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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 27 – व्यंग्य – दुआरे पर गऊमाता ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार (आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन+ सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं।  कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है.  आज की  व्यंग्य  दुआरे पर गऊमाता । यह  सामयिक व्यंग्य  हमारे सामाजिक ताने बाने की सीधी साधी तस्वीर उकेरती है।  एक सीधा सादा व्यक्ति एवं परिवार आसपास की घटनाओं  जीवन जीने के लिए क्या कुछ नहीं  करता है? ऐसे सार्थक व्यंग्य के...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य – # 23 ☆ व्यंग्य – मिस्सड़ के मजे ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा  रचनाओं को “विवेक साहित्य ”  शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “मिस्सड़ के मजे”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  सामयिक व्यंग्य  बेशक असामयिक लग रहा होगा किन्तु, मैं इसे सामयिक के दर्जे में ही रखता हूँ। ब्रेकिंग न्यूज़ तो कभी भी रिपीट होती रहती है।  तो मिस्सड के मजे तो कभी भी लिए जा सकते हैं।यह तो सिद्ध हो  ही  गया  कि  श्री विवेक जी  पुरे देश की राजनीति को किचन से जोड़ने में भी माहिर हैं। किससे किसकी और किसको उपमा  देना तो कोई  श्री विवेक जी से सीखे। इस व्यंग्य को पढ़कर कमेंट बॉक्स में बताइयेगा ज़रूर। श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेहतरीन व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  ) ☆...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 26 – व्यंग्य – पुरुष बली नहिं होत है ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं.  हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं.  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं. कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं.  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है.  आज की  व्यंग्य  पुरुष बली नहिं होत है ।  यह  व्यंग्य पढ़ने के बाद कई  विवाहित पुरुषों की भ्रांतियां दूर हो जानी चाहिए और जो  ऊपरी मन से स्वीकार न करते  हों वे मन ही मन तो स्वीकार कर ही लेंगे। ऐसे सार्थक व्यंग्य के...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य – # 22 ☆ व्यंग्य – हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा  रचनाओं को “विवेक साहित्य ”  शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  सामयिक व्यंग्य  लोकतंत्र तो क्या घोड़ों को भी  शर्मसार करता हुआ लगता है। खैर, जिसने भी ये शब्द हॉर्स ट्रेडिंग इज़ाद किया हो  या तो वो लोकतंत्र का बिका हुआ घोडा रहा होगा या फिर बिकने को तैयार। बड़ा ही अजीब व्यापार है भाई साहब। वैसे यदि गलत नहीं हूँ तो हॉर्स ट्रेडिंग घोड़ों द्वारा घोड़ों का व्यापार  लगता है। बाकी आप श्री विवेक जी के हॉर्स ट्रेडिंग सम्बन्धी इस  व्यंग्य को पढ़कर कमेंट बॉक्स में बताइयेगा ज़रूर। श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेबाक  व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  ) ☆...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ जिनके लिये सब्जी खरीदना एक कला है ☆ – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन  (आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। आज  प्रस्तुत है श्री शांतिलाल जैन जी का सार्थक  एवं सटीक  व्यंग्य   “जिनके लिये सब्जी खरीदना एक कला है”।  इस व्यंग्य को पढ़कर निःशब्द हूँ। मैं श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य पर टिप्पणी करने के जिम्मेवारी पाठकों पर ही छोड़ता हूँ। अतः आप स्वयं  पढ़ें, विचारें एवं विवेचना करें। हम भविष्य में श्री शांतिलाल  जैन जी से  ऐसी ही उत्कृष्ट रचनाओं की अपेक्षा रखते हैं। )    ☆☆ जिनके लिये सब्जी खरीदना एक कला है ☆☆   वे जब बाहर निकले तो उनकी आँखों में चमक, होठों पर स्मित मुस्कान, चेहरा दर्प से दीप्त और चाल में विजेता का बांकपन था. वे खुदरा मंडी में सब्जी बेचनेवालों को परास्त करके...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 24 – व्यंग्य – पत्रिका के साझेदार ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं.  हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं.  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं. कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं.  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है. डॉ परिहार जी ने एक ऐसे पडोसी चरित्र के मनोविज्ञान का अध्ययन किया है, जिसकी मानसिकता गांठ के पैसे  से कुछ भी  खरीदने की है ही नहीं। पत्रिका तो मात्र संकेत है। यदि आप ऐसी मानसिक बीमारी के चरित्र को जानना चाहते हैं तो आपको...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ प्राईम-टाईम के बिजनेस में पेलवान का परवेस ☆ – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन  (आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। आज  प्रस्तुत है श्री शांतिलाल जैन जी का सार्थक एवं सटीक  व्यंग्य  मालवी भाषा की मिठास के साथ   “प्राईम-टाईम के बिजनेस में पेलवान का परवेस”।  मैं श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य पर टिप्पणी करने के जिम्मेवारी पाठकों पर ही छोड़ता हूँ। अतः आप स्वयं  पढ़ें, विचारें एवं विवेचना करें। हम भविष्य में श्री शांतिलाल  जैन जी से  ऐसी ही उत्कृष्ट रचनाओं की अपेक्षा रखते हैं। )    ☆☆ प्राईम-टाईम के बिजनेस में पेलवान का परवेस ☆☆   मालगंज चौराहे पे धन्ना पेलवान से मुलाक़ात हुई. बोले – ‘अच्छा हुआ सांतिभिया यहीं पे मिल गिये आप. कार्ड देना था आपको. क्या है कि अपन ने पेली तारीख से अखाड़ा बंद कर...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 23 – व्यंग्य – स्वाइन-फ्लू और भैयाजी ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं.  हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं.  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं. कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं.  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है. डॉ परिहार जी ने  एक ऐसे  नेता के चरित्र का विश्लेषण किया है जो  अपनी मामूली बिमारी से खुद तो परेशान है ही साथ ही उसने अपने चमचों की फ़ौज को भी परेशान कर रखा है।  तरह तरह की बीमारियों के नामों से ही भयभीत...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 19 ☆ संभालिये अपना …… ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “संभालिये अपना ...... ”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  सामयिक व्यंग्य  हमें आतंक और आतंकियों के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर करता है। साथ ही यह भी कि आतंक के प्रतीक के अंत की कहानी क्या होती है और यह भी कि आतंक कभी मरता क्यों नहीं है ? श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेबाक  व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 19 ☆  ☆ संभालिये अपना ...... ☆ ब्रेकिंग न्यूज़ में घोषणा हुई कि आतंकी सरगना मारा गया, दुनियां भर में इस खबर को बड़ी उत्सुकता से ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 22 – व्यंग्य – शोधछात्र का ज्ञानोदय ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं.  हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं.  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं. कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं.  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है. डॉ परिहार जी ने  एक ऐसे शोध छात्र  के  चरित्र का विश्लेषण किया है जो अपने गाइड  का झोला थामे आपके आस पास ही भरे बाजार मिल  जायेगा।  झोला मात्र  सांकेतिक वस्तु है  और इस  संकेत के पीछे भी एक दुनिया है। हम कुछ बिरले...
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