हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७२ ☆ कविता – सरदार वल्लभ भाई पटेल… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सरदार वल्लभ भाई पटेल…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७२

☆ सरदार वल्लभ भाई पटेल…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

हे देशभक्त, कर्तव्यनिष्ठ, दृढ़व्रती अनूठे सेनानी

वल्लभ भाई पटेल तुम थे एक सच्चे नेता पर दानी।

*

तब दूरदृष्टि शासन क्षमता हम सब में गर्व जगाती है

हर अग्नि परीक्षा के अवसर हमें पावन याद दिलाती है।।

*

तुमने थी निभाई प्रमुख भूमिका देश को एक बनाने में

बिखरे छोटे रजवाड़ों को भारत के साथ मिलाने में।।

*

नक्शे में भरने नया रंग एक अनुपम काम तुम्हारा है

इस कठिन काम हित सच मन से आभारी भारत सारा है।।

*

तुम आजादी के बाद शीघ्र ही छोड़ हमें जो चले गए

कितने ही नए जंजालों में फंस हम औरों से छले गए।।

*

जो काम रह गया, तब तुमसे वह काम आज भी बाकी है

पाने को किनारा तैर रहे पर हार रही तैराकी है।।

*

दो अपनी सी दृढ़ता हमको हर उलझन को सुलझाने को

नई नई समस्याओं से लड़कर उन्हें सहज निपटाने को।।

*

तुम अडिग रहे, डरा न सका न कोई जीवन संग्राम तुम्हें

करते हैं हे सरदार सभी हम बारम्बार प्रणाम तुम्हें।।

© स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सर्वप्रथम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सर्वप्रथम ? ?

मेरा मौन

निर्निमेष मुझे निहारता है,

मेरे सामने आकर

प्राय: ठहर जाता है,

एक अनकहा सागर

भीतर थपेड़े मारता है,

सारा अनभिव्यक्त

कहन को मचल जाता है,

जानता हूँ,

तुम्हारा अनकहा भी

छटपटाने लगता है,

उसे रोक पाने में

तट लड़खड़ाने लगता है,

चलो अपने-अपने अनकहे को

उँड़ेलें एक गागर में,

अपने- अपने अनकहे को

निहारें इस साझा सागर में,

नदियों का संगम तो

पारंपरिक लक्षण है,

सागरीय लहरों का घुलना-मिलना

अपवाद विलक्षण है,

विश्वास करना, हमारी गागर

किसी महासागर से भी

अधिक विशाल होगी,

खारे पानी से आकंठ तृप्त होने की

जगत की यह घटना प्रथम होगी..!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध … ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – युद्ध के विरुद्ध 

? रचना संसार # १०० – गीत – युद्ध के विरुद्ध …  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े।

दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।।

*

 है चकित, यह धरा, शांत आकाश है।

 रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।।

 वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके।

 मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।।

 स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े।

*

नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं।

ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।।

लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते।

उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।।

आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े।

*

है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते।

भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।।

धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है।

कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।।

मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े।

*

शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया।

नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।।

रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो।

हो विजय, सत्य की, झूठ की हार हो।।

गिर गये, हैं मुकुट, भ्रात मोती जड़े।

*

युद्ध की, त्रासदी, भोगते लोग सब।

धैर्य सब, खो दिया, मौत का योग अब।।

संधि की, दूर सब, देख संभावना।

चैन की, लोग बस, कर रहे याचना।।

ये कदम, क्यों भला, युद्ध के हैं पड़े।

*

यह धरा, तो बनी, देख श्मशान है।

धूल में, है मिला, राष्ट् का मान है।।

युद्ध है, हल नहीं, शांति की बात हो‌।

विश्व को, शांति की, कृष्ण सौगात हो।।

रो रही, है प्रजा, प्रण लिए क्यों कड़े।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२७ ☆ भावना के दोहे – प्रिय ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रिय)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रिय ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रहा भटकता रात दिन, खोकर सारे होश।

ख्वाब तुम्हारे देखता, मिलने का है जोश।।

मिले सहारा आपका, बस इतनी-सी आस।

तुम्हें खोजने में लगे, यही-कहीं हो पास।।

 *

कहना तुमसे बहुत कुछ, देना स्वयं जबाव।

प्यार किया है आपसे, करना यही हिसाब।।

 *

रात घनेरी हो रही, मिल जाओ तुम आज।

अंतर्मन में प्रिय बहुत, सजा रखे हैं साज।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०९ ☆ कविता – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०९ ☆

कविता – बढ़ती  गर्मी  अरु  महंगाई.! ☆ श्री संतोष नेमा ☆

बढ़ती  गर्मी   अरु   महंगाई |

तेल   भी  ले  रहा  अंगड़ाई ||

नहीं  नियंत्रण  राज तंत्र का |

कौन   लगाम  लगाए  भाई ||

*

यू एस ए   ईरान  न   झुकते |

कहाँ  युद्ध  से   दोनों  रुकते |

सबकी ऊंची नाक  यहाँ  पर |

यहाँ आम जन ही सब भुगते ||

हार्मोज  पर  नजर  सभी की |

समझो  सब  इनकी  चतुराई |

बढ़ती    गर्मी    अरु  महंगाई ||

*

महंगाई   की   मार  बहुत  है |

आंसुओं  में   धार   बहुत   है ||

गर्मी   में   जब  बहे   पसीना |

लगता  है  तब  खार  बहुत है ||

बैठे   नेता   सब   ए   सी   में |

मेहनतकश  की क्या सुनवाई ||

बढ़ती    गर्मी    अरु  महंगाई ||

*

आम   आदमी    की   लाचारी |

महंगाई   जिस   पर   है  भारी ||

कैसे   चलता   घर  गरीब  का |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १४ ☆ गीत – जीवन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  गीत – जीवन।)

☆ मंजिरी साहित्य # १४ ☆

? गीत – जीवन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

जीवन को अनमोल बनाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

बधाओं से पार निकलना l

सतत वेग से आगे चलना ll

हसते और हँसाते जाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

सुख दुःख पथ के अविरल राहीl

कर्म बनेंगे मंजिल चाही ll

नित सोपान चढ़ते जाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

असत्य राह त्याग कर जाएं l

मन को सुख की राह दिखाएंll

जीवन बगिया तुम महकाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २८ – कविता – प्रेरणा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रेरणा।)

☆ शशि साहित्य # २८ ☆

? कविता – प्रेरणा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

कोई हमको याद करे,

क्यों बने मोहताज…

यादों में बस जाएं,

ऐसे रखें जज्बात…

कदमों के निशां ढूंढ़ें,

बनें सहज सुजान…

कर्मों से रौशन करें,

बन जाएं वो मशाल…

मेहनत की जयकार हो,

रचना है यह इतिहास…

प्रयास ये, कि संग सबका हो विकास…

नहीं थमना, नहीं रुकना अब,

समय मिलता है अल्प…

बने सबकी मुस्कान का कारण,

लेना है यह संकल्प…

स्वार्थ त्याग से ही होता है,

वंदित, जग में नाम,

यादों में बस जाएं,

बस… करना है ऐसे काम…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सिर्फ पहली बार…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – सिर्फ पहली बार…!

☆ ॥ कविता॥ सिर्फ पहली बार…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

सिर्फ पहली बार

गलती से गलत रास्ते पर

आगे बढ़ने का

निर्णय भर करने की देरी है।

 

फिर तो आप बिना

परिश्रम-प्रयास के

नाले के पानी की मानिंद

रसातल की ओर

स्वतः लुढ़कते चले जाएँगे।

 

पर ऊपर शिखर पर

चढ़ने के लिए पँजे की पकड़,

साँसों पर नियंत्रण

और पसीना बहाना पड़ता है।

 

वस्तुतः मानव का

मन और बुद्धि मिलकर

रसातल की गहराई और

शिखर की ऊँचाई-सी

अनबूझ पहेली को गढ़ते हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२४) ? ?

शोर से सख़्त चिढ़ है,

वह चुप्पी चाहता है,

फिर देखकर मरघट,

बस्ती को चला आता है!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:28 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०० ☆ बाल कविता – इल्लम इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०० ☆ 

☆ बाल कविता – इल्लम इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

इल्लम – इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली।

भागी – दौड़ी पहुँची दिल्ली।।

 *

दिल्ली में था चूहा मोटा।

हाथ न आया पहुँचा कोटा।।

 *

कोटा में फिर करी पढ़ाई।

वहाँ गई बिल्ली की ताई।

 *

ताई को कुत्ते दौड़ाते।

चढ़ी पेड़ पर पकड़ न पाते।।

 *

पेड़ पे थे बड़के लंगूर।

पूँछ लगीं पहुँची मैसूर।।

 *

चूहों ने बिल्ली दौड़ाई।

लौट के बुद्धू घर को आई।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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