(साहित्यकार सुश्री श्रद्धा जलज घाटे जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. अल्प परिचय स्वरुप – आपने भारतीय स्टेट बैंक में 34 वर्ष सेवाएं देने के पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृति ली। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। साहित्य साधना सतत जारी। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा रिश्तों की आस।)
“मम्मी! नानी हाउस कब चलेंगे? अब तो राखी भी आने वाली है।”
“बेटा! नाना-नानी तो रहे नहीं। आप उसे अब मामा हाउस कहा करिए।”
इतना कहते ही मैं चार माह पहले की स्मृति में खो गई। माँ को दुनिया छोड़े अभी दो माह ही हुए थे, कि पिताजी भी हमें छोड़कर चले गए। भरा घर एकदम से सूना हो गया।
चलते समय भाभी ने बहुत अपनत्व से कहा कि “दीदी! ये माँ के सभी आभूषण हैं। जो मन करे लेते जाइएगा।”
“भाभी! मुझे तो बस ताउम्र पीहर की शीतल बयार चाहिए।’’ रुंधे गले से यह कहकर मैं माँ और पिताजी की एक सुंदर सी तस्वीर ले आई।
आज सुबह भाई का फोन आया। “प्रिया! ये मेरा और तुम्हारी भाभी का राखी पर बुलावा है। तुम्हारे आने की मैंने टिकिट्स करवा दी हैं।’’
स्नेह की पहली शीतल बयार से मन में बड़ा सुकून मिला।
तभी भाई आगे बोले- “इस बार दो-चार दिन रुककर जाना। कुछ पेपर्स, सर्टिफिकेट वग़ैरह हैं जिन पर तुम्हारे साइन होना हैं।’’
” ठीक है भाई।”
पर साइन की बात सुनकर मेरे हृदय को ज़ोर का धक्का लगा। मन कई प्रकार की आशंकाओं से घिर गया।
भाई आगे बोले- ‘’प्रिया! दरअसल माँ-पिताजी की स्मृति में मेधावी छात्रों के इनाम और कुछ प्रतियोगिताएं रखी हैं। सर्टिफिकेट माँ -पिताजी के नाम से ही रहेंगे, पर संस्था चाहती है कि “सौजन्य से” में मेरा भी नाम हो, पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथ तुम्हारा भी नाम हो।’’
“प्रिया! आखिर हम एक ही वृक्ष की दो टहनियां हैं। वे जितने मेरे थे उतने ही तुम्हारे भी थे।’’
” बस! अब जरा जल्दी से आ जाना। बच्चों को भी बुआ का इंतजार है।” कहते हुए भाई भावुक हो गए। उनकी बातें सुनकर मेरी आँखें भी भर आईं।
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘अम्माँ को पागल बनाया किसने ?‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५४ ☆
☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने ? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
“भाई! आज बहुत दिन बाद फोन पर बात कर रही हूँ तुमसे। क्या करती बात करके? तुम्हारे पास बातचीत का सिर्फ एक ही विषय है कि ‘अम्माँ पागल हो गई हैं’। उस दिन तो मैं दंग रह गई जब तुमने कहा – अम्माँ बनी-बनाई पागल हैं। भूलने की कोई बीमारी नहीं है उन्हें।”
“मतलब” – मैंने पूछा
“जब चाहती हैं सब भूल जाती हैं, वैसे फ्रिज की चाभी ढूँढकर सारी मिठाई खा जाती हैं। तब पागलपन नहीं दिखाई देता? अरे! वो बुढ़ापे में नहीं पगलाई, पहले से ही पागल हैं।”
“भाई! तुम सही कह रहे हो – वह पागल थी, पागल हैं और जब तक जिंदा रहेगीं पागल ही रहेंगी।अरे! आँखें फाड़े मेरा चेहरा क्या देख रहे हो? तुम्हारी बात का ही समर्थन कर रही हूँ।” ये कहते हुए अम्माँ के पागलपन के अनेक पन्ने मेरी खुली आँखों के सामने फड़फड़ाने लगे।
“भाई! अम्माँ का पागलपन तुम्हें तब समझ में आया जब वह तुम्हारे किसी काम की नहीं रह गई, बोझ बन गई तुम पर। पागल ना होती तो मोह के बंधन काटकर तुम पति-पत्नी को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया होता। तुम्हारी मुफ्त की नौकर बनकर ना रहतीं अपने ही घर में। सबके समझाने पर भी अम्माँ ने बड़ी मेहनत से बनाया घर तुम्हारे नाम कर दिया। कुछ ही समय में उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था। इसके बाद भी ‘मेरा राजा बेटा’ कहते उनकी जबान नहीं थकती, पागल ही थीं ना बेटे-बहू के मोह में? जब जीना दूभर हो गया तुम्हारे घर में तब मुझसे एक दिन बोली – ‘बेटी! बच्चों के मोह में कभी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी ना मार बैठना, मेरी तरह। मैं तो गल्ती कर बैठी, तुम ध्यान रखना।”
“भाई! फोन रखती हूँ। कभी समय मिले तो सोच लेना अम्माँ को पागल बनाया किसने??”
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपका ही घर है…।)
☆ लघुकथा # 78 – आपका ही घर है…☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
अवनीश जी ने चिल्लाकर गुस्से में कहा – क्या हुआ भाग्यवान अभी तक तुमने चाय नहीं बनाई?
क्या करूं घर के काम ही नहीं खत्म होते बना रही हूं, कमल जी ने धीमे में कहा।
चाय पी लो आज नाश्ता नहीं बनेगा सीधे मैं खाना ही बना रही हूं क्योंकि आपने अपनी बहन को बुला लिया है और उनके साथ बुआ जी भी आ रही हैं। अभी-अभी तो हमने बेटी श्रुति की शादी की है, अब बेटी दामाद को कब बुलाऊ कुछ समझ नहीं आ रहा है।
बेटी दामाद को भी बुला लो क्या मेरी बहन उनका खाना या कुछ छीन लेंगे या तुमसे कुछ लेती हैं।
कमल जी ने कहा- मुझसे तो कोई कुछ नहीं लेता, आप तो दुकान चले जाते हो सारा दिन सबके आराम का ख्याल तो मुझे ही रखना पड़ता है, राखी आ रही है, इस त्यौहार में मैं अपने भाई के यहां मायके तो नहीं जा पाती। ऊपर से दिनभर सब बैठकर ताने सुनाती रहेंगी।
अवनीश जी ने कहा -तुम बोलो तो उन्हें फोन करके मना कर दूं।
कमल जी ने कहा- नहीं नहीं, सभी को बुला लो और कोई बचा हो तो।
तुम चिंता मत करो झाड़ू पोछा बर्तन के साथ खाना बनाने के लिए भी बाई को रख लेंगे।या तुम कहो तो दिन भर एक काम वाले लड़के को दुकान से भेज देता हूं। बुआ जी तो बुजुर्ग है दीदी भी तुम्हारे काम में मदद कर देगी। मैंने दामाद जी और परख बिटिया को भी बुला लिया है।
इतने में दोनों दरवाजे पर देखते हैं तो बुआ और उसकी बहन रागिनी दोनों खड़े हुए सारी बातें सुनते हैं।
आप लोग बिटिया और दामाद को बुला लो और हमारी चिंता मत करो अब से हम राखी के दिन ही आकर राखी बांधकर चले जाया करेंगे क्या करें। इसी बहाने हम सभी को मायके आने का मौका मिलता है नहीं तो कोई आने नहीं देता कुछ दिन आराम से रहकर बचपन के दिन जीते हैं।
कमल जी की आंखें नम हो जाती है और आंसू निकलने लगते हैं, वे कहती है- आप लोग मुझे माफ कर दीजिए, आइये बैठिए आपका ही घर है दीदी।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 235 ☆
🌻लघुकथा🌻 🛕भोले का अभिषेक 🚩
भारत में सनातनी धर्म, शिव शंकर को ध्याने वाले, अटूट श्रद्धा और विश्वास सानंद देखने को मिलाता है।
भोर होते भोले दरबार में काँवड यात्रा की भीड़, श्रद्धा और यात्रा में लगी होड़। शहर में पुन्य सलिला माँ नर्मदा का नीर भरकर लगभग 35 कि मी की पैदल यात्रा।
बीच-बीच में कहीं-कहीं कहीं पानी का पाऊच, बिस्किट, मेंगो फ्रुटी, चाय, फलहारी, केला बाँटे जा रहे थे।
महेश उम्र में तो कम, परन्तु जिम्मेदारी और गरीबी से लग रहा था कि सयाना हो चला था। एक झोले में सभी सामान भरते जा रहा था। उसका मन उल्लास, उमंग से भरा था बच्चों को दो दिनों तक थोड़ा-थोड़ा खाने का सामान दे देगें।
मंदिर प्रांगण में पहुँचने से पहले सभी का सामान देखा जा रहा पर यह क्या?!!! महेश देखता ही रह गया—-
उसका सारा सामान एक जाली नुमा टंकी पर फेंक दिया गया। जिसे वह काँवड़ से भी ज्यादा संभाल कर चल रहा था।
बदले में 1/2लि दूध का पैकेट दिया गया। कुछ लोग तो फाड़- फाड़ कर दूध अभिषेक की बाल्टी में डाल रहे थे, परन्तु महेश कमीज में छुपाकर निकल गया। साथ में दो तीन फटे पैकेट उठाकर चलता बना, जिसमें दुध बचा हुआ था।
अभिषेक का जल नाली नुमा धार से बहा दिया गया। महेश बाते करते जा रहा था– प्रभु मेरे बच्चों ने खीर खाने की इच्छा की है। आप बड़े दयालु अंतर्यामी है।
दूध के पैकेट मिलने से पाँव के छाले का दर्द फीका पड़ गया। सहलाता हुआ दरवाजे पर गिरा चढ़ा नारियल और चिरौंजी दाने उठाता गदगद हो हर-हर बम-बम की टेर लगाता उल्लास के साथ घर की ओर बढ़ चला।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– सीमा – रेखा ..” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # 70 — सीमा – रेखा —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
संत अपने व्यक्तिगत कक्ष में अकेले खा रहा होता। जबकि लोग पंडाल में समूहगत बैठ कर खाते। उन लोगों में बड़ी आत्मीयता बनी हुई थी। उन्हें देखते संत का मन भारी हो रहा था। उसने माना जीने के लिए लोगों के साथ कौर लेने में उसकी हिस्सेदारी कभी न बन पाती थी। पर यह सीमा तो उसी ने निर्धारित की थी। आज उसे अनुभूति हुई वह समाज में ऊपर रह सकता है, लेकिन समाज में उतर नहीं सकता।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “प्यार की धुन”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
मैं चौक पर किसी सवारी की इंतज़ार में खड़ा था। कुछ फासले पर एक विकलांग भी शायद इसी उम्मीद में खड़ा हुआ था। मैले कुचैले, गंदे से कपड़े पहने बैसाखियों के सहारे। मैं सोचने लगा कि इसे कौन अपने ऑटो में बिठायेगा ?
तभी एक ऑटो रुका। मैं पिछली सीट पर बैठ गया। वह ऑटो चालक उतरा और उस विकलांग को बड़े प्यार से अपने साथ वाली सीट पर बैठने में उसकी मदद करने लगा। मेरा भी हृदय पिघल गया। मैंने फैसला किया कि इसका किराया मैं ही चुका दूंगा।
कुछ स्टाॅपेज के बाद उस विकलांग का स्टाॅपेज आ गया। इससे पहले कि मैं कहता कि किराया मैं दूंगा ऑटो चालक ने उसे उतने ही प्यार से सहारा देकर उतारा और बैसाखियों के सहारे खड़ा कर दिया। और जैसे ही उस विकलांग ने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला, ऑटो चालक ने बिना कुछ कहे ऑटो आगे बढ़ा दिया।
मैं ऑटो चालक के इस पुनीत भाव को देखकर जैसे हैरान था और भौचक्का भी। इसे कहते हैं सहयोग। बिना किसी प्रकार की हमदर्दी दिखाये या शोर शराबा मचाये .. और जैसे कहीं कोई बांसुरी की मधुर धुन बजने लगी ….या कहीं दूर मंदिर की घंटियां सुनाई देने लगीं….
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – एकाकार
‘मैं मृत्यु हूँ। तुम मेरी प्रतीक्षा का अंतिम विराम हो। मैं तुम्हारी होना चाहती हूँ पर तुम्हें मरा हुआ नहीं देख सकती..,’ जीवन के प्रति मोहित मृत्यु ने कहा।
‘मैं जीवन हूँ। तुम ही मेरा अंतिम विश्राम हो। तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा क्योंकि मैं तुम्हें हारा हुआ नहीं देख सकता..’, मृत्यु के प्रति आकर्षित जीवन ने उत्तर दिया।
समय ने देखा जीवन का मृत होना, समय ने देखा मृत्यु का जी उठना, समय ने देखा एकाकार का साकार होना।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदली सोच।)
बाहर गली में अमिता की दोस्त रागिनी ने आवाज दिया “क्या बात है आज तुम मेरे घर बुलाने नहीं आई? क्या कॉलेज नहीं जाना है?”
अमिता ने कहा- “चलना तो है लेकिन मेरे पास किताबें नहीं है?”
कोई बात नहीं कॉर्नर में जो दुकान है वहाॅं पर आओ चलो हम अंकल से बात करते हैं शायद कुछ रास्ता निकल आए।”
“अंकल क्या आपके पास फर्स्ट ईयर की किताबें हैं मिल जाएगी।”
दुकान वाले ने कहा – “रागिनी बेटा तुम्हारे पापा तो कल ही किताबें खरीद कर गए हैं?”
“अंकल मेरी सहेली के पास किताबें नहीं है उसे चाहिये। क्या कोई आपकी जानकारी में बच्चा है जो हमें पुरानी किताबें दे सके।”
“हाॅं बेटा कुछ लोग जब पढ़ाई उनकी खत्म हो जाती है तो वह सारी किताबें मेरे पास छोड़ जाते हैं कि यदि कोई जरूरतमंद बच्चा जिसके पास पैसे नहीं है? वह यह किताबें ले सकता है।”
“शर्त यह है कि तुम दोनों को पढ़ने के बाद जब साल पूरा हो जाएगा तब अपनी किताबें मुझे जाकर देनी पड़ेगी।”
अमिता के चेहरे खुशी के मारे आंसू निकल रहे थे और बिना कुछ कहे ही वह बहुत कुछ कह रही थी सारी किताबें बड़े अच्छे से इकट्ठा करने लगी।
अमिता की आंखों से ऑंसू गिर रहे थे।
रागिनी ने अंकल की दुकान से एक अच्छा सा बैग खरीदा और सारी किताबें उसमें रख दी और एक ऑटो रिक्शा रोका और बोला रोते ही रहेगी कॉलेज नहीं जाना है क्या?
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– तथाकथित…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # 69 — तथाकथित —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
एक गुफा में कुछ अस्थियाँ मिल जाने पर उन्हें इतिहास से जोड़ कर देखा गया। माना गया जानवरों की अस्थियाँ होंगी। पर यह अंतिम तर्क न बन पाया। जो तर्क जमा वह यह था भगवानदर्शी ऋषि ऐसी ही गुफाओं में तप करते थे। उस देश का वर्तमान बहुत भ्रष्ट था। परंतु अब इतिहास की एक तथाकथित धरोहर मिल जाने से अब तो मानो तमाम भगवान वहीं से पैदा हो कर पूरे देश में विचरण करने निकलते हैं।
☆ आलेख ☆ विवाह संस्था का दरकता स्थापत्य–शिलांग प्रकरण ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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विगत कुछ वर्षों से सामाजिक संरचना में होनेवाले भयावह परिवर्तन दहशतनाक दृश्य उपस्थित कर रहे हैं। विकराल आसन्न संकट की
सूचना दे रहे हैं। जो स्त्री पुरुष संबंधों में दरकते विश्वास, प्रेम में धोखा, विकृत मानसिकता,माता-पिता की रूढ़िवादी सोच तथा सूचना संचार क्रान्ति से उपजी विस्फोटक स्थिति का तस्करा करती हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि सदियों से सताई गयी असूर्यपश्या स्त्रियों के लिये शिक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ उजालों की व्यवस्था की गयी ताकि वे इस आलोक मैं अपने वजूद को पहचान सकें।
स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है — सिमोन द बोउआर के शब्दों का मर्म समझे। अपने दोयम दर्जे से मुक्त हो। उसे एक इन्सान की तरह जीने की सुविधा मिले।
इस विचारधारा के साइड इफेक्ट के रूप में एक ऐसा वर्ग उदित हुआ जो वीमेंस लिब के नाम पर स्वच्छन्दता और स्वैराचार का हिमायती हो गया। ऐसी में कितने ही अप्रिय और भीषण दृश्य सामने आने लगे।
ड्रग्स,ड्रिंक्स, स्मोकिंग ,मुक्त यौन संबंधों के चलते असंस्कृत प्रकरण समाज को दहलाने लगे।
सूक्ष्मवस्त्रधारिणी स्त्रियों ने स्लोगन दिया–मैं जो चाहे करूं मेरी मर्जी। वे स्टैंड अप काॅमेडी में अश्लील गालियां देती हुई पाई जा रही हैं।
ओ टी टी प्लेटफार्म पर प्रस्तुत, विकृत फिल्में हिंसा यौनाचार से जनता को उत्तेजित करती हैं। निर्माताओं को धन उगाहना है। देश जाये भाड़ में। सेंसर बोर्ड यानी बिजूका। टी वी पर क्राइम थ्रिलर भी दुष्टों को उकसाते हैं। उनकी कुत्सित सोच को खाद पानी देते हैं। स्मार्ट फोन भी पीछे नहीं। अश्लील साइट्स ने किशोरों की मानसिकता में जहर भरने का काम किया है। टीन एजर बच्चे जल्दी गिरफ्त में आते हैं। आजकल तीन साल के बच्चे को मोबाइल देने का फैशन है। कच्ची उम्र में माता पिता के मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट की भारी जरूरत होती है। आधुनिकता के नाम पर निरंकुश आजादी के दुष्परिणाम समाज देख रहा है। । रेप और हत्याओं का सिलसिला इसी की परिणति है।
विश्वास ही एक ऐसी चीज है जिसके आधार पर राष्ट्र की हर इकाई, समाज परिवार और सारे रिश्ते परवान चढ़ते हैं। संस्कृति की दुहाई दी जा सकती है।
यह सारा कथानक इसलिए कि समाज का ढाँचा चरमरा रहा है। प्रेमी की मदद से पति की हत्या के प्रकरण लंबे अर्से से सुर्खियों में हैं। एक सुन्दर शिक्षित दुल्हन के रूप में कोई नागिन हत्यारिन डसने वाली है, ऐसी कल्पना भी कोई कैसे कर सकता है। मुस्कान ने प्रेमी के साथ पति के टुकड़े टुकड़े कर दिये और ड्रम में भर दिये। “—नीला ड्रम” लंबे समय तक दहशत का प्रतीक बना रहा।
और अब ताजातरीन “शिलांग प्रकरण”—इन्दौर की सोनम ने हनीमून के ख्वाब दिखाए और शिलांग में अपने पति राज रघुवंशी की हत्या करवाई। हैरानी है कि जो लड़की 20 लाख की सुपारी देकर इतने जघन्य कांड को अंजाम दे सकती है वह सीधे सीधे माता पिता से शादी के लिये मना कर सकती थी या प्रेमी संग भाग सकती थी। एक बेकसूर की हत्या कर डाली। अंततः सलाखों के पीछे ही उम्र गुजारेगी। ये किस प्रजाति की स्त्रियों का उदय हो रहा है। इन्हें परिणाम का भय नहीं होता। क्या इन्हें जरा भी अंदेशा नहीं होता कि फाँसी मिलेगी या आजीवन कारावास।
एक ने तो शादी के मंडप में वरमाला हाथ में लेकर दूल्हे से कह दिया कि वह किसी और से प्यार करती है लिहाजा ये शादी नहीं कर सकती। काश वह लड़की माता पिता की इज्जत की ऐसी धज्जियां न उड़ाती। और माता पिता को बेटी के प्रेम प्रकरण की भनक न हो ऐसा तो हो नहीं सकता।
पुणे का “लिव इन “कपल भूले नहीं होंगे लोग जहां पुरुष ने स्त्री को मारकर उसके टुकड़े फ्रिज में रख दिये थे।
इन दुर्दांत घटनाओं के अलावा डिवोर्स से लेकर एलीमनी गाँठना और प्रेमी संग ऐश करने की घटनाएं भी घटित हो रही हैं।
बेंगलुरु मेरठ आगरा मुंबई कितने शहरों के नाम लिये जायें। दुष्ट महिलाएं बेखौफ हैं। इधर शादी के आकांक्षी युवाओं में खौफ छाया हुआ है। दुल्हन के रूप में यमदूती न आ जाये कहीं। खून पसीने की कमाई एलीमनी की भेंट न चढ़ जाये।
यह विवाह संस्था के स्थापत्य की ढहती हुई दीवारों की ओर इशारा है।
अधिकांश कानून स्त्रियों के पक्ष में हैं। विवाहेतर संबंधों में स्त्री को पीड़िता का दर्जा दिया गया है। दहेज प्रताड़ना के दृश्य भी विचलित करते हैं। आश्चर्यजनक हैं ऐसी खबरें कि कुछ लड़कियां खुद भारी भरकम दहेज चाहती हैं। रक्षा के लिये निर्मित कानूनों का बेजा फायदा उठा रही हैं स्त्रियां। वे अपनी नैसर्गिक छवि का जनाजा निकाल रही हैं।
माता पिता –बच्चों की परवरिश और नैतिक मूल्यों को लेकर सचेत हों और समाज में नाक कटेगी इस सड़े विचार को लेकर समाज का ही नुकसान न करें। जब बेटी हत्या करवाती है तब नाक नहीं कटती ?
संबंधों की चूलें हिल चुकी हैं। अगर वक्त रहते पारिवारिक परिवेश और बासी बेकार मान्यताओं को लेकर लोग सजग न हुये तो और भी कई गुनाह जन्म ले सकते हैं। वक्त बेशक पीछे मुड़ना नहीं जानता पर परिवार प्रणाली का पुनरीक्षण करने की महती आवश्यकता है। शिलांग हत्याकांड के सूत्र हर रिश्ते को आईना दिखा रहे हैं। कोई भी गुनाह एक दिन के विचार की परिणति नहीं होती। वह समय के साथ परिवेश से खाद पानी लेता हुआ पल्लवित होता है। तब दायित्व के निर्वाह को लेकर हर रिश्ते को कठघरे में उपस्थित किया जाना चाहिए।