हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆ आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘वृद्धावस्था ‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆

? आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ? ?

?

हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन रूपी रथ के चार पहिये माने जाते हैंl

1-ब्रम्हचर्य

2-ग्रहस्थ

3- वानप्रस्थ

4- सन्यास

वृद्धवस्था शरीर में होने वाला प्राकृतिक परिवर्तन हैl इस समय व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती हैl शरीर में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैंl साथ ही ऊर्जा क्षक्ति का क्षय होना शुरु हो जाता हैl

आज के समय में वानप्रस्थ की आयु 70 वर्ष हैl इस अवस्था में आते आते मानव के मन की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती हैl उसे अपनों से ही असुरक्षा, डर, संकोच के साथ निर्भरता का भाव झकझोर देता हैl वहीं वह कुछ नया करने की तमन्ना भी जगाए रखता हैl जो उसने युववस्था में नहीं किया उसे ही करने का निश्चय करता हैl

आज समाज वानप्रस्थ के पश्चात् सन्यास लेने की बात करता हैl पर क्या आज की परिस्थिति में सन्यास लेना सम्भव है?? यदि आदमी घर बार छोड़ भी दे तो क्या वह वास्तविकता में जंगल में रह पायेगा?? जंगल…… कौन सा जंगल?? प्राकृतिक घना पेड़ों से भरा जंगल ?? पर वह तो देखने में बहुत कम मिलता हैl आज तो जहाँ तक दृष्टि जाए वहाँ तक सीमेंट और कोंक्रीट के ही जंगल देखने को मिलते हैंl

आज की चकाचौध की दुनिया में वानप्रस्थ होना ही असम्भव सा है तो सन्यास तो बहुत दूर की बात हो गईl

आज वृद्धवस्था में हमें आयुनुसार स्वयं को ढालना बहुत जरूरी हो गया हैl वानप्रस्थ अर्थात मोहमाया से अलिप्त होने की शुरुवात और अपने अंतिम गंतव्य को ध्यान में रख अंतर्मुख होने की प्रक्रियाl सन्यास आश्रम हेतु आपको कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं अपितु संसार में रह कर ही यदि आपने अंतर्मुखी होने की कला सीख ली तो आप पूर्ण रूप से सन्यासी हो गएl

 ये जरूर है कि आयु बढ़ने के साथ हम सुविधाओं की तरफ ज्यादा बढ़ते हैं क्यूंकि हमें जीवन व्यापन में आसानी हो जाती हैl बढ़ती आयु के साथ कई वस्तुए तो आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैंl वास्तविकता तो ये हैं कई जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक हम पूर्णतः मोहमाया का त्याग नहीं कर सकतेl अगर देखा जाए तो ये मोह ही हमको हमारे परिवार से जोड़े रखता हैl आयु के इस पड़ाव में कुछ गतिविधियां, कुछ आदतें अपने आप ही छूट जाती हैंl कुछ लोग तो आज भी 60 वर्ष की आयु के पश्चात कार्य करना बंद कर देते हैं या स्वयं को रिटायर समझकर किसी काम करने में रूचि ही नहीं रखतेl पर मेरा ऐसा मानना है कि जब तक शरीर में प्राण है काम करते ही रहना चाहिएl और अपनी रूचि भी बनाए रखना चाहिएl इससे शरीर तंदुरुस्त और मन भी प्रेरणा से भरा होगाl पर कुछ लोग आयु बढ़ने से नहीं वरन इसलिए वृद्ध हो जाते हैं क्यूंकि उनके पास जीवन जीने का कोई लक्ष्य ही नहीं होताl सादगी से जीवन व्यतीत कीजिए पर सादगी का मतलब ये नहीं कि आप जीवन से पलायन कर, कंजूस बनकर, अकर्मन्यता से या असामान्य अवस्था से जीवन व्यापन करेंl व्यस्त रहना और कर्म करना दोनों ही बातें जहाँ मानव का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं वहीं समाज में सम्मान का पात्र भी बनाते हैंl अपनी उपयोगिता कभी भी खत्म ना करेंl स्वयं को संकुचित दायरे में रखने की जगह घरपरिवार और समाज हेतु सहयोग की भावना रखेंl वृद्धावस्था में हम जीवन को वास्तविकता में अधिक सार्थक और गरिमापूर्ण बनना चाहें तो संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे व्यापक बनाना होगाl

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९८ ☆ रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९८ ☆

☆ रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

आम नीम बरगद संग, पीपल की छाँव ।

महुआ और जामुन से, महकेगा गाँव ।।

*

टेसू के लाल फूल, चंपा सुहाय ।

गुलमोहर सेमल मन, सबका लुभाय ।।

☆

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति और जीवन-मूल्यों से जुड़ने का भी सुंदर अवसर है। जिस तरह राखी का धागा भाई-बहन के रिश्ते को प्रेम और जिम्मेदारी से बाँधता है, उसी तरह एक पौधा हमें धरती के साथ अपने रिश्ते की याद दिलाता है।

आज जब पेड़-पौधों की संख्या घट रही है और पर्यावरण अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब रक्षाबंधन को हरियाली से जोड़ना एक सार्थक पहल हो सकती है। इस वर्ष हम अपने भाई या बहन की कलाई पर राखी बाँधने के साथ एक पौधा भी लगा सकते हैं और उसे अपने रिश्ते की तरह सहेजने का संकल्प ले सकते हैं। नीम, पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला या कोई फलदार पौधा—हर पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा प्रेम-पत्र बन सकता है।

कल्पना कीजिए, जिस दिन भाई-बहन साथ मिलकर एक पौधा लगाएँ और कहें—“जैसे यह पौधा बढ़ेगा, वैसे ही हमारा स्नेह भी बढ़ता रहे”—तो रक्षाबंधन का अर्थ कितना व्यापक हो जाएगा। राखी का धागा कुछ समय बाद उतर जाएगा, लेकिन लगाया हुआ पेड़ वर्षों तक उस प्रेम की स्मृति बनकर खड़ा रहेगा।

प्रकृति भी तो हमारी बहन जैसी है—वह हमें छाया देती है, हवा देती है, फल-फूल देती है और बिना किसी अपेक्षा के हमारा जीवन सँवारती है। उसकी रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।

आइए, इस रक्षाबंधन एक नई परंपरा शुरू करें—एक राखी रिश्ते के नाम और एक पौधा प्रकृति के नाम। क्योंकि जब रिश्तों में प्रेम और धरती पर हरियाली होगी, तभी जीवन सचमुच सुंदर होगा।

भाव यही जन-जन के , मन में जगाएँ।

एक- एक पौधे को, घर में  लगाएँ ।।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७८ ⇒ वेदना निग्रह रस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वेदना निग्रह रस…“।)

?अभी अभी # १०७८ ⇒ आलेख – वेदना निग्रह रस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को। जहाँ महादेवी की वेदना पर प्रसाद के आँसू निकल आते हों, वहाँ बच्चन की मधुशाला किस काम की। जहाँ सूरज की रोशनी कम हो, और हरदम आसमान में काली घटा छाई रहे, ऐसे में शहनाई शोभा नहीं देती। कहीं किसी कोने में, कोई दिल का दीया अगर जला दे, तो मन को बड़ा सुकून मिलता है।

कहीं मीत ना मिला रे मन का, तो कहीं मिल के बिछड़ गई अंखियां, हाय रामा ! ऊपर वाले का खेल बड़ा निराला है। किसी की झोली में खुशियों की सौगात तो कहीं गम बेशुमार। मन करता है, अखबार में इश्तहार दे दिया जाए, गुमशुदा की तलाश ! हमारी खुशी कहीं खो गई है। उम्र नाजुक, हंसता हुआ नूरानी चेहरा, लाने वाले का शुक्रिया, मेहरबानी, मुंहमांगा इनाम।।

होठों पे आए खुशी, क्या मजाल है। दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं। छोटी सी गुड़िया हो तो उदासी ज़्यादा समय तक टिकती नहीं। बच्चों को बहलाना कितना आसान है। गुड़िया, हमसे रूठी रहोगी, कब तक ना हँसोगी, देखो जी, आई रे हँसी आई। देखो जी, आई रे हँसी आई। लेकिन बड़ों का मामला जरा टेढ़ा होता है।

गम की अंधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर, सुबह जरूर आएगी, सुबह का इंतजार कर। लेकिन जिसे सब्र नहीं, उसका क्या किया जाए। इंतजार और अभी, और अभी, और अभी। तुम्हारा इंतजार है।।

जब इंसान भीड़ में भी अकेला हो जाता है, किसी के साथ होता है, फिर भी कहीं खोया रहता है, तो वह दुनिया से नहीं, अपनों से नहीं, अपने आप से भी बहुत दूर चला जाता है। उसे न जाने क्यों ऐसा लगता है, ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं। सबमें शामिल हो मगर, सबसे जुदा लगती हो, सिर्फ हमसे ही नहीं, खुद से खफा लगती हो। शुभचिंतक कह उठते हैं, सीधा सादा, अवसाद का मामला है।

होठ पर लिए, दिल की बात हम। जागते रहेंगे और, कितनी रात हम। तुम्हारा इंतजार है। दिल बहल तो जाएगा, इस खयाल से। हाल मिल गया तुम्हारा, अपने हाल से।

रात ये करार की, बेकरार है।

तुम पुकार लो। तुम्हारा इंतजार है।।

क्या वेदना में भी रस होता है ! किसी दूसरे के दुख में दुखी होना अलग बात है और खुद को अंधेरे बंद कमरे में कैद करना अलग बात है। मुबारक और को खुशियाँ, मुझे गम से मोहब्बत है।

बहुत इच्छा होती है, ऐसे गमजदा लोगों को पकड़कर बाहर लाया जाए, उन्हें ऐसे लोगों से मिलाया जाए, जो वाकई दुःखी और लाचार हैं। कुएं में कूद जाने से बेहतर है उन लोगों को निकाला जाए जो कुएं में पड़े हुए हैं। दुख दर्द का कुआं, अवसाद का कुआं। जहाँ कोई झांकना पसंद नहीं करता ;

अंधेरे में जो बैठे हैं,

नज़र उन पर भी कुछ डालो

अरे ओ रोशनी वालों !

एक रोते बच्चे को हंसाना अधिक आसान है, क्योंकि वहाँ अभी सुख दुख के संस्कार संचित ही नहीं हुए हैं। हवा के झोंको की तरह खुशी आती जाती रहती है।

प्रकृति में इंसान ज्यादा उदास नहीं रह पाता। जब एक चिड़िया चहकती है, तो उदास मन में आशा की किरण चमकती है। बारिश की बूंदें कितने आंसुओं को धो डालती है। संगीत की स्वर लहरियां एक बार अंतस में प्रवेश कर जाएं, तो अनहद नाद गूंज उठता है।।

क्या है कोई ऐसा वेदना निग्रह रस, जो महादेवी की वेदना को कम कर सके। गीता का तो पहला अध्याय ही अर्जुन विषाद योग है। हम तो यही चाहते हैं ;

झूम झूम कर नाचो आज

गाओ खुशी के गीत,

हो …

आज किसी की हार हुई है

और किसी की जीत,

हो …

गाओ खुशी के गीत …

लगता है, गम हार गया

खुशी जीत गई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७७ ⇒ दूर के रिश्ते ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर के रिश्ते…“।)

?अभी अभी # १०७७ ⇒ आलेख – दूर के रिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या दूर के ढोल की तरह, दूर के रिश्ते भी सुहाने होते हैं ! रिश्ते भी ढोल की तरह ही तो होते हैं, रिश्तों में जीवन है, मिठास है, उत्सव है, परम्परा है। ढोल, रिश्तों को जश्न और धूमधाम से मनाने का ही तो प्रतीक है।

पास के रिश्तों का उत्सव पास के ढोल से ही मनाया जाता है। रिश्ता है तो ढोल है, ढोल है तो रिश्ता है। अगर रिश्ता नहीं, तो ढोल में पोल है।

रिश्तों में दरार आई, बेटा ना रहा बेटा, भाई ना रहा भाई। कोई नई बात नहीं ! पहले कहाँ हिंदू मुस्लिम और भारत पाकिस्तान था, हम ही तो कौरव पांडव भाई भाई थे। भारत में ही महाभारत था। जब भी पास के रिश्तों में फूट पड़ी है, दूर का रिश्ता पास आया है। कोई हमें लूटने बर्बाद करने तो कोई हमारा दिल जीतने। कोई हमारे आँसू पोंछता है तो कोई पीठ में छुरा भोंकता है।।

कोई करीबी इंसान क्यूँ अचानक जिन्दगी से बहुत दूर जाता है और कोई दूर का इंसान कब करीबी बन जाता है, दिल से अधिक यह देश, काल, परिस्थिति पर निर्भर करता है। दिल को ही परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है। परिस्थितियाँ कहाँ दिल की परवाह करती हैं।

दूर पास के रिश्तों में सामंजस्य ही तो खुशहाल जिंदगी का राज है। कभी ढोल के साथ हमें भी सबकी खुशी के लिए नाचना पड़ता है। तब ढोल के साथ कानों में शहनाई की आवाज भी गूंजती है, सबके साथ पांव थिरकने लगते हैं। पास के ढोल, पास के रिश्ते बड़े सुहाने लगते हैं। ।

इंसान पहले परिवार में प्यार तलाशता है। एक हँसते खेलते परिवार में कितना अपनापन लगता है। खुशियां दीवारों, खिड़की दरवाजों में समा नहीं पाती, घर के आसपास भी बिखर जाती हैं। महक रही फुलवारी। रिश्तों की डोर प्रेम से बंधी होती है। उधार की तरह स्वार्थ और नफ़रत भी प्रेम की कैंची है। जब करीबी रिश्तों में खटास आ जाती है तो दूर के रिश्ते तलाशे जाते हैं। जो दिल के करीब होता है, वही अपना कहलाता है।

इसी बीच रिश्तों की किताब में एक पन्ना और जुड़ गया जिसे फेसबुक नाम दिया गया। दूर के लोगों में कुछ करीबी नजर आने लगे। अचानक नए नए रिश्ते दस्तक देने लगे। मित्रता का संसार इतना वृहद भी हो सकता है, कभी कल्पना नहीं की थी।।

क्या पुस्तक खोलने से रिश्ते भी खुलते हैं, दूर के रिश्ते पास आने लगते हैं, दूर के ढोल सुहाने लगने लगते हैं। जिसे आभासी संसार नाम दिया गया है, वह क्या हमारी दिनचर्या का अंग नहीं बन गया है। कुछ आभासी रिश्ते तो परिवार में घुल मिल भी गए हैं। कौन कहता है, दूर के ढोल ही सुहाने होते हैं। जब इन रिश्तों की आवाज़ करीब आती है तो ये कानों में ही नहीं, मकानों में भी घुल मिल जाते हैं।

प्रेम एक ऐसा बंधन है, अगर निःस्वार्थ हो, तो मुक्त करता है।

सहमति, असहमति से परे होती है सच्ची दोस्ती, सच्चा प्यार, सच्चा रिश्ता। शर्तों पर नहीं निभाए जाते रिश्ते ! रिश्ते कभी अनफ्रेंड नहीं किए जाते, ब्लॉक नहीं किए जाते, बस निभाए जाते हैं। जब दूर के रिश्ते फेसबुक के जरिए पास आ सकते हैं, तो करीबी रिश्ते तो पहले से ही इतने करीब हैं। फिर रिश्तों के बारे में हम क्यों गरीब हैं। रिश्ते सुहाने हैं, ढोल सुहाने हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७६ ⇒ उड़न किस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उड़न किस …“।)

?अभी अभी # १०७६ ⇒ आलेख – उड़न किस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इस नश्वर संसार में उड़न खटोले से लगाकर उड़न परी और उड़न सिख के बीच इतनी उड़ती उड़ती चीजें हैं, कि इन्हें देखकर एक साधारण इंसान का तो सर ही चकरा जाए । क्या पता,कब कोई एलियन उड़न परी, उड़न तश्तरी से इस धरती पर उतर आए, जिसे देख उड़न दस्ता भी आश्चर्य में पड़ जाए और उसका एक एलियन किस,हमारे धरती के फ्लाइंग किस पर भारी पड़ जाए ।

जब एक मक्खी उड़ती हुई,आपके मुंह पर फ्लाइंग किस मारकर उड़ जाती है,तो आप उसका क्या बिगाड़ लेते हो । हमने वे दिन भी देखे हैं जब खटमल हमारा खून चूस रहे हैं,और डैंड्रफ के कारण हम अपना सर खुजा रहे हैं । भला हो, ऑल आउट, काला हिट, मच्छरदानी,पैंटीन शैंपू और लक्ष्मण रेखा का,जो हमें इन उड़ते मक्खी,मच्छर और रेंगती छिपकली, चींटी मकोड़े और कॉकरोचों से हमारा और हमारी बालों की रूसी का भी बचाव करती रहती हैं ।।

हर इंसान को उड़ती खबर और उड़ती नज़र से सावधान रहना चाहिए । कोई अच्छी बुरी खबर उड़ते उड़ते कहां पहुंच जाए,कहा नहीं जा सकता । वे दिन हवा हुए,जब उड़ते हुए शांतिदूतों के जरिए प्रेम संदेश और मित्रता संदेश भेजे जाते थे । सरकारी आदेश तो डुगडुगी पीटकर ही सुनाया जाता था। सुनो,सुनो, सुनो ! और सबको सुनना भी पड़ता था ।

फिर काम की खबरें भी बेतार के तारों के जरिए भेजी जाने लगी । बेतार की भाषा किसी गागर में सागर से कम नहीं होती थी । शब्द और अक्षरों में कोई भेद नहीं होता था । कई बार तो अर्थ का अनर्थ भी हो जाता था ।।

फिर आया सरस्वतीचंद्र का जमाना,जब ” फूल तुम्हें भेजा है खत में,फूल नहीं मेरा दिल है “,जैसे संदेश फूलों के जरिए भेजे जाने लगे । किसी भी पुरानी किताब में सूखा,मुरझाया कोई गुलाब का एक फूल कोई भूली दास्तान बयां करता नजर आता था ।

हमारे नीरज जी तो फूलों के रंग से ,और दिल की कलम से रोज ही पाती लिखते थे ।

आज तो स्थिति यह है कि इधर व्हाट्सएप पर संदेश लिखा जा रहा है,और उधर उन्हें उसकी भी खबर प्रसारित हो रही है । किस टाइप का प्रेम संदेश है यह,

जो लिखने से पहले ही बयां होने को लालायित है,उत्सुक है ।।

आसमान में उड़ते बादल भी विरही प्रेमियों के दिल का हाल जानते हैं । सावन के बादलों,उनसे ये जा कहो ,और ;

जा रे कारे बदरा,

सजना के पास ।

वो हैं ऐसे बुद्धू,

कि समझे ना प्यार ।।

हमारे आनंद बक्षी जी ने सावन को लाखों का बताया है,और नौकरी को दो टकियाॅं की । ऐसे फुल टाइम फूल,गुलदस्ता और फ्लाइंग किस भेजने वालों से भगवान हम शरीफों को बचाए । हम तो चाहते हैं,इस अधिक मास के सावन में दाल रोटी खाएं,और प्रभु के गुण गाकर कुछ पुण्य कमाएं ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८८ – देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८८ ☆ देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

फ्री या मुफ्त शब्द का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण की गति से भी तीव्र माना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे कुछ ज्ञानी “कॉम्प्लीमेंट्री” बताकर अपने आप को सफेद पोश समझ लेते हैं। उनका ये मानना है, हमारे द्वारा खरीदी गई सुविधा के साथ ही तो मिल रहा है, इसलिए ये फ्री से अलग होता हैं।

दो साबुन के साथ एक फ्री का मिलना हो या होटल में किराए के कमरे के साथ नाश्ता और एक समय का भोजन जैसी सुविधा इस श्रेणी में गिना जाता हैं।

होटल का कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट वह जगह है, जहाँ आदमी भूख से नहीं, कमरे के किराए की वसूली की भावना से खाता है, घर पर सुबह दो टोस्ट से काम चल जाता है मगर होटल में प्लेट उठाते ही भीतर का चार्टर्ड अकाउंटेंट जाग जाता है।

व्हाट्स ऐप ज्ञान से प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले फल डालेंगे क्योंकि स्वस्थ दिखना है, फिर उसके बगल में आलू पराठा, इडली, पोहा, सॉसेज और एक ऐसा छोटा तिरामिसु रख देंगे जिसकी पहचान हमें नहीं मगर मुफ़्त है इसलिए सम्मान देना ज़रूरी है।

प्लेट में जगह खत्म होते ही दूसरी प्लेट उठा लेते हैं और अपने आप से कहते हैं यह सिर्फ ऑमलेट के लिए है, लाइव काउंटर वाला पूछता है वेज या चीज़, प्याज़, टमाटर, मिर्च, मशरूम, अब हम ऑमलेट नहीं बनवा रहे, जीवनसाथी चुनने जितनी जानकारी दे रहे हैं।

फिर टोस्टर में ब्रेड डालते हैं, वह नीचे से गायब हो जाती है मगर निकलती कहीं नहीं, आप मशीन के सामने झुककर भीतर ऐसे देखते हैं जैसे बच्चा बोरवेल में गिर गया हो, तभी पीछे से किसी और की जली हुई ब्रेड निकलती है और वह आपको संदेह से देखता है कि आपने उसकी ब्रेड के साथ क्या किया, कॉफी मशीन पर छह बटन हैं, एस्प्रेसो दबाओ तो कप में दो चम्मच दुःख गिरता है, कैपुचीनो दबाओ तो मशीन पहले कराहती है, फिर भाप छोड़ती है, फिर इतनी झाग देती है कि कॉफी नीचे कहीं किरायेदार बनकर रह जाती है।

आप मेज़ पर लौटते हैं तो साथी पूछती है इतना कौन खाएगा, आप कहते हैं थोड़ा थोड़ा लिया है, जबकि मेज़ देखकर लगता है संयुक्त राष्ट्र ने अकाल राहत सामग्री भेजी है, बीच में वेटर प्लेट उठाने आता है और आप आधी खाई इडली बचाते हुए कहते हैं अभी चल रही है, भोजन है या पुरानी ईएमआई जिसे बंद नहीं होने देना है।

अंत में पेट जवाब दे चुका होता है मगर नज़र मिठाई पर पड़ती है, हम एक मफ़िन नैपकिन में लपेटकर बाद के लिए रख लेते हैं, फिर कमरे में लौटकर दो घंटे बिस्तर पर सीधे नहीं लेट पाते और गर्व से कहते हैं आज लंच की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यही होटल ब्रेकफास्ट की असली बचत है, पैसे एक वक्त के बचते हैं और पाचन तंत्र दो दिन का ओवरटाइम करता है।

यदि होटल में कमरे के किराए में नाश्ते के बदले कुछ छूट मिल जाय तो निजी यात्रा के समय हम सब कम किराए वाला ऑप्शन उपयोग करते है। ऑफिशल यात्रा के समय कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ता ही चुना जाता हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२८ – बोनस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)  

☆ चुभते तीर # १२८ – व्यंग्य – बोनस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास की कंपनी ‘ग्लोबल सॉल्यूशंस’ में दिवाली का बोनस सिर्फ़ एक आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि कर्मचारियों की योग्यता मापने का सबसे बड़ा पैमाना थी। दफ़्तर में यह फुसफुसाहट थी कि इस बार कंपनी का मुनाफ़ा दोगुना हुआ है, इसलिए सीनियर मैनेजर वर्मा जी सब कर्मचारियों को भारी-भरकम बोनस का लिफ़ाफ़ा थमाने वाले हैं। लेकिन एक पेंच था, लिफ़ाफ़ा देने का तरीका हमेशा की तरह बहुत ही गुप्त रखा गया था।

विकास पिछले तीन महीनों से जी तोड़ मेहनत कर रहा था। रात-रात भर जागकर प्रेजेंटेशन तैयार करना, चाय की चुस्कियों के साथ बॉस के बेतुके चुटकुलों पर सबसे तेज़ हंसना और हर मीटिंग में सबसे आगे खड़े रहना, उसने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसके सहकर्मी अमित का मानना था कि काम से ज़्यादा बॉस का मूड मायने रखता है। अमित दिन भर अपनी मेज़ पर बैठा सोशल मीडिया स्क्रॉल करता रहता था, लेकिन जब भी बॉस पास से गुजरते, वह स्क्रीन पर किसी गंभीर एक्सेल शीट को खोलकर मुंह ऐसा बना लेता जैसे देश की आर्थिक नीति वही तय कर रहा हो।

बोनस वितरण का दिन आया। कॉन्फ्रेंस रूम का दरवाज़ा बंद था। बाहर लंबी कतार लगी थी। कर्मचारी एक-एक करके अंदर जाते और बाहर निकलते समय चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान या गहरी खामोशी होती। कोई किसी को यह बताने को तैयार नहीं था कि अंदर क्या मिला। जब विकास की बारी आई, तो उसके दिल की धड़कन किसी पुराने इंजन की तरह तेज़ चलने लगी।

कमरे के अंदर वर्मा जी एक बड़ी सी लकड़ी की मेज़ के पीछे बैठे थे। मेज़ पर दो अलग-अलग रंगों के लिफ़ाफ़े रखे थे, एक चमकीला सुनहरे रंग का और दूसरा साधारण सफ़ेद। सुनहरे लिफ़ाफ़े का आकार सफ़ेद वाले से दुगना था। वर्मा जी ने विकास की तरफ देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, “विकास, तुमने इस साल काम तो बहुत किया, लेकिन हमारी नीति के अनुसार तुम्हें इन दो लिफ़ाफ़ों में से किसी एक का चुनाव करना होगा। एक में नकद बोनस है और दूसरे में कंपनी के शेयर के साथ एक विशेष सम्मान पत्र।”

विकास धर्मसंकट में पड़ गया। सुनहरे लिफ़ाफ़े में ज़रूर भारी नकद राशि होगी, जबकि सफ़ेद लिफ़ाफ़ा साधारण लग रहा था। अमित ने बाहर निकलते समय सफ़ेद लिफ़ाफ़ा ही पकड़ा हुआ था और उसकी आंखों में चमक थी। विकास ने जोखिम लेने का फ़ैसला किया और भारी लगने वाले सुनहरे लिफ़ाफ़े पर उंगली रख दी।

वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए सुनहरा लिफ़ाफ़ा विकास को सौंप दिया। विकास ने उत्सुकता से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर नकद पैसों की जगह ‘सर्वश्रेष्ठ धैर्यवान कर्मचारी’ का एक प्लास्टिक का मेडल और एक कूपन निकला, जिस पर लिखा था ‘अगले तीन महीने तक मुफ़्त ओवरटाइम चाय’।

विकास की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत पूछा, “सर, और सफ़ेद लिफ़ाफ़े में क्या था?”

वर्मा जी ने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा खोलकर दिखाया, उसमें पचास हज़ार रुपये नकद और एक हफ्ते की सशुल्क छुट्टी का पत्र था। वर्मा जी बोले, “कंपनी ने इस बार चालाकी की परीक्षा ली थी। जो इंसान सिर्फ चमक-धमक देखकर फैसला लेता है, वह बोनस नहीं, सिर्फ मेडल का हकदार होता है।”

तभी कॉन्फ्रेंस रूम का पर्दा हटा और पूरी टीम ने ज़ोरदार तालियां बजाना शुरू कर दिया। विकास ने अपना प्लास्टिक का मेडल गले में डाला और मुस्कुराते हुए कहा, “सर, कम से कम तीन महीने चाय के पैसे तो बचेंगे!” पूरा कमरा फिर से ठहाकों और तालियों से गूंज उठा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक।)

☆ आलेख – बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक  ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

बुजुर्ग परिवार और समाज की रीढ़ होते हैं। हमारे जीवन की व्यवस्था इनके इर्द-गिर्द घूमती है। संस्कार, भाषा, खेती, शादी, झगड़ों का समाधान सभी में ये मार्गदर्शक होते हैं, इसलिए बुजुर्गों को अनुभव का खजाना एवं कुल का जीवित इतिहास कहा जाता है। चार आश्रमों की अवधारणा में वानप्रस्थ और सन्यास बुजुर्गों के लिए ही है। ‘ मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य देवो भव ‘ इसी सोच से भारतीय संस्कृति में समाहित है। बताया गया है कि दस उपाध्यायों से एक आचार्य बड़ा है, सौ आचार्यों से एक पिता बड़ा है और एक हजार पिताओं से भी माता गौरव में बड़ी होती है। माता-पिता सर्वोच्च हैं, अनुभव, संस्कार और आशीर्वाद के प्रतीक हैं। परिवार व समाज में इनकी सेवा करना केवल कर्तव्य नहीं अपितु अपने ही जीवन को आयु, ज्ञान और यश से भरने का रास्ता है, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी परिवर्तन, तकनीक, नवीन विचारों और भविष्य की सम्भावनाओं की वाहक है। इन दोनों के बीच यदि संवाद बना रहे तो अनुभव और नवाचार का सुन्दर समन्वय सम्भव है। वर्तमान समय में पारिवारिक विघटन, शहरीकरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की महत्वाकांक्षा ने दोनों ही पीढ़ियों के सम्बन्धों को चुनौती दी है। बुजुर्गों को लगता है कि नई पीढ़ी परम्पराओं और पारिवारिक मूल्यों से विमुख होती जा रही है और युवा पीढ़ी वर्तमान परिस्थितियों के लिए बुजुर्गों को अनुपयुक्त मान रहे हैं।

पीढ़ी अंतराल की इस अवधारणा में दोनों के सोच, अनुभव, भाषा, तकनीकी व्यवहार, सामाजिक प्राथमिकताओं और जीवन-मूल्यों का अंतर है, जो तनाव को जन्म दे रहा है। संवाद के अभाव में एक घर में रहते हुए दोनों ही समस्याएँ साझा करने से बचते हैं। बच्चे समझते हैं कि उपदेश मिलेगा तो वहीं पर बुजुर्ग अपने को उपेक्षित अनुभव करते हैं। अक्सर यह धारणा बना दी जाती है कि परम्परा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी हैं लेकिन इन दोनों को समन्वित किया जा सकता है। बुजुर्ग अपने अनुभव से बता सकते हैं कि  क्या मूल्यवान है और नई पीढ़ी यह बता सकती है कि इसे नये संदर्भ में कैसे अपनाया जाए? इसी प्रकार डिजिटल तकनीक भी संवाद का सेतु बन सकती है। युवा स्मार्टफोन,ऑनलाइन सेवाओं की जानकारी बुज़ुर्गों को दे सकते हैं और बुज़ुर्ग भी युवाओं को धैर्य से परिवार का इतिहास, संस्कृति व जीवन के अनुभवों से परिचित करा सकते हैं। परिवार में सामूहिक गतिविधियाँ, सहभोज, संस्मरण सुनने की परम्परा, पुराने फोटो का संरक्षण, बुज़ुर्गों का परामर्श, संवाद व संवेदनशीलता को विकसित कर सकता है।

आधुनिक परिवारों में आज बुज़ुर्गों की भूमिका बदल रही है। पहले वे परिवार के निर्णायक होते थे लेकिन आजकल वे अधिकार-आधारित सम्बन्धों से सहभागिता आधारित सम्बन्धों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। नई पीढ़ी का भी उत्तरदायित्व है कि बुज़ुर्गों को समय दें , इनकी बात धैर्य से सुनें, इनको डिजिटल दुनिया से जोड़ें, इनकी सामाजिक उपयोगिता को पहचानें, असहमति को अपमान में न बदलें। कहने का तात्पर्य है कि पीढ़ियों के बीच समन्वय के लिए किसी एक पक्ष को पूरी तरह बदलने के बजाय दोनों पक्षों में लचीलापन आवश्यक है। सुनना संवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरे की बात पूरी होने से पूर्व निष्कर्ष निकालना संवाद को कमजोर करता है। युवाओं को बुज़ुर्गों के अनुभव का सम्मान करना चाहिए और बुज़ुर्गों को युवाओं के स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहाँ युवा अपनी असहमति व्यक्त कर सकें और बुजुर्ग अपनी भावनाएँ नि:संकोच साझा कर सकें। इसके अतिरिक्त अंतर पीढ़ी संवाद में विद्यालय-महाविद्यालय, समाज और सामुदायिक, स्वयंसेवी संस्थाएँ, सांस्कृतिक मंच आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

अंतर पीढ़ी में संवाद का सामाजिक महत्व होता है। जब बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा एक साथ आएगी तो निश्चित ही सकारात्मक परिणाम आएँगे। यह नहीं भूलना चाहिए कि नई पीढ़ी भी भविष्य की बुजुर्ग पीढ़ी है। वह भी उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचेगा, जहाँ अनुभव तो होगा लेकिन सामाजिक गति शायद आगे निकल चुकी होगी अत: इस बात को ध्यान में रखना होगा कि जिस समाज में वृद्धावस्था को सम्मान व सहभागिता मिलेगी वहाँ भविष्य में वृद्ध होना भय या सामाजिक बहिष्कार का पर्याय नहीं बनेगा। बुजुर्गों को सम्मान देने व साझेदार बनाने की आज आवश्यकता है। बुजुर्गों का अनुभव,युवाओं का नवाचार जब संवाद के माध्यम से मिलते हैं तब पीढ़ी अंतराल संघर्ष नहीं, सामाजिक समन्वय की शक्ति बन जाता है। संवाद से समझ पैदा होती है, समझ से सम्मान, सम्मान से सहभागिता और सहभागिता से सदैव ही समन्वय स्थापित होता है। यही वह मार्ग है जिसके माध्यम से परिवार को अधिक संवेदनशील, समाज को समावेशी और भविष्य को मानवीय बनाया जा सकता है।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७५ ⇒ आत्म – मुग्धता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म – मुग्धता…“।)

?अभी अभी # १०७५ ⇒ आलेख – आत्म – मुग्धता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

COMPLACENCY

दर्पण झूठ ना बोले ! अगर झूठ बोलता तो कौन दर्पण देखता ? बार बार आइना कौन देखता है, वही जो खूबसूरत होता है, सुंदर होता है। फिर भी जब विश्वास नहीं होता, तब ही यह प्रश्न किया जाता है, मैं कैसी लग रही हूं ? और अगर फिर भी जवाब संतोषजनक नहीं मिलता, तो मूड खराब हो जाता है। दो घंटे की तैयारी पर पानी फिर जाता है।

दूसरे आप पर मुग्ध हों, उससे पहले यह जरूरी है कि आप अपने आप पर मुग्ध हों। लता जी का एक खराब गाना है, शायद आपको अच्छा लगे, उसके बोल हैं ; आज मैं जवान हो गई हूं, गुल से गुलिस्तान हो गई हूं। ये दिन, ये साल ये महीना, ओ मिट्ठू मियाँ, भूलेगा मुझको कभी ना। नायिका आखिर क्या करे, किसी से तो अपने मन की बात शेयर करे। ये पपीहा भी बहुत काम आता है ऐसे वक्त।।

हमें यह तो पता है, हमारा निवास कहां है, लेकिन हमारे शरीर में स्थित आत्मा का निवास कहां है, कोई नहीं जानता। हम अक्सर आत्म संतोष, आत्म बल, आत्म निरीक्षण और आत्मा के दुखी होने की बात करते हैं, वह आत्मा जो नित्य है, शुद्ध है। लेकिन शरीर में रहकर वह भी सुखी दुखी होती रहती है। क्या हमें उसे संतुष्ट रखने का अधिकार नहीं। जब हम आत्म मुग्ध होते हैं, तो हमारी आत्मा कितनी प्रसन्न होती है, क्या कभी आपने सोचा है।

एक बच्चे में राग द्वेष नहीं होता। वह कितना आत्म मुग्ध होता है। मैं मम्मा का राजा बेटा हूं। मैं कितना सुंदर हूं। मैं दुनिया का सबसे बहादुर बच्चा हूं। अच्छे बच्चे कभी झूठ नहीं बोलते। अच्छाई का दूसरा नाम ही आत्म मुग्धता है। हम यही तो चाहते हैं कि हमारे बच्चे में अच्छाई कूट कूटकर भरी जाए। इससे उसके आत्म विश्वास में वृद्धि होती है। निराशा की भावना बच्चे को हतोत्साहित करती है, उसके विकास में बाधा बनती है।

आत्म मुग्धता, खुद की तारीफ़ है। अपने मुंह से अपनी तारीफ़ अच्छी नहीं लगती, लेकिन जब सभी गुण बाजार में बिकने लगे, तो उनकी भी मार्केटिंग जरूरी हो जाती है। आजकल आदमी भी एक उत्पाद की तरह हो गया है। उसकी भी मार्केट वैल्यू है। प्रचार, दिखावा और अतिशयोक्ति के बिना कहां किसी के गुणों की आजकल पहचान होती है। साक्षात्कार, जिसे हम इंटरव्यू कहते हैं, बिना तैयारी के नहीं दिए जाते। अपना एक बायोडाटा तैयार करना पड़ता है, खुद को श्रेष्ठ साबित करना पड़ता है।।

आत्म मुग्धता कहीं वरदान है तो कहीं अभिशाप, लेकिन अगर आपको अवसाद और नकारात्मकता से बचना है, तो आत्म मुग्ध बनें। एक राजनेता जितना आत्म मुग्ध होता है, वह उतना ही आगे बढ़ता है, लोकप्रिय होता जाता है। अपने गुणों का प्रचार करने का भी एक तरीका होता है। आपकी तारीफ आपके आगे आगे चले, और आप पीछे पीछे। और आपके पीछे आपके तरफदार।

अवसाद, हीन भावना और पराजय की काट है, आत्म मुग्धता। आप स्वयं ही अपने गुणों से संतुष्ट नहीं, तो लोग क्या खाक होंगे। पहले अपनी तारीफ के पुल बाधिये, फिर उस पर अपने गुणों की चादर बिछाइए, और मौका आने पर प्रायोजकों से उस पर रेड कार्पेट बिछवाइए और शान से चलिए। जो जितना आत्म मुग्ध होता है, दुनिया उस पर उतनी ही मुग्ध होती है। मायूस चेहरों पर तो मक्खी भी नहीं बैठती।

अपनी आत्मा की सुनें। अगर आपकी आत्मा को आलोचना पसंद नहीं, तो ऐसे लोगों से दूर रहें जो आपमें कमियां ढूँढते हैं। जो गुण के पारखी हैं, वे आपकी ओर खिंचे चले आएंगे। अपने व्यक्तित्व को विशाल बनाइए, यही आत्मोत्थान की निशानी है।।

जाने वालों, जरा होशियार, आगे पीछे हमारी सरकार, यहां के हम हैं राजकुमार। सारी दुनिया में अपनी जय जयकार, यहां के हम हैं राजकुमार। आत्म मुग्ध हैं हम फिर काहे का गम …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७४ ⇒ सौन्दर्य बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सौन्दर्य बोध…“।)

?अभी अभी # १०७४ ⇒ आलेख – सौन्दर्य बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ASTHETIC SENSE

जब भी सुंदरता की बात होती है, चंदन सा बदन, चंचल चितवन, से आगे बात ही नहीं बढ़ती। नारी सौंदर्य की मूरत है, बस यही बोध पर्याप्त है। सारे कवि और शायर भी घूम फिरकर यही कहना चाहते हैं लेकिन सौंदर्य का एक कला पक्ष भी होता है, जो कहीं ना कहीं उसे व्यक्ति परक नहीं, वस्तुपरक बनाता है। वस्तु के इस कलात्मक पक्ष को ही asthetic sense, यानी सौंदर्य बोध का नाम दिया गया है।

कला, सौंदर्य और सुरुचि का नाम ही सौंदर्य बोध है। जब हम किसी ऐसे घर में प्रवेश करते हैं, जहाँ सब कुछ व्यवस्थित, ठिकाने पर हो, घर की हर वस्तु आपको आकर्षित करती हो, जिसमें घर में रहने वाले का व्यवहार और पहनावा भी शामिल हो, चलने का तरीका, बोलने का तरीका, हँसने से लेकर खाते समय मुंह चलाने तक का तरीका आकर्षित करता हो, तो आप कह सकते हैं कि उस व्यक्ति में एस्थेटिक सेंस यानी सौंदर्य बोध है।।

आप सौंदर्य को सभ्यता और संस्कृति से अलग नहीं कर सकते। जिसे हम तहज़ीब, manner अथवा एटिकेट कहते हैं, उसकी तह में बोलने अथवा बात करने का लहजा भी मायने रखता है। किसी का सुरुचिपूर्ण व्यवहार यानी polished behaviour आपको कभी कभी कृत्रिम भी लगे, लेकिन जो लोग इसमें ढल जाते हैं, उनकी सहजता और सरलता उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगा देती है।

आप मुझे अच्छे लगने लगे ! सौंदर्य बोध का इससे अच्छा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता। यहाँ अनुभूति का स्तर, देह से बहुत ऊपर उठ गया है, जिसमें अगर एक अबोध बच्चे की खुशी भी शामिल है तो एक आत्मा का दूसरी आत्मा के प्रति अपनापन, जो कहीं कहीं परमात्मा के करीब है। क्योंकि जो वाकई अच्छा है, वही सत्य है, शिव है और सुंदर है।।

आपको भगवान मंदिर में नहीं मिलेंगे, इंसानों में ही मिलेंगे। खेत, खलिहानों, बाग बगीचों, हरी भरी वादियों, पहाड़ों और झरनों में ही उस विराट की प्रतीति ही सौंदर्य बोध है। संगीत, ध्यान, कला, नृत्य और अध्यात्म उसके विभिन्न अवयव हैं। यह गीता का वह ज्ञान है, कर्म की कुशलता जिसका पहला अध्याय है, तो निष्काम कर्म अंतिम।

अमीरी गरीबी से ऊपर, सुख दुःख के बीच, सरलता, सहजता, निष्पाप मन, निर्विकार चेष्टा, मानव मात्र के प्रति शुभ संकल्प का भाव, प्राणी मात्र के कल्याण की भावना और प्रकृति और पर्यावरण से प्रतीति ही सौंदर्य बोध है। अंदर और बाहर से व्यवस्थित होना ही व्यवस्था है। प्रकृति में जहाँ भी सौंदर्य है, वह व्यवस्थित और अनुशासित है। पक्षियों का उड़ना, शाम को अपने घर लौटना, फूल का खिलना, भौंरों का गुनगुनाना, नदियों का बहना, सभी इस व्यवस्था के अंग हैं, इसीलिए उनमें सौंदर्य बोध है। हमें कोई दूसरी दुनिया नहीं बसानी। इसी को व्यवस्थित करना है। हमारी दृष्टि बदलने से समष्टि बदल जाती है। दृष्टि में ही सौंदर्य बोध है। जब सृष्टि इतनी सुंदर है, तो इसका रचयिता कितना सुंदर होगा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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