(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत यह लघुकथा भी वर्तमान सामाजिक परिवेश के ताने बाने पर आधारित है। डॉ प्रदीप जी की शब्द चयन एवं सांकेतिक शैली मौलिक है। )
☆ कुत्तों से सावधान ☆
चंदा बंगले का गेट खोलकर जैसे ही अंदर दाखिल हुई ,मेमसाहब ने तीखी आवाज में चिल्लाना शुरू कर दिया – ” कहाँ मर गई थीं , इतनी देर से आ रही है ? ”
” मेमसाब , अभी 9 ही तो बजा है , देर कहां हुई । ”
” जुबान लड़ाती है , चुपचाप काम कर ।” मेमसाब नें डांटते हुए कहा ।
वह चुपचाप बर्तन मांजने एवं कपड़े धोने लगी । जब तक उसका काम खत्म नहीं हुआ तब तक मेमसाब बड़बड़ाती ही रही ।
काम खत्म कर वह बाहर निकलने लगी तो देखा गार्डन में खड़े साहब माली पर चिल्ला रहे थे ।
गेट के अंदर एक कोने में टॉमी दुबका पड़ा था । चंदा ने उसे देखा तो सोचने लगी कि टॉमी के भोंकने की आवाज तो कभी सुनाई भी नहीं पड़ी, लेकिन रोज सुबह से साहब और मेमसाब जरूर माली, धोबी, सब्जी वाले जैसे हम छोटे लोगों पर भोंकते रहते हैं ।
बाहर निकलकर जब वह गेट बंद कर रही थी, तब उसकी निगाह गेट पर लगी तख्ती पर पड़ी , जिसमें लिखा था – कुत्तों से सावधान ।
चंदा व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ दूसरे घर की ओर बढ़ गई ।
(श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का e-abhivyakti में स्वागत है। हम श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी के रूप में एक बाल साहित्यकार को पाकर गौरवान्वित हैं। आपकी विशेष उपलब्धियां हैं वर्ष – 2008 में 24, 2009 में 25 व 2010 में 16 बाल-कहानियों का 8 भाषा में प्रकाशन है। इसके अतिरिक्त आप अपने बाल साहित्य के लिए कई सम्मनों/अलंकरणों से अलंकृत हैं।हमें भविष्य में आपकी चुनिन्दा रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।)
? लू की आत्मकथा ?
मैं लू हूँ. लू यानी गरम हवा. गरमी में जब गरम हवा चलती है तब इसे ही लू चलना कहते हैं. क्या आप मुझे जानते हो ? नहीं ना ? तो चलो, मैं आज अपने बारे में बता कर आप को अपनी आत्मकथा सुनाती हूँ.
अक्सर गरमी के दिनों में गरम हवा चलती है. इसे ही लू चलना कहते हैं. इस वक्त वातावरण का तापमान 40 डिग्री से अधिक हो जाता है. यह तापमान आप के शरीर के तापमान 37 डिग्री से अधिक होता है.
इस ताप पर शरीर की स्वनियंत्रित तापमान प्रणाली शरीर का काम ठीकठाक ढंग से करती है. इस का काम शरीर का तापमान 37 डिग्री बनाए रखना होता है. यदि वातावरण का तापमान इस ताप से ज्यादा हो जाता है और आप लोग गरमी में बाहर निकल कर खेलते हैं तो तब तुम्हारे शरीर की यह प्रणाली सक्रिय हो जाती है. इस वक्त यह शरीर से पसीना बाहर निकालती रहती है ताकि तुम्हारे शरीर का तापमान 37 डिग्री बनाए रखा जा सकें.
पसीना आने से शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है. पसीना हवा से सूख जाता है. इस से शरीर में पानी की कमी होने लगती है. इस वक्त आप को प्यास लगने लगती है.यदि आप समयसमय पर पानी पीते हो तो शरीर में पानी की पूर्ति हो जाती है.
कभी कभी इस का उल्टा हो जाता है. आप समय समय पर पानी नहीं पीते हो तो शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इस दौरान धूप में खेलने या गरम हवा के संपर्क में आने से और शरीर में पानी की कमी होने से वह अपने सामान्य तापमान को बनाए रखने के लिए अधिक पसीना निकाल नहीं पाता है. इस के कारण शरीर का तापमान बढ़ जाता है. शरीर के इस तरह तापमान बढ़ने को लू लगना कहते हैं.
लू लगने का आशय आप के शरीर का तापमान अधिक बढ़ जाना होता है. इस दौरान शरीर अपने तापमान को बनाए रखने में असमर्थ हो जाता है. इस से शरीर को बहुत नुकसान होता हैं. शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इस से आप का खून गाढ़ा हो जाता है. जिस से रक्त संचरण में रूकावट आती है. इस रूकावट की वजह से चक्कर आना, उल्टी होना, बेहोशी होना, आंखे जलना जैसी शिकायत होने लगती है. यह सब लू लगने के लक्षण होते हैं.
यदि लू लगने के बाद भी धूप में रहा जाए तो कभी कभी इनसान की मृत्यु हो जाती है. इस कारण गरमी में लू की वजह से कई जनहानि होती रहती है. मगर, आप सोच रहे होंगे कि मैं यानी लू बहुत खतरनाक होती हूं. नहीं भाई, आप का यह सोचना गलत है. मेरे चलने से ही समुद्र के पानी का वाष्पन होता है. इसी की वजह से बरसात आने की संभावना पैदा होती हैं. यदि मैं न होऊं तो आपके बहुत सारे काम रूक जाए.
वैसे आप कुछ सावधानियां रख कर मुझे से बच सकते हो. आप चाहते हो कि मैं आप को नुकसान नहीं पहुंचाऊं तो आप को कुछ बातों का ध्यान रखना होगा. गरमी के दिनों में खूब पानी पी कर बाहर खेलना चाहिए. जब भी बाहर जाओ तब सिर पर सफेद कपड़ा या टोपी लगा कर बाहर जाओं. दिन के समय सीधी धूप में न रहो. खूब पानी या तरल पदार्थ पी कर तुम मुझ से और मेरे प्रभाव से बच सकते हो.
बस ! यही मेरी छोटीसी आत्मकथा हैं. यह तुम्हें अच्छी लगी होगी. मैं समझती हूं कि अब आप मुझे अच्छी तरह से समझ गए होंगे. मैं ठीक कह रही हूं ना ?
हाँ. अब ज्यादा गरदन मत हिलाओं. मैं समझ गई हूं कि तुम समझ गए हो. इसलिए अब मैं चलती हूं. मुझे अपने जिम्मे के कई काम करना हैं. कहते हुए लू तेजी से चली गई.
(श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार ‘ जी का e-abhvyakti में हार्दिक स्वागत है। आप एक प्रसिद्ध कवि, कहानीकार तथा अनेक पुस्तकों के रचियता हैं। इसके अतिरिक्त आपकी विशेष उपलब्धि ‘प्रणेता संस्थान’ है जिसके आप संस्थापक हैं। हम भविष्य में ई-अभिव्यक्ति के पाठकों के लिए आपकी चुनिन्दा रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।)
☆ छुटकारा ☆
“अभिनव, पापा जी को बोलो न, वे वहाँ खड़े-खड़े क्या सामान गिन रहे हैं? एक तरफ जाकर बैठ क्यों नहीं जाते? कहीं किसी मजदूर का सामान ले जाते हुए धक्का लग गया तो व्यर्थ ही अस्पताल भागना पड़ेगा और तुम तो जानते ही हो कि अभी हम यह जोखिम नहीं उठा सकते। नये मकान में कितना काम पड़ा है। जाओ और उन्हें समझा दो कि हम केवल अपना ही सामान ले जा रहे हैं, वे निश्चिंत रहें, हम उनका कुछ भी नहीं ले जाएंगे।” पाठक जी को बरामदे में खड़ा देख कर नेहा ने कुढ़कर पति से कहा।
“हाँ, तुम ठीक कह रही हो, अभी कहता हूँ।” अभिनव ने कहा।
“अरे पापा जी, क्या आप से चैन से बैठा नहीं जाता? आते-जाते किसी मजदूर का धक्का लगेगा तो आपका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, बैठे-बिठाए हम मुसीबत में पड़ जाएंगे। जाइये, अपने कमरे में आराम से बैठिये।” अभिनव ने मानो पिता को वहाँ से धकेलते हुए कहा।
सहसा पुत्र की झिड़की का कोई जवाब नहीं दे सके पाठक जी, चुपचाप अपने कमरे में आज्ञाकारी बालक की भाँति जा बैठे। उधर सामान ट्रक में लादा जा चुका था। तभी पाठक जी का पोता डुग्गू उन्हें ढूँढ़ता हुआ वहाँ पहुँच गया और बोला, “अरे दादू आप यहाँ क्यों बैठे हैं, क्या आप को चलना नहीं है? सारा सामान तो लादा जा चुका है और आप अभी तक तैयार भी नहीं हुए? चलिये जल्दी करिये।”
“अरे नहीं डुग्गू, मैं वहाँ भला कैसे जा सकता हूँ, यहाँ भी तो कोई रहना चाहिये ना!” पाठक जी ने अपने अंदर उठते तूफान को थामते हुए बोला।
“तो ठीक है, मैं अभी पापा जी को कह देता हूँ कि मैं भी यहीं रहूंगा। वैसे भी आप अकेले यहाँ कैसे रहेंगे? कोई तो आपके साथ होना चाहिये ना?” डुग्गू जैसे सहसा बहुत बड़ा हो गया था।
“चलो डुग्गू, देर हो रही है, गाड़ी में बैठो। आप भी पापा जी इसे बातों में उलझाए हुए हैं, क्या आपको दिखाई नहीं देता कि हम कितने व्यस्त हैं?” नेहा ने पाठक जी को डांटते हुए कहा।
“मैं दादू के साथ ही रहूंगा मम्मी, यहाँ अकेले दादू कैसे रहेंगे? देखती नहीं हो कि दादू कितने बीमार हैं? मैं जाऊंगा तो दादू को भी ले जाना पड़ेगा।” डुग्गू ने जैसे अपना निर्णय सुना दिया।
“डुग्गू तुम्हारी बहुत जुबान चलने लगी है, चलो अब बकवास बंद करो और चलकर गाड़ी में बैठो। बड़ी मुश्किल से तो इनसे छुटकारा मिला है। रात भर खाँसते हैं, न खुद सोते हैं और न दूसरों को सोने देते हैं।” नेहा डुग्गू को बाजू से पकड़कर खींचकर ले जाते हुए बड़बड़ाई।
(श्री सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा जी का e-abhivyakti में स्वागत है। प्रस्तुत है श्री अरोड़ा जी की मानवीय संवेदनाओं पर आधारित लघुकथा ‘उदासी’। हम भविष्य में श्री अरोड़ा जी से उनके चुनिन्दा साहित्य की अपेक्षा कराते हैं।)
☆ उदासी ☆
‘कभी कभी ऐसा क्यूँ हो जाता है कि बिना वजह हमे उदासी घेर लेती है? ‘
‘ तुम उदास हो क्या?’
‘ उदास तो नहीं पर खुशी भी महसूस नहीं कर पा रहा ।’
‘ मेरा साथ तो तुम्हें पसन्द है और मैं तुम्हारे साथ हूँ । फिर भी तुम उदास हो । कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारा मन मुझसे भर गया है ? ‘
‘ ऐसी बातें मत करो । इससे मेरी उदासी बढ़ जायेगी । ‘
‘ फिर तुम भी उदास होने की बात मत करो ।’
‘ यार! एक बात बताओ, जिंदगी क्या सिर्फ हमारी – तुम्हारी दिनचर्या का नाम है ? ‘
‘ ऐसा क्यों सोच रहे हो? हम हर दिन उन सारे लोगों से मिलतें हैं, जिनसे हमें कोई न कोई काम होता है । बेमतलब तो किसी से बात नहीं की जा सकती न ।’
‘ बस इसे ही जिंदगी कहते हैं क्या?’
‘ और क्या होती है जिंदगी? आज ऐसा क्या हुआ जो नहीं होना चाहिए था और ऐसा क्या नहीं हुआ जो होना चाहिए था कुछ समझ नहीं आया । आखिर कहना क्या चाहते हो ? ‘
‘ यही कि वो आदमी कितनी शिद्दत से जिन लोगों की जिंदगी के गड्ढे भरने की कोशिश कर रहा था ‘ वो उसी गड्ढे में गिरकर मर गया जिसे उन लोगों ने उसे भरने नहीं दिया । मतलब उसे जबर्दस्ती मार दिया गया ।’
‘ तो क्या इसीलिए उदास हो? ‘
‘ क्या मेरी उदासी के लिए ये वजह काफी नहीं है कि उस आदमी ने जिन लोगों के लिए गड्ढों को भरने की कोशिश की वही उसकी मौत का कारण बन गए! ‘
‘ समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हारे साथ रहकर, तुम्हें पहले से ज्यादा प्यार करूँ या तुम्हें तुम्हारी कँकरीली उदासियों के बीच छोड़कर किसी सरपटी नरम राह की राहगीर बन जाऊं ? ‘
‘ अच्छा तो यही होगा कि तुम कोई नरम राह चुन लो ।’
‘ तुम्हें पता भी है कि हर नरमी को कठोर धरातल की जरूरत होती है। नहीं तो वह नरमी कुछ देर बाद धंस कर गड्ढा बन जाती है । और हाँ, तुम्हारी उदासियों से वो आदमी जिन्दा नहीं हो जायेगा ।’
‘ तो क्या करूं? ‘
‘ उठो और उसकी तमाम कोशिशों के बाद भी जो गड्ढे भरे नहीं जा सके, उसकी वजह खोजों और उन्हें भरने की कोशिश भी करो । फिर देखना वो आदमी फिर से जिन्दा हो उठेगा ।’
(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत यह लघुकथा भी वर्तमान सामाजिक परिवेश के ताने बाने पर आधारित है। डॉ प्रदीप जी की शब्द चयन एवं सांकेतिक शैली मौलिक है। )
☆ भेड़िया ☆
वह नियमित रूप से भगवान के पूजन अर्चन हेतु मंदिर जाती थी । वैधव्य के अकेलेपन को वह भगवान के चरणों मे बैठकर दूर करने का प्रयास करती ।
कुछ दिनों से वह महसूस कर रही थी कि पुजारी उस पर ज्यादा ही मेहरबानी दिखा रहा है ।
एक दिन पुजारी ने उसके हाथ से पूजा की थाली लेते हुए कहा — ” शाम को हमारे निवास पर सत्संग का कार्यक्रम है , आप अवश्य पधारें । ”
उसने विनम्रता से पुजारी से कहा — ” मैं अवश्य आती यदि आपकी आंखों में मुझे वासना की जगह वात्सल्य नजर आता । तुम भेड़िया हो सकते हो किन्तु में भेड़ नहीँ हूँ । ” वह मंदिर से लौटते हुए सोच रही थी कि भगवान ने हम महिलाओं को पुरुषों की नजर पढ़ने की
विशेष क्षमता दी है, फिर भी महिलाएं इन वहशियों के जाल में कैसे फँस जाती हैं?
(डॉ . मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मातृ दिवस पर विशेष लघुकथा कोहराम ……।)
मातृ दिवस विशेष
☆ कोहराम ……. ☆
रेवती के पति का देहांत हो गया था। अर्थी उठाने की तैयारियां हो रहीं थीं।
उसके तीनों बेटे गहन चिंतन में मग्न थे। वे परेशान थे कि अब माँ को कौन ले जायेगा? उसका बोझ कौन ढोयेगा? उसकी देखभाल कौन करेगा? इसी विचार-विमर्श में उलझे वे भूल गये कि लोग अर्थी को कांधा देने के लिये उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
श्मशान से लौटने के बाद रात को ही तीनों ने माँ को अपनी-अपनी मजबूरी बताई कि उनके लिये वापिस जाना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने माँ को आश्वस्त किया कि वे सपरिवार तेरहवीं पर अवश्य लौट आयेंगे।
उनके चेहरे के भाव देख कोई भी उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगा सकता था।
उन्हें देख ऐसा लगता था मानो एक-दूसरे से पूछ रहे हों ‘क्या इंसान इसी दिन के लिये बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करता है? क्या माता पिता के प्रति बच्चों का कोई कर्त्तव्य नहीं है?’ वे आंखों में आंसू लिये हैरान, परेशान चिंतित एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे। उनके भीतर का कोहराम थमने का नाम नहीं ले रहा था।
ऐसी स्थिति में रेवती को लगा, सिर्फ पति ही नहीं, शेष संबंधों की डोरी भी खिंच गयी है। उसके टूटने की आशंका बलवती होने लगी है।
(e-abhivyakti में श्री संदीप तोमर जी का स्वागत है। आपने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सृजन कार्य किया है और कई सम्मानों एवं अलंकरणों से सुशोभित हैं। आपके उपन्यास “थ्री गर्ल्सफ्रेंड्स” ने आपको चर्चित उपन्यासकार के रूप में स्थापित कर दिया। हम भविष्य में ई-अभिव्यक्ति के पाठकों के लिए और भी साहित्य की अपेक्षा करते हैं।)
ऐतिहासिक मुकदमा था। कोर्ट परिसर लोगो से अटा पड़ा था। न्यायाधीश ने कहा-“सानन्द जी, आपने जो केस फाइल किया, उसमें आपने अपनी माँ की मृत्यु अस्थमा से बताई है, लेकिन साथ ही आपका कहना है कि आपकी माँ की की हत्या हुई है, आप क्या कहना चाहते हैं स्पष्ट कहिये।”
“माता जी दीवाली पर सदा परेशान रहती थी। मेरा घर कालोनी के ऊपर के माले पर है, नीचे बमों की लड़ी, और बम पटाखों का धुआं सीधा ऊपर आता था। जज साहब यकीन करिये , माँ का दम घुटने लगता था। वो 80 वर्ष की थी, मेरी माता जी का क्या हाल होता होगा, आप अंदाजा लगा सकते है। वो तड़पती थी।“
लेकिन आप जाकर बोल सकते थे, पुलिस के पास जा सकते थे।“-न्यायधीश ने कहा।
“दीवाली पर किसे नीचे जाकर बोलता जज साहब कि बंद करो ये सब, मेरी माँ को तकलीफ है और नीचे ही क्यो? धुंआ तो पूरे इलाके में है, पूरे शहर में ये ही आलम है, माँ चद्दर लेकर मुँह ढक लेती थी, लेकिन राहत कहाँ मिलती उसे।“
“एक आपकी माँ ही बुजुर्ग नहीं शहर में बहुत बुजुर्ग हैं।“
“शायद दुनिया के सारे बुजुगों को ऐसा महसूस नही होता होगा, पर मेरी माँ को होता था। पूरी रात बैचैन रहती थी माँ।“
“ठीक है, लेकिन बिमारी के चलते उनकी मृत्यु हुई आप उसे हत्या कैसे कह सकते हैं”
“जज साहब वो रात बड़ी भयानक थी, लोग दीपावली की खुशियाँ मना रहे थे, जैसे-जैसे पटाखों का धुआं और शोर बढ़ता जाता था, उसकी साँस फूलती जाती थी, वो तकलीफ अपने आँखों से देखी थी, मैं बार बार बालकनी तक आता था, माँ को नुबेलाइज करता और सोचता था अब बंद हो पटाखें, लेकिन रात जैसे जैसे सबाब पर आती गयी आतिशबाजी बढती गयी, माँ ने आँखें बंद कर ली, वो चली गयी जज साहब, वो चली गयी।“
लेकिन ये एक धर्म पर आरोप का मामला हुआ।“
“नहीं जज साहब, वो सब्बेबारात, गुरुपरब, गुड फ्राइडे सब दिन ऐसे ही जीती-मरती रहती थी।“
“हाँ सानन्द आपने अब मेरी मुस्किल आसान कर दी, कोर्ट के फैसले का इन्तजार कीजिये।“
“जी जज साहब, आप इन्साफ करेगे इसका मुझे विश्वास है लेकिन मेरे भारत में मायलार्ड को गाली देने वालो की कमी नही है। कोर्ट में बैठे मेरे कई साथी मुझसे असहमत होंगे, मुझे उनसे कोई शिकायत नही, मैं स्वार्थी हूँ, मुझे आज भी अपनी माँ की वो तस्वीर, उसका चेहरा याद आता है तो तकलीफ होती है, किसी भी धर्म का मेरी बात से लेना-देना नही है। मैंने तो बम-पटाखों से फैलते धुंए की वजह से अपनी माँ की तकलीफ से, कोर्ट को अवगत कराया है। निस्वार्थी और बम पटाखों के प्रबल समर्थकों और धर्म के रखवालों से माफी चाहूँगा, आज मेरी माँ नही है, मुझे उसकी तकलीफें है, कल आपको भी होगी।“
सानन्द बोले जा रहे थे।
जज साहब ने टाइपिस्ट को फैसला टाइप करने का इशारा किया।
(ई-अभिव्यक्ति में मानवता के लिए एक सार्थक संदेश की कल्पना के साथ यह पहली अन्तरिक्ष विज्ञान पर आधारित लघुकथा है जो युवा साहित्यकार श्री सूरज कुमार सिंह द्वारा लिखी गई है । यह लघुकथा हमें पर्यावरण के अतिरिक्त मानव जीवन के कई पहलुओं पर प्रकाश डालती है। हिन्दी साहित्य में ऐसे सकारात्मक प्रयोगों की आवश्यकता है । )
त्रयाक के नियंत्रण कक्ष तथा कमान कक्ष मे काफ़ी चहल-पहल थी। और होती भी क्यों न? त्राको वासियों का यह दल सिग्नस-अ आकाशगंगा से छह सौ करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी तय कर मिल्कीवे आकाशगंगा पहुँच चुके थे और उनका यान त्रयाक सौर मंडल के छोर पर आकर रुक चूका था l अब त्रयाक के कर्मी सबसे महत्वपूर्ण कार्य की तैयारी में जुट गए। पृथ्वी पर एक चालक रहित यान भेज कर यह सुनिश्चित करना की पृथ्वी की सतह तथा जीव दोनों अनुकूल हैं या नही। हालाँकि पिछले कई
वर्षो से जिस पृथ्वी से त्राको वासियों को लगातार रेडियो सिग्नल मिल रहे थे उस गृह के जीवों से वे एक दोस्ताना रवैये की ही उम्मीद कर रहे थे परन्तु प्रोटोकॉल तो प्रोटोकॉल था। न चाहते हुए भी टोह लेना आवश्यक था। तो परिणामस्वरूप चालक रहित यानों को त्रयाक से उतारा गया और पृथ्वी की ओर रवाना किया गया। इन यानों से मिलने वाले डाटा को रिसीव कर उनकी समीक्षा और एनालिसिस करने को त्रयाक का हर कर्मी उत्साहित था। वे तो सोच रहे थे की कब इन यानों से जानकारियां आना शुरू हो जाए और कब मानव तथा अन्य प्रजातियों से सीधा संपर्क करने को हम पृथ्वी पर उतरें। यानों ने पृथ्वी की कक्षा को इंटरसेप्ट किया और फिर वायुमंडल मे दाखिल होने लगे। त्राको वासियों की बेसब्री बढ़ते ही जा रही थी। पृथ्वी पर मानव के आलावा भी कई प्रजातियां हैं वे पहले से जानते थे और यह भी मान चुके थे की मानव एक इंटेलीजेंट प्रजाति है। अन्यथा इतने स्पष्ट रेडियो सिग्नल इतने दूर अंतरिक्ष मे कैसे भेज पाते? बस अब देरी थी तो उनको और बेहतर ढंग से समझने की और उनसे सीधा संपर्क बनाने की।
पांचो टोही यानों से डाटा आने शुरू हो गए। अभी पृथ्वी के समय के हिसाब से कुछ मिनट हुए ही होंगे की पांच मे से एक यान ने अपने ओर तेज़ गति से आ रहे कुछ हथियारों को इंटरसेप्ट किया। उस यान ने आसानी से खुद को उन हाथियों की पथ में आने से बचा तो लिया परन्तु हमले जारी रहे। यान ने इनके सोर्स का पता लगाया और उनकी पहुँच से दूर चला गया। दरअसल वे अमरीकी मिसाइलें थीं। जो पैसिफ़िक के उन अमरीकी द्वीपों पर तैनात थीं जिनके ऊपर से वो यान गुज़र रहा था। शायद उन्होंने त्राको अंतरिक्ष यान को कोई दक्षिण-कोरियाई मिसाइल समझ लिया था। अब त्रयाक पर मौजूद नियंत्रण कर्मी और उनके लीडरों का महकमा सकते मे आ गया था! इस किस्म के व्यवहार की किसी ने भी उम्मीद नही की थी। किसी ने भी नही सोचा था की पृथ्वी वासी हथियारों से स्वागत करेंगे। पर फिर भी टोही मिशन को जारी रखने की अनुमति वैज्ञानिक दल की सलाह के बाद कमांडर ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद दे दी। खैर टोही यानों ने अपना काम जारी रखा और डाटा त्रयाक तक पहुंचाते रहे। इस कार्य की पूर्ति के बाद पांचो टोही यान वापस बुला लिए गए। काफी ज़्यादा डाटा एकत्रित हो चूका था। इसे पूरी तरह एनालाइज़ करने मे थोड़ा वक़्त लगा। परन्तु फिर भी परिणाम काफी जल्दी मिल गए। परिणाम काफी चौंकाने वाले साबित हुए! इसकी रिपोर्ट बना कर कमांडर को तथा अन्य लीडरों को सौंप दी गयी। इस रिपोर्ट के अंत मे जो लिखा हुआ था वह सबके लिए एक बड़ा झटका था। लिखा हुआ था – मानवों मे से ज़्यादातर मानसिक रूप से विकृत है जो उन्हे हिंसावादी और तबाही-पसंद बनाता है। यह एक ऐसी प्रजाति के जीव हैं जो सिर्फ एक दूसरे को ही नही अपितु अन्य प्रजातियों को भी भरसक हानि पहुंचाते हैं। इनमे इंटेलीजेंट और शांतिप्रिय जन बहुत ही कम हैं। और जितने हैं उन्हे इन का समाज ईशनिंदा करने वाला बताकर धिक्कारता है। इनका समाज वैज्ञानिको की निंदा और धोखाधड़ों को पूजता है। इसलिए वे मेल-जोल के लायक नही हैं। इनसे किसी तरह का संपर्क हमे इनसे तालुकात रखने पर मजबूर कर देगा जो हमारे लिए घातक सिद्ध हो सकता है। कल को यह हमारी ही तकनीक का प्रयोग कर हम तक हथियारों के साथ पहुंच जाएँ तो यह हमारा क्या करेंगे कहना बड़ा मुश्किल है। इसलिए इनके समक्ष अपनी उपस्थिति उजागर करना मूर्खता है। जब रिपोर्ट मे इस गंभीर मानसिक विकृति तथा अधिक वक़्त मे कम तकनिकी तरक़्क़ी के मुख्य कारणों पर नज़र डाली गयी तो और भी रोचक बात सामने आयी! बताया गया की जब भी मानव जाति विज्ञान और तकनीक में तरक़्क़ी करने लगती है और मानव जाति का विकास होने लगता है, उसी वक़्त असामाजिक ताक़तें खुद सशक्त होने के लिए पूरी मानव जाति को पीछे धकेल देती है। इसलिए मानव जाति के विकास की गति बहुत धीमी है। साथ ही इन लोगों ने अपनी बुनियादी सम्पदाओं के दोहन के साथ-साथ प्रकृति को भी इतना नुक्सान पंहुचा दिया है की अब इनका पर्यावरण बचाया नहीं जा सकता।
कमांडर ने इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए सबसे कहा- इस रिपोर्ट में मौजूद तथ्यों को ध्यान मे लेते हुए आप सब को शायद अब कोई शक नही होगा कि मेरा निर्णय क्या होने वाला है। मै इस मिशन का कमांडर होने के नाते यह फैसला लेता हूँ की त्रयाक दल फ़िलहाल मानव जाति से कोई संपर्क स्थापित नही करेगा और हम पृथ्वी के सूर्य से त्रयाक के सभी इंजनों को रिचार्ज कर वापस अपनी आकाशगंगा की ओर चलेंगे। इस पर एक त्रको लीडर ने एतराज़ जताया। उनका कहना था कि सौर मंडल के सूर्य से इंजन रिचार्ज करने का अर्थ है सूर्य का फ्यूल कम कर देना। इससे सूर्य की उम्र कई गुना घट जाएगी। इसका सीधा असर भविष्य मे मानव तथा पृथ्वी की अन्य प्रजातियों पर पड़ेगा। तो क्या ऐसा करना उचित होगा। इस पर कमांडर ने उन्हें दिलासा दिया और कहा- मित्र मै आपकी चिंता समझता हूँ पर क्या आपको लगता है कि मानव जाति के पास इतना समय है भी।
(प्रस्तुत है डॉ कुंवर प्रेमिल जी की एक बेहतरीन एवं विचारणीय लघुकथा। आखिर सारा खेल जगह का ही तो है । )
उसके पास कुल जमा ढाई कमरे ही तो है। एक कमरे में बहू बेटा सोते हैं तो दूसरे में वे बूढा – बूढी। उनके हिस्से में एक पोती भी है जो पूरे पलंग पर लोटती है। बाकी बचे आधे कमरे में उनकी रसोई और उसी में उनका गृहस्थी का आधा अधूरा सामान ठुसा पड़ा है।
कहीं दूसरा बच्चा आ गया तो…..पलंग पर दादी अपनी पोती को खिसका -खिसका कर दूसरे बच्चे के लिए जगह बनाकर देखती है।
बच्ची के फैल – पसर कर सोने से हममें से एक ☝ जागता एक सोता है। दूसरे बच्चे के आने पर हम दोनों को ही रात ? भर जागरण करना पड़ेगा……बूढा कहता।
तब तो हमारे लिए इस पलंग पर कोई जगह ही नहीं रहेगी।
तीसरी पीढ़ी जब जगह बनाती है तो पहली पीढ़ी अपनी जगह गँवाती है। सारा खेल इस जगह का ही तो है। देखा नहीं एक -एक इंच जगह के लिए कैसी हाय तौबा मची रहती है। दादी सोच रही थी।
न जाने कैसी हवा चली है कि आजकल बहुएं, बच्चों को अपने पास सुलाने का नाम ही नहीं लेती। यदि वे अपनी बच्चों को अपने पास सुला लेती तो थोड़ी बहुत जगह हम बूढा बूढी को भी नसीब हो जाती।
(प्रस्तुत है डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी की एक विचारोत्तेजक लघुकथा। कहते हैं कि उम्मीद पर दुनिया टिकी है। किन्तु, डॉ कुन्दन सिंह जी नें यह सिद्ध कर दिया है कि उम्मीद पर दुनिया ही नहीं इंसानियत भी टिकी है। लघुकथा की अन्तिम पंक्ति के लिए तो मैं निःशब्द हूँ। मैं आभारी हूँ डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का जिन्होने अपनी कालजयी लघुकथा उम्मीद को e-abhivyakti के माध्यम से आप तक पहुंचाने का सौभाग्य प्रदान किया।)
महीनों से शहर में हिंसा का नंगा नाच हो रहा था। रोज़ सबेरे सड़क के किनारे दो तीन लाशें पड़ी दिखायी देतीं। पता नहीं यह हत्या वहीं होती थी या लाश दूर से लाकर सड़क के किनारे छोड़ दी जाती थी। लोगों के मन में हर वक्त डर समाया रहता। दूकानें खुलतीं, जन-जीवन भी चलता, लेकिन किसी भी अफवाह पर दूकानें बन्द हो जातीं और लोग घरों में बन्द हो जाते। सब तरफ जले मकानों और मलबे का साम्राज्य था। लोग आत्मसीमित हो गये थे। ज़िन्दगी का हिसाब-किताब एक दिन के लिए ही होता—पता नहीं कल का सबेरा देखने को मिले या नहीं।
लोग धीरे-धीरे तटस्थ और उदासीन हो रहे थे।पहले सड़क के किनारे घायल आदमी या लाश को देखकर भीड़ लग जाती थी। लोग आँखें फैलाकर, गर्दन बढ़ाकर उत्सुकता से देखते। जो ज़्यादा संवेदनशील थे वे उसे देखकर बार-बार सिहरते। बाद में उसके बारे में दूसरों को बताते। वह दुर्घटना उनके लिए दिन भर चर्चा का विषय बनी रहती।
लेकिन हत्याओं की आवृत्ति इतनी बढ़ी कि हिंसा और हत्या के प्रति लोगों की दिलचस्पी कुन्द होने लगी। भीड़ों का आकार क्रमशः कम होने लगा। फिर धीरे-धीरे हाल यह हुआ कि लाशें सड़क के किनारे पड़ी रहतीं और लोग तटस्थ भाव से उनकी बगल से गुज़रते रहते।
स्थिति यह हो गयी कि सामने लाश पड़ी रहती और लोग दूकानों पर चाय पीते रहते या सौदा-सुलुफ लेते रहते। लेकिन इस सहजता के बावजूद सबके चेहरे पर गंभीरता रहती थी। संबंधों में ठंडापन आ गया था। गर्मी और उत्साह ख़त्म हो गये थे। लगता था जैसे सब इंसानियत के मर जाने का मातम कर रहे हों।
फिर एक दिन एक जगह भीड़ दिखायी दी। वहाँ से गुज़रने वाले उत्सुकतावश भीड़ में शामिल होते जा रहे थे, लेकिन भीड़ इतनी घनी थी कि पीछे वालों को आगे का कुछ ठीक-ठीक दिखायी नहीं दे रहा था।
एक आदमी भीड़ से अलग होकर लौटा तो पीछे से देखने का उपक्रम कर रहे एक दूसरे आदमी ने पूछा, ‘क्या हो रहा है?’
लौट रहे आदमी के चेहरे पर पुलक और आँखों में चमक थी। मुस्कराकर बोला, ‘बच्चे गेंद खेल रहे हैं।’