हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हे राम धरा पर आ जाओ…।

? रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

हे राम धरा पर आ जाओ,

प्रभु फिरती अकुलाई।

खोई है मानवता जग ने,

कली-कली मुरझाई।।

‌*

दानवता प्रभु खूब बढ़ी है,

रक्षक बनकर आओ।

संस्कारों को भूल गए सब,

आकर नाथ सिखाओ।।

समरसता का पाठ पढ़ा दो,

दूर करो कठिनाई।

*

भ्रष्टाचारी पनप रहे हैं,

भ्रष्टाचार मिटादो।

भय से हीन जगत् हो सारा,

अत्याचार हटादो।।

अंत करो मन के रावण का,

हर उसकी परछाई।

*

राह प्रगति की खोलो सारी,

हो संस्कृति संस्थापक।

पोषित कर दो धर्म सनातन,

प्रभु हो शांति उपासक।।

राम राज्य फिर से आ जाए,

सुरभित हो अँगनाई।

*

रघुकुल रीति निभाने वाले,

प्रभु हो अन्तर्यामी।

तकती राह अहल्या फिर से,

दे दो दर्शन स्वामी।।

कलियुग के सब कलुष दूर हों,

मुक्तिधाम रघुराई ।

*

विनती करते रघुकुल भूषण,

शरणागत आते हैं।

वंदन अभिनंदन हैं प्रभुजी,

रामचरित गाते हैं।।

करुणानिधि सुख के सागर हो,

समय बड़ा दुखदाई।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२९ ☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – संवाद।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

पूछा हमने प्यार से, तेरी हाँ थी जान।

अब मैं तो पछता रहा, नहीं किया हैं मान।।

 *

घड़ी मिलन की देखता, आओगी अब पास।

अन्तस में तुम! ही बसी, बस चाहत की आस।।

 *

तेरे इस व्यवहार से, छूटे मेरे प्राण।

उमड़ा मन में ज्वार था, मगर दूर अरमान।।

 *

नहीं कहा मैंने गलत, जलता मैं दिन-रात।

उमड़ा सागर भाव का, सुन मेरी यह बात।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३११ ☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय मुक्तक – प्यार और ऐतवार… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३११ ☆

☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

आजकल लड़कियों पर  ऐतवार  कौन करे

बदलते  हालात  में सच्चा  प्यार  कौन करे

जिस कदर करतीं हैं विश्वास घात लडकियाँ

साथ  इनके  अब  सद  व्यबहार कौन करे

*

प्यार  में  इतने  जुनूनी  हो  गए

चाह में प्रेमी की मगनूनी हो गए

प्रेम में  अंधे  हुए वो  इस  कदर

हत्या  कर के  खुद खूनी हो गए

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३० – कविता – बारिश की बूंदे… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बारिश की बूंदे…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३० ☆

? कविता – बारिश की बूंदे…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

छम छम करके बरसें बूंदे,

नाचे जैसे संग सितार…

मन नाच रहा संग में,

सुनकर राग मल्हार…

 

सर से अपने हटा के छतरी,

सुन लो मेघों की प्रेम पुकार…

भीग जाने दो तन को,

मन को हो जाने दो तर,

लंबा रास्ता तय कर आई बरखा,

तुमसे मिलने, धर बूंदों का आकार…

 

बहुत समय तक तरसे नैना,

तब जाकर हुआ दीदार…

साकार होते देख लो,

अब अपना यह इंतजार…

कुछ अपनी कहो, कुछ उनकी सुनो…

मन की बातें करो हज़ार…

 

बसा के माटी की भीनी खुशबू…

सांस महक, हो जाए खुशगवार…

छमक कर लाई, प्रीत संदेशा,

जैसे हरसू बरसे,

खुशियों का उपहार…

हटा के छतरी, गले लगा लो,

स्वीकार करो यह अमोल बौछार…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अक़्ल मारी गई है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक वक्रोक्ति युक्त रचना – अक़्ल मारी गई है…!

☆ ॥ कविता॥ अक़्ल मारी गई है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆  

प्यादा बादशाह के सम्मुख खड़ा है,

कहता कि वह बादशाह से बड़ा है।

*

लोग दाँतों तले उँगली दबाए हुए हैं,

प्यादे की हिम्मत, हौसला तगड़ा है।

*

प्यादे- बादशाह  के बीच दरअसल,

झूठे गुरूर,आधिपत्य का झगड़ा है।

*

प्यादे  और बादशाह की यलगार में,

कुल जहां का समीकरण बिगड़ा है।

*

लगता, दोनों की अक़्ल मारी गई है,

चूँकि बादशाह सूर, प्यादा लंगडा है।

*

प्यादा औक़ात भूलकर बादशाह के,

उद्दण्ड साँड की मानिंद पीछे पड़ा है।

 ☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सिकुड़न ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सिकुड़न ? ?

किसी सिकुड़े हुए

आदमी से मिलो

तो कुछ देर

बतियाओ उससे,

वह कुछ खिल-सा जाएगा..,

बार-बार मिलना उससे,

लगातार मिलना उससे,

धूप, खाद, पानी पाकर

वह निरंतर खिलता जाएगा..,

सनद रहे-

अकेलेपन का दायरा

जब फैलता जाता है,

बेबस आदमी तब

सिकुड़ता जाता है…!

?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 9:05 बजे, 31.05.25

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कभी सोचा है ऐसा भी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – कभी सोचा है ऐसा भी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मन से रोये या आंसुओं से

भीगता तो कुछ न कुछ है

अच्छा है यह, जीवन में

कहीं न कहीं

शुष्कता को आद्रित कर

नमी को पोषित करता है

और याद रखिये

किसी अंकुरण से नव-विचार,

नवजीवन प्रस्फुटित होने को

आद्रता और नमी तो चाहिए ही

चाहे आंसुओं से रोयें

या भावुकता में, हृदय से रोयें,

फर्क नहीं पड़ता..

नतीजा अच्छा आने की चाह में , न सही

कभी तो रो लीजिये एकांत में या

सबके सामने ही सही , बेझिझक होकर

“कुछ” तो धुल जाएगा और

“कुछ” तो हल्का हो जाएगा

ज़िंदगी के दिल पर भारी,कुछ बोझ ढ़ोने से

लाख बेहतर है उनसे निजात पाना

यही सूत्र उचित लगता है अपनाना…!!!

☆

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०२ ☆ बाल कविता – जीवन है अनमोल… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०२ ☆ 

☆ बाल कविता – जीवन है अनमोल…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

टमटम में बैठे हम सब ही

चले शहर की ओर

पों – पों – पीं – पीं गाड़ी करतीं

अति का होता शोर।।

* 

भालू जी की बाइक की थी

बहुत तेज रफ्तार

मोबाइल से बात कर रहे

जा टकराए कार

बाइक टूटी गिरे जोर से

      दुखी है पोर- पोर।।

 **

शेर, लोमड़ी गीदड़ उनको

अस्पताल में लाए

हाल अजब अपना था पाया

जब वे होश में आए

नहीं करूँ मनमानी अब मैं

      जीवन है अनमोल।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५१ ☆ गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय “गीतिका” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५१ ☆

☆ गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

 नदिया सूखी भरी हुई सी

धूप बिचारी मरी हुई सी ।

 *

बरखा बूँद हुई मतवाली

गर्मी अबला डरी हुई सी।

 *

खेत अघाने पानी पीकर

मेंड़ लगे कुछ हरी हुई सी।

 *

छप्पर छानी बतियाते हैं

लगे बदरिया झरी हुई सी।

 *

गंध सुवासित व्यापी तन-मन

हुलस प्रीति मरमरी हुई सी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चिरंजीव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चिरंजीव ? ?

अदल-बदल कर

समय ने किए

कई प्रयोग, पर

निष्कर्ष वही रहा,

धन, रूप, शक्ति,

जुगाड़ सब खेत हुए,

हर काल में किंतु

ज्ञान चिरंजीव रहा!

 ?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 12:08, 21.10.2018

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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