हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४९ – लोहे का पुराना पिंजरा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – लोहे का पुराना पिंजरा।)  

☆  चुभते तीर # १४९ – व्यंग्य  – लोहे का पुराना पिंजरा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे से सटे राष्ट्रीय वन्यजीव अभयारण्य के मुख्य वन जांच नाके की कंटीली बाड़ के सहारे लोहे की सींकों वाला एक पुराना और जंग लगा पिंजरा पिछले बीस सालों से एक भारी खूंटे पर टँगा हुआ था जिसका छोटा सा दरवाजा हमेशा खुला रहता था। उस पिंजरे की पपड़ीदार जर्जर सींकों पर कभी वन्यजीवों के बचाव का प्रतीक बना हुआ था जो अब धूल और बारिश की मार से स्याह हो चुका था। उस नाके के ठीक नीचे पत्थर के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही धरमपाल काका अपनी शीशम की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले धरमपाल काका दिन भर उस खुले हुए लोहे के पिंजरे को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अभयारण्य के प्रवेश द्वार पर सुबह से ही सफारी जिप्सियों, वातानुकूलित कारों और वन विभाग के बड़े-बड़े अधिकारियों की गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। मंच से मूक वन्यजीवों के प्रति करुणा और वन रक्षा पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए वन्यजीव विशेषज्ञों और सूट-बूट पहने अफसरों को बाड़ के कोने में लटके उस पुराने कबाड़ पिंजरे से कोई सरोकार नहीं था। नाके का पुराना वन रक्षक मंगलू जब भी हाथ में चाय की केतली लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगलू आज वन्यजीव सप्ताह के इस मेले में इस पिंजरे के खुले दरवाजे से किसी बेजुबान का दर्द समझने का कोई आदेश आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की घास ही चरवाई जा रही है?” मंगलू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

अभयारण्य में हाल ही में राजधानी के केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से नए क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए डिजिटल निगरानी केंद्र का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे धरमपाल काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस बाड़ पर लटके पुराने पिंजरे पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को वन्यजीव सप्ताह के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और जीपीएस ट्रैकिंग के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक पुराने कबाड़ पिंजरे के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और नाके के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे धरमपाल काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य नाके का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई वन आश्रित पेंशन या लकड़ी बीनने का परमिट चाहिए तो भीतर दफ्तर में जाकर क्लर्क से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर बाड़ पर टँगे एक पुराने बेकार पिंजरे को घूरने से इस जंगल के जानवरों की सुरक्षा नहीं होने वाली है।” धरमपाल काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “संरक्षक साहब मैं किसी पेंशन या मुफ़्त की लकड़ी की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस पिंजरे में वह खोया हुआ विश्वास वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए विश्वास की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस वन्यजीव सप्ताह पर करोड़ों का बजट जारी करके बेजुबानों के लिए नए प्राकृतिक गलियारे बना रही है, फिर आपकी इस पुरानी लोहे की जाली का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त वनपाल पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस जंगल के हर पेड़ और हर शिकारी के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “संरक्षक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे वन क्षेत्र में शिकारियों और तस्करों ने बेजुबान वन्यजीवों का संहार करना शुरू किया था तब काका के इकलौते बेटे समरेश ने इसी चौपाल पर खड़े होकर मूक जीवों के प्राणों की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “समरेश ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पुराने पिंजरे से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब समरेश उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा प्राणी विज्ञानी था, जब शहर के बड़े तस्कर तेंदुओं और हिरणों की खालें नोचते थे तब समरेश ने जंगलों में रात-रात भर भटक कर घायल जानवरों को इसी पिंजरे में रखकर उनका इलाज किया था, उसने इस पिंजरे का दरवाजा हमेशा खुला रखकर कसम खाई थी कि जब तक इस जंगल के अंतिम जानवर को स्वतंत्र सांस लेने की गारंटी नहीं मिल जाएगी तब तक वह किसी बड़ी विदेशी सफारी लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

धरमपाल काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस पिंजरे की जंग लगी सींक को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे समरेश ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह पिंजरा केवल लोहे का ढांचा नहीं बल्कि कैद से आजादी की हिफाजत करने वाली चौखट है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड का सबसे बड़ा अभयारण्य सुरक्षा आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस पिंजरे को संग्रहालय में रखवाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े पर्यावरण मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी वन रक्षा प्रोजेक्ट फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब समरेश ने अंतरराष्ट्रीय तस्करों के सिंडिकेट की पोल खोली थी तो विदेशी निजी जू और लक्जरी सफारी रिसॉर्ट्स की लॉबी ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए समरेश को अपनी अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव पर्यटन कंपनी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी देकर खरीद लिया था। समरेश ने अपने सारे आदर्शों और उस पिंजरे का वास्ता ताक पर रखकर उन गोपनीय परमिटों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति वाइल्डलाइफ रिजॉर्ट टाइकून बन गया जो आज उसी जंगल के जानवरों को विदेशी रईसों के मनोरंजन के लिए निजी बाड़ों में कैद करने का सबसे बड़ा सौदागर था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि समरेश तो खुद बेजुबानों का सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर वन्यजीव सप्ताह में बेजुबान जानवरों से प्यार का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही वनवासी बाप के खुले पिंजरे का सौदा करके जंगल के राजा को सर्कस का खिलौना बना देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई संवेदना से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस खाली पिंजरे को ताकते रह गए और पूरा वन नाका उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४८ – चमड़े की पुरानी नाल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चमड़े की पुरानी नाल।)  

☆  चुभते तीर # १४८ – व्यंग्य  – चमड़े की पुरानी नाल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय पशु चिकित्सालय के मुख्य बरामदे की चौखट के पास मोटी कील के सहारे लोहे की नाल जड़ी चमड़े की एक घिसी हुई पुरानी पट्टी पिछले बीस सालों से लटकी हुई थी जिसकी सिलाई वक्त और धूप की मार से उधड़ चुकी थी। उस खुरदरी नाल पर कभी बेसहारा बैलों और घोड़ों के खुरों को घाव से बचाने वाले स्नेह की चमक थी जो अब गर्द और सीलन की परत में बिल्कुल खो चुकी थी। उस चौखट के ठीक नीचे ईंटों के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही हरदेव काका अपनी बांस की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला गमछा डाले हरदेव काका दिन भर उस पुरानी नाल को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अस्पताल परिसर में सुबह से ही आधुनिक पशु एम्बुलेंस गाड़ियों, विदेशी नस्ल के पालतू कुत्तों के ब्यूटी पार्लर उत्पादों और पशु कल्याण बोर्ड के बड़े अफसरों की चमकती गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। मंच से मूक पशुओं के प्रति करुणा और दया पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे पर उन नए डॉक्टरों और सूट-बूट पहने अफसरों को बरामदे के कोने में लटकी उस घिसी हुई पुरानी नाल से कोई मतलब नहीं था। अस्पताल का पुराना ग्वाला सुखराम जब भी हाथ में चारे का गट्ठा लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती आवाज में उससे पूछते “क्यों रे सुखराम आज विश्व पशु दिवस के इस मेले में इस पुरानी नाल से किसी बूढ़े बैल के खुर का दर्द नापने का कोई हुक्म आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की घास ही चरवाई जा रही है?” सुखराम बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

चिकित्सालय में हाल ही में राजधानी के पशुपालन सचिवालय से नए मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक वेटरनरी सर्जरी के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए वातानुकूलित ऑपरेशन थियेटर का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे हरदेव काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस चौखट पर लटकी पुरानी नाल पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व पशु दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और विदेशी पेट क्लिनिकों के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ चमड़े की पट्टी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और अस्पताल के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में भोजन के लिए चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे हरदेव काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई पशुपालक किसान पेंशन या मुफ़्त टीके की पर्ची बनवानी है तो भीतर ओपीडी काउंटर पर जाइए, इस तरह बाहर बैठकर चौखट पर लटकी एक बेकार लोहे की नाल को घूरने से इस देश की सड़कों पर घूमती लावारिस गायों का पेट नहीं भरने वाला है।” हरदेव काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “अधिकारी साहब मैं किसी मुफ़्त के टीके या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस नाल में वह खोया हुआ दर्द वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए दर्द की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस पशु दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके आवारा पशुओं के लिए आधुनिक गौशालाएं बनवा रही है, फिर आपकी इस पुरानी घिसी नाल का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त पशुधन प्रसार अधिकारी पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस अस्पताल के हर खुर और हर घाव के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “चिकित्सा अधिकारी साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे इलाके में बूढ़े और बीमार बैलों को कसाईखानों में धकेलने की क्रूरता चरम पर थी तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी चौपाल पर खड़े होकर मूक पशुओं के प्राणों की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस लोहे की नाल से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और संवेदनशील युवा पशु चिकित्सक था, जब व्यापारी काम से छूटे बूढ़े बैलों को भूखा मारकर लावारिस छोड़ देते थे तब मानस ने रात-रात भर जागकर उनके रिसते खुरों पर यही नाल बांधी थी, उसने इस नाल को चौखट पर टांगकर कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम मूक जानवर को जीने का अधिकार नहीं मिलेगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

हरदेव काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस नाल के चमड़े को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह नाल केवल लोहे का टुकड़ा नहीं बल्कि बेजुबानों के आंसुओं की ढाल है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय पशु संरक्षण बोर्ड का सबसे बड़ा अभयारण्य आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस नाल पर सरसों का तेल लगाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े पशु सेवा मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी पशु रक्षा फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने अवैध वधशालाओं और पशु अंगों की तस्करी की पोल खोली थी तो बहुराष्ट्रीय पशु चारा और लेदर एक्सपोर्ट कंपनियों के सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी अंतरराष्ट्रीय पेट फूड और लेदर कॉर्पोरेशन का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस नाल का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति मीट प्रोसेसिंग टाइकून बन गया जो आज उसी कस्बे के बूढ़े जानवरों को काटकर विदेशी पालतू कुत्तों के लिए डिब्बाबंद खाना बनाने का सबसे बड़ा कारखाना चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद बेजुबानों का सबसे बड़ा कसाई बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व पशु दिवस पर मूक प्राणियों पर दया का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही ग्वाले बाप की इस नाल को मुनाफे की भट्टी में झोंककर जानवरों की हड्डियों का व्यापार करते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई करुणा के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस लटकी हुई नाल को ताकते रह गए और पूरा पशु चिकित्सालय उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ७० ☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ।)

☆ शेष कुशल # ७० ☆

☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” – शांतिलाल जैन ☆

लोकतंत्र जम्बूदीप में भी है. जाहिर है वहाँ एक संसद भी है और संसद की कार्यवाही को कवर करनेवाले न्यूज़ चैनल भी. यू-ट्यूब पर उपलब्ध ऐसे ही एक चैनल के बुलेटिन का ट्रांसक्रिप्ट कुछ इस प्रकार है.

“नमस्कार. मैं हूँ अनाम और आप देखना शुरू कर चुके हैं दी जम्बूदीप टाइम्स. सरकार ने आज संसद में दो अधिनियम प्रस्तुत किए, जिन्हें भारी हंगामे के बीच बिना बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया. आज के बुलेटिन में हम दोनों कानूनों पर विस्तार से बात करेंगे.

पहला है मिनिमम वेजेस फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून के तहत देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को एक करोड़ रुपए रोज़ाना की न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान की गई है. इसे हर पाँच साल में संशोधित किया जाएगा और प्राइस इंडेक्स के अनुसार इसमें वृद्धि की जा सकेगी. उद्देश्य है रिच लाइफ़ स्टाइल में जीवनयापन के लिए एक तयशुदा बुनियादी आय का भरोसा दिलाया जाना.

दूसरा है वेल्थ क्रिएशन एंड एसेट होल्डिंग फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून में देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को उनके क़ब्ज़े में अब तक आ चुकी राष्ट्र की चालीस प्रतिशत संपदा में कमी नहीं आने देने की गारंटी प्रदान की गई है. उद्देश्य है अमीरों को गरीब होने से बचाना. कानून यह सुनिश्चित करेगा कि कल को आर्थिक समानता लाने की सनक में कोई सिरफिरा जननायक अमीरों की संपदा कम न कर बैठे.

सूत्र बताते हैं कि अंदरखाने सरकार चिंतित है कि कुछ बिजनेस टाइकून्स और टॉप सीईओज की इनकम और सैलरी लगातार घट रही है. कहीं कहीं तो यह पचपन लाख रुपए प्रतिदिन तक रह गई है. जबकि उनकी फैक्ट्रियों में मजदूरों की आय पंद्रह बेसिस पॉइंट के इज़ाफ़े के साथ तीन सौ पंद्रह रुपए रोज़ हो गई है. ऐसे में सुपर रिच सेगमेंट को शोषण से बचाने की जरूरत महसूस की जा रही थी. प्रस्तावित क़ानून यह देखेगा कि बिजनेस टाइकून्स की इनकम बेंच मार्क इनकम से कम न होने पाए. यदि ऐसी स्थिति निर्मित होती है तो शासन इंसेटिवाइज करके अंतर की राशि की आपूर्ति करेगा. बिल पेश करते हुए सरकार ने इसे कल्याणकारी राज्य की दिशा में एक जनहितकारी कदम बताया है.

कॉर्पोरेट फंडेड थिंक टैंक के एक अर्थशास्त्री से हमने कुछ देर पहले बात की. उन्होंने जम्बूदीप टाइम्स को बताया कि सुपर रिच परिवार इन दिनों फाइनेंशियल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. एक करोड़ रुपए रोज़ की मामूली आमदनी से घर खर्च बमुश्किल निकल पाता है. निजी विमान से यात्रा का खर्च,  विदेशों में होने वाली कांफ्रेसेज का खर्च,  प्राईवेट आईलैंड पर हॉलिडेईंग का खर्च और परिवार में परिणय-प्रसंग पड़ जाए तो चार-पाँच हज़ार करोड़ की मामूली सी रकम में सादगी से निपटाने की मजबूरी. स्थिति इतनी गंभीर है कि पाँच सितारा होटल्स में दो जून की रोटी का खर्च निकालपाना दुश्वार होता जा रहा है. अधिनियमों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित जम्बूदीप बनाने के लिए गरीबों को अमीरों के पक्ष में त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. सरकार के विधिक सलाहकारों का अभिमत है कि तीन सौ रुपए रोजाना कमाने की लक्झरी में जी रही पचास प्रतिशत आबादी स्वेच्छा से कुर्बानी न दे तो शासन क़ानून बनाकर ऐसी कुर्बानी ले सकता है, लेना भी चाहिए. गरीब और मध्यम वर्ग की कुर्बानियाँ जीएसटी के रूप में हो सकती हैं. बढ़ी हुई आयकर की दरों के रूप में या सर्विस चार्जेज के रूप में भी हो सकती है, जल, जंगल, जमीन के अधिग्रहण के रूप में भी.

अधिनियम पारित होने के बाद जननायक ने प्रेस से बात करते हुए कहा है कि आर्थिक समानता की बात करनेवाले बुद्धिजीवी जम्बूदीप में अराजकता फैलाना चाहते है. पचास प्रतिशत आबादी के पास देश की संपदा का छह प्रतिशत हिस्सा अभी भी  है. यह विलासिता है. संपत्ति रखने की उसे जरूरत ही क्या है?  रोज़ कमाना रोज़ खाना है. पाँच किलो अनाज हम दे ही रहे हैं, उतना अपने पास रखकर शेष अमीरों में बाँट देना चाहिए.

अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सरकार ने एक रोडमैप भी बनाया है. मान लो किसी बड़े घराने की संपदा घटने लगी तो सरकार उसे एक दो हवाई अड्डे देगी,  कुछेक सी-पोर्ट दे देगी,  कुछ खदानें,  नॉमिनल दरों पर जमीन और कॉर्पोरेट टैक्स में छूट देकर उन्हें गरीब होने से बचाएगी. लोन के डिफाल्टर हुए तो नब्बे प्रतिशत से ज्यादा का हेयरकट देकर भी उनके सुपर रिच स्टेटस की रक्षा करेगी. सरकार अपनी प्राथमिकताएँ समझती है, अमीरों को और अधिक अमीर बनाना सरकार की प्राथमिकताओं में हमेशा ही शुमार रहा है.

अधिनियम के प्रावधानों में कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेष्ठीजनों में वर्गीकरण नहीं किया गया है. जो कुशल है वो धनाढ्य भी हो यह जरूरी नहीं है. जो धनाढ्य है वो कुशल है. प्रस्तावित अधिनियम में संरक्षण पाने का अधिकारी है. इस अधिनियम में कार्य घंटे और कार्य दिवस भी परिभाषित नहीं किए गए है. ‘वंस ए अमीर इज आलवेज ए अमीर’ के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है. विपक्ष ने इन दोनों अधिनियमों का विरोध किया है लेकिन हमने अपनी पड़ताल में पाया है कि जब वे ट्रेझरी बेंच पर क़ाबिज़ थे तब उनकी नीतियाँ भी प्रो-रिच-सुपर-रिच ही रहीं. बहरहाल, पूरे जम्बूदीप में सरकार के इन क़दमों का स्वागत किया जा रहा है. सुपर रिच खुश तो हैं लेकिन न्यूनतम दैनिक आय एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ रुपए रोज़ाना करने की मांग भी कर रहे हैं.

दोनों अधिनियमों पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ. अभी के लिए बस इतना ही. नमस्कार”

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ – हास्य-व्यंग्य – “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक व्यंग्य  “नरेन्द्र और देवराज इंद्र”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

नारायण – नारायण कहते हुए नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने आइये ऋषिवर, कहां से आगमन हुआ कहते हुए नारद जी का स्वागत किया। नारद मुनि बोले – प्रभु पृथ्वी पर स्थित आपके प्रिय जम्बुद्वीप का भ्रमण करके लौट रहा हूं। वहां की अराजक स्थिति को देखकर अत्यंत दुखी हूं। जनता में हाहाकार मचा है। देश की केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों के बढ़ते टैक्सों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिसके पास धन और सत्ता है वे सुख भोग रहे हैं। गरीबों, कमजोरों पर तरह – तरह के अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिभा और योग्यता दर – दर भटक रही है, गधे पंजीरी खा रहे हैं। दबंगों के साथ – साथ अनेक साधु वेशधारी भी महिलाओं से दुष्कर्मों में लिप्त हैं। झूठ और फरेब का बोलबाला है। देवी – देवताओं के वंशज पथ भ्रष्ट हो गए हैं। धन्वन्तरि के वंशज चिकित्सा के क्षेत्र में, कुबेर के वंशज व्यवसाय में, बुद्धि दाता गणेश के वंशज मीडिया और न्याय में, विश्वकर्मा के वंशज तकनीक और नवनिर्माण में, माँ अन्नपूर्णा के वंशज कृषि और अनाज के क्षेत्र में लूट और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। प्रभु आपने ही बताया था कि धरती पर शांति और अनुशासन के लिए एक ही परम शक्ति ने अलग – अलग रूपों में जन्म लिया है। फिर देवी – देवताओं और अन्य धर्मों के प्रमुखों के नाम पर भोली – भाली जनता को भ्रमित करके क्यों लड़वाया और लूटा जा रहा है ? प्रभु अब जम्बुद्वीप पर आपके पुनः जन्म लेने का समय आ गया है। विष्णु जी बोले – ऋषिवर मैं यह कार्य अनेक बार कर चुका हूं, अब इसे कोई अन्य देवता करे। नारद मुनि निराश होकर देवराज इंद्र के दरबार में पहुंचे। उन्होंने देवराज को जम्बुद्वीप की हालत और विष्णु देव से मुलाकात की जानकारी दी। नारद की बात पर देवराज ने मुस्कुराते हुए कहा – हे ऋषिवर भारतवासियों और पड़ोसी देशों के समाचारों से हम सभी देवता चिंतित हैं। “देव सरकार” भी विष्णु जी से जम्बुद्वीप पर अवतार लेकर वहां पुनः व्यवस्था कायम करने का आग्रह कर चुकी है, किंतु विष्णु जी का कथन भी सही है कि वे यह कार्य अनेक बार कर चुके हैं, अतः अब किसी अन्य देवता को भेजा जाए। ऋषिवर विष्णु जी के धरती पर अनुभवों को देखते हुए हमने उनसे अनुरोध किया है, हमें विश्वास है कि वे एक बार फिर जम्बुद्वीप पर अवतार लेने राजी हो जाएंगे। वैसे भी उनका “कल्की अवतार” लेना अभी बाकी है।

नारद मुनि ने नारायण – नारायण कहते हुए गहरी सांस ली और बोले – प्रभु कहीं विष्णु जी को पहुंचने में देर न हो जाए। जम्बुद्वीप में इन दिनों नरेंद्र नामक व्यक्ति सर्वोच्च पद पर आसीन है, कोई अमित उनका सारथी है। ये दोनों ही तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी हैं। नरेंद्र तो चक्रवर्ती सम्राट बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसने पूरे जम्बुद्वीप को एक रंग में रंग दिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सहित विश्व के तमाम बड़े – छोटे देशों को अपनी वाणी से मोह लिया है, चीन पर भी डोरे डाल रहा है। जम्बुद्वीप का सारा विपक्ष भी एकजुट होकर उसका मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रहा है। यदि नरेंद्र के विजय रथ को शीघ्र नहीं रोका गया तो अनर्थ हो जाएगा। चिंतातुर देवराज बोले – हे ऋषिवर स्पष्ट बोलें – क्या अनर्थ हो जाएगा ?

नारद मुनि ने पुनः गहरी सांस ली और कहा – प्रभु जम्बुद्वीप के चंद राज्य ही उसके ध्वज से बचे हैं। जैसे ही वह संपूर्ण जम्बुद्वीप पर अपना ध्वज लहराकर और सम्पूर्ण विश्व के नेताओं को जादू की झप्पी दे देकर चक्रवर्ती सम्राट बनेगा वैसे ही उसकी नजर आपकी कुर्सी पर होगी। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि वह बहुत चतुर है। उसके पास अमित जैसा कुशल सारथी और “मामा” जैसे घोषणा वीर हैं। नारद की बातों से चिंतित देवराज अपना आसन छोड़ विष्णु जी से मिलने रवाना हो गए। वे नहीं चाहते थे कि कलयुग में कोई धरती पुत्र इतना शक्तिशाली हो जाए कि उसके कारण इंद्रासन डोलने लगे।

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४७ – सूखा डस्टर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सूखा डस्टर।)  

☆  चुभते तीर # १४७ – व्यंग्य  – सूखा डस्टर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के मुख्य व्याख्यान कक्ष की चौखट के पास लकड़ी का एक भारी और घिसा हुआ पुराना डस्टर पिछले बीस सालों से एक मटमैले ताखे पर रखा हुआ था जिसके कपड़े वाले हिस्से पर सफेद खड़िया की जमी हुई परत धूप और सीलन की मार से पत्थर जैसी सख्त हो चुकी थी। उस डस्टर की लकड़ी पर कभी नन्हें बच्चों के भविष्य को संवारने वाले आदर और समर्पण की खामोश खुशबू बसी थी जो अब गर्द के नीचे कहीं खो गई थी। उस दालान के ठीक नीचे टूटी ईंटों वाले चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही शिवशंकर गुरुजी अपनी शीशम की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले शिवशंकर गुरुजी दिन भर उस चाक से भरे डस्टर को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। महाविद्यालय परिसर में सुबह से ही आधुनिक वातानुकूलित कारों में सवार होकर बड़े-बड़े निजी कोचिंग सिंडिकेट के मालिकों, एडुटेक कंपनियों के प्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग के आला अफसरों की कतारें लग रही थीं। मंच से गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु के श्लोक लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे पर उन नए सलाहकारों और सूट-बूट पहने अफसरों को दालान के कोने में रखे उस धूल भरे काठ के डस्टर से कोई सरोकार नहीं था। संस्थान का पुराना भृत्य रामदीन जब भी हाथ में चाय की केतली लिए उधर से निकलता तो गुरुजी की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर कांप उठता था। गुरुजी बहुत ही धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे रामदीन आज विश्व शिक्षक दिवस के इस मेले में इस डस्टर से किसी तख्ती की कालिख पोंछने का कोई सरकारी फरमान आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों के शॉल ही ओढ़ाए जा रहे हैं?” रामदीन बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

महाविद्यालय में हाल ही में राजधानी के राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद से नए क्षेत्रीय निदेशक बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक स्मार्ट क्लासरूम तकनीक के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए डिजिटल टीचिंग स्टूडियो का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे शिवशंकर गुरुजी पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस ताखे पर रखे पुराने डस्टर पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व शिक्षक दिवस के इतने बड़े भव्य आयोजन और एआई आधारित ऑनलाइन ट्यूशन के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग शिक्षक का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ डस्टर के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और संस्थान के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सम्मान समारोह समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे शिवशंकर गुरुजी के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “मास्टर जी आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य दालान का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई सेवानिवृत्त शिक्षक कल्याण निधि या मुफ़्त चिकित्सा का फॉर्म भरना है तो भीतर दफ्तर में जाकर बाबू से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर ताखे पर रखे एक पुराने बेकार डस्टर को घूरने से इस देश की शिक्षा व्यवस्था में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आने वाला है।” शिवशंकर गुरुजी ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “निदेशक साहब मैं किसी भत्ते या खैरात की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस डस्टर की लकड़ी पर वह खोया हुआ संस्कार लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को गुरुजी का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “मास्टर जी आप किस खोए हुए संस्कार की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस विश्व शिक्षक दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके शिक्षकों को टैबलेट बाँटती है और विदेशों में आधुनिक ट्रेनिंग के लिए भेजती है, फिर आपके इस पुराने लकड़ी के डस्टर का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त प्रवक्ता पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस महाविद्यालय के हर ब्लैकबोर्ड और हर छात्र के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “निदेशक साहब गुरुजी की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस जिले में सरकारी स्कूलों को बंद करके शिक्षा की दुकानें खोली जा रही थीं तब गुरुजी के इकलौते बेटे मानस ने इसी दालान में खड़े होकर निस्वार्थ विद्यादान की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस चाक वाले डस्टर से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा शिक्षक था, जब बड़े कोचिंग वाले गरीब बच्चों से लाखों की फीस वसूलते थे तब मानस ने रात-रात भर लालटेन जलाकर सैकड़ों निर्धन बच्चों को इसी डस्टर से ब्लैकबोर्ड साफ करके मुफ्त पढ़ाया था, उसने इस डस्टर को ताखे पर रखकर कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम गरीब बच्चे को एक सच्चे शिक्षक का ज्ञान बिना मोल नहीं मिल जाएगा तब तक वह किसी निजी शिक्षा माफिया के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

शिवशंकर गुरुजी ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस डस्टर की सफेद खड़िया वाली सतह को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह डस्टर केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं बल्कि अज्ञान के अंधेरे को पोंछने वाला शिक्षक का स्वाभिमान है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय शिक्षक अधिकार आयोग का सबसे बड़ा ग्रामीण शिक्षा संरक्षण आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस डस्टर से धूल झाड़ेगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े ज्ञान मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी शिक्षक कल्याण समिति की मूल फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने कोचिंग माफियाओं के खिलाफ आवाज उठाई थी तो देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन कोचिंग और एडुटेक कंपनियों के सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी बहुराष्ट्रीय एडुटेक फर्म में पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी और मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पद देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस काठ के डस्टर का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा एडुटेक टाइकून बन गया जो आज गरीब माँ-बाप की जमीनों को गिरवी रखवाकर ऑनलाइन कोर्स बेचने का सबसे बड़ा व्यापार चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से गुरुजी से कहा कि मानस तो खुद विद्या का सबसे बड़ा सौदागर बन चुका है, तो गुरुजी ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व शिक्षक दिवस पर गुरु के चरणों की पूजा का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही शिक्षक बाप के हाथों का डस्टर छीनकर शिक्षा को मुनाफे का कसाईखाना बना देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई सरस्वती के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस धूल भरे डस्टर को ताकते रह गए और पूरा प्रशिक्षण संस्थान उस बेबस गुरु के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४६ – तिपहिया साइकिल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – तिपहिया साइकिल।)  

☆  चुभते तीर # १४६ – व्यंग्य  – तिपहिया साइकिल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय दिव्यांग एवं बाल पुनर्वास केंद्र के मुख्य दालान की सीलन भरी दीवार के सहारे लोहे की एक पुरानी और घिसी हुई तिपहिया साइकिल पिछले बीस सालों से रखी हुई थी जिसके पिछले दोनों पहियों के रबर वाले टायर गल चुके थे और उसकी लोहे की हरी चादर पर वक्त की मार से लाल जंग की गहरी परत चढ़ चुकी थी। उस तीन पहियों वाली छोटी गाड़ी के हैंडिल पर कभी सेरेब्रल पाल्सी से जूझते बच्चों के कांपते हाथों की मजबूत पकड़ के पसीने की गंध बसी थी जो अब धूल और जालों के नीचे दम तोड़ रही थी। उस दालान के ठीक नीचे टूटी ईंटों वाले चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही सोमदत्त काका अपनी जामुन की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले सोमदत्त काका दिन भर उस हरी तिपहिया साइकिल के पैडल को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। केंद्र परिसर में सुबह से ही आधुनिक रोबोटिक व्हीलचेयरों, न्यूरो-स्टिम्यूलेशन मशीनों और महंगे फिजियोथेरेपी उपकरणों का प्रदर्शन करने के लिए शहर के बड़े-बड़े निजी अस्पतालों के डॉक्टरों और अफसरों की चमचमाती गाड़ियाँ आ रही थीं। मंच से सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चों के सपनों को पंख लगाने पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए न्यूरोलॉजिस्टों और सूट-बूट पहने अफसरों को दालान के कोने में रखी उस पुरानी कबाड़ साइकिल से कोई सरोकार नहीं था। केंद्र का पुराना चपरासी मंगरू जब भी हाथ में चाय की केतली लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगरू आज सेरेब्रल पाल्सी दिवस के इस मेले में इस तीन पहियों वाली गाड़ी पर किसी लड़खड़ाते बच्चे को बैठाने का कोई हुक्म आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों के खिलौने ही बांटे जा रहे हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

पुनर्वास केंद्र में हाल ही में राजधानी के सामाजिक कल्याण एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण सचिवालय से नए मुख्य परियोजना निदेशक बनकर आए डॉक्टर अनिमेष भारद्वाज बहुत ही कड़क, आधुनिक न्यूरो-रिहैबिलिटेशन के जानकार और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए सेंसरी रूम का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे सोमदत्त काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस दीवार के सहारे खड़ी हरी तिपहिया साइकिल पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व सेरेब्रल पाल्सी दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल थेरेपी के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ गाड़ी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और केंद्र के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे सोमदत्त काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य दालान का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई दिव्यांग सहायता पेंशन या मुफ़्त बैसाखी का फार्म भरना है तो भीतर दफ्तर में जाकर बाबू से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर दालान में रखी एक टूटी बेकार तिपहिया साइकिल को घूरने से इस मुल्क के सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चों के पैर सीधे नहीं होने वाले हैं।” सोमदत्त काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “निदेशक साहब मैं किसी मुफ़्त की बैसाखी या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस तिपहिया साइकिल पर वह खोया हुआ सहारा वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए सहारे की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस सेरेब्रल पाल्सी दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके आधुनिक सहायक उपकरण बांट रही है, फिर आपकी इस पुरानी तिपहिया साइकिल का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त फिजियोथेरेपिस्ट पंडित कृपाशंकर जी जो पिछले चालीस सालों से उस केंद्र के हर बच्चे और हर थेरेपी के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “निदेशक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस जिले में सेरेब्रल पाल्सी से ग्रस्त बच्चों को परिवार वाले घर के किसी अंधेरे कोने में लावारिस छोड़ देते थे तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी दालान में खड़े होकर उन मासूमों के अधिकारों की सबसे बड़ी अलख जगाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस हरी तिपहिया साइकिल से जुड़ा हुआ है?” पंडित कृपाशंकर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और संवेदनशील युवा ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट था, जब बड़े अस्पताल गरीब बच्चों के इलाज के नाम पर लाखों लूटते थे तब मानस ने अपनी जेब के पैसों से बढ़ई और लोहार के साथ मिलकर यह पहली तिपहिया साइकिल बनाई थी ताकि पक्षाघात से जूझते बच्चे खुद अपने पैरों पर खड़े होने का अभ्यास कर सकें, उसने इस साइकिल को दालान में स्थापित करके कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम दिव्यांग बच्चे को मुफ्त में सहारा नहीं मिल जाएगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी मेडिकल लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

सोमदत्त काका ने कृपाशंकर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस तिपहिया साइकिल के जंग लगे पैडल को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह तिपहिया साइकिल केवल लोहे का ढांचा नहीं बल्कि लड़खड़ाते बचपन के स्वाभिमान की गाड़ी है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय दिव्यांग कल्याण बोर्ड का सबसे बड़ा मुफ़्त पुनर्वास प्रोजेक्ट पास कराकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस गाड़ी में ताजे रंग भरेगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े बाल कल्याण मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी पुनर्वास प्रोजेक्ट फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने गरीबों के मुफ्त इलाज की मुहिम छेड़ी थी तो विदेशी रोबोटिक व्हीलचेयर और महंगी थेरेपी मशीनों के बहुराष्ट्रीय सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी अंतरराष्ट्रीय न्यूरो-रिहैब कंपनी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस तिपहिया साइकिल का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति न्यूरो-थेरेपी टाइकून बन गया जो आज उसी कस्बे के गरीब पक्षाघात पीड़ित बच्चों को बाहर का रास्ता दिखाकर रईसों के बच्चों से एक-एक घंटे की थेरेपी के बीस हजार रुपए वसूलने का सबसे बड़ा अस्पताल चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद मासूमों की मजबूरी का सबसे बड़ा कसाई बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व सेरेब्रल पाल्सी दिवस पर मूक पक्षाघात पीड़ित बच्चों के प्रति करुणा का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप के हाथों की इस तिपहिया साइकिल को मुनाफे के बाजार में बेचकर लड़खड़ाते बचपन की सांसों का सौदा करते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई संवेदना से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस धूल भरी तिपहिया साइकिल को ताकते रह गए और पूरा पुनर्वास केंद्र उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३३ ☆ व्यंग्य – जैसा बोओगे, वैसा काटोगे ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३३ ☆

?  व्यंग्य – जैसा बोओगे, वैसा काटोगे ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

गलती उनकी कतई नहीं है।

वे भी हमारे जैसे ही इंसान हैं। वही दो आँखें, दो कान, दो हाथ-पैर और सबसे बढ़कर वही दिमाग। हार्डवेयर में कोई खास फर्क नहीं।

फर्क केवल सॉफ्टवेयर का है।

दुनिया भर के बच्चों को बचपन में दिमाग में कहानियाँ, कविताएँ, संस्कार और सवाल अपलोड किए जाते हैं।

पर कहीं-कहीं सवाल पूछने की जगह जवाब पहले ही इंस्टॉल कर दिए जाते हैं। फिर रोज पाँच बार उसका अपडेट होता है। कभी पैकेज में नफरत होती है, कभी श्रेष्ठता का भ्रम, कभी दूसरे को मिटा देने का अंधा जुनून।

कमाल यह है कि सॉफ्टवेयर पुराना होता जाता है और उसे ‘अपडेटेड विचार’ बताया जाता रहता है!

पीढ़ियाँ कन्फ्यूज्ड हैं।

नतीजा सामने है।

इंसान आधुनिक हो गया, तकनीक अत्याधुनिक हो गई, हथियार स्मार्ट हो गए ,लेकिन सोच का ऑपरेटिंग सिस्टम अब भी पिछली कई सदियों में अटका हुआ है।

फिर हम आतंकवाद को देखकर पूछते हैं, ये लोग ऐसे क्यों हैं?

सवाल थोड़ा बदलकर पूछिए, इनके भीतर ऐसा बनने की प्रोग्रामिंग किसने की?

हवाई जहाज हाईजैक करने वाले दिखाई देते हैं।बम बनाने वाला हाथ दिखाई देता है, कोड लिखने वाला दिमाग दिखाई नहीं देता।

आतंकवादी दिखाई देता है, आतंक की मैन्युफैक्चरिंग फैक्टरी दिखाई नहीं देती।

इसलिए यदि दुनिया से आतंकवाद मिटाना है तो केवल सुरक्षा घेरा कुछ नहीं कर सकता।ट्रिगर पर उँगली रोकना पर्याप्त नहीं होगा। उँगली से पहले दिमाग तक पहुँचना होगा।

सॉफ्टवेयर बदलना होगा।

और यह काम किसी बाहरी इंजीनियर से नहीं होगा। जिसे बचपन से कोई विचार हर दिन समझाया गया है, उसे ही यह शिक्षा बदलने की असली जिम्मेदारी, उसी समाज को उठानी होगी, जिसने वह विचार  डाला है।

जो लोग दुनिया बदलने निकले थे, उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि दुनिया बदलने से पहले अपने भीतर का वायरस निकालना जरूरी है।

वे दूसरों को मिटाने निकले और धीरे-धीरे अपने ही समाज की शांति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और भविष्य को मिटाने लगे।

नफरत की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह जिस घर से निकलती है, लौटकर उसी घर की खिड़कियाँ तोड़ती है।

एक दिन शायद उन्हें भी समझ आएगा कि आतंक का कारोबार पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने वाला है।

क्योंकि गोली यह नहीं पूछती कि सामने वाला शरीर  किसका है।

बम यह नहीं देखता कि मलबे में कौन-सा धर्म दबा है।

आग को पासपोर्ट पढ़ना नहीं आता।

और मौत किसी विचारधारा की सदस्य नहीं होती।

इसलिए लड़ाई किसी धर्म, जाति या देश से नहीं, उस खतरनाक सॉफ्टवेयर से है जो इंसान को इंसान से नफरत करना सिखाता है।

हार्डवेयर वही रहेगा।

प्रोग्राम बदलना होगा।

और शायद बदलाव की सबसे बड़ी मजबूरी भी वहीं से आएगी, जब उन्हें दिखाई देने लगेगा कि जिस नफरत को वे दूसरों के लिए डाउनलोड कर रहे थे, उसका वायरस उनके अपने घरों में फैल चुका है। पर्दे के भीतर घुटन है।

“गलती उनकी कतई नहीं है।” आत्मघाती हौसला बिरला होता है।

यह जज़्बा इंसानी बेहतरी के लिए अपडेट किया जाए तो यह इतिहास का सबसे बड़ा अपडेट होगा ।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४५ – सूचना का अधिकार – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)  

☆  चुभते तीर # १४५ – व्यंग्य  – सूचना का अधिकार ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राज्य मुख्य सूचना आयुक्त कार्यालय के मुख्य बरामदे की जालीदार खिड़की पर पीतल की एक पुरानी और मटमैली घंटी पिछले बीस सालों से एक सन की खुरदरी रस्सी के सहारे लटकी हुई थी जिसके भीतर की गोल लोहे वाली जिभी बरसों पहले निकाल ली गई थी। उस घंटी की बनावट कभी दफ्तर में सुनवाई की बारी बताने के काम आती थी पर अब वक्त की धूल और सीलन से उसकी चमक पूरी तरह उड़ चुकी थी और वह खिड़की की जंग लगी सलाखों के बीच बेआवाज झूल रही थी। खिड़की के ठीक नीचे सीमेंट के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही धरमदास काका अपनी इमली की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले धरमदास काका दिन भर उस मूक घंटी को अपनी धुंधली आँखों से एकटक निहारते रहते थे। भवन परिसर में सुबह से ही आधुनिक पारदर्शी पोर्टल, डिजिटल शिकायत पेटियों और हाईटेक निगरानी तंत्र का प्रदर्शन करने के लिए शहर के बड़े-बड़े अफसरों, वकीलों और नेताओं की चमचमाती गाड़ियाँ आ रही थीं। मंच से नागरिक अधिकारों और सच को सामने लाने की कसमें खाते हुए लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए प्रवक्ताओं और सूट-बूट पहने अफसरों को खिड़की के कोने में लटकी उस बेजुबान पीतल की घंटी से कोई सरोकार नहीं था। दफ्तर का पुराना चपरासी मंगरू जब भी हाथ में फाइलों का बंडल लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगरू आज सूचना के अधिकार के इस मेले में इस गूंगी घंटी में कोई सच की बोली बजने की उम्मीद जगी क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की पर्चियां ही बाँटी जा रही हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

सूचना भवन में हाल ही में राजधानी के प्रशासनिक सुधार सचिवालय से नए मुख्य सूचना आयुक्त बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक डिजिटल ट्रैकिंग के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए ऑनलाइन पोर्टल कक्ष का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे धरमदास काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस खिड़की पर लटकी पुरानी घंटी पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को अंतरराष्ट्रीय सूचना दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल इंडिया के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक बेकार घंटी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और संस्थान के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय उद्घाटन सत्र का मुख्य भाषण समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे धरमदास काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई आरटीआई अर्जी का स्टेटस या बुढ़ापा पेंशन की अपील देखनी है तो भीतर काउंटर पर जाकर फॉर्म भरिए, इस तरह बाहर बैठकर खिड़की पर टँगी एक टूटी घंटी को घूरने से इस मुल्क की सरकारी फाइलों का सच बाहर नहीं आने वाला है।” धरमदास काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “आयुक्त साहब मैं किसी कागजी नकल या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस घंटी में वह खोया हुआ सच लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए सच की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस सूचना अधिकार दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके जनता को हर फाइल तक पहुँच दे रही है, फिर आपकी इस पुरानी पीतल की घंटी का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त पेशकार पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस आयोग के हर फैसले और हर अपील के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “आयुक्त साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस कस्बे में आरटीआई कानून की शुरुआत हुई थी और गरीबों के राशन की चोरी दबाने के लिए फाइलों में आग लगाई जाती थी तब काका के इकलौते बेटे सत्यप्रकाश ने इसी चौपाल पर खड़े होकर सच जानने के अधिकार की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “सत्यप्रकाश ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पीतल की घंटी से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब सत्यप्रकाश उस समय पूरे जिले का सबसे बहादुर और स्वाभिमानी युवा आरटीआई कार्यकर्ता था, जब राशन माफिया और भ्रष्ट ठेकेदार गरीबों के हक पर कुंडली मारकर बैठते थे तब सत्यप्रकाश ने इसी घंटी को खिड़की पर बांधकर कसम खाई थी कि जब भी किसी गरीब की फाइल दबाई जाएगी तो वह इसे बजाकर पूरे कस्बे को जगाएगा, उसने भूख से तड़पते सैकड़ों परिवारों को उनका हक दिलाया था और ऐलान किया था कि जब तक इस दफ्तर की आखिरी फाइल शीशे की तरह साफ नहीं हो जाएगी तब तक वह किसी भ्रष्ट तंत्र के आगे नहीं झुकेगा।”

धरमदास काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस घंटी की खुरदरी रस्सी को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे सत्यप्रकाश ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह घंटी केवल पीतल का ढक्कन नहीं बल्कि सच की आवाज है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से केंद्रीय पारदर्शिता आयोग का सबसे बड़ा लोक अधिकार आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस घंटी में नई जिभी लगाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी आरटीआई फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब सत्यप्रकाश ने करोड़ों के सरकारी घोटालों की पोल खोली थी तो देश के सबसे बड़े खनन और रियल एस्टेट सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए सत्यप्रकाश को अपनी बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट जनसंपर्क एजेंसी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी देकर खरीद लिया था। सत्यप्रकाश ने अपने सारे आदर्शों और उस घंटी का वास्ता ताक पर रखकर उन जांचों को दबाने वाली फाइलों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा पीआर माफिया बन गया जो आज सरकारों और उद्योगपतियों के काले कारनामों को छिपाने का सबसे बड़ा ठेका चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि सत्यप्रकाश तो खुद सच को दफन करने वाला सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर सूचना के अधिकार और पारदर्शिता का ढोंग करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप की आवाज को फाइलों में बंद करके बेच देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई सच्चाई के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस मूक घंटी को ताकते रह गए और पूरा सूचना भवन उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३८ – हास्य-व्यंग्य – “लोकतंत्र खतरे में…!” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “लोकतंत्र खतरे में…!”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “लोकतंत्र खतरे में…!” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

“लोकतंत्र खतरे में है।” हमारे देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता – प्रवक्ता और नामवर समाजसेवी जब – तब देशवासियों को इसके प्रति आगाह करते रहते हैं। लोकतंत्र को खतरे में बताने वाले इसके लिए हमेशा ही अपने प्रतियोगी राजनीतिक दलों अथवा अन्य कद्दावर नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं। चाहे भाजपा हो, कांग्रेस, जद, जद (यू) अथवा पश्चिम बंगाल की टीएमसी या दक्षिण भारत के राजनीतिक दल सभी दूसरे दलों और उनके नेताओं की कार्यप्रणालियों को अलोकतांत्रिक बताते हुए लोकतंत्र को खतरा बता रहे हैं। दुनिया को यह बताने के लिए कि भारतवर्ष में अराजकता है, यहां के निवासियों की हालत बहुत खराब है, “भारत में लोकतंत्र खतरे में है” कुछ नेता अक्सर विदेश भी जाते रहते हैं। आश्चर्य है कि हमारे देश में सत्तापक्ष से लेकर सभी विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेताओं सहित गली मोहल्ला तक के नेता देश में लोकतंत्र बचाने की लड़ाई जी जान से लड़ रहे हैं फिर भी लोकतंत्र खतरे में है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र के जन्मदाताओं और उसके पालन-पोषण कर्ताओं द्वारा ही स्वहित के चलते नवजात लोकतंत्र की समुचित देखरेख में बरती गई लापरवाही के कारण वह बचपन से ही कुपोषित और कमजोर हो चला हो और इतनी लंबी आयु होने के बाद भी उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं आया। मुझे तो लगता है कि स्वार्थी नेताओं ने जानबूझ कर हमारे देश के लोकतंत्र को मजबूत, बलिष्ठ, हट्टा-कट्टा नहीं होने दिया ताकि अपनी मर्जी पूरी करने कभी भी उसके साथ छेड़छाड़, बलात्कार किया जा सके। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जैसे लोकतंत्र एक अत्यंत “रूपवती कन्या” है और विभिन्न राजनीतिक संगठनों के पदाधिकारी और नेता व उसके टुच्चे आशिक उसे अपने कब्जे में करके उससे अपनी मर्जी का डांस करवाना चाहते हैं। जब मोहल्ला छाप साधारण से त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में मारपीट, खून खराब हो जाता है, बड़े क्षेत्र की शांति व्यवस्था प्रभावित हो जाती है तब यहां तो लोकतंत्र के असंख्य हितैषी – दीवाने और रखवाले हैं। लोकतंत्र को बचाने, उस पर कब्जा करने और उसके पालन-पोषण की इस बहुकोणीय लड़ाई और छीना झपटी में बेचारा लोकतंत्र अब घायल होकर वेंटिलेटर पर पहुंच गया है। निःसंदेह जो वेंटिलेटर पर पहुंच जाता है, उसे मृत नहीं माना जाता अतः कहा जा सकता है कि बीमार ही सही, किंतु अभी हमारे देश में लोकतंत्र जिंदा है। देश के सभी राजनीतिक दल, नेता, अफसर, कर्मचारी, समाजसेवी और सभी धर्मों के संरक्षक अपने-अपने ढंग से लोकतंत्र को बचाने के प्रयास और प्रार्थना कर रहे हैं। उसकी जीवन रक्षा की कामना में रत हैं। मुझे विश्वास है कि हमारे देश का लोकतंत्र कभी न कभी वेंटिलेटर से निकलकर पूरी तरह स्वस्थ और मजबूत होकर खड़ा होगा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६९ ☆ व्यंग्य – “बहाने गढ़ने का ऑस्कर गोज़ टू दी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “बहाने गढ़ने का ऑस्कर गोज़ टू दी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी…” ।)

☆ शेष कुशल # ६९ ☆

☆ व्यंग्य – “बहाने गढ़ने का ऑस्कर गोज़ टू दी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी…” – शांतिलाल जैन ☆

‘जब धन खोता है, तो कुछ नहीं खोता; जब स्वास्थ्य खोता है, तो कुछ खोता है; जब चरित्र…’

इन दिनों चरित्र का तो!!! जाने भी दो यारों……आज हम अपनी बात स्वास्थ्य तक ही सीमित रखते हैं.  बीमार होते हैं आप, भर्ती होते हैं आप, तब तक इंश्योरेंस प्रीमियम का धन तो खो ही चुके होते हैं,  अस्पताल के बिल में भी…. डबल लॉस.  सैंक्शन का मेल! अब आएगा. अब आएगा. आँखें पथरा जाती हैं मेल नहीं आता.  बार बार चेक करते हैं. क्वेरी आती है सेंक्शन नहीं आता. फेसलेस प्रोसेस है श्रीमान्. एजेंट फेस दिखा नहीं रहा, कंपनी का फेस दिख नहीं रहा, शर्म दिखे तो किसकी आँखों में दिखे!!  दादू का ही केस लीजिए.

“कैशलेस हो जाएगा ?” – मैंने काउंटर पर पूछा.

“भर्ती के समय तो नहीं हो पाएगा लेकिन हम सुनिश्चित करेंगे कि डिस्चार्ज होते होते मरीज कैशलेस हो जाए.”

सत्तर की उम्र में हैं दादू. पंद्रह सालों में दस बारह लाख प्रीमियम तो भर ही चुके हैं. बीमार पड़े,  भर्ती हुए तो पता लगा कि जो बीमारी उनको हुई है उसे छोड़कर दुनिया की सारी बीमारियाँ कवर्ड हैं. अमेज़न के जंगलों में नेटिव्स को होनेवाली बीमारियाँ भी कवर्ड हैं, नहीं हैं तो बस वही बीमारी कवर्ड नहीं है जो दादू को हुई है.  बीमारियों के कवरेज का खेल वीडियो गेम के नामुमकिन लेवल्स को पार करने जैसा है. बीमारी कवर में निकल भी आए तो ‘वेटिंग पीरियड’ में निकल आती है. कवर हासिल करने के चक्कर में मरीज़ अनकवर होने लगता है.

दादू एक सभ्य नागरिक है. भारतवर्ष में जीवित रहने के तमाम टैक्स में से एक टैक्स बीमा कंपनियों को भी चुकाता है. सरकार हो या बीमा कंपनी, आप अपने भरे गए टैक्स का हिसाब मांग नहीं पाते. बरस-दर-बरस प्रीमियम डबल होती जाती है, दादू तब भी भरता हैं. बीमा कम्पनियाँ क्लेम रिजेक्ट करके अपना धरम निभाती हैं दादू प्रीमियम भरकर अपना धरम निभाता है. दादू झक्की भी है. ज़िद पाल बैठा है, कम से कम एक बार तो क्लेम ले कर रहेगा. फ़ानी दुनियाँ से फ़ना होने से पहले ‘पैसा वसूल’ की ज़िद में दादू ने निमोनिया जैसी बीमारी लगा ली. ‘प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज’ पर क्लेम रिजेक्ट हो गया. बहुत पहले उसे एक बार ज़ोर की छींक आई  थी. बीमा कराते समय उसने बताया नहीं. ‘नॉन-डिस्क्लोजर ऑफ मटेरियल फैक्ट्स’. दादू फिर हार गया.

बहाने गढ़ने के ऑस्कर अवार्ड नहीं मिला करते श्रीमान् वरना क्लेम रिजेक्ट करने में भारत की बीमा कम्पनियों को किसी का बाप भी हरा नहीं सकता. दादू का एक क्लेम तो बस इसीलिए रिजेक्ट हो गया कि उसकी बीमारी उसकी उम्र से जुड़ी थी. जेरियाट्रिक डिसीज. उम्र सापेक्ष. इस उमर में आपको ये बीमारी तो होना ही थी – इसका क्लेम कैसा!!! इन दिनों अस्पताल एआई तकनीक से इलाज़ करते हैं,  कंपनी सुपर एआई से रिजेक्शन का बहाना खोज लाती है. दादू डाल-डाल, बीमा कंपनी पात-पात. क्लेम का ऊँट किसी भी करवट बैठे, बैठता इंश्योरेंस कम्पनी के बाड़े में ही है. अस्पताल से डिस्चार्ज के समय आपको सब मिलता है – खीज़, चिढ़, फ्रस्टेशन, गुस्सा, खुद के कपड़े फाड़ लेने का मानस; नहीं मिलता तो बस बीमे का क्लेम नहीं मिलता.

बहरहाल, फिल्म इतनी निराशावादी भी नहीं है. क्लेम कभी-कभी मिलते भी हैं. मुझे मिला है एक बार. एक माइनर ऑपरेशन कराना पड़ा था. बिल बना एक लाख चौबीस हज़ार पाँच सौ तेइस रुपए का. सत्तर हज़ार डिडक्टिबल के कट गए, पचास हज़ार ‘को-पे’ के. चार हज़ार दौ सौ ‘नॉन-मेडिकल आईटम्स’ के. तीन सौ रुपए क्लेम के मिले.  बीमा लोकपाल में मैंने कम्प्लेंट करके पूछा – ये तेइस रुपए और किस बात के कट गए?  रिप्लाई आया – ‘बीमा कंपनी ने तेईस रुपए लोअर हंड्रेड्स में राउंड-ऑफ करने में काटे हैं. सब नियमानुसार हुआ है.’

खुश हुए अपन. रिप्लाई तो मिला. खाते से निकालकर सौ सौ के तीन नोट धरोहर की तरह संभालकर रखे हैं. जो कभी अपन की बीमार होकर आईसीयू में मरने की नौबत आई तो उत्तराधिकार में देने के लिए धन इतना ही बचेगा. बचाकर तो अपन ने चरित्र भी रखा है, पर उसका तो इस बार!!! जाने भी दो यारों……      

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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