हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७४ – व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७४ – व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

पहली बार जिला मुख्यालय में “ईमानदारों का राष्ट्रीय सम्मेलन” आयोजित हुआ। स्वागत द्वार पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“सच्चाई ही हमारी पहचान है।” नीचे छोटा अक्षर में लिखा था—“प्रायोजक: यूनिवर्सल कंस्ट्रक्शन कंपनी (जिस पर सीबीआई की जांच जारी है)।” मुख्य अतिथि, माननीय मंत्री जी, जिन्होंने हाल ही में अपनी तीसरी पत्नी के नाम पर पाँच एकड़ ज़मीन रजिस्टर कराई थी, मंच पर पहुँचे तो तालियाँ गूँज उठीं। भीड़ में से किसी ने कहा— “यही सच्चे ईमानदार हैं, सब कुछ खुलेआम करते हैं!” मंत्री जी मुस्कुराए। उन्होंने भाषण में कहा— “देश को अब ईमानदारी की कमी नहीं, बस पहचानने की ताकत चाहिए।” भाषण समाप्त होते ही मंच संचालक ने घोषणा की— “अब ईमानदारी सम्मान समारोह होगा।” पुरस्कार स्वरूप मंत्री जी ने हर प्रतिनिधि को घड़ी भेंट की, जिस पर उनका चुनाव चिन्ह खुदा था। पत्रकारों ने पूछा— “घड़ी असली है या नकली?” आयोजक बोला— “घड़ी असली है, बस समय नकली बताती है।”

दूसरा सत्र ‘नैतिकता के नए मानदंड’ पर था। एक वक्ता, सरकारी बाबू, बोले—“पहले रिश्वत को अपराध माना जाता था, अब यह सहयोग शुल्क कहलाने लगी है। समाज विकासशील है, शब्दावली भी होनी चाहिए।” दूसरे वक्ता, प्राइवेट स्कूल के संचालक, बोले—“हम बच्चों में नैतिकता लाने के लिए जीना कठिन बना देते हैं। फिर जब बच्चा नियम तोड़ने लगे, तो वही असली नागरिक कहलाता है।” सभागार तालियों से गूंज उठा। तभी मंच के पीछे से आवाज़ आई—“कृपया चोरी गई कुर्सियाँ वापस करें।” प्रतिनिधि मुस्कुराए—“ईमानदारी का सम्मेलन है, कुर्सियाँ कहाँ जाएँगी?” कुछ देर बाद पाया गया कि दर्जनभर कुर्सियाँ पार्किंग में बिक्रय हेतु रखी थीं। आयोजक ने घोषणा की— “यह व्यवस्था शुल्क है।” बाबू जी बोले— “वाह, देश आगे बढ़ रहा है!”

तीसरे सत्र में “डिजिटल ईमानदारी” पर चर्चा हुई। एक युवा अफ़सर ने कहा—“अब सब ऑनलाइन है। भ्रष्टाचार भी पारदर्शी हो गया है। ट्रांजैक्शन सीधे खाते में आती है, दलालों की ज़रूरत नहीं रही। यह डिजिटल इंडिया की सफलता है।” एक और विद्वान बोले—“ईमानदारी अब ऐप में मिलती है, वेरिफाई करके डाउनलोड करनी पड़ती है।” तभी मंच के सामने एक गरीब व्यक्ति अपनी फ़ाइल लेकर आया—“बाबू जी, दो महीने से आवेदन लंबित है।” बाबू ने मुस्कुरा कर कहा—“भाई, यह ईमानदारी का सम्मेलन है, सुविधा केंद्र नहीं। यहाँ सिर्फ भाषणों की अनुमति है, काम की नहीं।” वह आदमी चुप हो गया, लेकिन पौधे के पास खड़ा एक बच्चा बोला—“अगर यह ईमानदार हैं, तो हमारे गाँव में झूठे कौन रहते हैं?” सभा मौन हो गई। पंखे की आवाज़ में ईमानदारी की झिल्ली सी फड़फड़ाने लगी।

सम्मेलन के अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य हुआ। अध्यक्ष महोदय बोले— “हम सब अपने-अपने क्षेत्र के ईमानदार लोग हैं। मैं डॉक्टर के नाम पर दवा बेचता हूँ, शिक्षक नकली प्रमाणपत्र देता है, अफ़सर काम न करके फ़ाइल दबाता है, नेता जनता को भरोसा देता है—और यही राष्ट्रीय एकता का आधार है।” सभागार ठहाकों से भर गया। उन्होंने कहा— “अगले वर्ष हम ‘सच्चाई दिवस’ मनाएँगे, बशर्ते प्रायोजक मिल जाए।” बाहर निकलते हुए किसी ने पूछा— “क्या सम्मेलन सफल रहा?” आयोजक हँसा— “पूरा बजट खर्च हो गया, अब तो ईमानदारी साबित है!” रात को शहर लौटने वाले प्रतिनिधियों की बसें चलीं। सड़क किनारे एक ठेला वाला बैठा था, धीरे से बुदबुदाया— “साहब लोग ईमानदार हैं, इसलिए गरीब अब भी ज़िंदा है।” सड़क की बत्तियाँ झिलमिलाईं—शायद वे भी इस नई ईमानदारी पर मुस्कुरा रही थीं।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २० – हास्य-व्यंग्य – “फेरी वाले और पड़ोसन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  फेरी वाले और पड़ोसन

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २०

☆ व्यंग्य ☆ “फेरी वाले और पड़ोसन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बचपन में जब भी मां मुझे बाजार भेजा करतीं, मोल – भाव कर दाम निश्चित करके समान खरीदने की हिदायत देना न भूलतीं। कभी – कभी तो वे मंगाई जाने वाली वस्तुओं का व्यापारी द्वारा निर्धारित अनुमानित मूल्य बताकर, मेरे द्वारा तय की जाने वाली राशि की पहली परिधि भी निश्चित कर देतीं, जैसे आलू का भाव 20 रूपये किलो बताया जाए तो तुम 15 रूपये किलो मांगना।

मां के कहने से मैं खरीद फरोख्त के समय थोड़ा प्रयास भी करता कि व्यापारी द्वारा मांगी कीमत से कम दामों में मुझे वस्तु मिल जाए, परंतु मुझे खेद है कि मैं भाव ठहराने अथवा तय करने की कला में निपुणता प्राप्त नहीं कर पाया और हमेशा ही अपनी मां एवं मित्रों की तथा अब पत्नी की नजरों में भी एक कुशल खरीददार न कहला सका। अपने द्वारा खरीदी गई किसी भी वस्तु का मूल्य बताकर में लोगों पर रौब न जमा सका, उन्हें आश्चर्य में न डाल सका। जब मेरे मित्र और मेरी पत्नी मेरे द्वारा लाई गई वस्तु का मूल्य सुनकर मुझे ठगा हुआ साबित कर देते हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि शायद वह दिन मेरे जीवन में कभी नहीं आएगा जब मेरे द्वारा खरीदी वस्तु की तथा उसके मूल्य की तारीफ करते हुए लोग दांतों तले अंगुली दबा कर मुझसे उस दुकान का पता पूछेंगे। कभी – कभी मुझे दुख होता है कि मैंने दाम ठहराने अथवा मोल भाव करने जैसी अत्यावश्यक कला मन लगा कर क्यों न सीखी।

मोल भाव करने की आवश्यकता कहां नहीं पड़ती, रिक्शा करने, सब्जी खरीदने से लेकर शादी करने – कराने और पुराने कपड़ों से बर्तन खरीदने तक कदम – कदम पर मोलभाव कर मूल्य ठहराने या दाम निश्चित करने की आवश्यकता पड़ती है।

मेरी पत्नी पर हमारी पड़ोसन का प्रभाव है जहां दिन के बारह घंटे में से छह घंटे तो फेरी वालों का आना – जाना लगा ही रहता है। अच्छे – अच्छे पठान फेरी वाले जो दरी – गलीचे जैसी महंगी वस्तुएँ किश्तों में बेचते हैं हमारे पड़ोस में आकर ठग लिए जाते हैं। न जाने कौन सी कला हमारी पड़ोसन के पास है, सारे मोहल्ले की महिलाओं पर खरीद फरोख्त के मामले में उनका प्रभाव है।

जानकार फेरी वाले तो स्वयं आवाज लगते हुए उनके घर के दरवाजे पर बैठ जाते हैं। अनजान या नए फेरी वालों को पकड़ – पकड़ कर लाने का कार्य उनके चुन्नू – मुन्नू किया करते हैं। वैसे हमारा और हमारी पड़ोसन का मकान गली की नुक्कड़ पर ही है, अतः यह कहा जा सकता है कि चाहे वह कोई भी फेरी वाला क्यों न हो बिना मेरे पड़ोस में रुके आगे जा ही नहीं सकता।

फेरी वालों को कुशलता पूर्वक ठग कर उनसे उचित मूल्य पर समान खरीदने में हमारी पड़ोसन को सिद्धि प्राप्त है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे गीदड़ मौत आने पर शहर की ओर भागता है वैसे ही फेरी वाले दुर्भाग्य आने पर हमारे पड़ोस में सामान बेचने पहुंच जाते हैं। पड़ोसन की ख्याति धीरे – धीरे आसपास के सभी घरों की घर मालकिनों तक एवं उनके माध्यम से घर मालिकों तक पहुंच चुकी है। मोहल्ले की अनेक महिलाएं जो वस्तु क्रय करने में हमारी पड़ोसन का नेतृत्व स्वीकार कर चुकी हैं, फेरी वाले के आने पर चुन्नू – मुन्नू की सूचनाओं के द्वारा उनके घर पहुंच जाती हैं, पड़ोसन की अगुवाई में वस्तु को उचित मूल्य पर खरीदने।

ठंड का मौसम चल रहा है आजकल फेरीवालों को फंसा कर सस्ते मूल्य पर ऊन खरीदने का अभियान मोहल्ले की महिलाओं ने उन्हीं के नेतृत्व में चलाया है। घर घर में ऊनी बनियान बनाई जा रहीं हैं। फुर्सत के क्षणों में मेरे घर में भी मेरी पत्नी की बातों का विषय ऊन ही रहता है। हमारे किस पड़ोसी की पत्नी ने कौन से रंग का कितना ऊन, किस मूल्य पर लिया है इसकी जानकारी तो मुझे है ही यदि मैं गंभीरता पूर्वक पत्नी की बात सुनूं तो यह भी मालुम कर सकता हूं कि किस पड़ोसन ने किसके लिए कितने फंदे डाले।

एक दिन जब मेरी पत्नी पड़ोसन के यहां उनके आमंत्रण पर किसी फेरी वाले से कुछ खरीदने गई थी, मैंने सोचा क्यों न अपने गर्म कपड़े निकाल कर उनकी झाड़ – पोंछ करके उन्हें धूप दिखा दूं। मैंने घर की तमाम पेटियां, अलमारियां इत्यादि छान डालीं परंतु जब मुझे अपना इकलौता ससुराल से मिला गर्म सूट न मिला तो मैं आश्यर्च में पड़ गया। वही तो एक सूट था जिसे कभी – कभी विशेष पार्टियों आदि में पहिन कर मैं लोगों पर अपनी सम्पन्नता की धाक जमा दिया करता था। पत्नी के वापस आने पर रहस्योद्घाटन हुआ – मेरा सूट और अपनी एक पुरानी बनारसी साड़ी फेरी वाले को देकर उन्होंने कुछ बर्तन पड़ोसन के नेतृत्व में ले लिए थे। मैंने अपना माथा ठोक लिया और पड़ोसन को कोसता हुआ पश्चाताप करने लगा। मुझे दुखी और परेशान देख कर पत्नी अपने हाथों का ऊन दिखा कर प्रसन्नता पूर्वक बोली – चिंता न करो अभी, मैंने कुछ पुराने बर्तनों के तुम्हारी स्वेटर के लिए ही ऊन लिया है, दो – चार दिन में ही स्वेटर तैयार हो जाएगी। मैं बर्तनों के बदले ऊन की बात सुनकर चौंक गया, परंतु पत्नी विजय से गर्वित मुस्कान लिए सलाई में फंदे डालते हुए बनियान का डिजाइन पूछने पुनः पड़ोसन के यहां जा चुकी थी। मैंने चुपचाप कपड़े पहने और इस पड़ोसन से दूर नए मकान की तलाश में निकल पड़ा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७३ – व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७३ – व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

पवित्रता और श्रद्धा का वह युग, जब भक्त मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपनी धूल-धूसरित चप्पलों के साथ अहंकार को भी बाहर छोड़ आते थे, अब समाप्त हो चुका है। अब तो भक्त नहीं, बल्कि ‘ग्राहक-उपभोक्ता’ आते हैं, जिनके हाथों में धूप-दीप की जगह चमचमाता स्मार्टफोन होता है और मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रश्न गूँजता है: “मैंने समय दिया, पैसा चढ़ाया, अब रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) क्या है?” यह युग ‘त्वरित मोक्ष’ (Instant Salvation) का है, जहाँ आस्था भी एक ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म बन गई है। मंदिर, जो कभी आत्मा की शांति का आश्रय थे, आज गूगल मैप्स पर तीन-सितारा रेटिंग वाले एक पर्यटन स्थल से ज़्यादा कुछ नहीं। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब उत्पन्न होता है जब कोई भक्त बाहर आकर अपनी निराशा को व्यक्त करता है: ‘भगवान को चार बार आवाज़ दी, कोई जवाब नहीं आया, प्रसादी भी ठंडी थी, इसलिए एक स्टार!’ यह समीक्षा केवल एक ऐप पर दर्ज की गई टिप्पणी नहीं है; यह उस उपभोक्तावादी संस्कृति का महाकाव्य है, जिसने ईश्वर को भी एक विफल सर्विस प्रोवाइडर बना दिया है, और यह मन को झकझोरने वाला सत्य है कि हम अपनी समस्याओं के तत्काल समाधान की चाह में, धैर्य और विश्वास की अपनी सदियों पुरानी पूंजी को नष्ट कर चुके हैं।

यह ‘वन स्टार’ की विडंबना ही हमारे समय का सार है। भक्त की अपेक्षाएँ किसी प्रीमियम मेंबरशिप वाले ग्राहक से कम नहीं होतीं। उन्होंने लाइन में खड़े होकर ‘वीआईपी दर्शन’ के लिए अतिरिक्त शुल्क दिया है, उन्होंने अपनी अर्जी (चिट्ठी) बाकायदा ड्रॉप-बॉक्स में डाली है, तो अब उनके ‘ईष्ट देव’ को तत्काल प्रकट होकर, कम से कम, उनकी नौकरी की तरक्की या बेटी के विवाह की गारंटी तो देनी ही चाहिए थी। भक्त यह भूल गया है कि यह मंदिर किसी ’24×7 कॉल सेंटर’ का ब्रांच ऑफिस नहीं है, जहाँ शिकायत दर्ज होते ही ‘अगले तीन मिनट’ में समस्या का निवारण हो जाएगा। वे भूल गए हैं कि आध्यात्मिक यात्रा एक ‘स्लो बफरिंग’ वाली लंबी फ़िल्म है, जिसे देखने के लिए धैर्य का डेटा पैक चाहिए, न कि ‘फास्ट-फॉरवर्ड’ बटन। यह त्रासदी केवल भगवान की अनुपस्थिति की नहीं है, बल्कि भक्त के भीतर से उस ‘अदृश्य विश्वास’ की अनुपस्थिति की है, जो बिना किसी सबूत या गारंटी के भी, अपनी यात्रा को जारी रखता था। हम प्रमाणिकता और दृश्यता के इतने आदी हो चुके हैं कि जो चीज़ आँखों से ओझल है, उसे हम स्वचालित रूप से ‘फ़र्जी’ मान लेते हैं।

आस्था का यह बाजारीकरण दरअसल हमारी आत्मिक दरिद्रता का प्रमाण है। जब जीवन की जटिल समस्याएँ (जैसे कि ईएमआई का बोझ, या बॉस का अत्याचार) हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो हम त्वरित समाधान के लिए दौड़ते हैं, और मंदिर हमें एक ‘मैजिक पिल’ बेचने वाली दुकान लगने लगती है। भक्त यह उम्मीद करता है कि अगर वह एक ‘मेगा डोनेशन’ देता है, तो उसकी फाइल भगवान के इनबॉक्स में सबसे ऊपर चली जाएगी, क्योंकि वह ‘प्रीमियम ग्राहक’ है। वह नहीं समझता कि ब्रह्मांड की व्यवस्था किसी ‘फ़र्स्ट कम, फ़र्स्ट सर्व’ की नीति पर नहीं चलती, और वहाँ कोई ‘सुपर एडमिन’ विशेष लाभ नहीं देता। इस हृदयविदारक नाटक में, भक्त की आँख में एक आँसू भी है—वह आँसू जो उसकी गहरी असुरक्षा और खालीपन को दर्शाता है। वह सचमुच डरा हुआ है और उसे किसी सहारे की ज़रूरत है, लेकिन सहारा ढूँढने के लिए उसने जिस आधुनिक ‘समीक्षा-आधारित’ प्रणाली को चुना है, वह उसकी आस्था को और खोखला कर रही है, क्योंकि जब वह ‘एक स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में भगवान को नहीं, बल्कि अपने ही टूटे हुए विश्वास को रेटिंग दे रहा होता है।

इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की बीमारी ने भगवान के अस्तित्व के पूरे सिद्धांत को ही विकृत कर दिया है। ज़रा सोचिए, अगर यह रेटिंग प्रणाली व्यापक हो जाए तो क्या होगा: किसी गरीब ने मन्नत माँगी और लॉटरी नहीं लगी, वह तुरंत आकर लिखेगा: ‘गॉड ऑफ़ लक, फ़ेल! 0/100, विल नॉट रेकमेंड।’ किसी धनी व्यापारी को थोड़ी सी हानि हुई, वह लिखेगा: ‘पोर्टफोलियो मैनेजमेंट बहुत ख़राब है, एआई (AI) आधारित आशीर्वाद की ज़रूरत है।’ मंदिरों को शायद अब एक ‘फ़ॉलोअप टीम’ रखनी पड़ेगी जो भक्तों को फ़ोन करके पूछे: ‘सर, क्या आपको हमारी कृपा प्राप्त हुई? क्या आप हमारे ‘दिव्य समाधान’ से संतुष्ट हैं?’ यह सब इतना मन को झकझोर देने वाला है, इतना तर्कहीन है कि दिमाग चकरा जाता है। हमने ‘कर्म’ को ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ में बदल दिया है और ‘मोक्ष’ को ‘इंस्टॉलेशन प्रोसेस’ मान लिया है। हमारी समस्या यह नहीं है कि हमें भगवान नहीं मिले, हमारी समस्या यह है कि हमने भगवान को ढूँढने का सही पता ही भुला दिया है।

इस पूरे तंत्र में सबसे दयनीय प्राणी है पुजारी। वह बेचारा अब ‘कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजर’ बन गया है। उसकी धोती भले ही पवित्र हो, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारियाँ कॉर्पोरेट हैं। वह सुबह उठकर भगवान का अभिषेक करता है या भक्तों की शिकायतों का निवारण? भक्त आकर उस पर चिल्लाता है: ‘महाराज, मेरे बेटे को विदेश की वीज़ा फाइल को पास क्यों नहीं कराया? पिछली बार मैंने आपको अच्छा दक्षिणा दिया था!’ पुजारी, जो कभी आत्मज्ञान का वाहक था, अब ‘फ़्रंटलाइन एग्जीक्यूटिव’ है, जिसे ‘फ़ॉल्टी ग्रेस’ या ‘अन-डिलीवर्ड मिरेकल’ की शिकायतें संभालनी हैं। मंदिर प्रबंधन (जो शायद एक ट्रस्ट का ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ है) उस पर ‘ग्रोथ’ और ‘ईश्वर के विज़िबिलिटी स्कोर’ बढ़ाने का दबाव डाल रहा है। पुजारी अपनी माला जपता है और मन ही मन सोचता है: ‘हे प्रभु, या तो इन्हें असली ज्ञान दो, या मुझे इस रिव्यू सिस्टम से मुक्ति दो।’ यह तनावपूर्ण स्थिति इतनी हृदयविदारक है कि हम इसमें छिपे हुए सच्चे आध्यात्मिक सेवक के दुख को अनदेखा कर देते हैं।

यह व्यवहार, दरअसल, एक ‘आस्था का फ़ास्ट फ़ैशन’ है, जिसमें सब कुछ क्षणिक और खर्च करने योग्य है। आज का भक्त ‘ईश्वर के साथ संबंध’ नहीं चाहता, वह ‘ईश्वर से सौदा’ चाहता है। वह अपने जीवन को एक ‘टू-डू लिस्ट’ के रूप में देखता है, जहाँ भगवान की ज़िम्मेदारी है कि वह सबसे मुश्किल ‘टास्क’ को पूरा करें। वे भूल गए हैं कि ‘आस्था’ एक लंबी अवधि का निवेश है, जिसके लाभ तुरंत नहीं दिखते, बल्कि जीवन के अंतिम खाते में जुड़ते हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ तथ्य है कि हम, जो अपनी मर्ज़ी से मंदिर आते हैं, जब अपनी इच्छा पूरी नहीं होती, तो सार्वजनिक रूप से ‘ईश्वर की गुणवत्ता’ पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। क्या किसी भक्त ने कभी अपनी ‘बुरी आदतों’ को ‘वन स्टार’ दिया है? क्या किसी ने अपने ‘क्रोध’ या ‘लालच’ के लिए ‘रिफंड’ माँगा है? नहीं। हम अपनी विफलताओं का दोष एक अदृश्य शक्ति पर मढ़ने में अत्यधिक कुशल हो चुके हैं, क्योंकि ऐसा करना हमारी ज़िम्मेदारी को आसान बना देता है।

विडंबना यहीं खत्म नहीं होती। कुछ भक्त ‘अच्छी’ समीक्षाएँ भी लिखते हैं, लेकिन उनका आधार भी उतना ही खोखला होता है। ‘मैंने 100 रुपए चढ़ाए थे, और रास्ते में 1000 रुपए का नोट मिल गया। 5 स्टार! बेहतरीन सेवा!’ इस तरह की समीक्षाएँ साबित करती हैं कि ईश्वर को भी अब ‘चमत्कार-वितरण’ (Miracle-Delivery) के आधार पर मापा जा रहा है। वे यह नहीं समझते कि शायद उस दिन उन्हें 1000 रुपए का नोट इसलिए मिला होगा ताकि वे यह जानें कि लालच और कृतज्ञता में क्या अंतर है। लेकिन नहीं, उनके लिए तो भगवान एक उच्च-रिटर्न वाली ‘म्यूचुअल फंड स्कीम’ हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ है कि हमने अपनी आध्यात्मिकता को पूरी तरह से भौतिक लाभ और लेन-देन तक सीमित कर दिया है, और इस प्रक्रिया में हमने उस ‘निःस्वार्थ प्रेम’ को खो दिया है जो बिना किसी अपेक्षा के भक्ति की नींव रखता था। यह प्रेम, यह निःस्वार्थता ही वह चीज़ है जिसे हमने सबसे सस्ता समझा और जिसे सबसे पहले ऑनलाइन बाज़ार में बेच डाला।

अंत में, यह कथा भगवान की विफलता की नहीं, बल्कि हमारी मानव जाति की आधुनिक विफलता की है। हमने एक ऐसी दुनिया बना ली है जहाँ हर अनुभव को रेटिंग दी जाती है, जहाँ हर भावना को इमोजी में समेटा जाता है, और जहाँ ‘विश्वास’ का अर्थ ‘गारंटी’ बन गया है। जब भक्त बाहर आकर ‘वन स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में चिल्लाकर कह रहा होता है: “मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए तुम्हारा अस्तित्व व्यर्थ है!” यह हमारी ‘उपभोक्ता-केंद्रित’ मानसिकता का अंतिम चरण है, जहाँ हम भगवान को भी अपनी नौकरशाही और उपभोक्ता अधिकारों के अधीन देखना चाहते हैं। हरिशंकर परसाई जी शायद आज यह देखकर आहें भरते कि जिस समाज की उन्होंने आलोचना की थी, वह समाज अब अपनी आलोचना को भी ‘वन स्टार’ देकर आगे बढ़ जाएगा। हमें याद रखना चाहिए: ईश्वर ने हमें आज़ादी दी है, लेकिन हम उस आज़ादी का प्रयोग उन्हें ‘रेटिंग’ देने में कर रहे हैं। काश, हम अपनी आत्मा की गहराई में झाँककर, अपने जीवन को ‘पांच स्टार’ देने लायक बना पाते, न कि अपने मनचाहे परिणाम न मिलने पर उस अदृश्य शक्ति को दोष देते।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १९ – हास्य-व्यंग्य – “मूंछें, पुलिस और रौब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  मूंछें, पुलिस और रौब

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १९

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूंछें, पुलिस और रौब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

यदि कोई पुलिस वाला किसी गुंडे, बदमाश अथवा शरीफ आदमी के साथ गाली – गलौच या मारपीट करके उसकी इज्जत रूपी नाक काट लेता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि यह तो रोजमर्रा की बात है, किंतु यदि कोई व्यक्ति किसी हवलदार को चेलेंज करके उसकी मूंछें काट कर उसे मुछमुंडा बना दे तो यह न केवल मूंछों की हानि उठाने वाले उस पुलिसिया के लिए वरन पूरे विभाग के लिये शर्म से डूब मरने वाली घोर आश्चर्य की बात होगी।

एक बार ऐसी ही एक घटना किसी थाने के प्रधान आरक्षक के साथ घटी। बताया गया कि आरक्षक को वहीं के एक व्यक्ति ने चेलेंज किया कि वह आरक्षक की मूंछें काट लेगा और आखिर रात के दो बजे उस व्यक्ति ने हवलदार साहब को “क्लीनशेव” कर दिया। यह पता नहीं चला कि इतना सब होने के बाद भी पुलिस ने उस दुस्साहसी का क्या किया ?

पुलिस विभाग का गहराई से निरीक्षण करने पर ऐसा समझ में आता है कि इस विभाग के लोगों को मूंछों से बड़ा लगाव है। 95 प्रतिशत पुलिसिया मूंछधारी होते हैं। जितने आकार प्रकार की मूंछें दुनिया में हो सकती हैं सभी इस विभाग के लोगों में पाई जाती हैं। तलवार से भाला कट तक और मक्खी से तितली के आकार तक की मूंछों को आप विभिन्न पुलिसियों के चेहरों पर शान से जमे देख सकते हैं।

लोगों का ऐसा सोचना है कि मूंछों से चेहरे पर कठोरता आती है, रौब मैं वृद्धि होती है, चेहरा मर्दाना मालूम होने लगता है। पुलिस को इन सभी की आवश्यकता होती है जो वे मूंछ उगाकर ग्रहण करते हैं। बड़ी – बड़ी मूंछें रख कर बहुत से कमजोर, डरपोक और पिद्दी टाइप के पुलिसिया भी लोगों पर रौब जमाने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी मूंछें देखकर ही लोग समझ जाते हैं कि यह पुलिस वाला है इससे दूर ही रहो। अब आप ही अंदाज लगाएं कि पुलिस की नौकरी और मूंछों का कैसा सम्बंध है। मूंछें पुलिस वालों की पहचान बन गई हैं, जिस पुलिस वाले की जितनी बड़ी मूंछें वह उतना ही दबंग, जांबाज माना जाता है। चावल में कंकड़ों की भांति पुलिस विभाग में भी कुछ मुछमुंडे पाए जाते हैं, किंतु उनके चेहरों में वो बात नहीं होती जो मूंछ वालों के चेहरों पर होती है।

पुलिस विभाग में मूंछों की लोकप्रियता और महत्व देखते हुए मेरे हिसाब से तो इसे पुलिस वालों के लिए आवश्यक करार दे दिया जाना चाहिए। बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिस तरह इस विभाग में प्रवेश के लिए लम्बाई, सीना और वजन की न्यूनतम माप निर्धारित है उसी तरह मूंछों की भी न्यूनतम लम्बाई – चौड़ाई निर्धारित कर दी जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि इस कदम से अवश्य ही अपराधों की संख्या में कमी आएगी। जब मूंछें पुलिस का खौफ बढ़ाएंगी तो अपराधियों के हौसलों का पस्त होना स्वाभाविक ही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले तो पुलिस विभाग में मूंछ मेंटेनेंस भत्ता भी मिला करता था।

हां, एक परेशानी उस समय अवश्य पैदा हो सकती है जब मूंछ धारी पुलिस वालों के रौब से बचने अथवा उन पर अपना रौब कायम करने के लिए गुंडा तत्व भी उसी टक्कर की अथवा उनसे बड़ी मूंछें रखने लगें, फिर मूंछों में “कॉम्पटीशन” पैदा हो जाएगा। अस्तु, इस स्थिति में ऐसा कोई नियम भी बनाया जाना आवश्यक हो जाएगा जिससे आम आदमी की मूंछें पुलिस वालों की मूंछों से टक्कर न ले सकें। कहने का अर्थ यह कि आम जनता की मूंछों का आकर प्रकार भी निर्धारित करना होगा।

खैर यह तो एक ऐसी बात है कि जिस पर तरह – तरह से विचार किया जा सकता है। अब बात उठ गई है तो लोग इस पर सोचेंगे भी, सुधार भी करेंगे। समस्या उन बेचारे पुलिस वालों की होगी जिनकी मूंछें ऊगती ही न हों अथवा बिरली हों। ऐसी दशा में एक मात्र सहारा नकली मूंछें लगाने का ही बचेगा, किन्तु नकली मूंछें लगाना भी आज की स्थिति में कहां तक उचित होगा विचारणीय है। जब एक पुलिस वाला एक साधारण से आदमी से अपनी असली मूंछें कटवा चुका हो तब नकली मूंछों से बनी इज्जत का कहां तक भरोसा किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि अब पुलिस विभाग में पर्याप्त संख्या में महिलाएं भी आ गई हैं और आती जा रही हैं। महिलाओं के मूंछें नहीं होतीं और न ही उगाई जा सकती हैं अतः महिला पुलिस कर्मियों को लेकर मूंछों के प्रसंग पर बात करना व्यर्थ है। हां, बात खतम करते – करते इतना अवश्य कह दूं कि बिन मूंछों की महिलाओं के सामने बड़ी – बड़ी मूंछों वाले भी झुकते देखे गए हैं। चाहे वे गुंडे – बदमाश हों या मंत्री – संतरी। अतः विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि महिलाएं पुलिस विभाग में मूंछें न होने के बाद भी उतनी ही सफल होंगी जितना सफल कोई मर्द बड़ी – बड़ी मूंछों के सहारे भी नहीं हो सकता।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१२ ☆ व्यंग्य – बहती गंगा में हाथ धोने वाले ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘बहती गंगा में हाथ धोने वाले‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बहती गंगा में हाथ धोने वाले

देशभक्त कई किसिम के होते हैं। पहली किस्म के देशभक्त वे होते हैं जिनके दिल में देशभक्ति स्वाभाविक रूप से पैवस्त रहती है। उन्हें उसे याद नहीं करना पड़ता, न ही उसे बार-बार जगाना पड़ता है। वे अंग्रेज़ी कहावत के अनुसार अपनी देशभक्ति अपनी आस्तीन पर टांग कर प्रदर्शित नहीं करते।

दूसरी तरह के लोग वे होते हैं जिनकी देशभक्ति तभी जागती है जब देशभक्ति दिखाने से कुछ प्राप्ति की संभावना होती है। सूखी देशभक्ति से क्या फायदा? ऐसे ही लोग देशभक्ति के प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरते हैं, देशभक्ति के नाम पर बवाल काटने को तैयार रहते हैं। ऐसे देशभक्त असली देशभक्तों का जीना मुहाल किये रहते हैं।

एक किस्म की देशभक्ति राजनीतिज्ञों की होती है। ये देश की सेवा के नाम पर बार-बार दल बदलते हैं। याद रखना मुश्किल होता है कि वे कौन-कौन से घाट का पानी पीकर आये हैं। कइयों को खुद भी याद नहीं होगा कि उन्होंने कितनी पार्टियां बदली हैं। सब कुछ देश की सेवा की दुहाई देकर होता है। देश की सेवा के लिए ये बेचारे अपने उसूल तृणवत त्याग देते हैं, ज़बान बदल देते हैं, अंतरात्मा का गला घोंट देते हैं।

बहुत से लोगों की देशभक्ति मौसम के हिसाब से बदलती है। सत्ता बदलने के साथ सत्ता की नीतियां बदलती हैं। बहुत से होशियार लोग इन्हें पढ़ते और गुनते हैं, और फिर उनको दुहने के लिए देशभक्ति का झंडा लेकर मैदान में उतर आते हैं। बहुत से लेखक और फिल्मकार यही करते हैं। इनकी देशभक्ति लाभ की संभावना के हिसाब से बढ़ती घटती है। ये मौके पर चौका लगाने वाले चतुर लोग होते हैं। जब अटल जी प्रधानमंत्री थे तब उनकी कविताओं के बहुत से गायक और प्रशंसक पैदा हो गये थे। उनके पद से हटते ही ये गायक भी ग़ायब हो गये थे। लालू यादव के एक प्रशंसक ने उन पर ‘लालू चालीसा’ लिखी थी। पुरस्कार- स्वरूप कवि जी राज्यसभा में सीट पा गये थे।

अभी चतुर लेखक सत्ता के ताकतवर लोगों पर पुस्तकें लिख रहे हैं और पर्याप्त प्रचार के साथ उनका विमोचन करा रहे हैं ताकि संदेश सही जगह पहुंच जाए और कृपा के द्वार खुल जाएं। राजाओं के ज़माने में यह काम भाट और चारण करते थे। कुछ फिल्मकार हैं जिन्हें सोते-सोते अचानक याद आता है कि देश में बहुत ज़ुल्म हुए हैं और उन पर किसी ज़िम्मेदार फिल्मकार ने फिल्म नहीं बनायी। सत्तर अस्सी साल पीछे तक दौड़ लगती है, पुराने कागज़-पत्र खंगाले जाते हैं, और साबित किया जाता है कि एक समुदाय ने दूसरे पर कितनी क्रूरता की है। नमक-मिर्च का भरपूर उपयोग होता है। भावनाओं की नदियां बहती हैं। कोशिश होती है कि उत्पीड़ित बताया गया समुदाय भीड़ों की शक्ल में सिनेमाघरों पर टूटे और सिनेमा- खिड़की पर चांदी बरसे। ऐसी फिल्मों को सत्ता का आशीर्वाद मिलता है, उन्हें मनोरंजन-कर से मुक्त किया जाता है। इसलिए खोज-खोज कर ऐसी घटनाओं पर फिल्में बनायी जा रही हैं।

यह मायने नहीं रखता कि इससे कितना आपसी सौहार्द्र बिगड़ता है, कितनी उत्तेजना फैलती है, कितना वैमनस्य होता है, आम आदमी की कितनी फजीहत होती है। फिल्मकार के लिए ये बातें निरर्थक होती हैं। वह ‘मिशन मोड’ में होता है। सच्चाई पर से पर्दा उठाना है, चाहे जो परिणाम हो। इस क्रम में गुज़रे वक्त के नेताओं को कठघरे में खड़ा किया जाता है, उनका मान-मर्दन होता है। नेताओं के लिए ये फिल्में लाभदायक होती हैं क्योंकि इनसे समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है और वे गोलबंद होते हैं।

इन फिल्मकारों से पूछा जाता है कि वे दूसरे समुदाय के द्वारा किये गए ज़ुल्म और अन्याय पर फिल्म क्यों नहीं बनाते। जवाब मिलता है कि हर घटना पर फिल्म बनाने का ठेका हमीं ने नहीं ले रखा है। अन्य घटनाओं पर फिल्म अन्य फिल्मकारों को बनाना चाहिए। संदेश साफ है कि समझदार लोग वहीं हाथ डालेंगे जहां कुछ शहद मिलने की संभावना हो।

गनीमत यही है कि इस देश का आम आदमी शांतिप्रिय और धर्मनिरपेक्ष है और इसीलिए वह प्रोपेगंडा फिल्मों से प्रभावित नहीं होता। इन फिल्मों की कमाई के आंकड़ों से यह सिद्ध होता है। आम जनता को अच्छे कथानक और अच्छे अभिनय वाली फिल्में ही लुभाती हैं।

सत्ता के मिजाज़ के अनुसार रंग बदलने वाले और ‘जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी दीजे’ के सिद्धांत पर चलने वाले होशियार लोग हर युग में रहे हैं और हमेशा फलते-फूलते रहते हैं। डार्विन के सिद्धांत के अनुसार इनका ‘सर्वाइवल’ निश्चित है क्योंकि ये हर युग में ‘फ़िटेस्ट’ साबित होते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ अभी अभी # ८३८ ⇒ सटायर और रिटायर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “सटायर और रिटायर।)

?अभी अभी # ८३८ ⇒ व्यंग्य – सटायर और रिटायर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सटायर कभी रिटायर नहीं होती। रिटायर होना, जिंदगी की सबसे बड़ी सटायर है। रिटायर होना पहले टायर होना है और उसके बाद सटायर होना है। टायर जीवन का पहिया है, जो हमेशा बाबू बनकर दफ्तर की जिंदगी की गाड़ी में जुता रहता है। जब थक जाता है, सटायर हो जाता है, दफ्तर से रिटायर हो जाता है।

जब बड़े बाबू रिटायर होते हैं, उनकी कलम थक जाती है। जीवन भर, जब तक उनकी कलम चली नहीं, फाइल अपनी जगह से हिली नहीं। कलम ही उनका जीवन का पहिया था, जो टायर का काम करता था। उनकी टीप से ही फाइल यहां से वहां जाया करती थी। अपना वक्त जाया किया करती थी। बड़े बाबू कभी थके नहीं, फाईल कभी नहीं थकी। अचानक जीवन सटायर हो गया, बड़ा बाबू रिटायर हो गया।।

जीवन में संगति है तो गति है। गीत है, संगीत है। आशा, उम्मीद, उत्साह, उमंग, जोश जीवन के पहिये हैं, जिन पर चलकर ही इंसान आगे बढ़ता है। चलना जिंदगी की निशानी, रुकना टायर के रिटायर होने की निशानी। कबीर की एक और ताजी उलटबासी! जो कभी थके नहीं, हमेशा चलता रहे, फिर भी नाम टायर यानी थकेला। व्हाट अ सटायर!

बेचारा थका है, टायर है, फिर भी चल रहा है। हम सब थके हुए टायर हैं, फिर भी चल रहे हैं। टायर नहीं, रिटायर हूं मैं। यानी करेला और नीम चढ़ा। नीम की उम्र बड़ी होती है, करेले की कम होती है। यह सटायर कभी कड़वी नीम है तो कभी मीठी। करेले की तरह नहीं, नीम की तरह रिटायर हों। दीवाली के फरसाण की मीठी नीम हैं हम, अभंग स्नान की नीम, चंदन, केसर, तुलसी हैं हम।

हमारी विसंगति में भी गति है। रिटायर हैं हम, सटायर हैं हम। आज नहीं नीम की कड़वाहट, आज नहीं टायर की थकावट, कल के जुगनू नहीं, आज प्रकाश के पुंज हैं हम। उम्मीद के आकाश के चमकते तारे हैं हम। आज नहीं बयानबाजी, बस खुशियों की आतिशबाजी, तम की कड़वाहट दूर भगाई जाए, आज कुछ मीठा हो जाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १८ – हास्य-व्यंग्य – “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १८ ☆

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

लल्लू की शादी थी। लल्लू के दोस्तों की जिद थी कि बारात में कल्लू का बैंड बजेगा, तभी झल्लू, लल्लू और सिल्लू नाचेंगे।

बारात में नृत्य होना अब कितना जरूरी “आइटम” हो गया है यह सभी जानते हैं। वह बारात भी कोई बारात है जिसमें घोड़ी चढ़े दूल्हे के आगे – आगे बैंड वादकों के बीच उसके दस – बीस साथी नाच – नाच कर आसमान सर पर न उठा लें। नर्तकों के दल के बिना आज बारात की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नृत्यों के प्रदर्शन के बिना बारात वैसी ही बेमजा, अनाकर्षक लगती है जैसे नमक के बिना दाल, बूट के बिना सूट और ठुमकों के बिना खूबसूरत कमसिन हसीना की चाल।

यदि व्हेनसांग या फाहयान जैसा कोई चीनी यात्री इस समय भारत यात्रा का वर्णन लिख रहा होगा तो उसने यहां के विवाहों और बारातों पर अवश्य ही लिखा होगा कि भारत में विवाह अब पंडितों के मुहूर्त पर नहीं बैंड वादकों के दिए समयानुसार निर्धारित होकर संपन्न होते हैं। वर पक्ष नगर में उपलब्ध श्रेष्ठतम बैंड पार्टी को अपनी बारात हेतु तय करके पूरा पैसा कन्या पक्ष के सर मढ़ने की कोशिश करता है।

वर – पक्ष की हैसियत अब बारात के साथ चल रही बैंड पार्टी के स्टैण्डर्ड से आंकी जाने लगी है। बारात में बैंड वादकों के आगे आगे चमचमाते रथों अथवा सुसज्जित ठेलों पर ध्वनि विस्तारक यंत्र (लाउड स्पीकर) चलते हैं जो बैंड वादकों की संगीत कला और वर पक्ष की प्रतिष्ठा को दूर – दूर तक फैलाने का काम करते हैं। बैंड वादकों के दोनों ओर कतार से गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले बच्चे अथवा महिलाएं सर पर डिस्को लाइट व्यवस्था से जुड़े विद्युत बोर्ड रख कर चलते हैं जिनकी विद्युत छटा वाद्य यंत्रों से निकली तरंगों की भांति कंपित होकर नृत्य का वातावरण निर्मित करती है।

यों तो पथ पर जगह – जगह बारात रुकवाकर उपस्थित नर्तक दल अपने नृत्य का प्रदर्शन करता है, किंतु तिराहों – चौराहों पर नाच के विशेष और लम्बे प्रदर्शन हुआ करते हैं। आमतौर पर नशे के कारण बारात में उपस्थित युवा नर्तकों का समय बोध समाप्त हो जाता है। वे नाचना शुरू करते हैं तो उस समय तक नाचते ही रहते हैं जब तक कि बारात के साथ युवकों का संकोच पालते चुपचाप होश में चल रहे बड़े – बूढ़े बार – बार उनसे आगे बढ़ने का अनुरोध नहीं करते।

नर्तकों में कुछ तो घोषित नर्तक होते हैं जिन्हें केवल बारात के आगे – आगे नृत्य करने के उद्देश्य से ही दूल्हे अथवा उनके छोटे बड़े भाईयों द्वारा आमंत्रित किया जाता है। ऐसे युवा नर्तक नृत्य के प्रभाव को उभारने वाली भड़कीली, नए फैशन की पोशाकें धारण किए रहते हैं। सामान्यतः इनके बाल या तो बड़े – बड़े होते हैं अथवा सिर के चारों ओर के बाल साफ, केवल सिर के ऊपर बालों का गुच्छा होता है जैसे छिला हुआ नारियल। बैंड वादकों को इनके निर्देशानुसार नृत्य प्रधान फिल्मी गीतों की धुनें बजाना पड़ती हैं। युवकों की दृष्टि में इन कुशल तथा बड़े – बूढों की दृष्टि में इन भौंडी हरकतें करने वाले युवा नर्तकों का नृत्य अथवा उछलकूद जब पूरे जोश में होता है तब दर्शनीय वातावरण निर्मित होता है। ऐसा लगता जैसे अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, ऋषि कपूर, सलमान खान और ऋतिक रौशन के भूत एक साथ इन पर सवार हो गए हों। अब तो बड़ी संख्या में महिलाएं भी बारातों में सड़क पर होने वाले नृत्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगी हैं। सच भी है जमाना बराबरी का है।

बारात के समक्ष नृत्य प्रदर्शन में बीच – बीच में निपुण नर्तकों द्वारा नृत्य से अंजान अथवा नृत्य करने में शर्माने, झिझकने वालों को भी नृत्य में सम्मिलित होने के लिए पकड़ – पकड़ कर खींचा जाता है। चूंकि बारात में नाचना दूल्हे से निकटता का परिचायक है, अतः नाच न जानने वाले अथवा नाच की इच्छा न रखने वालों को भी नृत्य आमंत्रण के बलात्कार का शिकार होना पड़ता है। जब इस तरह के लोग सामूहिक नृत्य करते हैं तो केवल तीन काम किए जा सकते हैं। पहला जी खोल कर हंसने का, किंतु हंसना अभद्रता का प्रतीक हो जाता है इसीलिए बारात में उपस्थित दर्शक हंसी आने पर भी हंस नहीं पाते, हां कुछ चेहरों पर मुस्कुराहट अवश्य आ जाती है। नृत्य से बिल्कुल ही अपरिचित किंतु नृत्य करने को मजबूर कुछ बेचारों का नृत्य देखकर जो दूसरा काम किया जा सकता है वह है सिर पटकने का। इसी तरह तीसरा काम, अपने बाल नोंचने का भी यदि दर्शक चाहें तो कर सकते हैं।

अस्तु, अंत में कन्या के घर तक पहुंचते – पहुंचते नर्तक दलों और बैंड वादकों में तू – तू, मैं – मैं होने लगती है। बैंड वादक भिन्न – भिन्न नर्तक दलों के पसंद की धुनें बजा – बजाकर परेशान हो जाते हैं। कोई कहता है ” खई के पान बनारस वाला” बजाओ, कोई “घोड़ी पे होके सवार, चला है दूल्हा यार” की फरमाइश करता है। तो कोई कहता है कि “तंबू में बम्बू” बजाओ। सबकी अलग फरमाइश होती है।

लड़की के घर के समक्ष नृत्य का विशाल, अनोखा और अंतिम प्रदर्शन किया जाता है जिसमें सारे कुशल, अकुशल नर्तक एक साथ भाग लेकर हंगामा खड़ा कर देते हैं। पंडित लड़की के माता – पिता से मुहूर्त निकला जा रहा है की गुहार लगाते हैं। आखिर समझने – बुझाने पर किसी तरह नृत्य निशा समाप्त होती है। मिलने को आतुर समधी गले मिलते हैं। नचईया कम हो रहे नशे की पूर्ति को निकल जाते हैं।

यह दृश्य केवल लल्लू की शादी और कल्लू की बैंड पार्टी का नहीं, आज की अधिकांश बारातों का है। हर शादी में झल्लू, मल्लू और सिल्लू जैसे नर्तक होते हैं। भले ही इनके नाम कुछ और हों। शादियों का समय चल रहा है, वैसे तो मुझे भरोसा है कि सभी के पास बारात के लिए नाचइयों का इंतजाम होगा फिर भी यदि किसी को नाचने वाले न मिल रहे हों तो उसे चाहिए कि वह पहले से दौड़ धूप कर ले, आजकल किराए पर सब उपलब्ध है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३११ ☆ व्यंग्य – ‘रूट्स’ की खोज-खबर ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘रूट्स’ की खोज-खबर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३११ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘रूट्स’ की खोज-खबर

संतोष भाई आठ दस साल से ‘स्टेट्स’ में बस गये हैं। बच्चे भी अब आठ दस साल के हो गये हैं। बड़ी बेटी है और छोटा बेटा। संतोष भाई के गांव में अभी मां-बाप और अन्य रिश्तेदार हैं। तीन चार साल पहले वे अकेले गांव गये थे। अमेरिका के घर में मां-बाप, चाचाओं-चाचियों और गांव के घर की फोटो टंगी है। कई बार उन्हें हसरत से देख लेते हैं, लेकिन इंडिया वापस लौटने की नहीं सोचते।

लेकिन कुछ दिनों से संतोष भाई के मन में यह बात बार-बार आ रही है कि बच्चे बड़े हो गये, उन्हें अपनी ‘रूट्स’ से परिचित कराना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके ‘एंसेस्टर्स’ कहां से आये थे, वे कैसे रहते थे, इंडिया का गांव कैसा होता है, वगैर:-वगैर:। बेटी सयानी हो  रही है, कहीं कल के दिन डेटिंग वेटिंग के चक्कर में न पड़ जाए, इसलिए इंडियन कल्चर की जानकारी देना ज़रूरी है। जब से संतोष भाई के दिमाग में ये  बातें आयी हैं तब से वे ‘टु द रूट्स’, ‘टु द रूट्स’ बुदबुदाते रहते हैं।

संतोष भाई करीब एक महीने का प्लान बनाकर पांच छः दिन के लिए अपने गांव आ गये। दोनों बच्चे और पत्नी, रेखा, साथ हैं। गांव से ससुराल जाएंगे, फिर घूमने के लिए शिमला मसूरी।

मां बाप पोते-पोती को देखकर खुश हुए। गांव से और रिश्तेदार-परिचित जुटने लगे। गांव की दीदियां, चाचियां, बुआएं आने लगीं। घर में भीड़ होने लगी। महिलाएं बच्चों को लिपटाने चिपटाने की कोशिश करतीं तो रेखा की नाक सिकुड़ती। ‘इनफेक्शन’ का डर लगता। यहां कोई ढंग का डॉक्टर भी नहीं मिलेगा।

गांव में बहुत तब्दीली हो गयी। संतोष भाई के बचपन में रोशनी के नाम पर लालटेनें और लैम्प थे, पानी कुएं से आता था, रसोई के लिए चूल्हा था, खेती के लिए हल और परिवहन के लिए बैलगाड़ी थी, लोग कम पढ़े-लिखे और सीधे-सादे थे और सब तरफ सादगी और मजबूरी का आलम था। कारों के दर्शन कभी-कभी  रसूखदारों की कृपा से होते थे। अब सब घरों में बिजली और नल थे, रसोई के लिए गैस थी, खेती- परिवहन के लिए ट्रैक्टर आ गये थे, लोग शिक्षित और चतुर हो गये थे और जीवन में चमक आ गयी थी। पहले लड़कियां संकोच में सिकुड़ीं घर में रहती थीं, अब वे पूरे आत्मविश्वास से मोबाइल और लैपटॉप पर काम करती दिखायी पड़ती थीं। कई घरों के दुआरे पर कारें देखी जा सकती थीं। कभी गांव में सिर्फ वैद्य का एक घर था जिसकी सेवा बड़े लोगों को ही मयस्सर होती थी, बाकी जनता रामभरोसे थी। अब सरकारी डॉक्टर के अलावा प्राइवेट डॉक्टर भी थे। सरकारी स्कूलों के अलावा प्राइवेट स्कूल भी पहुंच गये थे। गांव में ज़रूरी सुविधाएं पैदा हो गयी थीं।

लेकिन संतोष भाई को बच्चों को उनकी ‘रूट्स’ से रूबरू कराना है। वे घर के टांड़ में पुरानी चीज़ों को खंगालने में लगे हैं। पुरानी चीज़ों का ढेर  लग रहा है। मिट्टी मंगवा कर चूल्हा बन रहा है। जलाने के लिए सूखी टहनियां मंगा ली गयी हैं। टांड़ पर एक टूटी चिमनी वाली लालटेन मिल गयी है। संतोष भाई उसे पोंछ-पांछ कर जलाते हैं। बच्चे देखकर कौतूहल से ताली बजाते हैं। दादी चूल्हा जलाती है, बच्चे धुएं  की मार से बचने के लिए दूर खड़े होते हैं। रेखा हाथ नहीं लगाती, जलने का डर है।

टांड़ में हाथ से झलने वाला पंखा भी मिल जाता है। संतोष भाई बताते हैं कि पुराने ज़माने का ‘फ़ैन’ यही है। इसी के सहारे गर्मी कटती थी। बच्चे ताज्जुब से उस अजूबे को देखते हैं। संतोष भाई घुमा घुमा कर उसका प्रदर्शन करते हैं। बताते हैं कि उसे ‘बिजना’ कहा जाता था।

सवेरे दही बिलोने के लिए मथानी चलती है। दादी बच्चों को दिखाने के लिए रस्सी से खींचकर मथानी चलाती हैं। मक्खन या ‘नैनूं’ निकाला जाता है। बच्चे भी एक दो बार खींचा- खांची करते हैं। मज़ा आता है। फिर मां बरजती है। रस्सी से हाथ कटने का डर है।

संतोष भाई बच्चों को घर के सामने मीठे पानी के कुएं पर ले जाते हैं। गांव में मीठे पानी के दो-तीन कुएं ही हैं। कुएं पर मोटी रस्सी और उसमें बंधी बाल्टी पड़ी है। संतोष भाई वीरता दिखाने के लिए बाल्टी को कुएं में लटका देते हैं। कुआं गहरा है। संतोष भाई भरी बाल्टी खींचते हैं। आधी दूर तक  खींचते खींचते उनकी हालत खराब हो जाती है। हांफी चढ़ जाती है। मुश्किल से बाल्टी को जगत तक पहुंचाते हैं, फिर कमर पर हाथ रखकर लंबी सांसें लेने लगते हैं। रेखा नाराज़ होकर बुदबुदाती है—‘सिली।’

अगले सवेरे एक बैलगाड़ी दरवाज़े आ लगी। ‘द चिल्ड्रेन विल गो फॉर अ राइड। इट विल बी अ नेसेसरी एक्सपीरिएंस।’ बच्चे बैलों को देखकर ‘काउ काउ’ चिल्लाने लगे। उन्हें बताया गया कि वे ‘काउ’ नहीं, ‘ऑक्स’ थे। गाड़ी में मोटा कालीन बिछाया गया ताकि झटके कम से कम लगें। गाड़ी चली तो हर गढ्ढे पर उछलने पर बच्चे ‘ओह’ ‘आह’ करते। पहले तो उन्हें मज़ा आया, फिर उनका मुंह बिगड़ने लगा। रेखा परेशान होने लगी। ज़्यादा उछलने पर छोटी-मोटी चोट लगने का ख़तरा था। लाचार संतोष भाई ने आधे घंटे में ही गाड़ी वापस मुड़वा ली।

तीन दिन में संतोष भाई ने अपनी ‘रूट्स’ को काफी खंगाल लिया है। अब वे संतोष के साथ ‘स्टेट्स’ लौट सकते हैं। ‘वी हैव नॉट फॉरगॉटेन अवर रूट्स। अपनी रूट्स को भूलना नहीं है। वी आर प्राउड ऑफ़ देम। सैल्यूट टु अवर मदरलैंड। सैल्यूट टु इंडिया।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८४ ☆ व्यंग्य – “सत्य का डॉक्टर्ड वीडियो” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८४ ☆

?  व्यंग्य – सत्य का डॉक्टर्ड वीडियो ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

सत्य संशय में है,गांधी जी के तीनो जापानी बंदर  अब ए आई के जमाने में अपडेट हो चुके हैं। एक ने मुंह पर मोबाइल के पैक डिब्बे से निकला  टेप चिपका लिया है , दूसरा कानों में इयरबड लगाकर कह रहा है मैं एआई फेक नहीं सुनता , यह मेरी समझ से बाहर है, तीसरा कैमरे के सामने हाथ हिलाकर कह रहा है अब मुझे मत शूट करो भाई, मुझे वीडियो साक्ष्य पर अब भरोसा नहीं रहा ।

कभी लोग कहते थे जो आंखों देखा वही सच। पर आज वही वीडियो सत्य , झूठ साबित हो रहा है। आंखों देखी अब भरोसे के काबिल नहीं रही। आंखें तो अब मोबाइल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं और स्क्रीन पर जो कुछ दिखता है वो जेमिनी और उसके भाई बंधुओं का बनाया हुआ मायाजाल होता है। अब कोई भी वीडियो सच नहीं होता बस ए आई एडिटिंग की उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन होता है। पल भर में आप शेर की सवारी करते नजर आ सकते हैं, और अगले ही क्षण एक क्लिक से  गोआ के बीच पर रंगरेलिया मनाते दिखाए जा सकते हैं। वीडियो सत्य भी डॉक्टर्ड है जो फॉरेंसिक जांच के प्रमाण पत्र के बिना झूठ समझा जा सकता है।

पहले कोई रिश्वत लेते पकड़ा जाता था तो कहा जाता था कि वीडियो साक्ष्य पक्का सबूत है। अब वही अफसर मुस्कराकर कहता है साहब ये तो जेमिनी का बनाया हुआ वीडियो है ।  विभाग जांच बैठा देता है कि यह रिश्वत असली है या आर्टिफिशियल। रिश्वतखोर कहता है कि नोटों के बंडल तो मेरी जेब में खुद एआई ने डाले थे मैं तो फाइल में गांधी जी के आदर्श ढूंढ रहा था, यह सब मेरे विरुद्ध एक टेक्निकल साजिश है।

अब न्यायालय भी परेशान है। वकील साहब कहते हैं कि माय लॉर्ड यह वीडियो पूरी तरह से कंप्यूटर जनित भ्रम है। जज साहब सोच में पड़ जाते हैं कि फैसला सुनाएं या अपडेट डाउनलोड करें। अदालत में गवाह कहता है मैंने अपनी आंखों से देखा और सामने वाला वकील पूछता है क्या आपकी आंखें जेमिनी से वेरीफाइड थीं।

प्रेम की दुनिया भी इस तकनीक की शिकार हो गई है। अब लड़की पूछती है क्या तुम सच में मुझसे प्यार करते हो और लड़का कहता है जितना प्यार जेमिनी मुझसे करता है। अब रोमांस नहीं होता रेंडरिंग होती है। लोग कहते हैं वीडियो कॉल पर कितने प्यारे लगते हो और सामने मिलते ही पूछ बैठते हैं , आप कौन हैं। प्यार  बस एचडी क्वालिटी में दिखने वाला झूठ बन गया है।

शर्मा जी का हाल तो और भी खराब हुआ। ऑफिस में एक वीडियो फैला जिसमें वे अपनी टीम मेंबर के साथ पार्किंग में कुछ ज्यादा ही टीमवर्क करते दिखे। बीवी ने मोबाइल दिखाकर कहा ये कौन है। शर्मा जी बोले ये सब डीपफेक है , मैं तो बोर्ड मीटिंग में था। बीवी बोली बोर्ड मीटिंग में तुमने थाईलैंड जाने की बात कब से शुरू कर दी। शर्मा जी ने पसीना पोंछते हुए कहा अब जेमिनी आवाज तक कॉपी कर लेता है। बीवी बोली तो क्या अब मैं जेमिनी से पूछूं कि मेरा असली पति कौन है।

भ्रष्टाचार अब  कला का रूप ले चुका है। पहले चोरी करते लोग डरते थे अब चोरी का वीडियो खुद बनाते हैं और लिखते हैं यह समाजशास्त्र का प्रयोग है। अब चोर भागता नहीं इंटरव्यू देता है। कहता है मैंने चोरी नहीं की,  जेमिनी ने सिखाया था,  मैं तो अनुसंधान कर रहा था। पुलिस भी अब सर्वर से पूछताछ करती है अपराधी नहीं पकड़ा जाता उसका डेटा पकड़ा जाता है।

जनता की हालत और भी दयनीय है। सुबह सोशल मीडिया खोलते ही हर आदमी किसी न किसी स्कैंडल का हिस्सा होता है। कोई नेता रिश्वत लेता है । कोई संत भगवत कथा सुनते हुए लड़कियों के संग गुप्त तपस्या में लीन पकड़ा जाता  है ।  और हर कोई कहता है ये सब फेक वीडियो है। साजिश है ।अब भ्रम है ,  कौन असली है कौन आर्टिफिशियल। अब जो झूठ बोलता है वो मासूम कहलाता है और जो सच बोल देता है वो एआई विरोधी माना जाता है।

थाईलैंड अब एक पर्यटन स्थल नहीं वैवाहिक विवाद का प्रतीक बन गया है। कोई भी पुरुष वहां न भी जाए तो भी उसका डिजिटल वर्जन घूम आता है। बीवी वीडियो दिखाती है , देखो ये तुम बीच पर हो और पति कहता है ये फेस स्वैप है। बीवी कहती है तो पासपोर्ट की फोटो में वही मुस्कान क्यों है।  अब सच्चाई भी सर्वर की मरजी से चलती है।

सच अब वैसा है जैसे सरकारी टेंडर हमेशा अटैचमेंट में छुपा रहता है। या शेयर इनवेस्टमेंट की बारीक अक्षरों वाली शर्तों में। लोग कहते हैं सच देखना हो तो वीडियो भेजो और वीडियो भेजते ही सबूत मिट जाता है। जो सच था वो फाइल बन गया और जो झूठ था वो ट्रेंडिंग वायरल टॉपिक।

भविष्य का बच्चा स्कूल में निबंध लिखेगा मेरा असली पिता कौन है। परीक्षा में पूछा जाएगा सत्य और डीपफेक का तुलनात्मक अध्ययन। और विज्ञान मेले में बच्चे प्रोजेक्ट लगाएंगे सच्चाई को फर्जी बनाने की मशीन।

अब हर सत्य संशय में है। कोई कहता है मैंने देखा तो लोग कहते हैं स्क्रीन रिकॉर्डिंग दिखाओ। कोई कहता है मैं निर्दोष हूं तो जवाब मिलता है प्रमाण दो कि तुम इंसान हो न कि किसी सॉफ्टवेयर का एक्सपेरिमेंट।

सच बोलना अब अपराध है क्योंकि झूठ जेमिनी की मेहरबानी से और खूबसूरत हो गया है।

वीडियो साक्ष्य का सचमुच अंत हो चुका है। अब सच्चाई क्लाउड में अपलोड है और झूठ हर मोबाइल के व्हाट्सअप पर डाउनलोड हो रहा है। जो दिख रहा है वो झूठ है और जो नहीं दिख रहा वह सच हो इसमें सदा संशय है।

कहते हैं सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं। पर जेमिनी के जमाने में सत्य न सिर्फ परेशान है बल्कि एडिट भी हो चुका है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७१ – व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७१ – व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

अरे भैया, आप भी क्या खूब बात कर दिए! अपेक्षाएँ यानी आशाएँ! हा हा हा। यह तो ऐसा हो गया जैसे कहो कि पेट्रोल यानी गंगाजल। भई, गंगाजल से प्यास बुझती है, आस्था जगती है, पर पेट्रोल तो आग लगाता है! हमारी आपकी इस फालतू-सी जिंदगी में ये जो ‘अपेक्षा’ नाम का लाइलाज कोढ़ है न, यह केवल आशा का नाम नहीं है, यह तो जीवन का लाइसेंस है, और मृत्यु का वारंट भी! लाइसेंस इस बात का कि हाँ, तुम अभी जिंदा हो, क्योंकि तुम्हें किसी पड़ोसी की नई कार से, किसी रिश्तेदार की झूठी तारीफ से, या खुद अपनी निकम्मी औलाद से कोई गंभीर-सी अपेक्षा बाकी है। जिस दिन ‘जीने की वजह’ खत्म हो जाएगी, उसी दिन यह निरुद्देश्य जीवन जो तुम कोस रहे हो, वह अपने चरम पर पहुँच जाएगा। लेकिन ‘निरुद्देश्य जीवन’ भी कोई जीवन है? बिलकुल नहीं, वह तो सरकारी अस्पताल की फाइल है, जिसका कोई अता-पता नहीं, बस मोटी होती जाती है।

हमारे ‘मामाजी’ की अपेक्षाएँ तो इतनी ऊँची थीं कि छत से लगकर वापस आती थीं। उन्हें अपेक्षा थी कि उनकी मृत्यु पर कम से कम बीस हज़ार लोग रोएँ, जिसमें दस हज़ार तो ‘शो ऑफ’ करने वाले ही हों। और जब मरे, तो कुल पंद्रह आदमी पहुँचे, जिनमें से ग्यारह केवल खाना खाने के लिए आए थे। और आप कहते हैं कि अपेक्षाएँ रखनी चाहिए? ज़रूर रखिए! लेकिन यह ध्यान रखिए कि अपेक्षा जिससे रख रहे हैं, वह इंसान है—यानी फिसड्डी, कामचोर और मतलबी। आप अपेक्षा रखिए कि आपकी पत्नी चाय बनाएगी, और वह आपको ज़हर भी दे सकती है! और हाँ, यह बात तो बिलकुल ही सही है कि ‘पूरी न हो पाने पर निराश नहीं होना चाहिए’। यह उपदेश नहीं है, यह तो राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है! हर भारतीय यही उपदेश देता है, क्योंकि हममें से किसी की कोई अपेक्षा पूरी नहीं होती, इसलिए हम निराश नहीं होते, हम बस सन्न रह जाते हैं। यह निराशा नहीं, यह जन्मजात उदासीनता है। अपेक्षा रखो, और जब पूरी न हो, तो बस हँसो, एक ऐसी हँसी जो भीतर ही भीतर आपकी आँतों को निचोड़कर रख दे। यही जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य है, मेरे भाई।

वाह! क्या बात कही है! “जिंदगी चलने का नाम है”! बिलकुल, जिंदगी ऐसे ही चलती है, जैसे सरकारी बाबू की फाइल। धीरे-धीरे, रेंगते हुए, बिना किसी उद्देश्य के, और अंततः एक रद्दी के ढेर में सिमटकर। और ये जो इच्छाएँ अनन्त हैं न, यह तो ऐसा जुमला है, जिसे सुनकर तो आँखों में आँसू आ जाने चाहिए! एक इच्छा पूरी हुई नहीं कि दूसरी ने बेलन लेकर सिर पर दस्तक दे दी। अरे भाई, ये इच्छाएँ नहीं हैं, ये तो ब्याज हैं, जो हम अपनी आत्मा से ले रहे हैं! पहली इच्छा (एक साइकिल) पूरी होती है तो दूसरी (एक स्कूटर) तुरंत माँग पत्र भेज देती है। स्कूटर मिलता है तो तीसरी (एक सरकारी नौकरी) एफिडेविट लेकर खड़ी हो जाती है! यह अनन्तता नहीं है, यह तो नरक का इन्फिनिटी लूप है। एक इच्छा-पूर्ति का सुख सिर्फ दो मिनट का होता है, और अगली इच्छा का दुख दो जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ता।

जिस दिन सब पूरी हो जाएँ, यानी मन निर्मोही हो जाए! हा हा हा! यह तो भारतीय आध्यात्म का सबसे क्रूरतम व्यंग्य है। मन निर्मोही हो जाए? यानी मन काम करना बंद कर दे, यानी मन की मशीन में जंग लग जाए। तब मोक्ष मिलेगा? मोक्ष नहीं मिलेगा मेरे दोस्त, अधूरे सपनों का भूत मिलेगा, जो रात भर कान में फुसफुसाएगा, “क्यों नहीं किया? क्यों छोड़ दिया?” और आप कहते हैं कि तब व्यक्ति मरे हुए के समान हो गया? बिलकुल! मरे हुए के समान नहीं, बल्कि सच्चा भारतीय नागरिक हो गया! क्योंकि यहाँ आदमी जिंदा कम, मरा हुआ ज़्यादा नज़र आता है। सुबह-शाम काम करता है, बच्चों को पालता है, समाज को गालियाँ देता है, लेकिन भीतर से वह कोरा कागज़ है, जिस पर कोई इच्छा, कोई अपेक्षा अब कोई रंग नहीं भर पाती। यह जीती-जागती लाश बनना ही तो ‘मोक्ष’ है—उस मोक्ष का, जो इस समाज ने हमें उपहार में दिया है! अपेक्षा ही तो वह काला धागा है, जो हमें खुद से और दूसरों से बाँधे रखता है। यह धागा टूट जाए तो आदमी निर्गुण ब्रह्म हो जाए, यानी बेकार!

अपेक्षा ही वह जीवन-पथ है, जो निरंतर जीवन्तता की ओर अग्रसर होती है! आह! क्या सहानुभूतिपूर्ण झूठ है! अपेक्षा जीवन्तता की ओर नहीं ले जाती, वह तो हमें अस्पताल के बेड की ओर खींचती है, जहाँ हम अपेक्षा करते हैं कि डॉक्टर अब भी ईमानदार होगा और इंजेक्शन सही नस में लगाएगा! यह अपेक्षा ही तो है जो जीवन में रस घोलती है? बिलकुल घोलती है! यह माधुर्य नहीं घोलती, यह तो ज़हर का कड़वा घोल घोलती है! यह रस तो ऐसा है, जो हमारी नसों से खून निचोड़कर बाहर कर देता है, और हम कहते हैं, वाह! क्या माधुर्य है! एक कर्मचारी अपने बॉस से अपेक्षा करता है कि उसकी मेहनत का फल उसे मिलेगा। फल मिलता है? नहीं, उसे ज्यादा काम मिलता है! एक पत्नी अपेक्षा करती है कि पति उसे समझेगा। पति समझता है? नहीं, वह उसे रसोई का सामान समझता है! यही तो हमारे ‘जीवन का रस’ है—अधूरापन और उपेक्षा।

और ये लोगों के विचारों में जो उनकी अपेक्षाओं का दम होता है न, यह तो पेटेंट कराने लायक है! मरने के बाद के लिए भी अपेक्षाएँ पाल लेना—इससे बड़ा मानवीय विदूषक और कोई हो ही नहीं सकता। हमारे ‘चाचाजी’ (फिर से नाम बदल दिया, पर आत्मा वही है) ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनके मरने के बाद उनके सारे झूठ और कमजोरियाँ जला दी जाएँ। उन्हें अपेक्षा थी कि दुनिया उन्हें एक देवता की तरह याद करेगी। और हुआ क्या? उनके मरने के अगले ही दिन उनकी अवैध ज़मीन पर कब्ज़ा हो गया, और उनके बेटा-बेटी आपस में चप्पलें चला रहे थे कि पिता का काला चश्मा किसे मिलेगा!

और यह जो आपने कहा, ‘मरने के बाद कोई लौट कर यह देखने नहीं आता’! यह बात तो रोने पर मजबूर कर देती है! कोई आता ही नहीं, क्योंकि जिसे आना था (यानी आत्मा), वह तो मोक्ष के चक्कर में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही होगी! लेकिन फिर भी, अपेक्षाएँ तो रहेंगी! हाँ! जीवन के बाद के लिए भी अपेक्षाएँ रहेंगी—कि अगली बार इंसान न बनें, कम से कम कीड़ा ही बन जाएँ, जिसकी कोई अपेक्षा न हो! कम से कम कीड़े को मोक्ष की चिंता तो नहीं करनी पड़ती!

अंतिम बात, जो आपने कही, वह तो आत्म-उत्पीड़न का चरम है! जैसे अपेक्षाओं का अंत नहीं होता, वैसे ही ज़रूरी नहीं हर अपेक्षा पूर्णता को प्राप्त हो। यह सच्चाई नहीं है, यह तो ज़िंदगी का क्रूर मज़ाक है! अपेक्षा पूरी न हो, तब भी हम सीधी पीठ करके खड़े रहें। क्यों? क्योंकि हमें अपने आप को ऐसा बनाना चाहिए कि किसी बात से कभी निराश नहीं होना चाहिए! यह असंभव है! यह तो ऐसा है जैसे किसी भूखे आदमी से कहो कि तुमको खाना नहीं मिलेगा, पर तुम खुश रहो, क्योंकि खुशी में ही सुखी जीवन की कुंजी है!

अरे भैया, निराशा का दामन न थामना वीरता नहीं है, यह तो आत्म-वंचना है! जो आदमी निराशा का दामन नहीं थामता, वह असल में कुछ भी नहीं थामता! वह बस बहता जाता है, जैसे सेप्टिक टैंक का पानी। उसे लगता है कि वह सुखी जीवन जीने की कुंजी हासिल कर लेगा? हा हा हा! उसे मिलती है अमरता का फंदा! वह हमेशा खुश रहने की एक्टिंग करता है, और इसी एक्टिंग में वह इतना थक जाता है कि अंततः वह मनुष्य नहीं रह जाता, वह एक खाली, खोखला ढोल बन जाता है।

सुखी जीवन की कुंजी यह नहीं है कि आपकी अपेक्षाएँ पूरी हों। सुखी जीवन की कुंजी यह भी नहीं है कि आप निराशा से दूर रहें। सुखी जीवन की कुंजी तो यह है कि जब आपकी अपेक्षाएँ धूल में मिल जाएँ, जब आपके अपने आप को धोखा दें, जब दुनिया आपको ठुकरा दे, तब आप ज़ोर-ज़ोर से रोएँ! आप चिल्लाएँ! आप अपनी अंदर की पीड़ा को बाहर आने दें! लेकिन नहीं, हमारा समाज हमें यही सिखाता है—मुस्कुराओ, क्योंकि रोने वाला आदमी कमज़ोर होता है। इस झूठी मुस्कान के पीछे जो अश्रु-सागर छिपा है न, वही इस व्यंग्य की सबसे मार्मिक और पीड़ादायक सच्चाई है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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