हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ स्त्री-पुरुष – श्री सुरेश पटवा ☆ समीक्षक – श्री गोकुल सोनी

पुस्तक – स्त्री-पुरुष

लेखक – श्री सुरेश पटवा

प्रकाशक – नोशन प्रेस, चेन्नई

मूल्य – रु.२६०/-

☆ पुस्तक चर्चा – स्त्री-पुरुष – लेखक श्री सुरेश पटवा – समीक्षक – श्री गोकुल सोनी  ☆

श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘स्त्री-पुरुष’ को पढ़ते हुए वैचारिक धरातल पर जो अनुभव हुए, वैसे प्राय: अन्य कृतियों को पढ़ते समय नहीं होते. रिश्तों के दैहिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, गूढ़ रहस्यों को धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, संरचनात्मक, परिप्रेक्ष्य में अनावृत्त कर विवेचन करती यह पुस्तक समूचे विश्व के मत-मतान्तरों को समेटते हुए सचमुच एक श्रमसाध्य अन्वेषण है. जहां श्री पटवा जी स्त्री- पुरुष के अंतर्संबंधों की गहराई में उतरते हुए कभी एक मनोवैज्ञानिक नजर आते हैं, तो कहीं इतिहासवेत्ता, कहीं भूगोलवेत्ता, तो कहीं समाजशास्त्री. पुस्तक को पढ़ते हुए लेखक की प्रतिभा के विभिन्न आयाम सामने आते हैं.

suresh patwa-साठीचा प्रतिमा निकालभारतवर्ष की पुरातन संस्कृति और धर्म तथा आध्यात्म का आधार वेद-पुराण, उपनिषद और अन्य धार्मिक ग्रन्थ हैं. जहाँ हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अभीष्ट बताये हैं, जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हैं. इनमे ‘काम’ अर्थात सेक्स को एक सम्मानजनक स्थान दिया गया है. वहीँ सुखी मानवीय जीवन हेतु त्याज्य बुराइयों में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह जैसे तत्वों या प्रवृत्तियों में ‘काम’ को पहला स्थान दिया गया है. काम दोनों जगह है.

प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों? उत्तर स्पष्ट है- यदि काम का नैसर्गिक और मर्यादित रूप जीवन में हो तो समूचा जीवन संगीत बन जाता है, परन्तु काम को विकृति के रूप में अपनाने पर यह व्यक्ति के मन और मष्तिष्क पर अपना अधिकार करके उसे रसातल में पहुंचा देता है. निर्भया के अपराधियों के कृत्य और उनको फांसी, इसके जीवंत उदाहरण हैं.

काम सृष्टि का नियामक तत्व है और जीवन के प्रत्येक कार्य के मूल में पाया जाता है. यह केवल मनुष्यों में ही नहीं, पशु-पक्षियों या मनुष्येतर प्राणियों में भी आचरण और स्वभाव का मूल कारक होता है. यह एक ऐसा विषय है जिसने बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों देवी-देवताओं, दैत्यों, विद्वानों के चिंतन को उद्वेलित किया है. धार्मिक ग्रंथों को लें तो ‘नारद मोह’ इंद्र-अहिल्या, और राजा ययाति की कथा इसके जीवंत उदाहरण हैं, वहीँ यह राजा भर्तहरी को भोग लिप्सा के वशीभूत श्रंगार शतक लिखवाता है. फिर चिंतन की गहराई में धकेलते हुए वैराग्य शतक लिखवाता है.

स्त्री-पुरुष अन्तर्संबंधों में काम तत्व इतना जटिल रूप में दृष्टिगोचर होता है कि जिसको मात्र आध्यात्मिक चिंतन से विद्वान लोग हल नहीं कर पाए. यही वजह है कि धर्म ध्वजा फहराने निकले आदि गुरु शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में मिथिला विद्वान मंडन मिश्र को तो हरा दिया परंतु उनकी विदुषी पत्नी भारती के काम कला संबंधी सवालों का जवाब ब्रहमचारी सन्यासी आदि शंकराचार्य नहीं दे पाए. क्योंकि एक स्त्री से हारना उनको अपमानजनक लगा अतः उन्होंने एक राजा की देह में परकाया प्रवेश कर काम कला का ज्ञान प्राप्त किया, तब जाकर भारती को हराकर उसे शिष्या बनाया. इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि काम एक गूढ़ विषय है.

आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व ऋषि वात्सायन ने समग्र चिंतन-मनन के पश्चात काम सूत्र की रचना की. यही नहीं आधुनिक लेखकों ने नर-नारी पृष्ठभूमि पर प्रोफ़ेसर यशपाल के उपन्यास “क्यों फँसे” और “बारह घंटे” लिखा जिसमें उन्मुक्त यौनाचार, नर नारी संबंधों का विश्लेषण है, साथ में बारह घंटे में प्रेम-विवाह की नैतिकता को केंद्र में रखकर इसके स्वरुप पर विचार किया है. काम की महत्ता मात्र वैदिक धर्म में ही नहीं, वरन अन्य धर्मों में भी देखने में आती है. यदि मुस्लिम धर्म का उदाहरण देखें तो पाएंगे कि उन्हें भी प्रलोभन दिया गया है, कि यदि अल्लाह के बताए मार्ग पर चलेंगे, तो जन्नत में बहत्तर हूरें मिलेंगी. वहीँ ईसाई धर्म में तो प्रभु यीशु का कुंवारी मां के गर्भ से जन्म लेना काम का प्रभावी रूप दर्शाता है.

लेखक ने जहां भारतीय धर्म दर्शन वा साहित्य यथा- कामसूत्र, शिव पुराण, और अन्य धार्मिक ग्रंथों को पढ़ा है वहीँ कबीर, गांधी, ओशो, के साथ ही पाश्चात्य दर्शन-साहित्य जैसे फ्राइड, काल मार्क्स, अरस्तू, प्लेटो, लिविजिन व लाक, विल्हेम, वुंट, टिनेचर, फेक्नर, हेल्मोलेत्स, हैरिंग, जी ई म्युलर डेकार्ट, लायब, नीत्से, ह्यूम,हार्टले, रीड, कांडीलेक, जेम्स मिल, स्टुअर्ट मिल, बेन, कांट, हरबर्ट, बेवर, हेल्मो, डार्विन, फ्रेंचेस्को, पेट्रार्क, बर्ट्रेण्ड रसेल, जैसे कई विदेशी वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों, समाज शास्त्रियों के सिद्धांतों का अध्ययन कर, उनके जीवन-दर्शन, चिंतन को इस पुस्तक में समाहित किया है.

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पग पग नर्मदा दर्शन के सहयात्री श्री सुरेश पटवा जी से पहली बार इस यात्रा में ही परिचय हुआ। वे मुझसे 5 साल बड़े हैं। स्टेट बैंक के सहायक महाप्रबंधक पद से रिटायर हुए हैं। हमारी पैदल नर्मदा यात्रा के सूत्र धार वे ही हैं। आपको लिखने पढ़ने का शौक है, इतिहास की सिलसिलेवार तारीख के साथ जानकारी उन्हें कंठस्थ है।वे लेखक भी हैं उनकी पहली पुस्तक “गुलामी की कहानी” में इतिहास के अनछुए किस्सों को रोचक ढंग से लिखा गया है। आपकी दूसरी पुस्तक “पचमढ़ी की खोज” जेम्स फार्सायथ का रोमांचक अभियान है, आपने तीसरी पुस्तक ” स्त्री पुरुष की उलझनें “ पति पत्नी और प्रेमियों के रिश्तों की देहिक, भावात्मक,और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर केन्द्रित है। श्री पटवा जी ने नर्मदा घाटी के इतिहास और यात्रा अनुभव को अपनी पुस्तक “नर्मदा” सौंदर्य, समृद्धि,और वैराग्य की नदी में लिखा है।

– श्री अविनाश दवे, सेवानिवृत सेंट्रल बैंक

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लेखक ने अपना एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है, कि ईश्वर ने मंगल ग्रह के पत्थरों और कड़क मिट्टी को लेकर मजबूत हड्डियों और पुष्ट मांसपेशियों से आदमी बनाया, उसके बाद उसका दिमाग बनाकर उसमें ताकत, क्षमता, उपलब्धि और सफलता प्राप्त करने के बीज रोपित कर दिए. उसे ऐसी योग्यता का एहसास दिया, कि कठिन से कठिन परिस्थिति का हल ढूंढ सकता है. उसे इस भाव से भर दिया, कि मुश्किलों से निकलने के लिए मंगल ग्रह के जीव के अलावा किसी अन्य जीव का सहयोग वांछित नहीं और दिमाग में अजीब सी रासायनिक चीज डाली कि जवान औरत को देखकर उसे पाने हेतु उसमें तीव्र इच्छा जागृत हो. जिसे मात्रा अनुसार क्रमशः प्रेम, कामुकता, और वासना कहा गया. क्योंकि उसे सृष्टि का सृजनचक्र अनवरत जारी रखना था, इसीलिए यह सृष्टि कायम रखने के लिए उसने शुक्र ग्रह की हल्के, मुलायम, पत्थर और नरम मिट्टी से सुंदर स्त्री बनाकर उसके दिमाग में प्रेम-भावना, कमनीयता, अनुभूति, समस्या आने पर दूसरों से साझा कर, सुलझाने की प्रवृत्ति और आदमी से आठ गुना अधिक काम का अंश, दिमाग में रसायन देकर सुंदर शरीर-सौष्ठव, कामुक अंग, मन की चंचलता, परंतु ममता की भावनाओं से भर दिया. सजने-सँवरने द्वारा काम उद्दीपन और पसंद के आदमी से सृजन हेतु चयन का रुझान दिया. इतना ही नहीं, पशु पक्षियों में काम अंश की स्थापना की, ताकि सृष्टि का क्रम निर्वाध गति से चलता रहे. क्योंकि दोनों की वाह्य संरचना और आंतरिक सोच में पर्याप्त अंतर है, इसलिए आपस में समस्याएं भी उत्पन्न होती है. दोनों एक दूसरे को अपने जैसा समझ लेते हैं. अंतर भूल जाते हैं. तब एक दूसरे पर भावनात्मक शासन की प्रवृत्ति जागृत होती है. जब आपसी समस्या उत्पन्न होती है, तो आदमी चिंतन की आंतरिक गुफा में प्रवेश कर जाता है. वह अपनी समस्या को बगैर किसी से बाटें, स्वयं सुलझाना चाहता है और औरत के बार बार टोकने पर क्रोधित हो जाता है. वहीँ औरत जब समस्या अनुभव करती है, तो वह साझा करना चाहती है. वह चाहती है, कि आदमी धैर्य पूर्वक उसकी बात सुन भर ले, समस्या तो वह स्वयं हल कर लेगी. ऐसा नहीं होता, तो वह तनाव ग्रस्त होकर ऊपर से भले संयत दिखे, पर दुखी होकर अपना अस्तित्व खोने लगती है. यदि दोनों परस्पर एक दूसरे की मानसिक संरचना और शरीर में स्रावित रसों से उत्पन्न भावना चक्रों को ध्यान में रखते हुए परस्पर व्यवहार करें, तो जीवन की सारी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाती है.

लेखक यह भी मानता है, कि पूरे जीवन के प्रत्येक कार्य के मूल में काम होता है, जिसे उसने वात्सायन, फ्राइड, रजनीश आदि के सिद्धांत द्वारा स्पष्ट करते हुए रजनीश के उपन्यास “संभोग से समाधि की ओर” का विश्लेषण कर समझाने की चेष्टा की है. पुस्तक में औरत एवं आदमी की वाह्य अंगों की संरचना एवं आंतरिक स्वभाव की दृष्टि से कई वर्गीकरण भी किए गये हैं, तो जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान के तरीके भी सुझाए गये हैं.

प्रेम के दैहिक वा मनोवैज्ञानिक रहस्य को समझने हेतु विभिन्न उदाहरण, और अंत तीन प्रेम कहानियां भी दी गई हैं, जो पुस्तक को सरल और बोधगम्य बनाती हैं. पृष्ठ ४७ से ५४ तक मनोविज्ञान के विकास का विस्तृत इतिहास पढ़ते हुए लगता है, कि लेखक जैसे अपने मूल विषय से भटक कर विषयांतर होकर उन मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण करने लगा हो जो पूर्णत: स्त्री-पुरुष अंतर्संबंधों के आवश्यक कारक नहीं है तथापि पृष्ठ 62 से 66 पठनीय है जिसमें भारतीय संस्कृति और हिंदू दर्शन के बीज निहित हैं.

हमारे प्राचीन दर्शन में काम संबंधी वर्जनाएँ नहीं थी. आज के युग में काम विकृति का कारण ही यही है, कि उसे निंदनीय, गंदा, नियम विरुद्ध, त्याज्य बताकर ही बचपन से विचारों में ढाला जाता है, अतः जब नियम टूटता है तो व्यक्ति को ग्लानि भाव होने लगता है. लेखक के अनुसार यह नैसर्गिक प्रवृत्ति है और इसे सहजता पूर्वक अपनाकर मर्यादित रुप से आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है. अंदर से प्रत्येक स्त्री-पुरुष इसे चाहते हुए ऊपर से परंपराओं के वशीभूत हो, इसकी आलोचना करते हैं, परंतु लेखक की दृष्टि में यह तथ्य भी मैं लाना चाहता हूँ कि जब कोई आदत या प्रवृत्ति बहुत सामान्य हो जाएगी तब वह निश्चित ही अपना आकर्षण खो देगी. लंबे अंतराल के पश्चात जो मिलन होता है वह कई गुना आनंद देता है. दूसरे अनावृत्त के प्रति अधिक आकर्षण होता है, पाने की चाह और आनंद होता है, अतः आंशिक वर्जनाओं का अपना अलग महत्त्व है. उसी से समाज का स्वरुप बना रहता है. यदि पुस्तक में राजा ययाति के चरित्र का चित्रण किया जाता तो विषय की व्यापकता में वृद्धि होती और यह सोने पर सोहागा सिद्ध होता। पुस्तक को पाठ्यपुस्तक की तरह लिखा गया है. वास्तव में यह पुस्तक ग्रेजुएशन के कोर्स में पढाये जाने लायक है, पुस्तक का शीर्षक एकदम सपाट “स्त्री पुरुष” है. लेखक विद्वान हैं अत: अच्छा होता कि इसका शीर्षक कलात्मक, यथा- जीवन और प्रेम, सुखद दांपत्य का रहस्य, सुखद अंतर्संबंधों का रहस्य, या सृष्टि-सृजन में प्रेम की भूमिका जैसा कलात्मक शीर्षक होता तो अधिक अच्छा लगता.

कुल मिलाकर यह पुस्तक चिंतन को नया आयाम देकर काम की विज्ञान और मनोविज्ञान सम्मत परिभाषा देते हुए स्त्री-पुरुष के बीच सौहार्द्र स्थापित करने की कुंजी है जो सुखद दाम्पत्य जीवन की नींव है. टीनेजर से लेकर सभी आयु वर्ग के पाठकों के  पढ़ने योग्य है यह पुस्तक. श्री सुरेश पटवा जी को इस सुंदर सार्थक साहित्य-सृजन हेतु बधाई एवं उन्नत लेखकीय भविष्य हेतु हार्दिक मंगलकामनाएं.

 

समीक्षक .. श्री गोकुल सोनी (कवि, कथाकार, व्यंग्यकार)

ए-४, पैलेस आर्चर्ड, फेस-१,  कोलार रोड, भोपाल. मो- ७०००८५५४०९

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 40 ☆ व्यंग्य संग्रह – ५ वां कबीर – श्री बुलाकी शर्मा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री बुलाकी शर्मा जी  के  व्यंग्य  संग्रह   “५ वां कबीर  ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 40 ☆ 

पुस्तक – ५ वां कबीर

व्यंग्यकार – श्री बुलाकी शर्मा

पृष्ठ – ११२

मूल्य – १०० रु

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य  संग्रह   – ५ वां कबीर  – व्यंग्यकार – श्री बुलाकी शर्मा ☆

व्यंग्य यात्रा में हर सप्ताह हमें किसी नई व्यंग्य पुस्तक, किसी नये व्यंग्य लेखक को पढ़ने का सुअवसर मिलता है.. जाने माने व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यंग्य उनके मुख से सुन चुका हूं. पढ़ने तो वे प्रायः मिल ही जाते हैं. प्रकाशन के वर्तमान परिदृश्य के सर्वथा अनुरूप ११२ पृष्ठीय ” ५ वां कबीर ” में बुलाकी जी के कोई ४० व्यंग्य संग्रहित हैं. स्पष्ट है व्यंग्य ८०० शब्दो के सीमित विस्तार में हैं. इस सीमित विस्तार में अपना मंतव्य पायक तक पहुंचाने की कला ही लेखन की सफलता होती है. वे इस कला में पारंगत हैं.

जितने भी लोग नये साल को किसी कारण से जश्न की तरह नही मना पाते वे नये साल के संकल्प जरूर लेते हैं, अपने पहले ही लेख में लेखक भी संकल्प लेते हैं, और आत्मनिर्भरता के संकल्प को पूरा करने के आशान्वित भरोसे के साथ व्यंग्य पूरा करते हैं. जरूर यह व्यंग्य जनवरी में छपा रहा होगा, तब किसे पता था कि कोरोना इस बार भी संकल्प पर तुषारापात कर डालेगा. दुख के हम साथी, फिर बापू के तीन बंदर पढ़ना आज २ अक्टूबर को बड़ा प्रासंगिक रहा, जब बापू के बंदर बापू को बता रहे थे कि वे न बुरा देखते, सुनते या बोलते हैं, तो टी वी पर हाथरस की रपट देख रहा मैं सोच रहा था कि हम तो बुरा मानते भी  नहीं हैं…… पांचवे कबीर के अवतरण की सूचना पढ़ लगा अच्छा हुआ कि कबीर साहब के अनुनायियों ने यह नहीं पढ़ा, वरना बिना कबीर को समझे, बिना व्यंग्य के मर्म को समझे केवल चित्र या नाम देखकर भी इस देश में कट्टरपंथियो की भावनाओ को आहत होते देख शासन प्रशासन बहुत कुछ करने को मजबूर हो जाता है. लेकिन वह व्यंग्यकार ही क्या जो ऐसे डर से अपनी अभिव्यक्ति बदल दे. बुलाकी जी कबीर की काली कम्बलिया में लिखते हैं ” मन चंचल है किंतु बंधु आप अपने मन को संयमित करने का यत्न कीजीये. ” प्याज ऐसा विषय बन गया है जिसका वार्षिक समारोह होना चाहिये, जब जब चुनाव आयेंगे, प्याज, शक्कर, स्टील, सीमेंट कुछ न कुछ तो गुल खिलायेगा ही.उनका प्याज व्यंग्यकार से कहता है कि वह बाहर से खुश्बूदार होने का भ्रम पैदा करता है पर है बद्बूदार. अब यह हम व्यंग्यकारो पर है कि हम अंदर बाहर में कितना कैसा समन्वय कर पाते हैं.

अस्तु कवि, साहित्य, साहित्यिक संस्थायें आदि पर खूब सारे व्यंग्य लिखे हैं उन्होने, मतलब अनुभव की गठरी खोल कर रख दी है. बगावती वायरस बिन्दु रूप लिखा गया शैली की दृष्टि से नयापन लिये हुये है. डायरी के चुनिंदा पृष्ठ भी अच्छे हैं.

मेरी रेटिंग, पैसा वसूल ।

 

समीक्षक .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 39 ☆ डॉ ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अट्टाहस पत्रिका – अतिथि संपादक – श्री शांतिलाल जैन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री शांतिलाल जैन जी के  अतिथि संपादन में प्रकाशित  डॉ ज्ञान चतुर्वेदी जी  पर केंद्रित अट्टहास पत्रिका पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 39 ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – डॉ ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अट्टाहस पत्रिका – अतिथि संपादक – श्री शांतिलाल जैन  ☆

चर्चा में पत्रिका – अट्टहास का डा ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अंक – अक्टूबर २०२०

अंक संपादक –  श्री शांति लाल जैन

प्रधान संपादक – श्री अनूप श्रीवास्तव

गुलिंस्ता कालोनी, लखनऊ ( उ प्र )

इससे पहले कि अट्टहास के डा ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अंक इस विशेषांक पर कुछ लिखूं, व्यंग्य को समर्पित पत्रिका अट्टहास पर व इसके समर्पित संपादक श्री अनूप श्रीवास्तव जी पर संक्षिप्त चर्चा जरूरी लगती है. ऐसे समय में जब कादम्बनी जैसी बड़े व्यवसायिक प्रतिष्ठानो की साहित्यिक पत्रिकायें बंद हो रही हों, एक बुजुर्ग व्यक्ति अपने कंधो पर अट्टहास का बोझ लिये चलता दिखे तो उसकी जिजिविषा व व्यंग्य के लिये समर्पण की मुक्त कंठ प्रशंसा आवश्यक है. वे व्यंग्य का इतिहास रचते दिखते हैं. अट्टहास के अनवरत प्रकाशन हेतु ही नही किसी भी पत्रिका के सफल संचालन के लिये यह आवश्यक होता है कि पत्रिका का उत्तरोतर विकास हो, नये पाठक, नये लेखक पत्रिका से जुड़ें. इस लक्ष्य को पाने के लिये अट्टहास ने अतिथि संपादन के रूप में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग किये. क्षेत्रीय व्यंग्य विशेषांक  निकाले गये हैं.अतिथि संपादक की व्यक्तिगत योग्यता, क्षमता व ऊर्जा का लाभ पत्रिका को मिला भी है. डा ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य के जीवंत शिखर पुरुषों में  हैं, उन पर केंद्रित विशेषांक निकालना किसी भी पत्रिका के लिये गौरव का विषय है. अट्टहास ने यह बेहद महत्वपूर्ण परम्परा प्रारंभ की है.

संपादन कितना दुष्कर काम है यह मैं समझता हूं, रचनायें बुलवाना, गुणवत्ता परखना, उन्हें एक फांट में संयोजित करना, सरल नही हैं. आदरणीय शांतिलाल जैन सर ने भोपाल से उज्जैन स्थानांतरित होने, स्वयं के स्वास्थ्य खराब रहने की व्यक्तिगत व्यस्तताओ के बाद भी महीनो भरपूर समय व ऊर्जा इस अंक के लिये सामग्री जुटाने व संपादन में लगाई है जिसके परिणाम स्वरूप ही अंक डा ज्ञान चतुर्वेदी पर संग्रहणीय दस्तावेज बन सका है.

अपने संपादकीय में अनूप जी लिखते हैं व्यंग्य विधा है या शैली इस बहस में पड़े बिना ज्ञान जी ने अपनी पृथक शैली में लगातार लिखकर स्वयं को साबित किया है. उनका यह लिखना कि शिखर पर होते हुये भी ज्ञान जी में लेश मात्र भी अभिमान नही है, वे लगातार युवाओ के मार्गदर्शक बने हुये हैं. यह टिप्पणी  डा साहब के कृतित्व व व्यक्तित्व का सूक्ष्म आकलन है.

अतिथि संपादक शांतिलाल जैन जी ने अपनी भूमिका बहुत गरिमा व गम्भीरता से निभाई है. उन्होने डा चतुर्वेदी की चुनिंदा रचनाये जैसे नरक यात्रा से अंश, हम न मरब से अंश,  मार दिये जाओगे भाई साब, पुरातन राजा रानी की आधुनिक प्रेम कथा, एक खूबसूरत खंजर अंक के पाठको के लिये प्रस्तुत की हैं. मुझे लगता है उनके लिये ज्ञान सर की लम्बी रचना यात्रा में से चंद रचनायें चुनना फूलो की टोकरी में से चंद बीज के दाने चुनने जैसा रहा होगा. तुम ज्ञानू हम प्रेमू पढ़ा मैं प्रेम जनमेजय जी की भावनाओ को आत्मसात करता रहा. वे लिखते हैं ज्ञान व्यंग्ययात्रा का घनघोर प्रशंसक है, ज्ञान जी लिखते हैं प्रेम सक्षम होते हुये भी तिकड़मी नहीं है. मुझे लगा जैसे सी सा झूले के दो छोर पर बैठे दो व्यक्ति एक दूसरे को आंखों में आंखे डाल बड़ा साफ देख रहे हों.सुभाष चंदर जी,  हरीश नवल जी, सूर्यबाला जी, गिरीश पंकज जी,  पंकज प्रसून जी, प्रभु जोशी जी, रामकिशोर उपाध्याय जी, डा हरीश कुमार सिंह,  अरुण अर्णव खरे जी, श्रवण कुमार उर्मलिया जी के लेख पठनीय हैं. ज्ञान जी का उपन्यास नरक यात्रा बहु चर्चित रहा है उसकी कांति कुमार जैन जी की समीक्षा, मरीचिका पर मधुरेश जी की समीक्षा, हम न मरब पर कैलाश मण्डलेकर जी की समीक्षा महत्वपूर्ण चयन है. अंक में प्रस्तुत सारे चित्र डा ज्ञान का जीवन एल्बम हैं. पारिवारिक चित्र, सम्मान के चित्र, पद्मश्री ग्रहण करते हुये चित्र, अनेक व्यंग्यकारो के साथ के चित्र सब दस्तावेज हैं. समग्र टीप की है विजी श्रीवास्तव जी ने जिसे पढ़कर अभीभूत हूं. मैं अट्टहास लम्बे समय से पढ़ता रहा हूं, जबलपुर में इसके एक अंक के विमोचन का आयोजन भी कर चुका हूं, पर निर्विवाद लिख सकता हूं कि अट्टहास का डा ज्ञान चतुर्वेदी केंद्रित अक्टूबर २०२० अंक पिछले अनेक वर्षो के अंको में सर्वश्रेष्ठ है. जिसके लिये अट्टहास, अनूप जी, शांतिलाल जी, ही नही इसका हर पाठक बधाई का पात्र है. मुझे लगता है जो भी व्यंग्य प्रेमी इसे पढ़ेगा संदर्भ के लिये मेरी तरह संग्रहित जरूर करेगा.

 

चर्चाकार  .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

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हिन्दी साहित्य – ☆ पुस्तक चर्चा ☆ है हिन्दी हमारी बोली – इफ्तखार “बशर” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा  इफ्तखार अहमद खान बशर  जी की पुस्तक “है हिन्दी हमारी बोली “ पर  पुस्तक चर्चा। ) 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ है हिन्दी हमारी बोली – इफ्तखार “बशर” ☆  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

अंधेरे आकाश में जैसे बिजली कौंध कर पूरे परिवेश को प्रकाशित…कर देती है उसी तरह अपनी भाव तरंग को वाणी देकर कवि खुद अपने साथ अनेकों श्रोताओं और पाठकों को प्रफुल्लित कर देते हैं. यह कुशलता बहुतों में जन्मजात होती है.

इफ्तखार अहमद खान बशर में यह रूचि मैंने उनके छात्र जीवन में ही देखी थी यह उल्लेख अपनी पुस्तक है हिंदी हमारी बोली में प्रारंभ में ही उन्होंने किया है. अपने शासकीय सेवा काल में  विभिन्न कार्य भार  से दबे होने के कारण उनके कवि के मनोभावों ने अभिव्यक्ति कम पाई. सेवा से अवकाश पाकर उन्होंने अपनी साहित्यिक प्रवृत्ति को पुनः अपनाया और लेखन  किया, यह एक अच्छी बात है, साहित्य प्रेम की रुचि खुद को आनंद देती है. साथ ही अनेकों पाठकों को भी सुख देते हुए सुखी करती है.

अपनी पुस्तक के प्रकाशन के कुछ समय बाद उन्होंने मेरी कुछ गजलो व कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद कर पुस्तक सहित जब मुझे प्रेषित किया तो मैं आश्चर्यचकित रह गया उनकी पुस्तक में उनकी 40 गजलें, कविताएं व दोहे हैं. पुस्तक को पढ़कर मैंने उनके मनोभावों को समझने का प्रयास किया है. उनके बहुरंगी भावों को पढ़कर अच्छा लगा. कवि हृदय मनोभावों से लबरेज है. वे लिखते हैं

सूझते हैं मिसरे शायरी के मुझको

मुखड़े बहुत सारे मेरे जहन में है

पुस्तक का नाम ही कवि के मन की पवित्रता राष्ट्रप्रेम तथा मातृभाषा हिंदी के प्रति लगाव की गवाही देता है.

यह आरती की थाली है हिंदी हमारी बोली

अनुपम सुखद निराली है हिंदी हमारी बोली

 

कवि के मन में प्रकृति दर्शन की ललक दिखती है

इस दुनिया में जन्नत की अगर कोई निशानी है

ये हरियाली शाबादी फिजा की रूप रानी है

शरद पूर्णिमा की शोभा उसे आकर्षित करती है , मनमोहक लगती है उसे देख वे लिखते हैं

लो धवलता छा रही है इस गगन की नीलिमा में

है निखरती छटा शशि की इस शरद की पूर्णिमा में सामाजिक त्योहार भाईचारे और मन मिलन का संदेश देते हैं दीपावाली का त्यौहार प्राचीन काल से यही संदेश देता आ रहा है,  उन्होंने लिखा है

हुमायुं लक्ष्मी पूजा विधि विधान के साथ

करवाता था राज में दे दान खुले हाथ

सामाजिक व्यवहार चलते जाते हैं बदलाव नहीं दिखते

हुश्न के तेवर नहीं बदले जेवर बदलते जा रहे हैं

स्वार्थ पूर्ण व्यवहार बेईमानी कर्तव्य निष्ठा का अभाव भी वैसा ही चल रहा है

उनसे मुफ्त में उम्मीद क्या करें

रहनुमाई मिली जिनको कुर्सी खरीदकर

या

लोगों को तुम्हारी रोटियां सियासत की गोटियां हैं

ब्रिटिश शासकों ने बर्बरता से देश भक्तों का शिकार किया

घात की नज़दीकियों की अक्सर  फिकर है

झाड़ियों की ओट में आदिम शिकारी चल रहा है

 

अनेकों बहुरंगी भावों का गुलदस्ता उनकी यह कृति है.

आशा है भविष्य में भी कुछ और अच्छा उनसे पढ़ने को मिलेगा. गजलो का अंग्रेजी अनुवाद भी बहुत अच्छा है.

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 38 ☆ ललित निबंध संग्रह – तन रागी मन बैरागी – डा देवेन्द्र जोशी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  डा देवेन्द्र जोशी जी  के  ललित निबंध संग्रह  “तन रागी मन बैरागी” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 38 ☆ 

तन रागी मन बैरागी (ललित निबंध संग्रह)

लेखक –  डा देवेन्द्र जोशी 

प्रकाशक – निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स आगरा

मूल्य  १२५ रु

पृष्ठ ११२

☆ पुस्तक चर्चा –ललित निबंध संग्रह   – तन रागी मन बैरागी  – लेखक – डा देवेन्द्र जोशी  ☆

मन बैरागी, तन अनुरागी, क़दम-क़दम दुश्वारी है

जीवन जीना सहज न जानो, बहुत बड़ी फ़नकारी है

… निदा फाजली

जीवन  का भाव  पक्ष सदैव मर्मस्पर्शी होता है.  जब अपने स्वयं के अनुभवो के आधार पर कोई ललित निबंध लिखा जाता है तो वह और भी महत्वपूर्ण बन जाता है व पाठक को सीधा हृदयंगम हो, उसके अंतः को प्रभावित करता है.  ऐसे निबंध पाठक को जीवन दृष्टि देते हैं, उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं.  तन रागी मन बैरागी में संकलित प्रत्येक निबंध मैंने फुरसत से पढ़ा है, मैं कह सकता हूं कि ये निबंध डा जोशी की वैचारिक अभिव्यक्ति हैं, जो पाठक को चिंतन की प्रचुर समृद्ध सामग्री व दिशा देते हैं.  निदा फाजली के जिस शेर से मैंने अपनी बात शुरू की है, उसके बिल्कुल अनुरूप इस पुस्तक का प्रत्येक निबंध जीवन की फनकारी सिखलाता है.  लेखक डा देवेन्द्र जोशी चेतावनी के स्पष्ट स्वर में प्रारंभ में ही लिखते हैं, जिनमें जिंदा रहने का अहसास मर चुका है कृपया वे इस पुस्तक को न पढ़ें, सचमुच संग्रह के सभी निबंध जिंदगी के बहुत निकट हम सबके बिल्कुल आसपास के विषयों पर हैं.  अनावश्यक विस्तार  से मुक्त, छोटे छोटे निबंध हैं,  शीर्षक की सीधी वैचारिक अनुकरणीय विवेचना है.  पहला संस्करण हाल ही प्रकाशित हुआ है.

हिन्दी में ललित निबंध को  विधा के स्वरूप में अभिस्वीकृति का साहित्यिक इतिहास भी रोचक व विवादास्पद रहा है, लगभग वैसा ही जैसा व्यंग्य को विधा के रूप में स्वीकार करने की यात्रा रही है.  अब ललित निबंध की सात्विक सत्ता भी प्रतिष्ठित हो चुकी है, और व्यंग्य की भी.  डा देवेंद्र जोशी दोनो ही विधाओ के साथ विज्ञान लेखन के भी पारंगत सुस्थापित विद्वान हैं. वे कवि हैं , संपादक है, मंच संचालक हैं, शोधार्थी हैं.  बिना उनसे मिले मैं कह सकता हूं कि  बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डा जोशी सबसे पहले एक अच्छे इंसान हैं, क्योंकि ऐसा लेखन एक सदाशयी व्यक्ति ही कर सकता है.

उनमें सूत्र वाक्य लेखन की विशेषता है जैसे वे लिखते हैं ” निर्धन के अभाव की पूर्ति तो धन से संभव है, पर लालच और धन लोलुप प्रवृत्ति की पूर्ति कोई नहीं कर सकता”, या ” लक्ष्यहीन जीवन को जीवन की श्रेणि में नहीं रखा जा सकता‍‌. . चलना ही जिंदगी “, ” व्यक्तित्व विकास की प्रथम सीढ़ी है. .आत्म साक्षात्कार ” मैंने पुस्तक पढ़ते हुये ऐसे अनेक वाक्यो को रेखांकित किया है, ये उद्वरण  केवल इसलिये कि आप की जिज्ञासा पुस्तक पढ़ने के लिये जागृत हो.

जिन विषयो पर लेखक ने निबंध लिखे हैं उनमें ये शीर्षक शामिल हैं, राष्ट्रीयता का बोध, समय से पहले भाग्य से ज्यादा, माँ, प्यार का अहसास,युवा उम्र का रोमांच,रिश्तों की गर्माहट, स्वभाव के प्रतिकूल, बड़प्पन,सामाजिक सरोकार, पद की गरिमा, बाल मनोविज्ञान,सफलता का जश्न, अवसाद के क्षण,अकेलापन, श्मशान बैराग्य आदि आदि कुल तीस हम सबके जीवन के रोजमर्रा के विषय हैं.

प्रत्येक निबंध विषय की व्याख्या करते हुये एक निर्णायक मार्गदर्शक बिन्दु पर अंत होता है, उदाहरण स्वरूप वे बचपन की मीठी यादें निबंध का अंत इस शेर से करते हैं

घर से मस्जिद बहुत दूर है चलो यूं करें

किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये

अकेलापन निबंध का अंतिम वाक्य है ” अकेलापन हमारी कमजोरी बने उसके पहले उसे अपनी ताकत बनाना सीख लें.  ”

भाषा के लालित्य के मोती, भाव,  शिल्प के स्तर पर बुने हुये सभी निबंध प्रेरक हैं. अभिधा में सशक्त मनोहारी अभिव्यक्ति के सामर्थ्य के चलते  लेखक डा देवेन्द्र जोशी को श्रेष्ठ निबंधकार कहा जाना  सर्वथा तर्कसंगत है. यह  कृति हर उस पाठक को अवश्य पढ़नी चाहिये जो जीवन के किसी मोड़ पर किंकर्तव्य विमूढ़ हो, और इसे पूरा पढ़कर मैं सुनिश्चित हूं कि उसे अवश्य ही निराशा से मुक्ति मिलेगी व उसका भविष्य प्रदर्शित हो सकेगा.  इस दृष्टि से कृति जीवन की सफलता के सूत्र प्रतिपादित करती है.  संदर्भ हेतु संग्रहणीय व बार बार पठनीय है.  अभी ऐसी कई पुस्तकें लेखक से हिन्दी साहित्य को मिलें इसी शुभाशंसा के साथ.

 

समीक्षक .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 37 ☆ व्यंग्य संग्रह – दिमाग वालों सावधान  – श्री धर्मपाल जैन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री धर्मपाल जैन जी  के  व्यंग्य -संग्रह  “दिमाग वालों सावधान ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 37 ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य-संग्रह   – दिमाग वालों सावधान – व्यंग्यकार – श्री धर्मपाल जैन ☆

दिमाग वालों सावधान

व्यंग्यकार धर्मपाल जैन

किताबगंज प्रकाशन गंगापुर सिटी

ISBN 9789389352634

 

किसी भी किताब में सर्वप्रथम जो चीज पाठक को आकर्षित करती है, वह होता है उसका नाम. व्यंग्य की किताबों के लिये अनेक व्यंग्य लेखो में से एक नाम के आधार पर किताब का नाम रखना सहज परम्परा है. इसी लीक पर चलते हुये व्यंग्यकार धर्मपाल जैन जी ने अपनी नई पुस्तक का नाम दिमाग वालों सावधान रखा है. नाम ध्यान आकर्षित करता है. प्रकाशक ने बिना त्रुटि सम्यक आवरण डिजाइन करवाकर, अच्छे गेटअप में पुस्तक प्रस्तुत की है. पेपरबैक का मूल्य मात्र २५० रु है. कहने का मतलब है कि बुक स्टाल पर मुँह दिखाई में तो पाठक किताब से रिश्ता बना ही सकता है.

अब जब कृति घर आ जाये और तकिये के नीचे तक पहुंच जाये तो उसके कलेवर पर कुछ चर्चा हो जाये.

बैक कवर पर बिंदु रूप लेखक परिचय से समझ आता है कि यह लेखक की दूसरी व्यंग्य की किताब है. किसी की कोई भूमिका नही, कोई आत्मकथन नही. सीधी बात. कुल जमा ५१ सनसनाती व्यंग्य रचनायें समेटे हुये है पुस्तक.

दिमाग चाटने वालो पर है शीर्षक व्यंग्य. छोटे छोटे वाक्य, समझ आने वाली भाषा, प्रभावी शैली का अच्छा व्यंग्य है. कई व्यंग्य ऐसे हैं जिन शीर्षको से मै कई व्यंग्यकारो के लेख पढ़ चुका हूं, बल्कि कई शीर्षको पर तो स्वयं मेरे भी लेख हैं, जैसे झंडा ऊंचा रहे हमारा, अस मानुस की जात, कबिरा खड़ा बाजार में, हिन्दी डे, इन टापिक पर मैं भी व्यंग्य लिख चुका हूं. मतलब साफ है कि व्यंग्यकारों की पीड़ा समान होती है.

“एल्लो सरपंच जी क्या सांड से कम होवे हैं ” ऐसा लेखन केनेडा में बसे हुये व्यंग्यकार लिखे तो समझ लें कि वह जमीन से जुड़ा हुआ आदमी है. यूं भी विदेश में रहकर वहाँकी चकाचौंध से भ्रमित हुये बिना देश से, हिन्दी से, व्यंग्य से सरोकार बनाये रखने के चलते धर्मपाल जी  अपने रचना धर्म का पालन करते नजर आते हैं.

चंद्रयान ३ से भारत प्रधानमंत्री से संवाद शैली में मारक व्यंग्य है. किस तरह चुनाव जीतने में हर तरह की उपलब्धियों का राजनीति उपयोग करती है, यह उजागर करता व्यंग्य है. कमियो की बात करें तो इतना ही कहूंगा कि अनेक स्थानो पर अमिधा में बातें कहने की जगह प्रतीको में बात की जाने की संभावना है, अगले संग्रहों में जैन साहब से व्यंग्य को ओर उम्मीदें हैं.

सबकी हो सबरीमाला, साहित्य की सही रेसिपी, अब मेरे घर में देवता रहते हैं, बापू का आधुनिक बंदर आदि रचनायें मुझे बड़ी पसंद आई. कुल जमा किताब  पढ़े जाने के बाद तकिये के नीचे से निकलकर, बुकशैल्फ में शोभायमान करने योग्य है.

 

चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 36 ☆ व्यंग्य संग्रह – बड्डे गढ़्डे और चौगड्डे – श्री रमाकांत ताम्रकार☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री श्री रमाकांत ताम्रकार जी  के  व्यंग्य -संग्रह  “बड्डे गढ़्डे और चौगड्डे ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 36 ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य-संग्रह   – बड्डे गढ़्डे और चौगड्डे – व्यंग्यकार – श्री रमाकांत ताम्रकार ☆

यह हम व्यंग्य यात्रियो का अपनापन ही है कि जहां सामान्यतः लोग स्वयं को छिपाकर रखना चाहते हैं, व एक आवरण में लपेट कर अपना रुपहला पक्ष ही सबके सम्मुख रखते हैं वही अपनी ही विवेचना करवाने के लिये व्यंग्य यात्री सहजता से ग्रुप में सबके सम्मुख उत्साह से  प्रस्तुत रहते हैं. रमाकांत ताम्रकार जी की सद्यः प्रकाशित कृति बड्डे गढ़्डे और चौगड्डे के शीर्षक में जबलपुर की स्थानीयता प्रतिबिंबित होती है .जबलपुर में जाने अनजाने हरेक को बड्डे संबोधन सहज है.  श्री रमाकांत ताम्रकार जी जबलपुर से हैं, आंचलिकता की महक उनके कई व्यंग्य लेखो में दृष्टिगत होती है. ३४ विभिन्न विषयो पर उन्होने व्यंग्य को माध्यम बनाकर चुटीली, रोचक प्रस्तुतियां इस पुस्तक में की हैं. इनमें से कई व्यंग्य उनके श्रीमुख से सुनने के सुअवसर भी मिले हैं. जैसे दो रुपये दे दो भैया, जरा खिसकना, राजनीति बनाम डकैती आदि. वे प्रवाहमय लिखते हैं. वे राजनीतिज्ञो को शेर की खाल में भेड़िया लिखते हैं, उन्हें हद्डी विहीन सर्प बताते हैं. हमने सीखा है कि व्यंग्य में केवल इशारो में बात होनी चाहिये पर वे सीधे मोदी जी का नाम लेकर लिखने का दुसाहस करने वाले व्यंग्यकार हैं. वे भ्रष्टाचार के रुपयों को बापू का सर्टिफिकेट लिखते हैं. आशय है कि व्यंग्य के माध्यम से समाज की विसंगतियो पर प्रहार की यात्रा में वे हम सभी के सहगामी हें. मेरी मंगल कामनायें उनके साथ हैं ।

चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 35 ☆ व्यंग्य संग्रह – आप कैमरे की नजर में हैं – श्री हरीश कुमार सिंग ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री हरीश कुमार सिंग जी  के  व्यंग्य -संग्रह  “आप कैमरे की नजर में हैं ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 35 ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य-संग्रह   – आप कैमरे की नजर में हैं  ☆

पुस्तक –  आप कैमरे की नजर में हैं ( व्यंग्य-संग्रह) 

व्यंग्यकार – श्री हरीश कुमार सिंग 

पृष्ठ संख्या  – 128

 ☆  व्यंग्य– संग्रह – आप कैमरे की नजर में हैं – श्री हरीश कुमार सिंग  –  चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

इस सप्ताह व्यंग्य के सशक्त सुस्थापित हरीश सिंग की नई व्यंग्य कृति नजर अपनी अपनी पढ़ने का अवसर मिला .  अखबारो, पत्र पत्रिकाओ सोशल मीडिया में इनमें से अधिकांश पर मेरी नजर पड़ चुकी हैं . जो व्यंग्यकार केवल १२८ पृष्ठो में ४८ प्रभावी व्यंग्य लिखने की क्षमता रखता है उसे पढ़ना कौतुहल से भरपूर होता है . बड़े कम शब्दो में टू द पाईंट व्यंग्य लिखना हरीश जी की खासियत समझ आती है . वे व्यंग्य समूहो, टेपा सम्मेलन जैसे आयोजनो से जुड़े हुये लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं .संपादको व पाठको को उनके समसामयिक व्यंग्य पसंद आते हैं .

संग्रह  के व्यंग्य विषय देखिये मार्निग वाक, ओपनिंग आफ न्यू हास्पिटल, बच्चों हम शर्मिंदा हैं, अफसर कल्चर, संकट में विचारधारा, व्हाट्सएप, मी टू, आप कैमरे की नजर में हैं, रिश्वत ड़िश्तेदार और राजनीति, हिंदी की विनती, लिव इन रिलेशन, शीर्षक व्यंग्य नजर अपनी अपनी, काव्य गोष्ठी, बिन बाबा चैन कहां, हनी ट्रैप, ये सारे ऐसे विषय हैं जो हमारे परिवेश या बाक्स न्यूज के रूप में हम सबकी नजरों से गुजरे हैं . इन विषयो को अपने मन के डार्करूम में डेवेलप कर एक चित्रमय व्यंग्य झांकी दिखाने का काम घटना के तीसरे चौथे दिन ही हरीश जी की कलम करती रही . फिर संकलित होकर पुस्तक बन गई .

सीमित शब्द सीमा में सहज घटनाओ से उपजी मानसिक वेदना  को वे प्रवाहमान संप्रेषण देते हैं, पाठक जुड़ता जाता है, सरल कटाक्षो का मजा लेता है, जो समझ सकता  है वह व्यंग्य में छिपा अंतर्निहित संदेश पकड़ लेता है, व्यंग्य पूरा हो जाता है .

 

चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक आत्मकथ्य: ☆ मृग तृष्णा ☆ – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

आत्मकथ्य: मृग तृष्णा  – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

आत्मकथ्य:  ‘मृग तृष्णा’ पुस्तक समाज के विभिन्न पहलुओं पर मार्मिक कविताओं का संकलन है| प्रत्येक कविता दिल को छू लेने वाली है| ‘आजाद हो गए मोती’ में कैसे संयुक्त परिवार का बिखराव हुआ और आज सब क्या महसूस करते हैं इसका बहुत भावुक वर्णन है| ‘रिश्तों की हवेली’ में पहले रिश्ते कितने संजीदा होते थे उसका भावुक वर्णन किया है| ‘मृग तृष्णा’ कविता में दर्शाया है की इंसान जीवन भर अपनी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है,उसके पीछे बहुत कुछ खो देता है मगर फिर भी अंतिम क्षण तक वो अपनी इच्छाओं से पार नहीं पा सकता | अन्य कविताएं मसलन ‘रिश्तों में जमी बर्फ’, ‘शब्द की गाथा’, ‘याद’, ‘खुशियों का झरना’ एवं ‘कहो तो चले अब’ दिल को अंदर तक झझकोरने वाली है| सैनिकों के सम्मान में भी कुछ कविताएं है | ‘मंजर शहीद के घर का’ देश के सैनिकों एवं उनके परिवार पर बहुत भावुक, मार्मिक एवं दिल को छू लेने वाली कविता है| पुस्तक की सभी 50 कविताऐं सामाजिक,पारिवारिक एवं देश के सैनिकों पर मार्मिक, भावुक एवं आम आदमी की जिंदगी का प्रतिबिम्ब है | लेखक का परिचय लेखक की एक सामाजिक प्रेरणा की कविता पुस्तक ‘सफर रिश्तों का’ अमेज़न पर उपलब्ध है| रंगमंच प्रकाशन की साझा संकलन-I में कविताएं प्रकशित हो चुकी है| विंग वर्ड राष्ट्रीय स्तर की कविता प्रतियोगिता में सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट का अवार्ड प्राप्त किया है| अनेक रचनाएं विभिन्न पत्रिकाओं में छप चुकी हैं| लेखक की कुछ और पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होने जा रही है| प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  *सफर रिश्तों का* तथा* मृग तृष्णा* कविता पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही है।
श्री यतीन्द्र गोविल, गीतकार
आपके एक गीत “ए परिंदे आसमान में दूर कहाँ तुम जाते हो” को श्री यतीन्द्र गोविल जी (उदयपुर, राजस्थान) ने स्वर दिया है। श्री गोविल जी 81 वर्ष के हैं और आपके आकाशवाणी उदयपुर से 1984 से 2000 तक गीत प्रसारित होते रहे थे।  आपके यूट्यूब और फेसबुक पर अब तक 2670 गीत उपलब्ध हैं और निरंतर बढ़ाते ही जा रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर श्री यतीन्द्र गोविल जी का जज्बा निश्चित ही हमें उत्साह प्रदान करता है।
ई- अभिव्यक्ति की ओर से श्री गोविल जो को हार्दिक शुभकामनाएं। 
आप श्री माथुर जी का उपरोक्त गीत निम्न लिंक पर सुन सकते हैं –

मृग तृष्णा से एक अत्यंत भावप्रवण  कविता >>>

☆ ढूंढ़ रहा हूँ रफूगर ☆

उधड़ गयी है जिंदगी चारों तरफ से,

पैबन्द जगह-जगह मैंने खुद लगाए,

अब हर तरफ पैबन्द लगी नजर आती है जिंदगी ||

 

ढूंढ़ रहा हूँ शायद कोई रफूगर मिल जाये,

जो जिंदगी को रफू कर दे,

जगह-जगह से उधड़ी हई नज़र आती है जिंदगी ||

 

जितना ज्यादा संभल कर कदम रखता हूँ,

उतनी ही ज्यादा उलझ कर,

और ज्यादा उधड़ी हई नज़र आती है जिंदगी ||

 

काश ! कोई जिंदगी का रफूगर मिल जाता,

जो एक-एक रिश्तों को मिला कर,

रफू कर देता तो पहले सी नज़र आ जाती जिंदगी ||

 

फूलों की बजाय मैं कांटों में उलझ गया,

काश कांटों की जगह,

फूलों से उलझ जाता तो फूलों सी महक जाती जिदगी ||

 

श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी की पुस्तक सफर रिश्तों का  निम्न लिंक्स पर उपलब्ध हैं :

Amazon India(paperback and Kindle): सफर रिश्तों का
AMAZON (INTERNATIONAL) : 1।  सफर रिश्तों का  2। सफर रिश्तों का 
AMAZON (KINDLE EDITION INTERNATIONAL) : सफर रिश्तों का
KOBO.COM : सफर रिश्तों का

 

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 34 ☆ व्यंग्य संग्रह – बारात के झम्मन – श्री सुनील जैन राही ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री सुनील जैन राही जी  के  व्यंग्य -संग्रह  “बारात के झम्मन” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

पुस्तक चर्चा के सम्बन्ध में श्री विवेक रंजन जी की विशेष टिपण्णी :- पठनीयता के अभाव के इस समय मे किताबें बहुत कम संख्या में छप रही हैं, जो छपती भी हैं वो महज विज़िटिंग कार्ड सी बंटती हैं ।  गम्भीर चर्चा नही होती है  । मैं पिछले 2 बरसो से हर हफ्ते अपनी पढ़ी किताब का कंटेंट, परिचय  लिखता हूं, उद्देश यही की किताब की जानकारी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचे जिससे जिस पाठक को रुचि हो उसकी पूरी पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता जगे। यह चर्चा मेकलदूत अखबार, ई अभिव्यक्ति व अन्य जगह छपती भी है । जिन लेखकों को रुचि हो वे अपनी किताब मुझे भेज सकते हैं।   – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 34 ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य-संग्रह   –  बारात के झम्मन ☆

पुस्तक –  बारात के झम्मन ( व्यंग्य-संग्रह) 

व्यंग्यकार – श्री सुनील जैन राही

प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर

मूल्य – रु 150/- पेपर बेक

ISBN 9789388167741

☆  व्यंग्य– संग्रह – बारात के झम्मन – श्री सुनील जैन राही –  चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

इस सप्ताह लाकडाउन में पढ़ा खूब पढ़ा. सुनील जैन राही  की व्यंग्य कृति बारात के झम्मन पूरी पढ़ डाली. मजा आया. समीक्षा बिल्कुल नहीं करूंगा, हाँ कंटेन्ट पर चर्चा जरूर करूंगा,   जिससे आप की भी उत्सुकता जागे और आप किताब का आर्डर करने के लिये मन बना लें. सुनील जी स्वयं एक स्थापित समीक्षक हैं, वे स्वयं सैकड़ो किताबों की समीक्षा लिख चुके हैं.  उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक बोधि प्रकाशन से छपी है, त्रुटि रहित संपादन, सुंदर प्रस्तुति बोधि की खासियत है. जन संस्करण अर्थात पेपर बैक संस्करण है.

झम्मन वह साधारण सा बी पी एळ पात्र है जिसके माध्यम से सुनील जी समाज की विसंगतियों को हमें दिखाते हैं. झम्मन की जिंदगी की इन विडम्बनाओ को हम रोजमर्रा अपनी खुद की आपाधापी में खोये रहने के चलते अनदेखा करते रहते हैं. ऐसी विसंगतियां व्यंग्यकार के आदर्श समाज के स्वप्न में उसे कचोटती हैं,और वह अपनी सरल प्रवाहमान शैली में पाठक को अपने पक्ष में बहा ले जाता है. यही लेखकीय निपुणता उनकी सफलता है.

बारात के झम्मन किताब का शीर्षक व्यंग्य ही पहला लेख है. इस छोटे से व्यंग्य में बारातों में लाईट के प्रकाश स्तंभ उठाकर चलने वाले झम्मन की मनोदशा के चित्र अपनी विशिष्ट शैली में सुनील जी ने खिंचे हैं. सामान्यतः हम देखते ही हैं कि सजा धजाकर नाच गाने के साथ बारात को दरवाजे तक लाने वाले, लाईट के हंडे पकड़ने वाले गरीब दरवाजे से ही भूखे लौट जाते हैं. सैकड़ो भरे पेट अतिथियों को तो तरह तरह के व्यंजन परोसे जाते हैं, किंतु ये सारे गरीब झम्मन लाइट दिखाते नाचते हुये बारातियों पर लुटाये जा रहे रुपये बटोरते रह जाते हैं. यदि इस व्यंग्य को पढ़कर कुछ लोगों के मन में भी यह विचार आ जावे कि बेटी के विवाह के शुभ अवसर पर इन गरीबों को भी खाने के पैकेट ही बांट दिये जाने का लोकाचार बन जावे तो व्यंग्य का उद्देश्य मूर्त हो जावे. वे गरीबों के उस पक्ष पर भी प्रहार करने में संकोच नही करते जो उन्हें नागवार लगता है “झम्मन का दारू चिंतन”, मुफ्तखोर झम्मन, युवाओ को अब रोजगार नही रेवड़ी चाहिये ऐसे ही व्यंग्य हैं.

१२० पृष्ठीय किताब में ४७ ऐसे ही संवेदनशील व्यंग्य प्रस्तुत किये गये हैं. अधिकांश विभिन्न वेबसाइट या प्रिंट मीडीया में छप चुके हैं, किंतु विषय ऐसे हैं कि उनकी प्रासंगिकता दीर्घ कालिक है, और इसलिये इन्हें पुस्तक रूप में प्रकाशन का में स्वागत करता हूं.

कुछ शीर्षक सहज ही अपना मनतव्य उजागर करते हैं यथा चूना हिसाब से लगायें, चुनाव में बगावतियों और बारात में जीजा फूफा की पूंछ टेढ़ी होती है, अमरूद और चुनावी विकास दोनो सीजनल हैं, हाथ जोड़ने का मौसम है अभी वो बाकी ५ साल आप, देश में लोकतंत्र की इन विडम्बनाओ पर मैने अनेक व्यंग्यकारो के कटाक्ष पढ़े हैं, किन्तु जिस सुगमता से सुनील जी हमारे आस पास से उदाहरण उठाकर अपनी बातें कह देते हें वह विशिष्ट है. झम्मन इस बाजार में नेता जी बिक गये हैं सरकार में, हार्स ट्रेडिंग पर जोरदार प्रहार है. फेसबुक पर टपकते दोस्त सोशल मीडिया की हम सब की अनुभूत कथा है. गधे को प्रतीक बनाकर भी कई बेहतरीन व्यंग्य सुनील जी ने सहजता से लिख डाले हैं जैसे होली में गधो का महत्व, राजनीति की गंगा में गधों का स्नान, क्या चुनाव बाद गधो की लोकप्रियता बनी रहेगी ?

मुझे यह व्यंग्य संग्रह कहीं गुदगुदाता रहा, कहीं सोच में डालने में सफल रहा, कहीं मैने खुद के देखे पर अनदेखे दृश्य सुनील जी की लेखनी के माध्यम से देखे. मेरा आग्रह है कि यदि इसे पढ़ आपको उत्सुकता हो रही हो तो किताब बुलवाकर पढ़ डालिये, सारे व्यंग्य पैसा वसूल हैं.

 

चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

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