हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “नश्तूर” (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी) – कवि – श्री अनिल खयाल अत्री ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री अनिल खयाल अत्री जी के काव्य संग्रह नश्तूर पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “नश्तूर” (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी) – कवि – श्री अनिल खयाल अत्री ☆  श्री जयपाल ☆

श्री अनिल खयाल अत्री

☆ “जीवन संघर्षों से उपजी हैं अनिल ख्याल अत्री की कविताएं” ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक का नाम – नश्तूर (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी)

कवि – अनिल खयाल अत्री

प्रकाशक  – जौहरा प्रकाशन पटियाला

0175-2210686

‘नश्तूर’ अनिल ख्याल अत्री का दो भाषाओं- हिंदी और पंजाबी  में 2025 में प्रकाशित कविता संग्रह है। ये अपने आप में एक अलग प्रयोग है। पहले भाग में पंजाबी की 45 कवितायें है और दूसरे भाग में हिंदी की 28 कविताएँ है । कविता संग्रह को हिंदी के विद्वान लेखक डॉ. स्वर्गीय डॉक्टर रवींद्र गासो को समर्पित किया गया है। इससे कवि की वैचारिक प्राथमिकता का पता चलता  है। अनिल ख्याल अत्री एक सूफियाना अंदाज़ के कवि हैं । वे जीवन के रंग में गहरे डूबते हैं और वहां जो हीरे मोती मिलते हैं उन्हें अपने पाठकों में बांट देते हैं। उनकी कविता मनुष्य जीवन-संदर्भों को मार्मिकता के साथ स्पर्श करती है । इन कविताओं में जीवन के दर्द अधिक है और सुख के पल बहुत कम । आज के मनुष्य का जीवन भी तो कुछ ऐसी ही सामाजिक स्थितियों से घिरा हुआ है।  जीवन की आपा-धापी और भाग दौड़ में ही सारी उम्र निकल जाती है। कुछ भी हाथ नहीं लगता। क्या खोया क्या पाया..कुछ पता नहीं..कभी ढंग से बैठ कर कभी सोचा ही नहीं।  कवि ,जीवन की इस अस्थिरता पर चिंतन करता है । शायद कवि ने जीवन में  संघर्षों से अधिक सामना किया  है और प्राप्ति बहुत कम । कवि अपनी जीवन-यात्रा को याद करते हुए अपने सहयोगियों को भी याद करते हैं । कुछ ने उनका साथ दिया और कुछ मूकदर्शक बने रहे।

हिन्दी और पंजाबी में रचित इन कविताओं का स्वर और तेवर एक जैसे हैं। इनकी रचना प्रक्रिया भी लगभग एक जैसी है। जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर लिखी गई इन कविताओं के अर्थ व्यापक और गंभीर हैं । पंजाबी की कविता ‘मासूम- सवाल’ और हिंदी की कविता  ‘नया साल’ में एक प्रश्न के माध्यम से उत्तर खोजने का प्रयास है। इसी प्रकार–कलम की कसम  में लेखक को कलम के साथ ईमानदारी बरतने का सुझाव है और सत्ता की चाटुकारिता से आगाह किया गया है। वचन- प्रवचन और अभिषेक कविता में नेता और देवता की तुलना करते हुए पत्थर के देवता से नेता के पत्थर-पन को अधिक खतरनाक बताया  है ।

“डुब्बदा तारा” पंजाबी कविता में रोशनी बांटते तारे को श्रेष्ठ बताने के पीछे समाज की भलाई में लगे व्यक्तियों को प्रेरित करना है l “की भरोसा” पंजाबी कविता में जीवन में  होने वाली घटनाओं के बारे मे बात करते हुए कवि जीवन को अनिश्चित मानता है।

कुछ हिन्दी- पंजाबी कविताओं के अंश तो जीवन के गहरे सूत्र वाक्यों की तरह याद रखने योग्य हैं जैसे—

*नजाकत और हलीमी में ही

होती है जीतने की जिद्द

 

*दर्द है तो जीवन है

 

*निष्प्राण है तुम्हारी कविता

रौशनी के नाम पर  सिर्फ

 रौशनी की एक तस्वीर

 

*एक ऐसी आवाज जो

 दबाए न दबे

 और एक ऐसी छाप

जो मिटाये न मिटे

 

*जैसे रोज़-रोज़ एक ही

दर्जे का तापमान लिए

उदय हो रहा हो सूरज

 

*जणा खणा जदौं देंदाए सानूं

धरती ते भार दा खिताब

 

*पर देण वालेआं  ने तूहानू फुॅल

अते सानू क॔डेआं दा नां दित्ता है

 

प्रूफ की त्रुटियां खलती हैं। कहीं कहीं कविता की पंक्तियों के असंगत संयोजन के कारण वाक्य प्रवाह तो टूटता ही है , गद्यात्मकता भी आ जाती है। कुछ कविताओं में उपदेशात्मकता भी है । द्विभाषी होने के कारण यह हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं के पाठकों के लिये रुचिकर और पठनीय है। जीवन को गंभीरता, निश्छलता, धैर्य के साथ जीने का सलीका देता है। कवि अनिल ख्याल अत्री को बहुत बहुत बधाई !!

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’ ☆

श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

उपन्यास का नाम- “अचानक डूबता सूरज उग आया”

लेखक – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

समीक्षक – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

प्रकाशक  – कोहबर प्रकाशन

मूल्य: ₹ २९९/-

☆ जटिल सामाजिक समस्याओं के प्रति सजक करता सामाजिक उपन्यास – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’ ☆

हिन्दी साहित्य में जब कोई लेखक समाज की जटिल और पीड़ादायक सच्चाइयों को कथा का रूप देता है, तब वह केवल कहानी नहीं लिखता, बल्कि एक जिम्मेदारी निभाता है। श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ का उपन्यास “अचानक डूबता सूरज उग आया” इसी प्रकार की एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मानवीय कृति है।

यह उपन्यास नशे (ड्रग्स) एवं संचरित व्याधियों जैसे सामाजिक समस्याओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, पर यह केवल नशे की समस्या तक सीमित नहीं रहता। यह उन परिवारों की पीड़ा, युवाओं के भटकाव, समाज की निराशा और फिर उसी समाज के भीतर से उठती आशा की किरण को भी उजागर करता है।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

उपन्यास का मुख्य पात्र राजीव पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ता है। पढ़ाई के लिए विदेश जाना, वहाँ के रहन-सहन से परिचित होना, विश्वास का टूटना और फिर भी हार न मानना राजीव का संघर्ष आज के अनेक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उसके पिता द्वारा अपने अति निकट संबंधी जगदीश पर किया गया विश्वास और उस विश्वास का टूट जाना कथा को और अधिक मानवीय बना देता है। राजीव एक सजग, संवेदनशील और संकल्प को सिद्धि तक ले जाने वाला युवा है। भारत से विदेश गए हुये परिवारों में बदलती हुई जीवन शैली, संबंधों और विडंबनाओं को अत्यंत ही करीब से देखता है और वह भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों पर गर्व की अनुभूति करता है। लेखक ने विलायत के जीवन-परिवेश, वहाँ बसे भारतीयों और बहुसांस्कृतिक समाज का चित्रण अत्यंत ही सहज भाव से किया है।

राजीव का रूबी से आत्मिक प्रेम उपन्यास को एक भावनात्मक ऊँचाई देता है। रूबी एक प्रतिभाशाली, संवेदनशील और सशक्त युवती है, जो जीवन को समझती है और भविष्य के प्रति सजग है। यह प्रेम कथा उपन्यास में केवल रोमांस नहीं रचती, बल्कि संघर्ष और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है।

उपन्यास का दूसरा पक्ष राजीव का पुनः भारत वापस आना और भारत में अपने उन पुराने मित्रों से मिलना है जहां से उसने अपने जीवन की शुरुआत की थी। एक बड़े समृद्धिशाली व्यापारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद मध्यय निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के साथ मैत्री एवं भावपूर्ण संबंध उसके पारिवारिक संस्कारों को दर्शाता है। सोनू एक ऐसे मध्यमवर्गीय के परिवार का बेटा है। जिसकी सुबह से शाम कमाने और खाने के बीच ही सिमट कर रह जाती है एक समय जब सोनू की दादी बीमार पड़ती है और उसके निकट सगे संबंधी तक उसका साथ देने से मना कर देते हैं उस समय एक मित्र की भूमिका में राजीव सोनू के साथ जैसी संवेदनशीलता का परिचय देता है  और आर्थिक मदद करता है यह राजीव के सहृद व्यक्तित्व को और भी अधिक परिष्कृत करता है। राजीव का मुंबई जैसे बड़े शहर में जाना और एक नए परिवेश में नवीन दायित्यों का निर्वहन उसकी परिपक्वता की एक नए कथानक की शुरुवात करता है।

रेल की पटरियों के किनारे नशा करते युवाओं का चित्रण उपन्यास के सबसे दर्दनाक दृश्यों में से एक है। वहाँ यह प्रश्न गूँजता है  “क्या इनके माँ-बाप को खबर की गई?” यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक विफलता का आईना है।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से मुंबई पहुंचा एक दूसरा पात्र नृपेन्द्र है जो एक मध्यम परिवार का युवा है , बड़े शहर की बदरंग दुनिया में इस तरह से फंस जाता है कि वह अपनी अत्यंत प्रिय नई नवेली पत्नी आरती से भी दूर हो जाता है ।

नशे की लत  और बुरी संगत पारिवारिक रिश्तों के ऊपर भारी पड़ने लगती हैं ।

लेकिन लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से उसे भी एक ऐसे मोड़ पर ले जाकर उसकी आंखों को खोलने की कोशिश करता है जहां चारों तरफ अंधेरा ही अधेरा है। अंततः राजीव का प्रयास रंग लाता है और दीपेंद्र  को आरती के पास पुनः पहुंचने में सफल हो जाता है।

उपन्यास का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष संध्या का चरित्र है। परिस्थितियों की मार और सामाजिक शोषण जैसे घिनौने कृत्य के कारण वह जिस्म के सौदागरों के जाल में फँस जाती है। जहां से निकलना मुश्किल सा लगता है। उसके संवाद और आत्मसंघर्ष पाठक के मन को झकझोर देते हैं।

एक दृश्य में वृद्ध ग्राहक से उसका प्रश्न  “आपके पास बचाव का इंतज़ाम है न?” और अंत में उसी वृद्ध व्यक्ति के भीतर अचानक पिता-भाव जाग उठता है और उपन्यास के कथानक को नया मोड दे देता है। यह लेखक की गहरी मानवीय संवेदना का प्रमाण है।

राजीव केवल दुख देखकर रुक नहीं जाता, बल्कि वह सामाजिक परिवर्तन की पहल करता है। नशा, एचआईवी, एड्स और यौन रोगों के प्रति जागरूकता फैलाने का उसका प्रयास, और युवाओं से सीधा संवाद उपन्यास को एक सामाजिक अभियान का स्वरूप दे देता है। गैर सरकारी संगठनों के मंच, सम्मेलन और जनजागरण के दृश्य यह दिखाते हैं कि बदलाव संभव है, यदि नीयत और प्रयास ईमानदार हों।

उपन्यास का अंत अत्यंत सकारात्मक और आशावादी है। विवाह, सांस्कृतिक समन्वय, संगीत और उत्सव के दृश्य यह संकेत देते हैं कि संघर्ष चाहे जितना गहरा क्यों न हो, जीवन अंततः प्रकाश की ओर लौट सकता है। यही इस उपन्यास का सार है  कि डूबता हुआ सूरज फिर उग सकता है।

—– 

© श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

कवि, लेखक एवं समीक्षक

बहराइच, उत्तर प्रदेश, भारत।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ छाँव जैसी औरतें… – कृतिकार – श्री पवन शर्मा ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ छाँव जैसी औरतें…  –  कृतिकार – श्री पवन शर्मा ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कृति–छाँव जैसी औरतें

कृतिकार–पवन शर्मा

समीक्षक–इन्दिरा किसलय

प्रकाशक–बोधि प्रकाशन जयपुर 

मूल्य–249/-

पृष्ठ संख्या-141

छाँव जैसी औरतें–संघर्ष साहस और संवेदना का दस्तावेज – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुख्यात लघुकथाकार “पवन शर्मा” द्वारा रचित कृति “छाँव जैसी औरतें “प्रथमतः शीर्षक के माध्यम से ही स्त्री विमर्श की प्रकाम्य दिशा का परिचय देती है। जिसमें स्त्री-जीवन के अकथ कथानक व्यंजित हैं। मुश्किल उतनी ही जरूरी, समकाल के यथार्थ का नैसर्गिक चित्रण करती हुई। वृक्ष की तरह सारी उष्मा एवं मौसम के आघात झेलकर छाँव देने वाली ललनाएं। कथाकार के शब्दों में” कभी रोटियों सी गोल कभी दरवाजों सी बंद। “

अभिव्यक्ति का अंदाज़ कहीं फैंटसी तो कहीं सामाजिक सरोकारों की सूक्ष्म पड़ताल बनकर उभरा है। समूचे संग्रह का प्राणस्वर है शीर्षकवाही लघुकथा जिसे शब्द चित्र कहना होगा। स्त्री मुक्ति का मानवीय परिप्रेक्ष्य—

“तुम्हारी पीढ़ी हमें सिर्फ छांव न मानकर इंसान माने। “””

” संवाद शैली” में रची गयी कथाएं, लीक से हटकर अपना स्थान बनाती हैं। कुछ लघुकथाएं बौद्धिक व्यायाम माँगती हैं। ऐसे प्रसंग जो हमारी दृष्टि से अक्सर ओझल रहे आते हैं, संग्रह में संवेदनशील प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं। सांघातिक सच के रूबरू खड़ा करते हैं।

दैनंदिन जीवन के घटनाक्रम तथा परिस्थितिजन्य संवेगों का कच्चा चिट्ठा कितनी ही लघुकथाओं में द्रष्टव्य है। परंपरा और रचनात्मक तर्कों का द्वन्द्व पाठकीय चेतना को उद्वेलित करता है।

“रात की महफिल”, ” जिनसे सुकून मिलता है” जैसी रचनाएं काव्यात्मक लालित्य उपलब्ध कराती हैं। परछाइयों के पार एवं कुर्सियों के पीछे फैंटसी है, जो संकल्पित उद्देश्य को उजागर करती है।

डूब की जमीन का दुःख में विस्थापन का दर्द है। “ऐसा नहीं देखना “-के केन्द्र में ज़ेन जी का उजड्ड पन है।

शहरी जीवन का खोखलापन और संत्रास भी कथाकार की दृष्टि में है। स्त्री विमर्श को बेहद ईमानदारी से वाणी दी गयी है। मनोवैज्ञानिक पेंच, अन्तर्द्वन्द्व और संलग्न सामाजिक पार्श्व की खोज। “सिर्फ औरतें नहीं हैं वे” में बदलाव की दस्तक दर्ज है।

“तलाश” अपने ढंग की अनूठी रचना है। पछतावे की कीलें ध्यान खींचती है।

” आँगन की चौखट में”नारी जीवन की यांत्रिकता है तो बीजी की भूल में एक सूत्र हस्तगत होता है “रिश्ते नाम से नहीं स्पर्श से चलते हैं। “मंच के पीछे में सियासत का घिनौना चेहरा है। “हँसते चेहरे” चार्ली चैप्लिन की याद दिलाती है।

अकेलेपन की टीस पर भी केन्द्रित हैं कुछ कथाएं।

सारी लघुकथाएं अंत में मन का कोई दर्दीला कोना खोलती हैं जो सामाजिक तानेबाने का अंदरूनी सच बयां करता है। रूहानी रिश्तों की खूबसूरती रूह की रोशनी में द्रष्टव्य है तो अपने हिस्से का सच पितृसत्तात्मक समाज का आईना है। शंख की आवाज़ और धुंध में बची औरत, भावुकता का सौंदर्य अनावृत्त करती हैं।

संग्रह की कथाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि वे निर्णायक मोड़ पर लाकर, पाठक को छोड़ देती हैं, उनका चैतन्य जाग्रत करती हैं।

भाषायी लालित्य एवं प्रवाह पाठकीय संवेदना से आत्मीयतापूर्ण रिश्ता बनाता है। शाब्दिक संयम, मितव्ययिता, एवं अभिजात्य ने भावों को सलीका प्रदान किया है। बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित यह कृति निश्चय ही लघुकथेतिहास में अपने पदांक स्थिर कर क्रान्तिकामी वैचारिकी का सैलाब लाएगी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ समीक्षा – डा. विजय चौरसिया ☆

डा. विजय चौरसिया

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ समीक्षा – डा. विजय चौरसिया

पुस्तक –  टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड 

लेखक – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

प्रकाशक – ज्ञानमुद्रा, भोपाल

☆ भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा ☆ डा. विजय चौरसिया

भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा पुस्तक एक एतिहासिक कथा साहित्य है। यह उपन्यासिक कृति 19वीं सदी के महान आदिवासी जननायक के संघर्ष, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनके विद्रोह और गरीबों के प्रति उनकी दरियादिली को रेखांकित करती है। यह भारत के आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा, देश भक्त स्वतंत्रता सेनानी की खोई पहचान को सामने लाती है। विवेक रंजन श्रीवास्तव ने राबिनहुड टंट्या मामा को एक योद्धा, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी नेता के रुप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में दमनकारी जमींदारी प्रथा और अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासी समुदाय के एकजुट संघर्ष को दर्शाया गया है। वह राबिनहुड की तरह जंगलों में रहता है। उसके साथी भो वैसे ही गरीब, वंचित जुल्म के शिकार पर अदम्य साहसी लोग हैं। वह अमीरों और अंग्रेज अधिकारियों पर धावा बोलता है और उनकी दौलत लूटकर आदिवासी बस्तियों में बांट देता है।

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र”

टंट्या मामा को लोक मानस में एक ईश्वर तुल्य जननायक, मसीहा और आदिवासी नायक के रुप में  जो पहचान मिली थी उसे उसी स्वरूप में सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी है बल्कि यह अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रतीक को सजीव करती है। टंट्या ने जल-जंगल-जमीन की लडाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, किन्तु उन पर अब तक कोई भी कथा साहित्य नहीं था, परिचयात्मक जीवनीयों को पढ़कर उसे कथा रूप में लेखक ने रोचक प्रवाहमान प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है।

पुस्तक की भाषा सरल है, जिससे यह बच्चों और किशोरों के लिए भी पढ़ने योग्य है। पुस्तक आज के समय भी आदिवासी अधिकारों और अस्मिता के संघर्ष को उजागर करती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए आवश्यक है, जो भारतीय स्वतंत्रता सग्राम के अनसुने नायकों और आदिवासी संघर्षों के बारे में जानना चाहते हैं।

भारत के बहुसंख्यक बहुजनों के न केवल इतिहास बल्कि उनके बेहतर भविष्य की चाहत रखने वाले हर व्यक्ति को यह किताब जरुर पढ़ना चाहिए, पुस्तक भारतीय इतिहास को देखने के लिए नई दृष्टि प्रदान करती है।

भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा के लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव ने कठिन परिश्रम कर टटया मामा का इतिहास खोजकर उसका पुस्तक रुप दिया है, मैं उन्हें इस कार्य की बधाई देता हूं।

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© डा. विजय चौरसिया

लोकसंस्कृतिकार

चौरसिया सदन, गाडासरई जिला – डिन्डौरी (मध्यप्रदेश)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/ सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अनजान रिश्ते – श्री आलोक श्रीवास्तव “धीरज” ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अनजान रिश्ते – श्री आलोक श्रीवास्तव “धीरज” ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

परस्पर प्रेम के निर्वाह को लेकर विभिन्न दृष्टिकोणों से वैसे तो साहित्य में काफी कुछ लिखा गया है और इस संबंध में विस्तृत चिंतन भी किया गया है। साहित्य के अंतर्गत डा . धर्मवीर भारती लिखित उपन्यास गुनाहों का देवता हो या श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उसने कहा था, दोनों ही का कथानक हमें प्रेम के बारे ये सीख तो जरुर देता है कि प्रेम भावनात्मक रूप से जीवन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में यही सब कुछ नहीं है । दोनों ही अमर रचनाकारों के इन चर्चित कथानक में प्रेम के इस अद्भुत चिंतन और दर्शन में यही बात सामने आती हैं । उसने कहा था कहानी का मुख्य पात्र लहना सिंह हो या गुनाहों का देवता का मुख्य पात्र चंदर हो, इन दोनों की प्रेम की पराकाष्ठा से सभी परिचित हैं लेकिन प्रेम के अतिरिक्त व्यावहारिक जीवन के प्रति उनकी निष्ठा और दायित्वों की अगर बात की जाये तो समाज के प्रति यह प्रेरणा दायक ही नजर आती है ।

श्री आलोक श्रीवास्तव “धीरज”

भाई आलोक श्रीवास्तव के द्वारा लिखित उपन्यास अनजाने रिश्ते को जब पाठक वर्ग बड़ी गहराई से अध्ययन करेंगे तो वे भी मेरी उपरोक्त बातों से सहमत होंगे कि जीवन में आत्मिक प्रेम और दैहिक प्रेम ही सब कुछ नहीं है बल्कि इससे आगे भी कुछ और है जो कि हमें अपने जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर सोचने के लिए विवश करता है। आलोक जी के इस उपन्यास में इस तथ्य के समर्थन में किसी फिल्म की ये पंक्तियां भी सहायक सिद्ध हो सकती हैं-

 0

छोड़ दें सारी दुनिया किसी के लिए,

ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए ।

प्यार से भी जरुरी कई काम हैं,

प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।।

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 देखा जाए तो आलोक जी ने भी अपने इस उपन्यास में उपरोक्त पंक्तियों के आधार पर ही अपने पाठकों को यह मैसेज दिया है। उपन्यास के कथानक पर ध्यान दें तो लेखक अपने इस उपन्यास के माध्यम से अपनी बात समझाने में सफल भी हुए हैं । इस उपन्यास में मुख्य तौर पर तीन पात्र हैं, शेखर, सुधा और रेखा । शेखर सुधा से प्यार करता है और अपने बचपन के दोस्त रवि की पत्नी रेखा के प्रति ट्रेन यात्रा के दौरान वह आकर्षित हो गया था और यह आकर्षण उन दोनों की अति निकटता का कारण भी बना । इधर सुधा से मिलने की सुलभता के लिए उसने रेखा की मित्रता सुधा से करवा दी लेकिन बाद में जब उसने सुधा से शादी करनी चाही तो उसके परिजनों ने उसकी शादी अपनी इच्छा से दूसरी जगह करवा दी और यहां रेखा ने भी शादी से मना कर दिया। बाद में शेखर अपने पिता की इच्छाओं के अनुसार ही शादी के लिए तैयार हो गया ।आलोक जी के इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैं फिर पाठकों का ध्यान उल्लेख की गई फिल्म की उन्हीं पंक्तियों की ओर दिलाना चाहूंगा कि आलोक श्रीवास्तव ने प्रेम संबंधों का विश्लेषण करते हुए ये सार्थक संदेश तो समाज को दिया ही है कि परस्पर प्रेम संबंधों में कोई सफल हो या असफल अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों की दिशा में उसे सदा सचेत एवं सक्रिय होना चाहिए।

 मेरे दृष्टिकोण से आलोक श्रीवास्तव का यह उपन्यास अनजान रिश्ते पाठकों के समक्ष प्रेम को एक और नये रुप में परिभाषित करने में समर्थ सिद्ध होगा।

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “रेत पर रेखाएं” – कवि – श्री राजेश भारती ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री राजेश भारती जी के काव्य संग्रह “रेत पर रेखाएं” पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “रेत पर रेखाएं” – कवि – श्री राजेश भारती ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक —रेत पर रेखाएं (कविता-संग्रह)

कवि – राजेश भारती (9896992737)

कीमत-200/- पेपर-बैक (पृष्ठ-142)

प्रकाशक- वेरा प्रकाशन,जयपुर।

मोबाइल-96804-33181

राजेश भारती

☆ “व्यवस्था के अमानवीय चेहरे को बेनकाब करती हैं ‘राजेश भारती’ की कविताएं” ☆  श्री जयपाल ☆

हरियाणा के कैथल जिले के गाँव काकौत में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कवि ‘राजेश भारती’ कविता और किसानी दोनों के प्रति एक समर्पित युवा प्रतिभा हैं । छोटी-मोटी अनेक नौकरियों के अनुभव के बाद उनका मन खेती और कविता में रम गया है। घर-परिवार चलाने के लिए खेतीबाड़ी और समाज के लिए कविता शायद यही उनका जीवन दर्शन है। इस दौर की कविता में उनकी कविता एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुई है।

उनकी कविता खेती-किसानी,गांव-गरीबी, दलित समाज का दर्द, वर्तमान दौर की क्रूर राजनीति और संवेदनाविहीन सत्ता, क्रांति, युद्ध,हिंसा,सामंती मानसिकता,पितृसत्ता, साम्प्रदायिकता , हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद बंधुआ मजदूरी, शोषण,ईश्वर का अस्तित्व,बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे केंद्रीय सामाजिक मुद्दों को मानवीय दृष्टि से उठाती है और एक बेहतर समाज की कल्पना करती है।

अपनी पहली ही कविता में राजेश भारती वर्तमान राजनीति की क्रूरता पर तीखा प्रहार करते हैं’–

राजनीति के

बूचड़खाने में

सत्य ही पशु है

जिसे काटा जा रहा है

…..

राजनीति के बूचड़खाने में

करुणा सबसे पहले मरती है

बिम्ब, प्रतीक,उपमाएं,वक्रोक्तियां या भाषा की भंगिमाएं आदि शिल्पगत प्रयोग कविता को तब ही समृद्ध करते हैं अगर अगर कवि के पास  मुक्तिबोध के शब्दों में ‘ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान’ हो। देश-दुनिया को समझने की व्यापक वैश्विक दृष्टि हो। यह दृष्टि ही रचनाकार को एक बेहतर रचनाकार बनाती है । इन कविताओं को पढ़कर ऐसा एहसास होता है कि कवि स्वयं को इस दृष्टि से समृद्ध करने में ईमानदारी से प्रयासरत है।

कवि ‘मन’ कविता में स्वीकार करता है— 

मैं खुद को

अपडेट करने की

कोशिश कर रहा हूं

लेकिन

फ़ाइलें बहुत बड़ी हैं

और कनेक्शन बहुत धीमा

—-

कभी-कभी

मुझे लगता है कि

जैसे कोई वायरस

धीरे-धीरे

मेरे दिमाग में फैल रहा है

कवि अपने शिल्पगत विधान में किसी विशेष परिपाटी का अनुसरण नहीं करता बल्कि उनकी कविता के अधिकांश बिम्ब/प्रतीक उसके आसपास के ग्रामीण माहौल  से ही स्वाभाविक रूप में कविता में ढल जाते हैं। उन्हें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता । जैसे—रेत पर रेखाएं,बूचड़खाना,नीम का पेड़, चमारों की गली,कबाड़खाना,सुबह की चाय, भिनभिनाती मक्खियाँ,भूखा-बच्चा, तमाशबीन, पर कटी चिड़िया, पशु-बाड़ा, बूढ़ा-बैल, पत्थरों का टोकरा,झूठी-पत्तलें,चूल्हा-चौका,चौबारा,कच्चे मकान की छत,सडांध भरी बस्ती आदि इन कविताओं के परिवेश और सरोकारों का परिचय एक साथ दे देते हैं। इन बिम्बों/प्रतीकों से कवि की सौंदर्य-दृष्टि का संकेत भी मिल जाता है कि चीजों को देखने की उसकी दृष्टि किस तरह से अलग है।

‘रेत पर रेखाएं’ की कविताएं किसी मनोरंजन या आनंद की प्राप्ति के लिए नहीं लिखी गई बल्कि समाज के हाशिये पर पड़े हुए वंचित तबकों के दर्द को अभिव्यक्ति देना कवि का विशेष प्रयोजन नजर आता है। इसलिए इन कविताओं में सीधी वैचारिक टकराहट है। एक अभिजन वर्ग की कुलीन विचारधारा और दूसरी तरफ आमजन के अधिकारों के लिए व्यवस्था से संघर्ष की विचारधारा। आम आदमी के दर्द की अभिव्यक्ति के लिये कवि क्रूर-सत्ता, कुटिल- राजनीति, वर्ण-व्यवस्था, साम्प्रदायिक शक्तियां, धार्मिक पाखंड, ईश्वर का अस्तित्व, मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुस्लिम -विवाद आदि से सीधे-सीधे टकराता है। राजेश भारती की कविताओं का यह मुख्य द्वंद्व है।पंजाब के क्रांतिकारी कवि  पाश की तरह व्यवस्था के प्रति आक्रोश और आमजन के प्रति करुणा और प्रेम, किसान-मजदूर-महिला और हाशिया-गत समाज के शोषण के खिलाफ बगावती तेवर इन कविताओं की एक विशेषता मानी जा सकती है।

कवि भगत सिंह के सपनों का भारत चाहता है।  कुछ कविताओं जैसे बूचड़खाना, तानाशाह, भगवान का खेल,पुल, मैं दलित हूँ, चमारों की गली, रूढ़ियाँ, लूटतंत्र, बेरोजगार, हे ईश्वर, आप तो, दुःखी दुनिया,गीत अभी बाकी है, सवाल,इसी समय ही, संवेदनाओं के सूत्र, कितना आसान है, गरीबी,मेरा औरत होना, युद्ध, गरीबों की शव यात्रा, मेहनतकश आदि  में राजेश भारती में अपने इन प्रतिरोधी विचारों को खुलकर व्यक्त किया है। वे ‘सवाल’ कविता में वर्तमान नेताओं को भगत सिंह के सपनों का हत्यारा बताते हुए कहते हैं-

कुछ तो बोलो तुम

जाति धर्म के ठेकेदारो

भगत सिंह के सपनों के हत्यारो

प्रेम,शांति,स्वतंत्रता,समानता,अभिव्यक्ति की आजादी, गरिमापूर्ण जीवन और एक बेहतर आदर्श समाज की स्थापना के लिए कवि का आत्म-संघर्ष इन कविताओं में स्पष्ट दिखाई देता है।

विशेषकर–लिखी जाए ऐसी कविता ,हमारा प्यार, खिड़की, हाथ, कितनी बार, खिंचाव, रेत पर रेखाएं, मन के भूत, सुकरात, यदि, सवाल,मां, जिन्दगी, मेरे बच्चो, अब की बार,

बदल गई है हीर, नौकरी लगने पर आदि कविताओं में इन्हीं मानवीय मूल्यों को बचाने की जद्दोजहद है l

जिस तरह धर्म का पाखंड होता है,उसी तरह साहित्य का पाखंड भी होता है और यह दौर धार्मिक पाखंड का तो है ही,साहित्यिक पाखंड का भी है। वर्तमान दौर में इस साहित्यिक पाखंड से बच पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है लेकिन इस खतरे से सतर्क रहकर ही गंभीर सृजन किया जा सकता है। इन कविताओं को पढ़कर लगता है कि कवि इस खतरे के प्रति सतर्क है।

कहीं-कहीं पर प्रूफ की त्रुटियां, स्पाट बयानी, गद्यात्मकता, कविता-पंक्ति का निर्वाह भावानुसार न होना आदि कुछ असावधानियां होते हुए भी अधिकांश कविताएं बेहद संवेदनशील, मार्मिक और पठनीय बन पड़ी हैं।

कुछ कविताओं के विशेष काव्यांशों को आप भी देखिए–

मुझे डर है कहीं

मर न जाए घुटकर

क्रांति की आवाज…

 

धीरे-धीरे

विलुप्त हो रहे हैं

बेहतर भविष्य के सपने..

 

लिखी जाए ऐसी कविता

जो किसी

विवश औरत की देह पर

उभरे हुए नाखूनों के निशान

मिटा सके

मरहम बनकर…

 

यदि

तारे शब्द होते

तो मैं तुम्हारा नाम

आकाशीय लिपि में लिखता..

 

जिस गति से फैलाई जा रही है

साम्प्रदायिकता

यदि इसी गति से तुम

प्रेम के पुल बनाते…

तो कब का हो गया होता

इस दुनिया का कायाकल्प…

 

धीरे-धीरे

कुर्सी के कीड़े

खा रहे हैं देश को

और स्थापित किया जा रहा है

मुट्ठी भर लोगों का लूट तंत्र…

 

मेरी कविता निर्धन की बेटी है

जिसे पल पल घूरते हैं लोग..

 

तुम इतने

कायर भी मत हो जाना

कि किसी स्त्री पर

अत्याचार होता देख

तुम्हें तुम्हारी माँ का

खयाल न आए…

 

तुम ऐसे

बुद्धिजीवी न बनना

कि डालने लगो

हुकूमत की गलतियों पर पर्दा

गढ़ने लगो

उसके कसीदे…

 

चमारों की गली का

आखिरी छोर

वहां खत्म नहीं होता

जहां मकान खत्म होते हैं…

 

जिंदगी

मेरे पशु बाड़े में

बैठा बूढ़ा-बैल

जो निरंतर ताक रहा है…

 

जिंदगी

एक उदास गीत

जिसे एक प्रेयसी

गुनगुना रही है..

 

कुछ तो बोलो तुम

जाति धर्म के ठेकेदारो

भगत सिंह के सपनों के हत्यारो…

 

ख़बरें आती हैं

जैसे मक्खियाँ भिनभिनाती हैं..

 

एंकर की आवाज

जैसे बाजार में रेहड़ी वाला…

 

और हम

हम बस तमाशबीन

जो हर खबर के बाद

ताली बजाते हैं..

 एक खूबसूरत कविता संग्रह के लिए संभावनाशील युवा कवि राजेश को बहुत- बहुत बधाई !!

 

समीक्षा-जयपाल (9466610508)

 

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “जंगल में जनतंत्र…” (लघुकथा संग्रह)– आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी की कृति जंगल में जनतंत्र… “ की समीक्षा)

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

☆ “जंगल में जनतंत्र…” (लघुकथा संग्रह)– आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆ 

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक ‏: जंगल में जनतंत्र 

कथाकार  : आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ 

सलिल की सहज, अर्थ पूर्ण लघु कथाएं – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

वरिष्ठ कवि – साहित्यकार इंजी. संजीव वर्मा “सलिल” का लघु कथा संग्रह “जंगल में जनतंत्र” पढ़ने मिला। इस संग्रह पर विचार प्रस्तुत करने से पूर्व कथा – कहानियों से संबंधित कुछ बिंदुओं पर चर्चा आवश्यक है तभी हम लघु कथा जगत में “सलिल” का स्थान निर्धारत कर पाएंगे।

दादी, नानी और मां के माध्यम से बच्चे 2/3 वर्ष की आयु में ही कहानियों से जुड़ जाते हैं। … एक था कौआ, …एक थी गलगल मौसी और …दूर के चंदा मामा जैसी कहानियां उनकी समझ, उनकी कल्पना शक्ति बढ़ाने लगते हैं। …फिर एक था राजा और एक था साधु, किसान, व्यापारी आदि की कहानियां उनके दृष्टि – फलक और ज्ञान को बढ़ाती हैं। मैं समझता हूं कि हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में सर्वाधिक कही – सुनी, पढ़ी – लिखी जाने वाली विधा कहानी ही है। कहानी का अस्तित्व भी उतना ही पुराना है जितना मनुष्य के विचारवान होने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का। हो सकता है उस काल में कहन का तरीका अलग रहा हो, किंतु कथा के अस्तित्व पर आशंका नहीं की जा सकती। मनुष्य के ज्ञान, लिपि और संस्कार यात्रा से कदमताल करते हुए ही कथा ने भी लघु कथा, कहानी, उपन्यास जैसे विविध नाम और परिभाषाएं पाईं हैं।

किसी समय अत्यंत रुचि से पढ़े जाने वाले वृहत उपन्यास लोगों की बढ़ती व्यस्तता के कारण उनसे दूर हो गए, किंतु कहानियों और लघु कथाओं के पाठक व कथाकार दोनों ही निरंतर बढ़ रहे हैं। लघु कथाएं न सिर्फ हिंदी वरन सभी भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही हैं, विदेशों में भी रची – पढ़ी जा रही हैं। अमेरिका के एडगर एलन पो., ओ. हेनरी, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, रेमंड कार्वर, रूस के एटोन चेखव, फ्रांस के गाई डे. मौपासां, अर्जेंटीना के जार्ज लुइस बोर्गेस तथा कनाडा के एलिस मुनरो की लघु कथाएं दुनिया भर में पढ़ी जा रही हैं। जिन भारतीय साहित्यकारों का नाम हम बड़े सम्मान से लेते हैं उन्होंने भी लघु कथाएं लिखी हैं। इनमें मुंशी प्रेमचन्द, उपेंद्रनाथ “अश्क”, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, महाश्वेता देवी, चंद्रधर शर्मा “गुलेरी”, विमल मित्र, महादेवी वर्मा, हरिशंकर परसाई, मेहरुन्निशा परवेज, विष्णु प्रभाकर, शिवानी, खुशवंत सिंह, मृदुला सिंह आदि शामिल हैं।

यहां एक बात कहना चाहता हूं कि इन सभी ख्यातिलब्ध भारतीय साहित्यकारों ने जो भी लघु कथाएं लिखीं वे स्वाभाविक रूप से लघु हैं। इन्होंने प्रयास पूर्वक कथाओं को लघु नहीं बनाया, इसलिए इनकी लघु कथाएं रोचक हैं, पाठकों के स्मृति पटल पर अंकित हैं। वरिष्ठ कवि, साहित्यकार भाई संजीव वर्मा “सलिल” के लघु कथा संग्रह “जंगल में जनतंत्र” को पढ़ने के उपरांत मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वे भी इन्हीं श्रेष्ठ भारतीय कथाकारों की श्रेणी में आते हैं जो प्रयास पूर्वक कहानी को सिकोड़ कर छोटा करने का प्रयत्न नहीं करते वरन अपने अर्थ पूर्ण शब्द भंडार और संयोजन कला से अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कम शब्दों में व्यक्त करने में सक्षम हैं। उनकी कथाओं में जीवन के विविध रंग हैं, भाव हैं, दर्शन है, सबक है। मैं समझता हूं की यदि अन्य लघुकथाकार भी “सलिल” जी की भांति लघु लिखने की प्रतियोगिता में न पड़ते हुए सहजता से लघु कथा लेखन करेंगे तो उनकी कथाएं सलिल जी की कथाओं की तरह ही अधिक प्रभावशाली होंगी।

अनेक लोग “एक था राजा, एक थी रानी। दोनों मर गए, खतम कहानी। ” को सबसे छोटी कथा मानते हैं।

गुड़गांव निवासी अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर रवींद्र शर्मा की लघु कथा भी सबसे छोटी कथा मानी जाती है –

“अपनी मांद से बाहर निकलते हुए अपने बच्चे को बिल्ली ने कहा – “रुक जाओ, एक इंसान तुम्हारा रास्ता काट गया है। “

ठीक है, कथा लघु है, पर रवींद्र शर्मा जी को कौन समझाए कि बिल्ली की नहीं शेर के रहने की जगह को मांद कहते हैं।

सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर की लघु कथा “लक्ष्मी” को पढ़ें – “दीवाली की रात के पहले वाला दिन। एक करोड़पति मित्र ने अपने लेखक मित्र से कहा – दोस्त ! घर के दरवाजे खुले रखना,,,, आज रात लक्ष्मी आयेगी।

तो लेखक ने कहा – दोस्त अपने घर के दरवाजे भी खोल देना नहीं तो लक्ष्मी निकलेगी कैसे ?

यह एक अच्छी पूर्ण लघु कथा है।

बानगी के रूप में यहां प्रस्तुत है सलिल जी रचित इस कथा संग्रह की एक कथा – “नाम का प्यार”।

“आया ! बेबी को सम्हालो। ध्यान रखना समय पर खा – पी ले, मैं किटी पार्टी में जा रही हूं। गंदे हाथों से छू लेगी तो मेकअप खराब हो जायेगा। ” कहते हुए वे बच्ची को झिड़कते हुए कार में जा बैठीं और मैं देखता रह गया, उनका नाम का प्यार।

संग्रह में प्रस्तुत सलिल जी की सभी लघु कथाएं “कहानी” की परिभाषा पर खरी व उद्देश्य पूर्ण हैं, सहज संक्षिप्त विस्तार पाकर ही वे अपनी बात स्पष्ट कर देती हैं। ये पाठकों के मन – मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ेंगी। संजीव वर्मा “सलिल” जी को बहुत बहुत बधाई, मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर, मध्यप्रदेश – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९५ ☆ “ए जी! सुनते हो…” – लेखक… विजी श्रीवास्तव ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री विजी श्रीवास्तव जी द्वारा लिखित  “ए जी! सुनते हो……” पर चर्चा।

साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९५ ☆

“ए जी! सुनते हो…” – लेखक… विजी श्रीवास्तव ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – ए जी! सुनते हो… (व्यंग्य संग्रह)

लेखक – विजी श्रीवास्तव

चर्चा.. विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का  निर्भीक शब्द-युद्ध  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

विजी श्रीवास्तव का सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ए जी सुनते हो ,  समकालीन हिंदी साहित्य में व्यंग्य की एक ऐसी मशाल बन कर प्रस्तुत हो रहा है जो समाज के अंधेरे कोनों को उजागर करता दिखता है। यह पुस्तक शीर्षक के अनुरूप मात्र हल्का फुल्का हँसाने का साधन नहीं, बल्कि  समाज के सामूहिक पाखंड और नैतिक पतन का एक गहरा अन्वेषण है ।  यह संग्रह पाठकों से कहता है, ए जी सुनते हो? पढ़ो, सुनो , गुनो, और हो सके तो कुछ करो भी ।

लेखक ने माइनिंग में होते व्यापक भ्रष्टाचार को समझाने के लिए शब्दों को ही प्रयोगशाला बना दिया है। वे ‘खान’ को  (यानी खाते रहना) और ‘खनिज’ को ‘निज’ (स्वयं का) में बदलकर यह बताते हैं कि कैसे सार्वजनिक खनिज संपदा माफिया की निजी लूट का साधन बन गई है।

लेखक ने उधारी का शहीद,  इस नवाचारी पदबंध के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रहार किया है। जो व्यक्ति कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, वह व्यवस्था के लिए केवल ‘ शहीद’ बनकर रह जाता है।

‘कफ़न चाहिए तो बोलो’ रचना में दिखाया गया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सरकारी तंत्र मृतकों को मुफ्त कफ़न बाँटने की योजना में भी अपने लिए ‘कमीशन’ की गुंजाइश ढूँढ लेता है।

चम्मच घुमाना , का रोचक प्रयोग लेखक की शैली बताता है। एक सड़क ठेकेदार का यह कहना कि उसने ठेका लेने के लिए ‘कितनी ही जगह चम्मच घुमाया था’ (रिश्वत दी थी), शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोलता मारक स्टेटमेंट है।

 ‘ए जी! सुनते हो’ ,  पाखंड के विरुद्ध एक निर्भीक शब्द-युद्ध है।

विजी श्रीवास्तव का यह व्यंग्य-संग्रह आधुनिक जीवन की विसंगतियों का एक ‘सोशल क्रॉस-सेक्शन’ है।

यह पुस्तक अपनी भाषा की मारक क्षमता और शिल्प की नवीनता के कारण विशिष्ट बन पड़ी है।

शब्द-कीमियागरी और भाषाई प्रहार जबर्दस्त हैं।

लेखक के पास शब्दों का ‘संप्रभु अधिकार’ है। वे ‘चूना लगाना’ जैसे लोक-मुहावरों को राजनीतिक विचारधारा के स्तर तक ले जाते हैं। ‘चूना मंत्री’ या ‘विशेष अतिथि’ जैसे शब्दों के माध्यम से वे समाज के उस वर्ग पर चोट करते हैं जो बिना किसी उपयोगिता के केवल ‘मंच का बैलेंस’ (फोटो खिंचवाने) के लिए मौजूद रहता है।

संस्थागत पाखंड का पर्दाफाश करने में लेखक सफल है।

‘चरण रज का अभिलाषी’ में लेखक ने साहित्यिक और अकादमिक बाज़ार के पतन को दिखाया है। जहाँ योग्यता की जगह ‘नेटवर्किंग’ और चाटुकारिता ने ले ली है। जब एक युवक भ्रष्ट लोगों की चरण रज इकट्ठा करके बंजर खेत को उर्वर बनाने का दावा करता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि भ्रष्टाचार ही हमारा नया जीवन-स्रोत बन चुका है । लेखक मीडिया और तकनीक पर कटाक्ष करने में पीछे नहीं रहते ।

‘आत्मा से मिलाप’ में टीआरपी की दौड़ , अंधी होती पत्रकारिता को निशाना बनाया गया है। वहीं ‘ओटीपी आ गया’ और ‘कस्टमर केयर के चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यु’ जैसी रचनाएँ दिखाती हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक ने जीवन को सुलभ बनाने के बजाय उसे अधिक खीज भरा और जटिल बना दिया है।

 मानवीय संवेदनाओं का क्षरण लेखक के निशाने पर है। लेखक इस बात से व्यथित हैं कि आज का मनुष्य संवेदना शून्य होता जा रहा है। ‘कल शायद श्मशान जाना पड़े’ जैसी सूचना पर व्यक्ति दुखी होने के बजाय अपने ‘अपॉइंटमेंट’ बिगड़ने की चिंता करता है। जब समाज में न्याय और रोटी की खबरें छोटे कॉलम में सिमट जाती हैं और जूता उछालने जैसी घटनाएँ ‘हेडलाइन’ बनती हैं, तो लेखक की निराशा एक तीखे व्यंग्य के रूप में फूटती है।

‘एजी! सुनते हो’ एक अत्यंत सजग और सतर्क, सतत् व्यंग्य दृष्टि का परिणामी ,सुदृढ़ लेखन है। विजी श्रीवास्तव ने उपदेश देने के बजाय हास्य और फंतासी के माध्यम से पाठकों को चेताया है। यह पुस्तक समकालीन समय के कठिन सवालों से मुठभेड़ करती है और हमें अपने भीतर झाँकने पर विवश करती है।

पार्टी के अनुशासित सिपाहियों की महफिल, लिव इन की कहानी का अंत,चूने की लकीर,और सुनाओ भाभी कैसी हैं,

कृषि दर्शन में जूते की खेती,क्या डिलिट किया,शोक सभा की तैयारियाँ,सावधान ! खाँसना मना है,स्वतंत्रता दिवस की बूंदी और ट्रिलियन के शून्य,कुत्तों का नामकरण , अपनी पर आने वालो अब आ ही जाओ ,बिल्ली की शिट्टी-न लीपने की न पोतने की, तेल, तेल की धार और फैट-फ्री आम आदमी ,  हिंदी संस्थान का कुत्ता,अपने पाले में हमें तो मत गिनो यार..,

उल्लू के पट्टे कभी कम न होंगे,स्वदेशी मुर्गी का हिंदी दर्शन,विशेष-अतिथि, पतन के मार्गों पर गड्ढों का नामकरण,समर्थन का मूल्य,इन्साफ का तलबगार,ग्लूकोज के बिस्कुट का साहित्य के विकास में योगदान,

नींद में बिकती इन्सानियत,लोकतंत्र घायल है,अच्छे डॉक्टर से इलाज कराओ,हुआ हुआ न हुआ हमला,हलो चेक हलो,कोरोना वायरस का अभिनंदन समारोह,हैरान हैं सड़कें,साढ़े इक्कीसवीं सदी में सब्जी की साहसिक खरीदी,शांति के मसीहा के बहुरंगी रूमाल,

 जैसे अपेक्षाकृत लंबे शीर्षकों वाली किन्तु गहरे मंतव्य की, हर वाक्य में सार्थक कटाक्ष से भरी रचनाएं एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर वैचारिक संप्रेषण करती हैं। सारी किताब विजी श्रीवास्तव की परिपक्व लेखनी से परिचित करवाती है। किताब पाठक को व्यंग्य का आनंद प्रदान करने वाली है। भाषा , शैली , अभिव्यक्ति, संप्रेषण सधा हुआ है। इसे पढ़कर मैं आश्वस्त हूं कि पुस्तक एजी सुनते हो, समकालीन व्यंग्य जगत में विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी ही करेगी। पुस्तक वनिका पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई है, और नई दिल्ली पुस्तक मेले में हाल ही कृति का विमोचन हुआ है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३६ – पुस्तक चर्चा ☆ चाणक्य वार्ता (पाक्षिक) – सम्पादक: डॉ. अमित जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ. अमित जैन जी द्वारा संपादित चाणक्य वार्ता (पाक्षिक)की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३६ 

☆ पुस्तक समीक्षा – चाणक्य वार्ता (पाक्षिक)सम्पादक: डॉ. अमित जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पत्रिका: चाणक्य वार्ता (पाक्षिक)

अंक: 1-15 जनवरी, 2026 (बाल साहित्य विशेषांक)

सम्पादक: डॉ. अमित जैन

पृष्ठ: 152 | मूल्य: 150 रुपये

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

नई पीढ़ी के नैतिक और बौद्धिक विकास का सारथी — ‘बाल साहित्य विशेषांक’ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

आज के तकनीकी युग में, जहाँ वीडियो गेम और सोशल मीडिया बच्चों के कोमल मन को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं, बाल साहित्य की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में ‘चाणक्य वार्ता’ पत्रिका का ‘बाल साहित्य विशेषांक’ (जनवरी 2026) एक मशाल की तरह सामने आया है। 152 पृष्ठों का यह विशाल कलेवर न केवल संख्यात्मक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि गुणवत्ता के मामले में भी यह बाल साहित्य के प्रति सम्पादकीय टीम की निष्ठा को दर्शाता है।

संपादकीय दृष्टि और विरासत का सम्मान

विशेषांक की शुरुआत संपादक डॉ. अमित जैन के सारगर्भित संपादकीय से होती है, जो वर्तमान समय में बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर बल देता है। पत्रिका ने अपनी परंपरा को भूलने नहीं दिया है। ‘विरासत’ स्तंभ के अंतर्गत महान बाल साहित्यकारों— चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’, डॉ. अश्वघोष, डॉ. श्याम सिंह शशि और डॉ. राष्ट्रबंधु के योगदान को रेखांकित करना सराहनीय है। यह खंड नई पीढ़ी के लेखकों को अपने दिग्गजों से परिचित कराने का एक सेतु है।

कहानियों और नाटकों का इंद्रधनुष

पत्रिका में संकलित कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ सूक्ष्म उपदेशात्मकता लिए हुए हैं। प्रकाश मनु की रचना जहाँ कौतूहल पैदा करती है, वहीं डॉ. रमेश यादव की ‘दादा-दादी पार्क’ पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की अहमियत समझाती है। नाटकों का समावेश इस अंक की एक बड़ी उपलब्धि है। अलका प्रमोद और बलराम अग्रवाल के नाटक न केवल पढ़ने के लिए हैं, बल्कि स्कूलों में मंचन के लिए भी बेहद उपयुक्त हैं। ये नाटक बच्चों में संवाद कौशल और आत्मविश्वास विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

काव्य और अन्य विधाओं का सौंदर्य

विशेषांक में कविताओं का चयन बहुत ही सलीके से किया गया है। लक्ष्मीनारायण भाला, सूर्य कुमार पांडे, संजीव जायसवाल ‘संजय’ और शकुंतला कालरा जैसे वरिष्ठ कवियों की रचनाओं में जहाँ गेयता और लय है, वहीं समकालीन विषयों पर लिखी गई कविताएँ बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करती हैं। पहेलियाँ, चित्रकथाएँ और बाल-गीत पत्रिका को मनोरंजक बनाते हैं, जिससे बच्चों की रुचि अंत तक बनी रहती है।

वैश्विक संदर्भ और विमर्श

इस विशेषांक की सबसे अनूठी विशेषता इसका ‘अंतरराष्ट्रीय’ स्वरूप है। ‘प्रवासी पन्ने’ में अमेरिका से डॉ. अनूप भार्गव, ऑस्ट्रेलिया से डॉ. शैलजा चतुर्वेदी और लंदन से दिव्या माथुर जैसे रचनाकारों की उपस्थिति यह बताती है कि सात समंदर पार भी भारतीय संस्कृति और हिंदी बाल साहित्य की खुशबू महक रही है। इसके अतिरिक्त, प्रो. उषा यादव और प्रो. सुरेन्द्र विक्रम के आलेख बाल साहित्य के गिरते स्तर और समीक्षा की कमी जैसे गंभीर विषयों पर सार्थक बहस छेड़ते हैं।

प्रस्तुति और साज-सज्जा

पत्रिका का आवरण चित्र अत्यंत आकर्षक है, जो देखते ही बच्चों को अपनी ओर खींचता है। कागज़ की गुणवत्ता और छपाई साफ-सुथरी है। चित्रों का प्रयोग कहानियों के भाव के अनुरूप किया गया है, जिससे पठन-पाठन की प्रक्रिया उबाऊ नहीं लगती।

निष्कर्ष

‘चाणक्य वार्ता’ का यह ‘बाल साहित्य विशेषांक’ केवल एक पत्रिका का अंक मात्र नहीं है, बल्कि यह हिंदी बाल साहित्य के वर्तमान परिदृश्य का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। इसमें जहाँ एक ओर परंपरा का सम्मान है, वहीं दूसरी ओर भविष्य की आधुनिक सोच भी है। 150 रुपये के मूल्य में यह विशेषांक हर पुस्तकालय और हर उस घर की शोभा बनना चाहिए जहाँ बच्चे पल रहे हैं।

यह अंक निश्चित रूप से बाल साहित्य की दुनिया में एक नए मील के पत्थर के रूप में याद किया जाएगा।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

12/01/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  “दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं

☆ आलेख/पुस्तक चर्चा ☆ दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

पुस्तक – बंद दरवाजे ( दलित-चिंतन की कविताएं)

कवि – जयपाल

समीक्षक – मनजीत सिंह

प्रकाशन – यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र

क़ीमत –150/- पेपर बैक

पिछले दिनों हरियाणा के चर्चित कवि जयपाल जी द्वारा लिखित काव्य पुस्तक-‘बन्द दरवाज़ें’–पढ़ने का अवसर मिला ।  इस पुस्तक में दलित  चिंतन की कविताएं हैं। दलित चिंतक/कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान को समर्पित “जूठी पत्तल’ की पंक्तियों में भूख का यथार्थ देखिए–

जूठी-पत्तल

हम तो बस टूट पड़ते थे

मिली-जुली सतरंगी मिठाइयों पर

घुली-मिली दाल-सब्जियों पर

कटे-फटे फल-फ्रूटों पर

कभी कभार ही मिलते थे हमें ये छत्तीस व्यंजन

माँ बहुत खुश होती थी

कभी-कभी दुःखी भी होती थी

दलित साहित्य के बारे में अलग-अलग लेखक अलग-अलग राय रखते हैं। हर लेखक ने अपनी हर रचना में बदलाव और विकास को अलग-अलग तरीके से दिखाया है। कुछ दलित लेखक ऐसे भी हैं जो देवी-देवताओं को मज़ाक के साथ नकारते हैं । कुछ लेखक ऐसे हैं जो आम लोगों की लोक संस्कृति को एक नई ज़िंदगी देने वाली दुनिया के तौर पर देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मिथकों और कहानियों को समुदाय की क्रिएटिविटी से बने रूपक मानते हैं ,उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मार्क्सवाद को बहुत नफ़रत से देखते हैं, और कुछ दलित ऐसे हैं जिन्हें इस बात का अफ़सोस है कि मार्क्सवादी अभी तक हमारी मदद के लिए क्यों नहीं आए  l कुछ सोचते हैं कि मार्क्सवाद ही एकमात्र रास्ता है जो जात-पात को  सही अर्थों में समाप्त कर सकता है और  गैर-बराबरी मिटा सकता है lसभी लेखकों की अलग-अलग सोच  है लेकिन सारे लेखकों में कहीं न कहीं एक जगह जाकर समानता देखने को मिलती है कि जाति पर आधारित अमानवीय भेदभाव  और जाति समाप्त होनी चाहिए।

श्री जयपाल 

‘उसका गांव’ कविता आज के सन्दर्भ में पूर्णतया सटीक बैठती है… उदाहरणार्थ यदि मैं गांव जाता हूं तो सबसे पहले मेरा नाम पूछा जाता है फिर मोहल्ला , पाना,ठोला,ठिकाना, बाप,दादा आदि ताकि जाति का पता चल जाए। शहर में भी यही हाल है, केवल मकान नं की पहचान काफी नहीं है जाति तो शहर में भी देखी जाती है । कुछ पंक्तियां आप भी देखिये–

वे जाति नहीं पूछते

आज कल कोई किसी से जाति नहीं पूछता

जाति मिट सी गई है मानो

जैसे पढ़ लिख से गए हैं सब

इसीलिए जाति नहीं पूछते

हालांकि बाकी सब अते-पते,

आग्गा- पिच्छा गली-मौहल्ला

वे अच्छी तरह पूछ लेते हैं

बार-बार पूछते हैं

पूछते ही रहते हैं कुछ न कुछ

जब तक पानी पूरी तरह साफ ना हो जाए

और पता ना लग जाए

कौन कितने पानी में हैं!

‘हम क्या करते रहे’ कविता में कवि ने दलित वर्ग से प्रश्न पूछे हैं कि वे क्या करते रहे ?  जयपाल जी सीधे तौर पर कविता के माध्यम से अनेक सवाल कर रहे हैं–

वे गा रहे थे

हम नाच रहे थे

वो बोल रहे थे

तो हम सुन रहे थे

 

सदियां गुज़र गई

कुछ इसी तरह

पता ही नहीं चला

वे क्या कहते रहे

हम क्या करते रहे

दलितों-पिछड़ों और वंचित समाज ने कभी नहीं सोचा आखिरकार वे कर क्या रहे थे! अर्थात केवल अनुसरण कर रहे थे ! आदेश मान रहे थे!!

‘दलित बस्ती’ कविता एक बेहतरीन कविता है जिसमें दलित बस्ती स्वयं अपने बारे में कहती है कि मेरे पास तो न तो ढंग से सूर्य पहुंचा है न ही ढंग से कोई कवि । ‘आशा’ नामक कविता में दलित-स्त्री  कहती है कि बीता हुआ कल मेरा कभी नहीं हुआ और जो चल रहा है वह किसी और का है और भविष्य पहले ही तय हो चुका है।

दलित स्त्री का दुःख कवि के शब्दों में—

मैं तोड़ देना चाहती हूँ वे पैर

जो दलकर मुझे दलित बनाते हैं

दफ़न कर देना चाहती हूँ उस बचपन को

जो मेरे जख्मों पर नमक छिड़कता है

 भूल जाना चाहती हूँ वह जवानी

 जो मुझ पर बिजली बन कर गिरी थी

बंद कर देना चाहती हूं वे पवित्र कुएं

जिनमें मेरी लाश तैरती रहती है

पटक देना चाहती हूँ वे व्यवस्थाएं

जो मेरा सिर सबके पैरों में रख देती है

छोड़ देना चाहती हूं वे रास्ते

जो सिर्फ मेरे लिए ही बनाए गए हैं

मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं

जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती हैं

पलट देना चाहती हूं वे सारी परंपराएं

जो मेरे गले में लटका दी गई हैं

इसी तरह ‘मैं किसको क्या कहूं’- कविता में भारतीय गांव में दलित महिला की स्थिति देखिए —

मैं क्या कहूं

उस गांव को

जो सबका है पर मेरा नहीं

उन गांव के कुत्तों को

जो मुझे ही देखकर भौंकते हैं

उन गाय भैंसों को

जिनका गोबर-मूत भी मेरे हाथों से पवित्र है

उस गाय- माता को

जिसके के नाम पर माबलिंचिंग हुई

और मैं विधवा हो गई

 

क्या कहूँ

उन देवताओं को

जो मुझे हमेशा शाप ही देते हैं

उन पवित्र पुजारियों को

जिनका धर्म मेरी परछाई पर टिका है

 उन धार्मिक चरणों को

 जिनके नीचे मुझे कुचला ही गया

 उस हवेलियों को

 जिसके दरवाजे हमेशा बन्द ही रहते हैं

उन महाजनों को

जिनके पास मेरी आत्मा गिरवी है

वर्ण-व्यवस्था को लेकर उपरोक्त कविता कुछ तीखे सवाल उठाती है और बेचैन करती है।

संस्कृत से लिया गया “दलित” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “टूटा हुआ,” “कुचला हुआ,” “बिखरा हुआ,” या “उत्पीड़ित,” जो भारत में इन समुदायों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक अधीनता, हाशिए पर धकेले जाने और अधिकारों से वंचित किए जाने को दर्शाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से “अछूत” माना जाता था और जाति व्यवस्था से बाहर रखा गया था । यह शब्द अब सामाजिक/ राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया है,जो ज्यादातर कविताओं में झलकता है। इन कविताओं में दलित समाज की पीड़ा को गहरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता  के साथ व्यक्त किया गया है । देश के वर्तमान जातिवादी और साम्प्रदायिक माहौल में ये कविताएं बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं । मनुष्यता को बचाने का  आह्वान करती हैं और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करती हैं।

आशा है पाठकों को श्री जयपाल जी की पुस्तक बंद दरवाजे की कविताएं दलित समस्या पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी   ।

 

श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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