हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३९ ⇒ गंजे को नाखून ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गंजे को नाखून।)

?अभी अभी # ८३९ ⇒ आलेख – गंजे को नाखून ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुना है भगवान गंजे को नाखून नहीं देते। मैं निश्चिंत हूं, जब तक मेरे नाखून हैं, मैं गंजा नहीं हो सकता। क्या आपने कभी किसी गंजे के नाखूनों को गौर से देखा है? कैसे देखेंगे, भगवान उसे नाखून देता ही नहीं है। हमने बिना खून वाला (बहुत ही कम हीमोग्लोबिन ) इंसान तो देखा है लेकिन बिना नाखून वाला इंसान आज तक नहीं देखा। आप कैसे कह सकते हैं कि भगवान के यहां देर है अंधेर नहीं?

यह तो सरासर अंधेरगर्दी है।

बालक शब्द ही बाल से बना है। छोटे बाल, बालक, बड़े बाल, बालिका। एक जमाना था जब चोटी की सिने तारिकाओं की लंबी लंबी चोटी हुआ करती थी। अगर उनके बाल नहीं होते तो न तो जुल्फ लहराती और न वे जुल्फ से पानी झटकाती। जितने बड़े बाल, उतनी ही अधिक देखभाल, रखरखाव।।

तब कहां आज की तरह शैंपू और मॉश्चराइजर का बाजार था। बड़े बड़े बाल वाले बच्चों का परिवार होता था। लोमा हेयर ऑइल से बाल कमर से नीचे तक लहराते थे।

सुबह से ही नाखूनों की सहायता से बड़ी दीदी छोटी बहन के सिर से जुंओं की धरपकड़ शुरू कर देती थी। इन्हें मारना भी जरूरी हो जाता था।

समय बदलता चला गया। लोग लीक से हटते चले गए और रुसी पर आकर अटक गए। वैसे जूं और लीक में अंतर बताना विशेषज्ञों का काम है। सुना है शैम्पू से डर से आजकल जूं ने बाल उद्यान छोड़ दिया है और वह कानों में रेंगने लगी है।।

पहले लोगों के बाल बढ़ते थे, आजकल झड़ते हैं। पौष्टिक आहार की कमी, और पानी में भारीपन के अलावा ट्यूबवेल के पानी में कैल्शियम की मात्रा अधिक होने के कारण बालों का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा है। लेकिन ईश्वर बड़ा दयालु है वह पुरुषों को भले ही गंजा कर दे, नारियों पर वह इतना मेहरबान जरूर है कि किसी का मैदान साफ नहीं करता क्योंकि वे बालों के साथ साथ नाखूनों की भी उचित देखभाल करती है। जहां सुंदर नाखून हैं, वहां सुंदर बाल हैं। पुरुष भले ही एक बार जूता पॉलिश करना भूल जाए, नारी नाखूनों में नेल पॉलिश लगाना नहीं भूलती।

मैं कोई सौंदर्य विशेषज्ञ नहीं, लेकिन नारी सौंदर्य में जितना महत्व बालों और नाखूनों का है उतना शायद किसी अन्य तत्व का नहीं। लेकिन आजकल उल्टी गंगा बह रही है। महिलाएं बाल छोटे रख रही हैं और पुरुष बाल बढ़ा रहा है। अगर स्त्री नहीं बन सकते, तो बाल बढ़ाकर बाबा ही बन जाओ। बाबा के प्रवचन में भी अधिकतर महिलाएं ही महिलाएं। एक दो गंजे पुरुष दिख जाएं तो बहुत।।

सुना है नाखून रगड़ने से बाल बढ़ते हैं। गंजा भी पुरुष ही होता है तो नाखून भी वही रगड़ेगा। अब इस भगवान की गंजों से क्या दुश्मनी है, कुछ समझ नहीं आता। पहले भगवान के आगे नाक रगड़ो। अगर मुझे गंजा कर ही दिया है तो नाखून तो सलामत रहने देते। बाबा रामदेव ने देखो, नाखून रगड़ रगड़ कर कैसे बाल लंबे कर लिए। काश हमारे भी नाखून होते तो हम उन्हें घिस घिसकर बाबा रामदेव बन जाते।

कुछ भी कहें बाल हों या नाखून, हमारे ही खून से ये पुष्ट होते हैं, फलते फूलते हैं। इनका रखरखाव ठीक से करें। सुना है ज्यादा चिंता से बाल उड़ते हैं, तो क्या पुरुष ही अधिक चिंता करता है और महिलाएं पूरी तरह निश्चिंत रहती हैं। वैसे पुरुष का भाग्य कौन पढ़ पाया है। लोग तो गंजा देखते ही कहने लग जाते हैं, जरूर भाग्यशाली और पैसे वाला होगा। देखो, उसकी पत्नी कितनी सुंदर है, हां वही, लम्बे, बड़े बालों वाली, और लंबे नाखूनों वाली।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१२ – साक्षात्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१२ ☆ साक्षात्कार… ?

शाम का धुँधलका घिर रहा है। बालकनी में खड़ा सड़क की दूसरी ओर का दृश्य निहार रहा हूँ। यह क्षेत्र पेड़ों से भरा हुआ है। घर लौटते पंछियों की चहचहाट से वातावरण गुंजायमान है।

देखता हूँ कि सुदूर आकाश में दो पंछी काफी ऊँचाई पर पंख फैलाये, धीमी गति से उड़ रहे हैं। उनमें से एक धीरे-धीरे नीचे की ओर आ रहा है। नीचे आने की प्रक्रिया में पेड़ के पीछे की ओर जाकर विलुप्त हो गया। संभवत: कोई घोंसला उसकी प्रतीक्षा में है। दूसरा दूर और दूर जा रहा है, निरंतर आकाश की ओर। थोड़े समय बाद आँखों को केवल आकाश दिख रहा है।

जीवन भी कुछ ऐसा ही है। घोंसला मिलना, जगत मिलना। जगत मिलना, जन्म पाना। आकाश में ओझल होना, प्रयाण पर निकलना। प्रयाण पर निकलना, काल के गाल में समाना।

प्रकृति को निहारो, हर क्षण जन्म है। प्रकृति को निहारो, हर क्षण मरण है। प्रकृति है सो पंचमहाभूत हैं। पंचमहाभूत हैं सो जन्म है।

प्रकृति है सो पंचतत्वों में विलीन होना है, पंचतत्वों में विलीन होना है सो मरण है। प्रकृति है सो पंचेंद्रियों के माध्यम से जीवनरस का पान है। जीवनरस का पान है सो जीवन का वरदान है। जन्म का पथ है प्रकृति, जीवन का रथ है प्रकृति, मृत्यु का सत्य है प्रकृति।

प्रकृति जन्म, परण, मरण है। जन्म, परण, मरण, जीव की गति के अलग-अलग भेष हैं। जन्म, परण, मरण ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश,त्रिदेव हैं। प्रकृति त्रिदेव है। सहजता से त्रिदेव के साक्षात दर्शन कर सकते हो।

साधो! कब करोगे दर्शन?

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३७ ⇒ सर्वहारा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सर्वहारा।)

?अभी अभी # ८३७ ⇒ आलेख – सर्वहारा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर सर्व- शक्तिमान है,उसी से यह धरती-आसमान है और जो सर्वत्र विराजमान है ! सर्वहारा भी उसी की एक सन्तान है,और उसकी बनाई इसी धरती पर विद्यमान है। सर्वहारा शब्द उन लोगों पर लागू नहीं होता, जो ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकल जाना चाहते हैं। इन्हें आगे लाने वाले,इनसे कई कदम आगे निकल जाते हैं। वह तो बेचारा समझ ही नहीं पाता, कौन जीता कौन हारा।

सर्वहारा कोई आम शब्द नहीं ! यह खास लोगों के लिए, कुछ ख़ास लोगों द्वारा रचा गया है। सरल शब्दों में खेतिहर मजदूर और किसान ही इस श्रेणी में आते हैं। जिस तरह देश के कर्णधार देश के विकास के लिए बार बार विदेश जाते रहते हैं, उसी तरह सर्वहारा के संरक्षक उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए कभी मास्को तो कभी चीन की यात्रा किया करते हैं। ।

सर्वहारा के दो दुश्मन हैं,एक तो समाजवाद और दूसरा बुर्जुआ ! जो खा-पीकर बुजुर्ग हुआ,उसे आप बुर्जुआ भी कह कहते हैं। पेंशनर कहीं से कहीं तक सर्वहारा में नहीं आता। भले ही वह इधर से उधर फिरता रहे मारा-मारा,परेशानियों का मारा।

आचार्य से भगवान ,और भगवान से एक कदम अधिक ओशो, कहते कहते थक गए कि,समाजवाद से सावधान। चिल्लाते-चिल्लाते वे अमेरिका चले गए,फिर भी उनकी किसी ने न सुनी और सर्वहारा की चिंता ने लालू को बे-चारा कर दिया और समाजवादी मुलायम के बेटों को सरकारी बंगले की टाइल्स तक उखाड़नी पड़ी। अगर गधे-घोड़े एक हो गए,अमीर गरीब एक हो गए, तो नेताओं के वादों का क्या होगा, सर्वहारा की क्रांति का क्या होगा। ।

सृष्टि के सुचारू रूप से चलने के लिए जितना जरूरी लक्ष्मी-नारायण का वरदान है,उतना ही सर्वहारा का सह-अस्तित्व भी ! दरिद्रों में नारायण का वास है ,इसलिए उनका भी रहना जरूरी है। लक्ष्मी भले ही तिजोरी में बंद हो,नारायण का वास हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब में समान रूप से है।

प्रेमचंद,रेणु की परती परी कथा और निराला की वह तोड़ती पत्थर को अगर आज आप सर्वहारा नहीं तो गरीब,वंचित,उपेक्षित ,पिछड़े अथवा मज़दूर ,किसान ,जो भी नाम दें, हमारे इस सभ्य,सुसंस्कृत,डिजिटल इंडिया का ही अंग है। जिन तक सूर्य की रोशनी बिना भेद-भाव तक पहुँचती रहती है,जिनकी झोपड़ियों में स्वच्छ हवा निर्बाध गति से बहती रहती है, भूख,प्यास और नींद जिन पर सदा मेहरबान रहती है,उन पर हमारे आकाओं की भी दृष्टि हो। उन्हें भी इंसान समझा जाए, उन्हें किसी राजनैतिक विचारधारा का मोहरा न बनाया जाए,विकास रूपी अमृत की कुछ बूँदें उनके हलक तक पहुंच जाए,तो आप चाहें तो इसे जुमला कहें,लेकिन स्वर्ग धरती पर उतर आए। ।

शहर से गाँव चलने के दिन अब लद गए ! अब तो सभी गाँव रोजगार के लिए शहर चले आ रहे हैं। वनवासी-आदिवासी तक जो पहुँचता है,या तो वह कोई प्रोजेक्टधारी एनजीओ होता है या फिर किसी राजनैतिक पार्टी का प्रचारक ! एक शहरी तो यहाँ अर्बन नक्सल से ही डरा हुआ है,वह क्या बस्तर के आदिवासियों के बीच जा पाएगा। जहाँ कभी प्रकृति की छाँव थी,आज वहाँ हिंसा और आतंक का साया है।

सर्वहारा हमारी पहुँच से बहुत बाहर है। जिसकी जगह हमारे दिल में होनी थी,उसकी जगह लाचारी,ग़रीबी, मज़बूरी में है। हमें आगे बढ़ना है,विजयी होना है। फ़िल्म अपना देश का यह गाना गाना है,सुन चंपा,सुन तारा ! कोई जीता कोई हारा। जो हारा, वही सर्वहारा। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०० ☆ अनदेखे फलित सपने… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनदेखे फलित सपने। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०० ☆

☆ अनदेखे फलित सपने… ☆

‘कुछ लोग उन चीज़ों को देखते हैं; जिनका अस्तित्व है और पूछते हैं कि वे ऐसी क्यों हैं? मैं उन चीज़ों के स्वप्न देखता हूं; जो कभी नहीं थीं और कहता हूं–वे क्यों नहीं हो सकतीं?’ जार्ज बर्नार्ड शॉ का यह कथन उनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचायक है कि संसार में जिन वस्तुओं का अस्तित्व है; उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करना सामान्य सी बात है। वास्तव में जिनका अस्तित्व नहीं है,जो कल्पना व स्वप्न हैं; जिनका अस्तित्व कभी नहीं था; उनके बारे में भी अपनी धारणा बनानी चाहिए कि वे क्यों नहीं हो सकतीं? ऐसी कल्पना विलक्षण प्रतिभा का धनी व्यक्ति ही कर सकता है। इस कथन को सार्थक करती हैं दुष्यंत की पंक्तियां– ‘कौन कहता है/ आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ संसार में असंभव कुछ भी नहीं है। जो नहीं है,उसके बारे में चिंतन व शोध करना और उसे सबके के समक्ष प्रकट कर देना ही चमत्कार है। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण व एडिसन का बल्ब की खोज व अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उन वस्तुओं के अस्तित्व व रूपाकार को स्पष्ट करना किसी अजूबे से कम नहीं है। ऐसे कार्य प्रभु-प्रदत्त प्रतिभा,दृढ़ निश्चय व अथक परिश्रम द्वारा संभव हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक योगदान रहता है आत्मविश्वास का; जो हमें निरंतर कर्म करने की प्रेरणा देता है तथा बीच राह से लौटने नहीं देता; न ही थककर निराशा का दामन थामने देता है।

सपने में होते हैं, शजो हम खुली आंखों से देखते हैं,क्योंकि वे हमें सोने नहीं देते और बंद आंखों से देखे गए सपनों का कोई अस्तित्व नहीं होता। अब्दुल कलाम की यह सोच मानव मन को ऊर्जस्वित करती है और वह इंसान तब तक चैन से नहीं बैठता; जब तक उसके सपने साकार नहीं हो जाते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि ‘मनुष्य युद्ध में सहस्त्रों पर विजय प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब वह  स्वयं पर विजय पा लेता है; सबसे बड़ा विजयी होता है,क्योंकि उसे आत्मावलोकन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जीवन में कठिनाईयाँ तो हमसाये की भांति हमारे अंग-संग रहती हैं। यदि हम उन्हें कष्टकारी मानते रहेंगे,तो वे हमें असीम पीड़ा व दु:ख पहुंचाएंगी। यदि हम उन्हें परछाई के रूप में स्वीकार लेंगे तो वे हमारा पथ- प्रशस्त करेंगी और हम आत्मविश्वास के बल पर दाना मांझी की भांति पर्वत काटकर बीस किलोमीटर लंबी सड़क अकेले ही बना पाने का साहस जुटा पाएंगे। वास्तव में चुनौतियां हमें प्रेरणा देती हैं और जब हम उन्हें जीवन का हिस्सा स्वीकार लेते हैं; वे हमारी पथ-प्रदर्शक बन निरंतर कार्य-रत रहने को प्रेरित करती हैं। सो! उनसे मुक्ति पाने का उपाय,उनकी  सहज-स्वीकार्यता ही है।

बाबा आमटे बचपन में मन के अनुकूल न होने पर नाराज़ हो जाते थे,जो उनकी माता को बहुत अखरता था। एक बार वे पतझड़ के मौसम में उन्हें बगीचे में ले गयीं और दिखाया कि वृक्ष अपने पत्तों का त्याग कर रहे हैं और उनके स्थान पर नए पत्ते आकार ग्रहण कर रहे हैं। सो! मानव को भी सुखद जीवन जीने के लिए मन के दुराग्रह व धारणाओं का त्याग करके संबंधों को नवीन ढंग से सींचना चाहिए और अपने अप्रिय अनुभवों को पुराने पत्तों की भांति त्याग देना चाहिए। आमटे पर उक्त सीख का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे तुरंत अपने नाराज़ मित्र से मिलने पहुंच गए। वास्तव में यही जीवन है; सृष्टि का क्रम है। जीवन-मृत्यु का सिलसिला तो निरंतर चलता रहता है। संतोषानंद जी की यह पंक्तियां ‘जीवन का मतलब तो आना और जाना है/ परछाइयाँ रह जाती रह जातीं, रह जाती निशानी है।’ आज तक कोई भी इस रहस्य को नहीं जान पाया है कि इंसान कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है? धन-दौलत, महल-चौबारे व सगे-संबंधी सब यहीं धरे रह जाते हैं; केवल उसके कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है। इसलिए मानव को सत्कर्म व सबसे प्रेम-पूर्वक व्यवहार करने की सीख दी गई है।

मालवीय जी के मतानुसार ‘जो मनुष्य अपनी निंदा सुन लेता है; वह सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह सामर्थ्य केवल उसी व्यक्ति में होता है; जिसमें अहं भाव नहीं होता। टैगोर का ‘एकला चलो रे’ संदेश भी अनुकरणीय है कि ‘जो लोग बने-बनाए रास्ते पर न चलकर अपनी राह का निर्माण ख़ुद करते हैं; वे ही मील के पत्थर स्थापित करते हैं।’ टैगोर की भांति वे अपने सृजन अर्थात् कृत-कर्मों से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। जीवन के अंतकाल में जब टैगोर बीमार पड़ गए थे तो विनोबा भावे उन्हें देखने गए और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने पचपन हज़ार गीतों की रचना कर इतिहास रच दिया है तथा टेनिसन, शैले आदि गीतकारों को भी पीछे छोड़ दिया है। परंतु उन्होंने यह उत्तर दिया कि ‘वे संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि अभी वे उन गीतों का सृजन नहीं कर पाए हैं; जो वे करना चाहते थे। वास्तव में वे गीत, जो गाये नहीं गए; आज भी उनके ज़हन में हैं,अधूरे हैं।’

सृजन एक साधना है और उत्तम साहित्यकार निरंतर साधना-रत रहता है और उसके हृदय में उत्कृष्ट सृजन का भाव सदैव विद्यमान रहता है। प्रत्येक साहित्यकार एक नयी कृति के सृजन को पाठकों तक पहुंचाने के मध्य प्रसव-पीड़ा से गुज़रता है। उस स्थिति में समाज के हर व्यक्ति की पीड़ा उसकी पीड़ा बन जाती है और वह उसे आत्मसात् कर जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर लेता; चैन से नहीं बैठ सकता। उसे उन पात्रों के दर्द को जीना पड़ता है और जब तक वह अनुभूत पीड़ा उसी रूप में पाठकों के हृदय को आंदोलित नहीं करती; उसका सृजन सार्थक नहीं होता। काव्य-शास्त्र में यह विधा साधारणीकरण कहलाती है और नाटक में त्रासदी को देखते हुए जब दर्शकों के नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है और वे उस क़िरदार की मनोदशा में पहुंच जाते हैं,तो वह सृजन सफल माना जाता है; जिसे पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में विरेचन की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। सोहनलाल द्विवेदी जी की ये पंक्तियां ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती/ लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ अर्थात् जो लहरों से डरकर किनारे पर बैठे रहते हैं; उनकी नौका कभी भी पार नहीं उतर सकती। सो! मानव को निरंतर प्रयासरत चाहिए।

किंग ब्रूसली ने एक मकड़ी को अपने जाले से बार-बार गिरते व चढ़ते देख उससे प्रेरणा प्राप्त की और पुन; युद्ध करने पर उन्हें विजय प्राप्त हुई। सो! जीवन में निरंतर संघर्ष-रत रहना चाहिए; कभी पराजय को स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ वैसे भी जो हम सोचते हैं और जैसा हमारा नज़रिया होता है; वही घटित हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि नज़रें बदलने से नज़ारे बदल जाएंगे और नज़रिया बदलने से ज़िंदगी बदल जाएगी; जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा। अंत में स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से मैं यह कहना चाहूंगी कि ‘मौसम भी बदलते हैं/ दिन रात बदलते हैं/ यह समां बदलता है/ जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं/ दिल को सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं,परंतु सृष्टि का क्रम अनवरत चलता रहता है। इसलिए ‘दु:खों से मत घबरा मानव/ यह समां भी गुज़र जाएगा।’ रात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर नयी आशा व नवीन स्वप्न लेकर दस्तक देती है और हमें ऊर्जस्वित करती है। इसलिए आशा का दामन थाम रखिए; जीवन में अप्रत्याशित करिश्में हो जाएंगे; जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ लाफ्टर योगा – हास्ययोग ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

😂 लाफ्टर योगा – हास्ययोग 🤣☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

हर कोई जानता है कि हँसी सबसे अच्छी दवा है, लेकिन हममें से कितने लोग रोज खुलकर हँसते हैं?

हँसी का हमारे स्वास्थ्य, खुशी, और मन की शांति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह एक तरह की अंदरूनी कसरत है। हँसी हमारे शरीर की ज़्यादातर प्रणालियों को सक्रिय कर देती है। यह शरीर की अशुद्ध हवा को बाहर निकालती है और फेफड़ों को ताज़ी ऑक्सीजन से भर देती है।

खुलकर हँसना एक बेहतरीन व्यायाम है। इससे तनाव के हार्मोन कम होते हैं और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। हँसी से रक्त वाहिनियाँ फैलती हैं, रक्त प्रवाह सुधरता है, और हृदय रोग का ख़तरा कम होता है।

आज हमें ज़्यादा हँसने की ज़रूरत है क्योंकि तनाव और अवसाद सबसे बड़ी बीमारी बन चुके हैं। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव को हँसी तत्काल दूर करती है, क्योंकि इससे फील-गुड हार्मोन का उत्पादन होता है। इसलिए यह अवसाद के लिए भी एक प्रभावशाली उपाय है।

लाफ्टर योगा – हास्ययोग – एक अनोखी पद्धति है, जिसमें कोई भी व्यक्ति बिना चुटकुलों, कॉमेडी या हास्य-व्यंग्य के हँस सकता है। बिना किसी कारण, बिना किसी शर्त! सुख में भी और दुख के पलों में भी। हम कुछ सरल एक्सरसाइज़ की मदद से हँसी शुरू करते हैं, जो थोड़ी ही देर में यह बच्चों की तरह मस्ती, नजरों के मिलने, और सामूहिक ऊर्जा से सहज और वास्तविक हँसी में बदल जाती है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि शरीर असली और नकली हँसी में फर्क नहीं करता — दोनों के लाभ एक जैसे होते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सत्र में होने वाली हँसी नकली है; बल्कि यह अक्सर रोज़मर्रा की हँसी से ज़्यादा गहरी और सुकून देने वाली होती है।

लाफ्टर योगा में हँसी के अभ्यासों के साथ सांसों के अभ्यास और योग का मेल होता है। इसकी शुरुआत मुंबई के एक चिकित्सक डॉ. मदन कटारिया ने की थी। 13 मार्च 1995 को पहले सत्र में केवल पाँच लोग सम्मिलित थे, लेकिन आज यह सौ से अधिक देशों में किया जाता है।

हम लाफ्टर योगा क्यों करें?

इसके तीन प्रमुख कारण हैं:

पहला — हँसी का स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए रोज़ कम से कम दस–पंद्रह मिनट लगातार हँसना ज़रूरी है।

दूसरा — हँसी गहरी और पेट से उठने वाली होनी चाहिए।

तीसरा — हँसी को कभी-कभार या विशेष अवसर के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए; इसका अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए, ताकि इसके स्वास्थ्य लाभ मिल सकें।

लाफ्टर योगा के फायदे अनेक एवं अद्भुत हैं। यह एक मज़बूत कार्डियो वर्कआउट है। दस मिनट की गहरी हँसी, तीस मिनट रोइंग मशीन चलाने के बराबर है। हँसी से एंडोर्फिन बनते हैं — वही हार्मोन जो आपको पूरे दिन खुश और ऊर्जावान रखते हैं। शरीर को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है, जिससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। हँसी तनाव को तत्काल दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है।

लाफ्टर सत्र साधारणतः चार चरणों में होता है।

सबसे पहले ताली बजाना, फिर गहरी सांस का अभ्यास, उसके बाद बच्चों जैसी मस्ती। तत्पश्चात, कुछ लाफ्टर एक्सरसाइज़ करते हैं।

सत्र का समापन, लाफ्टर मेडिटेशन से हो तो उत्तम। इसमें हँसी का निर्बाध प्रवाह होता है। यह एक दिव्य अनुभव है — शुद्ध और निर्मल आनंद। मन पूर्णिमा के चाँद की तरह शांत और उज्ज्वल हो जाता है।

सत्र का समापन उत्तम स्वास्थ्य, चारों दिशाओं में आनंद, और विश्व-शांति की प्रार्थना के साथ होता है।

जब हम हास्ययोग की यात्रा शुरू करते हैं, तो हमारा ध्यान अपने स्वास्थ्य और खुशियों पर होता है।

लेकिन धीरे-धीरे भीतरी बदलाव आने लगते हैं — दूसरों के प्रति गर्मजोशी, दया, करुणा, और अपने अंदर आशावाद और सकारात्मकता बढ़ने लगती है। हम ज़्यादा स्नेहमय, मददगार, और मेलजोल वाले बन जाते हैं।

निर्मल हंसी से जनित आत्मिक शक्ति हमारे जीवन को पूर्णतः बदल देती है!

😅😂🤣

 #laughteryoga #हास्ययोग

 

 © जगत सिंह बिष्ट

लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३६ ⇒ पौ फटना (DAWN BURST) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पौ फटना (DAWN BURST)।)

?अभी अभी # ८३६ ⇒ आलेख – पौ फटना (DAWN BURST) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रात्रि विश्राम के लिए बनी है, दिन भर का थका मांदा इंसान, निद्रा देवी की गोद में अपनी थकान मिटाता है, प्रकृति भी रात्रि काल में सोई सोई सी प्रतीत होती है, क्योंकि अधिकांश पशु पक्षी भी इस काल में अपनी दैनिक गतिविधियों को विराम दे देते हैं।

प्रकृति में जीव भी हैं और वनस्पति भी! जीव भले ही रात्रि में विश्राम करे, उसका दिल धड़कता रहता है, सांस चलती रहती है।

एक नई सुबह के साथ कैलेंडर ही नहीं बदलता, हमारी उम्र भी एक दिन घट/बढ़ जाती है। हमें पता ही नहीं चलता, हमारे नाखून बढ़ जाते हैं, सुबह फिर शेव करनी पड़ती है।

उधर भले ही पेड़ पौधे भी हमें रात्रि विश्राम करते प्रतीत होते हैं, हवा मंद गति से चलती रहती है, सुबह के स्वागत में कहीं कोई कली चटकती है तो कहीं कोई फूल खिलता है। पक्षियों का चहचहाना शुरू हो जाता है, पेड़ पौधों में नई कोपलें दृष्टिगोचर होने लगती है।।

अचानक बहुत कुछ घटने लगता है। लगता है, प्रकृति अंगड़ाई ले रही है। आसमान शनै: शनै: साफ होने लगता है। पौ फटने लगती है। पौ जब फटती है, तब सूर्योदय होता है अथवा जब सूर्योदय होता है, तब पौ फटती है। दिल टूटने की आवाज़ कुछ दीवाने भले ही सुन लें, पौ फटने की आवाज़ अभी तक तो विज्ञान ने भी नहीं सुनी।

अगर पौ नहीं फटेगी तो क्या सुबह नहीं होगी, सूरज नहीं निकलेगा। पंचांग में रोज सूर्योदय और सूर्यास्त का समय दिया रहता है, पौ फटने न फटने से पंचांग को क्या लेना देना। भले ही आसमान में किसी दिन बादलों के कारण सूर्य नारायण देरी से प्रकट हों, पौ तो वक्त पर फट ही चुकी होती है।।

हमने आसमान में बादलों को फटते देखा है, तीन चौथाई जल के होते हुए भी यहां कभी ज्वालामुखी फटते हैं तो कभी इस धरती के कलेजे को भी फटते देखा है। इंसान के भी अपने दुख दर्द हैं। कहीं कुछ फटा है तो कहीं कुछ टूटा फूटा है। एक बाल मन तो फकत एक गुब्बारे के फूटने से ही उदास हो जाता है। पेट्रोल के भाव सुनकर तो फटफटी की आंखें भी फटी की फटी रह गई हैं आजकल।

क्या पौ रात भर से भरी बैठी रहती है, जो सुबह होते ही फट जाती है, पौ का शाम से कुछ लेना देना नहीं, यह सिर्फ सुबह का नज़ारा है। जो सुबह ही फट गई, फिर उसके शाम को पौ बारह होने की संभावना वैसे भी खत्म ही हो जाती है। खेद है, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरण प्रेमी भी पौ फटने की घटना को गंभीरता से नहीं लेते।

कवि और कविता की कल्पना की उड़ान चारु चन्द्र की चंचल किरणों से भले ही खेल ले, उसे सूरज का सातवां घोड़ा तक नजर आ जाए, मंद मंद हवा का शोर और कल कल करते बहते झरने की आवाज उसे सुनाई दे जाए, लेकिन पौ फटने का स्वर वह नहीं पकड़ पाया। फिर भी मेरी हिम्मत नहीं कि इस सनातन सत्य को मैं झुठला सकूं कि पौ नहीं फटती।

जंगल में मोर नाचा, सबने देखा। आज ही सुबह सुबह, खुले आसमान में पौ फटी, कोई शक? पौ फटना शुभ है। एक शुभ दिन की शुरुआत होती है पौ फटने से। आपका आज का दिन शुभ हो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६५ ☆ हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६५ ☆ हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत…

भारतीय संस्कृति में प्रकृति केवल हमारे चारों ओर बसी हुई कोई वस्तु नहीं, बल्कि हमारा अपना विस्तार है। मिट्टी की सुगंध, तुलसी की पवित्रता, पीपल की शीतल छाया, नदी की कलकल ध्वनि—ये सब भारतीय मन के भाव संसार का हिस्सा हैं। यही कारण है कि हमारे यहां पेड़-पौधों को जीव माना गया है, और हरियाली को सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत।

आज जब दुनिया तनाव और भागदौड़ में उलझी है, हरियाली हमें एक सरल-सा संदेश देती है—

“धीरे बढ़ो, पर निरंतर बढ़ो।”

यही ग्रीन मोटिवेशन का आधार है।

हरी पत्ती का दर्शन — सकारात्मकता का पहला पाठ

किसी भी पौधे को ध्यान से देखिए—

वह कभी शिकायत नहीं करता, कभी थकता नहीं, बस संभावनाओं की ओर बढ़ता रहता है।

न सूरज की गर्मी रोकती है, न बारिश की बूंदें, न मिट्टी की कठोरता।

इस छोटे से पौधे के भीतर इतनी अद्भुत इच्छा होती है कि वह पत्थरों के बीच भी रास्ता बना लेता है।

भारतीय दर्शन में इसे उद्यम कहा गया है

अर्थात मनुष्य की वही भीतरी शक्ति, जो परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, आगे बढ़ना जानती है।

यही सीख हर पौधा हमें रोज देता है।

भारतीय संस्कृति और हरियाली—एक आत्मीय संबंध

भारतीय परंपरा में हर पौधा अपने भीतर कोई न कोई सांस्कृतिक अर्थ समेटे हुए है…

तुलसी — शुद्धता और जीवन शक्ति

पीपल — प्राण-वायु, दीर्घायु और आध्यात्मिक ऊर्जा

बरगद— स्थिरता और दीर्घकालिक दृष्टि

नीम — स्वास्थ्य और संरक्षण

कृष्ण कमल, कदंब, बेल — भगवान कृष्ण और शिव के भाव-संदेश

यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने कहा…

“वृक्ष आत्मा नहीं बोलते, पर हमारी आत्मा से बोलते हैं।”

आज के समय में, जबकि मनुष्य मानसिक दबावों से जूझ रहा है, यह सांस्कृतिक सीख पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

हरियाली का मनोवैज्ञानिक प्रभाव—सकारात्मकता की नई परिभाषा

समकालीन विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का मत है कि हरे रंग की उपस्थिति—

  • मन में शांति बढ़ाती है
  • दिल की धड़कन संतुलित करती है
  • चिंता और तनाव को कम करती है
  • रचनात्मकता को बढ़ाती है

इसीलिए हरे पौधे घरों, अस्पतालों,कार्यालयों और धार्मिक स्थलों में बहुतायत से लगाए जाते हैं।

भारतीय आध्यात्मिक विचार कहता है—

जिस मन में हरियाली रहती है, वहां नकारात्मकता कभी टिक नहीं पाती।

ग्रीन मोटिवेशन: प्रकृति की भाषा में सफलता का सूत्र

पेड़,पौधों की दुनिया में एक अद्भुत शांति है, पर इसके भीतर छिपा है गहरा जीवन-संदेश—

  • जड़ मजबूत हो, तो तूफान भी झुका नहीं सकते।
  • धीरे-धीरे बढ़ने में भी एक स्थायी शक्ति होती है।

जो देता है, वही सच्चे अर्थ में बढ़ता है — जैसे पेड़ बिना किसी स्वार्थ के छाया, ऑक्सीजन, फल, फूल और जीवन देता है।

जीवन में सफलता का यह “ग्रीन सूत्र” हमें सहज रूप से समझा देता है कि

विकास का सबसे सुंदर रूप वही है, जो शांत, सतत और सबके लिए उपयोगी हो।

अन्ततः यही कहा जा सकता है कि हर पौधा एक अध्यापक है।हरियाली हमारी संस्कृति की जड़ है,और सकारात्मकता उसका फल।

जब मनुष्य प्रकृति को केवल देखने या सजाने की चीज नहीं मानता, बल्कि जीवन-शक्ति समझता है, तभी उसके भीतर वह प्रज्ञा जागती है जिसे भारतीय ऋषियों ने “अनुभूति” कहा है।

आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उनसे जुड़कर जीने की है।

क्योंकि—

जहां हरियाली होती है, वहां ईश्वर की कृपा, मन की शांति और जीवन का संतुलन—तीनों साथ रहते हैं।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८६ ☆ दुबई से ~ लंबी फ्लाइट की तैयारी ~ ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८६ ☆

?  दुबई से ~ लंबी फ्लाइट की तैयारी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इन दिनों दुबई से

ग्लोबल विलेज वाली दुनियां में लंबी घंटों की थका देने वाली उड़ान का नाम सुनते ही मन में  सफर शुरू हो जाता है। दुबई से न्यूयॉर्क तक के पंद्रह घंटे , एक सीट पर वही लंबी सुरंग हैं जिसमें यात्री अपने धैर्य, शरीर और आदतों की परीक्षा खुद देता चलता है। ऐसी यात्रा में असुविधा का बीज छोटी सी चूक से भी उग आता है। इसलिए तैयारी केवल बैग पैक करने का काम नहीं, बल्कि मन और शरीर को उड़ान के हिसाब से ढालने की कला है।

सबसे पहली तैयारी सीट चुनने से शुरू होती है। यूं तो विमान में हर सीट एक ही दिशा में जाती है, लेकिन अनुभव अलग अलग होता है। जिसे बाहर झांकना अच्छा लगता है वह खिड़की वाला स्थान चुन कर खुद को थोड़ी राहत दे सकता है, और जिसे पैरों को फैलाने की आजादी चाहिए वह बीच वाले रास्ते के पास बैठे तो यात्रा कहीं ज्यादा संयत हो जाती है। शरीर ऐसे लम्बे समय में सबसे तेजी से थकता है, इसलिए कपड़े हल्के और ढीले होने चाहिए ताकि नसें खून का दौरान बनाएं रखें।  शरीर उड़ान के हर उतार चढ़ाव के साथ सहज रह सके।

हैंड बैगेज की तैयारी में छोटी छोटी चीजें बड़ा काम करती हैं। गर्दन को थामने वाला तकिया, आंखों को रोशनी से बचाने वाला मास्क, पसंद का संगीत, कुछ हल्के स्नैक्स, मॉइश्चराइज़र और चार्जर जैसे मित्र पूरी उड़ान में साथ देते हैं और परेशानियों को उससे पहले ही रोक लेते हैं जब वे आकार भी नहीं ले पातीं। उड़ान के दौरान शरीर हाइड्रेटेड रखना चाहिए। अच्छा हो कि फ्लाइट से पहले नहा कर फ्रेश ढीले  कपड़े पहनकर रेडी हो। अक्सर लोग विमान में चाय, कॉफी या सोडा के भरोसे रहते हैं, पर ये पेय शरीर की नमी खींच लेते हैं और लंबी उड़ान में यही छोटी गलती कई गुना भारी पड़ती है। नमी की कमी केवल गला नहीं सुखाती, बल्कि सिरदर्द, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ाती है। हमें जेट लेग से निपटना होता है इसलिए अपनी बाडी क्लाक को नींद के मामले में उस देश के समय के अनुरूप पहले से ही ढालने का यत्न करें जहां आप जाने वाले हैं।

लंबे सफर की असली चुनौती यह है कि पंद्रह घंटे सीट से चिपके रहने का मन तो बना लिया जाता है, पर शरीर इसे स्वीकार नहीं करता। हर दो तीन घंटे में उठकर कुछ कदम चल लेने और पैरों को स्ट्रेच करने से रक्त संचार सुचारू बना रहता है और बेचैनी कम होती है। दुनिया भर के डॉक्टर लगातार चेताते हैं कि एक ही स्थिति में बहुत देर तक बैठे रहने से नसों में अवांछित गांठें बनने का खतरा बढ़ता है, इसलिए सफर में थोड़ी चहल कदमी दवा जैसी काम करती है।

केबिन की हवा अपनी अलग ही प्रकृति रखती है। जमीन की हवा जितनी नम रहती है उड़ान की हवा उतनी ही सूखी होती है। ऐसे में त्वचा और होंठ बार बार यह याद दिलाते हैं कि उन्हें भी थोड़ा ध्यान चाहिए। एक हल्का मॉइश्चराइज़र और लिप बाम इस पूरे मौसम परिवर्तन को सरल बना देते हैं।

भोजन को लेकर भी समझदारी जरूरी है। भारी खाना ऊंचाई पर और कठिन लगता है।

फ्लाइट में परोसे जाना वाला भोजन फ्री हो सकता है पर अपनी सेहत के अनुसार ही लिया जाना चाहिए।हल्का और संतुलित भोजन पेट और मन दोनों को शांत रखता है।

यात्रा केवल शारीरिक नहीं होती, मानसिक भी होती है। इतने लंबे सफर में खिड़की के बाहर की दुनिया कई घंटे तक एक समान दिखती है, वही आसमान  बस , ऐसे में मन के लिए मनोरंजन की तैयारी भी जरूरी है। कुछ किताबें, डाउनलोड की हुई फिल्में या संगीत एक अदृश्य सहयात्री बन जाते हैं और समय को बेहतर तरीके से आगे बढाते हैं। अगर कोई दवा नियमित रुप से लेनी है तो उसे साथ रखना और उड़ान के हिसाब से उसका समय तय कर लेन बुद्धिमानी भरा कदम है।

इसके साथ ही दस्तावेजों की जांच उड़ान की अनिवार्य जरूरत है। कई यात्री लंबी यात्रा की चिंता में सबसे साधारण गलती इसी मोड़ पर कर बैठते हैं। इसलिए पासपोर्ट, टिकट और वीजा को अंतिम बार देखकर ही यात्रा की शुरुआत करना मन की शांति को अगले कई घंटों तक सुरक्षित रखता है। इमिग्रेशन के संभावित सवाल जवाब पहले ही सोच लेना चाहिए। जिस देश में जाना हो वहां के नियमों को समझ लेना चाहिए, उदाहरण के लिए दुबई में खसखस भूल कर भी न ले जाएं। अमेरिका में कोई प्रतिबंधित बीज, या प्रतिबंधित दवाएं आदि न ले जाएं। जो मेडिसिन रखें उनका प्रिस्क्रिप्शन साथ रखें।

इन सारी तैयारियों का मकसद एक ही है कि लंबी यात्रा थकान के बोझ से मुक्त होकर एक शांत और यादगार अनुभव बन सके। उड़ान चाहे कितनी भी लंबी हो, थोड़ी सजगता और थोड़ी समझदारी उसे सहज ही सरल बना देती है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

इन दिनों दुबई में

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३७ ⇒ आदमी और पजामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आदमी और पजामा।)

?अभी अभी # ८३७ ⇒ आलेख – आदमी और पजामा ? श्री प्रदीप शर्मा ?

इंसान, ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति का नमूना है, वह कोई बंदर अथवा भालू नहीं, कि उसे जैसा मन चाहे, जामा पहना दिया जाए। वह अपनी मर्ज़ी का मालिक है, अपनी बुद्धि और विवेकानुसार अच्छा से अच्छा खा सकता है, और अच्छे से बेहतर तरीके से ओढ पहन सकता है। वह भले ही खुद अपनी नुमाइश करे, लेकिन आप उसे नमूना नहीं कह सकते।

सभी जानते हैं पायजामा पुरुषों द्वारा पहना जाता है। पुराने लोग अक्सर कमीज पायजामा और कुर्ता धोती पहनते थे। आजकल भी कुर्ता पायजामा एक भारतीय वेषभूषा है, जिससे भारतीयता टपकती है। दक्षिण में तो आज भी वकील लोग नीचे धोती और ऊपर कमीज, काला कोट और टाई पहनते हैं। कानून हमें काला कोट और टाई पहनने को बाध्य तो कर सकता है लेकिन हमारी धोती को हात नई लगा सकता। यह हमारी राष्ट्रीयता का मामला है।।

पजामा तंग और कुर्ता ढीला हो सकता है लेकिन अगर कोई हमें कहे, तुम आदमी हो या पजामा, तो यह सिर्फ हमारा सरासर अपमान ही नहीं, हमारी अस्मिता, वेश भूषा, संस्कृति और भारतीयता की भी तौहीन है। आखिर पायजामे में ऐसा क्या है, जिससे हमें शर्मिंदा होना पड़े।

सभी जानते हैं, पेंट बुशर्ट, टाई और आज की फैशनेबल जीन्स हमारा पारम्परिक पहनावा नहीं है। कभी हमने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी और आज उन्हीं की फटी जीन्स हम पर इतनी हावी हो गई है कि हमें एक अच्छा भला आदमी पजामा नजर आने लगा है और फटी जीन्स वाला नमूना एक बेहतर इंसान। क्या कहें, बस यही कह सकते हैं, साला मैं तो साब बन गया, साब बनके कैसा तन गया।।

मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है, हमारे जमाने में कुछ लड़के कमीज पायजामा पहनकर कॉलेज आते थे। घर पर आज भी कुछ पुराने लोग अमोल पालेकर टाइप, पट्टे वाली बंबइया चड्डी और पायजामा पहनते हैं। लेकिन यहाँ भी ब्रांडेड कैप्री और रंगबिरंगी चड्डी टाइप हॉफ पैंट का जमाना आ गया है, जिसे पहनकर आप मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग और मॉल तक जा सकते हो। अगर हम यहाँ भी वही कहावत दोहराएँ कि यह आदमी है या पजामा, तो फिर भी बदनाम हमारा पायजामा ही होता है।

वैसे पजामा, पाजामा, और पैजामा तीनों ही पायजामा का अपभृंश हैं। पायजेब और पायदान की तरह जो जामा पाँव से जुड़ा हुआ हो, उसे पायजामा ही कहेंगे। स्कूल में हमारे हिंदी के अध्यापक खादी के, हाथ से धुले, पारंपरिक धोती कुर्ता पहनकर आते थे और नैतिकता पर विशेष बल देते थे। एक दिन उन्होंने धूम्रपान और तंबाकू के दुष्प्रभाव पर सबकी क्लास ली, और दूसरे ही दिन हमें तंबाकू पर निबंध लिखकर लाने का आदेश दिया। जितना लिख सकें, जो लिख सकें, लेकिन लिखना जरूरी है।।

अगले ही दिन सबकी कॉपियां जप्त कर ली गईं। फुर्सत में उनकी जॉच शुरू हुई और आखिर वह कयामत का दिन आ ही गया, जब सबके निबंधों का पोस्टमार्टम होना था।

कुछ छात्रों के निबंध अच्छे थे, तो कुछ के खराब। लेकिन सभी छात्रों के निबंधों का शीर्षक लाल स्याही से घेर दिया गया था। किसी ने तमाखू लिखा था, तो किसी ने तंबाखू। कहीं कू की मात्रा छोटी थी तो कहीं खू की। शायद ही किसी ने सही तरीके से तम्बाकू लिखा हो।

आप पजामा बोलें अथवा पायजामा, कोई कुछ नहीं कहने वाला। आप पायजामा पहनें, अथवा ना पहनें, यह आपका विवेकाधिकार है, बस आदमी की तौहीन करना हो तो करें, लेकिन बेचारे पायजामे ने आपका क्या बिगाड़ा है। आप यह भी तो कह सकते हैं, तुम आदमी हो या फटी जीन्स? स्वदेशी बनें, लेकिन किसी भारतीय परिधान की इज्जत तो ना उछालें और वह भी बेचारे पायजामे की। वह हमेशा पायजामा ही रहा है, उसने कहीं अतिक्रमण नहीं किया। पायजामे को पायजामा ही रहने दो, किसी आदमी को इसकी उपाधि तो न दो। अगर आप फिर भी आदत से बाज नहीं आए, तो कहीं हम ही अपना आपा ना खो दें और कह उठें आप आदमी हो या…?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३५ ⇒ डिक्टेशन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डिक्टेशन।)

?अभी अभी # ८३५ ⇒ आलेख – डिक्टेशन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर इस अंग्रेजी शब्द का डिसेक्शन अथवा चीर फाड़ की जाए तो आप किसी को डिक्टेट भी कर सकते हैं। समझने वाले भले ही इसे तानाशाही समझें, लेकिन साधारण शब्दों में आप जैसा बोल रहे हैं, वैसा अगर सामने वाला लिखता जाए, तो यह डिक्टेशन हो जाए।

डिक्टेशन शब्द में आदेश देने की बू भी आती है। जब कि अगर प्रेम से बोला जाए, तो मैं बोलूं, तू लिखते जा, ही इस अंग्रेजी शब्द का हिंदी अर्थ होता है।।

आज तो हर बोला हुआ आसानी से रिकॉर्ड हो जाता है, वॉइस स्पीच विधा भी हमारे पास उपलब्ध है, मैं तब की बात कर रहा हूं, जब कक्षा में नोट्स लिखवाए जाते थे। बस उधर से आदेश होता था, चुपचाप बैठे मत रहो, कॉपी कलम निकालो, और जो हम बोल रहे हैं, उसे नोट करो। इट्स इंपॉर्टेंट।

डिक्टेशन हिंदी में भी हो सकता है और अंग्रेजी में भी। जिसे जो भाषा आती है, वह उसी में डिक्टेशन ले सकता है। यह संभव नहीं कि कोई अंग्रेजी में बोल रहा हैं, आपको अंग्रेजी नहीं आती, तो आप हिंदी, उर्दू, मराठी अथवा गुजराती में ही डिक्टेशन ले लो।।

जैसा बोला जाए, वैसा ही सुना जाए, समझा जाए, और लिखा जाए, यानी सुनो, समझो और नोट करो, यही डिक्टेशन का अर्थ हुआ। लेकिन इतनी कसरत क्यों, क्या डिक्टेशन के लिए क्या हिंदी में कोई शब्द नहीं है।

किसी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना अथवा मिलकर गीत गाना, जितना आसान है, उतना ही कठिन है, किसी के बोले हुए को उसी गति में लिखते जाना, शायद इसीलिए पिटमैन ने शॉर्ट हैंड यानी आशु लिपि का आविष्कार किया। कुछ कुछ उर्दू जैसी सांकेतिक भाषा में द्रुत गति में पहले लिखना और बाद में उसे टाइपिंग करना ही एक स्टेनोग्राफर का मुख्य दायित्व होता था।।

आज की तारीख में यह विधा तो छोड़िए, मोबाइल में गूगल आपको अनुवाद भी कर देगा, भाषा उसके लिए कोई समस्या नहीं। अनुवाद की समस्या पर एक जमाने में कई ग्रंथ लिखे गए हैं, डिक्टेशन की समस्या का निदान कभी किसी ने नहीं सुझाया।

महाभारत महाकाव्य के लिपिबद्ध होने की कहानी भी बड़ी रोचक है। कुछ कुछ, जब तक आप बोलते जाओगे, मेरी कलम चलेगी, इधर वेदव्यास जी महाराज रुके, और उधर गणेश जी का फाइनल फुल स्टॉप।।

हिंदी में डिक्टेशन लेने में शायद इतनी समस्या नहीं आती है, जितना अंग्रेजी में आती है। हां अगर बोलने वाले का ही अगर उच्चारण दोष है तो डिक्टेशन लेने वाले का नहीं दोष गुसाईं।

सबकी अंग्रजी इतनी अच्छी भी नहीं होती। जैसा सुनते हैं, समझते हैं, वैसा लिख लेते हैं। अगर कोई, I have to say को eye have two say लिख मारे तो आप अपना सर कहां दे मारेंगे।।

हमारे कॉलेज में अंग्रेजी की कक्षा में ऐसी कई कॉपियां मौजूद थीं, अगर उनको चेक किया जाए, क्या सुना, क्या, समझा, और क्या लिखा तो समझिए बस महाभारत शुरू हो जाए।

लव की स्पेलिंग luv भी हो सकती थी और मैरिज की mirage. Come here को come hear लिखने वाले भी कम नहीं थे।

अगर किसी ने, I don’t know को, I don’t no लिख दिया, तो क्या आप उसे फांसी पर चढ़ा दोगे।

हम भले ही भाषा को भासा बोलें, लेकिन हमारे भाव शुद्ध हैं और हमें अपनी मातृ भाषा से बहुत प्रेम है। अगर कोई विदेशी भाषा हम पर जबरदस्ती थौंपी जाएगी, तो हम इसी तरह उसकी ऐसी तैसी, क्या कहते हैं उसे हिंदी में, Teeth for tat

यानी जैसे को तैसा करते ही रहेंगे। Eye love you. Tank you.

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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