गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
कक्षा नर्सरी की अक्षरमाला के किताब में अक्षरों को पढ़ाते हुये शिक्षकों ने कहा नहीं बस अबोध मन को रटाते सीखते रहे।
जीवन के बढ़ते आपाधापी में तर्कशील शब्दों ने सुझाव दिया समाधान रटाने और पढ़ाने से नहींं बल्कि गढ़ने से सफल होता है,
दोहरे चरित्र की मिट्टी से बना समाज ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ और दर्शाता केवल व्यवहार व परिस्थितियां से तय करता है कि दोषी कौन है?
‘जब भगवान् कृष्णा का जन्म कारावास में हुआ तो दोषी कंस ही क्यों बना’ आखिर बाकी समाज के बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी भी तो देवकी का दोषी थी। बात महाभारत की हो तो अपने ही राज्य के हक के लिए अर्जुन को लड़ना पड़ा, वह भी अपने ही रक्त से परन्तु पंचाली और गंधारी का दोषी अभिमान से चुप चाप बैठा था, गर्वित क्यों?
अत:खुद के लिए एक अक्षरमाला की पुस्तिका बनाना सीखना चाहिए नारी शक्ति को जिसमें प से पंतग के साथ पंख भी लिखा हो।
वह पुस्तक ज्ञान देने के साथ अधिकार के लिए लड़ना भी सिखाता हो। शायद उस मे श से शुरुआत लिखा हो और अ से अधिकार लिखा हो, प से परंपरा लिखा हो व अ से अत्याचार का अंत भी लिखा हो!
श्रीकृष्ण के भगवत् गीता के जैसे अन्याय से लड़ने की बातें अबोध मन को अक्षरमाला के पुस्तकों के माध्यम से बचपन से ही शिक्षकों द्वारा पढाना शुरू किया जाना चाहिए।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सत्संगति की धारा…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 248 ☆सत्संगति की धारा… ☆
एक जैसी विचारधारा के लोग बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। जब व्यक्ति एक बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ता है तो बहुत से मददगार मिलते जाते हैं। इस दौरान कई बार ऐसा लगता है कि राह कठिन है पर तभी कुछ ऐसे घटनाक्रम होते हैं जिनसे सब कुछ आसान हो जाता है।
कहा भी गया है चरैवेति चरैवेति अर्थात चलते रहो चलते रहो। एक न एक दिन मुकाम अवश्य मिलेगा। जो दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ लेते ऐसे लोग हमेशा प्रसन्नचित नज़र आते हैं, उन्हें देखकर लगता ही नहीं कि इनको कभी कोई दुःख छू सकता है।
मीठे वचनों के प्रयोगों से आप सबके प्रिय बन सकते हैं। यदि दूसरों के हित हेतु कभी कड़वे बोल बोलने भी पड़ जाएँ तो भी वे सुनने वालों को मधुर लगेंगे क्योंकि उनका उद्देश्य सर्वजन हिताय है।
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छोड़िए- छोड़िए हर नशा छोड़िए।
जोड़िए- जोड़िए भाव को जोड़िए।।
प्रीत सच्ची सही अब निभानी सदा।
मोड़िए- मोड़िए ये कदम मोड़िए।।
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जब इन सबसे विजयी होकर कर्मभूमि पर उतरो तभी भ्रष्टाचार के दर्शन हो जाते हैं,कोई कार्य इसके बिना पूरा नहीं होता। हर व्यक्ति इसी की दुहाई देता हुआ मिल जायेगा कि ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार छाया हुआ है। महंगाई तो इसके साथ अमरबेल की तरह बढ़ रही है।
आवश्यकता है कि हम लोग जागरूक हों, अपने कर्तव्यों को समझें।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिल बट्टा और खलबत्ता…“।)
अभी अभी # 715 ⇒ सिल बट्टा और खलबत्ता श्री प्रदीप शर्मा
क्या आपके रसोड़े में आज भी यह जोड़ी मौजूद है ? पत्थर की सिल्ला और पत्थर की ही लोढ़ी, और लोहे का खल और लोहे का ही बत्ता ! जब तक मैं ज़मीन से जुड़ा रहा, ये मुझसे जुड़े रहे। आज मैं जमीन से ऊपर उठ गया हूं, एक फ्लैट में शिफ्ट हो गया हूं। आप कह सकते हैं, न तू ज़मीं के लिए है, न आसमां के लिए। तेरा वजूद है, सिर्फ़ 2BHK, लेट कम अटैच बाथ के लिए। अब मेरे फ्लैट की चार इंच की दीवारें और चमकदार नाज़ुक टाइल्स इनका बोझ नहीं सह सकती। पुराने घर में जहां मन करे, एक कील ठोंको और छतरी टांग दो। यहां तो अपनी ही दीवार में एक कील लगाने के लिए ड्रिलिंग करना पड़ता है। पूरी बिल्डिग जान जाती है, कहीं एक कील ठुक रही है। आज न सिल न बट्टा, और ना ही खलबत्ता। कोई फर्क नहीं अलबत्ता।
सिल अथवा सिल्ला, एक तरह की पोर्टेबल पत्थर की शिला ही तो होती है, जिसके मुंह पर चेचक के दाग की तरह खुरदुरे छेद होते हैं। इन पत्थरों को टांका जाता है। मोहल्ले में एक पत्थर और घट्टी टांकने वाला आवाज लगाता था। घट्टी भी एक पत्थर की छोटी चक्की ही होती थी, जिसमें पक्षियासन की मुद्रा में दोनों पाँव फैलाकर अनाज पीसा जाता था, और दालों को दला जाता था। तब दो ही तो कहावतें मशहूर थी कहासुनी के वक्त ! कौन सी चक्की का आटा खाते हो, और आ जाओ मैदान में, अगर मां का दूध पीया है तो ?
तब कहां घरों में मिक्सर ग्राइंडर होते थे। मेहनत और पसीने की खड़े मसालों की, सिल पत्थर पर पिसी चटनी का स्वाद ही कुछ और होता था। गर्म गर्म मुंगौड़ों के लिए पहले मूंग की दाल भिगोना और फिर उसे सिल बट्टे पर दरदरी पीसना, अदरक, हरी मिर्ची और धनिये के साथ। गणेश चतुर्थी के लड्डू के लिए पहले मुठिया तली जाती, फिर उसे खलबत्ते में कूटा जाता। खलबत्ते की आवाज के साथ मोहल्ले में खुशबू फैल जाती। फुर्सत ही फुर्सत, स्वाद ही स्वाद।
आज समय, स्वास्थ्य और तकनीकी ज्ञान ने सब कुछ कितना आसान कर दिया है। एक वह दिन, जब रसोई घर यानी पाक शाला में बिना स्नान प्रवेश वर्जित। पाक और नापाक का क्या साथ ! चूल्हे में अगर आग नहीं, तो गुलजार साहब पड़ोसी के चूल्हे से आग ले आते। ये मर्द नहीं मानते, उसी से बीड़ी भी जला लेते हैं। सो अनहाइजेनिक। दिन भर धुआं ही धुआं और रात भर रसोई में चिमनी का धुआं। और एक आज, रसोई में बढ़िया स्टैंडिंग किचन, वॉश बेसिन, एक्वा गार्ड, चार बर्नर वाला गैस स्टोव, फिलिप्स का मिक्सर, ग्राइंडर, माइक्रोवेव ओवन और रसोईघर का धुआं और प्रदूषण निकलने के लिए अत्याधुनिक बिजली की चिमनी। ।
सब कुछ कितना आसान, आरामदेह और आधुनिक हो गया। जो समय के साथ चला, वह आगे निकल गया, जो साइकिल से आगे नहीं बढ़ा, वो मोरसली गली में ही अटक गया। कांसे और पीतल के बर्तन बिक गए, अनब्रेकेबल क्राकरी भी तेजी से आई और निकल गई। बोन चाइना में हड्डियां पाई गई। दीनदयाल स्टेनलेस स्टील के बर्तन लेकर आए और येरा कांच के बर्तन।
जो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हैं, वे शायद आज भी चांदी के डिनर सेट में खाना खाते हों।
अगर इंसान हो हट्टा कट्टा, तो आजमा ले सिल बट्टा और खलबत्ता का स्वाद खट्टा मीठा। समय और सुविधा का तकाजा तो यही है, स्वाद से समझौता करें, स्वस्थ और तंदुरुस्त रहें। पहले शरीर को आराम देओ और बाद में बाबा रामदेव। सिलबट्टा, खलबत्ता नहीं हंसी ठट्टा, दोनों से कट्टम कट्टा।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कान का मैल…“।)
अभी अभी # 714 ⇒ कान का मैल श्री प्रदीप शर्मा
मैल का सफाई से कोई मेल नहीं ! हम रोज़ नहाते हैं, अपनी कंचन जैसी काया को स्वच्छ, सुंदर व पवित्र बनाए रखने की कोशिश करते हैं, फिर भी यह मैल न जाने कहां से तन – बदन में प्रवेश कर जाता है। चलिए मान लिया, मिट्टी का शरीर है, दिन भर धूल मिट्टी लगती रहती है, मैला होना कोई आश्चर्य का विषय नहीं। लेकिन सात तालों में बंद हमारा मन तो कितना अंदर है, वहां तक मैल कैसे पहुंच जाता है, अज़ीब पहेली है।
हम यहां पहेलियां बुझाने नहीं आए और न ही मन के मैल के विषय में ज्ञान बांटने आए हैं। आज हम सिर्फ और सिर्फ कान के मैल की बात करेंगे। सिर्फ एक मात्रा में मेला, मैला हो जाता है और जहां मेल जोल होना चाहिए वहां मैला आंचल। ईश्वर ने हमें दो दो कान, और दो दो आंखें दी है, सुनने और देखने के लिए। आंखों से कम दिखाई देने पर चश्मा तो आंखों पर लगता है, लेकिन दोनों कानों का बोझ बढ़ जाता है।
शरीर में जहां जहां भी मैल है, उसके अलग अलग नाम हैं। आंख में मैल नहीं कीच होता है, और कान में हींग की शक्ल का मैल होता है। यूं तो हमारी आंखों के नीचे नाक भी रहती है। कभी आंसू बहते हैं, तो कभी नाक बहती है। सयाने कह गए हैं, आंख में अंजन और दांत में मंजन नित्य करना चाहिए। लोग तो होटलों में खाना खाना जाते हैं, तो बिल के साथ, सौंफ और टूथ पिक, यानी दांत खुरचने का यंत्र भी उपलब्ध होता है। जहां यह उपलब्ध नहीं होता, मुंह में माचिस की काड़ी ही किया करते हैं। यह अच्छी बात नहीं है।।
नाक कान और गले के एक ही विशेषज्ञ होते हैं। अतः नाक और कान में उंगली करने के लिए भी सयानों ने रोक लगा रखी है। यूं तो कानों का काम केवल सुनने का है, और कान का मैल निकालने के लिए भी बाजार में cotton ear buds उपलब्ध हैं, इसके बावजूद जब कानों में असहनीय दर्द होता है, तो डॉक्टरों की लग जाती है।
कान में फंगस भी हो सकता है, और मवाद भी ! एक रात कान में भयंकर आवाज़ से मेरी नींद खुली। लगा, बांए कान में नगाड़े बज रहे हैं। कान में थोड़ा पानी डाला, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लगा कान के अंदर कोई कीट फड़फड़ा रहा है, जिसके कारण पूरे कान में आवाज़ गूंज रही थी।
ऐसे समय में, मां ही संकट मोचक बन काम आती है। उन्होंने मेरा सर अपनी गोद में लिया, रूई से थोड़ा गर्म गर्म सरसों का तेल मेरे कानों में डाला। कुछ ही देर में कान का शोर थम गया। मां ने रूई के फोहे से एक मरी हुई चींटी कान से बाहर निकाल दी।।
कान तो खैर दीवारों के भी होते हैं, और जिस तरह कमरों के खिड़की दरवाजों में पर्दे लगे होते हैं, कान का भी एक पर्दा होता है, जो बड़ा महीन होने के बावजूद, ठंड, गर्मी, पानी और धूल से हमारे कानों की रक्षा करता है। डी जे के दीवाने और शोर भरा संगीत सुनने के शौकीन, अपना कान का पर्दा गंवा बैठते हैं।
उम्र के हिसाब से कम सुनने के अलावा मधुमेह जैसी बीमारियों के कारण लोग अपने सुनने की शक्ति भी खो बैठते हैं। जो लोग कम सुनते हैं, वे कानों में मशीन लगा लेते हैं। वैसे सुनने वाली बात तो लोग बिना कान के भी सुन लेते हैं, और जिन्हें अनसुनी ही करना है, उनके लिए कान का होना, न होना कोई महत्व नहीं रखता।।
कुछ बातें इतनी मीठी होती है जो कानों में अमृत घोल देती हैं। जिन्हें खरी खोटी, सुनने अथवा सुनाने की आदत है, उसका इलाज किसी ई एन टी के पास नहीं। ईश्वर ने कान अच्छा सुनने के लिए दिए हैं, अच्छा सुनें, अच्छा सुनाएं। कान का मैल साफ़ करें, कानाफूसी से कान साफ नहीं होता। एक काम की बात कान में कह दूं ! जगजीत सिंह को सुनकर देखें, कान के साथ मन का मैल भी साफ हो जाएगा।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “टाइपराइटर…“।)
अभी अभी # 713 ⇒ टाइपराइटर श्री प्रदीप शर्मा
(23 जून International Typewriter Day पर विशेष आलेख)
राइटर और टाइपराइटर दोनों शब्दों से खेलते हैं। राइटर खुद लिखता है, टाइपराइटर जो टाइप करो, वह लिखता है। राइटर पहले पैदा हुआ, राइटर की सुविधा के लिए टाइपराइटर का आविष्कार हुआ।
जो लिखता है, वह लेखक! और जो टाइप करता है, वह टाइपिस्ट। लिखना भी सीखना पड़ता है, और टाइप करना भी। अंतर सिर्फ इतना है कि हर लिखने वाला भले ही लेखक नहीं होता, लेकिन हर टाइप करने वाला टाइपिस्ट हो सकता है।।
लेखक कई टाइप के होते हैं, टाइपिस्ट सिर्फ दो तरह के होते हैं, टाइपिस्ट और स्टेनो-टायपिस्ट! स्टेनो-टायपिस्ट को टाइपिंग के साथ द्रुत-लिपि अर्थात शॉर्ट-हैंड भी सीखना पड़ता है। टाइपराइटर और टायपिस्ट अंग्रेजों की ही देन है।
उनके समय में लड़कियां ही टाइपिस्ट होती थीं, क्योंकि उनकी उंगलियाँ नाजुक होती थी। पियानो की तरह जब की-बोर्ड पर उनकी उंगलियाँ चलती थी, तो घड़ी की टिक-टिक के साथ टाइपराइटर की भी टिप टिप की ध्वनि किसी संगीत से कम नहीं होती थी।
अंग्रेज़ चले गए, गोरी टाइपिस्ट ले गए, किस्म किस्म के टाइपराइटर छोड़ गए। रेमिंगटन टाइपराइटर से स्वर्गीय के एल सहगल की स्मृति जुड़ी हुई है। एक गायक-अभिनेता के पहले वे इस कंपनी के सेल्समेन जो थे। अंडरवुड, रॉयल, और ओलीवित्ति जैसे टाइपराइटर पर लोगों ने टाइपिंग सीखी और सरकारी दफ्तरों में धड़ल्ले से टाइपिस्ट; क्लर्क की भर्तियां होने लगीं।।
किसी संगीत-वाद्य की तरह टाइपराइटर में भी एक की-बोर्ड होता है। अंग्रेज़ी भाषा के अलावा भी विश्व की कई भाषाओं के की-बोर्ड टाइपराइटर में उपलब्ध होते हैं। हमारे देश में हिंदी, मराठी और गुजराती टाइपराइटर बहुतायत से देखे गए हैं। अंग्रेज़ी का की-बोर्ड आज भी वही है, जो मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर में उपयोग में आता है। हिंदी का की-बोर्ड बड़ी मुश्किल से याद होता था। बकमानजन, सपिवप।
नौकरशाही में, अदालत में, थाने में, पंचायत में, नगर पालिका में, अर्जियाँ देनी पड़ती थी। जो काम पहले अर्जीनवीस करते थे, वही काम बाद में टाइपिस्ट करने लग गए। लोअर कोर्ट और हाई कोर्ट में दावे पेश होते थे, पिटीशन फ़ाइल की जाती थी। वकील ड्राफ्ट बनाता था, टाइपिस्ट टाइप करता था, पिटीशन अदालत में पेश हो जाती थी।
जो छात्र कॉलेजों में स्नातकोत्तर पढ़ाई करते थे, उन्हें थीसिस प्रस्तुत करनी होती थी, अच्छे, सुंदर, सन-लिट् बॉन्ड पेपर पर करीने से टाइप करी हुई। कुछ टाइपिस्ट घिस-घिसकर इतने शालिग्राम बन चुके होते थे कि मात्रा और व्याकरण की गलतियाँ तो छोड़िए, ड्राफ्टिंग भी इतनी बेहतरीन करते थे कि देखते ही बनती थी।।
अक्षरों को काला करने के लिए रिबिन का उपयोग होता था। कागज़ की साइज फुल साइज कहलाती थी। अधिक प्रतियों के लिए कार्बन -पेपर का इस्तेमाल
किया जाता था। एक विदेशी कंपनी kores ही टाइपराइटर की समस्त स्टेशनरी सप्लाई करती थी। kores कंपनी tip-top नाम से कार्बन पेपर का निर्माण करती थी, जिसके ऊपर एक दुबली-पतली सुंदर ऑफिस-गर्ल का चित्र शोभायमान होता था।।
भारत में godrej और halda कंपनियों ने भी हिंदी-अंग्रेज़ी टाइपराइटर्स का निर्माण किया लेकिन समय के बढ़ते प्रभाव ने टाइपराइटर और टाइपिस्ट को अतीत में धकेल दिया। आज हम एक प्रिंटिंग मशीन अपने हाथों में लेकर बैठे हैं जो किसी मज़मून की कितनी भी प्रतियाँ निकालकर विश्व के किसी भी कोने में भेज सकते हैं। बुलेट ट्रेन के युग में एक टाइपराइटर पर टाइप करने में वही सुख मिल सकता है, जो कभी तांगे या टमटम पर, किसी शांत सड़क पर सवारी से महसूस किया जा सकता था।
रंग-बिरंगे छोटे-बड़े टाइपराइटर्स की छवि मनमोहक और आकर्षक तो होती ही है, जब नाजुक उँगलियों के स्पर्श से टाइपराइटर गतिमान होता है तो उसकी टप-टप की ध्वनि एक ऐसे संगीत को जन्म देती है जो शास्त्रीय न होते हुए भी कर्ण-प्रिय है, जिसकी तुलना केवल बारिश की टपकती बूँदों से की जा सकती है। हवाई जहाज की यात्रा छोड़ किसी टमटम में सैर करने की मंशा हो तो एक टाइपराइटर पर उंगलियाँ चलाइये, अतीत में खो जाइए …!!!!
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 137 ☆ देश-परदेश – हमारे सहायक: केशकर्तक ☆ श्री राकेश कुमार ☆
साधारण भाषा में हम लोग इनको नाई या नाऊ भी कहते हैं। मुंडन से जीवन के अंतिम समय तक इनकी सेवाएं ली जाती हैं।
कुछ दिन पूर्व एक केशकर्तक की सेवा के लिए वेटिंग में थे। अब तो उनकी दुकान पर ए सी की सुविधा भी है। दो तीन लोग और भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।
नए ग्राहक भी प्रवेश करते हुए पूछ रहे थे, कि कितना समय लगेगा ? क्या युवा या वृद्ध कोई भी इंतजार नहीं करना चाहता है, सब को मोबाइल में आए हुए मैसेज जो पढ़ने रहते हैं।
करीब पंद्रह वर्ष का एक बच्चा जब नाई की कुर्सी पर बैठा, तो उसने मोबाइल से अपने पिता से बात करवाई। पिता ने कहा बाल एकदम छोटे कर देना। इतना ही नहीं कटिंग पूरी हो जाने पर वीडियो कॉल के बाद पिताश्री ने नाई को और छोटे बाल करने के निर्देश भी दिए। टेक्नोलॉजी का सही उपयोग इसी को कहते है।
ये सुनकर हमें अपने बचपन की याद आ गई। नाई के यहां से जब बाल कटवा कर घर जाते थे, तो हमारे पिताजी वापिस नाई की दुकान पर भेज देते थे, कि बाल और छोटे करवा कर आओ। हमारा नाई इसलिए पहले से ही एकदम छोटे बाल कर देता था, ताकि दुबारा हम उसकी दुकान पर ना आएं। आज भी भारतीय पिता इस पुरानी परंपरा को बखूबी निभा रहे हैं।
केशकर्तक पूर्व में कैंची को मुख्य औजार के रूप में उपयोग करते थे। कैंची की कतर कतर आवाज़ में भी नाई दुनिया भर के रोचक किस्से नमक मिर्च लगा कर सुना देते थे। आजकल बैटरी चलित छोटी मशीन कम आवाज़ वाली उपयोग में आ रही है। इससे नाई की उंगलियों को भी आराम मिलता है। नाई भी मुंह में गुटका दबा कर अब कम ही बोल पाते हैं।
नाई के ग्राहक भी बीच बीच में मोबाइल पर तिरछी निगाह मार लेते हैं, शायद कोई नए प्रकार का मैसेज आ गया हो। ये भी हो सकता है, आप लोगों में से हमारा ये आलेख भी कोई बाल कटवाते हुए पढ़ रहा हो।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शुद्ध घी और चित्त शुद्धि…“।)
अभी अभी # 712 ⇒ शुद्ध घी और चित्त शुद्धि श्री प्रदीप शर्मा
क्या शुद्ध घी और शुद्ध चित्त का आपस में कोई संबंध है, शुद्ध घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, इसमें दो मत नहीं, अधिकांश लोग बाजार का अमूल घी अथवा केबीसी ब्रांड गोवर्धन घी पर भरोसा करते हैं। कुछ भाग्यशाली गुजरात की गिर देसी गाय पालते हैं, और उसके शुद्ध सात्विक, ऑर्गेनिक देशी घी का सेवन करते हैं।
कुछ लोग होते हैं, जो अपने ही घर पर उपलब्ध दूध का घी बनाकर उसका सेवन करते हैं। घर पर बनाए जाने वाला शुद्ध घी
का तरीका हमारे चित्त शुद्धि के तरीके से बहुत मेल खाता है। गुरु को रंगरेज तो कहा गया है, लेकिन किसी हलवाई को सदगुरु नहीं कहा गया। गुरु रंगरेज की तरह हमारे चित्त को अगर रंग सकता है तो घी बनाने का तरीका हमारे चित्त को शुद्ध करने के तरीके से पूरी तरह मेल खाता है।।
काश जितनी चिंता हम शुद्ध घी की करते हैं, उतनी ही चिंता हमें अपने चित्त की शुद्धि की भी होती। घी बनाने से चित्त शुद्ध करने का नुस्खा हमने ईजाद किया है, लेकिन इस पर हमारा कोई कॉपीराइट नहीं, मैं जब घर पर घी बनाता हूं तो मुझे ऐसा लगता है, मैं अपना चित्त शुद्ध कर रहा हूं। एक पंथ दो काज।।
सबसे पहले हम दूध को गर्म करते हैं, दूध की चाय बनती है, बच्चे दूध पीते हैं और हम उसकी मलाई निकाल लेते हैं। बिना मलाई के घी नहीं बनता। अपने आपको तपाए बिना चित्त कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जप, तप, साधन, सेवा, सत्संग सभी चित्त शुद्धि के साधन माने गए हैं।
लो जी दूध को तपाया और मलाई निकाल ली। जितना दूध है, उतने की ही मलाई निकलेगी, इसलिए रोज दूध गर्म होगा, तपेगा, और उसकी मलाई निकलेगी, जिसे एक बर्तन में एकत्रित कर लिया जाएगा। मलाई निकालने अथवा खाने से चित्त शुद्ध नहीं होता। थोड़ा धैर्य धारण करना पड़ता है। इस मलाई में चाहें तो थोड़ा दही मिलाते जाएं, और मलाई फ्रीजर में रखते जाएं। पहले तप और उसके बाद धीरज, मन ललचाता है, मलाई के लिए। मन पर कंट्रोल भी जरूरी है चित्त शुद्धि के लिए।।
चलिए कुछ दिन यही चलता रहा। अच्छी मलाई जमा हो गई। अब इसे एक बड़े बर्तन अथवा मटकी में रवई से, खूब सारा पानी डालकर मथ लिया। थोड़ा परिश्रम और ऊपर मक्खन तैरने लग गया। कृष्ण की सभी बाल लीलाएं, मटकी, माखन और गोपियों के आसपास ही घटित होती रहती हैं। माखन चोर की तरह किसी का दिल चुराएं, मक्खन नहीं।
लो जी यहां तो मक्खन देखते ही मुंह में पानी आ गया, और साथ में मलाई वाली छाछ भी। हम तो तर गए। लेकिन महाराज, अभी कहां चित्त शुद्धि हुई, घी तो अभी निकला ही नहीं। कंट्रोल कंट्रोल, नो चित्त शुद्धि विदाउट कंट्रोल।।
जी हां अब मक्खन छाछ से अलग होगा, जैसे विकार चित्त से अलग होते हैं, चित्त शुद्धि के समय। लेकिन अभी तो मक्खन की भी परीक्षा होगी, उसको भी संयम और विवेक की अग्नि में तपना होगा। बिना भाड़ में गए कभी चना सिका है, बिना भट्टी के कभी रसोई पकी है।
तेज आंच में मक्खन की तरह चित्त की परीक्षा हो रही है, कड़ी परीक्षा, तेज आंच, धैर्य की परीक्षा, और आखिर वह घड़ी आ ही जाती है, जब शुद्ध विकार युक्त घी चित्त शुद्ध की तरह कढ़ाई में तैरने लगता है।
साथ में कुछ विकार जलकर खाक नहीं होते, मावा बन जाते हैं। नर, सत्संग से क्या से क्या हो जाए। संसार में असार कुछ भी नहीं, फिर ज्ञानियों द्वारा सार सार ही ग्रहण किया जाता है, और थोथा उड़ा दिया जाता है।।
हमने घी बनाने का तरीका नहीं सीखा, चित्त शुद्धि का तरीका सीखा। सतगुरु की सीख ऐसी ही होती है, इसीलिए उसे रंगरेज कहते हैं। आप अपने गुरु स्वयं बनें, घर पर ही घी बनाएं, अपना चित्त शुद्ध करें। मैंने अपनी मां से सीखा, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागा मेरा ..!!
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 293 ☆ समन्वय…
मेरुदण्ड या रीढ़ की हड्डी, शरीर का केंद्रीय स्तम्भ है। इस स्तम्भ का लचीलापन ही इसकी शक्ति है। शारीरिक के साथ-साथ मानसिक लचीलापन, जीवन को स्वस्थ रखता है। समन्वय जीवन में अनिवार्य है। मानसिक लचीलापन समन्वय का आधार है।
परिजनों या परिचितों से थोड़ी-सी मतभिन्नता होने पर अधिकांश लोगों को लगता है कि वे विपरीत वृत्ति के हैं। उनसे समन्वय नहीं सध सकता। साधने के लिए चाहिए साधना। साधना के अभाव में समन्वय तो अस्तित्व ही नहीं पाता। हर साधना की तरह समन्वय भी समर्पण चाहता है, उदारता चाहता है, भिन्न-भिन्न स्वभाव को समान सम्मान देना चाहता है।
दृष्टि निरपेक्ष है तो सृष्टि में हर कहीं समन्वय है। दूर न जाते हुए स्वयं को देखो। शरीर नश्वर है, आत्मा ईश्वर है। एक हर क्षण मृत्यु की ओर बढ़ता है, दूसरा हर क्षण नये अनुभव से निखरता है। फिर आता है वह क्षण, जब शरीर और आत्मा पृथक हो जाते हैं लेकिन नयी काया में फिर साथ आते हैं।
देह व देहातीत के समन्वय पर पार्थ का मार्गदर्शन करते हुए पार्थसारथी ने कहा था,
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
आत्मा का किसी भी काल में न जन्म होता है और न ही मृत्यु। यह पूर्व न होकर, पुनः न रहनेवाला भी नहीं है। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।
सांख्ययोग की मीमांसा का यह योगेश्वर उवाच भी देखिए-
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।
इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्य देही आत्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।
युद्ध का एक अर्थ संघर्ष भी है। संघर्ष अपने आप से, संघर्ष अंतर्निहित समन्वय के दर्शन हेतु।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा द्वारा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नये शरीरों को ग्रहण करने की प्रक्रिया होती है।
जैसा पहले उल्लेख किया गया है, देह का नाशवान होना, आत्मा का अजन्मा होना, फिर मर्त्यलोक में कुछ समय के लिए दोनों का साथ आना, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ना होना.., समन्वय का ऐसा अनुपम उदाहरण ब्रह्मांड में और कौनसा होगा?
सृष्टि समन्वय से जन्मी, समन्वय से चलती, समन्वय पर टिकी है। दृष्टिकोण समन्वित करो, सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सार्वजनीन समन्वय दृष्टिगोचर होगा।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी
इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।
इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “निंदा-स्तुति…“।)
अभी अभी # 711 ⇒ निंदा-स्तुति श्री प्रदीप शर्मा
कल ही कबीर साहब का जन्मदिन था, जो माया को महा ठगिनी कहते थे। हम आज माया-ममता दोनों का ज़िक्र नहीं करेंगे, केवल निंदा-स्तुति की बात करेंगे। जिन्हें इन बातों में पड़कर अपनी चादर मैली नहीं करनी, वे अपने पाँव समेट लें।
निंदा लोकतंत्र का एक ऐसा हथियार है, जिसका उपयोग सत्ता-विपक्ष दोनों अपनी सुविधानुसार करते हैं।
कबीर साहब घोर लोकतांत्रिक थे, उन्होंने जो सम्मान एक निंदक को दिलाया, वह अनूठा, अद्भुत व अविस्मरणीय है। विपक्ष के नेता को जितनी भी सुविधाएँ, अधिकार और भत्ते आज मिल रहे हैं, उन सबका श्रेय कबीर साहब को जाता है।।
निंदक नियरे राखिये,
आँगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना
निर्मल करे सुभाय।।
न जाने क्यों, शास्त्रों और ग्रंथों में निंदा को एक अवगुण माना गया है, मानसिक विकार माना गया है। कबीर साहब iconoclast थे। वे रूढ़ियों, मान्यताओं के साथ -साथ ही मूर्ति-भंजक भी थे।
सज्जन लोग निंदा सहन कर सकते हैं, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। शिशुपाल को योगिराज श्रीकृष्ण ने गालियों के सौ अवसर दिये। आखिर हद होती है, इंसानियत की भी ! हमारे मोदीजी को ही ले लीजिए। विपक्ष ने गालियों की झड़ी लगा दी। मोदीजी ने भी गालियाँ गिना-गिनाकर जनता से वोट माँगे। जनता ने भी बदले में वोटों की झड़ी लगा दी।।
ईश-निंदा पाप है ! लेकिन अहंकारी दक्ष कहाँ मानने वाला था। अपनी पुत्री सती के ही समक्ष अपने दामाद त्रिपुरारी भोलेशंकर की निंदा शुरू कर दी। उनका यज्ञ में अपमान किया ! सती अपने पति का यह अपमान सहन नहीं कर सकी। आगे की कथा शिव-पुराण में पढिये। निंदा से क्लेश व ग्लानि उत्पन्न होती है, जिससे व्यक्ति के जीवन में भूचाल आ जाता है। न सुन सुन, सुन बुरा। न देख देख, देख बुरा, न बोल बोल, बोल बुरा। न सुन बुरा, देख बुरा, बोल बुरा।।
गीता प्रेस का प्रकाशन है, स्तोत्र रत्नावली जिसमें समस्त देवी-देवताओं की स्तुतियों का संकलन है ! स्तोत्र ही स्तुति है, प्रार्थना है, श्लोक है। स्तुति से देवता प्रसन्न होते हैं। दानव भी अपने इष्ट की स्तुति कर मनचाहा वरदान ले उड़ते हैं। जब देवता की कमज़ोरी स्तुति है, तो क्या मानव की स्तुति उसे महा-मानव नहीं बना सकती। ज़रा सी तारीफ़ में जो इंसान चने के झाड़ पर चढ़ जाए, उसकी स्तुति उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती है। एक देवकांत बरुआ थे, जो इंदिरा इज़ इंडिया का गुणगान करते घे। आज तो सब भक्तन मिलकर सरकार का स्तुतिगान कर रहे हैं। सत्ता की स्तुति ही में देश का कल्याण है। वैसे भी शास्त्रों में राजा की निंदा को पाप और राष्ट्रद्रोह कहा गया है।
कभी कभी स्तुति से भी काम नहीं बनता। सीता माता की खोज में श्रीराम रामेश्वरम के सागर-तट पर पहुँचे ! पहले शिवजी का पूजन किया फिर उदधि की स्तुति की, रास्ता माँगा। सागर नहीं माना। मर्यादा पुरुषोत्तम को क्रोध आया। भय बिनु होय न प्रीति। सागर नतमस्तक। राम जी के नाम से पत्थर भी तैरने लगे। सागर ने राह बनाई।।
निंदा-स्तुति का साथ, गुलाब जामुन और चाशनी का साथ है। कहीं किसी की निंदा से काम निकल जाता है, तो कहीं किसी की स्तुति से। निंदा अगर चाशनी है तो स्तुति चाशनी भरा गुलाबजामुन। ऐसे लोग किस काम के, जिन्हें गुलाबजामुन ही पसंद नहीं।
जीवन में मिठास हो। थोड़ी निंदा, थोड़ी स्तुति हो। जो गलत हो, उसका प्रतिकार हो, जो सही हो, उसका सत्कार हो। विद्वतजन सत्य की स्तुति करते हैं, असत्य की निंदा करते हैं। निंदा-स्तुति ही सत्-असत् है। किसी की निंदा से बचें, अपनी स्तुति से भी बचें। जिसके कारण हमारा अस्तित्व है, केवल वह ही स्तुति-योग्य है। प्राणी-मात्र की स्तुति करें, स्वार्थवश किसी व्यक्ति की नहीं।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर एक विशेष ज्ञानवर्धक आलेख – “भारत से विश्व तक.. योग की पाँच सहस्राब्दी की अमर यात्रा ” ।)
आलेख – भारत से विश्व तक.. योग की पाँच सहस्राब्दी की अमर यात्रा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(अंतरराष्ट्रीय योग दिवस विशेष)
योग का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है। योग के प्रारंभिक प्रमाण सिंधु-सरस्वती घाटी सभ्यता (2700 ईसा पूर्व) में मिलते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य, विशेष रूप से योग मुद्राओं वाली मुहरें, इंगित करती हैं कि योग उस समय की संस्कृति का अभिन्न अंग था। हिंदू परंपरा में भगवान शिव को ‘आदि योगी’ माना जाता है, जिन्होंने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान प्रदान किया।
वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) में योग का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जहाँ यह आध्यात्मिक एकता और ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने का साधन था। उपनिषदों में योग को “चित्त की वृत्तियों के निरोध” के रूप में परिभाषित किया गया, जिसका उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और अंततोगत्वा मोक्ष प्राप्त करना था।
योग साधना का शास्त्रीय काल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। ऋषि पतंजलि ने योग सूत्र की रचना कर योग को एक व्यवस्थित दर्शन प्रदान किया। उन्होंने अष्टांग योग की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें आठ चरण शामिल थे:
१। (सामाजिक अनुशासन)
नियम (व्यक्तिगत अनुशासन)
आसन (शारीरिक मुद्राएँ)
प्राणायाम (श्वास नियंत्रण)
प्रत्याहार (इंद्रिय संयम)
धारणा (एकाग्रता)
ध्यान (मेडिटेशन)
समाधि (परम चेतना)
भारतीय दर्शन में योग की प्रमुख शाखाएँ योग प्रकार, मार्ग, प्रतिपादक के आधार पर निर्धारित की गई है।
कर्म योग, निस्वार्थ कर्म की शिक्षा देता है।
भक्ति योग भक्ति और समर्पण को और ज्ञान योग बौद्धिक जागृति बताता है।
राज योग में ध्यान और मानसिक नियंत्रण पर बल दिया जाता है। मध्यकालीन परिवर्तन हुए जब भक्ति योग से हठयोग तक के साधक हुए।
मध्ययुगीन काल में योग ने विविध आध्यात्मिक परंपराओं के साथ एकीकरण किया। भगवद्गीता (200 ईसा पूर्व) ने कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग के मार्ग प्रस्तुत किए, जो व्यक्ति की प्रकृति के अनुरूप मुक्ति के विविध विकल्प प्रदान करते थे।
11वीं शताब्दी में योगी गोरखनाथ के नेतृत्व में नाथ परंपरा का उदय हुआ, जिसने हठयोग को केंद्र में रखा। इस शैली में कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए शारीरिक आसनों और श्वास तकनीकों पर विशेष जोर दिया गया। इसने योग के अभ्यास में एक भौतिक आयाम जोड़ा और आधुनिक योग शैलियों का मार्ग प्रशस्त किया।
आधुनिक पुनर्जागरण से योग समीचीन हुआ। स्वामी विवेकानंद ने योग के वैश्विक प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
औपनिवेशिक काल में स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में योग का परिचय पश्चिम से करवाया। उन्होंने योग के आध्यात्मिक और दार्शनिक पहलुओं पर जोर दिया, जिससे पश्चिम में पूर्वी रहस्यवाद के प्रति आकर्षण बढ़ा।
20वीं सदी में तिरुमलाई कृष्णमाचार्य और बी.के.एस. आयंगर जैसे योगाचार्यों ने योग को विज्ञान सम्मत रूप प्रदान किया। आयंगर की पुस्तक “लाइट ऑन योग”(1966) ने हठ योग को पुनर्परिभाषित किया और योग को घर-घर तक पहुँचाया। इसी काल में परमहंस योगानंद ने “ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” के माध्यम से अमेरिका में ध्यान योग को लोकप्रिय बनाया।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा। 11 दिसंबर 2014 को 177 देशों के समर्थन से 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। यह दिन ग्रीष्म संक्रांति (उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन) के रूप में चुना गया, जो भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
2025 में पुडुचेरी में आयोजित होने वाले कार्यक्रम की थीम “योग फॉर वन अर्थ, वन हेल्थ” रखी गई है, जो वैश्विक स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति योग के योगदान को रेखांकित करती है।
समकालीन परिदृश्य में डिजिटल युग में योग का विस्तार और उपयोग सार्वभौम है।
आज योग ने पारंपरिक सीमाओं को पार कर डिजिटल मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज की है। ऑनलाइन कक्षाएँ, योग ऐप्स और सोशल मीडिया ने योग को वैश्विक ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाया है। वैश्विक योग बाजार 2023 तक 66 अरब डॉलर से अधिक का हो गया है, जो इसकी व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है।
वैश्विक स्तर पर योग के प्रभाव के प्रमुख संकेत सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभ में परिलक्षित हो रहे हैं। अनुसंधानों ने पुष्टि की है कि योग तनाव कम करता है, हृदय गति नियंत्रित करता है, शरीर का लचीलापन बढ़ाता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है।
योग सांस्कृतिक आदान-प्रदान का विषय बन गया है। बैंगलोर के अक्षर योग केंद्र जैसे संस्थानों ने 12 गिनीज विश्व रिकॉर्ड स्थापित किए हैं, जिसमें 50 दिव्यांग बच्चों सहित देश-विदेश के हजारों प्रतिभागी शामिल हुए।
शैक्षिक एकीकरण में भी योग की भूमिका दिख रही है। अमेरिका, यूरोप और भारत सहित कई देशों ने योग को शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
योग साधना के सैन्य अनुप्रयोग भी हो रहे हैं। भारतीय सेना, सीआरपीएफ और पुलिस बलों में योग को अनिवार्य प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया गया है।
योग हमारी सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की दिशाएँ निर्धारित कर रहा है। योग भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया है। यूनेस्को ने 2016 में योग को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया, जो इसके वैश्विक महत्व को मान्यता देता है। भविष्य में योग अनुकूली प्रौद्योगिकी (वर्चुअल रियलिटी के माध्यम से) और चिकित्सा विज्ञान (योग चिकित्सा के रूप में) के साथ और अधिक एकीकृत होने की ओर अग्रसर है।
योग की यात्रा सिंधु घाटी की प्राचीन मुहरों से लेकर न्यूयॉर्क के योग स्टूडियो तक फैली चुकी है। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि “मन, शरीर और आत्मा का मिलन” है, जैसा कि आयुष मंत्रालय ने परिभाषित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि “योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य का रास्ता है”। जैसे-जैसे विश्व तनाव, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक विखंडन की चुनौतियों का सामना करता है, योग की “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य” की दृष्टि हमें स्मरण कराती है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान आधुनिक वैश्विक समस्याओं के समाधान में कितना प्रासंगिक है।