हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४७ – बुन्देली कविता – ”जो दारू के दास हो गए” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जो दारू के दास हो गए।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४८ ☆

☆  बुन्देली कविता – जो दारू के दास हो गए ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

 जो दारू के दास हो गए

घर के सत्यानाश हो गए

 *

मौड़ा-मौड़ी खबीब पढ़त राय

पैलें नम्बर पास हो गए

 *

हिम्मत कर लो, हार न मानो

तुम तौ अबइ निराश हो गए

 *

स्थान की अब कदर होत नई

मानों कूड़ा-घास हो गए

 *

जब से सारे जंगल कट गय

ओझल कहाँ पलास हो गए

 *

बीस महल, लाखों झोपड़ियाँ

ऐंड़ आइ, विकास हो गए

 *

भिनकत रैन कुठरिया में बे

‘भगवत’ जिन्दा लाश हो गए

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी/मराठी साहित्य – कविता ☆ “बिना शीर्षक के शब्द-पुष्प ” – श्री विजयसिंह चौहान ☆ संकलन एवं मराठी भावानुवाद – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ “बिना शीर्षक के शब्द-पुष्प ” – श्री विजयसिंह चौहान ☆ संकलन एवं मराठी भावानुवाद – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

अब नहीं लिख पाता हूँ,

न सुन पाता हूँ,

और न बोलना चाहता हूँ

माँ…

 

अरसा हो गया

माँ कहे हुए।

लोग कहते हैं

दुनिया में अमीर बनो,

पर सच तो यह है…

सबसे अमीर वही हैं

जिनके सिर पर

आज भी

माँ का आँचल है।

 

तुम्हारी रिक्तता…

समूचा ब्रह्मांड भी मिलकर

नहीं भर सकता।

वो ममता,

वो आँचल,

जिसमें दुनिया की

हर चिंता हार जाती थी…

जहाँ डाँट में भी

प्यार छुपा होता था।

 

तुम सचमुच

एक स्कैनर थीं,

माँ

चेहरा देखतीं

और दिल पढ़ लेतीं।

मै चुप रहता,

और तुम पूछ ही लेती थीं

क्या हुआ बेटा?”

 

अब…

कोई समझने वाला नहीं,

कोई बिना कहे

जानने वाला नहीं,

कोई पूछने वाला नहीं…

 

अब जीवन तो है,

साँस भी चल रही है,

चलती-फिरती काया भी है

पर तुम्हारे बिना

सब कुछ जैसे

निष्प्राण है।

कवी : श्री विजयसिंह चौहान

संकलनकर्ता  एवं मराठी भावानुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆☆☆☆

ही तर शब्दफुले .. .. या भावनांना ‘ शीर्षक ‘ ??? कशाला ना ?.. .. .. ☆ 

आता काही लिहू नाही शकत .. ना काही ऐकू शकत ..

आणि बोलायची तर इच्छाच नाहीये आई ..

किती काळ लोटला गं .. .. ‘ आई ss ‘ अशी हाक मारून .. .. ..

 

लोक म्हणतात .. ‘ तू श्रीमंत हो ‘ ..

पण सत्य तर हे आहे ना की ..

जगातला सर्वात श्रीमंत माणूस तोच आहे …

ज्याच्या डोक्यावर आजही आईच्या पदराची आश्वासक सावली आहे .. .. ..

 

पूर्ण ब्रह्मांड एकत्र आलं तरी .. तरी तुझी उणीव भरून काढू शकणार नाही गं ..

ते प्रेम .. तो मायेने ओथंबणारा पदर ..

ज्याच्या उबदार छत्रापुढे प्रत्येक चिंता नि दु:ख हरत होतं ..

आणि तुझं रागावणंही .. मनातलं प्रेम कसंतरी दडवणारं होतं .. .. ..

 

तू खरंच एक ‘ स्कॅनर ‘ होतीस आई ..

चेहेरा नुसता बघूनच मन वाचायचीस ..

मी काही न बोलता गप्प बसायचो ..

आणि तू लगेच विचारायचीस .. ‘ काय झालं बाळा ? ‘ .. .. ..

 

पण आता .. ..

आता मात्र समजून घेणारं कुणी नाही ..

न सांगताही समजणारं कुणीही नाही ..

आपणहून जाणून घेणारंही कुणी नाही ..

आणि विचारणारंही कुणी नाही .. .. ..

 

आता आयुष्य तर पुढे सरकतंय ..

श्वासही सुरु आहे अव्याहत ..

हिंडतं फिरतं शरीरही आहेच की .. पण ..

पण तुझ्याशिवाय सगळं .. सगळंच ..

.. कसं गतप्राण झाल्यासारखं वाटतंय .. .. ..

  

मूळ हिंदी कविता :  ‘बिना शीर्षक के शब्द-पुष्प ‘

मूळ कवी : श्री. विजयसिंह चौहान

मराठी भावानुवाद –  सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

संपादिका – ई-अभिव्यक्ति (मराठी)

सांगली, महाराष्ट्र

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विचार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विचार ? ?

मेरे पूर्ववर्तियों ने जहाँ छोड़ा था;

उसीके आगे का अध्याय

लिख रहा हूँ मै,

मेरे बाद के कलमकार

बढ़ायेंगे इस

अनंत ग्रंथ को आगे,

मेरी बात

गाँठ बाँध लेना मित्र-

अखंड दीया

केवल कर्मकाण्ड में

नहीं जलता,

लेखक चाहे रहे अनाम

विचार कभी नहीं मरता।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मुसल्सल देखते जाना नज़र में इश्क़ का काजल

नहीं होना कभी भी तुम हमारी आँखों से ओझल

 *

उतरकर आँखों में देखो गिराँखातिर कि गहराई

हजारो हैं वहाँ तूफाँ बरसते है कहीं बादल

 *

उसी में है रवादारी उसे कमजोर मत समझो

सवारे जो यहाँ गुलशन उसे नादाँ कहें पागल

 *

नहीं है दोश भी कोई परिन्दे कैद है फिर भी

गिरेबाँ में जरा झाँको कफ़स में बंद है कोयल

 *

नहीं हिम्मत किसी में थी करे मैला यहाँ दामन

नहीं धब्बा जरासा भी रखा है पाक ये आँचल

 *

उसे पत्थर समझ बैठा नजर ने दे दिया धोखा

नहीं हीरा समझ पाया कहाँ का जौहरी कायल

 *

जवानी का ढला सूरज बुढापा पार करना हैं

अकेले हैं वहाँ जाना जहाँ पर ले चले पायल

 

मुसल्सल = एकटक, गिराँखातिर = उदासी, रखादारी = सहनशीलता, कफ़स = पिंजरा

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆

गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम।

आजादी की जली मशालें,गाया वंदेमातरम।।

*

बंकिमचंद्र चटर्जी जी ने, लिखी वंदना राष्ट्र की।

गाया हम सबने मिल करके, मंत्रित वंदेमातरम।।

*

हमने जननी जन्म भूमि को, माँ का दर्जा दिया सदा।

मातृभूमि की बलिवेदी में, वंदित वंदेमातरम।।

*

उत्तर पूरब पश्चिम दक्षिण, दश दिशाओं को भाया।

भाषा की टूटी दीवारें, गूँजा वंदेमातरम।।

*

धर्म कहाँ तब आड़े आया, दिल को आजादी भाई।

मिल कर गाया एक स्वरों में , सबने वंदेमातरम।।

*

सुदृढ़ अब अर्थ व्यवस्था, देश प्रगति करता यारो।

विश्व अग्रणी बने देश यह, गाएँ वंदेमातरम।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ – कविता – कहाँ हो माँ? ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है मातृ दिवस पर विशेष “कहाँ हो माँ? ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ ☆

🌻कविता 🌻 कहाँ हो माँ? 🌻

(विधाता छंद)

*

कहाँ हो माँ जरा सुन लो, तुम्हारी याद आती है।

घड़ी भर नींद का झोका, लगा आँचल सुलाती है।।

बजे धड़कन जरा सुन लो, अभी आँखे भरी मेरी।

यहीं है माँ तुझे देखूँ, लगे आवाज है तेरी।।

*

बनी दुनिया यहाँ मेरी, नया अनुभव सभी पाया।

बिताया फूल सा जीवन, सदा आँचल बनी छाया।।

समय की मार भी देखा, खड़ी हर जुल्म से सीखा।

कहीं बातें सदा मीठी, सही बातें बड़ी तीखा।।

*

ह्दय में प्रेम की गंगा, सदा ममता भरी बोली।

सजाया है यही घर को, कहे दुनिया बड़ी भोली।।

भरी है मांग लाली से, सजी कंचन सदा गहना।

पिता के साथ देखी है, सदा ही संग में बहना।।

*

सुनाती लोरियाँ मीठी, लगा बचपन अभी आया।

पुरानी बात है सारी, तुझे ढूँढा नही पाया।।

बनी जो हाथ की रोटी, सदा मुँह स्वाद है मेरा।

बनाई माँ मुझे बिटिया, करूँ आभार मै तेरा।।

*

विधाता खेल है रचता, लिखी हूँ आज मै गाना।

कहाँ ढूँढूँ तुम्हें मै तो, जरा मुझको बता जाना।।

मिली है प्रेम की पाती, यही तेरी निशानी है।

बता तुझको लिखूँ कैसे, सभी बातें कहानी है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…१ ✍

कह कि तुझ पर

क्या विपत आई

कि तेरी आँख भर आई?

मत समझ हमको पराया

बोल दे भाई

गाँठ मन की खोल दे भाई ।

कह कि कुछ तू आपनी बीती

कुछ तू और की बीती

प्रमिल

सुन कि

कि

साथ में आजा, उड़ा मौजें

बाद में तस्वीर हम खोजें

कि तुझ पर कष्ट कैसा आ पड़ा है

अरे भाई, बैठ भी तो जा

एक

कि तू कब से खड़ा है

बोझ मन भर का रखे मन पर

भला क्या सोच पायेगा ?

अँधेरा आँख में आँखें

भला किस ओर जायेगा ?

बात अब तेरी समझ में आ गई होगी

मैं यही समझा

कि तेरे इरादों पर

कोई मुसीबत छा गई होगी।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८२ “निरंतर हुये प्रतीत पिता…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत निरंतर हुये प्रतीत पिता...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “निरंतर हुये प्रतीत पिता...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

आँखों में विश्वास खोजते

हुये व्यतीत पिता ।

इस घर की इन दीवारों में

बने अतीत पिता ॥

 

ऊपर के उस आले में

धुँघली चिन्तित छाया ।

जो विपन्न हो बैठी आखिर

छूट गई माया।

 

उस पलंग पर बैठे

लगता देख रहे सबको ।

गहन प्यास को लिये

निरंतर हुये प्रतीत पिता ॥

 

उसी एक कमरे में जिसमें

बिता चुके जीवन ।

वही एक इच्छा,आकांक्षा का

अधियारा मन ।

 

उसी तिमिर से लडते लडते

साहस की मूरत,

ढोते रहे जीर्ण कंधों पर

बने सुजीत पिता ॥

 

और सभी हम लोग कुटुंबी

जन करते चर्चा ।

मरते मरते तकिया नीचे

छोड़ गये खर्चा ।

 

इसी तरह सब अपनी अपनी

लिये समस्यायें,

हो बैठे हम कैसे आखिर

अनुग्रहीत पिता ?

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

13-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – नासमझ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – नासमझ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

बिल्कुल भी नहीं

रोई मैं

माँ के शव के निकट बैठी हुई

बस देखती रही

वही सुन्दर सौम्य

करुणामय मुद्रा

लगा कुछ भी तो नहीं हुआ

वे सोई हैं, जाग जायेंगी

आँखों को कैसे विश्वास दिलाती

लोग कहते रहे

ज्योति ,ज्योति में समा गई !

विदेह प्राण विलीन हो गये

जा मिले अपने उत्स से!

मातृ दिवस पर

यादों का तूफान उठा है

चिता पर लेटी हुई माँ

अग्निशिखाएं आकाश

छू रही हैं।

चलचित्र चल रहा है।

छलक रही हैं आँखें

धारासार

कैसे रोकूं

झर रहा है दर्द

आँखों ने बगावत कर दी है।

 

माँ के लिए

हालात की दुहाई देकर

कुछ न कर पाने का

अपराध बोध

तकलीफ को

जानलेवा बना रहा है।

 

मैं जितना कहना चाहती हूं कहां कह पाती हूं

ईश्वर को समझने की

चेष्टा में

खाली हाथ रह जाती हूं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभी अभी # ९८७ ⇒ मदर्स डे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी कविता – “मदर्स डे।)

?अभी अभी # ९८७ ⇒ कविता – मदर्स डे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या हम मदर्स डे को

 मां का दिन नहीं कह सकते !

एक बच्चे के लिए हर दिन मां का होता है।

बड़ों के लिए मातृ दिवस होता है।

जिनकी मां आज नहीं है,

उनको मां की बहुत याद आती है।

यूं तो रोज ही आती होगी,

लेकिन आज उन्हें याद दिलाया जाता है।

दुनिया में ऐसा कौन है, कि

जिसकी कोई मां नहीं !

जन्म से ही नहीं,

जो पाले वह भी मां कहलाती है।

मां का दर्जा मासी को भी

मिल सकता है, और

भाभी मां को भी।

अगर सबसे अच्छी मां की स्पर्धा हो तो,

निर्णायक महोदय सबकी मां को छोड़कर

अपनी मां को ही यह खिताब दे दे।

अपनी मां से अच्छी किसी

की मां नहीं होती।

यह

मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं।

ज़रा मेरी मां को देखो,

आपको अपनी मां

याद आ जाएगी।

भगवान खुद धरती पर नहीं उतर पाता,

इसलिए

मां को भेज देता है।

लेकिन

बड़ा निष्ठुर है वह,

मां को वापस ले लेता है,

बदले में

सिर्फ मां की यादों से ही

काम चलाना पड़ता है।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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