(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “इंसानियत का अपराधीकरण… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३० ☆
आलेख – इंसानियत का अपराधीकरण… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
किसी के प्राण निकाल लिए जाएं तो क्या न्याय होगा उसके बाद। किसी की इज्जत लूट ली जाए या नाम पर धब्बा लगा दिया जाए तो क्या न्याय होगा और कौन कर पाएगा न्याय। कांच का बर्तन जब टूट जाए तो कौन जोड़ पाएगा उसे और जब तक उसे जोडा नहीं जाता तब तक न्याय कहां और कैसा? और जोड़ना असंभव है तो न्याय भी असंभव है। जिस तरह जान के बदले जान न्याय का एक मानदंड बनाया गया था वैसे ही इज्जत के बदले इज्जत न्याय का मानदंड बन सकता है?
लेकिन यहां तो प्राण और इज्जत दोनों के मूल्य ही बदल गए हैं। एक के प्राण बहुमूल्य तो दूसरे के प्राण का कोई मूल्य नहीं। इसी प्रकार एक की इज्जत पूरे समाज व देश की इज्जत तो दूसरे की इज्जत मिट्टी बराबर भी नहीं। कोई मूल्य नहीं, कोई महत्व नहीं।
बड़े बड़े लोग मानवीयता की बात करते हैं, इंसानियत की बात करते हैं – लेकिन तभी तक जब तक उनके ऊपर नहीं बीतती। इसके अलावा जाति के आधार पर अपराध की परिभाषा बदल जाती है तो कभी राजनीतिक रंग देकर अपराध का स्वरूप ही बदल जाता है। आम जन अपराध के समाचार से कितना आहत होता है, उसके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी चिंता तो किसी को है, ऐसा लगता ही नहीं। सब कुछ खेल की रिपोर्टिंग की तरह चलता रहता है। अभी मनुष्य इतना उन्नत नहीं हुआ है कि वह अपराध समाचार को खेल भावना से महसूस करे। इससे मनुष्य की महसूस करने की क्षमता की कोमलता नष्ट हो रही है। कोमल भावनाएं कुचल रही हैं और दया करुणा की भावनाओं का अंत होता दिखाई पड़ रहा है। इस कोमलता को कायरता में बदल दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। पीड़ित को दुश्चरित्र, और अपराधी को मासूम बता कर अपराध के स्वरूप को ही बदल दिया जाए तब भी आश्चर्य नहीं होगा।
जिन गुणों के कारण मनुष्य इंसान कहलाता है और इंसानियत को उच्च प्राथमिकता प्राप्त है तो अपराधों को जाति, धर्म, राजनीति के आधार पर उच्चताबोध प्रदान किया जाएगा, अपराध की जघन्यता वादी प्रतिवादी में बँट जाएगी, भावनाएं पत्थर समान कठोर हो जाएंगी तो इंसानियत का भी अपराधीकरण हो जाएगा और जीने की सार्थकता भी अर्थ खो बैठेगी। इंसानियत को बचाने का अभी समय है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन…“।)
अभी अभी # ७६१ ⇒ आलेख – एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन श्री प्रदीप शर्मा
बुखार, सरदर्द, सर्दी जुकाम और हाथ पाँव टूटना मानव शरीर का धर्म है। इन्हें दैहिक ताप कहा गया है। समय के साथ इन्हें बीमारियों के साथ जोड़ा जाता है, इनको नए नए नाम दिए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है, मच्छरों के काटने से मलेरिया हो जाता है। अधिक शारीरिक परिश्रम, मानसिक थकान इत्यादि से हाथ पाँव में टूटन और जुकाम से सरदर्द भी हो सकता है।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। चिकित्सा विज्ञान में भी आविष्कार हुए। आयुर्वेद, यूनानी और होमियोपैथी चिकित्सा के साथ ही साथ अंग्रेज अपने साथ अंग्रेजी दवा भी लेते आए। कई घरों में आज भी प्राकृतिक चिकित्सा पर ही जोर दिया जाता है। लेकिन बीमारियां हैं कि बढ़ती ही जाती हैं, और उन्हें नए नए नाम दे दिए जाते हैं। ।
एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन की तिकड़ी, पुरानी भारतीय क्रिकेट टीम के स्पिन गेंदबाज, प्रसन्ना, वेंकटराघवन और चंद्रशेखर की याद ताजा कर देती हैं। इन गेंदबाजों की तिकड़ी ने मिल जुलकर कितने डंडे उखाड़े, इनके कारण कितने विदेशी बल्लेबाजों को बुखार आया, सरदर्द हुआ, इतिहास गवाह है।
तब ना तो घरों में टी. वी. था, और ना ही लोगों के हाथ में मोबाइल।
सभी विज्ञापन रेडियो, अखबारों और पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों की जबान पर चढ़ जाते थे। एक और जबरदस्त माध्यम था विज्ञापन का, सिनेमाघर का विशाल परदा, जहां डॉक्यूमेंट्री फिल्म के साथ साथ इन दवाओं की तिकड़ी यानी एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन के विज्ञापन प्रसारित होते थे। अच्छी और खराब फ़िल्म से इन दवाओं का भी व्यापार घटता बढ़ता रहता था। तब एस्प्रो की गोली को टिकिया बोलते थे। ।
नर्सरी राइम्स की तरह इन दवाओं के विज्ञापन बच्चे बच्चे की जुबान पर रटे हुए थे। सर्दी जुकाम में, एस्प्रो देता है आराम। सर का दर्द भगाता है, दर्द बदन का जाता है। एस्प्रो ले लो, ले लो एस्प्रो ! और उसके बाद अमीन सयानी की राहत भरी आवाज़। सेरिडोन के चार फायदे चार उंगलियों के माध्यम से गिनाए जाते थे। सरदर्द, बुखार, जुकाम और बदन दर्द। एक गोली में सब गायब।
आजकल वैक्सीन का दौर चल रहा है। क्रिकेट की स्पिन तिकड़ी की तरह लोग इस संकट मोचक तिकड़ी को भी भूल गए हैं। अब इस तिकड़ी को नया नाम दिया गया है, पैरासिटामोल। साधारण भाषा में क्रोसिन पैन रिलीफ और फिर जितनी ऊँची दुकान, उतने ही महंगे पकवान।
अगर बुखार उतर नहीं रहा है तो डेंगू, चिकनगुनिया की आशंका के चलते पहले खून की जांच भी जरूरी हो जाती है।
इस तिकड़ी की पुरानी सहेली सेरिडोन को वापस विज्ञापन में देखकर बचपन के दिन याद आ गए। एस्प्रो ले लो, ले लो एस्प्रो।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १४३ ☆ देश-परदेश – International Homeless Animals Day 17th August ☆ श्री राकेश कुमार ☆
विगत एक सप्ताह से इस विषय को लेकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर अनेक प्रतिक्रियाएं, विरोध रैली से लेकर कुछ संगठन आवश्यकता से अधिक सक्रिय हो गए हैं।
सभ्य समाज के वो लोग जो घर से निकलने से पूर्व अपने ड्राइवर से कार का एयर कंडीशनर चालू करवाकर कार में बैठ पाते है, धूप में पसीना बहाते दिखे। ऐसे लोगों ने तो कार की बंद खिड़कियों से ही गली के कुत्तों को कार के पीछे दौड़ते हुए देखा होगा।
सड़कों पर हमारे द्वारा फैलाए गए कचरे को अलसुबह बीन कर अपना पेट भरने वाले गरीबों पर सड़क के ये कुत्ते काटने को दौड़ते हैं, मानो सड़क के कचरे पर सिर्फ इन कुत्तों का ही हक हैं।
NGO के माध्यम से अनेक लोग बड़ी रकम प्राप्त कर अपने ऐशो आराम पर उड़ा देते हैं। अंग्रेजी भाषा में प्रवीण ऐसे लोग अत्यधिक मुखर प्रवृत्ति के होते हैं। ये लोग क्या ही गली के कुत्तों के लिए कुछ कर पाते हैं। अधिकतर कुत्ते तो गरीबों के घर के आस पास रहकर वहीं रुख सूखा खा लेते हैं। बड़े परिसरों के आस पास वहां के गार्ड्स ही इनके लिए भोजन की व्यवस्था करते है।
कुत्तों की बढ़ती आबादी से बिल्लियां बहुत कम रह गई हैं। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, कम बिल्लियों के कारण कबूतरों की आबादी तो आसमान से भी ऊपर चली गई हैं। उनकी बढ़ती संख्या मानव जीवन के लिए खतरा हो चुकी हैं।
धार्मिक प्रवृति के लोग भी जानवरों और कबूतरों को लेकर सक्रिय हो चुके हैं। “Excess of every thing is bad” से तो ये ही अर्थ निकलता है, मानव, कुत्ते और कबूतरों की बढ़ती आबादी पृथ्वी के लिए बोझ बन रही हैं।
मानव आबादी पर नियंत्रण के परिणाम आने लगे है, उम्मीद करते हैं, इसी प्रकार से अन्य जीवों की आबादी को नियंत्रण में रखने के लिए स्वयंभू पशु प्रेमी भी विचार करेंगे, वर्ना फिर न्यायालय जैसी संस्थाओं को आगे आना पड़ रहा हैं।
(www.e-abhivyakti.com में आज संस्कारधानी जबलपुर के आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित इस आलेख को प्रस्तुत करते हुए हम गौरवान्वित अनुभव करते हैं। अंतरराष्ट्रीय खातिलब्ध आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संक्षिप्त में लिखना असंभव है। आपकी गिनती हिन्दी साहित्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर के साहित्य मनीषियों में होती है। आचार्य भगवत दुबे जी से दूरभाष इंटरव्यू एवं सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित आलेख।)
🙏 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्रद्धेय आचार्य भगवत दुबे जी को जन्म दिवस १८ अगस्त पर शत शत प्रणाम 🙏
(यह आलेख २१ अप्रैल २०१९ को स्मृतिशेष जयप्रकाश पाण्डेय जी के प्रोत्साहन पर प्रकाशित किया गया था – हेमन्त बावनकर )
आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 3 पी एच डी (4थी पी एच डी पर कार्य चल रहा है) तथा 2 एम फिल किए गए हैं। डॉ राज कुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी के साथ रुस यात्रा के दौरान आपकी अध्यक्षता में एक पुस्तकालय का लोकार्पण एवंआपके कर कमलों द्वारा कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किए गए।
बचपन से ही प्रतिभावन आचार्य जी अपने गुरुओं के प्रिय रहे हैं। वे आज भी अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने गुरुवर सनातन कुमार बाजपेयी जी को देते हैं जिन्होने न सिर्फ उन्हें प्रोत्साहित किया अपितु, उन्हें हिन्दी और अंग्रेजी की शिक्षा भी दी और आर्थिक सहायता भी। आज ऐसे गुरुवर मिलना अत्यंत सौभाग्य की बात है। हम हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ऐसी गुरु-शिष्य परंपरा सदैव जीवित रहे।
संयोगवश आज “पृथ्वी दिवस” पर यह उल्लिखित करन मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है कि – आपकी पर्यावरण विषय पर कविता ‘कर लो पर्यावरण सुधार’ को तमिलनाडू के शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। प्राथमिक कक्षा की मधुर हिन्दी पाठमाला में प्रकाशित आचार्य की कविता में छात्रों को सीखने-समझने के लिए शब्दार्थ दिए गए हैं। साथ ही मौखिक अभ्यास प्रश्नावली भी दी गई है।
आपके महाकाव्य ‘दधीचि’ का उल्लेख के बिना यह आलेख अधूरा होगा। दधीचि महाकाव्य नौ सर्गों में विभक्त है जिनके नाम क्रमशः -‘दधीचि, सुरक्षा, गुरू, वृत्तासुर, मंत्रणा, सुषमा, आश्रम, बलिदान तथा युद्ध है । प्रारम्भ में मंगलाचरण और अन्त में दधीचि वंदना भी दी गयी है । दधीचि की कथा श्रीमद्भागवत, शिवपुराण, महाभारत, स्कन्द पुराण उपनिषद तैत्तिरीय संहिता तथा विभिन्न चरित कोषों में वर्णित है। दधीचि मंत्रवृष्टा ऋषि थे। आपने अपनी मौलिक कल्पना से इस चिर पुरातन कथा को एक नवीन स्वरूप प्रदान कर दिया है। आपने दधीचि को पहले राजा स्वीकार किया है । फिर उनकी आदर्श राज्य व्यवस्था का वर्णन किया है।
आपके ही शब्दों में ‘‘मैने निश्चय कर लिया कि राजा दधीचि से ऋषि दधीचि तक का वर्णन कर मैं अपनी बात कहूंगा । इस महाकाव्य में दधीचि सर्ग का आधार मेरी यही मौलिक कल्पना शीलता है, जो पुराण प्रसिद्ध दधीचि के आख्यान से प्र्याप्त भिन्न होने हुए भी मूल कथानक से सामंजस्य बनाकर ही सुविकसित हुई है ।
इन्द्र और वृत्तासुर के युद्ध वर्णन पर वे लिखते हैं –
इक ओर वनुज कज्जल गिरि सा, तो लगते मेरू परंदर थे । दोनों पहाड़ करके दहाड़ टकाराकर गिरे भयंकर थे ।। विक पाल डरे दिग्गज डोले, घबड़ाकर चतुर्दिशाओं के । जब वाण परंदर के छोड़े जाज्वल्यमान उल्काओं के ।।
आपके कई ईबुक के स्वरूप में अमेज़न पर उपलब्ध है। इनमें से प्रमुख साँसों के संतूर एवं अक्कड़-बक्कड़ प्रमुख हैं। साँसों के संतूर काव्य संग्रह में समाहित दार्शनिक जीवन दृष्टि एवं सत्यम, शिवम, सुंदरम की आराधना हैं, चिंतन दर्शन सृजन का पाथेय हैं । सासों के संतूर में एक हजार से ज्यादा दोहे हैं इन में श्रंगार सौंदर्य के साथ अन्याय, अनीति,मूल्यों के संकट, शोषण पर प्रहार किया हैं। किन्तु आपकी अधिकतम पुस्तकें प्रिंट स्वरूप में ही हैं।
संस्कारधानी के ही वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी ने अभी हाल ही में आचार्य जी से एक संक्षिप्त चर्चा की एवं उनके अनुरोध पर आचार्य भगवत दुबे जी ने लोकतन्त्र के महापर्व पर चुनाव-चकल्लस के अंतर्गत “घोषणा पत्र” शीर्षक से अपनी व्यंग्य रचना का पाठ किया।
इस विशेष विडियो के लिए हम श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के हृदय से आभारी हैं।
(स्मृतिशेष जयप्रकाश पाण्डेय जी द्वारा उस समय प्रेषित विडियो प्रस्तुत है जिसमें आचार्य भगवत दुबे जी ने अपनी व्यंग्य कविता “घोषणा पत्र” का काव्य पाठ किया है।)
विस्तृत परिचय
नाम – आचार्य भगवत दुबे पिता – स्व. ओंकार प्रसाद जी दुबे माता – श्रीमती रामकली दुबे पत्नी – स्व.श्रीमती विमला दुबे (आदर्श शिक्षिका) जन्म – 18.08.43 जन्म स्थान – डगडगा हिनौता चरगवां रोड, जबलपुर (म.प्र.) शिक्षा – एम.ए. एल.एल.बी. कोविद (संस्कृत) व्यावसायिक विवरण- (1) कृषि (2) रत्नावली महिला महाविद्यालय गढा, जबलपुर में पाच वर्ष तक आचार्य पद पर कार्य किया । (3) मेडिको सोशल वर्कर, मेडीकल कालेज जबलपुर से सेवा निवृत्त ।
43 प्रकाशित कृतियां: (कुछ प्रमुख)
(1) स्मृतिगंधा वियोग श्रंगार प्रधान गीत संग्रह 1990 प्रकाशक हिन्दी मंच भारती, जबलपुर. (2) अक्षर मंत्र साक्षरता से संबंधित गीत संग्रह 1996 जिला साक्षरता साहित्य समिति, जबलपुर. (3) शब्दों के संवाद एक हजार दोहों का संग्रह 1996 मेघ प्रकाशन दिल्ली. (4) हरीतिमा पर्यावरण विषयक दोहा संग्रह 1996 विकास एवं पर्यावरण संस्था. (5) रक्षा कवच विभिन्न रोगों के लक्षण, कारण, दुष्परिणाम एवं निदान विषयक गीत संग्रह(स्वास्थ्य शिक्षा हेतु) 1997 पलाश प्रकाशन. (6) संकल्परथी वनवासियों की जीवन पद्धति, संस्कृति और पंचायती राज की परिकल्पना पर केन्द्रित काव्य कृति 1997 एन आई डब्ल्यू, सी वाई डी, जबलपुर. (7) बजे नगाडे काल के जबलपुर की भूकम्प त्रासदी पर केन्द्रित दोहा संग्रह 1997 महापौर जबलपुर. (8) वनपांखी (गीत) जल, जंगल, जमीन, विस्थापन एवं लोक संस्कृति पर केन्द्रित गीत संग्रह 1998 आदिवासी स्वशासन के लिए राष्ट्रीय मोर्चा. (9) दधीचि (महाकाव्य) विश्वशांति के लिए समकालीन प्रासंगिकता के परिपे्रक्ष्य में महर्षि दधीचि के आत्मोत्सर्ग पर केन्द्रित बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य 1998 समय प्रकाशन दिल्ली. (10) जियो और जीने दो (गीत) मानवाधिकारों पर केन्द्रित काव्य कृति 1990 मानव अधिकार कानून नेटवर्क की ओर से (11) विषकन्या (मद्यनिषेध) मद्य निषेध विषयक गीत-लोकगीत संग्रह 1999 एन आई डब्ल्यू, सी वाई डी, जबलपुर. (12) शंखनाद (राष्ट्रीय गीत) राष्ट्रीय पृष्ठभूमि पर केन्द्रित ओज गीत संग्रह 1999 समय प्रकाशन दिल्ली (13) चुभन (गजलें) गजल संग्रह 2000 प्रकाशन मंचदीप जबलपुर (14) दूल्हा देव कहानी संग्रह (अधिकांश आंचलिक कहानियां) 2000 समय प्रकाशन दिल्ली (15) शब्द विहंग (दोहे) एक हजार दोहों का संग्रह 2001 पाथेय प्रकाशन जबलपुर (16) प्रणय ऋचाएं (गीत) श्रंगार गीत संग्रह 2000 पाथेय प्रकाशन जबलपुर (17) कांटे हुए किरीट (काव्य) व्यंग्य गीत संग्रह 2001 कांटे हुए किरीट म.प्र.आंचलिक साहित्यकार परिषद. (18) करूणा यज्ञ पशु-पक्षी, जीव-जन्तु पर्यावरण एवं गोरक्षा पर केन्द्रित काव्यकृति 2001 श्री कृष्ण गोपाला जीव रक्षा केन्द्र दुर्ग, छत्तीसगढ. (19) हिन्दी तुझे प्रणाम हिन्दी भाषा की दशा-दिशा एवं संवर्धन की पृष्ठभूमि पर केन्द्रित काव्य संग्रह 2003 अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद. (20) कसक (गजलें) गजल संग्रह 2003 अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद. (21) शिकन (गजलें) गजल संग्रह 2004 अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद. (22) हिरण सु्रगंधों के (नवगीत) नवगीत संग्रह (23) घुटन गजल संग्रह (24) हम जंगल के अमलतास नवगीत संग्रह (25) अक्कड बक्कड बाल गीत (26) मां ममता की मूर्ति गीत संग्रह (27) सांई की लीला अपार गीत संग्रह (28) अटकन चटकन बाल गीत (29) यादों के लाक्षागृह नवगीत संग्रह (30) चहकते चितचोर बालगीत संग्रह (31) गीत ये पीरी पही के जनगीत संग्रह (32) गरजते शिला खण्ड व्यंग्य संग्रह (33) मृग तृष्णा लघुकथा संग्रह (34) संशय के संग्राम खण्ड काव्य (35) गागर में सागर हाकु काव्य (36) भक्ति की भागीरथी भक्ति गीत संग्रह (37) सृजन सोपान गद्य आलेख (38) संस्कृतियों के सेतु चिन्तन आलेख संग्रह (39) अटकन चटकन बाल गीत संग्रह (40) अक्कड़ बक्कड़ बाल गीत संग्रह इसके अतिरिक्त पाँच हजार दोहे अभी भी अप्रकाशित हैं ।
संपादन – (1) मधुसंचय जबलपुर के कवियों की रचनाओं का संकलन (2) मानस मंदाकिनी गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व पर केन्द्रित स्मारिका (3) गौरवान्विता कादम्बिनी क्लब जबलपुर की स्मारिका (4) यशस्विनी कादम्बरी के साहित्यकार/पत्रकार सम्मान समारोह की स्मारिका (5) धरोहर काव्य संकलन (6) विरासत काव्य संकलन (7) अमानत काव्य संकलन (8) सौगात काव्य संकलन (9) दीपशिखा त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका
विशेष शताधिक पुस्तकों की समीक्षा तथा अनेक पुस्तकों की भूमिका लेखन ।
कैसिट्स – (1) ह्यूमन वेलफेयर एण्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन इन्दौर द्वारा रक्षा कवच के गीतों का कैसिट । (2) श्री अजय पाण्डेय राष्ट्रीय अध्यक्ष मानवाधिकार समिति द्वारा बनवाया गया राष्ट्रीय रचनाओं का कैसिट ‘दुर्गावती‘ श्रीमती सोनिया गांधी अ.भा.राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा लोकार्पित । (3) लगभग एक दर्जन लोक गायकों के कैसिटों में लोकगीत सम्मिलित । (4) श्री आशोक गीते खण्डवा द्वारा व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक ‘अभिव्यक्ति‘ का प्रकाशन । (5) परिक्रमा संस्था जबलपुर द्वारा सन् 2003 के लिए कराये गये एक गुप्त सर्वेक्षण में जबलपुर के दस चर्चित व्यक्तित्वों में सम्मानित। (6) क्राइस्ट चर्च व्यापस सीनियर सेकेन्डरी स्कूल के तीन छात्रों द्वारा लघु शोध पत्र । (7) कुसुम महाविद्यालय सिवनी मालवा एम.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा द्वारा व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य संपन्न (8) पी.एच.डी. के अनेक शोध प्रबन्धों में संदर्भ । (9) कुरूक्षेत्र विश्व विद्यालय से दोहों पर एम.फिल. (हिसार से राजकुमार द्वारा) (10) कामराज युनिवर्सिटि से नवगीत पर एम.फिल. प्रारंभ (छात्रा निर्मला मलिक द्वारा, निदेशक ्रडाॅ. राधेश्याम शुक्ल) (11) डॉ ओंकार नाथ द्विवेदी के निर्देशन में, प्रियंका श्रीवास्तव द्वारा सुल्तानपुर से महाकाव्य दधीचि पर पी..एच.डी. प्रारंभ
शताधिक सम्मान – अलंकरण (कुछ प्रमुख)
1) कहानी ‘दूल्हादेव‘ के लिये म.प्र.आंचलिक साहित्यकार परिषद की ओर से स्व. श्री रामेश्वर शुक्ला अंचल की अध्यक्ष्ता में मुख्य अतिथि कादम्बिनी के पूर्व संपादक श्री राजेन्द्र अवस्थी द्वारा स्व. नर्मदा प्रसाद खरे स्मृति सम्मान 1000 रू. नगद। (2) दोहा संग्रह ‘शब्दों के संवाद‘ पर अखिल भरतीय संस्था अभियान द्वारा ‘भाषा भूषण‘ अलंकरण एक हजार रूपये के पुरस्कार। (3) दधीचि महाकाव्य पर स्व. रामानुजलाल श्रीवास्तव ‘ऊंट‘ बिलहरवी की स्मृति में ‘महाकवि निराला सम्मान‘ मुख्य अतिथि डॉ राममूति त्रिपाठी द्वारा। (4) दधीचि महाकाव्य पर ‘गुजरात हिन्दी विद्यापीठ‘ की ओर से मुख्य अतिथि महामहिम राज्यपाल श्री सुन्दर सिंह भण्डारी द्वारा ‘हिन्दी गरिमा सम्मान‘ (ताम्रपत्र) (5) 1999 की सर्वश्रेष्ठ पद्यकृति ‘दधीचि‘ के लिए अ.भा. अभियान संस्था जबलपुर द्वारा ‘दिव्य‘ अलंकरण ‘हिन्दी रत्न‘ एवं पाँच हजार रूपये । (6) ‘मंचदीप‘ जबलपुर की ओर से ‘दधीचि‘ महाकाव्य पर पद्म श्री गोपाल दास नीरज सम्मान 11000 रूपये एवं भव्य अलंकरण स्वयं नीरज जी के कर कमलों से । (7) अखिल भारतीय साहित्यकार कल्याण मंच रायबरेली द्वारा कहानी संग्रह ‘दूल्हा देव‘ पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान मुख्य अतिथि डॉ गिरिजाशंकर त्रिवेदी संपादक नवनीत (मुम्बई) द्वारा । (8) डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय अस्मिता दर्शी साहित्य अकादमी उज्जैन (म.प्र.) द्वारा दधीचि महाकाव्य पर ‘डॉ. अम्बेडकर सम्मान‘ अध्यक्ष डॉ. पुरूषोत्तम सत्यप्रेमी एवं मुख्य अतिथि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा । (9) म.प्र.आंचलिक साहित्यकार परिषद के सप्तम अधिवेशन हर्रई जागीर में दधीचि महाकाव्य पर श्रीमती राधा सिंह संस्कृति सम्मान 1100 रू. मुख्य अतिथि डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी द्वारा । (10) अ.भा. साहित्य कला मंच मुरादाबाद द्वारा समग्र लेखन पर स्व. सतीश चन्द्र अग्रवाल स्मृति सम्मान साहित्य श्री 2100 रू. डॉ. विश्वनाथ शुक्ल द्वारा । (11) अ.भा. सृष्टि समाकलन समिति जालौन (उ.प्र.)द्वारा महाकाव्य दधीचि पर ‘काव्य किरीट‘ सम्मान । (12) शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदा पुरम (म.प्र.) द्वारा महाकाव्य दधीचि पर ‘पं. राधेलाल शर्मा हिामंशु‘ सम्मान । (13) 4 मई, 2003 को साहित्य, संस्कृति कला संगम अकादमी परियावा प्रताप गढ द्वारा समग्र लेखन पर ‘विद्यावाचस्पति‘ मानदोपाधि । (14) हिन्दी प्रचारिणी समिति छिन्दवाडा द्वारा सारस्वत सम्मान । (15) साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था छिन्दवाडा द्वारा महाकाव्य दधीचि के लिए सम्मानित । (16) यू.एस.एम. पत्रिका तथा युवा साहित्य मंडल गाजियाबाद के वार्षिकोत्सव पर त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल डाॅ माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल बी सत्यनारायण रेड्डी द्वारा वरिष्ठ साहित्य सेवी सम्मान । (17) श्री ऋषिकेश सेवाश्रम (धर्माधिष्ठान) अलीगढ द्वारा धर्मनिष्ठ सम्मानोपाधि । (18) आपदा प्रबंधन संस्थान भोपाल एवं संवाद सोसायटी फार एडवोकेसी एण्ड डेवलपमेंट जबलपुर द्वारा भूकम्प त्रासदी पर लिखित काव्यकृति ‘बजे नगाडे काल के‘ पर प्रशस्ति पत्र । (19) 1999 में ध्रुव प्रकाशन अहमदाबाद द्वारा श्रेष्ठ सृजन हेतु सारस्वत सम्मान । (20) म.प्र.लेखक संघ बैतूल (म.प्र.) द्वारा 16.4.2001 को ‘काव्याचार्य‘ सम्मानोपाधि । (21) नव सप्तक साहित्य श्रंखला के अंतर्गत प्रथम काव्यसप्तक के लिए चयनित एवं उसमें प्रकाशन के लिए उद्योग नगर गाजियाबाद द्वारा गौरवशाली रचनाकार के रूप् में सम्मानित । (22) माण्डवी प्रकाशन गाजियाबाद द्वारा काव्यकृति ‘कांटे हुए किरीट‘ के लिए ‘निर्मला देवी साहित्य स्मृति‘ सम्मान । (23) अ.भा.कवि सम्मेलन संयोजन समिति हाथरस द्वारा ‘काव्य प्रसून‘ सम्मान । (24) इंडियन फिजिकल सोसायटी सेन्ट्रल जोन द्वारा मनोरोग एवं चिकित्सा शिक्षा विषयक काव्यकृति ‘रक्षा कवच‘ के लिए सम्मानित । (25) सन् 2002 में ऋतंभरा साहित्यिक मंच कुम्हारी (छत्तीसगढ) द्वारा उत्कृष्ट काव्य धर्मिता के लिए सम्मानित । (26) कला साहित्य एवं उल्लेखनीय समाज सेवा के लिए साहित्यिक संस्था खजुरी कला (भोपाल) द्वारा ‘दर्पण सृजन श्री‘ सम्मान । (27) अ.भा.साहित्यकार कल्याण मंच रायबरेली द्वारा वर्ष 2001 में दधीचि महाकाव्य पर ‘‘सूफी संत कवि जायसी सम्मान‘‘। (28) साहित्यिक सांस्कृतिक क्रीडा एवं समाज सेवी संस्था जबलपुर द्वारा साहित्य सृजन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा के लिए ‘हरिशंकर परसाई‘ सम्मान । (29) मानव सेवा संस्थान, भोपाल द्वारा 1998 में उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए ‘साहित्य श्री‘ सम्मान एवं 252 रू. नगद। (30) अमेरिकन बायोगाफिकल संस्था द्वारा राशि भुगतान करने की शर्त का विरोध करने के बाद भी रिसर्च बोर्ड की मानद सदस्यता प्रदत्त । (31) अ.भा. साहित्य परिषद बालाघाट द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदत्त । (32) संस्कार भारती राष्ट्रीय संगोष्ठी मेरठ प्रान्त द्वारा ‘संस्कार भारती सम्मान 2001. (33) महावीर सेवा संस्थान कादीपुर, प्रतापगढ द्वारा दोहा संग्रह शब्दों के संवाद के लिए हिन्दी दिवस 1999 को ‘‘साहित्य शिरोमणि‘‘ सम्मान। (34) 10 नवम्बर 2002 को भारती परिषद प्रयाग द्वारा उ.प्र. के विधान सभाध्यक्ष पं. केशरी नाथ त्रिपाठी के जन्मोत्सव पर श्रेष्ठ साहित्य सृजन के लिए सम्मानित । (35) संस्कार भारती शिक्षण संस्थान विक्रमपुर सुल्तानापुर द्वारा सुदीर्घ, उत्कृष्ठ सृजन साधना के लिए ‘बाबा पुरूषोत्तम दास स्मृति हस्त्राब्दि प्रतिभा सम्मान 2001. (36) श्री राज राजेश्वरी त्रिपुर सुन्दरी मंदिर पवई, अमरपुर की ओर से माननीय श्री विश्वनाथ दुबे नगर निगम जबलपुर एवं गृह मंत्री श्री रघुवंशी द्वारा ‘सप्तर्षि सम्मान‘. (37) पाथेय प्रकाशन जबलपुर द्वारा पाथेय श्री अलंकरण । (38) 24 दिसम्बर, 2001 को म.प्र. लेखक संघ जबलपुर द्वारा पत्रकार ‘स्व. हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह में सम्मानित । (39) उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दैनिक सी. टाइम्स जबलपुर की ओर से परम पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी द्वारा प्रशस्ति पत्र । (40) विमल स्मृति संस्था एवं आदर्श महिला मण्डल सीहोर द्वारा 6 जून, 2001 को उत्कृष्ट एवं प्रचुर साहित्य सृजन के लिए सम्मानित । (41) कहानी सग्रह दूल्हादेव पर नर्मदा अभियान द्वारा श्रीनाथ द्वारा राजथान से ‘‘हिन्दी भूषण‘‘ सम्मान । (42) सरिता साहित्य परिषद सहिनवां सुलनपुर द्वारा ‘कीर्ति भारती‘ (सर्वोच्च) सम्मान । (43) साहित्य साधना परिषद मैनपुरी द्वारा समग्र लेखन पर 20.02.05 को ‘‘कौशलो देवी अग्रवाल सम्मान‘‘ । (44) अखिल भारतीय साहित्य संस्कृति कला संगम अकादमी परियावा (प्रतापगढ) द्वारा समग्र लेखन पर ‘विद्यावारिधि‘ मानद उपाधि 2005. (45) जन पत्रकार संघ नई दिल्ली द्वारा अभिनन्दन 2005. (46) खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती संस्था द्वाराा मध्यप्रदेश काव्य रत्न सम्मान 2005. (47) डॉ. राम निवास ‘मानव‘ अभिनन्दन समिति हिसार (हरियाणा) द्वारा साहित्य शिरोमणि सम्मान. (48) कांटे हुए किरीट पर ‘दुष्यंतसम्मान‘ खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती हाजी मलंग शाह बाडी बी ओ बाडी पो. कल्याण 42130 ठाणे द्वारा 2.10.2005 को । (49) अखिल भारतीय साहित्य परिषद (कोटा इकाई) राजस्थान द्वारा डाॅ महेन्द्र सम्मान 2005. (50) भारत भारती संस्थान गुना द्वारा स्वर्ण जयन्ती सृजनधर्मी सम्मान 2005. (51) हिन्दी भाषा कुंभ दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा बैंगलोर द्वारा सम्मनित 2006. (52) हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा मथुरा अधिवेश में ‘वाग्विदांवर‘ सम्मान 6 अगस्त 2006 को । (53) मध्यप्रदेश हिन्दी लेखक संघ भोपाल द्वारा वर्ष 2006 का ‘अक्षर आदित्य‘ सम्मान 2100 रूपये । (54) म.प्र. तुलसी साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा वर्ष 2005 के लिए ‘तुलसी सम्मान‘ 1100 रूपये । (55) डॉ. चित्रा चतुर्वेदी द्वारा अपने पिता न्यायमूर्ति स्व. ब्रज किशोर चतुर्वेदी की स्मृति में स्थापित तुलसी सम्मान वर्ष 2006. (56) हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा विधावागीश सम्मान 2006. (57) हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा महादेवी वर्मा सम्मान 2007. (58) कवि ‘‘रत्न‘‘ सम्मान भारती परिषद प्रयाग 2007. (59) विद्यावारिधि (मानद) साहित्य प्रभा शिखर सम्मान 2007 देहरादून । (60) हिन्दी साहित्य सम्मेलन कटक (उडीसा) 24 जून, 2007 ‘‘सारस्वत संस्तन‘‘ सम्मान । (61) हिन्दी भाशा सम्मेलन पटियाला द्वारा 18 अपे्रल, 2010 को ‘‘साहित्य भूशण अलंकरण । (62) 14 सितंबर, 2010 को प्रतिभा सम्मेलन समारोह समिति गढा जबलपुर द्वारा गढा गौरव सम्मान । (63) विक्रमशिला विश्वविद्यालय गांधीनगर ईशुपुर (भागलपुर) द्वारा ‘विद्यासागर‘ मानद उपाधि ।
आचार्य भगवत दुबे प्रकाशन – बहुचर्चित दधीचि (महाकाव्य) एवं दूल्हादेव (कहानी संग्रह) सहित काव्य विधा की तेईस कृतियां प्रकाशित । देश की शताधिक पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन संपादन – मधुसंचय, धरोहर,अमानत, विरासत, सौगात एवं उपलब्धि काव्य संग्रह तथा त्रैमासिक दीपशिखा के साथ ही मानस मंदाकिनी एवं कादम्बरी (स्मारिका) का प्रतिवर्ष संपादन । विशेष – तीन लघु शोध पत्र, दो एम फिल संपन्न एवं पी.एच.डी., संपन्नता की ओर । सम्मान – देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं उपाधियां/ अलंकार ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छेड़ने की उम्र…“।)
अभी अभी # ७५९ ⇒ आलेख – छेड़ने की उम्र श्री प्रदीप शर्मा
छेड़ा मेरे दिल ने,
तराना तेरे प्यार का
जिसने सुना खो गया
पूरा नशा हो गया ….
जब भी छेड़ने की बात छिड़ती है, बात eve teasing, यानी, छेड़खानी पर आकर ठहर जाती है। उत्तरप्रदेश में भाइयों की छेड़खानी पर बैन है, बैन यानी बंदिश। सहूलियत के लिए इन भाइयों को मजनू भाई कहा जाता है। बहन चाहें तो भाइयों को छेड़ सकती हैं। भाई बहनों का रिश्ता ही ऐसा है। बोलो बहना, ये सच है ना ?
छोड़ो छेड़ने की बातें, हमें इनसे क्या लेना देना।
हर काम की एक उम्र होती है। जब गुरुकुल का जमाना था, गुरु दक्षिणा स्वरूप, शिष्य जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ते थे। समय बदलता चला गया। गुरुकुल स्कूल, कॉलेज और संकुल होते चले गए। गुरु शिष्य संबंध फिर भी कायम रहा। हमारे स्कूल कॉलेज की उम्र में लड़के लोग जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ने की जगह ट्यूशन फीस के बदले लड़कियां ही छेड़ लेते थे।।
छेड़छाड़ और छेड़खानी में जमीन आसमान का अंतर है। बचपन में भाई बहन के बीच, संगी साथियों के बीच बात बात में एक दूसरे को चिढाना तथा परेशान करना आम बात है। किसी की किताब छुपा देना, तो किसी का एक पांव का मोजा, भी शैतानी और मसखरी की परिभाषा में आता था। भाई बहन की चोटी खींच रहा है और बहन मां से शिकायत कर रही है। यह छेड़छाड़ बड़े होकर एक मधुर स्मृति बन जाती है। बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
किसी भी उम्र की लड़की अथवा महिला को गलत इरादे से छेड़ना अथवा उस पर फब्तियां कसना एक घृणित अपराध है, एक ऐसा पैशाचिक कृत्य है, जो दुर्भाग्य से जानवरों में नहीं, सिर्फ इंसानों में पाया जाता है, और यही कृत्य उन्हें इंसान से दरिंदा बना देता है। ईश्वर ने हर इंसान को निगाह भी दी है और नीयत भी। अगर निगाह अच्छी हो और नीयत साफ, तो छेड़खानी का एक अलग ही स्वरूप सामने आता है, जिस पर हम चर्चा करेंगे। ।
ताली दो हाथ से बजती है। आपस का परिचय हमारे मेलजोल और अच्छे व्यवहार से बढ़ता है। हर रिश्ते में प्रेम, आदर और समझदारी के साथ परिपक्वता भी जरूरी है। स्वस्थ संवाद और हंसी मजाक हमें न केवल खुशमिजाज बनाता है, यह रिश्तों में अपनापन बढ़ाता है और उन्हें और अधिक मजबूती प्रदान करता है।
शिक्षा और सह – शिक्षा का संबंध बाल मनोविज्ञान से है। एक समय था, जब सरकारी स्कूल लड़कों के अलग होते थे, और लड़कियों के अलग। केवल प्राइवेट और कॉन्वेंट स्कूल में ही सह – शिक्षा का चलन था। कॉलेज का मुंह देखने के साथ ही बाल मन लड़कियों का मुंह भी कक्षा में देख पाता था। कहीं इस बाल मन में जिज्ञासा, संकोच, शालीनता, नैतिकता और आदर के संस्कार शामिल थे तो कहीं व्यवहार में खुलापन, बेशर्मी, अनादर और बदतमीजी। कॉलेज में लड़के अच्छे भी होते थे, और बुरे भी। लड़कियां सब अच्छी ही होती थी। कुछ संकोची, शर्मीली, तो कुछ मिलनसार, खुशमिजाज। ।
फिल्मों का सबसे अधिक असर युवा पीढ़ी पर ही पड़ा। नायक नायिका का बाग बगीचों में मिलना, नाचना गाना और खलनायक का प्रवेश, छेड़छाड़ और रोमांस का रोमांच परदे से उठकर उनके बाल मन में भी प्रवेश कर गया। गुलशन नंदा और रानू के सस्ते साहित्य का भी इसमें अच्छा खासा योगदान रहा जिसका असर आगे चलकर उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। समाज अच्छा बुरा एक दिन में नहीं बन जाता।
जब कोई कृत्य अपराध की शक्ल ले ले, तो यह समाज और मानवता के लिए कलंक है। खेद है छेड़छाड़ की आड़ में हमारे देश की माता बहनों ने इसकी भारी कीमत चुकाई है। कई अनकही कहानियां उजागर ही नहीं हुई, कितनी पीड़िताओं ने अपने कलेजे पर पत्थर रख, उसे दबा दिया, कितनों ने अस्मिता के साथ समझौता किया, कितनों ने आवाज उठाई, प्रतिकार किया, इस बुराई से लोहा लिया, बहुत लंबी, दुखभरी दास्तान है, जिसे छेड़ना अथवा कुरेदना हमारा मकसद नहीं। ।
उम्र के साथ समझ भी आती है। आटे दाल के भाव जवानी के जोश को ठंडा कर देते हैं फिर भी कहीं कहीं बासी कढ़ी में उबाल आया ही करता है। सुंदरता की तारीफ़ किसे बुरी लगती है। कहीं तारीफ अच्छी नीयत से की जाती है तो कहीं खराब नीयत से। अच्छी नीयत से की गई तारीफ रिश्तों में मिठास, समझदारी और छेड़छाड़ के उस स्वस्थ स्वरूप को उजागर करती है, जिसमें आदर, सम्मान के साथ एक अनौपचारिक नोक झोंक भी शामिल होती है। जहां खुलकर हंसी के ठहाके लगते हैं, रिश्ते व्यक्तिगत नहीं पारिवारिक और सार्वजनिक हो जाते हैं।
सत्तर वर्ष की उम्र में मुझे एक अंग्रेजी शब्द prank का शब्दकोश में अर्थ ढूँढना पड़ा।
यह छेड़छाड़ आजकल सोशल मीडिया पर भी शुरू हो गई है।
छेड़खानी शब्द पुराना और दकियानूस हो गया है और लोग शब्दों के साथ भी फ्लर्ट करने लगे हैं। युवा पीढ़ी बहुत आगे निकल गई है और हम रूढ़िवादी मिडिल क्लास मानसिकता वाले आज भी आदर्श और नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं। ।
मुझे खुशी है कि मेरी छेड़ने की उम्र अब शुरू हुई है। सुबह सुबह हमाम में नहाते वक्त जब अपना बेसुरा सुर छेड़ता हूं, तो अपने आपको सुर सम्राट पाता हूं। चाय की प्याली जब टेबल पर पड़ी पड़ी ठंडी हो जाती है तो पत्नी का पंचम स्वर गूंज उठता है, कर दी न चाय ठंडी। पत्नी के गर्म मिजाज के कारण ठंडी चाय से भी मुंह जल जाता है। मेरी बदनसीबी, अगर पत्नी के सामने, शब्दों से छेड़छाड़ हो गई, तो अपनी खैर नहीं। यह कोई उम्र है हमें छेड़ने की ! जब उम्र थी तब तो घास डाली नहीं, और अब इस उम्र में, आया सावन झूम के ..!!
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०१ ☆
हल्ला मच गया कि एक महिला सांसद के गले से सोने की जंजीर की झपटमारी हो गयी, वह भी ऐसे क्षेत्र में जहां दूतावासों के भवन थे, यानी अति सुरक्षित क्षेत्र, जहां चौबीस घंटे पुलिस चौकन्नी रहती है। चेन छीनकर झपटमार आराम से निकल गये और सांसद महोदया फरयाद ही करती रह गयीं।
हाल के समय में रास्ते में झपटमारी की वारदातों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सोना खोने के अतिरिक्त महिलाएं ज़ख्मी भी होती रहती हैं। झपटमारी में इस वृद्धि के कारण क्या हैं? देश में बढ़ती बेरोज़गारी, कानून के डर में कमी, या व्यवस्था की कमज़ोरी? शायद युवाओं को दिन भर ईंट-गारा ढो कर चार सौ रुपये कमाने के बजाय थोड़े से साहस के बूते एक मिनट में दो चार लाख की चेन पा लेना अधिक लुभाता है। सोने के दाम बढ़ने के साथ झपटमारी में वृद्धि की पूरी संभावना है।
सोना पांच हजारी से बढ़ते बढ़ते लखपति हो गया, लेकिन अभी भी वह समाज के मन से उतरा नहीं है। प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को ‘मेरे सोना’ कह कर बुलाते हैं, जो दिखाता है कि प्रेमियों की नज़र में सोने की क्या कीमत है। सोने के लिए फैले पागलपन को लेकर प्रसिद्ध कवि बिहारी ने लिखा, ‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, वह खाये बौरात है यह खाये बौराय।’ यहां ‘कनक’ का अर्थ दोनों जगह अलग-अलग है। एक जगह धतूरा और दूसरी जगह सोना। यमक अलंकार है। कवि कहता है कि धतूरा खाकर आदमी जैसे बौराता है वैसे ही सोना पाकर। सोने की मादकता या नशा धतूरे से सौ गुना अधिक होता है।
सोने का उसके मूल्य के कारण संग्रह करना तो समझ में आता है, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि शरीर पर पहन कर उसकी नुमाइश क्यों की जाती है? आज के युग में कृत्रिम सुन्दर आभूषण उपलब्ध हैं जो सोने की तुलना में बहुत सस्ते होते हैं, लेकिन बहुत सी स्त्रियों को उन्हें पहनने में हेठी का अनुभव होता है। समाज में एक दूसरे से बेहतर दिखने की होड़ में सोना उपकरण बन जाता है।
कुछ पुरुष भी सोना पहनने के शौकीन होते हैं। टीवी पर कुछ महापुरुष ऐसे भी दिखे जो एक-दो किलो सोना शरीर पर लाद कर चलते थे। इनमें एक महन्त जी भी दिखे। ज़ाहिर है कि ये महानुभाव सुरक्षाकर्मियों के बिना नहीं चलते होंगे, अन्यथा उनका हाल भी सांसद महोदया जैसा होता। एक संगीत-निदेशक भी सोना पहनने के शौकीन थे। अनेक पुरुष सोने कीअंगूठियां और जंजीर पहनने के शौकीन होते हैं। कुछ दसों उंगलियों में अंगूठी पहनते हैं, जिसे देखकर सिहरन होती है।
सोने की धमक पूरे विश्व में रही है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले विश्व में स्वर्ण मान था जिसमें देश की मुद्रा स्वर्ण में परिवर्तनीय थी। भारत जैसे जो देश इस व्यवस्था को नहीं अपना सकते थे उन्होंने अपनी मुद्रा को स्वर्ण मान वाले बड़े देशों की मुद्रा से जोड़ लिया था। प्रथम विश्व युद्ध में हुए युद्ध के भारी व्ययों के कारण यह व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। ब्रिटिश काल में भारत में गिन्नी और अशर्फी नाम के सोने के सिक्के चलन में थे, लेकिन ये सिर्फ हैसियतदारों के पास ही होते थे क्योंकि रियासतों के ज़माने में आम जनता फटेहाल ही हुआ करती थी।
स्वर्ण-मोह की क्लासिक कथा राजा मिडास की है जिसके रचयिता अमेरिकी कथाकार नैथेनियल हॉथॉर्न थे। मिडास ने देवता से वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह जो कुछ भी छुए वह सोना बन जाए। उसे पहला झटका तब लगा जब उसका भोजन छूते ही सोना हो गया। अपनी मूर्खता का पूरा अहसास उसे तब हुआ जब उसकी बेटी उसके छूने से सोने की मूर्ति बन गयी। तब उसने देवता का पुनः आह्वान कर उस वरदान से मुक्ति पायी।
सन्त नामदेव से संबंधित एक घटना याद आती है। नामदेव जी कहीं जा रहे थे। पीछे पत्नी। मार्ग में पड़ा सोने का टुकड़ा दिखा। नामदेव जी को भय लगा कि पत्नी कहीं सोने के लोभ में न पड़ जाए। वे उसे मिट्टी से ढकने लगे। पत्नी ने सोना देख लिया था, बोलीं, ‘मिट्टी से मिट्टी को क्यों ढक रहे हो?’ नामदेव समझ गये कि उनका भय निर्मूल था। पत्नी की दृष्टि में उस सोने का मूल्य मिट्टी से अधिक नहीं था।
सोने-चांदी के दीवानों को फ्रांसीसी कथाकार मोपासां की प्रसिद्ध कहानी ‘डायमंड नेकलेस’ ज़रूर पढ़ना चाहिए। कहानी में एक नौकरानी अपनी मालकिन से एक पार्टी में पहनने के लिए उसका हीरे का हार मांग लेती है। दुर्भाग्य से हार खो जाता है, लेकिन नौकरानी भयवश इस बात को मालकिन से छिपा लेती है। वह धन उधार लेकर वैसा ही हार खरीदकर मालकिन को दे देती है। हार की उधारी चुकाते चुकाते नौकरानी असमय ही बूढ़ी हो जाती है। फिर एक दिन वह मालकिन को हार खोने की बात बताती है। मालकिन उसकी हालत पर दुखी होकर उसे बताती है कि उसका हार नकली था। इस तरह एक नकली हार के कारण एक स्त्री की ज़िन्दगी होम हो गयी।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 302 ☆ शिवोऽहम्….(5)…
आत्मषटकम् पर मनन-चिंतन की प्रक्रिया में आज पाँचवें श्लोक पर विचार करेंगे। अपने परिचय के क्रम में अगला आयाम आदिगुरु शंकराचार्य कुछ यूँ रखते हैं,
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बंधुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।
इसका शाब्दिक अर्थ है कि न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है। न मेरा कोई पिता है, न कोई माता है, न ही मेरा जन्म हुआ है। न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु है और न ही कोई शिष्य। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।
मृत्यु के संदर्भ में देखें तो शंकराचार्य जी महाराज के कथन से स्पष्ट है कि देह छूटना आशंका नहीं होना चाहिए। यों भी यात्रा में पड़ाव आशंका नहीं हो सकता। यात्रा तो परमात्मा के अंश की है, यात्रा आत्मा की है। यात्रा के सनातन और यात्री के शाश्वत होने का प्रसंग आए और योगेश्वर उवाच स्मृति में न आए, यह संभव ही नहीं। भगवान गीतोपदेश में कहते हैं,
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
आत्मा का किसी भी काल में न जन्म होता है और न ही मृत्यु। यह पूर्व न होकर, पुनः न रहनेवाला भी नहीं है। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।
मैं मृत्यु नहीं हूँ, अत: स्वाभाविक है कि जन्म भी नहीं हूँ। जो कभी जन्मा ही नहीं, वह मरेगा कैसे? जो कभी मरा ही नहीं, वह जन्मेगा कैसे?..ओशो की समाधि पर लिखा है, ‘नेवर बॉर्न, नेवर डाइड, ऑनली विज़िटेड दिस प्लानेट अर्थ बिटविन….’ उन्होंने न कभी जन्म लिया, न उनकी कभी मृत्यु हुई। वे केवल फलां तिथि से फलां तिथि तक सौरग्रह धरती पर रहे।’
विचार करें तो बस यही अवस्था न्यूनाधिक हर जीवात्मा की है। स्पष्ट है कि केवल जन्म और मृत्यु तक सीमित रखकर जीवन नहीं देखा जा सकता।
पिता न होना अर्थात किसीके जन्म का कारक न बनना और माता न होना अर्थात किसीको जन्म देने का कारण न होना। जन्म से मृत्यु तक जीवात्मा द्वारा देह धारण करने का कारण और कारक परमात्मा ही हैं। प्राप्त देह, यात्रा की निमित्त मात्र है।
न मार्ग का दर्शन, न मार्ग का अनुसरण.., न गुरु होना, न शिष्य होना। बंधु, मित्र न होना, रक्त का या परिचय का सम्बंध न होना। जगत के सम्बंधों तक सीमित नहीं है अस्तित्व। माता, पिता, गुरु, शिष्य, बंधु, मित्र इहलोक के नश्वर सम्बंध हैं जबकि जीवात्मा ईश्वर का आंशिक अवतरण है।
जातिभेद का उल्लेख करते हुए आदिगुरु स्पष्ट करते हैं कि मैं न कुलविशेष तक सीमित हूँ, न ही वंशविशेष हूँ। ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ …जाति का एक अर्थ उत्पत्ति भी है। जीवात्मा उत्पत्ति और विनाश से परे है।
जीवात्मा अपरिमेय संभावना है जिसे देह और मर्त्यलोक की आशंका तक सीमित कर हम अपने अस्तित्व को भूल रहे हैं। अपनी एक रचना स्मरण आ रही है,
संभावना क्षीण थी, आशंका घोर,
बायीं ओर से उठाकर, आशंका के सारे शून्य
धर दिये संभावना के दाहिनी ओर..,
गणना की संभावना खो गई,
संभावना अपरिमेय हो गई..!
मनुष्य अपने अस्तित्व की अपरिमेय संभावनाओं को पढ़ने लगे तो कह उठेगा,..’मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ,…शिवोऽहम्।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गोविन्द साधना शुक्रवार 15 अगस्त से गुरुवार 21 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना मेंॐ गोविंदाय नमः का मालाजप होगा साथ ही वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित मधुराष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक लोटा जल…“।)
अभी अभी # ७५८ ⇒ आलेख – एक लोटा जल श्री प्रदीप शर्मा
ग्लास आधा खाली अथवा आधा भरा हो सकता है, लेकिन एक लोटा जल हमेशा पूरा भरा होता है।
पानी पिलाया जाता है, और जल अर्पित किया जाता है। एक समय था जब पानी भी लोटे से ही पिलाया जाता था, क्योंकि तब लोगों की प्यास आसानी से नहीं बुझती थी। अब तो लोग ग्लास से भी सिर्फ पानी चखकर ही तृप्त हो जाते हैं, क्योंकि उनकी प्यास आजकल पानी से कहां बुझ पाती है।
लाठी जितने ही गुण एक लोटे में भी होते हैं। लोटे का अपना विज्ञान है, जिसे धातु विज्ञान कहते हैं। सुबह सवेरे उठते ही तांबे के लोटे का जल खाली पेट पीया जाता था। उसके बाद सबसे पहले उगते सूरज को जल अर्पित किया जाता था। जिनका सूर्य कमजोर हो, उन्हें सूर्य नारायण को एक लोटा जल अवश्य अर्पित करना चाहिए। पूजा के भी अधिकांश पात्र तांबे के ही होते हैं। ।
तब ना तो आज की तरह स्टील और कॉच के बर्तन होते थे। आम घरों में तांबा, पीतल और कांसे के बर्तन ही होते थे। कुछ संपन्न परिवारों में जरूर चांदी के बर्तन भी होते थे।
चांदी के चम्मच से नवजात शिशु को पहली बार खीर चटाना शुभ माना जाता था। सब लोग वैसे भी कहां, मुंह में चांदी का चम्मच(सिल्वर स्पून) लेकर पैदा होते हैं।
आज से ग्यारह वर्ष पहले तक लौटे का उपयोग दिशा मैदान के लिए भी किया जाता था। बचपन में हम जब अपने गांव ननिहाल जाते थे, तो सुबह पौ फटने के पहले ही उठकर, लोटा लेकर, जंगल जाना पड़ता था। वैसे गांव के बाहर और नदी किनारे को भी जंगल ही कहा जाता था, जहां आबादी ना हो।
लौटते समय नदी अथवा कुंए पर ही कुल्ला दातून और स्नान करके आना पड़ता था। ।
शिव जी को एक लोटा जल चढ़ाने की प्रथा बहुत पुरानी है, जिसे आज के कथा वाचकों ने एक इवेंट बना दिया है। जो भोलेनाथ बिल्व पत्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं, उनके लिए भक्तों की श्रद्धा देखिए, श्रावण मास में भक्त जन सैकड़ों मिलों की कांवड़ यात्रा सम्पन्न कर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। एक लोटा जल अथवा कांवड़, सब भाव और श्रद्धा का मामला है।
अंग्रेजी के वॉटर, हमारे पानी और उर्दू के आब में वह भाव नहीं, जो हमारे एक लोटा जल में है। यूं तो सभी नदियों का जल शुद्ध होता है, करीब गंगा जल की बात कुछ और ही है।
हमारे घर का एक्वागार्ड और हेमा मालिनी का ब्रांड केंट प्यूरीफायर, सिर्फ पानी को साफ ही कर सकता है, उसे गंगा जल जैसा पवित्र नहीं बना सकता। आखिर गंगा शिव जी की जटाओं से जो निकली है। यही कारण है, जब भोलेनाथ का अभिषेक गंगा जल से किया जाता है, तो वह अधिक प्रसन्न होते हैं। शायद घी, दूध और शहद से अधिक प्रसन्न होते हों।।
ईश्वर की भक्ति बुरी नहीं, अगर वह बिना किसी स्वार्थ अथवा सांसारिक कामना के की जाए, लेकिन हम संसारी जीव ईश्वर से वही तो मांगेंगे, जिसका हमें अभाव होगा। धन, संपत्ति, सुख, औलाद और निरोग काया, बस यही हमारा पसारा है, और हमारी सांसारिक बुद्धि और कुछ मांग ही नहीं सकती। कहीं पितृ दोष तो कहीं साढ़े साती। इनसे बचे तो राहु केतु और चंद्रमा नीच का।
अगर किसी संत महात्मा अथवा बाबा के पास इन लाख दुखों की एक दवा हो तो कौन नहीं उल्टे पांव भागेगा उसके धाम। केवल एक चिथड़ा सुख नहीं, त्रय ताप यानी दैहिक, भौतिक और दैविक, तीनों तापों से छुटकारा अगर एक लोटा जल से हो जाए, तो समझो हमें भगवान मिल गए। और हमें क्या भगवान का अचार डालना है। हमें अपने मतलब से मतलब।।
जो हमारे दुख दूर करे, वही हमारा भगवान। चमत्कार को नमस्कार करते करते हम धर्म की शरण में चले जाते हैं, और बाबा नाम केवलम्। बस हमें साक्षात् भगवान जो मिल गए। भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है। नेता भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। अगर ऐसे समागम में कुछ हादसे भी होते हैं, तो वह भी हरि इच्छा। वही कर्ता है, हमने तो अब कर्त्तापन पूरी तरह त्याग दिया है। सनातन हिंदू राष्ट्र में धर्म की विजय हो, अधर्म का नाश हो। विश्व का कल्याण हो। बोलो सब संतन की जय। आज के आनंद की जय..!!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खुदकुशी और जिजीविषा …“।)
अभी अभी # ७५७ ⇒ आलेख – खुदकुशी और जिजीविषा श्री प्रदीप शर्मा
जिंदगी के कई रंग रूप हैं ;
तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं
वापस बुला ले, मैं सजदे में गिरा हूं
मुझको है मालिक उठा ले..
अब एक रंग यह भी देखिए ;
जिंदगी कितनी खूबसूरत है जिंदगी कितनी खूबसूरत है
आइए, आपकी जरूरत है। ।
आज फिर जीने की
तमन्ना है,
आज फिर मरने का
इरादा है ;
ऐसी तमन्ना और इरादा सिर्फ गीतकार शैलेन्द्र का ही हो सकता है। यूं तो एक आम आदमी, रोज जीता और मरता है, लेकिन वह कभी खुदकुशी करने की नहीं सोचता। मेरा नाम जोकर में यही बात शैलेन्द्र के साहबजादे शैली शैलेन्द्र ने भी दोहराई है ;
जीना यहां मरना यहां
इसके सिवा जाना कहां। ।
इंसान भी अजीब है। एक तरफ वह कहता है, गम उठाने के लिए मैं तो जिये जाऊंगा, और अगर उसे अधिक खुशी मिले तो भी वह कह उठता है, हाय मैं मर जावाँ।।
प्यार में लोग साथ साथ जीने मरने की कसमें खा लेते हैं, अगर दिल टूट गया तो कह उठे, ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं, और अगर खोया प्यार मिल गया तो;
तुम जो मिल गए हो,
तो ऐसा लगता है
कि जहान मिल गया। ।
सुख दुःख और आशा निराशा के इस सागर में कोई डूब जाना चाहता है, तो कोई किनारा चाहता है। हाथ पांव सब मारते हैं, किसी की नैया पार लग जाती है, तो कोई मझधार में ही डूब जाता है। माझी नैया ढूंढे सहारा।
खुशी खुशी कौन खुदकुशी करता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार आत्महत्या पाप है, और कानून के अनुसार एक अपराध। एक ऐसा अपराध जिसका प्रयास तो दंडनीय है, लेकिन अगर प्रयास सफल हो गया, तो कानून के हाथ बंधे हैं। ।
एक फौजी जब सरहद पर हंसते हंसते अपने प्राण न्यौछावर करता है, तो यह वीरता कहलाती है और उसे शहीद का दर्ज़ा दिया जाता है तथा संसार उसे नमन करता है। जापान में हाराकिरी को एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अभ्यास के रूप में देखा जाता है, लेकिन आजकल यह भी वहां वैध नहीं है। जब जन्म पर आपका अधिकार नहीं है तो क्या मौत को इस तरह गले लगाना, ईश्वरीय विधान को चुनौती देने की अनधिकार चेष्टा नहीं। अगर आप खुद को इस तरह दंडित करते हो, ऊपरवाला इसको अमानत में ख़यानत का अपराध मान कठोर दंड देता है। वहां कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं, कोई राष्ट्रपति नहीं जो आपका अपराध माफ कर दे।
दुख दर्द, शारीरिक और मानसिक कष्ट एवं भावनात्मक आवेग के वशीभूत होकर कोई भी व्यक्ति खुदकुशी के लिए प्रेरित हो सकता है, लेकिन जीने की चाह, जिसे जिजीविषा कहते हैं, हमेशा उसे ऐसा करने से रोकती रहती है। कीड़े मकौड़ों और पशुओं से हमारा जीवन लाख गुना अच्छा है। पशु पक्षियों में जंगल राज होते हुए भी, कोई प्राणी स्वेच्छा से मौत के मुंह में जाना पसंद नहीं करता। मूक प्राणियों की तुलना में मनुष्य अधिक सभ्य और सुरक्षित है। जब एक गधे को भी अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं, तो वह इंसान गधा ही होगा जो खुदकुशी करने की सोचेगा। ।
आज के भौतिक युग में कुंठा, संत्रास, अवसाद अथवा मादक पदार्थों के सेवन के प्रभाव से भी व्यक्ति आत्मघाती प्रवृत्ति का हो जाता है। नास्तिकता और विकृति के कारण कई युवा अपनी जान गंवा बैठते हैं। ।
सकारात्मक सोच और विवेक के अभाव में फिर भी किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसे नाजुक क्षण आ जाते हैं, कि क्षणिक आवेश में वह अपनी इहलीला समाप्त कर बैठता है। यह एक ऐसा गंभीर जानलेवा कदम है, जो कभी वापस नहीं लिया जा सकता। यहां कोई भूल चूक लेनी नहीं, किसी तरह का भूल सुधार संभव नहीं।
अगर जीवन में एकांत है तो नीले आकाश और उड़ते पंछियों को निहारें, फूल पौधों और तितलियों से प्यार करें।
कहीं कोई नन्हा सा बच्चा दिख जाए, तो उससे बातें करें। बच्चों से आप ढेर सारी बातें कर सकते हैं। बच्चे कभी नहीं थकते क्योंकि बच्चों में ही तो भगवान होते हैं। अपने से कमजोर, अधिक दुखी और त्रस्त इंसान से प्रेरणा लें।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सत्संगति प्रभावहीन नहीं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २८८ ☆
☆ सत्संगति प्रभावहीन नहीं… ☆
‘झूठ कहते हैं, संगति का असर होता है… आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया और न फूलों को चुभना आया’ कितना विरोधाभास निहित है इस तथ्य में…यह सोचने पर विवश करता है, क्या वास्तव में संगति का प्रभाव नहीं होता? हम वर्षों से यही सुनते आए हैं कि अच्छी संगति का असर अच्छा होता है। सो! बुरी संगति से बचना ही श्रेयस्कर है। जैसी संगति में आप रहेंगे, लोग आपको वैसा ही समझेंगे। बुरी संगति मानव को अंधी गलियों में धकेल देती है, जहां से लौटना नामुमक़िन होता है तथा उसे ही दलदल अथवा कीचड़ की संज्ञा दी गयी है। यदि आप कीचड़ में कंकड़ फेंकेंगे, तो उसके छींटे अवश्य ही आपके दामन को मलिन कर देंगे। सो! इनसे सदैव दूर रहना चाहिए। इतना ही क्यों ‘Better alone than a bad company.’ अर्थात् ‘बुरी संगति से अकेला रहना कहीं अच्छा है।’ परंतु पुस्तकों को मानव का सबसे अच्छा मित्र स्वीकारा गया है, क्योंकि वे हमें सत्मार्ग पर ले जाती हैं।
परंतु इस दलील का क्या… ‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया, न फूलों को चुभना रास आया’–हमारे मन में ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न करता है। यह तथ्य मनोमस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करता, झिंझोड़ कर रख भी रख देता है। इस स्थिति में हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर सत्य क्या है? उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना तथा शब्दबद्ध करना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे परमात्मा की सत्ता व उसके गुणों का बखान करना। इसीलिए लोग ‘नेति-नेति’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, क्योंकि परमात्मा निर्गुण, निराकार, निर्विकार,अनश्वर व सर्वव्यापक है। उसकी महिमा अपरम्पार है तथा वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। उसकी महिमा का गुणगान करना मानव के वश की बात नहीं। यहां भी विरोधाभास स्पष्ट झलकता है कि जो निराकार है…जिसका रूप व आकार नहीं; जो निर्गुण है.. सत्, रज, तम तीनों गुणों से परे है; जो निर्विकार अर्थात् दोषों से रहित है; परंतु वह अनश्वर है…उसमें शील, शक्ति व सौंदर्य का समन्वय है…वह विश्व में श्रद्धेय है, आराध्य है, पूजनीय है, वंदनीय है।
प्रश्न उठता है, कि जो शब्द ब्रह्म मानव के अंतर्मन में निवास करता है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं… उसे मन की एकाग्रता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। एकाग्रता ध्यान केंद्रित करने से आती है। सो! हमें अंतरात्मा में झांकने की आवश्यकता है। यह ध्यान की वह स्थिति है, जिस में मानव क्षुद्र व तुच्छ वासनाओं से ऊपर उठ जाता है और उसे केवल सत्य-स्वरूप ब्रह्म ही नज़र आता है, क्योंकि ‘ब्रह्म सत्यम्, जगत् मिथ्या।’ परन्तु सांसारिक प्रलोभनों व मायाजाल में लिप्त बावरा मानव, मृग की भांति उस कस्तूरी को पाने के निमित्त इत-उत भटकता रहता है और वह भूखा-प्यासा रेगिस्तान में सूर्य की किरणों में जल का आभास पाकर निरंतर भागता रहता है…परंतु अंत में अपने प्राण त्याग देता है। सो! वही दशा मानव की है, जो नश्वर व भौतिक संसार में उसे मंदिर-मस्जिदों में तलाशता रहता है, जबकि वह तो उसकी अंतरात्मा में निवास करता है। परंतु मृग- तृष्णाएं उसे पग-पग पर उलझाती व भटकाती हैं और भ्रमित मानव उस मायाजाल से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता… लख चौरासी तक मोह-माया के बंधनों में उलझा रहता है। परिणामत: उसे कहीं भी सुक़ून, आनंद अथवा कैवल्य की स्थिति प्राप्त नहीं होती।
जहां तक कांटों को महकने का सलीका न आने का प्रश्न है, वह प्रकाश डालता है–मानव की आदतों पर; जो लाख प्रयास करने पर भी नहीं बदलतीं, क्योंकि वे हमें पूर्व-जन्म के संस्कारों के रूप में प्राप्त होती हैं। कुछ संस्कार पूर्वजों द्वारा प्रदत्त होते हैं और विभिन्न संबंधों के रूप में हमें प्राप्त होते हैं, जिन्हें पल्लवित-पोषित करने में हमारा कोई अहम् योगदान नहीं होता। परंतु उनका निर्वहन करने को हम विवश होते हैं और कुछ संस्कार हमें माता-पिता, गुरुजनों व हमारी संस्कृति द्वारा प्राप्त होते हैं, जो हमारे चारित्रिक गुणों को विकसित करते हैं। अच्छे संस्कार हमें आदर्शवादी बनाते हैं और बुरे संस्कार हमें पथ-विचलित करते हैं; हमें संसार में अपयश दिलाते हैं। यह संबंध हम स्वयं बनाते हैं, अक्सर यह संबंध स्वार्थ के होते हैं, जिन पर विश्वास करना स्वयं को छलना होता है। परंतु कुसंस्कारों के कारण समाज में हमारी निंदा होती है और लोग हमसे घृणा करना प्रारंभ कर देते हैं। बुरे लोगों का साथ देने के कारण हम पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक है… क्योंकि ‘यह मथुरा काजर की कोठरी, जे आवहिं ते कारे’ अर्थात् ‘जैसा संग, वैसा रंग’। कुसंगति का रंग अर्थात् काजल अपना प्रभाव अवश्य छोड़ता है। कबीरदास जी की यह पंक्ति’ कोयला होई ना ऊजरा, सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् कोयला सौ मन साबुन से धोने पर भी, कभी उजला नहीं हो सकता अर्थात् मानव की जैसी प्रकृति, प्रवृत्ति, सोच व आदतें होती हैं; उनके अनुरूप ही वह कार्य-व्यवहार करता है।
इंसान अपनी आदतों का ग़ुलाम होता है और सदैव उनके अंकुश में रहता है; उनसे मुक्ति पाने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि इंसान की सोच,आदतें व प्रवृत्तियां चिता की अग्नि में जलने के पश्चात् ही बदल सकती हैं। सो! प्रकृति के विभिन्न उपादान फूल, कांटे आदि अपना स्वभाव कैसे परिवर्तित कर सकते हैं? फूलों की प्रकृति है हंसना, मुस्कराना, बगिया के वातावरण को महकाना व आगंतुकों के हृदय को आह्लादित-उन्मादित करना। सो! वे कांटो के चुभने के दायित्व का वहन कैसे कर सकते हैं? इसी प्रकार मलय वायु, जो शीतल, मंद व सुगंधित होती है… याद दिलाती है अपने प्रिय की, जिसके ज़हन में आने से समस्त वातावरण आंदोलित हो उठता है और मानव अपनी सुधबुध खो बैठता है।
यह तो हुआ स्वभाव, प्रकृति व आदतों के न बदलने का चिंतन, जो सार्वभौमिक सत्य है। परंतु अच्छी आदतें सुसंस्कृत व अच्छे लोगों की संगति द्वारा बदली जा सकती है। हां! हमारे शास्त्र व अच्छी पुस्तकें इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं; बेहतर योगदान दे सकती हैं; उचित मार्गदर्शन कर जीवन की दशा व दिशा बदल सकती हैं। जो मनुष्य नियमित रूप से ध्यान-मग्न रहता है; सत्शास्त्रों का केवल अध्ययन ही नहीं; चिन्तन-मनन करता है; आत्मावलोकन करता है; चित्तवृत्तियों पर अंकुश लगाता है; इच्छाओं की चकाचौंध में फंसकर असामान्य व्यवहार नहीं करता तथा उनकी दासता स्वीकार नहीं करता; वह दुष्प्रवृत्तियों के इस मायाजाल से स्वत: मुक्ति प्राप्त कर सकता है…कुसंस्कारों का त्याग कर सकता है और अपने स्वभाव को बदलने में समर्थ हो सकता है।
सो! हम उपरोक्त कथन को मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं कि सत्संगति प्रभावहीन होती है, क्योंकि फूल और कांटे अपना सहज स्वभाव-प्रभाव हरगिज़ नहीं छोड़ते। कांटे अवरोधक होते हैं; सहज विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं; सदैव चुभते हैं; पीड़ा पहुंचाते हैं तथा दूसरों को कष्ट में देखकर आनंदित होते हैं। दूसरी ओर फूल इस तथ्य से अवगत होते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी वे निराशा का दामन कभी नहीं थामते… अपना महकने व मुस्कुराने का स्वभाव कभी नहीं त्यागते। इसलिए मानव को उनसे संदेश लेना चाहिए तथा जीवन में सदैव हंसना-मुस्कुराना चाहिए, क्योंकि खुश रहना जीवन की अनमोल कुंजी है; जीवन जीने का उत्तम सलीका है। इसलिए हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए ताकि दूसरे लोग भी हमें देखकर उल्लसित व आनंदित रह सकें और अपने कष्टों के भंवर से मुक्ति प्राप्त कर सकें।
अंत में मैं कहना चाहूंगी कि परमात्मा ने सबको समान बनाया है। इंसान कभी अच्छा-बुरा नहीं हो सकता… उसके सत्कर्म व दुष्कर्म ही उसे अच्छा व बुरा बनाते हैं…उसकी सोच को सकारात्मक व नकारात्मक बनाते हैं। अपने सुकर्मों से ही प्राणी सब का प्रिय बन सकता है। जैसे प्रकृति अपना स्वभाव नहीं बदलती; धरा, सूर्य, चंद्र, नदियां, पर्वत, वृक्ष आदि निरंतर कर्मशील रहते हैं; नियत समय पर अपने कार्य को अंजाम देते हैं; अपने स्वभाव को विषम परिस्थितियों में भी नहीं त्यागते; स्थिर रखते हैं…सो! हमें इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सत्य की राह का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि इनमें परोपकार की भावना निहित रहती है…ये किसी को आघात नहीं पहुंचाते और किसी का बुरा भी नहीं चाहते। हमारा स्वभाव भी वृक्षों की भांति होना चाहिए। वे धूप, आतप, वर्षा, आंधी, तूफ़ान आदि के प्रहार सहन करने के पश्चात् भी तपस्वी की भांति अडिग खड़े रहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि उन्हें अपने फलों का स्वाद नहीं चखना है। परंतु वे परोपकार हित सबको शीतल छाया व मीठे फल प्रदान करते हैं, भले ही कोई इन्हें कितनी भी हानि क्यों न पहुंचाए। इसी प्रकार सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं, चंद्रमा व तारे अपने निश्चित समय पर दस्तक देते हैं तथा निद्रा देवी थके-हारे मानव व समस्त प्राणी-जगत् को अपने आग़ोश में सुला लेती है ताकि वे भोर होते नव-चेतना व ताज़गी अनुभव कर, प्रफुल्लता से पुन: अपनी दिनचर्या में तल्लीन हो सकें। इसी प्रकार वर्षा के होने से धरा पर हरीतिमा छा जाती है और जीवनदायिनी फसलें लहलहा उठती हैं। इन सबसे बढ़कर ऋतु-परिवर्तन हमारे जीवन की एकरसता को मिटाता है।
मानव का स्वभाव चंचल है। वह एक-सी मन:स्थिति में लम्बे समय तक रहना पसंद नहीं करता। परंतु जब हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है; जो भूकंप, सुनामी, भयंकर बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी, भू-स्खलन आदि के रूप में समय-समय पर प्रकट होता है। यह कोटिशः सत्य है कि जब प्रकृति के विभिन्न उपादान अपना स्वभाव नहीं बदलते, तो मानव अपना स्वभाव क्यों बदले … जीवन में बुरी राह का अनुसरण करे तथा दूसरों को व्यर्थ हानि पहुंचाए? इस तथ्य से तो आप अवगत हैं कि जैसा व्यवहार आप दूसरों से करते हैं; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिये ‘सदैव अच्छा सोचिए, अच्छा बोलिए, अच्छा कीजिए, अच्छा दीजिए व अच्छा लीजिए।’ यदि दूसरा व्यक्ति आपके प्रति दुर्भावना रखता है व दुष्कर्म करता है, तो कबीरदास जी के दोहे का स्मरण कीजिए ‘जो ताको कांटा बुवै, तू बूवै ताको फूल’ अर्थात् आपको फूल के बदले फूल मिलेंगे और कांटे बोने वाले को शूल ही प्राप्त होंगे। इसलिए इस सिद्धांत को जीवन में धारण कर लीजिए कि शुभ का फल शुभ अथवा मंगलकारी होता है। इसलिए सदैव अच्छा ही अच्छा कीजिए। यह भी शाश्वत सत्य है कि कुटिल मनुष्य कभी भी अपनी कुटिलता का त्याग नहीं करता, जैसे सांप को जितना भी दूध पिलाओ; वह काटने का स्वभाव नहीं त्यागता। इसलिए ऐसे दुष्ट लोगों से सदैव सावधान रहना अपेक्षित है…उनकी फ़ितरत पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना व संकट में डालना है तथा उनका साथ देना अपने चरित्र पर लांछन लगाने व कालिख़ पोतने के समान है। सो! मानव के लिए दूसरों के व्यवहार के अनुरूप व प्रतिक्रिया-स्वरूप अपना स्वभाव न बदलने में ही उसका अपना व प्राणी-मात्र का हित है, मंगल है।