हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७३ – शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता – शाश्वत सत्य…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७३ ☆

✍ शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

यहाँ कुछ भी रहता नहीं

अनंत काल तक।

 

जब उठेगी दृष्टि, पीछे की ओर

तो सम्मुख होगा शाश्वत सत्य

कि,

बीता हुआ कल,

उसके पहले का कल,

या अभी- अभी बीता पल

अलग था

उससे जो दिख रहा है आईने में अभी।

 

क्या अमीबा ने सोचा होगा कभी

कि, उसके एककोषीय दुर्बल शरीर से

जन्म लेंगे कभी

जिराफ, हाथी, मगरमच्छ, अजगर

और घड़ियाल।

 

जीवन की इसी अनवरत यात्रा में

आदम की जात भी आई

उसी

एककोषीय जीवन से,

सतत बदलते रहने की

उस पुरातन परंपरा से।

 

कुछ भी नहीं बचा

जो रह गया हो

जैसा का तैसा।

विराट पहाड़ भी

किसी भूगर्भीय हलचल की

संतान हैं।

 

फिर,

आज का बवंडर

या सामने खड़ा तूफ़ान,

किसी की दहाड़

या आँखों की तपिश

इनका भी क्या ठिकाना?

 

सृष्टि के विराट क्रम में

उथल-पुथल भी क्षणिक है

तो शांति भी।

 

तूफ़ान आते हैं,

गुज़रने के लिए;

क्यूंकि

समय बदलता है करवट,

पल-पल।

 

यही तो है

संसार का सबसे पुराना सत्य

कि

यहाँ कुछ भी

नही है सदा के लिए।

 ☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६४ – बुन्देली कविता – ”बे महुआ-मूसर की दै रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६४ ☆

☆  बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

बे महुआ-मूसर की दै रय 

कइयो ने कै ऐंसी  कै रय  

* 

लै उधार भय नौ-दो ग्यारा 

इत्ते दिन तुम कहौ कितै रय 

 *

हैं दुख-दर्द हमाये संगी 

हम नईं इतै अकेले रै रय 

 *

जुन होरा  भूँजत छाती पै 

हर चुनाव में उन्हें जितै रय 

 *

हाल गरीबों के का पूँछत 

ओइ निचो रय, ओइ सुखै रय 

 *

बाप-मताइ कर्जा लै खें 

बिटिया खों ससरार पठै रय 

 *

पोल खोल हैं ओइ तुमाई 

‘भगवत’ जी खों जाँग दिखै रय

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ऊहापोह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ऊहापोह… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

ढूँढ़ो, तलाशो,

अपना पता लगाओ,

ग्लोब में तुम जहाँ हो

एक बिंदु लगाकर बताओ,

अस्तित्व की प्यास जगी,

खोज में ऊहापोह बढ़ी

कौन बूँद है, कौन सिंधु है..?

ग्लोब में वह एक बिंदु है या

ग्लोब उसके भीतर एक बिंदु है..?

?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 10.11 बजे, 25.9.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३६ – समय चक्र के सामने… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “समय चक्र के सामने…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३६ ☆

☆  समय चक्र के सामने… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

बच्चे हर माँ बाप को, लगें गले का हार।।

समय चक्र के सामने, फिर होते लाचार।।

*

समय अगर प्रतिकूल हो, मात-पिता हों साथ।

बिगड़े कार्य सभी बनें, कभी न छोड़ें हाथ।।

*

जीवन का यह सत्य है, ना जाता कुछ साथ।

आना जाना है लगा, इक दिन सभी अनाथ।।

*

मन में होता दुख बहुत, दिल रोता दिन रात ।

आँखों का जल सूखकर, दे जाता  आघात ।।

*

जीवन का दर्शन यही, हँसी खुशी संग साथ ।

जब तक हैं संसार में, जियो उठाकर माथ ।।

*

तन पत्ता सा कँापता, जर्जर हुआ शरीर ।

धन दौलत किस काम की, वय की मिटें लकीर ।।

*

जीवन भर जोड़ा बहुत, जिनके खातिर आज ।

वही खड़े मुँह फेर कर, हैं फिर भी नाराज ।।

*

छोटे हो छोटे रहो, रखो बड़ों का मान ।

बड़े तभी तो आपको, उचित करें सम्मान ।।

*

दिल को रखें सहेज कर, धड़कन तन की जान ।

अगर कहीं यह थम गयी, तब जीवन बेजान।।

*

परदुख में कातर बनो, सुख बाँटो कुछ अंश।

प्रेम डगर में तुम चलो, हे मानव के वंश ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # ३०२ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०२ ☆

☆ –  ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

बहुत दूर

दिख रही है फसल

धरा उर्वरा श्यामल ।

कोई देता है आश्वासन-

‘तुम्हें कल मिलेगा जल

और परसों काट लेना

सारी की सारी फसल ‘

कोई यक्ष आकर कहता है

हकीकत भरे ख्वाब में

पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो-

तब पानी पीना तालाब में-

हाय !

सारा ज्ञान हो गया व्यर्थ

हम कितने असमर्थ

समझ नहीं पाये प्रश्नों के अर्थ ।

हे यक्ष महाराज

न हों नाराज

एक सवाल मैं भी पूछूं

यदि बुरा न लगे आपको

सौ वर्ष में पूरी होने वाली

योजना से

क्या लाभ होगा मुझको

या मेरे बाप को?

माना कि आप

लाभ पहुँचाएगें

हमारे नाती के परनाती को

लेकिन हम तो तरस रहे हैं

चने को, चपाती को ।

आखिर हम कब तक

उकसाते रहेंगे

बिना तेल वाले दिये की जोत को

मंहगाई के महाभारत में

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९९ – “भाग रहा है भाग्य हमारे…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​  2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “भाग रहा है भाग्य हमारे...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९९  ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “भाग रहा है भाग्य हमारे...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

डूबे सारे खेत, कर्ज में

डूब गई थाती ।

डूबे, घर को रोशन करते

दिया और बाती ॥

 

ऐसी डूब समाया जिसमें

सम्पूरन रकबा ।

डूब गया जिसमें सारा का

सारा ही कुनबा ।

 

बेटी के विवाह को जोड़ा

सब दहेज डूबा ।

फिर कैसी बारात और

कैसे क्या बाराती ॥

 

भाग रहा है भाग्य हमारे

आगे ही आगे ।

जुड़ जाते है हाथ स्वतः ही

सब जन के आगे ।

 

जो जुड़ने थे हाथ सिर्फ

यों समधी के आगे ।

वही  हाथ,  सहलाते लगते

हमें आत्मघाती ॥

 

दुर्दिन कैसे घर आते हैं

हमने अब जाना ।

तभी विधाता करने बैठा

है कुछ अनजाना ।

 

एक टीस कर्जे की साला

करती है हर दिन |

फटी जा रही वही आज क्यों

चौड़ी सी  छाती ॥

 ☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

11-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क्वथनांक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क्वथनांक  ?? श्री संजय भारद्वाज ?

परिस्थितियाँ जितना तपाती गईं

उतना बढ़ता गया क्वथनांक मेरा,

अब आग के इतिहास में दर्ज़ है

मेरे प्रह्लाद होने का किस्सा!

(क्वथनांक- जिस तापमान पर पदार्थ उबलता है, बॉइलिंग पॉइंट।)

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८१ ☆ # “मायाजाल…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मायाजाल…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८१ ☆

☆ # “मायाजाल…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

रिश्तों का मायाजाल

 हर तरफ फैला है

उजले उजले चेहरें है

पर मन मैला है

 

वह साथ-साथ है

पास पास है

हर कदम पर

हमारे लिए खास है

वह सांसों में बसता है

हथेलियां पर

रंगो सा रचता है

उसे अपने खून पसीने से सींचा है

दुःख दर्द में अपने सीने से भींचा है

ओस की बूंदों की तरह पाला है

पेट काटकर उसे खिलाया निवाला है

बुलंदियों पर पहुंचाने हर कष्ट झेला है

आज उसके जीवन में खुशियों का मेला है

रुतबा है मान है सम्मान है

समाज में प्रतिष्ठित इंसान है

 

और

उसे यहां तक पहुंचाने वाला

हर पल संभालने वाला

जीवन के आखिरी पड़ाव पर

जीर्ण हो चुकी नाव पर

बैठा अकेला है

निरर्थक यह रिश्तों का मेला है

उसे चिंताओं ने घेरा है

उसके आगे अंधेरा ही अंधेरा है

जब रिश्तें टूटते हैं

तो आंख भर आती है

हृदय को भावविह्वल कर जाती है

 

रिश्ते भी कितने अजीब है

जिनका सहारा है

वह खुशनसीब है

 

जीवन भर आदमी

 अपने कंधों पर

रिश्तों को ढोता है

आखिरी पड़ाव पर

टूटते रिश्तें देखकर

चुपचाप रोते रोते

दुनिया से विदा होता है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२५ – … बुरा न मान जाए ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बुरा न मान जाए…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२५ ☆

☆ बुरा न मान जाए… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

वो उसे कुछ लिखना चाहता है,

लिखता है, पर पसंद नहीं आता,

लिख कर, फिर मिटा देता है,

कई विचार आते हैं, लिखता है,

पसंद नहीं आता, मिटा देता है,

सोचता क्या लिखे, नाराज न हो,

पढ़कर बुरा न मान जाए।

*

शब्दों का संयोजन, संतुलित हो,

उसकी बात समझे, नाराज न हो,

मन में बहुत कुछ है लिखने को,

कागज पर शब्द उभर नहीं पाते,

मन में विचार तो बहुत आते हैं,

मन से बाहर, निखर नहीं पाते,

अपने मन का हो, या उसके मन का,

मन का भाव, समझ तो पाए,

सोचता क्या लिखे, नाराज न हो,

पढ़कर बुरा न मान जाए।

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सामूहिकता… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सामूहिकता… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

(कविता-संग्रह ‘योंही‘ से)

रिश्तों का पेड़

लगाने का प्रयास था,

सामूहिकता पर

प्रबल विश्वास था,

रोज़ाना मेहनत से

माटी खोदता,

अंकुर लगाता,

सींचने के लिए

अपनों को कलश थमाता,

हर बार मैं पौधा रोपता,

हर बार सींचा जाता,

आश्चर्य!

हर बार फलने के बजाय

पौधा जल जाता,

कई बार सोचा,

कई बार दोहराया,

कोई कमी नहीं

पर नतीजा नहीं आया,

अकस्मात,

अपनों के कलश में

झाँक कर देखा,

सबने पानी की जगह

मट्ठा भरा था,

मैं पौधा लगाता,

खाद डालता,

वे मट्ठा भरते,

जड़ जलाते,

मिल-जुलकर

मेरे विश्वास को छल रहे थे,

मेरे श्रांत चेहरे पर

सामूहिक रूप से हँस रहे थे,

मैंने विजयी मुद्रा बनाई,

उनकी विश्वसनीयता डगमगाई,

हँसने की अब

मेरी बारी थी,

सामूहिकता की विजय

अब भी जारी थी,

पेड़ न फला, न सही,

जला, जला ही सही

सृजन के कारण नहीं,

विनाश की वज़ह ही सही,

मेरे विरोधी समूह में आए

और सामूहिक प्रयासों से ही

पौधा जला पाए…!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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