हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०६ – माँ… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता माँ।)

☆ अभिव्यक्ति # १०६ ☆ माँ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो,

सभी देवता गोद में खेले,

तुम तो बस चरणों में रहो.

**

जन्म दिया हो या पाला हो,

भेद न कोई ममता माने,

अपना पराया कोई नहीं है,

मां तो सबको अपना माने.

*

मां की ममता का मोल नहीं,

ममता है अनमोल कहो,

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो.

**

मां की महिमा का बखान,

सुर नर मुनि भी गाते हैं,

वेद पुराण के पन्ने भी,

लिख कर नहीं अघाते हैं.

*

सब रिश्तों से ऊपर है मां,

इससे ऊपर कोई न हो

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता एक अधूरा ख्वाब…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆

☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆

पूर्णिमा की रात थी

चांदनी की बरसात थी

चांद आसमान में खिला हुआ था

सितारों से जाकर मिला हुआ था

चंद्र किरण के लिए जो प्यासा था चकोर

जन्मों की प्यास बुझाकर हो रहा था विभोर

रातरानी की सुगंध महक रही थी

सुप्त भावनाएं धीरे-धीरे बहक रही थी

चांदनी रात में हम दोनों थे साथ में

बरसती चांदनी में हाथ थे हाथ में

पारिजात की गंध में बेसुध वो छुई-मुई

केवड़े के तने से जैसे लिपटी नागिन हो कोई

मादक पवन में मदहोश चमन में

अंगारे दहक रहे थे दोनों के बदन में

आगोश में एक दूसरे के खोए हुए थे

नाग नागिन से लिपटकर सोए हुए थे

मध्य रात्रि में कोई प्रेम राग गा रहा था

सारी कायनात पर नशा छा रहा था

ना संसार की चिंता ना खुद की खबर थी

पहलू में सोए चांद के चेहरे पर नजर थी

रात की खामोशी दे रही थी सदाऐं

प्रीत के गीत गा रही थी सारी दिशाएं

पता ही नहीं चला कब रात ढल गई

भोर की लालिमा प्रीत को छल गई

बिछड़ने की पास जब आई घड़ी

उसके नैनों से अश्रु की लग गई झड़ी

वो बेख़बर बेहोशी में गई मुझे छोड़कर

अरमानों से भरा मेरा मासूम सा दिल तोड़ कर

एक मधुर सा सपना नींद में ही टूट गया

एक अधूरा ख्वाब नींद और चैन दोनों लुट गया /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४६ – बुन्देली कविता – ”सज्जन, गुनी, रहीस लगत है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सज्जन, गुनी, रहीस लगत है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४६ ☆

☆  बुन्देली कविता – सज्जन, गुनी, रहीस लगत है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सज्जन, गुनी, रहीस लगत है

कड़ बच्चों की फीस भरत है

कोट कचहरी के बाहर बो

अजी लिखत, नबीस लगत है

 *

दोनऊँ पहलमान एकई से

कौनउ नई ऊरीस लगत है

 *

बो काये गुमसुम बैठो है

चुभ रउ कौनउ टीस लगत है

 *

अंड-गंड बातों में नइयाँ

सदा निपोत खबीस लगत है

 *

बार और नाखून बड़े हैं

भिनकत रति खबीस लगत है

 *

भगवत’ सबहें देखन भर के

इन सब में बो बीस लगत है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गाल बजाने से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – गाल बजाने से…!

☆ ॥ कविता॥ गाल बजाने से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

गाल  बजाने  से  हाल  नहीं  बदलते हैं,

खोटे सिक्के ज्यादा दिन नहीं चलते हैं।

*

कोई  कितना भी होशियार, सयाना हो,

समय  आने  पर  ही  सितारे बदलते हैं।

*

रोज-रोज बार-बार द्वारे दस्तक देने पर,

एक दिन ह्रदय के बंद कपाट खुलते हैं।

*

जवान  बेटों  की आवारगी को देखकर,

प्राणों  से  प्यारे लाड़ले अपने खलते हैं।

*

अपनों  को  आगे  बढ़ता  हुआ देखकर,

ख़ैर, गैर तो गैर अपने जन भी जलते हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पुजारी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पुजारी ? ?

मैं और वह,

दोनों काग़ज़ के पुजारी,

मैं फटे-पुराने,

मैले-कुचैले,

जैसे भी मिलते,

काग़ज बीनता, संवारता,

क़रीने से रखता,

वह इंद्रधनुषों के पीछे भागता,

रंग-बिरंगे काग़ज़ों के ढेर सजाता,

दोनों ने अपनी-अपनी थाती

विधाता के आगे धर दी,

विधाता ने

उसके माथे पर

अतृप्त अमीरी

और मेरे भाल पर

समृद्ध संतुष्टि लिख दी..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “दिनकर का दीप” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “दिनकर का दीप” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (23 सितम्‍बर 1908- 24 अप्रैल 1974)

जागा जब भारत का सोया  स्वाभिमान,

दिनकर की लेखनी बनी प्रचंड तूफ़ान।

शब्दों में धधकती अग्नि भावों में शंखनाद,

रच डाली दिनकर ने जब क्रांति की पुकार।

अन्याय जहाँ भी सीना ताने खड़ा,

उनकी वाणी बन वज्र वहाँ जा पड़ा।

कवि नहीं केवल, युग का प्रहरी बड़ा,

जग को सिखला गया झुकना नहीं पड़ा।

 *

रश्मियों में तेज, विचारों में थे प्राण,

हर छंद बना जैसे रण का बिगुल-गान।

वीरों की धड़कन, जन-मन की आस,

उनकी कविता में बसता है इतिहास।

 *

कभी करुणा की गंगा बहती रही,

कभी क्रांति की ज्वाला दहकती रही।

संतुलन ऐसा, न कोमलता कम,

न ओज में उनके कोई कमी रही।

 *

मिट्टी का मान, श्रम का अभिमान,

उनके शब्दों में गूंजा हिन्दुस्तान।

संघर्ष सिखाया, साहस का सार,

जीवन को बनाया कर्म का त्यौहार।

 *

दिनकर का दर्शन अमर आलोक,

अंधकार में जैसे दीप का  प्रकाश।

जो सत्य के पथ पर  डटकर चले,

वही इतिहास के पन्नों में बन जाते खास।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद एवं पाठयपुस्तक लेखिका 

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८२ – संकल्पित रहो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८२ – संकल्पित रहो – १ ✍

लूट, हत्या, बलात्कार

आज/समाज

बेशर्मी की चादर ओढ़कर सो गया है

इसीलिये भ्रष्टाचार/ राष्ट्रीय धर्म हो गया है।

ईमान को दकियानूसी

और अहिंसा को कहा जा रहा है

कायरता का पर्याय

हाय!

क्या हो गया है मुझे और मेरे देश को

कौन तोड़ेगा जड़ता के परिवेश को?

शायद

झंकृत हो रहे हैं कृष्ण चेतना के तार

खुल रहे हैं किरनों के द्वार

कोई कहता है

कैसे हुआ होगा/ सृष्टि का जन्म और विस्तार

और हर बार कैसे होता है संहार!

है

अन्तः करण होता है मुखर

निकलते हैं स्वर

जब सम्बन्धों की सुगंध चुक जाती है।

जीवन की प्रगति रुक जाती है

और आरंभ होता है/ महाप्रलय महाविनाश

काश ! हम सोचते

कि हम अमृतपुत्र हैं

हमारी जिन्दगी वरदान है बाजार नहीं

और हम

मनुष्य हैं चीज नहीं

मगर हमें इतना भी तमीज नहीं

हम भूलते हैं भ्रमते हैं

और बाट जोहते हैं।

किसी अवतार की

गौतम, महावीर शंकराचार्य

या गाँधी की

 

या किसी चमत्कारिक आँधी की ।

दोस्तो!

चमत्कार एक भ्रम है

अट्टू अथक श्रम ही

परिवर्तन का उद्गम है।

संकल्पित रहो

आतंक का अंगुलिमाल

शरण में आयेगा

मन की दृढ़ता से

पूरा पर्यावरण शुद्ध हो जायेगा।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८१ “माँ तो माँ है, नहीं…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत माँ तो माँ है, नहीं...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “माँ तो माँ है, नहीं...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

सिकुडी, सिमटी पडी हुई

खटिया पर बूढ़ी माँ ।

जैसे फँसी हुई लकड़ी

में कोई चूड़ी, माँ ॥

 

फिर भी दिया करे

आशीषें सभी सदस्यों को ।

हाथ जोड़ कर रचती है

करुणा के दृश्यों को ।

 

और निरंतर किडनी की

बीमारी के कारण –

सूज गई है देह, लगे

ज्यों फूली पूड़ी, माँ ॥

 

इतनी बीमारी फिर भी

कुछ करने की चाहत ।

उसकी आँखों में दिखती

न मिल पाती राहत –

 

लेटे-लेटे चिल्लाती –

लाओ मैं कर देती

नहीं हो चुकी हूँ अब

इतनी भी मैं बूढ़ी,माँ ।

 

माँ तो माँ है, नहीं

समझते हैं तीनों बेटे ।

लगी हुई माँ किस

उधेड़ बुन में लेटे – लेटे

 

बहुओं को यों तो वह

चौकीदार सरीखी है ।

लेकिन काम बताये तो

लगती है जूड़ी*  माँ ॥

जूड़ी = बुखार का एक प्रकार

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

06-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दशरथ मांझी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दशरथ मांझी ? ?

वे खड़े करते रहे,

मेरे इर्द-गिर्द

समस्याओं के पहाड़,

धीरे-धीरे….,

मेरे भीतर

पनपता रहा

एक ‘दशरथ मांझी,

धीरे-धीरे…!

(*दशरथ मांझी- 25 फुट ऊँचे पहाड़ को 22 वर्ष अकेले दम काटकर 360 फुट लम्बी सड़क बनाने वाले पर्वत-पुरुष।)

?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 8:17, 7.4. 23

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६२ ☆ # “जिंदगी दुश्वार हो गई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता जिंदगी दुश्वार हो गई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६२ ☆

☆ # “जिंदगी दुश्वार हो गई है…” # ☆

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

झूठ ही झूठ है यहां

सच की तो हार हो गई है

 

जो सपने दिखाए जाते हैं

वह हमको बहुत भाते हैं

वह कभी पूरे नहीं हो पाते हैं

उम्मीदें ना उम्मीदों में बदल

पेचदार हो गई हैं

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

 

सूनी आंखें आसमान में तकती है

ऊपर वाले से कितनी आशाएं रखती है

चोट खाकर भी नहीं थकती है

यह परंपरा अब हर बार हो गई है

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

 

आम आदमी अब करें तो क्या करें

किसका भरोसा या एतबार करें

कब तक अच्छे दिनों का इंतजार करें

टूटती आकांक्षाएं, चाहत की भरमार हो गई है

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

 

जनमानस का सब्र छूटता जा रहा है

हर पल हर घड़ी वो लुटता जा रहा है

कशमकश में उसका दम घुटता जा रहा है

विद्रोह की छुरी अब धारदार हो गई है

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

झूठ ही झूठ है यहां

सच की तो हार हो गई है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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