हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 222 – कहानी – मित्र की सरलता – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कहानी – मित्र की सरलता।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 222

☆ कहानी – मित्र की सरलता ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

राहुल व देवांश सड़क पर खड़े बातें कर रहे थे। तभी एक मोटरसाइकिल आकर उनके पास रूकी।

“क्यों रे! अपने आप को बहुत होशियार समझता है,” जैसे ही मोटरसाइकिल पर सवार रघु ने कहा तो राहुल उसे देख कर चौंक गया।

“क..क.. क्या?” उसके मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। वह डर गया था। रघुवीर उर्फ रघु उसके स्कूल का दादा था। उसकी एक गैंग थी। वह सभी पर रौब जमाता था। इसलिए सभी उससे डरते थे।

“ज्यादा होशियार बनता है क्यों?” उसने आंखें तरेर कर कहा, “यदि मैं तेरी कॉपी से जरा सा देख लेता तो तेरा बाप का क्या बिगड़ जाता? तेरी परीक्षा थोड़ी ही रुक जाती।” उसने राहुल को घुरा।

जैसे ही रघु ने यह कहा देवांश को सब माजरा समझ में आ गया। राहुल ने परीक्षा में रघु को नकल नहीं करने दी थी इस कारण वह भड़का हुआ था। उसने जब देखा राहुल कुछ नहीं बोल पा रहा है तो रघु को ओर भी तेज गुस्सा आ गया।

“अरे! बोलता क्यों नहीं? सांप सूंघ गया है क्या?”

“वो.. वो सर देख लेते!”

“सर देख लेते,” रघु ने चिढ़कर कहा, “सर की इतनी हिम्मत, मेरे सामने मैं कुछ बोलते,” कहते हुए रघु ने राहुल के सिर पर एक चपत जमा दी, “साला! साणा बनता है।”

यह देखकर देवांश को बहुत बुरा लगा। वह अपने मामाजी के यहां गांव में आया हुआ था। इसलिए वह समझ गया कि रघु की दादागिरी स्कूल के साथ-साथ बाहर भी चलती है। इसलिए उसने राहुल से कहा, “चल यार! मुझे काम है। चलते हैं,” कहने के साथ देवांश ने राहुल का हाथ पकड़ा कर खींचा।

“अबे! कहां जाता है?” रघु ने अकड़ कर कहा, “यदि कल के पेपर में देखने नहीं दिया तो ध्यान रखना हाथपैर तोड़ दूंगा।”

“जी,” राहुल ने कहा तो देवांश को एक तरकीब सुझाई दे गई। वह इस तरकीब से रघु की दादागिरी उतार सकता था, इसलिए उसने कहा, “अरे रघु भाई!”

“क्या है?” रघु ने चौंक कर पूछा, “बोल।”

“अरे रघु भाई, राहुल की इतनी हिम्मत नहीं कि वह आपको नकल करने से मना कर सकें। मगर वह क्या है..,” कह कर देवांश रुका।

रघु का पारा चढ़ा हुआ था। उसने कहा, ” वह क्या है? बोल जल्दी।”

“इसका भाई है ना वह,” कहते हुए देवांश ने खेत की ओर इशारा किया, “उसका कहना है कि तूने किसी को नकल कराई तो तेरी खैर नहीं है।”

“उसने कहा था,” रघु बोला, “वह तो साला एक नंबर का डरपोक और मरियल है।”

यह सुनकर राहुल डर गया था। उसने झट से कहा, “नहीं-नहीं, उसने नहीं बोला था।”

“अच्छा!”

“हां तो क्या हुआ?” देवांश ने रघु को उकसाया, “अगर वाकई तुम रघु दादा हो तो उसे सबक सिखा कर बताओ तो जानू?”

रघु को कोई चैलेंज करें वह कैसे बर्दाश्त कर सकता था? उसने कहा, “तू रघु दादा को चैलेंज दे रहा है। इसका अंजाम जानता है?”

“हां-हां जानता हूं। ऐसे बहुत से दादा देखे हैं मैंने शहर में, हिम्मत हो तो उसे सबक सिखा कर बताओ तो जानू?”

यह सुनकर रघु का पारा चढ़ गया। वह झट से मोटरसाइकिल से उतरा,” तू यहां रुक सोनू, मैं भी उसे सबक सिखा कर आता हूं,” कहते हुए वह खेत की मुंडेर कूद कर विकास के पास पहुंच गया।

वहां जाकर उसने सीधे विकास का गिरेबान पकड़ा और कहा, ” क्यों रे डेढ़ फसली, दादा बनता है,” कहने के साथ रघु ने विकास का कालर पकड़ कर दो थप्पड़ जड़ दिए।

विकास कुछ समझ नहीं पाया। यह क्या हुआ? तभी पास ही चर रहे बैल की निगाहें रघु की हरकत पर चली गई। वह विकास को थप्पड़ मार रहा था।

तभी अचानक वह दौड़कर आया। उसने आते ही सिंग से रघु को उठाया। हवा में उछाल दिया। रघु इसके लिए तैयार नहीं था। वह हवा में उछला। पत्थर की मुंडेर पर जाकर गिरा।

यह सब अचानक हुआ था। वह बहुत तेजी से उछला था और पत्थर पर गिरा था। गिरते ही उसके हाथ की हड्डी टूट गई थी। विकास कुछ-कुछ सम्हल चुका था। वह चिल्लाकर बोला,” रामू! रुक जा!”

मगर रामू बैल कहां रुकने वाला था। वह गुस्से में था। उसके मालिक को कोई हाथ लगाएं, यह उसे बर्दाश्त नहीं था। रघु ने उसे थप्पड़ जड़ दिए थे इस कारण वह बहुत तेजी से चिल्लाते हुए अपना गुस्सा उतार रहा था।

दोबारा रघु की ओर तेजी से दौड़ा। यह देखकर रघु घबरा गया। उसके सामने साक्षात मोड़ तांडव कर रही थी। मगर वह उठ नहीं पा रहा था इसलिए जोर से चिल्ला पड़ा, “अरे! मार डाला! कोई बचाओ!” कह कर वह चीखा। तभी उसका मित्र सोनू वहां आ गया।

तभी विकास ने सोनू को इशारा कर दिया। वह अंदर नहीं आए। इसी के साथ विकास तेजी से रघु के पास पहुंच गया, “नहीं रामू, इसे छोड़ दो।”

मगर रामू ने तेज गर्दन हिलाकर जोर से हुंकार भरी। जैसे वह रघु को जोरदार सबक सिखाना चाहता है।

विकास रामू का गुस्सा जानता था। वह तुरंत रामू के पास गया। उसे गले से लगाते हुए बोला, “नहीं रामू, इसे छोड़ दे।”

तभी विकास में तुरंत उसके दोस्त सोनू कहा, “सोनू! इसे ले जा। नहीं तो यह बैल इसको मार डालेगा।”

सोनू तुरंत रघु के पास गया। उसको हाथ टूट चुका था। पैर में चोट आई हुई थी। उसे पकड़ कर सोनू तुरंत खेत के बाहर ले गया। इस तरह रघु अपनी जान बचा कर भाग गया।

इस घटना के बाद से रघु ने दादागिरी लगाना छोड़ दिया। वह समझ गया था कि किसी का सरल व हृदय मित्र उसे कभी भी सबक सिखा सकता है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

28-01-2022

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २६७ ☆ बाल कहानी – कृष्णावतार की कविता में कहानी…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २६७ ☆ 

☆ बाल कहानी – कृष्णावतार की कविता में कहानी ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

(नाना से सुनी कृष्णावतार की कविता में कहानी)

 

गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं थीं। अर्णव और सोनी अपनी नानी के घर आए हुए थे।

वे जब भी नाना-नानी के घर आते, तब दोनों ही अपने नाना और नानी से जीभरकर बातें करते। कभी अपने स्कूल की बातें बताते, तो कभी दोस्तों की। लेकिन दोनों ही कहानी सुनने के बहुत शौकीन थे। वे कभी नाना के पास सोते, तो कभी नानी के। उनके नाना और नानी नई-नई कहानियाँ सुनाते।

एक दिन वे अपने नाना जी के साथ सोने आए, तब अर्णव बोला, ” प्यारे नाना मुझे भगवान कृष्ण की कहानी सुनाओ न।”

तभी सोनी बोल पड़ी, ” हाँ नानाजी मुझे भी भगवान कृष्ण की कहानी सुननी है।”

प्यारे बच्चो तुम्हें आज भगवान कृष्ण की कहानी कविता में सुनाता हूँ।”

“क्या कहा कविता में कहानी नानानी।” सोनी ने चोंकते हुए पूछा।

“हाँ बच्चो कविता में कहानी, आपको सच में बहुत पसंद आएगी।

हमारे मित्र चक्र ने कविता में पूरी कहानी लिखी है, सुनाता हूँ, जिनकी लिखीं कुछ लिखीं किताबें आपको दी थीं न।”

“हाँ-हाँ हम समझ गए। हमें उनकी किताबें बहुत अच्छी लगीं।” दोनों ही समवेत स्वर में बोले।

“देखो बच्चो ध्यान से सुनना। हुंकारे भरते रहना। कहीं सो मत जाना कहानी सुनते-सुनते।”

 दोनों समवेत स्वर में बोले, “नहीं, नहीं नानाजी। आप जल्दी से सुनाइए न!”

“बच्चो अब सुनो कविता में पूरी कहानी ध्यान से- बच्चो इस कहानी का शीर्षक है –कृष्णावतार और मुन्ना जी

—-

“बोला मुन्ना मातु से, कृष्ण लिए अवतार।

कैसे जन्मे कृष्ण जी, मुझे बताओ सार ।।

सुनो पुत्र पावन कथा, श्री कृष्ण भगवान।

अपने ही वरदान से, दिया देवकी – मान।।

 *

उग्रसेन ने पुत्र का, नाम रखा था कंस।

अतिशय ही वह क्रूर था, देता सबको दंश।।

 *

उग्रसेन राजा हुए, मथुरा ब्रज के धाम।

वे उदार प्रभु भक्त थे, करते जनहित काम।।

 *

उग्रसेन के भ्रात थे, देवक उनका नाम।

पुत्री उनकी देवकी, जने उसी ने श्याम।।

 *

हुआ ब्याह वसुदेव से, जो कुंती के भ्रात।

मंत्री मथुरा राज के, बँधी देवकी साथ।।

 *

विदा हुई जब देवकी, रथ को हाँके कंस।

बहुत खुशी था आज वह, जैसे मानस हंस।।

 *

रथ लेकर आगे बढ़ा, आई यह आवाज।

कंस काल सुत आठवाँ, छीने तेरा ताज।।

 *

जैसे ही उसने सुना, बहना का सुत काल।

गुस्से में वह भर गया, हुआ चेहरा लाल।।

 *

तुरत – फुरत वापस हुआ, डाला उनको जेल।

जंजीरों में जकड़कर, नहीं करा फिर मेल।।

 *

उग्रसेन क्रोधित हुए, किया कंस प्रतिरोध।

कंस न माना एक भी, भूल गया सब बोध।।

 *

कैद किए अपने पिता, डाला कारागार।

मद, घमण्ड में भूलकर, खूब किया प्रतिकार।।

 *

राजा मथुरा का बना, बढ़ गए अत्याचार।

मनमानी वह नित करे, बढ़े पाप के भार।।

 *

भद्र अष्टमी व्योम घन, छाईं खुशी अपार।

मातु देवकी गर्भ से, हुआ कृष्ण अवतार।।

 *

पुत्र आठवें कृष्ण थे, सत्य हुई यह बात।

बरसे जमकर मेघ तो, थी अँधियारी रात।।

 *

ताले टूटे जेल के, हुआ कृष्ण अवतार।

प्रहरी सोए नींद में, मातु कर रही प्यार।।

 *

वासुदेव गोकुल चले, सुत को लेकर साथ।

शेषनाग अवतार ने, ढका कृष्ण का गात।।

 *

यमुना जी भी घट गईं, किया कृष्ण को पार।

घर आए वह नन्द के, प्रभु की कृपा अपार।।

 *

लिटा पलँग पर कृष्ण को, हो वसुदेव निहाल।

प्रभु की लीला चल रही, अदभुत मायाजाल।।

 *

मातु यशोदा नींद में, रिमझिम है बरसात।

बेटी उनकी साथ ले, लौटे रातों – रात।।

 *

जन्मे माता रोहिणी, सुंदर से बलराम।

जग में प्यारे नाम हैं, बलदाऊ औ’ श्याम।।

 *

धन्य यशोदा हो गईं, पाकर के गोपाल।

गोकुल में खुशियाँ बढ़ीं, उच्च नन्द का भाल।।

 *

अत्याचारी कंस के, बढ़े पाप आचार।

चली एक कब कंस की, ईश लिए अवतार।।

 *

बलदाऊ सँग कृष्ण ने, किए अनेकों खेल।

गोकुल रसमय हो गया, बढ़ा प्रेम अरु मेल।।

 *

गाय चराईं कृष्ण ने, ग्वालों के नित संग ।

कभी चुराते मधु, दही, सभी देखकर दंग।।

 *

मिश्री, माखन, दही प्रिय, उनको भाए खूब।

रोज करें नाटक नए, कभी न आए ऊब।।

 *

हँस – हँस बीता बालपन, किए चमत्कृत काम।

देख चकित गोकुल हुआ, मनमोहन – बलराम।।

 *

कंस किया मलयुद्ध को, मिला निमंत्रण श्याम।

साथ – साथ दोनों चले, कृष्ण और बलराम।।

 *

छोटे से ही कृष्ण ने, मल्ल भी दिए पछाड़।

अत्याचारी कंस को, दिया उसी दिन मार।।

 *

कैद से छूटे मातु – पित, और नानु उग्रसेन।

खुशियाँ घर – घर बढ़ गईं, प्रेम में भीगे नैन।।

 *

मातु देवकी खुश बहुत, और पिता वसुदेव।

कृष्ण सभी को प्रिय हैं, हैं देवों के देव।।

 *

मुन्ना भी खुश बहुत था, सुनकर कृष्णावतार।

भक्तों का करते रहे, सदा कृष्ण उद्धार।।

 *

“बच्चो कैसी लगी कविता में कहानी।”

तभी अर्णव बोला, ” मुझे तो बहुत ही सुंदर लगी।”

सोनी भी कहाँ चुप रहने वाली थी, वह भी बोली, ” नानाजी इतने सरल शब्दों में इत्ती अच्छी कहानी, मुझे तो बहुत पसंद आई है। मैं तो याद करके कृष्णजन्माष्टमी पर अबकी बार स्कूल में सुनाऊँगी।”

“अरे वाह सोनी, क्या बात है? बच्चो मुझे तो नींद आने लगी है, अब आप दोनों भी सो जाओ। पाँच बार गायत्री मंत्र का सुनाते-सुनाते।”

तीनों ही गायत्री समवेत स्वर पढ़ने लगते हैं—

“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात —“

“बच्चो इस मंत्र का अर्थ हिंदी में याद है न।”

“हाँ नाना जी मुझे याद है। आपने ही तो याद कराया है। मुझे तो गायत्री मंत्र बोलकर बहुत अच्छी नींद आती है।” सोनी बोली।

अर्णव बोला, “मुझे भी। डरावने सपने भी नहीं आते कभी।”

“अच्छा एक बार दोहरा लेते हैं- हे प्रभु आप प्राण स्वरूप हैं, आप दुःखनाशक हैं, आप पापनाशक हैं, आप मेरी अंतरात्मा में धारण कर मुझे अच्छे रास्ते पर चलाते रहिए।”

बच्चो अब लाइट बंद करता हूँ, “शुभरात्रि बच्चो।”

“शुभरात्रि नाना जी!”

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ? ?

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक सुंदर भूखंड हुआ करता है..।’ श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस सौंदर्य का वर्णन सुनने की उत्सुकता जगी।

‘उस भूखंड के बारे में बताइए न प्रभु!’, सामूहिक स्वर में मनुहार थी।

‘इस भूखंड में हर तरफ हरीतिमा है। भूखंड का प्रत्येक नगर आकर्षक उद्यानों से सुशोभित है। यहाँ की नदियों में प्रवाहित होता सलिल अमृत-सा निर्मल और प्राणों को पुष्ट करने वाला  है। यहाँ के निवासी नदियों को माता के रूप में पूजते हैं। उनकी आरती उतारते हैं। गौ को वे अपनी जननी के समान मान देते हैं। अपने स्वामित्व की आधी भूमि पर ही वे अलट-पलट कर कृषि करते हैं, शेष भूमि पशुओं के चरने के लिए छोड़ दी जाती है। यहाँ हरे वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है, उनकी रक्षा करने और महात्म्य सुनने का भी विधान है। पंचमहाभूतों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति के घटकों में ही ईश्वर के दर्शन किये जाते हैं। स्वर्ग के सुख और देवता भी ईर्ष्या करें, ऐसा मनोरम है ये भूखंड!’

कथा सुनाई जाती रही, पीढ़ियों तक श्रोता तृप्त होते रहे। कालांतर में अपने पूर्वजों से इस भूखंड का वर्णन सुनने वाली नई पीढ़ी को भी पुरानी कथा में उत्सुकता जगी।

खेत और पेड़ रौंद कर खड़ी की गई चमचमाती गगनचुम्बी इमारत के एअर कंडीशंड कक्ष में प्लास्टिक  की बोतल से मिनरल पानी पीते हुए नई पीढ़ी ने सूत जी से कहा, ‘उस सुंदर भूखंड की कथा सुनाइए न!’

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक समय ऐसा सुंदर भूखंड हुआ करता था..!’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – वक्त सबका बाप है ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा वक्त सबका बाप है

☆ लघुकथा – वक्त सबका बाप है ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

गली, मोहल्ले, गाँव से लेकर शहर, शहर से लेकर देश, और देश से लेकर दुनिया भर में चौधरियों की भरमार है। यह परम्परा भिन्न-भिन्न नामों और उपाधियों से आदिम काल से चली आ रही है और आगत में भी अनवरत रूप से गतिमान रहेगी।

चौधरी अपने को सर्व शक्तिमान मानता है और कई मायनों में होता भी है। उसके चारों ओर चमचों की फ़ौज लगी रहती है। वह प्रशंसा का भूखा होता है। बड़ी-बड़ी डींगें हाँकना उसकी आदत में शुमार होता है। अपनी ताकत और दौलत के बूते पर ज़रूरतमंद और कमजोर व्यक्तियों पर अपनी हुकूमत क़ायम रखता है। अपने जायज़-नाजायज फ़ैसलों को थोपकर अपना रौब गाँठता है। अपने अधीनों पर जुल्म और ज़्यादतियाँ ढहाता है और बेचारे अधीनस्थ चुपचाप बर्दाश्त करते रहते है।

इधर पिछली सदी में दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली चौधरी के समक्ष छोटे, पर खुद्दार और मजबूत इरादों के धनी चौधरी ने चुनौती पेश कर दी है। उनके बीच ऐसी ज़बरदस्त भिड़ंत हुई कि उसकी बड़े चौधरी की हेकड़ी निकल गई। वह पगला कर गली के गुंडों की तरह धमकियों पर उतर आया। कल तक जो दुनिया में लगी युद्धाग्नि को बुझाने के हवाई दावे किया करता था, आज वही दुनिया को आग के हवाले करने की बातें कर रहा है।

पर इन दिनों हवा में ग़ज़ब का शोर है। लोगों का कहना है कि बड़बोले चौधरी का भेजा फिर गया है। दुनिया को अपनी उँगली पर नचाना चाहता है, पर वह भूल गया कि वक्त के दरिए का ढेर सारा पानी बह चुका है। वह जिन देशों के लोगों को गँवार और जंगली समझा करता था उनमें आत्म स्वाभिमान जाग उठा है। वे अपने पैरों पर उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने सहमति में सिर हिलाने, हाथ ऊपर उठाने और जी-हजूरी करने से साफ़-साफ मना कर दिया है।

कदाचित मद में अँधा चौधरी भूल गया कि दुनिया में किसी भी महाबली की चौधाराहट हमेशा के लिए नहीं रही है। वक्त का कोई बाप नहीं है। वक्त सबका बाप है। और जब वक्त अपने पर आता है, तो बड़े से बड़े राजे-महाराजे, अर्जुन जैसे धनुर्धरों, भीम जैसे महाबाहो, सिकंदरों, बादशाहों की पलक झपकते खटिया खड़ी कर देता है।… तो सुनो! मिस्टर चौधरी फिर तुम किस देश की मूली हो।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # # १२९ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – ३ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला सबसे खास: हमारे बॉस” 

☆ कथा-कहानी # १२९ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – ३ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

शीर्षक भ्रमित करता है क्योंकि हमारे माइंडसेट इस तरह बन गये हैं कि व्यक्ति या पद के हमारे आकलन हमारे अनुभवों और अपेक्षाओं पर आधारित होते हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि हमें जो मिला, शायद योग्यता से कम मिला है या फिर ज़रूरत से ज्यादा पा लिया है।कम मिलने पर तो हम निष्पक्षता की गुहार लगाते हुये उत्तरदायित्व रूपी टोपी से उस सर (Head) को सुशोभित करने में रत्ती भर संकोच नहीं करते जो हमारा हेड या बॉस होता है पर अपेक्षा और योग्यता से अधिक मिलने का पूरा श्रेय खुद ही हड़पने में संकोच नहीं करते।पर मान लीजिए कि बॉस की जगह ईश्वर हो तो फिर क्या होता है।जीवन, सिर्फ ऑफिस की चारदीवारों से घिरा नहीं होता, पाना और खोना, कम या ज्यादा, जैकपॉट या सेट बेक सब कुछ ही तो जीवन के अंग ही हैं जिसमें शैशव काल से लेकर वृद्धावस्था तक हर पायदान के परिणाम ईश्वर ने निर्धारित कर दिया है।

अगर मिल गया तो बहुत अच्छा और अगर नहीं मिला तो ये ईश्वर की इच्छा। “जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए “हमारी सनातन काल से चली आ रही जीवनशैली है जो शायद बदलते समय के साथ धूमिल पड़ रही है क्योंकि अधिकांश परिवारों का अपने नौनिहालों के लिए लक्ष्य 95% से शुरू हो रहा है।हम लोगों के सेवाकाल में भी वार्षिक मूल्यांकन में 95% पाना, याने “पदोन्नत” होने का अवसर गंवाना माना जाता रहा था।पर ये नंबर गेम बहुत कुछ छीन लेता है और शुरु हो जाती है रेटरेस। शुक्र है कि ये नंबर गेम हम सभी के जीवनकाल के लिए ईश्वरीय विधान नहीं है। प्रकृति ने सभी को सुनहले पल के उपहार दिये हैं।बहुत कुछ देख पाते हैं पर बहुत कुछ छूट भी जाता है, जो छूट जाता है वो शायद फोकस कहीं और होने से या फिर सर के ऊपर से गुजर जाने जैसा ही होता है।हर पल अपने आप में महत्वपूर्ण होता है जिसमें जीवन पाने से लेकर जीवन खोने तक की संभावनाएं छुपी रहती हैं, “जिंदगी का सफर है ये ऐसा सफर, कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं।है ये ऐसी डगर, चलते हैं सब मगर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं”।

जीवन चलने का नाम है तो इसी तरह हम सभी और हम सभी के बॉस और उनकी भी बॉस भी इसी परंपरा का पालन करते रहेंगे याने यह श्रंखला जारी रहेगी। 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जाने कब बदला जमाना?)

☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“हमारे जमाने में कितना अच्छा था, सबको एक दूसरे के लिए फुर्सत थी। सब अपने आरुषि पड़ोसी तो छोड़ो पूरे मोहल्ले का हाल-चाल बता देते थे एक दूसरे के दुख- सुख में खड़े भी रहते थे।

चूल्हे में खाना बनाते थे और हर त्यौहार को एक साथ   मिलजुल कर मानते थे।

क्या हो गया माँजी आज फिर अपने जमाने की यादें ताजा हो गई क्या?

नहीं बहू बस यूं ही याद आ गई थी पता नहीं तुम्हारी बाई कब आएगी? खाना बनाएगी कि नहीं? तो तुम लोग मोबाइल से आर्डर कर देते हो।

माँ जी आपके जमाने में इतनी सुविधा कहां थी?

मां-बाप लड़कियों को पढ़ाते कहां थे. अब हम तो लड़कों से आगे निकल गए हैं। आप थोड़ा बाहर निकलो दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है मां. बहुत खूबसूरत यह दुनिया है और अगर जमाना ना बदला होता तो आपको हम लोग यहाँ इसी मोबाइल में बाबा जी के घर बैठे प्रवचन जो आप सुनते हो यह सब कैसे सुनाते? पुराने जमाने में तो आपको भी काम करना पड़ता और मुझे भी अब हम दोनों आराम से है ना।

हां बहु तुम ठीक कह रही हो. यह जमाना ज्यादा अच्छा है हम तो तुम्हारे बाबूजी के सामने कुछ कह भी नहीं पाते थे. बदलाव हमेशा अच्छा होता है जाने कब जमाना बदल गया और जमाने के साथ हम भी बदल गये।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ पहाड़ों में बसा एक परिवार ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कथा-कहानी – पहाड़ों में बसा एक परिवार ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

​पहाड़ों की गोद में बसा, एक गुमनाम गाँव, जहाँ सुबह की किरणें सबसे पहले पेड़ों की चोटियों को छूती थीं और शाम को सूरज क्षितिज के पीछे धीरे-धीरे ओझल हो जाता था। यहाँ की हवा में एक अनूठी मिठास थी, और मिट्टी में मेहनत की सौंधी सुगंध।

इसी गाँव में, नरपत का परिवार रहता था, जिसकी जड़ें जमीन में गहरी थीं। नरपत के चार बच्चे थे—हीरा, शेर, बाग, और रूप। चारों अपनी-अपनी खूबियों के साथ, मानो एक ही पेड़ की चार मज़बूत शाखाएँ थीं।

​सबसे बड़ी, हीरा, का विवाह रूप के साथ हुआ। उनके घर में हँसी-खुशी का माहौल तब और बढ़ गया, जब उनके तीन बच्चे—इंदर, गोपाल, और कुंती—आँगन में खेलने लगे।

​हमारी कहानी नरपत के बड़े बेटे शेर की है, जिनकी आँखें सपनों से भरी थीं और कंधों पर परिवार की ज़िम्मेदारी थी। शेर ने अपनी जीवन संगिनी, नंदी का हाथ थामा।

नंदी, दीवान और खिमूली की बेटी थीं, और उनके परिवार में सात भाई-बहन थे—प्रेम, मोहन, चतुर, चंदन, स्वरूप, और चना। नंदी ने इस नए घर में आकर, अपने सरल स्वभाव और स्नेह से एक नई रोशनी भर दी।

🌱​नंदी का मायका

​नंदी के मायके की कहानी भी कम रोचक नहीं थी। उनके बड़े भाई प्रेम ने गोविंदी से विवाह किया, और उनके यहाँ तीन बेटियों ने जन्म लिया—महेशी, उमा, और उषा।

दूसरे भाई, मोहन, की पत्नी सरस्वती हैं, और उनके चार बच्चे हैं—गोदावरी, सुकुमार, शिव नारायण, और हरेंद्र।

तीसरे भाई, चतुर, ने प्रतिमा के साथ घर बसाया, और उनके पाँच बच्चे हैं—प्रकाश, देवी, लक्ष्मण, धरम पाल, और नर्मदा।

चौथे भाई, चंदन, का विवाह मधुलिका से हुआ, और उनके यहाँ देवेंद्र, इंदिरा, रेखा और अजय ने जन्म लिया।

पाँचवे भाई, स्वरूप, की पत्नी राधा हैं, और उनके तीन बच्चे हैं—संजीव, मंजू, और नरेश। नंदी की बहन चना का विवाह कुंदन के साथ हुआ, और उनके पाँच बच्चे हैं—मधी, चंदन, गोविंदी, सुरेंद्र, और नंदन।

🌱​शेर की गृहस्थी

​समय के साथ, शेर और नंदी की गृहस्थी बढ़ती गई। उनके घर में हँसी-ठिठोली और चहल-पहल रहने लगी। उनके सात बच्चे हुए—जसवंत, जगत, महेंद्र, गोविंदी, लीला, सरस्वती, और दान। हर बच्चा अपनी अनूठी पहचान के साथ आया, मानो जीवन के अलग-अलग रंग हों।

​सबसे बड़े जसवंत ने उम्मेद की बेटी शोभा से विवाह किया। दोनों के जीवन में खुशियों का आगमन हुआ जब उन्हें नितिन और नितेश का आशीर्वाद मिला।

​दूसरे बेटे, जगत, ने राधिका को अपना जीवनसाथी बनाया। राधिका के पिता बाग और माता सरस्वती हैं। जगत और राधिका के यहाँ अनुराग ने जन्म लिया, जो उनके परिवार की आँखों का तारा बना।

🌱​राधिका का मायका

​राधिका का मायका भी रिश्तों से भरा हुआ है। उनके तीन भाई-बहन हैं—रजनी, कुलदीप, और प्रदीप।

सबसे बड़ी, रजनी, का विवाह गजेंद्र के साथ हुआ और उनके दो बच्चे हैं—भानु और श्रृष्टि।

उनके भाई कुलदीप की पत्नी का नाम ज्योति है, जिनके माता-पिता राम और भगवती थे। कुलदीप और ज्योति के दो बच्चे हुए—प्रियंका और गौरव।

राधिका की बहन दीपा का विवाह महेंद्र के साथ हुआ, और उनके तीन बच्चे थे—मेघना, अभिनव और करण।

🌱​अनुराग और स्नेहा

​अनुराग की जीवन संगिनी स्नेहा बनीं, जो कमल और अंजू की बेटी हैं। स्नेहा का एक भाई भी है, जिसका नाम है रोहन।

उनके पिता कमल का परिवार भी भरा-पूरा है। उनके माता-पिता शिवरतन और सीता थे, और उनके चार भाई-बहन हैं—बिनोद, नरेश, बबीता, और दिनेश।

स्नेहा की माँ अंजू के माता-पिता ओम प्रकाश और लक्ष्मी थे, और उनके भी चार भाई-बहन हैं—पवन, आशा, वेद, और शशि।

🌱​शेर की गृहस्थी का विस्तार

​तीसरे बेटे, महेंद्र, ने जयश्री के साथ घर बसाया। उनके यहाँ रितु के रूप में एक नन्ही परी आई, जिसने घर के आँगन में किलकारियों की गूँज भर दी।

​शेर की तीन बेटियाँ हैं—गोविंदी, लीला, और सरस्वती। तीनों का विवाह बड़े ही धूमधाम से हुआ।

​गोविंदी का विवाह प्रह्लाद के साथ हुआ। प्रह्लाद नंदन के बेटे थे। इनके तीन बच्चे हुए—नीरज, दिवस, और विभा।

​लीला ने आनंद का हाथ थामा, जो गंगा के बेटे हैं। उनके घर दो बेटियों ने जन्म लिया—भाग्यश्री और तनुश्री।

​सरस्वती का विवाह रजत से हुआ, जिनके माता-पिता खीम और भागीरथी थे। सरस्वती और रजत की भी दो बेटियां हैं—गीतिका और युथिका।

​सबसे छोटे बेटे, दान, ने भगवती देवी को अपना हमसफ़र बनाया। भगवती, धर्म और लक्ष्मी की बेटी हैं। उनके यहाँ वीरेंद्र ने जन्म लिया, जो इस पीढ़ी की सबसे छोटी कड़ी बनकर आया।

🌱​बाग और रूप

​नरपत के सबसे छोटे बेटे रूप ने देबुली देवी से विवाह किया। उनके यहाँ बच्चों की किलकारियाँ गूँजती रहती थीं, और उनके दस बच्चे हैं—कौशल्या, चंदन, राधा, शंकर, महेंद्र, लीला, कुसुम, लक्ष्मी, पुष्पा, और गुड़िया।

​तीसरे बेटे बाग ने खिमूली देवी को अपनी जीवनसंगिनी बनाया। उनके घर पाँच बच्चों ने जन्म लिया—भूपाल, बहादुर, इंदर, जोगुली, और नंदन।

​इस प्रकार, नरपत का परिवार एक विशाल वटवृक्ष की तरह बढ़ता गया, जिसकी जड़ें तो पहाड़ों की मिट्टी में थीं, पर शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं। हर शादी, हर नया जन्म, और हर रिश्ता इस कहानी में एक नया अध्याय जोड़ता गया, जो आज भी सुनाया जाता है।

यह कहानी सिर्फ नामों और रिश्तों की नहीं है, बल्कि उस प्रेम, त्याग और आपसी सहयोग की है, जिसने इस परिवार को एक मजबूत धागे में बाँध रखा है। यह बताती है कि कैसे एक छोटे से गाँव से शुरू हुआ सफर, पीढ़ियों तक अपनी कहानियों की मिठास फैला सकता है।

♥♥♥♥

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७७ – ऋचाएँ… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ऋचाएँ…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७७ — ऋचाएँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

किसी शब्द — स्रष्टा ने पेड़ों की छालों में सहस्रों ऋचाएँ लिखी थीं। एक ऋषि ने उन सारी ऋचाओं का अर्थ समझ लिया। वह जानता था भविष्य में मनुष्य के हाथों पेड़ कटेंगे। पेड़ कटने से ऋचाएँ नष्ट हो जातीं। ऋषि इन ऋचाओं को नष्ट होने नहीं देता। उसने इन्हें कंठाग्र करना शुरु किया। वह साधना से वर्षों जी कर लोगों को यह अभ्यास करवाता। ये ऋचाएँ जन – जन के कंठ में पहुँच कर अनंत हो जातीं।

 © श्री रामदेव धुरंधर
20 – 09 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह साहब सुबह उठा। नहा धोकर , नाश्ता कर ऑफिस के लिए तैयार होने लगा कि अचानक एक जूते का तस्मा कसते कसते टूट गया। इतना समय नहीं बचा था कि बाज़ार जाकर नये तस्मे खरीद लाता। गाड़ी आकर गेट पर लग गयी थी। ड्राइवर हार्न बजाए जा रहा था। जैसे तैसे जूतों के पुराने तस्मे कसे और यह सोचकर रवाना हुआ कि शाम को लौटते वक्त नये तस्मे खरीद लेगा।

दिन भर ऑफिस में बैठे बैठे उसका ध्यान बार बार अपने एक टूटे तस्मे पर जाता रहा। वह मेज़ के पीछे जूतों को ज्यादा से ज्यादा छिपाने में लगा रहा। दूसरे कर्मचारी देखेंगे तो क्या सोचेंगे? फिर वह अपने पर मुस्कुराया भी कि हम ज़िंदगी भर यही सोचते रहते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे? दूसरे हमारी कोई कमी या कमज़ोरी देख लेंगे तो कैसा लगेगा? इस बात पर गौर किया उसने।

ऑफिस से छुट्टी हुई। साहब गाड़ी में सवार सीधे एक बढ़िया मार्केट में पहुंचे। बड़े बड़े शो रूम। चमचमातीं , दूधिया लाइट्स। बाहर मज़ेदार पकवान की रेहड़ियां। खूब भीड़। साहब एक शो रूम में घुसा। सेल्समैन भागा आया -कहिए साहब? कौन से ब्रांड के नये डिजायन के जूते दिखाऊं?

-मुझे जूते नहीं , सिर्फ तस्मे चाहिएं। अभी सोफे पर बैठते बैठते कहा साहब ने।

सेल्समैन ने चौंक कर देखा -साहब। यहां सिर्फ नये जूते बिकते हैं। साॅरी। आप अगले शो रूम में पता कीजिए।

दूसरे शो रूम वाले सेल्समैन ने सोफे पर बैठने का अवसर भी नहीं दिया।

तुरंत कहा -आप भी कमाल करते हो? जाइए। यहां कोई तस्मे एक्स्ट्रा नहीं बेचे जाते। आप चाहो तो नये जूते खरीदने के लिए बैठ सकते हो। नहीं तो समय खराब मत कीजिए।

शो रूम और भी थे। चमचमाते पर बिना पुराने जूतों के। वहां पुराने का कोई काम नहीं। एक शो रूम के सेल्समैन ने सबसे ज्यादा होशियारी दिखाई -क्या रखा है इन पुराने डिजाइन के जूतों में जिसके तस्मे ढूंढते फिर रहे हो? नये दिखाता हूं। खरीदिए और सारी प्राॅब्ल्म साल्व। न रहेंगे पुराने जूते न ढूंढेंगे तस्मे।

बाहर आया। देखा कि रेहड़ियों पर लोग पेपर ग्लास या पेपर प्लेट्स में मज़े में खा पी कर डस्टबिन में फेंक पैसे चुकता कर जा रहे हैं। अचानक तस्मों ने जैसे मुंह चिढ़ा कर कहा -बाबू मोशाॅय , समझे नहीं क्या? यह है नया कल्चर। यानी -यूज एंड थ्रो। ओल्ड से नो मोह। समझे क्या?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २४ – कथा-कहानी – राघव और विश्वास ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ राघव और विश्वास ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सुबह से रात तक सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाते दौड़ाते राघव बुरी तरह से थक जाता था। अपने ऑटो को चार्जिंग में लगाकर खाना पीना खाकर जब वह बिस्तर पर लेटता तो उसे यह पता भी नहीं चलता कि वह जिंदा भी है। प्रत्येक दिन की भांति आज भी वह घर पहुंचा, लेकिन आज उसके लेटने का दिन नहीं था।

मुनमुनिया बुखार से तप रही थी, साथ ही साथ उसे उल्टी भी हो रही थी। अपनी मुनमुनिया को लेकर राघव और रज्जो दोनों अस्पताल की ओर भागे। पूरे दिन की कमाई के अलावा यही कोई तीन-चार सो रुपए और भी घर में थे। कुल मिलाकर लगभग 1000 ₹1200 से अधिक नहीं था।

जैसे-जैसे राघव का ऑटो आलमबाग की तरफ पढ़ रहा था, सुंदर सी मुनमुनिया की साँसे लम्बी -लंबी चलने लगी।

जरा पीछे मुड़कर देखो तो मुनमुनिया के पापा! देखो न हमारी मुनमुनिया कैसे कर रही है? इसकी सासे उल्टी चल रही है मुनमुनिया के पापा!.. राघव ने पीछे मुड़ देखा तो उसके होश उड़ गए। उससे अब ऑटो चलाए बन नहीं रहा था। किसी तरह से वह नहरिया चौराहे के पास एक बड़े नर्सिंग होम के पास पहुंचा। अस्पताल के रिसेप्शन पर बात की तो मरीज के रजिस्ट्रेशन करने की बात कही गयी। पूरे ₹500 तो रजिस्ट्रेशन में ही खर्च हो गए। अभी शेष इलाज बाकी था। राघव के पसीने छूट रहे थे आखिर वह करें तो क्या करें। इधर पैसे की तंगी उधर मुनमुनिया के लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। राघव ने अपने कई ऑटो वाले साथियों को फोन मिलाया लेकिन लगभग सभी ने उटपटांग बातों के सिवाय कुछ भी मदद नहीं की। कई तो नशे में बुरी तरह से धुत होकर गालियां भी दे रहे थे।

राघव को अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मुनमुनिया की हालत बिगड़ती चली जा रही थी। उसे वेंटिलेटर पर रखने के सिवाय कोई उपाय शेष नहीं बचा था। बड़े डॉक्टर का इंतजार था।

सर…इनके पास तो पैसे रुपए बिल्कुल नहीं है। कैसे उका इलाज किया जाए। वैसे जरुरी इंजेक्शन वगैरह तो दे दिया गया है लेकिन बच्चे की हालत ठीक नहीं है। बच्चे को अटेंड क़र रहे नर्स और अटेंडेंट ने डॉ विश्वास से यह बातें कहीं।

इस बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर पर ले चलो। इसके अकाउंट में अभी ये ₹5000 डिपॉजिट करो, ऐसा कहते हुए डॉ. विश्वास ने नोटों की एक गड्डी नर्स के हाथ में पकड़ा दी। नर्स, अटेंडेंट और रज्जो तीनों हक्के – बक्के थे। रज्जो को विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि शायद डॉक्टर के रूप में भगवान ही आ गये। अस्पताल की ओ पी डी की बेंच पर सिसकी भरते हुए उस ऑटो ड्राइवर को डॉक्टर विश्वास ने देखक़र पहचान लिया था, जिसने एक दिन मुश्किल हालत में डॉक्टर साहब और उनके बेटे को एयरपोर्ट पहुंचाया था।

तेलीबाग और उतरेटिया के बीच जाम की स्थिति अत्यंत ही खराब थी। लगभग एक घंटे से कोई भी गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। डॉ विश्वास को अपने बेटे को छोड़ने एयरपोर्ट जाना था। उनकी फ्लाइट के टेक आफ करने का समय धीरे-धीरे, नजदीक आ रहा था, लेकिन जाम खुलने का नाम नहीं ले रहा था।

हर हाल में हमें फ्लाइट पकड़ना ही होगा नहीं तो मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा एक बीस बाइस वर्ष के बच्चे को ऐसा कहते हुए राघव ने सुना तो उसके कान खड़े हो गए।

क्यों साहब, बाबू ऐसा क्यों कह रहे हैं। कार की बगल में से गुजर रहे राघव ने डॉ विश्वास से पूछ लिया था।

डॉ विश्वास ने जब सारी बातें राघव से बताई तो राघव ने हाथ जोड़क़र कहा.. साहब आप अपनी कार को थोड़ा सासाइड में दबा कर इधर ही खड़ी कर दीजिए। जाम कब खुलेगा कुछ पता नहीं। मेरे साथ आईये न साहब…मैं कुछ करता हूं। राघव ने हाथ में साहब की अटैची उठाई और गली-गली होते हुए तीनों राघव के घर पहुंच गए।

यहां से गली-गली होते हुए राघव का ऑटो तेजी के साथ एयरपोर्ट की ओर भाग रहा था। सिक्योरिटी वालों ने एयरपोर्ट के पास पहुंचने ऑटो को रोका तो डॉक्टर साहब ने फ्लाइट छूटने का हवाला दिया तो उसे जाने का मौका मिला। डॉक्टर विश्वास का बेटा चेकिंग करने के बाद एयरपोर्ट के अंदर जा चुका था। उसके सपनों की उड़ान के पंख टूटने वाले थे कि राघव सचमुच राघव बन क़र आ गया था।

आज समय स्वयं को दुहरा रहा था। डॉक्टर विश्वास भगवान बन क़र आज मुनमुनिया का इलाज कर रहे थे। यह विश्वास तो राघव को भी नहीं हो रहा था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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