हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४३ ⇒ मन की बातें, मन ही जाने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मन की बातें, मन ही जाने ।)

?अभी अभी # ८४३ ⇒ आलेख – मन की बातें, मन ही जाने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मन रे, तू काहे न धीर धरे ! गोपियों ने तो आसानी से कह दिया, उधो ! मन नहीं दस बीस। मन की शरीर में एक्ज़ेक्ट लोकेशन किसी को पता नहीं है। कभी लोग दिल को मन मान बैठते हैं, तो कभी दिमाग को।

मन संकल्प विकल्प करता है, और दिमाग सोचता है। अगर कभी, मन नहीं करे, तो दिमाग कुछ सोचता भी नहीं। आप कह सकते हैं कि दिल और दिमाग़ पर मन की दादागिरी है।।

अध्यात्म में मन पर लगाम कसने की बात की जाती है। मन बड़ा उच्छ्रंखल है ! साहिर ने मन पर पीएचडी की है ! तोरा मन दर्पण कहलाये। भले बुरे, सारे कर्मों को, देखे और दिखाए। यानी मन, मन ना हुआ, किसी पुराने फिल्मी थिएटर का प्रोजेक्टर हुआ। वह फ़िल्म देखता भी है, और उसे दर्शकों को दिखाता भी है। एक व्यक्ति मन मारकर प्रोजेक्टर चलाता है, हम मन लगाकर फ़िल्म देखते हैं। सही भी तो है ! कहीं हमारा मन लग जाता है, और कहीं हमें मन को मारना पड़ता है।

हमारे शरीर में जितना स्थूल है, वह सूक्ष्म यंत्रों से देखा जा सकता है। दिल, दिमाग़, लिवर और किडनी ! किडनी दो, बाकी तीनों एक एक। दो दो हाथ, दोनों कान, दो ही आँख, और एक बेचारी नाक ! हमारी समझ से बाहर की बात है। दाँतों तले उँगली दबाइए, और उस बनाने वाले का एहसान मानिए।।

जो हमारे अंदर है, लेकिन नहीं नज़र आते, वे मन, चित्त, बुद्धि, और अहंकार हैं। जब हम मन की बात करते हैं, तो कभी उसके विकारों की बात नहीं करते। दुनिया में इतनी बुराई है, कि हमें अपनी बुराई कहीं नजर ही नहीं आती। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को मन के विकार माना गया है। भले ही आप इन्हें विकार मानें, लेकिन इनके बिना भी कहीं संसार चला है।

बुद्धि का काम सोच विचार करना है। चित्त और मन को आप अलग नहीं कर सकते ! हमारे लिए तो दिल, चित्त और मन सब एक ही बात है। कौन ज़्यादा मगजमारी करे। हमारी आम भाषा में अगर कहें तो भई दिल को साफ रखो। किसी के प्रति मन में मैल न आने दो और चित्त शुद्धि के प्रति सजग रहो।।

एक गांठ होती है, जिसे प्रेम की गांठ कहते हैं। यह जितनी मजबूत हो, उतनी अच्छी ! दुश्मनी की गांठ अगर ढीली होती जाए, खुलती चली जाए, तो बेहतर। दुश्मनी दोस्ती में बदल जाए, तो और भी बेहतर।

मन में भी गांठ पड़ जाती है ! यह बहुत बुरी होती है। चिकित्सा पद्धति में शरीर की किसी भी गांठ का इलाज है, मन की गांठ का नहीं। प्रेम, भक्ति और समर्पण ही वह संजीवनी औषधि है, जो मन की गांठ को खोल सकते हैं। जब मन मुक्त होता है, मस्त होता है, तब ही ये बोल सार्थक होते हैं;

मन मोरा बावरा !

निस दिन गाए, गीत मिलन के।

चिंता को चिता कहा गया है !

कम सोचो। चिंतन अधिक करो। किसी माँ को कभी मत सिखाना कि चिंता मत करो।

माँ का नाम ही care and concern है। हम भी अगर खुद का खयाल रखें, और थोड़ी बहुत दूसरों की भी चिंता करें, तो कोई बुरा नहीं। मन लगा रहेगा, दिल को तसल्ली मिलेगी और हाँ, थोड़ा बहुत चित्त भी शुद्ध होगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व

आज के डिजिटल युग में मनुष्य अपनी ही बनाई दौड़ में थककर गिर रहा है, तब प्रकृति हमें एक शांत, स्थिर और सुकून भरी पुकार देती है—

“रुक जाओ… मेरी गोद में आओ… मैं तुम्हें फिर से जीवन दूँगी।”

हरियाली केवल पेड़–पौधों का रंग नहीं है, यह जीवन का मूल भाव है। जिस दिन मनुष्य से पेड़ छिन जाते हैं, उसी दिन उसकी साँस, उसकी शांति, उसका अस्तित्व भी खोने लगता है। इसीलिए कहा जाता है—

“धरती हर बार देती है… बस लेने वाले हाथ हरे होने चाहिए।”

आज पर्यावरण संकट दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। प्रदूषण बढ़ रहा है, वर्षा घट रही है, तापमान असंतुलित हो रहा है, और धरती अपनी थकान का इजहार कर रही है। किंतु इससे बाहर निकलने का सबसे सुंदर, सरल और प्रभावी उपाय भी वही है—

प्रकृति।

एक पौधा लगाना किसी दान से कम नहीं। यह ऐसा पुण्य है जिसकी छाया हम नहीं, आने वाली पीढ़ियाँ पाती हैं।

जब हम बीज बोते हैं, तो सिर्फ एक बीज नहीं डालते…

हम धरती की धड़कन में एक नई धुन जोड़ते हैं।

बुज़ुर्ग कहते थे—

“पेड़ हमारी छाया नहीं, हमारी शिक्षा हैं।

सिखाते हैं—स्थिर रहो, देते रहो, और किसी से बदले में कुछ मत माँगो।”

हमारे गाँवों और कस्बों की पहचान कभी उनके बरगद, नीम, पीपल और आम के पेड़ों से होती थी। बच्चे पेड़ों पर खेलते थे, रास्ते में यात्री छाया पाते थे, और घरों में हवा ठंडी बहती थी। पर आज इन पेड़ों की कमी ने हमारे जीवन से ठंडक, ताज़गी और अपनापन छीन लिया है।

समय आ गया है कि हम फिर से प्रकृति को उसके सम्मान की जगह दें।

ग्रीन मोटिवेशन का अर्थ सिर्फ पौधा लगाना नहीं, बल्कि अपनी सोच को हरियाली से भरना है।

घर की छत पर दो गमले लगाना—छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव लाती है।

बच्चों को पौधों की देखभाल सिखाना—यह उनके चरित्र में संवेदनशीलता बोता है।

प्लास्टिक कम करना और मिट्टी को जगह देना—यही धरती की असली पूजा है।

हर त्यौहार, हर शुभ काम पर एक पौधा समर्पित करना—यह संस्कृति को हरियाली से जोड़ देता है।

हरियाली कोई विकल्प नहीं… यह जीवन का आधार है।

अगर आज पेड़ बचे रहेंगे, तो कल हमारी पृथ्वी सांस ले सकेगी।

अगर आज हम पौधे लगाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी।

आइए मिलकर एक संकल्प लें—

“जहाँ हम खड़े हों, वहाँ जीवन उगे।”

प्रकृति हमें कभी खाली हाथ नहीं लौटाती।

बस हमें उसके साथ चलने की जरूरत है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४२ ⇒ जीवित प्रमाणित ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीवित प्रमाणित।)

?अभी अभी # ८४२ ⇒ आलेख – जीवित प्रमाणित ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाल ही में, मैं अपने आपको, जीवित घोषित और प्रमाणित करके आया हूं। वैसे तो जीते सभी हैं, लेकिन मनुष्य योनि में मुख्य रूप से योगी, भोगी और रोगी ही जीवित देखे जाते हैं। योगी ईश्वर के लिए जीता है, तो भोगी सौ वर्ष तक सांसारिक सुख भोगना चाहता है, और रोगी की आस, स्वस्थ होने की उम्मीद और जिजीविषा उसे हमेशा जीवित रखती है। केवल एक पेंशनभोगी ही ऐसा प्राणी है, जो सिर्फ़ पेंशन पर जीता है। यानी पेंशन ना हुई, उसकी लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम अर्थात् वेंटीलेटर हुई।

डिजिटल युग में घर बैठे ऑनलाइन भी अपने आपको जीवित घोषित किया जा सकता है, इसके लिए बस अपने मोबाइल अथवा डेस्कटॉप पर क्लिक किया, और आप जीवित सिद्ध हुए। जीना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन जीवित रहना एक पेंशनभोगी का कर्तव्य भी है, क्योंकि उसे पेंशन जीवित रहने के लिए ही दी जाती है। सेवामुक्ति के पश्चात् आजीवन उसे एक पेंशनभोगी योनि में ही आखरी सांस तक, दिन रात गुजारने हैं।।

पेंशन यूं ही मुफ्त में नहीं मिल जाती, इसके लिए कुछ वर्ष तो गुजारिए परिश्रम और लगन से किसी शासकीय, अर्ध शासकीय दफ्तर में। सस्पेंड होने और टर्मिनेट होने के अंदेशे से अपने आपको बचाते हुए, क्लीन चिट मिलने के पश्चात् ही यह सुनहरा पल एक वेतन भोगी के जीवन में आता है। जो दुनिया में कुछ नहीं कर सकता, केवल वह ही आसानी से नौकरी कर सकता है। केवल कुछ कर गुजरने वाले ही आपसे नौकरी, चाकरी और गुलामी तक करवा लिया करते हैं। पहले आपसे सिर्फ वोट मांगा, और बाद में वामन अवतार की तरह दानवीर बाली को कंगाल कर बैठे।

असली अन्नदाता तो वही है, जो हर व्यक्ति को रोजी रोटी दे, लेकिन कुछ पुण्यात्मा ऐसे भी होते हैं, जो मुफ़्त में राशन, बिजली, पानी और दवा दारू भी बांटा करते हैं, और प्रभु के गुण गाया करते हैं ;

राम की दुनिया, राम का खेत।

खा ले चिड़िया भर भर पेट।।

लेकिन आदमी जिस चिड़िया का नाम है, उसका पापी पेट कभी भरता ही नहीं। कभी ये दिल मांगे मोर, तो कभी एक के साथ एक फ्री। उसे उसके आज की ही नहीं, कल की भी चिंता जो रहती है।।

हम कल की चिंता से मुक्त इसीलिए तो हैं, कि हमें कल भी पेंशन मिलती रहेगी। हमारी पेंशन का संबंध हमारी साँसों से है। बसंती के पाँवों की तरह जब तक हमारी साँसें चलेगी, तब तक हमें भी यकीन है, हमें हमारी पेंशन मिलती रहेगी। पेंशन है तो जीवन है, जीवन है तो पेंशन है। जब पेंशन है तो क्या टैंशन है।

अटेंशन, अटेंशन पेंशनर्स !

जीवन प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें, जीना इसी का नाम है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क्षण-क्षण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क्षण-क्षण ? ?

कविता का एक दिवस होता है। लघुकथा का एक दिवस होता है। कहानी का एक दिवस होता है। नाटक का एक दिवस होता है। नृत्य का एक दिवस होता है। हर विधा, हर कला का एक दिवस होता है। कविता दिवस पर रचता हूँ कविता, लघुकथा दिवस पर लिखता हूँ लघुकथा। जैसा दिन होता है, वैसा सृजन करता हूँ, मैं हूँ जो सबसे हटकर जीता हूँ।

..सुनो,  हर क्षण अनुभूति का होता है। हर क्षण अभिव्यक्ति का होता है। अनुभूति स्वयं चुनती है अभिव्यक्ति। अभिव्यक्ति स्वयं चुनती है अपनी विधा। हर अनुभूति, हर अभिव्यक्ति, हर कला, हर विधा का हर क्षण होता है।

…हर क्षण सृजन का होता है, हर क्षण विसर्जन का होता है। हर क्षण जीवन का होता है और हर क्षण मरण का भी होता है।

याद रहेगा ना…!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ हँसी की लहरों के पीछे छिपा गहरा विज्ञान: Laughter Yoga ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌷हँसी की लहरों के पीछे छिपा गहरा विज्ञान: Laughter Yoga🤣☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

सुबह-सुबह पार्क में लोगों को ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए देखना आजकल आम बात है। दूर से देखने पर यह दृश्य कभी-कभी हास्यास्पद या अटपटा लगता है। लेकिन उन हँसी की लहरों के पीछे एक गहरा विज्ञान छिपा है—Laughter Yoga. यह केवल मज़ा-मस्ती नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित अभ्यास है, जो शरीर, मन और भावनाओं को स्वस्थ बनाने के लिए तैयार किया गया है।

🌷हास्ययोग: बिना कारण हँसने की अनोखी पद्धति

Laughter Yoga (LY) का मूल विचार बहुत सरल है—अगर हँसी स्वास्थ्य के लिए इतनी लाभदायक है, तो इसके लिए चुटकुलों या कॉमेडी का इंतज़ार क्यों करें? क्यों न हँसी को ही एक व्यायाम बना दिया जाए!

इसी सोच से LY की शुरुआत हुई। इसमें हँसी को स्वेच्छा से, छोटे-छोटे अभ्यासों और childlike playfulness के ज़रिये पैदा किया जाता है। इसमें हास्य की ज़रूरत नहीं, बस हँसने की इच्छा और समूह का माहौल चाहिए।

मज़ेदार बात यह है कि शरीर असली और बनावटी हँसी में फर्क नहीं करता। हँसी शुरू होते ही शरीर वैसी ही प्रतिक्रिया देता है—लाभ तुरंत मिलते हैं।

डॉ. एंड्रयू वील के शब्दों में:

“Laughter oxygen बढ़ाता है, immunity को मज़बूत करता है, दर्द कम करता है, stress घटाता है और दिल की बीमारी, diabetes, arthritis, migraine और cancer से रक्षा करता है। यह technique सुरक्षित, सीखने में आसान, और मज़ेदार है।”

🌷नॉर्मन कज़िन्स की कहानी: हँसी से दर्द पर विजय

अमेरिकी लेखक नॉर्मन कज़िन्स की कहानी ने दुनिया भर का ध्यान हँसी की चिकित्सा शक्ति की ओर खींचा। रीढ़ की एक गंभीर बीमारी से जूझते हुए उन्होंने पाया कि दस मिनट की दिल खोलकर की गई हँसी उन्हें दो घंटे की pain-free नींद देती थी।

उनके अनुभव के बाद वैज्ञानिकों ने शोध किया और पता चला कि हँसी शरीर में endorphins—यानी प्राकृतिक painkillers—को बढ़ाती है। कज़िन्स हँसी को “internal jogging” कहते थे, क्योंकि इससे शरीर के अंगों में हलचल होती है, साँस गहरी होती है और उम्मीद की ऊर्जा एवं उमंग पैदा होती है।

🌷हँसी एक व्यायाम है: विज्ञान क्या कहता है

डॉ. विलियम फ्राय ने शोध करके बताया कि हँसी शरीर की ज़्यादातर प्रणालियों को सक्रिय कर देती है। वे कहते हैं,

“Mirthful laughter अच्छा physical exercise है और respiratory infections का खतरा कम करता है।”

Loma Linda University के डॉ. ली बर्क ने पाया कि हँसी stress hormones को घटाती है और immunity को मजबूत करती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. माइकल मिलर ने खोजा कि हँसी blood vessels को फैलाती है, जिससे blood circulation बढ़ता है और cardiovascular disease का खतरा कम होता है।

इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि दस मिनट की जोरदार हँसी तीस मिनट की रोइंग मशीन पर exercise के बराबर होती है।

🌷Motion Creates Emotion: मन और शरीर का गहरा संबंध

1884 में मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने बताया कि शरीर और मन एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। अगर मन खुशी पैदा करता है, तो शरीर प्रतिक्रिया देता है; और अगर शरीर खुशी का अभिनय करे, तो मन में भी वही भावना पैदा होती है।

यही सिद्धांत Laughter Yoga की रीढ़ है। जब हम कृत्रिम रूप से भी हँसना शुरू करते हैं, तो कुछ ही मिनटों में दिमाग में खुशी की लहरें बनने लगती हैं। बच्चों जैसे हाव-भाव, ताली बजाना, “हो-हो, हा-हा-हा” जैसे chanting—ये सब मन को स्वतः प्रसन्न अवस्था में ले जाते हैं।

मन और शरीर का यह मेल LY की सच्ची शक्ति है।

🌷हँसना भी एक Skill है

LY का एक और सिद्धांत है कि laughter can be programmed into your body. यानी हँसना एक skill की तरह सीखा जा सकता है। जैसे साइकिल चलाना या तैरना सीख लिया तो जीवन भर भूलते नहीं, वैसे ही एक बार हँसी का अभ्यास सीख लें, तो शरीर खुद उसे याद रखता है।

नियमित अभ्यास से दिमाग में नए neuronal connections बनते हैं, जो happy chemistry पैदा करते हैं। फिर भले ही कोई कारण न हो, मन हल्का और प्रसन्न रहता है।

🌷लोगों के सान्निध्य में हंसना

न्यूरोसाइंटिस्ट रॉबर्ट प्रोवाइन ने बताया कि हम ज़्यादातर बार किसी मजाक पर नहीं, बल्कि लोगों के साथ होने पर हँसते हैं। दोस्त से “हैलो, कैसे हो?” कहने भर से भी हल्की हँसी आती है—क्योंकि हँसी सामाजिक व्यवहार है।

इसका एक कारण है Mirror Neurons—हमारे दिमाग की वे कोशिकाएँ जो दूसरों की भावनाओं की नकल कर लेती हैं। किसी को हँसते देख कर हमारा मन भी हँसी की ओर खिंचता है।

मनोवैज्ञानिक पॉल एक्मैन और रॉबर्ट लेवेनसन ने यह भी पाया कि “put on a happy face” सच में काम करता है। चेहरा मुस्कुराता है, तो मन में भी खुशी पैदा होती है। यही प्रक्रिया आप हर सुबह हँसी क्लबों में देख सकते हैं।

🌷शरीर को फर्क नहीं पड़ता कि हँसी असली है या नकली

चार्ल्स शेफ़र का शोध बताता है कि

“Forced laughter adults के लिए mood और mental well-being बढ़ाने का एक सस्ता, सरल और प्रभावी तरीका है। शरीर को नहीं पता कि हँसी बनावटी है—even though your brain might know.”

बस हँसी शुरू होनी चाहिए, उसके बाद शरीर अपना काम खुद कर लेता है—endorphins बढ़ते हैं, stress घटता है और मन हल्का हो जाता है।

🌷“Joy Cocktail”: हँसी से उठने वाली सकारात्मक तरंगें

Laughter Yoga Movement के जनक डॉ. मदन कटारिया बताते हैं कि नियमित हँसी से शरीर में happiness, warmth, unconditional love, bonding, tolerance, forgiveness, generosity और compassion जैसे गुणों से भरे hormones और neuropeptides निकलते हैं। वे इसे प्यार से “joy cocktail” कहते हैं।

शायद यही वजह है कि Laughter Clubs का माहौल परिवार जैसा लगता है—लोगों में अपनापन, जुड़ाव और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

और डॉ. कटारिया का प्रसिद्ध वाक्य—

“When you laugh, you change; and when you change, the whole world changes.”

—लाफ्टर योग की आत्मा को पूरी तरह व्यक्त करता है।

🌷सरल लेकिन गहरा अभ्यास

पहली नज़र में Laughter Yoga एक हल्का-फुल्का खेल लगता है, पर वास्तव में यह मनोविज्ञान, शरीर-विज्ञान, न्यूरोसाइंस और योग का सुंदर संगम है। यह शरीर में oxygen बढ़ाता है, मन से विषाद हटाता है, immunity मजबूत करता है, भावनाओं को संतुलित करता है और समाज में खुशियों के पुल बनाता है।

हँसी सिर्फ मनोरंजन नहीं—यह स्वास्थ्य और सुख की ओर ले जाने वाली एक पूरी यात्रा है।

 #laughteryoga #हास्ययोग

 © जगत सिंह बिष्ट

लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “जिजीविषा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆

✍ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वैज्ञानिकों का मत है कि करीब बीस अरब वर्ष पहले एक बड़े धमाके के साथ सृष्टि का वर्तमान क्रम चालू हुआ।  तारों में सौर मंडल, उसमें पृथ्वी का जन्म, फिर उसका ठंडा होना, जल ऊपर आना और प्रारंभिक जीव वनस्पतियों का उद्गम। अनुमान यह है कि मछली से मानव तक कुल विकास गत 60 करोड़ वर्षों का है। इस विकास क्रम का भी अपना इतिहास है। कहते हैं कि प्रत्येक जीव जंतु का शरीर कोशिकाओं का गोदाम है और सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन तथा खाद्य अणु पहुंचाना और फालतू कचरा बाहर निकालना शरीर द्वारा होता है। व्यवस्था और प्रणाली भिन्न भिन्न हैं परंतु मैलिक कार्य में कोई अंतर नहीं है। धरती पर प्रजनन सर्व प्रथम पानी में ही हुआ और उसके बाद गीली और फिर सूखी भूमि पर। ऑक्सीजन प्राप्त की जाती रही पर बाद में श्वसन प्रणाली भी विकसित हुई। अनुभूति इंद्रियां, हृदय, स्मृति सबका विकास हुआ परंतु इच्छा कैसे पैदा हुई और उसका विकास क्रम का पता नहीं।

बिना इच्छा के तो कुछ होता ही नहीं परंतु जीने की इच्छा का क्या मतलब। जन्म हुआ है तो जीना ही पड़ेगा। फिर जीने की इच्छा हो या न हो, जीना ही होगा। परंतु फिर भी जीने की इच्छा है और वह सदा जीने की, अमर होने की। आध्यात्मिक मत है कि यह सृष्टि ब्रह्म से पैदा हुई, उसकी एक से अनेक होने की इच्छा हुई और वह अनेक हो गया। क्यों हुआ यह कोई नहीं जानता। लाभ हानि के हिसाब से अच्छी बुरी इच्छा का वर्गीकरण भी हुआ। आज संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह मानव इच्छा का ही परिणाम है। इच्छा प्रकट करने के लिए भाषा बनी, लिखना शुरू हुआ। विभिन्न ग्रंथ लिखे गए। सभ्यता बनीं, सिद्धांत बने। रहने के लिए महल बने। चलने के लिए सड़क बनीं और उन चलने के लिए अनेक वाहन। भूमि कम पड़ी तो जल और आसमान में भी वाहन चलने लगे। फिर भी इच्छा पूरी नहीं हुई।एक पैदा होती है और उसके पूरी होने पर दूसरी सामने आकर खड़ी हो जाती है।

आध्यात्मिक गुरु कहते हैं कि इच्छा त्यागो, जबकि यह कहना भी एक अच्छा है।  मृत्यु होने पर संसार से छुटकारा मिल जाता है परंतु फिर भी मुक्ति की इच्छा है। किससे मुक्ति की इच्छा? यह भी तो एक इच्छा है। औरों की सुधारने की इच्छा भी बड़ी प्रबल होती है। अमर होने की इस इच्छा ने कितने जीव जंतुओं मानवों का विनाश किया है, इसका कोई हिसाब नहीं।  उत्पत्ति सृष्टि है अपने आप होती है और विनाश किया जाता है जो इच्छा से होता है।  अब जीने की इच्छा को अदम्य साहस के रूप में भी देखा जाने लगा है। फिर भी इच्छा का उत्स नहीं पता।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४१ ⇒ छोटे-बड़े सपने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छोटे-बड़े सपने।)

?अभी अभी # ८४१ ⇒ आलेख – छोटे-बड़े सपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग स्वप्नदृष्टा होते हैं !। वे देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखते रहते हैं। सपने देखने के लिए चैन की नींद जरूरी है। कोई आपका स्वप्न भंग न कर दे। इसलिए वे सख्त हिदायत देकर सोते हैं। देश के लिए बड़ा सपना देख रहा हूँ। do not disturb.

फिल्मों की तरह ही होते हैं ये सपने ! कभी बहुत बड़े, कभी बहुत छोटे। सपने देखने के पहले, रुपहले पर्दे पर यह लिखा हुआ नहीं आता, फ़िल्म कितने रील की है। अच्छी है या बुरी, इसकी कोई समीक्षा पहले नहीं होती। एकदम लाइव टेलीकास्ट शुरू हो जाता है।।

कोई फ़िल्म सपनों का सौदागर जैसी वाहियात निकल जाती है तो कोई मेरा नाम जोकर जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म। देशभक्त लोग, देशहित में यादगार और यलगार जैसी फिल्में सपनों में देखना पसन्द करते हैं। एक बार तो सपने में चेतक पर सवार, महाराणा प्रताप बन नाला पार कर रहे थे। चेतक का पाँव फिसल गया और उनकी नींद टूट गई, वे पलंग के नीचे गिरे हुए थे।

बड़े सपने देखना इतना आसान भी नहीं होता। एक मच्छर भी आपके सपनों को चूर-चूर कर सकता है। सपनों के लिए मच्छरदानी एक मुफ़ीद जगह है अगर सपना ज़्यादा डरावना न हुआ तो। जो डरते हैं, उन्हें सपने कम देखना चाहिए। जिन्हें कुर्सी छिन जाने का डर है, उन्हें कुर्सी पर बैठकर सपने नहीं दिखाना चाहिए। जनता जागरूक है।।

रात लंबी ज़रूर होती है लेकिन और लंबी हो जाती है, जब चैन की नींद नहीं आती। जो सत्ता में हैं, उन्हें विपक्ष के सपने आते हैं। विपक्ष को तो सपने में भी कुर्सी ही नज़र आती है। चैन की नींद में या तो सपने आते ही नहीं, और अगर आते भी हैं तो अक्सर सुहाने ही होते हैं, बहारों के सपने होते हैं। चुनावी जीत के ढोल में खलल पड़ता है, जब मोबाइल की घंटी अचानक बज उठती है।

समय की माँग है कि बड़े बड़े सपने ना तो देखे जाएँ, और न ही दिखाए जाएँ ! छोटे छोटे सपने ज़्यादा रात भी ख़राब नहीं करते। आखिर सपनों को पूरा करने के लिए जागना भी तो ज़रूरी है। सपना देखना बुरा नहीं, लेकिन झूठे सपने दिखाना अपराध ज़रूर है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८७ ☆ ~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ “रफी की आवाज में धर्मेंद्र के फिल्मी अंदाज” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८७ ☆

?  आलेख ?~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

फेसबुक एक ऐसे विचार से शुरू हुआ था  जिसमें कुछ युवा अपने विश्वविद्यालय परिसर में आपस में जुड़ने का सरल तरीका खोज रहे थे। समय के साथ वही विचार इतना विशाल रूप ले चुका है कि दुनिया के लगभग हर कोने में लोग दिन की शुरुआत और बिस्तर पर दिन का अंत इसी मंच की खिड़की पर झांककर करते हैं। इसकी शुरुआत दो हजार चार में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई थी और धीरे धीरे इंटरनेट से आज फेसबुक सीमित दायरे वाले कॉलेज नेटवर्क से निकलकर वैश्विक मंच बन गया है। इस यात्रा में इसके संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे और आज भी कंपनी का नियंत्रण मुख्य रूप से उनके हाथ में ही है। बाद में कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा प्लेटफार्म्स कर लिया, जबकि फेसबुक उसी नाम से अपनी सेवाएं देता रहा।

फेसबुक की सबसे बड़ी सफलता उसका फैलाव है। यह केवल परिचितों से संपर्क बनाए रखने का साधन नहीं रहा, बल्कि विचार, अनुभव, समाचार, कला, व्यापार, जनमत और मनोरंजन का ऐसा सम्मिलित मंच बन चुका है जिसकी तुलना किसी अन्य माध्यम से करना कठिन है। इसके उपयोगकर्ता दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में हैं और हर दिन अरबों पोस्ट, फोटो, वीडियो और संदेश यहां पर साझा होते हैं। लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं, समूह बनाते हैं, समुदायों से जुड़ते हैं, खरीद फरोख्त करते हैं, विज्ञापन चलाते हैं और अपनी पहचान को मजबूत करते हैं। यही व्यापकता इसे आज के दौर में सबसे प्रभावी डिजिटल मंचों में शामिल करती है।

फेसबुक के आर्थिक ढांचे की रीढ़ विज्ञापन है। इसका लगभग पूरा राजस्व इसी पर आधारित है। फेसबुक उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और रुचियों को समझकर विज्ञापनदाताओं को ऐसा मंच देता है जहां वे लक्षित दर्शकों तक सीधे पहुंच सकते हैं। इस सटीकता ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया  है। धीरे धीरे कंपनी ने कंटेंट निर्माताओं के लिए भी अवसर खोले हैं। पेशेवर मोड, वीडियो मोनेटाइजेशन, पेड सदस्यता जैसे कई साधन उपयोगकर्ताओं को सीधे कमाई का अवसर दे रहे  हैं। इस तरह फेसबुक एक साधारण सोशल नेटवर्क से विकसित होकर एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है।

फेसबुक का उपयोग समझदारी और सावधानी से किया जाए तो यह उपयोगकर्ता को अत्यंत लाभ पहुंचा सकता है। गोपनीयता सेटिंग्स की समय समय पर जांच, निजी जानकारी साझा करने में संयम, उपयोगी समूहों और पृष्ठों से जुड़ाव, संतुलित समय प्रबंधन और स्वस्थ संवाद की आदत इसे सकारात्मक अनुभव बना सकती है। जो लोग रचनात्मक हैं और नियमित रूप से लेख, फोटो या वीडियो साझा करते हैं, उनके लिए यह अपनी पहचान बनाने और  लोगों तक पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी मोबाइल एप है। इसे कंप्यूटर पर भी उसी सरलता से चलाया जा सकता है, किसी तरह के व्यक्तिगत डेटा स्टोरेज की अलग से आवश्यकता नहीं होती। निजी व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए तो अब फेसबुक आधुनिक ऑनलाइन बाजार का अनिवार्य उपकरण बन चुका है।

भविष्य की दिशा में फेसबुक और उसकी मूल कंपनी मेटा नई संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है। आभासी और संवर्धित वास्तविकता के माध्यम से वे एक ऐसे डिजिटल जगत की कल्पना कर रहे हैं जिसमें लोग एक दूसरे से केवल संवाद ही नहीं करेंगे बल्कि एक साझा आभासी संसार में चल फिर सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए प्रयोग भी इस अनुभव को और उन्नत बनाने की ओर अग्रसर हैं। यह सब सफल हुआ तो सोशल कनेक्शन, मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के बिल्कुल नए स्वरूप सामने आ सकते हैं।

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। गलत सूचना, गोपनीयता का जोखिम, अत्यधिक स्क्रीन समय से आँखें खराब होना ,सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल निर्भरता जैसे पहलू चिंता का विषय बने रहते हैं। इस कारण फेसबुक की उपयोगिता तभी अर्थपूर्ण है जब इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। एक ओर यह अवसरों की दुनिया खोलता है, दूसरी ओर यह अपने साथ अपेक्षित सतर्कता भी मांगता है।

समग्र रूप से फेसबुक आधुनिक समाज का ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें पूरी दुनिया एक साथ दिखाई देती है। यह लोगों को जोड़ता है, विचारों को दिशा देता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों के नए मार्ग खोलता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि हर तकनीक उतनी ही उपयोगी है जितनी समझदारी से हम उसका उपयोग करें।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

इन दिनों न्यूयार्क से

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५४ – देश-परदेश – शहर बसा नहीं और चोर पहले आ गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५४ ☆ देश-परदेश – शहर बसा नहीं और चोर पहले आ गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆ 

आज के समाचार पत्र में उपरोक्त ख़बर पढ़ी, तो मन में ऊपर लिखी पुरानी किंवदंती याद आ गई हैं। विगत माह सरकार ने दरियादिली दिखाते हुए स्वास्थ बीमा से जी एस टी शुल्क जो कि 18% है, हटाने का ऐलान कर दिया। सब तरफ खुशी की लहर फैल गई, आमजन ने खुशियों मनाते हुए खूब मिठाइयां भी खाई। उनमें से इस कारण से कुछ का तो पेट भी खराब हो गया था।

बीमा कमानियों को अपने ग्राहकों की ये खुशी देखी नहीं गई। इसलिए प्रदूषण को बैसाखी बना कर उन्होंने पॉलिसी की मूल्य वृद्धि करने का निर्णय भी समय रहते ले डाला हैं। अंग्रेज़ी में इसी को “प्रो एक्टिव” भी कहते हैं।

इस पूरे गणित में उपभोक्ता को कोई हानि नहीं हुई, सरकार को जी एस टी से मिलने वाली राशि शून्य हो गई, बीमा कंपनियों की आय में पंद्रह प्रतिशत वृद्धि हो जाएगी। ग्राहक और कंपनियां दोनो खुश।

सबसे अधिक नुकसान तो ग्रुप पॉलिसी वालों का होगा। जी एस टी शुल्क पूर्व के सामान लागू रहेगा, ऊपर से 15% की बढ़ी हुई प्रीमियम दरों से ही बीमा पॉलिसी मिलेगी।

बड़े व्यापारिक घराने, कॉरपोरेट्स से लेकर छोटे व्यापारी तक मौके पर चौका लगा ही लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४० ⇒ प्रपंच और पसारा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रपंच और पसारा।)

?अभी अभी # ८४० ⇒ आलेख – प्रपंच और पसारा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संसार को माया कहने वाले पंचों की कमी नहीं! मानव शरीर नश्वर है, यह मानने वाले ज्ञानी-ध्यानी जीवन की सीमित आवश्यकताओं पर जोर देते हैं। प्रपंच और पसारा आसक्ति का मूल है, अतः सादा जीवन, उच्च विचार जैसे आदर्श वाक्य यदा-कदा पाठ्य-पुस्तकों में नज़र आ जाया करते थे।

जीवन की एक अवस्था होती है, जिसे आदर्श अवस्था कहते हैं। उस अवस्था में शिक्षा भी आदर्श बाल मंदिर और आदर्श शिशु विहार और आदर्श कन्या महाविद्यालय में ग्रहण की जाती थी। विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, गीता-रामायण, मीरा-कबीर-तुलसी और संत विनोबा आसपास मंडराया करते थे। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे शब्दों का बोलबाला था। सरकारी स्कूल सादगी, संतोष और सदाचार की शिक्षा दिया करते थे। ट्यूशन जैसा शब्द अस्तित्व में नहीं आया था।।

आदर्श जब बड़ा हो जाता है, तो समझदार और व्यवहारिक हो जाता है। कच्ची उम्र के भोलेपन पर समय की सयानी रेखा लकीर बन चेहरे पर हल्की मूँछ के रूप में उभरने लगती है। फ़िल्म जंगली, प्रोफेसर और राजकुमार के गीत लबों पर अनायास उतरने लगते हैं। बाल मन हुस्न, ज़ुल्फ़ और इश्क़ जैसे शब्दों में उलझकर रह जाता है।

बस यहीं से उसकी ज़िन्दगी में चकाचौंध शुरू हो जाती है।

कॉलेज की हवा, सायकल से स्कूटर, कच्ची उम्र का प्रेम और फिर चार पहिये का सफर, प्रशांत होटल से साया जी होटल तक वह बहुत कुछ ज़िन्दगी का स्वाद चख चुका होता है। अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी के बाद वह एक अच्छे आलीशान भवन का स्वामी भी बन जाता है।।

पैसा, प्रसिद्धि और पॉवर ही अब उसके पर्याय हो जाते हैं। बच्चे पढ़-लिखकर विदेशों में सेटल हो चुके होते हैं। ऐसे समय में प्रपंच और पसारा जैसे शब्द जब उसके अवचेतन में प्रवेश कर जाते हैं, तो वह चौंक उठता है।

शायद मुझमें वैराग्य पसर रहा है। प्रपंच मुझे सुहा नहीं रहा है। क्या मेरे वानप्रस्थ के दिन नज़दीक आ गए।

बड़े भारी भरकम हैं ये चार आश्रम, जो कभी सौ बरस की ज़िंदगी को चार आश्रमों में बाँटते थे। किसे मालूम था कि ज़िन्दगी का शॉर्ट कट उसे अनजाने में एक नए ही आश्रम में ला खड़ा करेगा, जिसे आजकल वृद्धाश्रम कहते हैं। यहाँ आकर उसके प्रपंच और पसारे की इतिश्री हो जाती है। उसके ज्ञान-चक्षु खुल जाते हैं, बहुत दुनिया देख ली।।

आलस्य और प्रमाद की तरह ही प्रपंच और पसारा भी हमारे चित्त को बंचक बनाये हुए है। कर्म की विवशता ही हमें सदा प्रवृत्त, प्रबुद्ध और प्रयासरत बनाए हुए है जिसमें लोकेषणा, जिजीविषा, पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा और आसक्ति का भी उतना ही योगदान है। मानसिक संतुलन, विवेक और आंतरिक वैराग्य ही हमारे सांसारिक प्रपंच और पसारे को एक लगाम की तरह कस सकते हैं। अन्तरावलोकन और अनुशासन ही शायद उसकी कुंजी हो।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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