हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #280 ☆ रिश्तों की तपिश… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख रिश्तों की तपिश। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 280 ☆

☆ रिश्तों की तपिश… ☆

सर्द हवा चलती रही/ रात भर बुझते हुए रिश्तों को तापा किया हमने‘– गुलज़ार की यह पंक्तियां समसामयिक हैं; आज भी शाश्वत हैं। रिश्ते कांच की भांति पल भर में दरक़ जाते हैं, जिसका कारण है संबंधों में बढ़ता अजनबीपन का एहसास, जो मानसिक संत्रास व एकाकीपन के कारण पनपता है और उसका मूल कारण है…मानव का अहं, जो रिश्तों को दीमक की भांति चाट रहा है। संवादहीनता के कारण पनप रही आत्मकेंद्रितता और संवेदनहीनता मधुर संबंधों में सेंध लगाकर अपने भाग्य पर इतरा रही है। सो! आजकल रिश्तों में गर्माहट रही कहां है?

विश्व में बढ़ रही प्रतिस्पर्द्धात्मकता के कारण मानव हर कीमत पर एक-दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है। उसकी प्राप्ति के लिए उसे चाहे किसी भी सीमा तक क्यों न जाना पड़े? रिश्ते आजकल बेमानी हैं; उनकी अहमियत रही नहीं। अहंनिष्ठ मानव अपने स्वार्थ-हित उनका उपयोग करता है। यह कहावत तो आपने सुनी होगी कि ‘मुसीबत में गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।’ आजकल रिश्ते स्वार्थ साधने का मात्र सोपान हैं और अपने ही, अपने बनकर अपनों को छल रहे  हैं अर्थात् अपनों की पीठ में छुरा घोंपना सामान्य-सी बात हो गयी है।

प्राचीन काल में संबंधों का निर्वहन अपने प्राणों की आहुति देकर किया जाता था… कृष्ण व सुदामा की दोस्ती का उदाहरण सबके समक्ष है; अविस्मरणीय है…कौन भुला सकता है उन्हें?  सावित्री का अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए यमराज से उलझ जाना; गंधारी का पति की खुशी के लिए अंधत्व को स्वीकार करना; सीता का राम के साथ वन-गमन; उर्मिला का लक्ष्मण के लिए राजमहल की सुख- सुविधाओं का त्याग करना आदि तथ्यों से सब अवगत हैं। परंतु लक्ष्मण व भरत जैसे भाई आजकल कहां मिलते हैं? आधुनिक युग में तो ‘यूज़ एण्ड थ्रो’ का प्रचलन है। सो! पति-पत्नी का संबंध भी वस्त्र-परिवर्तन की भांति है। जब तक अच्छा लगे– साथ रहो, वरना अलग हो जाओ। सो! संबंधों को ढोने का औचित्य क्या है? आजकल तो चंद घंटों पश्चात् भी पति-पत्नी में अलगाव हो जाता है। परिवार खंडित हो रहे हैं और सिंगल पेरेंट का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। बच्चे इसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा भुगतने को विवश हैं। एकल परिवार व्यवस्था के कारण बुज़ुर्ग भी वृद्धाश्रमों में आश्रय पा रहे हैं। कोई भी संबंध पावन नहीं रहा, यहां तक कि खून के रिश्ते, जो परमात्मा द्वारा बनाए जाते हैं तथा उनमें इंसान का तनिक भी योगदान नहीं होता …वे भी बेतहाशा टूट रहे हैं।

परिणामत: स्नेह, सौहार्द, प्रेम व त्याग का अभाव चहुंओर परिलक्षित है। हर इंसान निपट स्वार्थी हो गया है। विवाह-व्यवस्था अस्तित्वहीन हो गई है तथा टूटने के कग़ार पर है। पति-पत्नी भले ही एक छत के नीचे रहते हैं, परंतु कहां है उनमें समर्पण व स्वीकार्यता का भाव? वे हर पल एक-दूसरे को नीचा दिखा कर सुक़ून पाते हैं। सहनशीलता जीवन से नदारद होती जा रही है। पति-पत्नी दोनों दोधारी तलवार थामे, एक-दूसरे का डट कर सामना करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का प्रचलन तो सामान्य हो गया है। बीस वर्ष तक साथ रहने पर भी वे पलक झपकते अलग होने में जीवन की सार्थकता स्वीकारते हैं, जिसका मुख्य कारण है…लिव-इन व विवाहेतर संबंधों को कानूनी मान्यता प्राप्त होना। जी हां! आप स्वतंत्र हैं। आप निरंकुश होकर अपनी पत्नी की भावनाओं पर कुठाराघात कर पर-स्त्री गमन कर सकते हैं। ‘लिव-इन’ ने भी हिन्दू विवाह पद्धति की सार्थकता व अनिवार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। कैसा होगा आगामी पीढ़ी का चलन? क्या इन विषम परिस्थितियों में परिवार-व्यवस्था सुरक्षित रह पाएगी?

मैं यहां ‘मी टू’ पर भी प्रकाश डालना चाहूंगी, जिसे कानून ने मान्यता प्रदान कर दी है। आप पच्चीस वर्ष पश्चात् भी किसी पर दोषारोपण कर अपने हृदय की भड़ास निकालने को स्वतंत्र हैं।  हंसते-खेलते परिवारों की खुशियों को होम करने का आपको अधिकार है। सो! इस तथ्य से तो आप सब परिचित हैं कि अपवाद हर जगह मिलते हैं।  कितनी महिलाएं कहीं दहेज का इल्ज़ाम लगा व ‘मी टू’ के अंतर्गत किसी की पगड़ी उछाल कर उनकी खुशियों को मगर की भांति लील रही हैं।

इन विषम परिस्थितियों में आवश्यक है– सामाजिक विसंगतियों पर चर्चा करना। बाज़ारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण जीवन- मूल्य खण्डित हो रहे हैं और उनका पतन हो रहा है। सम्मान-सत्कार की भावना विलुप्त हो रही है और मासूमों के प्रति दुष्कर्म के हादसों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। कोई भी रिश्ता विश्वसनीय नहीं रहा। नब्बे प्रतिशत बालिकाओं का बचपन में अपनों द्वारा शीलहरण हो चुका होता है और उन्हें मौन रहने को विवश किया जाता है, ताकि परिवार विखण्डन से बच सके। वैसे भी दो वर्ष की बच्ची व नब्बे वर्ष की वृद्धा को मात्र उपभोग की वस्तु व वासना-पूर्ति का साधन स्वीकारा जाता है। हर चौराहे पर दुर्योधन व दु:शासनों की भीड़ लगी रहती है, जो उनका अपहरण करने के पश्चात् दुष्कर्म कर अपनी पीठ ठोकते हैं। इतना ही नहीं, उनकी हत्या कर वे  सुक़ून पाते हैं, क्योंकि वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि वे सबूत के अभाव में छूट जायेंगे। सो! वे निकल पड़ते हैं–नये शिकार की तलाश में। हर दिन घटित हादसों को देख कर हृदय चीत्कार कर उठता है और देश के कर्णाधारों से ग़ुहार लगाता है कि हमारे देश में सऊदी अरब जैसे कठोर कानून क्यों नहीं बनाए जाते, जहां पंद्रह मिनट में आरोपी को खोज कर सरेआम गोली से उड़ा दिया जाता है; जहां राजा स्वयं पीड़िता से मिल तीस मिनट में अपराधी को उल्टा लटका कर भीड़ को सौंप देते हैं ताकि लोगों को सीख मिल सके और उनमें भय  का भाव उत्पन्न हो सके। इससे दुष्कर्म के हादसों पर अंकुश लगना स्वाभाविक है।

इस भयावह वातावरण में हर इंसान मुखौटे लगा कर जी रहा है; एक-दूसरे की आंखों में धूल झोंक रहा है। आजकल महिलाएं भी सुरक्षा हित निर्मित कानूनों का खूब फायदा उठा रही हैं। वे बच्चों के लिए पति के साथ एक छत के नीचे रहती हैं, पूरी सुख-सुविधाएं भोगती हैं और हर पल पति पर निशाना साधे रहती हैं। वे दोनों दुनियादारी के निर्वहन हेतू पति-पत्नी का क़िरदार बखूबी निभाते हैं, जबकि वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि यह संबंध बच्चों के बड़े होने तक ही कायम रहेगा। जी हां, यही सत्य है जीवन का…समझ नहीं आता कि पुरुष इन पक्षों को अनदेखा कर कैसे अपनी ज़िंदगी गुज़ारता है और वृद्धावस्था की आगामी आपदाओं का स्मरण कर चिंतित नहीं होता। वह बच्चों की उपेक्षा व अवमानना का दंश झेलता, नशे का सहारा लेता है और अपने अहं में जीता रहता है। पत्नी सदैव उस पर हावी रहती है, क्योंकि वह जानती है कि उसे प्रदत्त अधिकार से कोई भी बेदखल नहीं कर सकता। हां! अलग होने पर मुआवज़ा, बच्चों की परवरिश का खर्च आदि मिलना उसका संवैधानिक अधिकार है। इसलिए महिलाएं अपने ढंग से जीवन-यापन करती हैं।

यह तो सर्द रातों में बुझते हुए दीयों की बात हुई।

जैसे सर्द हवा के चलने पर जलती आग के आसपास बैठ कर तापना बहुत सुक़ून देता है और इंसान उस तपिश को अंत तक महसूसना चाहता है, जबकि वह जानता है कि वे संबंध स्थायी नहीं हैं; पल भर में ओझल हो जाने वाले हैं। इंसान सदैव सुक़ून की तलाश में रहता है, परंंतु वह नहीं जानता कि आखिर सुक़ून उसे कहाँ और कैसे प्राप्त होगा? इसे आप रिश्तों को बचाने की मुहिम के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, परंतु ऐसा है नहीं, क्योंकि ‘मानव खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखता है। वह आज को जी लेना चाहता है; कल के बारे में चिन्ता नहीं करता।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ || अवसाद / तनाव / डिप्रेशन  || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्हें 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान से नवाजा गया। उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ || अवसाद / तनाव / डिप्रेशन || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

“तुम ने कहा नहीं

फिर भी मैं सुनना चाहती हूँ

कोई प्रेम पे काव्य नहीं ना ही किसी दूसरे के द्वारा बल्कि मैं वह सारी बातें तुम से सुनना चाहती हूँ”

मन के अतंस में अक्सर अपने जीवन साथी से बस दो पल और दो बातें को तरस जाती स्त्रियों चुप्पी साधे निहारती रहतीं है उन्हे सांत्वना या दु:ख नहीं होता बल्कि घुटन होती है वह अपने जीवन साथी से बहुत कुछ कहना चाहती है, सुनना चाहती हैं लेकिन शायद उसके पति के पास इस सब के लिए वक़्त होता है और अगर वक़्त नहीं होता है तो केवल पत्नी के लिए नहीं होता।

ना जाने कितनी स्त्रियाँ अजीब सी जिदंगी जीने पे मजबूर हैं, जो कहती नहीं लेकिन जी रहीं हैं। इस रिश्तों में पति-पत्नी एक छत के नीचे बैठते उठते हैं लेकिन बातें बस औपचारिकतावश करते हैं। उनके लिए बच्चे एक प्राथमिकता हैं जो उन्हें जोड़कर रखे हैं  समाज में सुखी कपल्स दिखते हैं, जबकि उनका रिश्ता बिलकुल उस पेड़ के जैसे होता है जो अंदर ही अंदर खोखला हो चुका होता है।

यह अलगाव ज्यादातर संयुक्त परिवार में नज़र आ रहा है। कारण है पति पत्नी को खुद के लिए वक़्त ना मिलना। पत्नी का घर के कार्य में व्यस्त और पति चाकरी में। दोनों साथ होकर भी साथ नहीं होते। परिवार में आपसी तालमेल नहीं होने के कारण दोनों के रिश्तों में तनाव उभरने लगता है। कुछ रिश्ते बच्चों के लिए बचा लेते हैं, तो कुछ तलाक़ लेकर अलग अलग हो जाते हैं।

समाज को दिखावे के लिए कुछ कपल्स जोड़ी चुपचाप साथ रहते हैं और अवसाद तनाव झेलते है, कुछ तनाव में आकर सुसाइड तक कर लेते हैं।

इस सब के पीछे बस एक ही कारण है ‘पति पत्नी के रिश्तों में वक़्त की कमी’।

मैं यह नहीं कह रही कि आप पत्नी या पति को की-रिंग बना कर घुमाये लेकिन आत्मिक सुख चैन शांति संवाद जरूर बनाकर रखें।

अपनी जीवनसंगिनी को संयुक्त परिवार के साथ सास-ससुर के घर में नहीं बल्कि अपने हृदय में रखने की कोशिश करें ताकि आप की पत्नी आपके साथ साथ आपके घर में निवास करे।

अरे पत्नी को समझने के लिए उसके पति को ज्यादा कुछ नहीं बस एक स्नेह भरा स्पर्श देते हुए एक वाक्य कहना पड़ता है ‘पगली मैं हूँ न तेरे साथ’।

बस यही एक वाक्य पति पत्नी के रिश्तों को अटूट विश्वास प्रेम में बांधकर जिंदा रहने के लिए मजबूर कर देता है।

वक्त रहते अगर संभाल सकते हैं तो संभाल लीजिए वरना तस्वीरें संभालने में देर नही लगती।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 247 ☆ प्रेरणादायक… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना प्रेरणादायक। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 247 ☆ प्रेरणादायक

सत्य निष्ठ व्यक्ति जब पूर्ण मनोयोग से कोई कार्य करता है तो निश्चय ही उसे मंजिल मिलती है। बस एक दिशा में सही मार्गदर्शक के साथ जुटे रहिए…

सत्य सार्थक सतत सफलता

साधन सत होता।

कर्म किए जाता  जो मानव

कभी नहीं रोता।।

*

भूल चूक से मत घबराना

बाधाओं से लड़- लड़ जाना।

कठिन भले लगती हो मंजिल

लक्ष्य प्राप्त कर तुम मुस्काना।।

*

बीज हृदय में सच्चाई के

जब – जब भी बोता।

कर्म किए जाता जो मानव

कभी नहीं रोता।।

*

अटल सत्य जीना अरु मरना

मानवता की पीड़ा हरना।

लाख गिरें पर उठ- उठ जाना

विषम परिस्थिति धीरज धरना।।

*

पापों को अपने आँसू से

निश्छल हो धोता।

कर्म किए जाता जो मानव

कभी नहीं रोता।।

कर्मपथ पर निरंतर चलते रहिए।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 708 ⇒ लेट लतीफ… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेट लतीफ।)

?अभी अभी # 708 ⇒ लेट लतीफ… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किसी और का नाम किसी व्यक्ति पर आरोपित करना कहां की समझदारी है। वक्त के बाद आप पहुंचते हैं, गलती आपकी है, लेट आप हो रहे हैं, और बदनाम बेचारा लतीफ हो रहा है। अजीब लतीफा है।

वियोगी होगा पहला कवि की तरह शायद लतीफ पहला इन्सान ऐसा हुआ होगा, जो बेचारा कहीं वक्त पर नहीं पहुंचा होगा, उसकी कुछ मजबूरी रही होगी। लेकिन बद अच्छा, बदनाम बुरा। लतीफ अच्छा, लेट लतीफ, ना बाबा ना।।

जो आदतन लेट होते हैं, उन्हें इस विशेषण से सम्मानित किया जाता है। राजा महाराजाओं की सवारी की तरह, लोग उन्हें देखते ही कह उठते हैं, लो आ गए, महाराज लेट लतीफ। वे भी आदत से मजबूर हैं अथवा उनकी भी कोई मजबूरी रहती होगी।

हर दफ्तर में लेट लतीफ पाए जाते हैं। महिलाओं में भी लेट लतीफी होती होगी, लेकिन कोई लता अथवा ललिता कभी लेट नहीं हुई, इसलिए उनके लिए कोई लेट लता अथवा लेट ललिता जैसा आदर्श स्थापित नहीं हो सका। घर गृहस्थी भी संभालना, बच्चों को स्कूल भेजना, पतिदेव का टिफिन तैयार करना, कितने कामकाज होते हैं उनके पास, हम समझते हैं। मैडम, कोशिश कीजिए, थोड़ा समय पर आने की।।

जो आदतन लेट होते हैं, उनका आत्म विश्वास बड़ा गज़ब का होता है। हमारा एक साथी घड़ी से पंद्रह मिनट लेट आता था, इसे कहते हैं वक्त की पाबंदी। आप अपनी घड़ी मिला लो। उसके पास कोई बहाना नहीं था। आधी हकीकत, आधा फसाना था। उसके और दफ्तर के बीच रेलवे क्रॉसिंग आते थे, ट्रेन का भी अपना टाइम था, और उसका भी दफ्तर का। बस अक्सर टकराहट हो जाती थी। अगर कभी शंटिंग शुरू हो गई, तो गए काम से। उससे आग्रह किया जाता, अपना समय थोड़ा एडजस्ट कर लिया करो। लेकिन एडजस्ट दफ्तर को ही करना पड़ता था।

एक हमारे वरिष्ठ मित्र के बारे में शर्त लगाई जाती समय पर आने की। खुद से अधिक दूसरा आप पर भरोसा करे। लगा लो शर्त, अगर वे कभी समय पर आ जाएं ! किसी दिन अगर वे समय से आ जाते, तो उनका अभिनंदन किया जाता। उन्हें सफाई देनी पड़ती, आज वे समय से कैसे आ गए।।

चलिए लेट लतीफ को छोड़िए, जो दफ्तर से जल्दी घर जाते हैं, बताइए, उन्हें क्या कहते हैं ! देखिए, यह आपसी मामला है, अगर इंसान अपना काम खत्म करके, किसी जरूरी काम से, जल्दी घर जाना चाहता है, तो जा सकता है। इसके लिए लतीफ की तरह किसी हनीफ को बीच में लाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जो आदतन जल्दी घर जाते हैं, जरा उनके भी तो जलवे देखिए।

एक सज्जन अपने वरिष्ठ अधिकारी की सदाशयता का लाभ उठाकर दफ्तर से रोजाना शाम दो घंटे पहले ही घर खसक जाते थे। बाबू अफसर राजी, तो इससे हमें क्यों आपत्ति जी ! लेकिन एक दिन तो गजब हो गया। जल्दी जाने वाले सज्जन के घर से उनकी धर्मपत्नी का फोन आ गया। फोन दरियादिल अफ़सर ने ही उठाया। उधर से दहाड़ सुनाई दी। वे रोज तो अब तक घर आ जाते हैं, आज ऐसा क्या हो गया जो अभी तक नहीं आए, हमें चिंता हो गई, इसलिए फोन लगाया है। अगले ही दिन पहले उनकी खिंचाई हुई और उसके बाद से वे भी, दफ्तर के नियत समय पर ही घर जाने लगे। अति सर्वत्र वर्ज्यते।।

हमारे एक पुराने पड़ोसी थे, संयोग से उनका नाम भी मिस्टर लतीफ ही था। बड़े मिलनसार भले इंसान। बरसों से उनसे भेंट नहीं हुई। कहीं से उनका फोन नंबर तलाशा और संपर्क किया तो पता चला he is mo more.

मिस्टर लतीफ अब late लतीफ हो गए, इस दुनिया में नहीं रहे। बड़ा बुरा लगा।

इन सत्तर वर्षों में बहुत कुछ बदला है। प्राइवेट दफ्तरों में समय की और काम की भी बहुत

सख्ती है। लेट लतीफों के दिन अब हवा हुए। अब तो दफ्तरों में भी मस्टर नहीं, ई – अंगूठे चलते हैं। समय की पाबंदी और अनुशासन से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जो बेहतर है, उसका स्वागत है। लेट लतीफ कहीं अब एक लतीफा बनकर ही न रह जाए। यह कहावत अब शायद ही उनके काम आए ;

लेट लतीफ ?

Better late than never. !!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि ? ?

अहं ब्रह्मास्मि।…सुनकर अच्छा लगता है न!…मैं ब्रह्म हूँ।….ब्रह्म मुझमें ही अंतर्भूत है।

ब्रह्म सब देखता है, ब्रह्म सब जानता है।

अपने आचरण को देख रहे हो न!…अपने आचरण को जान रहे हो न!

बस इतना ही कहना था।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

 

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 707 ⇒ दास – बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दास – बोध।)

?अभी अभी # 707 ⇒ दास – बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर सबका मालिक एक हुआ, तो हम सब उसके दास हुए। जो अपनी मर्ज़ी का मालिक है, वह किसी का दास नहीं। जिसे अपने कदमों पर सबको झुकाने में मज़ा आता है, उसे मालिक नहीं तानाशाह कहते हैं। शाब्दिक अर्थ को लिया जाए तो दास एक तुच्छ सेवक है। हर भक्त ईश्वर का एक तुच्छ सेवक है, दास है।

ईश्वर के सभी भक्त दास हैं, कबीरदास, सूरदास, रैदास और भगवान राम के तुलसीदास। सभी भक्त समर्थ हैं, रामदास हैं। दास में अहंकार नहीं, सात्विक अपराध-बोध है, तभी वह कह पाता है –

प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो !

यही दासबोध है।।

सामंती युग में दास दासियाँ हुआ करती थीं। कैकई की भी एक दासी थी, जिसके नाम से ही मन थर्रा जाता है। दासों के साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता था। देवदास अगर सिर्फ पारो का दास था तो एक देवदासी आराधना गृह की एक समर्पित दासी।

समय के साथ दास की कालिख घुलने लगी। सभी दास लोकतंत्र में सेवक हो गए। भगवानदास पढ़-लिखकर डॉ भगवानदास हो गए और श्यामसुन्दर डॉ श्यामसुंदर दास। अंग्रेजों ने सेवक को सर्वेंट कर दिया तो वे सभी सिविल सर्वेंट हो गए। सर्वेंट अफसर बन गए, तुच्छ-सेवक बाबू-चपरासी बन गए। जनता के सेवक मंत्री बन गए, उदास जनता फिर उनकी दास बन गई, चेरि बन गई।।

दास भक्ति का प्रतीक है, समर्पण की मिसाल है।

हम अगर आज भी अपने अवगुणों के दास हैं, तो ऐसी दास-प्रथा की जंजीरों को तत्काल तोड़ना होगा। हम केवल मात्र परम-पिता परमेश्वर के दास हैं। उनकी शरण मे जाते ही हम अतुलित बलधारी भक्त शिरोमणि, दासों-के-दास हनुमान के समान हो सकते हैं। ईश्वर का दास न अन्याय सहता है, न किसी का अपमान करता है। वह सर्व-गुण-सम्पन्न है, समर्थ है, राम का दास है। और यही सच्चे अर्थों में “दास-बोध” है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 706 ⇒ दोस्ती बढ़ाना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोस्ती बढ़ाना।)

?अभी अभी # 706 ⇒ दोस्ती बढ़ाना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब दोस्ती बढ़ती है, तब वह दोस्ताना कहलाती है। किसी से दोस्ती बढ़ाना इतना आसान नहीं होता। पहले परिचय, हैलो हाय से औपचारिक मेल-मिलाप होता है। कच्ची उम्र में दोस्ती, प्यार जैसी, अनायास ही हो जाती है। एक दूसरे का नाम भी नहीं जानते और दोस्ती हो जाती है।

आजकल दोस्ती का प्रबंधन फेसबुक ने अपने ज़िम्मे ले लिया है। किसी परिचित/अपरिचित की प्रोफाइल में जाओ, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजो, उधर से मंजूरी आई और we are friends! भले ही रिश्ते में वो आपका बाप लगता हो।।

फेसबुक के पास एक ही दर्ज़ा है, एक ही क्लास है, all are friends! हमारे शहर में एक लॉज थी, उसका नाम भी फ्रेंड्स लॉज ही था। वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा फेसबुक ने साकार कर दी।

स्कूल का एक साथी था, राम नाम था उसका, राम पाहूजा। खतीपुरे पर सायकल की दुकान थी उसकी। एक ही स्कूल, एक ही क्लास में थे, घर भी आसपास ही थे। दोस्ती हो गई। वह सायकल से मुझे घर लेने आता। डबल सवारी स्कूल जाते। उसकी सायकल की दुकान पर रेडियो सीलोन और विविध भारती सुनते। हफ़्ते में एक फ़िल्म ज़रूर देखते।

हम अच्छे दोस्त थे। फिर भी दोस्ती बढ़ाया करते थे। हमारा एक मौखिक करार था, खिलाओ पिलाओ, दोस्ती बढ़ेगी। कभी मुझे दोस्ती बढ़ाना पड़ती, कभी उसे। जिसकी जेब में पैसे होते, वह दोस्ती बढ़ा देता।।

कभी कभी नोंकझोंक भी हो जाती ! आज दोस्ती कौन बढ़ाएगा। दोनों के पास पैसे नहीं ! जेब की तलाशी ली जाती। दुकान के पैसे हैं, खर्च नहीं कर सकता। आज से दोस्ती खत्म।

दूसरे ही दिन ! चलो दोस्ती बढ़ाते हैं। दोनों की जेब में पैसे होते थे। कभी दामू अण्णा की कचोरी और एक फुल चाय से दोस्ती बढ़ती थी तो कभी प्रशांत के उसल पोहे अथवा दही मिसल से। इतना सस्ता, सुंदर लेकिन टिकाऊ तरीक़ा था हमारा दोस्ती बढ़ाने का।।

रामकथा हम बड़े भाव और श्रद्धा से सुनते हैं लेकिन किसी की रामकहानी में हमें कब दिलचस्पी होती है। मेरे इस दोस्त राम की भी बहुत अग्नि-परीक्षा ली गई। इसके भी लक्ष्मण और भरत जैसे दो भाई थे। राम का भी वनवास शुरू हुआ। पिताजी के शांत होते ही जहाँ पहले राम सायकल स्टोर्स था, वहाँ पहले ऑटो गैरेज और बाद में कपड़े की दुकान खुल गई। कलयुग के लक्ष्मण और भरत ने भ्राता राम को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बड़ा परेशान रहा मेरा दोस्त ! चार लड़कियों की शादी की। मर्यादा में रहा, लेकिन किसी अफसर, नेता से मतलब की दोस्ती नहीं बढ़ाई। दोस्ती बढ़ाई भी तो मुझ जैसे साधारण आदमी से, निःस्वार्थ निश्च्छल।

आज भी संघर्षरत है मेरा राम ! बहुत ठोकरें खाई लेकिन कभी निराश, हताश नहीं हुआ, डगर डगर भटका, लेकिन कभी कदम नहीं भटके। अपना छोटा मोटा धंधा करता है। कम मिलता है आजकल, लेकिन जब भी मिलता है, यही कहता है, चलो दोस्ती बढ़ाते हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 136 – देश-परदेश – खिड़की ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 136 ☆ देश-परदेश – खिड़की ☆ श्री राकेश कुमार ☆

खिड़की कही भी हो अच्छी लगती है। मानव हमेशा से ही उत्सुकता लेकर जीता है। उसके मन में हमेशा एक जिज्ञासा रहती है, नया देखने, महसूस करने की। घर में भी सुबह सुबह खिड़की ही तो खोलते हैं।

रेलगाड़ी की खिड़की सपनों का दरवाजा लगती है मुझे, जब भी रेलगाड़ी में खिड़की वाली सीट मिलती है तब एक नई दुनिया में चले जाते हैं हम!

भले वह दुनिया हकीकत में कोसों दूर है लेकिन एक खिड़की हमें उस दुनिया में जीने की अनुमति देती है|

हम गुनगुनाते हैं तराने, अपना हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर उसे हवा के साथ बहने देते हैं, पर अचानक किसी के डर से वह हाथ भीतर कर लेते हैं।

पर उस वक्त बेखबर हो जाते हैं हम, रेल गाड़ी की शोर भरी दुनिया में भी हम अपने लिए बना लेते हैं एक सपनो भरा शहर!!

हम सपने बुनने लगते हैं पर सपनों में किसी धीमी नदी के लहर से बहते चले जाते हैं, अचानक हम पाते हैं कि हमें मुस्कुरा रहे हैं।  मुस्कुराहट के साथ कुछ आँसू भी चेहरे पर चिपक जाते हैं, हमें अपनी उस दुनिया में होते हैं जहा हम सच में खुश होते हैं और हम वास्तव में तब तक वास्तविक दुनिया में वापस नही आते जब तक हमारे कंधे पर किसी का हाथ आकर हमें जगा ना दे।

हवाई यात्रा में भी खिड़की की सीट किसी का जीवन रक्षक बन कर पुरानी मान्यता “जाको राखे साइयां मार सके ना कोय” को चरितार्थ करती है, को हालिया विमान दुर्घटना से साबित हो गया हैं। 

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 8 – आलेख – “वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 8 ☆

☆ आलेख ☆ “वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

अपनों से दूर 93 वृद्धों का परिवार

आज सामाजिक सोच और परिस्थितियां ऐसी हो गईं हैं कि अधिकांश लोगों को अपने घर के बुजुर्ग बोझ लगने लगे हैं। ऐसे समय वृद्धाश्रमों की आवश्यकता और उपयोगिता बढ़ गई है। वृद्धाश्रमों में वृद्धों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। मैंने अपनी पारिवारिक मित्र श्रीमती भारती साहा से अक्सर उनके वृद्धाश्रम जाने और सुख सुविधा से रहते प्रसन्नचित्त वृद्धों के बारे में सुना। मेरा मन भी वृद्धाश्रम जाकर वहां की व्यवस्था देखने और खुशहाल वृद्धजनों से मिलने का हो गया और एक दिन मैं वहां पहुंच गया। भारती जी के साथ ही मेरी पत्नी श्रीमती विमला श्रीवास्तव भी मेरे साथ थीं। जिज्ञासा यह जानने की थी की एक ठिकाने पर इतने सारे बुजुर्गों की इतनी अच्छी देखरेख कैसे होती है कि वे सभी खुश और संतुष्ट रहते हैं।

निराश्रित वृद्ध आश्रम, जबलपुर में वृद्धों के बीच गुंजन संस्था, जबलपुर के सदस्य

नेताजी सुभाषचंद बोस मेडिकल कालेज, जबलपुर के पास स्थित निराश्रित वृद्धाश्रम में हम लोग संध्या 5 बजे के आसपास पहुंचे। वृद्धाश्रम के अहाते का द्वार खोलकर जैसे ही हमने अंदर प्रवेश किया तो लगा जैसे हम शहर के कोलाहल, आपाधापी, राजनीति, स्वार्थ और आपसी खींचतान की दुनिया से निकलकर एक ऐसी दुनिया में पहुंच गए हैं जहां सिर्फ अपनापन है, शांति है, सद्भाव है। वृद्धाश्रम के मुख्य प्रवेश द्वार के अंदर ही दाहनी ओर एक मंदिर बना है यहां अनेक वृद्ध पुरुष/महिलाएं बैठे हुए शांतचित्त से ईश्वर की आराधना में लीन थे। आश्रम के अत्यंत साफ सुथरे अहाते के बड़े छायादार वृक्ष और बगीचे में लगे सुंदर पौधे वहां के वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर रहे थे। आश्रमवासी अनेक वृद्ध नर/नारी अहाते में रखी बैंचों और कुर्सियों में बैठे या तो आपस में वार्तालाप कर रहे थे अथवा आत्म चिंतन में लीन थे, कुछ लोग चहल कदमी करते हुए भी नजर आए। लगा जैसे इन वृद्धों को यहां मिले सेवा, सुख और संतोष ने उनके तमाम दुखों को हर लिया है।

यह वृद्धाश्रम भारतीय रेडक्रास सोसायटी द्वारा 2 अप्रैल 1988 में स्थापित किया गया था। वृद्धाश्रम के पदेन अध्यक्ष जिला कलेक्टर हैं। नगर के विभन्न क्षेत्रों में सक्रिय समाज सेवा से जुड़े 24 व्यक्ति यहां के सम्माननीय सदस्य हैं। ये सभी पूरी चिंता और जिम्मेदारी के साथ समय समय पर वृद्धाश्रम पहुंचकर यहां की व्यवस्थाओं व आवश्यकताओं पर नजर रखते हैं और उन्हें बिना विलंब पूरा करने तत्पर रहते हैं।

एक प्रश्न पर बताया गया कि 96 लोगों के निवास की क्षमता वाले इस वृद्धाश्रम में वर्तमान में 93 वृद्ध हैं जिनमें 36 पुरुष और 57 महिलाएं हैं। यहां रह रहीं रामकली शर्मा सर्वाधिक 92 वर्ष की हैं। शांति साहू आश्रम में विगत 21 वर्षों से रह रही हैं। यहां के पुरुष निवासियों में कुछ सर्वाधिक 75 वर्ष के हैं। वृद्धाश्रम में धर्म जाति जैसा कोई बंधन नहीं है। व्यक्ति जबलपुर का निवासी हो, 60 वर्ष की उम्र हो और निराश्रित व निशक्त हो तभी उसे यहां रहने की पात्रता प्राप्त होती है। यहां रहने का कोई शुल्क नहीं किंतु पेंशन प्राप्त बुजुर्गों से कुछ सहयोग राशि ली जाती है। वृद्धाश्रम में साफ सुंदर विशाल भोजन कक्ष है जहां भोजन करने टेबिल कुर्सी लगी हैं। कार्यक्रमों आदि के लिए एक बड़ा हाल भी है। आश्रम की व्यवस्थाओं हेतु कार्यालय में 3, वृद्धों की देखरेख के लिए 4, भोजन बनाने 3, भोजन कक्ष की सफाई हेतु 1, स्वीपर 1, चौकीदार 1 और 1 एम्बुलेंस चालक है।

आश्रम का रखरखाव एवम खर्च सामाजिक न्याय विभाग से प्राप्त अनुदान से होता है। यहां निवासरत लोगों को भोजन, इलाज, दवा, वस्त्र, मनोरंजन सभी प्राप्त होता है। नगर के समाज सेवी तथा सहृदय लोग भी वृद्धाश्रम में सेवा सहयोग हेतु तत्पर रहते हैं। अनेक लोग अपने परिजनों की स्मृति में आश्रमवासियों को भोजन, चाय नाश्ता अथवा अन्य वस्तुओं का वितरण करते रहते हैं। संपन्न लोगों से आश्रम के लिए उपयोगी वस्तुएं भी प्राप्त होती रहती हैं। समय समय पर आश्रम में भी मनोरंजक, ज्ञानवर्धक कार्यक्रम होते हैं। आश्रमवासियों को नगर में आयोजित विशिष्ट समारोहों में भी ले जाया जाता है। यहां रहने वाले स्वेच्छा से जब तक चाहें अथवा अंत समय तक रह सकते हैं। यहां स्थाई चिकित्सक भी हैं जो हफ्ते में दो दिन स्वास्थ्य परीक्षण हेतु आते हैं। बताया गया कि समाज से आए लोगों से मिलकर आश्रमवासी प्रसन्न होते हैं और उनसे खुलकर बात करते हैं। यहां रहने वाले 70 प्रतिशत लोगों से मिलने उनके रिश्तेदार/परिचित आते रहते हैं किंतु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनसे मिलने कभी कोई नहीं आया। यहां कार्यरत लोग सभी बुजुर्गों में अपने माता पिता के दर्शन करते हूं। उनके दुखी, परेशान अथवा बीमार होने पर उनके पास आत्मीयता से बैठकर बातें कर उन्हें राहत पहुंचाने का प्रयास करते हैं। जबलपुर में 4/5 वृद्धाश्रम और भी हैं। रेडक्रास द्वारा मध्यप्रदेश में 81 वृद्धाश्रम संचालित किए जा रहे हैं। देशभर में बढ़ते वृद्धाश्रमों की संख्या वृद्धों की चिंताजनक स्थिति प्रगट करने पर्याप्त हैं। आवश्कता है वृद्धों की सेवा सुरक्षा के लिए परिवारों के साथ ही सम्पूर्ण समाज को जाग्रत करने और शिक्षा जगत के माध्यम से भी बच्चों में बुजुर्गों के प्रति आदर व प्रेम भाव भरने की। अपने परिजनों की उपेक्षा से दुखी किंतु वृद्धाश्रम की व्यवस्था और कर्मचारियों के स्नेह से तृप्त बुजुर्गों को देखकर हम सुख और दुख के मिश्रित भाव लिए वृद्धाश्रम से बाहर निकलते हुए सोच रहे थे कि क्या फिर ऐसा समय आएगा जब हर वृद्ध सुख शांति से अपने ही घर में रहेगा। वृद्धाश्रम बंद हो जाएंगे।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 705 ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान।)

?अभी अभी # 705 ⇒ गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है।

हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है।

कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बधाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का।

इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है।

वैसे तो आप आप स्वयं भी गुणों की खान हैं। होते हैं कुछ ऐसे गुणीजन, जो स्वयं के गुणों को पहचान जाते हैं, और उनका गुणगान अपने मुंह से करते नहीं अघाते। जीवन से उदासी, निराशा, अवसाद और नकारात्मकता को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय यही है, सकारात्मक सोच। खुद को किसी से कम नहीं आंकना। यहां आपको अपने दोष नहीं, गुण ही गुण नजर आते हैं। आत्मप्रशंसा उनका स्वभाव बन जाता है। आप स्वयं तो अपना गुणगान करते ही हैं, आप चाहते हैं, लोग भी आपकी तारीफ करें। वैसे भी तारीफ का भूखा कौन नहीं। लेकिन जब ईश्वर के समक्ष प्रार्थना करते हैं, तो यह भी कहना नहीं भूलते,

प्रभु मोरे अवगुन

चित ना धरो।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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