हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक भारतीय आत्मा।)

?अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिक्र होता है जब एक भारतीय आत्मा का, दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी की बात होती है। दद्दा का जन्म 1889 ईसवी में होशंगाबाद जिले के बाबई ग्राम में हुआ था। वैसे हमारा पैतृक निवास भी बाबई और सेमरी हरचंद ही है। हमारे बाप दादा भी वहीं पैदा हुए। देखिए, हमारी आत्मा भी कितनी भारतीय है। वैसे देखा जाए तो आज देश की सभी १४० करोड़ आत्माएं भी भारतीय ही हैं। भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, की तर्ज पर अगर आत्मा से पूछा जाए कि आत्मा रे आत्मा तेरा स्वरूप कैसा, तो शायद वह भी यही कहे, जिस जीव में विद्यमान, उस जैसा। आत्मा के बारे में गीता से अधिक ज्ञान कहां से मिल सकता है। बात सीधी नैनं छिन्दंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक: तक पहुंच जाती है। संक्षेप में हमारे जन्म के साथ ही आत्मा का प्राण के साथ हमारे शरीर में प्रवेश हो जाता है और जब प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो आत्मा भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। ।

लेकिन जब तक यह आत्मा हमारे शरीर में रहती है, इसे मन के अधीन रहना होता है और सारे सांसारिक प्रपंचों का साक्षी बनना पड़ता है। अगर हमारी आत्मा भारतीय है तो दुनिया के हर देशवासी की आत्मा भी उसी देश की वासी होगी। यथा An American Soul, A British Soul अथवा A Chinese Soul. एक देशसेवक फौजी जब अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाता है तो उसका शरीर और आत्मा एकरूप हो जाते हैं। आत्मा की तरह वह भी अमर हो जाता है।

जो अपने वतन अथवा मानवता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं, उनकी आत्मा उनसे अलग नहीं होती और वे जन्म मरण के बंधन से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

यह तो स्पष्ट है कि हमारे शरीर में कहीं न कहीं आत्मा है जरूर और उसी आत्मा में परमात्मा का भी वास है। उंगली में अंगूठी, अंगूठी में नगीना ! लेकिन काम, क्रोध, लोभ और मोह का आवरण हमें शुद्ध आत्मा तक नहीं पहुंचने देता। हम तो कम परेशान हैं, बेचारी आत्मा बहुत दुखी और परेशान है। सब गीता ज्ञान धरा रह जाता है, जब हमारी आत्मा दुखी सुखी होती है। हम कलेजे को ही आत्मा समझ बैठते हैं।

किसी आत्मा को अच्छी आत्मा और किसी आत्मा को दुष्टात्मा समझ बैठते हैं। ।

हमारी आत्मा कब कर्ता बनकर दुआ और बद्दुआ देने लगती है, हमें पता ही नहीं चलता। तुमने हमारी आत्मा को कष्ट पहुंचाया, ईश्वर तुम्हें देख लेगा। जब हमसे कुछ नहीं बन पड़ा, तो ईश्वर की धौंस दे दी। वाह रे मानुस की जात ?

जात पात तो हमसे छूटती नहीं, बड़े आत्मा परमात्मा की बात करते हैं। बात एक भारतीय आत्मा से शुरू हुई थी, ज्यादा दूर तलक नहीं गई। आत्मा का अपना दायरा है। आत्मा को भारतीय ही रहने दें चलेगा। देखा जाए तो बस वही परम सत्य और सनातन है। कम से कम इसे तो धर्म और राजनीति से दूर रखें। बड़ी मुश्किल होगी, अगर आत्मा भी कांग्रेस बीजेपी अथवा हिंदू मुसलमान हो गई। ।

कबीर बार बार जिस चादर की बात करते हैं और हमारे साहिर साहब जिस चुनरी के दाग के लिए फिक्रमंद हैं, क्या यह वही आत्मा तो नहीं। ओढ़ने की चुनरी हो या चादर, बात तो एक ही है।

आत्मा का क्या है, वह तो नित्य, शुद्ध और मुक्त है। वह तो काया का पिंजरा छोड़ परमात्मा में विलीन हो जाएगी और चित्रगुप्त अपने बही खाते खोलकर बैठे होंगे और घर में गरुड़ पुराण का पाठ चल रहा होगा। करते रहो दान पुण्य मृतात्मा की शांति और मुक्ति के लिए। लागा चुनरी में दाग, छुपा लो, छुपा सको तो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 295 – हर काल, हर हाल ! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 295 हर काल, हर हाल !… ?

संध्या समय प्राय: बालकनी में मालाजप या ध्यान के लिये बैठता हूँ। देखता हूँ कि एक बड़ी-सी छिपकली दीवार से चिपकी है। संभवत: उसे मनुष्य में काल दिखता है। मुझे देखते ही भाग खड़ी होती है। वह भागकर बालकनी के कोने में दीवार से टिकाकर रखी इस्त्री करने की पुरानी फोल्डिंग टेबल के पीछे छिप जाती है।

बालकनी यूँ तो घर में प्रकाश और हवा के लिए आरक्षित क्षेत्र है पर अधिकांश परिवारों की बालकनी का एक कोना पुराने सामान के लिये शनै:-शनै: आरक्षित हो जाता है। इसी कोने में रखी टेबल के पीछे छिपकर छिपकली को लगता होगा कि वह काल को मात दे आई है। काल अब उसे देख नहीं सकता।

यही भूल मनुष्य भी करता है। धन, मद, पद के पर्दे की ओट में स्वयं को सुरक्षित समझने की भूल। अपने कथित सुरक्षा क्षेत्र में काल को चकमा देकर जीने की भूल। काल की निगाहों में वह उतनी ही धूल झोंक सकता है जितना टेबल के पीछे छुपी छिपकली।

एक प्रसिद्ध मूर्तिकार अनन्य मूर्तियाँ बनाता था। ऐसी सजीव कि जिस किसीकी मूर्ति बनाये, वह भी मूर्ति के साथ खड़ा हो जाय तो मूल और मूर्ति में अंतर करना कठिन हो। समय के साथ मूर्तिकार वृद्ध हो चला। ढलती साँसों ने काल को चकमा देने की युक्ति की। मूर्तिकार ने स्वयं की दर्जनों मूर्तियाँ गढ़ डाली। काल की आहट हुई कि स्वयं भी मूर्तियों के बीच खड़ा हो गया। मूल और मूर्ति के मिलाप से काल सचमुच चकरा गया। असली मूर्तिकार कौनसा है, यह जानना कठिन हो चला। अब युक्ति की बारी काल की थी। ऊँचे स्वर में कहा, ‘अद्भुत कलाकार है। ऐसी कलाकारी तो तीन लोक में देखने को नहीं मिलती। ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार ने इतनी बड़ी भूल कैसे कर दी?” मूर्तिकार ने तुरंत बाहर निकल कर पूछा,” कौनसी भूल?”  काल हँसकर बोला,” स्वयं को कालजयी समझने की भूल।”

दाना चुगने से पहले चिड़िया अनेक बार चारों ओर देखती है कि किसी शिकारी की देह में काल तो नहीं आ धमका? …चिड़िया को भी काल का भान है, केवल मनुष्य बेभान है। सच तो यह है कि काल का कठफोड़वा तने में चोंच मारकर भीतर छिपे  कीटक का शिकार भी कर लेता है। अनेक प्राणी माटी खोदकर अंदर बसे कीड़े-मकोड़ों का भक्ष्ण कर लेते हैं। काल, हर काल में था, काल हर काल में है। काल हर हाल में रहा, काल हर हाल रहेगा।  काल से ही कालचक्र है,  काल ही कालातीत है। उससे बचा या भागा नहीं जा सकता।

थोड़े लिखे को अधिक बाँचना, बहुत अधिक गुनना।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 722 ⇒ पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # 722 ⇒ आलेख – पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन केवल सच्चाई और वास्तविकता से नहीं जीया जाता ! सपने सच नहीं होते, फिर भी सपने सुहाने लगते हैं। जीवन का सफर कभी सुहाना होता है, तो कभी काँटों भरा। मन को बहलाना ही मनोरंजन है। दुःख को कुछ समय के लिए भुलाना ही क्षणिक निवृत्ति है।

संगीत, कला और साहित्य जीवन को एक दिशा देते हैं, रोजमर्रा की उबाऊ दिनचर्या को रोचक और आकर्षक बना देते हैं। दुनिया फिल्मी हो, साहित्यिक हो, या फिर संगीतमय, जीवन में रस की सृष्टि करते हैं। साहित्य और संगीत अगर खास विधा है तो फ़िल्म एक आम विधा।।

संगीत अगर कानों में रस घोलता है तो दृश्य मन को आनंदित और आंदोलित करते हैं। आलमआरा और जहाँआरा जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह फिल्मी सफर आज उस मुकाम पर आ गया है, जहाँ सिनेमाहॉल का बड़ा पर्दा पहले टीवी का छोटा पर्दा हुआ और अब एंड्रॉयड के जरिये हमारी हथेली में कैद हो गया।

याद कीजिए सहगल, पृथ्वीराज कपूर, महिपाल, दिलीप, देव और राजकपूर की फिल्मों का दौर ! सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़। नर्गिस, मीनाकुमारी, साधना और सायराबानो की फिल्मों के पोस्टर्स। बिनाका गीत माला की धूम। हर पान वाले की दुकान पर बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं, जैसे गानों पर झूमते श्रोतागण। अभिनय सम्राट, संगीत सम्राट और हास्य सम्राट का त्रिवेणी संगम।।

समय का पंछी उड़ता जाए !

संचार क्रांति ने हरित क्रांति को पीछे छोड़ दिया। आज सिनेमाघर गिनती के हैं। जितने पहले शहर में सिनेमाघर थे, उससे अधिक आज मॉल हैं। दो आने की मूँगफली से पूरी ढाई घंटे की फ़िल्म देख ली जाती थी। आज 200 ₹ का पॉप कॉर्न कॉम्बो वह स्वाद नहीं देता।

आज मेरे हाथ में कोई बुक नहीं, फेसबुक है। बस इसे खोलने की देर है। एक झाड़ पर बैठे बंदरों से अधिक app मेरी उंगलियों तले दबे बैठे हैं। टीवी की पिक्चर ट्यूब की अब मुझे चिंता नहीं, एक टीवी दीवार से चिपका है तो एक मेरी आँखों से। यू ट्यूब में मैं जब चाहे सङ्गीत की महफ़िल सजा सकता हूँ। 24 x 7 मेरे सामने एक बोन्साई रजतपट है, सभी अभिनेताअभिनेत्रियों की फिल्में खुल जा सिम सिम की तरह केवल एक क्लिक की मोहताज है।।

फिल्मी पर्दे से फेसबुक के पर्दे तक का मेरा यह सफर बड़ा रोचक है। जो काम सन् 70 के दशक में संगीत, फिल्में और किताबें करती थी, वे सब आजकल केवल फेसबुक अकेली कर रही हैं। पहले किताबें बोलती नहीं थीं, आजकल लेखक से आपका जीवंत परिचय और संवाद होता है। रचना प्रक्रिया पर घर बैठे बहस होती है। सभी पुरानी फिल्में और क्लासिकल संगीत यू ट्यूब में उपलब्ध हो चुका है।

बस केवल एक पर्दे की जरूरत है, और वह है आँखों का पर्दा।

फेसबुक ओपन हुई और पर्दा खुला। किसी ने शायद इसी स्थिति को भाँपकर आज से कई वर्ष पहले इस गीत की रचना की होगी ;

पर्दा उठे सलाम हो जाए

बात बन जाये, काम हो जाए

फेसबुक का पर्दा उठ चुका है, आपसे सुबह का सलाम हो ही जाए ! सुप्रभात …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #282 ☆ ग़लत सोच : दु:खों का कारण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ग़लत सोच : दु:खों का कारण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 282 ☆

☆ ग़लत सोच : दु:खों का कारण… ☆

ग़लत सोच के लोगों से अच्छे व शुभ की अपेक्षा-आशा करना हमारे आधे दु:खों का कारण है, यह सार्वभौमिक सत्य है। ख़ुद को ग़लत स्वीकारना सही आदमी के लक्षण हैं, अन्यथा सृष्टि का हर प्राणी स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान समझता है। उसकी दृष्टि में सब मूर्ख हैं; विद्वत्ता में निकृष्ट हैं; हीन हैं और सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम हैं। ऐसा व्यक्ति अहंनिष्ठ व निपट स्वार्थी होता है। उसकी सोच नकारात्मक होती है और वह अपने परिवार से इतर कुछ नहीं सोचता, क्योंकि उसकी मनोवृत्ति संकुचित व सोच का दायरा छोटा होता है। उसकी दशा सावन के अंधे की भांति होती है, जिसे हर स्थान पर हरा ही हरा दिखाई देता है।

वास्तव में अपनी ग़लती को स्वीकारना दुनिया सबसे कठिन कार्य है तथा अहंवादी लोगों के लिए असंभव, क्योंकि दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है। वह हर अपराध के लिए दूसरों को दोषी ठहराता है, क्योंकि वह स्वयं को ख़ुदा से कम नहीं समझता। सो! वह ग़लती कर ही कैसे सकता है? ग़लती तो नासमझ लोग करते हैं। परंतु मेरे विचार से तो यह आत्म-विकास की सीढ़ी है और ऐसा व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। उसके रास्ते की बाधाएं स्वयं अपनी राह बदल लेती हैं और अवरोधक का कार्य नहीं करती, क्योंकि वह बनी-बनाई लीक पर चलने में विश्वास नहीं करता, बल्कि नवीन राहों का निर्माण करता है। अपनी ग़लती स्वीकारने के कारण सब उसके मुरीद बन जाते हैं और उसका अनुसरण करना प्रारंभ कर देते हैं।

ग़लत सोच के लोग किसी का हित कर सकते हैं तथा किसी के बारे में अच्छा सोच सकते हैं; सर्वथा ग़लत है। सो! ऐसे लोगों से शुभ की आशा करना स्वयं को दु:खों के सागर के अथाह जल में डुबोने के समान है, क्योंकि जब उसकी राह ही ठीक नहीं होगी; वे मंज़िल को कैसे प्राप्त कर सकेंगे? हमें मंज़िल तक पहुंचने के लिए सीधे-सपाट रास्ते को अपनाना होगा; कांटों भरी राह पर चलने से हमें बीच राह से लौटना पड़ेगा। उस स्थिति में हम हैरान-परेशान होकर निराशा का दामन थाम लेंगे और अपने भाग्य को कोसने लगेंगे। यह तो राह के कांटों को हटाने लिए पूरे क्षेत्र में रेड कारपेट बिछाने जैसा विकल्प होगा, जो असंभव है। यदि हम ग़लत लोगों की संगति करते हैं, तो उससे शुभ की प्राप्ति कैसे होगी ? वे तो हमें अपने साथ बुरी संगति में धकेल देंगे और हम लाख चाहने पर भी वहां से लौट नहीं पाएंगे। इंसान अपनी संगति से पहचाना जाता है। सो! हमें अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए, क्योंकि बुरे लोगों के साथ रहने से लोग हमसे भी कन्नी काटने लगते हैं तथा हमारी निंदा करने का एक भी अवसर नहीं चूकते। ग़लती छोटी हो या बड़ी; हमें उपहास का पात्र बनाती है। यदि छोटी-छोटी ग़लतियां बड़ी समस्याओं के रूप में हमारे पथ में अवरोधक बन जाएं, तो उनका समाधान कर लेना चाहिए। जैसे एक कांटा चुभने पर मानव को बहुत कष्ट होता है और एक चींटी विशालकाय हाथी को अनियंत्रित कर देती है, उसी प्रकार हमें छोटी-छोटी ग़लतियों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इंसान छोटे-छोटे पत्थरों से फिसलता है; पर्वतों से नहीं।

‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ अक्सर यह संदेश हमें वाहनों पर लिखित दिखाई पड़ता है, जो हमें सतर्क व सावधान रहने की सीख देता है, क्योंकि हमारी एक छोटी-सी ग़लती प्राण-घातक सिद्ध हो सकती है। सो! हमें संबंधों की अहमियत समझनी चाहिए चाहिए, क्योंकि रिश्ते अनमोल होते हैं तथा प्राणदायिनी शक्ति से भरपूर  होते हैं। वास्तव में रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं और भुने हुए पापड़ की भांति पल भर में दरक़ जाते हैं। मानव के लिए अपेक्षा व उपेक्षा दोनों स्थितियां अत्यंत घातक हैं, जो संबंधों को लील जाती हैं। यदि आप किसी उम्मीद रखते हैं और वह आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो संबंधों में दरारें पड़ जाती हैं; हृदय में गांठ पड़ जाती है, जिसे रहीम जी का यह दोहा बख़ूबी प्रकट करता है। ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय/ टूटे से फिर ना जुरै, जुरै तो गांठ परि जाए।’ सो! रिश्तों को सावधानी-पूर्वक संजो कर व सहेज कर रखने में सबका हित है। दूसरी ओर किसी के प्रति उपेक्षा भाव उसके अहं को ललकारता है और वह प्राणी प्रतिशोध लेने व उसे नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास करता है। यहीं से प्रारंभ होता है द्वंद्व युद्ध, जो संघर्ष का जन्मदाता है। अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को विनाश के कग़ार पर पहुंचा देता है। इसलिए हमें सबको यथायोग्य सम्मान ध्यान देना चाहिए। यदि हम किसी बच्चे को प्यार से आप कह कर बात करते हैं, तो वह भी उसी भाषा में प्रत्युत्तर देगा, अन्यथा वह अपनी प्रतिक्रिया तुरंत ज़ाहिर कर देगा। यह सब प्राणी-जगत् में भी घटित होता है। वैसे तो संपूर्ण विश्व में प्रेम का पसारा है और आप संसार में जो भी किसी को देते हो; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिए अच्छा बोलो; अच्छा सुनने को मिलेगा। सो! असामान्य परिस्थितियों में ग़लत बातों को देख कर आंख मूंदना हितकर है, क्योंकि मौन रहने व तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त न करने से सभी समस्याओं का समाधान स्वतः निकल आता है।

संसार मिथ्या है और माया के कारण हमें सत्य भासता है। जीवन में सफल होने का यही मापदंड है। यदि आप बापू के तीन बंदरों की भांति व्यवहार करते हैं, तो आप स्टेपनी की भांति हर स्थान व हर परिस्थिति में स्वयं को उचित व ठीक पाते हैं और उस वातावरण में स्वयं को ढाल सकते हैं। इसलिए कहा भी गया है कि ‘अपना व्यवहार पानी जैसा रखो, जो हर जगह, हर स्थिति में अपना स्थान बना लेता है। इसी प्रकार मानव भी अपना आपा खोकर घर -परिवार व समाज में सम्मान-पूर्वक अपना जीवन बसर कर सकता है। इसलिए हमें ग़लत लोगों का साथ कभी नहीं देना चाहिए, क्योंकि ग़लत व्यक्ति न तो अपनी ग़लती से स्वीकारता है; न ही अपनी अंतरात्मा में झांकता है और न ही उसके गुण-दोषों का मूल्यांकन करता है। इसलिए उससे सद्-व्यवहार की अपेक्षा मूर्खता है और समस्त दु:खों कारण है। सो! आत्मावलोकन कर अंतर्मन की वृत्तियों पर ध्यान दीजिए तथा अपने दोषों अथवा पंच-विकारों व नकारात्मक भावों पर अंकुश लगाइए तथा समूल नष्ट करने का प्रयास कीजिए। यही जीवन की सार्थकता व अमूल्य संदेश है, अन्यथा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ वाली स्थिति हो जाएगी और हम सोचने पर विवश हो जाएंगे… ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ का सिद्धांत सर्वोपरि है, सर्वोत्तम है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजने का प्रयास कीजिए और जो ग़लत है, उसे कोटि शत्रुओं-सम त्याग दीजिए…इसी में सबका मंगल है और यही सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 249 ☆ नियमितता की ताकत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना नियमितता की ताकत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 249 ☆ नियमितता की ताकत…

व्यक्ति अपने भविष्य का स्वयं निर्माता होता है। अक्सर देखने में आता है कि कोई बहुत मेहनती है, किंतु अपने जिद्दी स्वभाव के चलते सबके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता और पास आयी हुयी सफलता को ठोकर मारकर चल देता है।

समाज में जहाँ भिन्न- भिन्न विचारधारा के लोग रहते हैं, वहाँ सबके अनुसार तो बदलाव नहीं किया जा सकता पर कहीं न कहीं सूझ -बूझ की अपेक्षा तो इंसान एक दूसरे से कर ही सकता है। बदलाव को स्वीकार करो, इससे भले ही कंफर्ट जोन छिन जाए पर तरक्की पास आने लगेगी। दिखावे के चलते बिना सोचे विचार पैसे खर्च करना, छोटी- छोटी बातों में मुँह फुलाना, स्वामित्व की भावना को बलवती करना, बात न मानने पर चीखना-चिल्लाना, बैल की तरह बिना विचारे तोड़- फोड़ करना, आलस्य के चलते कार्य में सुस्ती, मानसिक व शारीरिक शिथिलता ये सब उदासी को जन्म देते हैं।

अवसर क्रमिक गति से आते -जाते रहते हैं, बस धैर्य के साथ सत्य की राह पकड़ कर नियमित रूप से चलते रहें।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 294 – युद्ध के विरुद्ध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 294 युद्ध के विरुद्ध… ?

मनुष्य कंदराओं में रहता था। सभ्यता के विकास के साथ उसने सामुदायिक उन्नति को आधार बनाया। परिणामस्वरूप नगर बसे, मनुष्य में अनेकानेक कलाओं का विकास हुआ। सारी विकास-यात्रा में  तथापि भीतर का आदिम न्यूनाधिक बना रहा।

इसी आदिम का एक पर्यायवाची है युद्ध। वस्तुत: युद्ध मनुष्य को ज्ञात और मनुष्य द्वारा विकसित एक ऐसी विद्रूप कला है जो मनुष्यता को ही विनाश के मुहाने पर ले आई। केवल विगत सौ वर्ष का इतिहास उठाकर देखें तो पाएँगे कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में तीन दशक से भी कम का अंतराल रहा। उसके बाद भी दुनिया निरंतर छोटे-बड़े युद्धों से जूझती रही है।

युद्ध की विभीषिका का दुष्परिणाम मनुष्य और मनुष्यता पर किस तरह से और कितना हुआ, इसका  आँखें खोलने वाला एक प्रमाण 31 मार्च 2015 को एक फोटो के रूप में सामने आया था।

‘सरेंडर्ड’

(युद्धग्रस्त सीरिया के शरणार्थी शिविर में रहने वाली 4 वर्षीय बच्ची हुडिया)

यह फोटो युद्धग्रस्त सीरिया के शरणार्थी शिविर में रहने वाली 4 वर्षीय बच्ची हुडिया का था। फोटो जर्नलिस्ट ने जब फोटो खींचने के लिए अपना कैमरा इस बच्ची की ओर घुमाया तो युद्धग्रस्त क्षेत्र की बिटिया ने कैमरे को बंदूक समझा और क्षण भर भी समय लगाए बिना भय से आत्मसमर्पण की मुद्रा में अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। ‘सरेंडर्ड’ शीर्षक का यह मर्मस्पर्शी चित्र शेष बची मनुष्यता के हृदय पटल पर गहराई से अंकित हो गया।

साथ ही यह चित्र अनेक प्रश्नों को विस्तृत कैनवास पर खड़ा कर गया। मनुष्य शनै:-शनै: युद्ध का आदी होता जा रहा है। युद्ध का आदी होने का अर्थ है कि मृत्यु और विनाश, बर्बरता और विद्रूपता अब हमारी संवेदना पर तुलनात्मक रूप से काफ़ी कम प्रभाव डालते हैं। यह प्रक्रिया आगे चलकर मनुष्य को पूरी तरह से संवेदनहीन कर देती है।

इससे भी अधिक घातक और दुखदाई है कि मानुष से अमानुष होने की इस यात्रा पर कोई चिंतित नहीं दिखाई देता। पिछले लगभग दो वर्ष से विश्व दो बड़े युद्ध देख रहा है। प्रकृति का निरंतर विनाश हो रहा है। मनुष्य के उन्माद ने अंतरिक्ष को प्रक्षेपास्रों का अड्डा बना दिया है तो सागर की गहराइयों में संहारक क्षमता वाली पनडुब्बियाँ उतार दी हैं। धरती, सागर, आकाश सब बारूद के ढेर पर बैठे हैं। उस पर तुर्रा यह कि अब तो शांति के लिए युद्ध को अनिवार्य बता कर नोबल प्राप्त करने का अभियान भी चल रहा है। सचमुच यह मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करने का समय है।

विचार करने पर खुली आँखों से दिखता तथ्य है कि महा शक्तियों के लिए युद्ध व्यापार हो चला है। हर कोई अपने तरीके से युद्ध बेच रहा है। जो युद्ध की परिधि में हैं, वे तिल-तिल कर जी रहे हैं, उनका मरना भी तिल- तिल कर ही है। जो प्रत्यक्ष युद्ध की परिधि से बाहर हैं उनके लिए युद्ध मनोरंजन भर है। बमों के धमाकों की, मिसाइल की, युद्ध के अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की चर्चा  करते समय प्राय: मारे जा रहे लोग, पीड़ित स्त्रियाँ, आतंकित बच्चे मनुष्य की आंखों में नहीं तैरते। कुछ देर युद्ध की ख़बरें देखना लोगों के लिए असंख्य चैनलों में एक और विकल्प भर रह गया है।

अपनी कविता ‘युद्ध के विरुद्ध’ स्मरण हो आई है-

कल्पना कीजिए,

आपकी निवासी इमारत

के सामने वाले मैदान में,

आसमान से एकाएक

टूटा और फिर फूटा हो

बम का कोई गोला,

भीषण आवाज़ से

फटने की हद तक

दहल गये हों

कान के परदे,

मैदान में खड़ा

बरगद का

विशाल पेड़

अकस्मात

लुप्त हो गया हो

डालियों पर बसे

घरौंदों के साथ,

नथुनों में हवा की जगह

घुस रही हो बारूदी गंध,

काली पड़ चुकी

मटियाली धरती

भय से समा रही हो

अपनी ही कोख में,

एकाध काले ठूँठ

दिख रहे हों अब भी

किसी योद्धा की

ख़ाक हो चुकी लाश की तरह,

अफरा-तफरी का माहौल हो,

घर, संपत्ति, ज़मीन के

सारे झगड़े भूलकर

बेतहाशा भाग रहा हो आदमी

अपने परिवार के साथ

किसी सुरक्षित

शरणस्थली की तलाश में,

आदमी की

फैल चुकी आँखों में

उतर आई हो

अपनी जान और

अपने घर की औरतों की

देह बचाने की चिंता,

बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष

सबके नाम की

एक-एक गोली लिए

अट्टहास करता विनाश

सामने खड़ा हो,

भविष्य मर चुका हो,

वर्तमान बचाने का

संघर्ष चल रहा हो,

ऐसे समय में

चैनलों पर युद्ध के

विद्रूप दृश्य

देखना बंद कीजिए,

खुद को झिंझोड़िए,

संघर्ष के रक्तहीन

विकल्पों पर

अनुसंधान कीजिए,

स्वयं को पात्र बनाकर

युद्ध की विभीषिका को

समझने-समझाने  का यह

मनोवैज्ञानिक अभ्यास है,

मनुष्यता को बचाए

रखने का यह प्रयास है!

अलबत्ता यह भी सच है की कभी-कभी युद्ध अपरिहार्य होता है। ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ के सूत्र से सहमत होते हुए भी यथासंभव युद्ध रोकने के सारे प्रयास किए जाने चाहिएँ। अठारह अक्षौहिणी सेना को निगल जाने वाले महाभारत युद्ध को रुकवाने के लिए योगेश्वर भी दुर्योधन के पास गए थे। युद्ध तब भी अंतिम विकल्प था, अब भी अंतिम विकल्प ही होना चाहिए।

नौनिहालों का आत्मसमर्पण, मनुष्यता के आत्मसमर्पण की घंटी है। यदि हम सच्चे मनुष्य हैं तो बचपन के चेहरे से आत्मसमर्पण के भाव को हटवा कर  फोटो खिंचवाने की प्रसन्नता में बदलने की मुहिम में जुटना होगा।  मानवता कराह रही है, मानवता बुला रही है। क्या हम सुन पा रहे हैं इस स्वर को?

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 6:44 बजे, 28 जून 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 718 ⇒ पवित्र रिश्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पवित्र रिश्ता।)

?अभी अभी # 718 ⇒ पवित्र रिश्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब भी पवित्र रिश्ते का जिक्र होता है, पतित पावन का स्मरण हो आता है। जो पतित को भी पावन कर दे, वह केवल परम पिता परमेश्वर ही हो सकता है।

हम संसारी तो रिश्तों में ही पवित्रता तलाशते रह जाते हैं।

रिश्ते अच्छे खराब तो हो सकते हैं, लेकिन क्या पवित्र और अपवित्र भी होते हैं। मां बेटे, भाई बहन, बेटी दामाद, सभी रिश्ते तो पवित्र होते हैं। क्या सच्चे प्यार का पवित्र होना भी जरूरी है। क्या किसी रिश्ते को गंगाजल से पवित्र किया जा सकता है। केवल पति पत्नी के रिश्तों को अग्नि की साक्षी में सात फेरों के बाद पवित्र माना जाता है। अब तो सुप्रीम कोर्ट लिव इन रिलेशन को भी पवित्र बनाने पर तुली हुई है।।

समाज हमें नैतिकता सिखा सकता है, कानून में बांध सकता है, लेकिन किसी रिश्ते को पवित्र अथवा अपवित्र नहीं ठहरा सकता। मीरा ने कुल की मान मर्यादा सब छोड़ दी। संतों के साथ बैठ बैठकर लोक लाज तक तज दी। अपने पति को पति नहीं, जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, ऐलान कर दिया। समाज ने उसे पवित्रता सिखाने के लिए दंडित भी किया लेकिन बात नहीं बनी।

लोग हंसते हैं, कुंती पुत्र कर्ण की तरह द्रौपदी पर, जो केवल कुंती के कहने पर पांच पांडवों की पत्नी बन गई ! वही कुंती, जो सूर्य पुत्र कर्ण को अपना बेटा घोषित नहीं कर पाई। और उसी द्रौपदी के बारे में यह कहा गया कि उसके जैसी कोई सती स्त्री नहीं। कृष्ण की पत्नी न होते हुए भी सभी प्रेम से राधे कृष्ण कहते हैं, सीता राम की तरह रुक्मणि कृष्ण नहीं।।

जिस तरह पारस लोहे को सोना बना देता है, अपवित्र को पवित्र करने का शॉर्ट कट भी है, यह मंत्र ;

ॐ अपवित्र: पवित्रो

वा सर्वा वस्थां गतोपि वा।

बाहर भीतर की पवित्रता का शर्तिया नुस्खा। इसी तरह एक तुलसी पत्र यानी तुलसी का पत्ता अपवित्र को पवित्र कर देता है। पूजा, आरती के पश्चात् जब पंडित जी पवित्र जल का भक्तजनों पर छिड़काव करते हैं, तो यह भाव जरूर मन में आता है, कि उस पवित्र जल का एक छींटा हम पर भी पड़ ही जावे।

चित्त की निर्मलता और आचरण की शुद्धता ही हमारे चरित्र का निर्माण करती है। फिर भी किसी को पवित्र अथवा अपवित्र घोषित करने का अधिकार ईश्वर ने मनुष्य को नहीं दिया। वह सबमें व्याप्त है। जिन समाज के ठेकेदारों में खुद ही चरित्र ना हो, वे किसी भी लाचार को चरित्रहीन घोषित कर सकते हैं। ऐसे चरित्र प्रमाण पत्र बांटने वालों से सावधान रहें। विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा जैसी जीवनी रचकर ‘ चरित्रहीन ‘ शरदचंद्र को अमर कर दिया।।

निष्ठा, त्याग, समर्पण और नि :स्वार्थ प्रेम ही पवित्रता की सच्ची पहचान है। यही ईश्वरीय प्रेम है। जो इन गुणों से युक्त हो, प्राणी मात्र से प्रेम करता है, है, वह सर्वगुण संपन्न होकर, मानव कहलाने की योग्यता रखता है …!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 717 ⇒ आषाढ़ का एक दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आषाढ़ का एक दिन।)

?अभी अभी # 717 ⇒ आषाढ़ का एक दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आषाढस्य प्रथम दिवसे पर अगर कालिदास का कॉपीराइट है तो आषाढ़ के एक दिन पर मोहन राकेश का। मुझे संस्कृत नहीं आती, अतः मैं कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल, कुमारसंभव और मेघदूतम् नहीं पढ़ पाया। कालिदास को हिंदी में पढ़ना शेक्सपीयर को हिंदी में पढ़ने जैसा है। जिसे संस्कृत नहीं आती, वह सुसंस्कृत नहीं कहलाता और जिसे अंग्रेजी नहीं आती, आजकल वह पढ़ा लिखा नहीं कहलाता। हमने मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन पढ़ लिया और संस्कृत नहीं आने के अपराध बोध से मुक्त हो गए।

हमारे अभिन्न मित्र श्री हृदयनारायण जी, जब प्रेम के ढाई अक्षरों में भी धाराप्रवाह संस्कृत बहा देते हैं, तो हमारी हिंदी हमें थाम नहीं पाती। जिसे तैरना नहीं आता, उसे भाषा के प्रवाह में बह जाना चाहिए। भाषा का प्रवाह सबको पार लगा देता है। जिसे एक बार भाषा का ज्ञान हो जाता है फिर वह ज्ञान के सागर में डुबकियां लगाता रहता है। ज्ञान के मोती भी उसी के हाथ लगते हैं।।

आषाढ़ के प्रथम दिन का शायद मेघदूत से संबंध है। इस बार आषाढ़ के पहले दिन ही एक बूंद भी पानी नहीं गिरा। शुक्र है फागुन की तरह, आषाढ़ के दिन चार नहीं होते, अभी आधा आषाढ़ पड़ा है, मेघदूत जल्दी कर, हरी अप।

इस बार आषाढ़ के दिनों में और भी कई दिन मिक्स हो गए। एक दिन तो ऐसा आया जिस दिन कई दिन एक साथ आ गए। आजकल दिन, दिवस हो जाता है, और दिवस, डे।

साल में वैसे तो सिर्फ 365 दिन होते हैं लेकिन अगर मदर्स डे, वेलेंटाइन्स डे और फादर्स डे की तरह अन्य दिवस अर्थात days का हिसाब लगाया जाए, तो वे 365 से अधिक ही बैठेंगे, कम नहीं। फरवरी का तो पूरा सप्ताह days’ week अर्थात् दिवसों का सप्ताह कहा जा सकता है। रोज़ डे, प्रोमिस डे, चॉकलेट डे, दिल दे, दिल ले, इत्यादि इत्यादि।

अभी अभी टाइपराइटर्स डे निकला, फादर्स डे भी अकेला नहीं आया, साथ में योग दिवस भी लेकर आया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, रोज दिन में तीन चार बार चाय पीने वाले हम भारतीय, चाय दिवस भी मनाते हैं। बस मैगी दिवस और पास्ता दिवस की कमी है शायद।।

मेरे लिए ” आषाढ़ का एक दिन ” बहुत महत्वपूर्ण है। कथाकार और नाटककार स्व.मोहन राकेश का यह पहला नाटक (1958) है। जो संस्कृत के ज्ञाता हैं, वे कालिदास को पढ़ें, हमारे जैसे हिंदीभाषी लोगों के लिए मोहन राकेश एक बहुत बड़ा काम कर गए। कितने कम समय में कोई इंसान सृजन के क्षेत्र में इतना कुछ कर जाता है ;(1925-1972) कि विश्वास ही नहीं होता। उनके दो और नाटक भी यहां उल्लेखनीय हैं, आधे अधूरे और लहरों के राजहंस।

अभी देव सोये नहीं हैं। मेघ हम पर मेहरबान हो रहे हैं। बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है। आषाढ़ के किसी भी दिन झमाझम हो सकती है। आप भी आषाढ़ के किसी एक दिन फुर्सत निकालकर मोहन राकेश का “आषाढ़ का एक दिन”, पढ़ ही लें। अगर पढ़ भी लिया हो, तो भी बार बार पढ़ने लायक है। जो नाट्य विधा अर्थात् स्टेज से जुड़े हैं, वे इसकी मंचीय खूबियों से भली भांति अवगत होंगे।

स्वागत, अभी आषाढ़ मास के कई दिन बाकी हैं।।

आषाढ़ के एक दिन की तरह शायद एक दिन विश्व नाट्य दिवस का भी अवश्य होगा। संस्कृत में कालिदास के अलावा भास और भवभूति भी नाटककार हैं। उधर अंग्रेजी साहित्य में भी विलियम शेक्सपियर और क्रिस्टोफर मार्लो के अलावा भी कई नाटककार हुए हैं।

हमारे देश में आज हिंदी की अपेक्षा मराठी मंच अधिक सक्रिय है।

कारण अच्छे मंचीय कलाकारों की फिल्मों में मांग। फिलहाल तो लगता है राजनीति साहित्य और संस्कृति को पूरी तरह लील रही है। कहीं हमें ऐसा दिन ना देखना पड़े कि लोग पूछें कौन कवि कालिदास और कौन मोहन राकेश..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #281 ☆ सब्र और ग़ुरूर… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सब्र और ग़ुरूर। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 281 ☆

☆ सब्र और ग़ुरूर… ☆

‘ज़िंदगी दो दिन की है।  एक दिन आपके हक़ में और एक दिन आप के खिलाफ़ होती है। जिस दिन आपके हक़ में हो, ग़ुरूर मत करना और जिस दिन खिलाफ़ हो, थोड़ा-सा सब्र ज़रूर करना।’ सब दिन होत समान अर्थात् समय परिवर्तनशील है; पल-पल रंग बदलता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति सुख में कभी फूलता नहीं; अपनी मर्यादा व सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता तथा अभिमान रूपी शत्रु को अपने निकट नहीं फटकने देता, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। वह दीमक की तरह बड़ी से बड़ी इमारत की जड़ों को खोखला कर देता है। उसी प्रकार अहंनिष्ठ मानव का विनाश अवश्यंभावी होता है। वह दुनिया की नज़रों में थोड़े समय के लिए तो अपना दबदबा क़ायम कर सकता है, परंतु एक अंतराल के पश्चात् वह अपनी मौत स्वयं मर जाता है। लोग उसके निकट जाने से भी गुरेज़ करने लगते हैं। इसलिए मानव को इस तथ्य को सदैव अपने ध्यान में रखना चाहिए कि ‘सुख के सब साथी दु:ख में न कोय।’ सो! मानव को सुख में अपनी औक़ात को सदैव स्मरण में रखना चाहिए, क्योंकि सुख सदैव रहने वाला नहीं। वह तो बिजली की कौंध की मानिंद अपनी चकाचौंध प्रदर्शित कर चल देता है

इंसान का सर्वश्रेष्ठ साथी उसका ज़मीर होता है; जो अच्छी बातों पर शाबाशी देता है और बुरी बातों पर अंतर्मन को झकझोरता है। किसी ने सत्य ही कहा है कि ‘हां! बीत जाती है सदियां/ यह समझने में/ कि हासिल करना क्या है?

जबकि मालूम यह भी नहीं/ इतना जो मिला है/ उसका करना क्या है?’ यही है हमारे जीवन का कटु यथार्थ। हम यह नहीं जान पाते कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है; हम संसार में आए क्यों हैं और हमारे जीवन का प्रयोजन क्या है? इसलिए कहा जाता है कि अच्छे दिनों में आप दूसरों की उपेक्षा मत करें; सबसे अच्छा व्यवहार करें तथा इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि सीढ़ियां चढ़ते हुए बीच राह चलते लोगों की उपेक्षा न करें, क्योंकि लौटते समय वे सब आपको दोबारा अवश्य मिलेंगे। सो! अच्छे दिनों में ग़ुरूर से दूर रहने का संदेश दिया गया है।

जब समय विपरीत दिशा में चल रहा हो, तो मानव को थोड़ा-सा सब्र अथवा संतोष अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि यह सुख वह आत्म-धन है; जो हमारी सकारात्मक सोच को दर्शाता है। इसलिए दु:ख को कभी अपना साथी मत समझिए, क्योंकि सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं। एक के जाने के पश्चात्  ही दूसरा दस्तक देता है। इसलिए कहा जाता है कि जो सुख में साथ दें, रिश्ते होते हैं/ जो दु:ख में साथ दें, फरिश्ते होते हैं।’ विषम परिस्थितियों में कोई कितना ही क्यों न बोल; स्वयं को शांत रखें, क्योंकि धूप कितनी तेज़ हो; समुद्र को नहीं सुखा सकती।  सो! अपने मन को शांत रखें; समय जैसा भी है– अच्छा या बुरा, गुज़र जाएगा।

विनोबा भावे के अनुसार ‘जब तक मन नहीं जीता जाता और राग-द्वेष शांत नहीं होते; तब तक मनुष्य इंद्रियों का गुलाम बना रहता है।’ सो! मानव को स्व-पर व राग-द्वेष से ऊपर उठना होगा। इसके लिए वाशिंगटन उत्तम सुझाव देते हैं कि ‘अपने कर्त्तव्य में लगे रहना और चुप रहना बदनामी का सबसे अच्छा जवाब है।’ हमें लोगों की बातों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि लोगों का काम तो दूसरों के मार्ग में कांटे बिछा कर पथ-विचलित करना है। यदि आप कुछ समय के लिए ख़ुद को नियंत्रित कर मौन का दामन थाम लेते हैं और तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते, तो उसका परिणाम घातक नहीं होता। क्रोध तो दूध के उफ़ान की भांति आता है; जो पल भर में शांत हो जाता है। सो! मौन रह कर अपने कार्य को सदैव निष्ठा से करें और व्यस्त रहें– यही सबसे कारगर उपाय है। इस प्रकार आप निंदा व बदनामी से बच सकते हैं। वैसे भी बोलना एक सज़ा है। इसलिए मानव को यथा-समय, यथा-स्थान उचित बात कहनी चाहिए, ताकि हमारी प्रतिष्ठा व मान-सम्मान सुरक्षित रह सके। सच्ची बात यदि मर्यादा में रहकर व मधुर भाषा में बोल कर कहें, तो सम्मान दिलाती है; वरना कलह का कारण बन जाती है। ग़लत बोलने से मौन रहना श्रेयस्कर है और यही समय की मांग है। दूसरे शब्दों में वाणी पर नियंत्रण व मर्यादापूर्वक वाणी का प्रयोग मानव को सम्मान दिलाता है तथा इसके विपरीत आचरण निरादर का कारण बनता है।

कबीरदास के मतानुसार ‘सबद सहारे बोलि/ सबद के हाथ न पांव/ एक सबद करि औषधि/ एक सबद करि घाव’ अर्थात् वाणी से निकला एक कठोर शब्द घाव करके महाभारत करा सकता है तथा वाणी की मर्यादा में रहकर बड़े-बड़े युद्धों पर नियंत्रण किया जा सकता है। आगे चलकर वे कहते हैं कि ‘जिभ्या जिन बस में करी/ तिन बस किये जहान/ नहीं तो औगुन उपजै/ कहें सब संत सुजान।’ इस प्रकार मानव अपने अच्छे स्वभावानुसार बुरे समय को टाल सकता है। दूसरी ओर ‘जे आवहिं संतोष धन, सब धन धूरि समान।’ रहीम जी का यह दोहा भी मानव को आत्म-संतुष्ट रहने की सीख देता है। मानव को किसी से अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि जो मिला है अर्थात् प्रभु प्रदत्त कांटों को भी पुष्प-सम मस्तक से लगाना चाहिए और प्रसाद समझ कर ग्रहण करना चाहिए।

भगवद्गीता का यह संदेश अत्यंत सार्थक है कि ‘जो हुआ है, जो हो रहा है और जो होगा निश्चित है।’ इसमें मानव कुछ नहीं कर सकता। इसलिए उसे नतमस्तक हो स्वीकारना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि ‘होता वही है जो मंज़ूरे ख़ुदा होता है।’ सो! उस परम सत्ता की रज़ा को स्वीकारने के अतिरिक्त मानव के पास कोई विकल्प नहीं है।

मीठी बातों से मानव को सर्वत्र सुख प्राप्त होता है और कठोर वचन का त्याग वशीकरण मंत्र है। तुलसी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। मानव को अपनी प्रशंसा सुन कर कभी गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह आपकी उन्नति के मार्ग में बाधक है। इसलिए कठोर वचनों का त्याग वह  वशीकरण मंत्र है; जिसके द्वारा आप दूसरों के हृदय पर आधिपत्य स्थापित कर सकते हैं। सो! जीवन में मानव को कभी अहम् नहीं करना चाहिए तथा जो मिला है ; उसी में संतोष कर अधिक की कामना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह मार्ग हमें पतन की ओर ले जाता है। दूसरे शब्दों में वह हमारे हृदय में राग-द्वेष के भाव को जन्म देता है और हम दूसरों को सुख-सुविधाओं से संपन्न देख उनसे ईर्ष्या करने लग जाते हैं तथा उन्हें नीचा दिखाने के अवसर तलाशने में लिप्त हो जाते हैं। दूसरी ओर हम अपने भाग्य को ही नहीं, प्रभु को भी  कोसने लगते हैं कि उसने हमारे साथ वह अन्याय क्यों किया है? दोनों स्थितियों में इंसान ऊपर उठ जाता है और उसे वही मनोवांछित फल प्राप्त होता है और वह जीते जी आनंद से रहता है। ग़मों की गर्म हवा का झोंका उसका स्पर्श नहीं कर पाता।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 716 ⇒ ह र क त ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ह र क त।)

?अभी अभी # 716 ⇒ ह र क त ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हरकत एक ऐसी सूक्ष्म अथवा स्थूल प्रक्रिया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कहीं कुछ ऐसा चल रहा होता है, जिसका हमें आभास तक नहीं होता। लेकिन अगर किसी ने तनिक इशारा भी कर दिया, तो हमारे कान खड़े हो जाते हैं।

हरकत को स्वस्थ गतिविधि नहीं माना जाता ! अबोध बालकों की कुछ हरकतें गंदी होती हैं, जिनके लिए माता पिता उन्हें अक्सर झिड़कते रहते हैं। बाथरूम में बंद करने तक की धमकी भी देते हैं।।

पक्ष और विपक्ष की अक्सर हरकतें ओछी होती हैं। पाकिस्तान की घुसपैठ की गतिविधियां भी इसी श्रेणी में आती हैं। अपराधियों के कारनामों की गिनती नीच हरकतों में होती है। कभी कभी किसी अपने की भी कोई हरकत इतनी नागवार गुजरती है कि मन खट्टा हो जाता है। मोहल्ले के कुछ लफंगे टाइप के लड़कों की हरकतों से शरीफ महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो जाता है। चीन की यह कोरोना वाली हरकत से तो, अब चीन क्या चाईनीज तक से नफ़रत हो गई है। आज की परिस्थिति में आप ट्रंप को हरकतबाज कह सकते हैं।

फिल्म हकीक़त का एक खूबसूरत सा गीत है :

ज़रा सी आहट जो होती है

तो दिल सोचता है,

कहीं ये वो तो नहीं !

जी नहीं। हकीकत तो यह है कि आहट का हरकत से कोई लेना देना नहीं। आपने कभी सांप के सरसराने की आवाज़ सुनी है, इसमें कोई आहट नहीं, झाड़ियों में हरकत सी होती है। सांप के चलने से सिर्फ हरकत होती है, बाहर भी, और अपने अंदर भी। मत पूछिए कैसी। हल्की हल्की बयार से पेड़ पौधों में, पत्तियों में एक हरकत होती है। जो देखी जा सकती है, महसूस की जा सकती है।।

आप जब किसी पड़ोसी के आंगन से कुछ फूल तोड़ने की इजाजत मांगते हैं, तो उसका जवाब होता है, कोई हरकत नहीं, आप जितने चाहें तोड़ लीजिए। हरकत यानी उज्र भी होता है। नो ऑब्जेक्शन। नो प्रोब्लम।

आइए, अब एक संयुक्त परिवार का हाल लेते हैं ! सबके चहेते ९०वर्षीय, स्वस्थ, खुशमिजाज, सभी परिजनों के दिलों की धड़कन, दादाजी, बिस्तर में पड़े हैं। अच्छे भले, हंसते खेलते, बातें करते, अचानक उन्हें स्ट्रोक आ गया, और वे कोमा में चले गए। पूरे घर में मातम मना हुआ है। दादाजी मज़ाक में कहते थे, पूरी सेंचुरी मारूंगा, इतनी जल्दी नहीं जाऊंगा।।

घर के सभी सदस्य चिंतित, प्रार्थनारत हैं, उन्हें अपने से अधिक दादाजी पर भरोसा है। उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता। डॉक्टर ने भी बोला है, जब तक दादाजी कोमा में हैं, हम कुछ नहीं कर सकते। आप बस प्रार्थना करें। या तो सबकी प्रार्थना रंग लाती है, या दादाजी का आत्मविश्वास, अचानक उनके शरीर में हरकत होती है, एक बार नहीं, दो तीन बार ! सबके शरीर में आशा का संचार होता है, मानो जग जीत लिया हो। डॉक्टर भी कहते हैं, खुश खबर है। दादाजी अब पुनः स्वस्थ हो सकते हैं।।

सबसे प्यारी हरकत संगीत में होती है। शास्त्रीय गायन और कुछ नहीं, सरगम की हरकत ही तो है। जब रविशंकर सितार के साथ हरकत करते हैं, बिस्मिल्लाह खान की शहनाई जब हरकत करती है, भीमसेन जोशी, पंडित जसराज और कुमार गंधर्व जब तान छेड़ते हैं, तो इबादत हो जाती है। इबादत से बढ़कर कोई हरकत नहीं।

जगजीतसिंह जब सरकती जाए, रुख से नकाब …. गाते हैं, तो कहां कहां हरकत नहीं होती। दर्शक झूम उठते हैं। पूरा हॉल आहिस्ता आहिस्ता से गूंज जाता है। केवल जगजीत की आवाज़ ही नहीं, हर वाद्य यंत्र हरकत में आ जाता है। क्या तबला, क्या वॉयलिन और क्या संतूर।।

शरारत की गिनती भी हरकत में ही आती है। घर में बच्चों की शरारत न होती, तो क्या लॉक डाउन के पहाड़ जैसे दिन आसानी से कटते। हर हरकत ऐसी हो हमारी, जिससे कोई आहत न हो। थोड़े शिकवे भी हों, कुछ शिकायत भी हो। फिर भी अगर कोई बेजा हरकत हो गई हो, तो गुस्ताखी माफ, गुस्ताखी माफ़।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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