हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८७ – जीवन जीने की दिशा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन जीने की दिशा।)

☆ लघुकथा # ८७ – जीवन जीने की दिशा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“क्या अम्मा हमेशा सब्जी बेचने टोकनी उठा कर आ जाती हो? कभी आराम नहीं करती? कोई तिथि त्यौहार नहीं मानती हो क्या?? रागिनी ने कहा।

बूढी अम्मा कमला ने मुस्कुराते हुए कहा – “बेटा यदि त्यौहार मनाने लगे तो हम खाएंगे क्या? हमारे लिए तो क्या त्यौहार और क्या सब दिन एक बराबर ही है बेटा, आप जैसे लोग कुछ खरीद लेते हो तो हमारा त्यौहार मान जाता है, मेरा छोड़ो बेटा यह बताओ तुमने इस त्यौहार में क्या मनाया? थोड़ा पानी पिला दो एक तुम ही हो जो थोड़ा चाय और पानी पिला देती हो।”

“अम्मा तुम्हारे बहाने मेरा भी कुछ समय तो कट जाता है वरना बच्चे और पति दिनभर बाहर निकल जाते हैं सब शाम को आते हैं तुम्हारे साथ थोड़ी देर बैठकर मैं भी अपने घर के कामों से आराम कर लेती हूं।”

“पितृ पक्ष आ रहे हैं श्राद्ध में क्या तुमने दाल की पूरी बनाई है?”

“अम्मा बना तो लूं पूरी और सारा पकवान पर कोई स्वाद से खाता नहीं है यह सब चीज मुझे तो बहुत पसंद है पर किसी को पसंद नहीं आती इसलिए बनाने का मन नहीं करता।”

चाय पीते हुए बुढ़िया मां कमला कुछ गहरी चिंता में खो गई।

“अम्मा क्या हुआ?” रागिनी ने कहा।

“कुछ नहीं बेटा जब मेरे पति जिंदा थे वह एक फैक्ट्री में नौकरी करते थे, बहुत खुश थी बच्चों को पढ़ाया लिखाया लेकिन अब वही बच्चे नौकरी करने लग गए और मुझे पराया कर दिया। पति की थोड़ी पेंशन मिलती है जिससे घर का किराया भर देती हूं और सब्जी बेचने से मेरा समय कट जाता है।”

“आपकी तरह पढ़ी-लिखी नहीं हूं बेटा बचपन में ही मेरी शादी हो गई थी बस घर गृहस्थी ही सीखा है लेकिन अब यह टोकरी उठाकर कहीं जाया नहीं जाता यदि एक दो घर में खाना बनाने का काम मिल जाए तो तुम मुझे बता देना।”

“ठीक है अम्मा मेरी पड़ोस में जो भाभी रहती है वह नौकरी करती है वह कई एक खाना बनाने वाली को ढूंढ रही थी।”

“आप रुको दाल पुरी की तैयारी करती हूं और साथ ही बच्चों की पसंद का नाश्ता भी बना दूंगी क्या आप मेरी मदद करोगी?”

“क्यों नहीं बेटा?”

“बच्चों और पति के लिए बड़ी प्रेम पूर्वक में खाना बनाती थी सब कहते हैं  मेरे हाथों में बहुत स्वाद है। जा बेटा तू आराम कर और यह अपना कोई और काम कर ले आज का खाना तेरी रसोई में ही बना कर रख देती हूं” और कमला मां उसे बड़े प्यार से खाना परोसने लग गई।

“मां के बाद आज पहली बार आपने गरम-गरम खाना बना कर खिलाया। मां को गए तो बरसों हो गए मायके में भी कभी यह सुख नहीं मिला।”

“कोई बात नहीं बेटा।”

“पर अम्मा आपने इतना काम किया मैंने आपसे सब्जी भी नहीं खरीदी कुछ सब्जियां तो ले लेती हूं।”

“नहीं नहीं बेटा आज मुझे एक बेटी मिल गई है इसी तरह मैं दोपहर में आया करूंगी और तुम मुझे कोई काम बता दिया करना।” 

दोनों के चेहरे पर एक विजय मुस्कान सी थी जैसे लग रहा था कि दोनों को जीवन जीने की एक दिशा मिल गई है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ – महालक्ष्मी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा महालक्ष्मी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕महालक्ष्मी 🛕

पेशे से इंजीनियर राहुल, पर सारा गुणांक उसकी पत्नी करती थी। आज माँ फिर से दिपावली पर पूरे घर की साफ सफाई कर घर की लक्ष्मी (बहु) आने का इंतजार कर रही थी।

छोटा बेटा अपनी माँ का पूरा ध्यान रखता, पर हाय रे विदेश में रहने वाले बेटा बहु!!

पेंशन में जितना मिलता घर का खर्च चलता। माँ ने खुश होकर साड़ी सुहाग का समान बहु के आने पर उपहार स्वरूप देने लगी।

अरे मम्मी जी – – माना कि आपके पास नही है। पर दे ही रही तो चाँदी के सिक्के देती तो कुछ काम आता।

ये मेरे किस काम के – – सामने खड़ी घर में काम करती बाई को देते फोन पर काल करने लगी।

छोटा बेटा दिये लगा रहा था। मुझे तो महालक्ष्मी ही सर्वोपरि है। बेटे के सिर पर हाथ फेरती माँ बोल उठी मुझे भी दीपक का उजाला आज दिखाई दिया है।

दोनों एक दूसरे की बात समझ। पूजन की तैयारी करने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७९ – प्रकृति… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– प्रकृति…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७९ — प्रकृति — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

संसार के एक किनारे में एक विशाल रेगिस्तान पानी में डूब रहा था। प्रश्न पैदा हुआ जो रेगिस्तान पानी के लिए हमेशा तरसा कैसे हुआ कि उसके डूबने के लिए इतना पानी निकल आया? इस प्रश्न का उत्तर तत्काल न मिल कर बहुत बाद में मिला। इस तरह के प्रश्नों के उत्तर बाद में ही मिलते हैं। संसार के दूसरे किनारे में बहुत विशाल पानी था। वैसे विशाल पानी को चीर कर उससे भी बड़ा एक रेगिस्तान उभर रहा था।

© श्री रामदेव धुरंधर

16 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।

कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।

-जरा सरकिए..

उसने शान से जमे आदमी से कहा।

-क्यों?

-मुझे बैठना है।

-किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?

-कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।

जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया, फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।

-क्योंकि यह सीट मेरी है।

-कहां लिखा है?

जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।

-हुजूर, आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।

सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला-मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।

-वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?

उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – चुप्पी का काला साया।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा  – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कल्पना कीजिए एक ऐसे शहर को जहां हवाएं भी फुसफुसाती हैं, वहां रहता था विशाल नामक एक साधारण क्लर्क, जो दफ्तर की फाइलों में छिपे भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ता था, हर रिपोर्ट में वह लिखता ‘यह लूट है, जनता की कमर टूट रही है’, लेकिन एक शाम, जब सूरज डूब रहा था, अचानक काले कोट वाले लोग आए और उसे घसीट ले गए, आरोप था ‘गोपनीय दस्तावेजों का दुरुपयोग कर सिस्टम को बदनाम करना’, अब विशाल उस ठंडी कोठरी में है जहां दीवारें कान लगाकर सुनती हैं, बाहर उसके सहकर्मी चुपचाप काम कर रहे हैं, डर से कि कहीं उनकी बारी न आ जाए, जबकि ऊपर वाले अधिकारी पार्टियां मना रहे हैं, व्यंग्य की धार यह कि जो ईमानदारी की मशाल जलाता है वही अंधेरे में फेंक दिया जाता है, जैसे कोई पुराना कागज कूड़ेदान में, विशाल की यादें अब उसके मन में घूमती हैं, बचपन की वे गलियां जहां वह सपने बुनता था एक बेहतर दुनिया के, लेकिन अब वे सपने सलाखों से टकराकर टूट रहे हैं, उसकी बूढ़ी मां घर के कोने में बैठी रोती है, हर दरवाजे पर दस्तक देती है न्याय की गुहार लगाते, लेकिन मिलते हैं सिर्फ खाली वादे और ठंडे जवाब, सिस्टम की यह ठंडी क्रूरता ऐसी है कि इंसान को धीरे-धीरे खोखला कर देती है, जैसे कोई जहर जो नसों में घुलता जाता है, विशाल की डायरी में आखिरी पन्ना खाली है, शायद वह लिखना चाहता था ‘मैं हार नहीं मानूंगा’, लेकिन हाथ कांपते हैं, आंखें धुंधली, और एक रात जब चांद छिप जाता है, विशाल की सांसें थम जाती हैं, वह अंतिम पल जहां वह फुसफुसाता है ‘क्यों?’, वह करुण फुसफुसाहट पूरे शहर की चुप्पी बन जाती है, एक ऐसी पीड़ा जो सीने को चीरती हुई निकलती है। विशाल की मौत के बाद उसके सहकर्मी चुप रहते हैं, मां की आंखें सूख जाती हैं आंसुओं से, और सिस्टम चलता रहता है अपनी रफ्तार से, लेकिन वह खालीपन, वह साया कभी नहीं मिटता, बस फैलता जाता है दिलों में, एक दर्द जो चीखता नहीं बल्कि सिसकता है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८६ – खिलौने वाला… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपदा।)

☆ लघुकथा # ८६ – खिलौने वाला श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

क्या बात है, लगता है आज कुछ कमाई नहीं हुई?

हां सच है भगवान भी पैसे वालों की ही मदद करता है उन्हीं को ज्यादा देता है।

लोग दुकानों से बिना मोलतोल के खरीद लेते हैं पर जब हम गरीबों के ठेले पर आते हैं तो बहुत मोल भाव करते हैं।

अब तो चौराहे पर खड़े होते हैं और गाड़ी के सामने जब लोग आ जाते हैं तो सब आगे निकल जाते हैं और वह कहते हैं कि तुमने नया तरीका भीख मांगने का निकाल लिया है कहते हैं, बाबूजी गाड़ी की सफाई कर दें।

तो वह कहते हैं कि अब सारा पैसा हम ही से कमाओगे क्या? एक बेटा था जिसको पढ़ाया लिखाया विदेश भेजा कर्ज लिया। आज उसी ने दाने-दाने को मोहताज किया है।

तभी कमल ने कहा भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं हैं। भगवान सब मदद करेगा अच्छे लोगों की बस।

तुम भगवान की बातें मत करो मेरा खून खोल जाता है।

अचानक किशोर जी बाहर जाते हैं और वह गिर जाते हैं।

उनकी पत्नी कमला मदद के लिए लोगों को बुलाती है।

तभी अचानक एक आदमी आता और कहता है – अरे! आंटी मैं आपके पास आया था कल हमारे घर में पार्टी है उसमें खाना बनाने के लिए चलिए।

अंकल को क्या हो गया मैं अस्पताल ले चलता हूं।

जब अस्पताल पहुंचता है तो वह देखता है कि उस अस्पताल में डॉक्टर दोस्त ही है। अस्पताल यह गुरुजी का है और उनके आश्रम भी है आप लोग वहीं पर क्यों नहीं रहते चलिए अकेले रहने से अच्छा है सबके साथ रहेंगे।

काम भी मिल जाएगा इससे कई लोगों को फिर फायदा होगा। ठीक है बेटा मैं यहां पर एक काउंटर लगा लूंगा और जो भी पैसा मिलेगा उससे तुम अस्पताल और इन बुजुर्गों की सेवा करना मेरा भी मन लगा रहेगा अब इस उम्र में पैसे का क्या  करूंगा? 

जीवन खिलौने ही तो है ।

उसे ऊपर वाले (भगवान) की खेल में हम सब अटक कर खेल रहे हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०६ ☆ कथा-कहानी – अपराध ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘अपराध‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०६ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ अपराध

मेहता साहब रिटायर हो गये। अब ज़रुरी हो गया कि ज़िन्दगी का अपना अलग ख़ाका बनायें ताकि बाकी ज़िन्दगी ठीक से बसर हो सके। रिटायर होने से पहले ज़िन्दगी का नियोजन नहीं किया था, इसलिए सहसा दिक्कत महसूस हुई। दोनों बेटे जब काम पर चले जाते हैं तो उन्हें महिलाओं के बीच फालतू रहने में परेशानी होती है। शायद धीरे-धीरे आदत हो जाए।

सवेरे घूमने चले जाते हैं। रास्ते में दूसरे रिटायर्ड लोग मिल जाते हैं। बातें होती हैं। लेकिन बातें ज़्यादातर बुढ़ापे के रोगों पर केन्द्रित होती हैं— गठिया, रक्तचाप, अपच, आंखों की तकलीफ़। कभी राजनीति पर बातचीत हो जाती है। एक  दो लोग ऐसे हैं जो अपने नाती-पोतों की चर्चा करके आल्हादित होते  रहते हैं, या फिर बेटे- बहू की बुराइयों का पुराण खोलकर बैठ जाते हैं।

मेहता साहब अभी चुस्त हैं। उनका शरीर अभी थका नहीं है। वे अक्सर सोचते हैं सरकार को रिटायरमेंट की उम्र बढ़ानी चाहिए, या फिर आदमी की सेहत देखकर रिटायर करना चाहिए। जब देश में औसत आयु बढ़ गयी तो रिटायरमेंट की उम्र उतनी ही बनाये रखने में कोई तुक नहीं।

सवेरे उठकर वे सैर से पहले कमरा बन्द करके हल्की वर्जिश कर लेते हैं। शरीर के सब हिस्से-पुर्ज़े अभी ठीक काम करते हैं। बालों की सफेदी और चेहरे की हल्की झुर्रियों जैसी बाहरी तब्दीलियां ज़रूर हैं, लेकर भीतर से चुस्ती और काम करने की ताकत बरकरार है।

इसीलिए मेहता साहब दिन में पलंग पर कम ही  लेटते हैं। घर में इधर-उधर घूमते रहते हैं। कमरे की सफाई कर लेते हैं। काम में पत्नी और बहुओं की मदद कर देते हैं। फूलों-पौधों की देखभाल कर लेते हैं।

लेकिन उन्हें महसूस होता है कि इतना सब काफी नहीं है। इस सब के बाद भी ऊब लगती है। भीतर से बेकारी का बोध होता है। शरीर बेकार होने तक नौकरी या व्यापार जैसा कोई काम करना ज़रूरी है। उन्हें अभी किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है। आराम से कहीं भी आ-जा सकते हैं, बस में उतर-चढ़ सकते हैं, सड़कें पार कर सकते हैं। फिर घर में बैठे रहने का क्या मतलब?

उन्होंने घर के सदस्यों को बताये बिना विज्ञापन देखना शुरू किया। ज़्यादा खोज- बीन नहीं करनी पड़ी। उन्होंने देखा कि स्थानीय कंपनियों के बहुत से विज्ञापन रोज़ निकलते हैं— मैनेजर के लिए, एकाउंटेंट के लिए, क्लर्क के लिए। वे एकाउंट्स ऑफिसर के पद से रिटायर हुए थे, इसलिए उन्होंने महसूस किया कि एकाउंटेंट का काम पा जाना मुश्किल नहीं है। इतना अनुभवी आदमी भला कंपनी को कहां मिलेगा?

उन्होंने बिना किसी को जानकारी दिये अर्ज़ी भेज दी। सोचा, नौकरी मिल गयी तो सब लोगों को ‘सरप्राइज़’ देंगे। जल्दी ही कंपनी से जवाब भी मिल गया। उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।

निश्चित तिथि पर मेहता साहब पुराने ऑफिस जाने का बहाना करके पुरानी नौकरी का प्रमाण-पत्र लेकर घर से निकल गये। साफ कमीज़ पैंट पर टाई लगाये वे इस उम्र में भी ‘स्मार्ट’ लग रहे थे।

कंपनी के दफ्तर में पहुंचे तो देखा वहां तीस चालीस लोग इकट्ठे थे। कुछ भीतर कमरे में बैठे थे, कुछ हाथ में फाइल लिए बाहर घूम रहे थे। मेहता साहब को आश्चर्य हुआ। एक जगह के लिए इतने उम्मीदवार। कमरे में देखा तो वहां उन जैसे पकी उम्र के तीन लोग और दिखे। बाकी सब नौजवान थे। बुज़ुर्गों में से एक ने खिसक कर उन्हें बैठा लिया। मेहता साहब ने बैठकर आसपास के लोगों पर नज़र फैलायी।

उन्होंने देखा, ज़्यादातर लोगों के चेहरे पर मायूसी का भाव था। लगता था वे पहले भी नौकरी के मोर्चे पर टकराकर शिकस्त खा चुके हैं। कई टाइयां लगाये थे, लेकिन साफ लगता था कि उन्हें टाइयां पहनने की आदत नहीं है। कई टाई बांथे थे, लेकिन उनकी कमीज़ों के कॉलर गन्दे और छिने हुए थे।

जल्दी ही इंटरव्यू शुरू हो गये और एक-एक कर उम्मीदवार अन्दर जाने लगे।

मेहता साहब के पास एक सांवले रंग का दाढ़ी वाला युवक बैठा था। वह मामूली  कमीज़-पैन्ट और पैरों में सस्ते काले जूते पहने था। वह अपने आसपास के नौजवानों से लगातार ऊंचे स्वर में बात कर रहा था। मेहता साहब को उसके बात करने के ढंग से कुछ तकलीफ महसूस हुई क्योंकि उसमें उस शिष्टता और नफ़ासत का अभाव दिखता था जिसकी अपेक्षा वे हर आदमी से करते थे।

मेहता साहब के कानों में उसकी बातें पड़ीं। वह कह रहा था— ‘नौकरी मिलेगी ठेंगा। आपका कोई माई-बाप है क्या? अभी किसी का फोन आ जाएगा और बस, बाकी लोग अपनी फाइल झुलाते वापस। बस यही करते रहो। कोई साला बस का किराया देने वाला भी नहीं। नौजवान इस देश के भविष्य हैं न। हमीं इस देश के भावी कर्णधार हैं।’ वह व्यंग्य से हंसा।

मेहता साहब उसकी बात सुनकर सिकुड़ गये। वह बार-बार उन चारों रिटायर्ड लोगों पर नज़र डाल रहा था।

थोड़ी देर में वह उन लोगों से मुखातिब होकर बोला, ‘आप लोग भी इसी नौकरी के लिए आये हैं?’

मेहता साहब ने  सिर हिलाया कहा, ‘हां।’

उसने उसी तरह बेलिहाज पूछा, ‘आप लोग रिटायर्ड हैं?’

मेहता साहब ने फिर सहमति में सिर हिलाया।

उस नौजवान के नथुने फड़कने लगे। सख़्त आवाज़ में बोला, ‘आप लोगों ने तो जिन्दगी भर नौकरी कर ली। सब सुख उठा लिये। बाल- बच्चों को नौकरी पर भी लगा दिया होगा। अब यहां हमारे पेट पर लात मारने क्यों आ गये  आप? पेंशन तो मिलती होगी?’

मेहता साहब मिनमिना कर बोले, ‘बिज़ी रहना ज़रूरी है। जब तक शरीर ठीक है कुछ न कुछ काम तो करना होगा।’

नवयुवक उसी तेज़ी से बोला, ‘मुहल्ले के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दीजिए, समाज सेवा का काम कीजिए, घर में बागवानी कीजिए। पैसा तो मिला होगा ही। कोई फार्म खरीद कर खेती कीजिए।’

मेहता साहब के बगल में जो रिटायर्ड सज्जन थे उनका जाति-नाम तम्हाने था।अब तक मेहता साहब का परिचय सभी रिटायर्ड लोगों से हो चुका था। तम्हाने  साहब नौजवान की बात पर उखड़ गये। अंग्रेजी में बोले, ‘यह हमारा निजी मामला है। तुम हमें उपदेश देने वाले कौन हो?’

नौजवान पलट कर बोला, ‘ठीक कहते हो। खा जाओ, पूरी नयी पीढ़ी को हजम कर जाओ। तुम सौ साल तक जिन्दा रहो और हमें पचास तक पहुंचना भी मुश्किल हो।’

फिर वह अपना हाथ घुमा कर बोला, ‘देख लो, इन नौजवानों में से कितने अभी से बूढ़े दिखने लगे हैं।’

मेहता साहब चुप्पी साधे बैठे थे। सौभाग्य से तभी उनका नाम पुकारा गया और वे बड़ी राहत महसूस करते हुए उठ गये।

भीतर काले कांच की  टॉप वाली बड़ी मेज़ के पीछे तीन आदमी बैठे थे। बीच वाला पैंतीस-चालीस की उम्र का होगा। चेहरा गोल, चिकना और गोरा। सुनहरे फ्रेम का चश्मा उसके चेहरे पर फब रहा था। उसके  दाहिने बायें के लोग  अधेड़ वय के थे।

बीच वाले ने पूछा, ‘मिस्टर वी के मेहता?’

मेहता साहब ने विनम्रता से ‘जी’ कहा।

बीच वाला बोला, ‘आप एकाउंट्स ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए?’

मेहता साहब ने फिर ‘जी’ कहा।

वही आदमी बोला, ‘हम आपकी सर्विसेज़ का फायदा ज़रूर उठाना चाहेंगे। आप एक्सपीरिएंस्ड हैं । नये लोगों को तो काम सिखाने में ही दो महीने लग जाते हैं। मैंने आपके पेपर्स देखे हैं।’

मेहता साहब ने चेहरे पर कृतज्ञता का भाव लाकर सिर  हिलाया।

बीच वाला आदमी हंस कर बोला, ‘रिटायर्ड लोगों को काम पर रखने का एक और बड़ा फायदा होता है। वे हड़ताल नहीं करते। नौजवानों का हाल तो यह है कि कंपनी में थोड़े पैर जमे नहीं कि हड़ताल शुरू। कंपनी की तरफ उनका कोई कमिटमेंट नहीं होता।’

मेहता साहब को उसकी बात पर झटका लगा। तो वह आदमी उन्हें बिलकुल सुरक्षित, हानिरहित समझता है। दूसरे शब्दों में मृत, अंतरात्माहीन, चलता फिरता ‘रोबो’।

गोरा आदमी अपनी तर्जनी से चश्मा पीछे धकेलते हुए, उनके चेहरे पर नज़र गड़ा कर बोला, ‘मेहता साहब, हमारी कंपनी अभी स्ट्रगल ही कर रही है। जमने में वक्त लगेगा। अभी हम आपको बीस हज़ार ही दे पायेंगे। एक साल बाद फिर सोचेंगे। आपको पेंशन तो मिलती ही होगी।’

मेहता साहब के दिमाग़ में कई बातें आ जा रही थीं। वे खोये हुए से बोले, ‘हां’।

वही आदमी बोला, ‘आपको मंजूर हो तो रुकिएगा। मैं दुबारा आपसे बात करूंगा।’

मेहता साहब बाहर आ गये, लेकिन अब उनके मन में कोई उत्साह नहीं था। दाढ़ी वाले नौजवान का नंबर अभी तक नहीं आया था। जिन नौजवानों का इंटरव्यू हो चुका था वे जा चुके थे, लेकिन रिटायर्ड लोग सभी हाज़िर थे।

मेहता साहब ने सुना दाढ़ी वाला कह रहा था, ‘ये प्राइवेट कंपनियों वाले हमारी मजबूरी जानते हैं, इसलिए अगर नौकरी मिल भी जाए तो दस्तखत होगा पचास हजार पर और मिलेंगे बीस हजार। न जीने  देंगे,न मरने देंगे। ड्यूटी आठ घंटे, दस घंटे। खून की एक एक बूंद चूस लेंगे। काम करना हो तो करो नहीं तो मुंह काला करो। तुम जैसे हजार मिल जाएंगे। सरकार इनका कुछ नहीं उखाड़ सकती।’

मेहता साहब अपराधी जैसे बैठे उसकी बातें सुनते रहे।

जल्दी ही उसका भी नंबर आ गया और वह भीतर चला गया। तम्हाने साहब  मेहता साहब से बोले, ‘आपको भी रुकने को कहा है?’

मेहता साहब कुछ चिढ़कर बोले, ‘जी’।

तम्हाने साहब उत्साह में बोले, ‘मुझे भी कहा है। लगता है सिर्फ रिटायर्ड लोगों को ही रोक रहे हैं।’

उनकी बात से मेहता साहब के चेहरे पर गुस्सा उभर आया, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।

दाढ़ी वाला नौजवान बाहर निकला। निकलते ही व्यंग्य के स्वर में बोला, ‘इंटरव्यू की औपचारिकता समाप्त।’ फिर किसी की नकल करता हुआ बोला, ‘जेंटिलमैन, वी विल इनफॉर्म यू बाई पोस्ट।’

फिर रिटायर्ड लोगों की तरफ आकर बोला, ‘शायद आप लोगों को रुकने के लिए बोला है।’

मेहता साहब ने सिर झुका लिया। तम्हाने साहब ने ‘हां’ कहा।

नौजवान बोला, ‘मैं जानता था। आप ही  लोगों में से किसी को नौकरी मिलेगी। जिसे भी मिले उसे बधाई। इसी तरह भावी पीढ़ी की जगह पर बैठकर जिन्दगी भर मलाई खाते रहिए और हमें आशीर्वाद और शुभकामनाएं देते रहिए।’

वह लंबे-लंबे हाथ फेंकता, लापरवाही दिखाते हुए चला गया। जल्दी ही सारे नौजवान गायब हो गये। सिर्फ रिटायर्ड ही बचे।

मेहता साहब का दुबारा बुलावा हुआ। वही चश्मे वाला बोला, ‘हम आपको लेना चाहेंगे, मेहता साहब। अगर आपको हमारे टर्म्स मंजूर हों तो आप कल से काम पर आ जाएं।’

मेहता साहब ने जवाब दिया, ‘मुझे अफसोस है, मैं यह नौकरी नहीं कर सकूंगा।’

वे तीनों विस्मित हुए। चश्मे वाला बोला, ‘वी आर सॉरी। हम तो समझे थे कि आप हमारे साथ काम करेंगे। हम आपको हज़ार दो हज़ार ज़्यादा दे सकते हैं।’

मेहता साहब ने सिर हिलाया, कहा, ‘पैसे वाली बात नहीं है। मुझे आपसे एक रिक्वेस्ट करनी है।’

चश्मे वाला आगे की तरफ झुक कर बोला, ‘कहिए।’

मेहता साहब बोले, ‘आप यह नौकरी रिटायर्ड लोगों को मत दीजिए। किसी नौजवान को ही मौका दीजिए। उनमें बहुत से ब्रिलिएंट होते हैं।’

चश्मे वाले के चेहरे पर अप्रसन्नता का भाव आ गया। बोला, ‘हमें अफसोस है, मिस्टर मेहता, इन मामलों में हम बाहर वालों की सलाह नहीं लेते। हम कंपनी के इंटरेस्ट्स के हिसाब से काम करेंगे। थैंक यू। आप जा सकते हैं।’

मेहता साहब बाहर आ गये। उनके मन से एक बोझ हट गया था, लेकिन फिर भी सारे दिन उन्हें उदासी घेरे रही।

दो-तीन महीने बाद एक दिन बस स्टॉप पर उन्हें तम्हाने साहब मिल गये। सलाम-दुआ के बाद मेहता साहब ने पूछा, ‘कहां जा रहे हैं?’

तम्हाने साहब ने जवाब दिया, ‘काम पर। उस दिन आपने शायद मना कर दिया तो मुझे अपॉइंटमेंट मिल गया।’

मेहता साहब बोले, ‘कितना दे रहे हैं?’

तम्हाने साहब कुछ शर्मा कर बोले, ‘बीस हजार। पेंशन के साथ बुरा नहीं है।’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद तम्हाने साहब बोले, ‘मालूम है? पांच छः दिन बाद दफ्तर में वही दाढ़ी वाला लड़का आया था, वही जो इंटरव्यू के टाइम ‘भासन’ मार रहा था। कंपनी ने ‘रिग्रेट’ का लैटर भेजा था, उसी को लेकर आया था। खूब हंगामा किया। मैनेजर से पूछता था हम में कौन सी कमी है जो हमें नौकरी नहीं दी। मेज पर मुट्ठियां पटकता था। फिर मैनेजर ने पुलिस को बुलाया। पुलिस ने दो तीन झापड़ लगाकर बाहर धकेल दिया, फिर लौट कर नहीं आया। एकदम इंडिसिप्लिंड लॉट।’

वे ‘ही ही’ करके हंसने लगे और मेहता साहब के पेट में मरोड़ सी उठी। इतने में बस आ गयी। तम्हाने साहब बोले, ‘आइए।’

मेहता साहब बोले, ‘आप निकल जाइए। मुझे जल्दी नहीं है। दूसरी बस से जाऊंगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७८ – आरोपित संस्कृति… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– आरोपित संस्कृति…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७८ — आरोपित संस्कृति — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अपनी जन्मभूमि मॉरिशस की वह संस्कृति मुझे अच्छी तरह याद है। वह पहली संस्कृति थी जब हम से आज़ादी के लिए खून मांगा जाता था। वह संस्कृति इतनी लुभावनी थी कि वह हमारी धमनियों में रच – बस गई थी। आज़ादी की शर्त पर हम बेबाकी से खून देते थे। हमारे खून से होली खेलने की संस्कृति तो बाद में बनी है। इस विकृत संस्कृति के पक्षधर बहुत ताकतवर हैं। वे बगावत करने वालों को देश द्रोही तक कह लेते हैं।

 © श्री रामदेव धुरंधर

01 / 10 / 2025

 संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सात ताले और चाबी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “सात ताले और चाबी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-अरी लड़की कहां हो?

-सात तालों में बंद।

-हैं? कौन से ताले?

-पहले ताला -मां की कोख पर। मुश्किल से तोड़ कर जीवन पाया।

-दूसरा?

-भाई के बीच प्यार का ताला। लड़का लाडला और लड़की जैसे कोई मजबूरी मां बाप की। परिवार की।

-तीसरा ताला?

-शिक्षा के द्वारों पर ताले मेरे लिए।

-आगे?

-मेरे रंगीन , खूबसूरत कपड़ों पर भी ताले। यह नहीं पहनोगी। वह नहीं पहनोगी। घराने घर की लड़कियों की तरह रहा करो। ऐसे कपड़े पहनती हैं लड़कियां?

-और आगे?

-समाज की निगाहों के पहरे। कैसी चलती है? कहां जाती है? क्यों ऐसा करती है? क्यों वैसा करती है?

-और?

-गाय की तरह धकेल कर शादी। मेरी पसंद पर ताले ही ताले। चुपचाप जहां कहा वहां शादी कर ले। और हमारा पीछा छोड़।

-और?

-पत्नी बन कर भी ताले ही ताले। यह नहीं करोगी। वह नहीं करोगी। मेरे पंखों और सपनों पर ताले। कोई उड़ान नहीं भर सकती। पाबंदी ही पाबंदी।

-अब हो कहां?

-सात तालों में बंद।

-ये ताले लगाये किसने?

-बताया तो। जिसका भी बस चला उसने लगा दिये।

-खोलेगा कौन?

-मैं ही खोलूंगी। और कौन?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २६ – लघुकथा – शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २६ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

ए डिक्की के पापा सीढ़ी पर आइये !!….

यह शब्द एक बार नहीं दो बार मेरे कान में गूंजेl मुझे ऐसा लगा कि शायद फिर कोई नया काम मेरे  आज के मिशन में विघ्न डालने वाला हैl

अपनी आगे की बात शुरू करने से पहले  एक बात कह दूँ कि कहीं आप मेरे पत्नी के द्वारा बोले गए इस संबोधन का मजाक  उस सिंगिंग टीवी सीरियल के महान एंकरों की तरह  न बना दें जिसमे उन लोगों उस एक महिला प्रतिभागी का हँसते मजाक उड़ा दे जो गोद में बच्चों को लिए हुए गाना गाने आई थी और उसने गॉड के बच्चे को अपने पति को स्टेज पर बुलाने के लिए सम्बोधन स्वरूप में कहा कि ए फलां के पापा..! आइये

हालांकि उन एंकरों ने उसे महिला को शो के दौरान बहुत ही सम्मान दिया और उसको बहुत ही प्रोत्साहन दियाl

जी… हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों में पत्नी,पति को  नाम नहीं लेती थीl यह उनका अपने पति के प्रति विशेष आदर भाव  और जन्म जन्म के रिश्ते को निभाने वाला संकल्प होता थाl

तब आज की तरह से प्यार से नाम लेकर, थोड़ा सा दुलार कर, फिर एक दूसरे को लाचार कर, अंत में कोर्ट में लाकर खड़ा कर, तलाक के पेपर पर साइन नहीं किए जाते थेl

अब मैं पुनः वापस आता हूं आज अपने मूल विषय पर…

मेरी पत्नी ने ही नीचे से बोला था, –

ए डिक्की के पापा  !! सीढ़ी पर आइये !!

यह शब्द थे मेरे धर्मपत्नी के ही थेl अक्सर जब मैं अपने व्यक्तिगत कार्य या साहित्यिक कार्य में जुटा पड़ा होता हूं तो मेरी प्रिय पत्नी का मैसेज आता है या बोलती है कि फलां काम करना हैl उस समय मेरा मन चिड़चिड़ा उठता हैl दरअसल बात यह है कि हम दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैl यद्यपि मेरी प्राथमिकता से उनकी  प्राथमिकता बड़ी होती हैl लेकिन मैं पति हूं या बच्चों का पिता हूं, यह मेरा धनात्मक पक्ष है, जो वास्तव में नही हैl इसके कारण में यह बताने की कोशिश करता हूं कि देखो मैं बड़ा काम कर रहा हूंl

वास्तव में सबसे बड़ा काम तो उन्होंने  आज से बीस – तीस बर्ष पूर्व किया था, जब मेरे छोटे-छोटे  बच्चों को पाल-पोस बड़ा किया, उन्हें स्कूल जाने के लिए टिफिन तैयार किया और अंत तक उनकी देख रेख कीl तब भी मैं अपने व्यक्तिगत कार्यों को प्राथमिकता मानता थाl सामाजिक एवं संगठन के कार्यों में रात दिन जुटा पड़ा रहता था और बोलना था कि तुम्हें क्या पता है मैं कितना व्यस्त हूंl

खैर मूल विषय पर आते हैं आज सुबह से मैं शाम की एक कार्यक्रम की तैयारी में अपने पुस्तकों के साथ लगा पड़ा या कहिए भिड़ा पड़ा था, मेरी प्राथमिकता कुछ और थीl मैं उठ खड़ा हुआ और जाकर जीने पर देखा तो मेरी पत्नी चाय का प्याला लेकर खड़ी थी और बोल रही थीl इतना देर हो गया कम से कम चाय तो पी लोl

आज मैंने महसूस किया कि शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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