हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆ जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆ —

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆

जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

होना क्या है

किसे पता है

शेष कुशल है यही कथा है।

 

लाँघ गए चौखट

अतीत की

बजती कोई धुन

सुगीत की

करना क्या है

किसे पता है

जनगण मन की यही व्यथा है ।

 

वर्तमान पीड़ित

उलझन से

राह निकलती है

करमन से

दुविधा क्या है

किसे पता है

अकर्मण्यता बनी प्रथा है ।

 

उग आए जंगल

आँखों में

सिमटे सपने सब

पाँखों में

उड़ना क्या है

किसे पता है

गंतव्यों की आत्मकथा है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(१४.८.२५)

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५६ ☆ तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तबाही रोकिए अब“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५६ ☆

✍ तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मिले है ज़ख़्म मुझको इश्क़ में अक्सर ही फूलों से

गिला कोई नहीं दिल में मुझे अपने रक़ीबों से

 *

पिलालो दूध कितना दोसती होती न सापों से

विवशता से नहीं रिश्ते सँवरते भावनाओं से

 *

ग़ज़ल कोई मुक़म्मल दोस्त आसानी से कब होती

कुरेदो ज़ख़्म दिल के सब्ज़ करने आप शूलों से

 *

बुरे अच्छे करो जो काम रखता वो अलग खाते

न पीछा छूटता इंसान का करता जो पापों से

 *

विसात इंसान की क्या है सितम करना नहीं इन पर

पिघल जाता है लोहा मुफ़लिसों की  निकली आहों से

 *

नबाजे हमको जो क़ुदरत अकड़ को छोड़ देना है

सबक ये सींख लें हम भी झुकी फलदार डालों से

 *

निजी कामों को करने सिर्फ़ ये  हमने नहीं पाईं

उठाएं गिर गए है जो ख़ुदा की बख्शी बाहों से

 *

तबाही रोकिए अब युद्ध  घातक मोड़ पर पहुँचा

जमीं को पाट देगे आप क्या लोगों की लाशों से

 *

बड़ा है दोगला गिरगिट से अपने रंग ये बदले

नहीं अनजान रहना है अरुण दुश्मन की चालों से

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२३) ? ?

मेरी चुप्पी का

जवाब पूछने आया था वह,

मेरी चुप्पी का

एन्सायक्लोपीडिया देखकर

चुप हो गया वह!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मुझे कुछ कहना है” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – मुझे कुछ कहना है… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मुझे तेज़ उजाले से बहुत ख़ौफ़ रहा है

ये आंखें चौधिंया कर

बड़ा खेल, खेल जाते हैं

अंधेरे में सरक कर आती धीमी रोशनी

 हालात को संभालने का अवसर देती है

यही आरोहण दिल मोह लेता है

मुझे इसका दर्शन पसंद है

अंधेरे और धीमी रोशनी

जीवन को समझने का धैर्य देती है

अंधेरे में पलकर

शनैः शनैः विकसित हुए पौधे भी

कभी आसमानी ऊंचाईयां छू लेते हैं

तेज उजालो ,मुझे नहीं चाहिए

सत्य को छिटकती तुम्हारी तीव्रता

मुझे आहिस्ता आहिस्ता

ज़िंदगी जीने का सलीका सीखने दो

तुम अपनी दिशाओं को उस ओर मोड़ दो

जिन्हें एक घूंट में तृप्ति की लालसा हो

बस तुम उधर रुख़ कर लो

तुम उधर का रुख कर लो…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६० – आवारगी में गुजारे दिन… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना  – आवारगी में गुजारे दिन।)

☆ हेमंत साहित्य # ६० ☆

✍ आवारगी में गुजारे दिन… ☆ श्री हेमंत तारे  

उधर चश्म पूरनम हुई तो बादल याद आ गये

इधर आँख खुली तो वो हसीं पैकर याद आ गये

माना के गुजरा वक्त कभी लौट आता नहीं

मगर उन संग जो गाये वो तराने याद आ गये

 *

बारिश मौसम तो है, सुकूँ भी है यार

बेवजह ही सही, वो ख़मदार – गैसू याद आ गये

 *

ये मिट्टी की महक औ बून्दो की छमाछम

इक छाते तले तै किये फ़ासिले याद आ गये

 *

देखा उस बेफिक्र को सिगरेट जलाते 

तो आवारगी में गुजारे दिन याद आ गये

 *

मुन्तजिर हूँ “हेमंत” सियाह अब्र बरसते रहे

वो आवारगी में गुजारे जमाने याद आ गये

पैकर = चेहरे, ख़मदार- गैसू = घुंघराले बाल

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५३ – बुन्देली कविता – ”तनक रुको घमधैयाँ लै लो” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – तनक रुको घमधैयाँ लै लो।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५३ ☆

☆  बुन्देली कविता – तनक रुको घमधैयाँ लै लो ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तनक रुकौ घमछैयाँ लै लो हमें संग में सैंया लै लो

*

काये भगत जात हौ सरपट बलम उठा लो कैंयाँ लै लो

बुरौ नें मानौ पाँव पिरा रय पिया उमर लरकैयाँ लै लो

*

कितनी तपी ततूरी देखौ मानों कही पन्हैयाँ लै लो

टूट गए गैया-बछिया के गिरमा और गिरैंयाँ लै लो

*

जड़कारो आ रब है साम्हू गद्दा, खोल, रजैंया लै लो

पीरी पहीं बिछौना छोड़ौ भगवतराम-रमैयाँ लै लो

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२१) ? ?

आदमी

बोलता रहा ताउम्र

दुनिया ने

अबोला कर लिया,

हमेशा के लिए

चुप हो गया आदमी

दुनिया आदमी पर

बतिया रही है!

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:44 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२५ – सजल – नैन उनके झुके तो नमन हो गया… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२५ ☆

☆ सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

नैन उनके झुके तो नमन हो गया।

भावना का सहज, निर्गमन हो गया।।

*

राह में कल मिले, मुस्कराते हुए।

सामने आ गए, दिल चमन हो गया।।

*

प्रेम की राह कंटक भरी है प्रिये।

वासना में फँसे, तो पतन हो गया।।

*

द्वार में बैठकर, थी प्रतीक्षा हमें।

आँख पथरा गईं सच कथन हो गया।।

*

चाँदनी रात मिलने का वादा प्रिये।

तुम न आए मन में चुभन हो गया।।

*

देश की बात पर हम सभी एक हों।

सिर निछावर किया वह रतन हो गया।।

*

शूर होता वही जो मिटे देश पर।

वीर बलिदानियों का वतन हो गया।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

16/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ – पर्यावरण संरक्षण ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता  “पर्यावरण संरक्षण”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ ☆

🌻कविता 🌧️पर्यावरण संरक्षण 🌻

वृक्ष रहे गुणकारी जानों, देती शीतल छाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी ,लगते निर्मल गाँव।।

*

पुरवैया जो बहे सनातन, दीप जले है शाम।

राम – राम की जै जै कहते, करते अपने काम।।

बीच धार में मांझी गाता, तेरे भरोसे नाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बदले ऋतु है बदली शोभा, खिले नीम पलाश।

कोयल कूके बागों में जब, पिया मिलन की आस।।

महुआ महके डाली- डाली,बढा़ हुआ है भाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बौरें अमिया बेरी झूले, नीबू लटके डाल।

त्वचा निरोगी सुंदर काया, हरे नीम की छाल।।

पौधे जो मन को भाते हैं, बढे़ मनुज की चाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

 बाँस सागौन शीशम चंदन, कंचन सा है मोल।

वृक्ष हमारे संगी साथी, लगे बड़े अनमोल।।

घर मकान सब बनते इनसे, लगते इनमें दाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

कृष्ण कन्हैया यमुना तट पर, झूले कंदब  डाल।

सिया राम की जोड़ी सुंदर, जटा जूट से बाल।।

सजी आलता लाल महावर, बैदेही के पाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी,लगते निर्मल गाँव।।

*

तुलसी पीपल पूजे बरगद,धरे दीप घर द्वार।

कृष्णा कावेरी नित बहती, गंगा यमुना धार।।

झर – झर झरना बहते सुंदर, हरा भरा है ठाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८९ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…१ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८८ ☆

☆ – सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 गुड़ियों से खेल रही है

भावना‘,

मिट्टी खा रही है

कामना

और

धनुष साध रहा है हर्ष’–

इन्हें क्या मालूम

कि आज

कम हो गये हैं

मेरे जीवन के कितने वर्ष।

हाय! जिन्दगी कट रही है

किराये की छत में,

क्या दे पाऊँगा विरासत में?

अखबारों की कतरनें

बासी चिट्ठियाँ

और लाटरी की निर्जीव टिकिटें

भला 

किस काम आयेंगीं?

संभावना की फसलकी

पुरानी प्रतियाँ

इन्हें क्या दे पायेंगी?

सच तो ये है-

दुहरी जिन्दगी जीने वाले

मास्टर का

जीना मरना बराबर है,

ये मँहगाई

जीवित शव पर लगा हुआ करहै।

 क्रमशः अगले अंक में

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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