। एक कंकर से मटकी फूट जाती है, और घड़े की किस्मत भी फूट जाती है। जल्द ही उसे परंडे से बेदखल कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

माटी के इस पुतले पर इतना गुमान ठीक नहीं। हम सब एक ही मिट्टी के घड़े हैं। हमारा कुम्हार कोई छोटा मोटा कुम्हार नहीं, उसने पूरी दुनिया बनाई है। अलग मिट्टी के मुगालते मत पाल हे जीव !

उसी मिट्टी से उसने कीड़े मकोड़े बनाए हैं, बस शुक्र मना उस कुम्हार का, जिसने तुझे जीता जागता माटी का पुतला बना डाला। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हम सब एक ही माटी के पुतले हैं। वही मिट्टी तो हमारी भारत माता है। उसका हमारा जन्म जन्मांतरों का नाता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९१ ⇒ धर्म संकट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धर्म संकट…“।)

?अभी अभी # ९९१ ⇒ आलेख – धर्म संकट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

धर्म संकट का धर्म से कोई संबंध नहीं! एक अधर्मी भी धर्म संकट में पड़ सकता है। हम लोगों का रोज धर्म संकट से वास्ता पड़ता है। बाहर पिक्चर का प्रोग्राम बनाया और कोई अतिथि आ धमके। आदर सत्कार के बाद किसी बीमार को देखने जाने का बहाना ऐसे मौकों पर आम होता है। सबसे बड़ा धर्मसंकट वैसे भी अतिथि तुम कब जाओगे, का ही होता है।

धर्म संकट की काट युक्ति होती है! सुग्रीव-बाली संग्राम में बाली का वध मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम युक्ति से ही करते हैं। एक सी शक्ल वाले दो भाइयों में से बाली को पहचानना इतना आसान नहीं था। बाली को सामने से नहीं मारा जा सकता था, क्योंकि उसके प्रतिद्वंद्वी का आधा बल उसे मिल जाता था। अतः एक भाई को पुष्पहार धारण करा दिया जाता है और बाली वध सम्पन्न हो जाता है। अधर्मी को छल से मारने में कैसा धर्म-संकट।।

मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, को आप कंफ्यूज़न कहेंगे, या धर्म संकट! अच्छे और बुरे में से एक को चुनना कोई धर्म संकट नहीं। वहाँ तो बुद्धि और विवेक काम आ जाते हैं। लेकिन जब दोनों बुरों में से किसी एक को चुनना हो तो, सलाह दी जाती है, कम बुरे को चुनो। बस वहीं धर्म संकट आ खड़ा होता है। कम बुरे को भी क्यों चुनो।

लीलाधारी योगेश्वर श्रीकृष्ण के पास महाभारत युद्ध के समय कोई धर्म संकट नहीं था, वे चाहते तो स्पष्ट रूप से धर्मराज युधिष्ठिर का साथ दे सकते थे और कौरवों का विरोध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने दुर्बुद्धि दुर्योधन के सामने एक प्रस्ताव रखा। या तो मुझे ले लो, अथवा मेरी अक्षौहिणी सेना! बस, यहीं विवेक मात खा जाता है! विनाश काले विपरीत बुद्धि। मूर्खों के सामने कोई धर्म संकट नहीं होता। और दुर्योधन ने कृष्ण की चतुरंगिनी सेना माँग ली। अर्जुन चतुर था, उसे बिना मांगे न केवल कृष्ण जैसे सारथि मिल गए, पूरे विश्व को इस बहाने गीता का ज्ञान भी उपलब्ध हो गया।।

हमारे लिए मतदान कब धर्म-संकट सिद्ध हुआ! मतदान प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, लोग शिक्षित, समझदार होते जा रहे हैं। घंटों कतार में खड़े रहकर आत्म-विश्वास से अपने मताधिकार का उपयोग करना ही स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है।

सोशल मीडिया पर जितनी भी उँगली उठाई जा रही है, मतदान के बाद दिखाई गई स्याही वाली उँगली सभी धारणाओं को ध्वस्त करती नज़र आ रही है कि मतदाता के मन में अपने उम्मीदवार को चुनने में कोई संशय है। कोई धर्म संकट नहीं। कोई देवासुर-संग्राम नहीं। महाभारत तो बिल्कुल नहीं! लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५१ – आलेख – मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५१ ☆

☆ आलेख ☆ ~ मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां  एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।

साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो  वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और  उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये  सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज  लिखता हूँ या  अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।

एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने  जब यह जानना चाहा था  कि  मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में  कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी)  क्षत्रियों का गांव है।

मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों  तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी  ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।

इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव  मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए,  सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर  यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे  थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री  उदय शंकर सिंह जी से  मिला।

यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।

अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।

होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।

वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।

उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है,  किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था।

छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण  स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे,  उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।

गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में  बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे  ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिणा दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना,   मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।

वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।

शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है ।

यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना,  उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था ।

विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न,  धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में  बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।

मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।

अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी ।  या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।

दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं   मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।

आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा।   आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना  था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।

यद्यपि आजकल मैं  उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।

यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है।  उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है ।  पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं,  वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।

यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया ।

इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।

सादर

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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