हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 177 – कथा-कहानी – बेटी के मोबाईल की घंटी ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम कहानी “बेटी के मोबाईल की घंटी”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 177 – कथा कहानी – बेटी के मोबाईल की घंटी ☆

रामप्रसाद मोबाईल से बात करने के बाद अपनी पेंट की जेब से रूमाल निकालते थे। उससे मोबाईल को अच्छी तरह से साफ करते थे फिर शर्ट की बाएँ जेब में बड़े करीने से उसे रख लेते थे। उन्हें लगता था कि अब समय बदल गया है। सभी अपने आप में व्यस्त हो गये हैं। किसी के पास अब समय नहीं है। यह मोबाईल ही है, जो आज हमारे परस्पर संबंधों में एक सेतु की तरह से काम कर रहा है। आज उनके जीवन में यही एक अमूल्य वस्तु है। जो उनके डायबिटिक जीवन में कभी कभी मिठास की चाहत की भरपाई कर जाता है। क्षण दो क्षण बात तो हो जाती है। बगैर किसी के घर जाये या उसको डिस्टर्ब किये बिना। दूरियाॅं कितनी भी हों, चाहे अपने हों या पराये जब बात करनी हो बेधड़क बात हो जाती। अब तो मोबाईल से लगता था, जैसे दोंनों पक्षों में आपसी सहमति एवं संतुष्टि हो गयी थी। आज के युग में अब मोबाईल धनवानों का फैशन नहीं रहा वरन् निर्धन लोगों की भी आवश्यकता बन गया है।

रामप्रसाद सरकारी नौकरी में थे। उन्हें अब पेंशन मिल रही थी, तो स्वाभाविक है, मोबाईल रिचार्ज कराने में कोई परेशानी नहीं थी। जब बात करते तो जी खोल कर बात करते। इस बढ़ती उम्र में पेट की भूख भी जवाब दे जाती है। धीरे धीरे सारे शौक बंद हो जाते हैं। ऐसी उम्र में पेटराम जरा भी अधिक खाना बर्दास्त नहीं कर सकते। जब कोई पेटू बनने की जुगत भिड़ाता, तो उसकी ऐसी धुलाई कर देता कि सभी कान पकड़ कर भविष्य में स्वयं ही तौबा कर लेते हैं वैसे भी उनके जवानी के दिनों में दिन में आठ दस बार पान खाना या फिर चाय पीना ही शामिल था। इसके सिवाय और कुछ नहीं था। वह भी वर्षों पहले पान सुपाड़ी से दो दांतों ने हिल कर उसे चेतावनी दे दी थी कि यदि सावधान नहीं हुए तो हम सभी आपका साथ छोड़ देंगे। तबसे उन्होंने बचे खुचे शौक भी छोड़ दिये थे। एक तरह से बचत ही बचत थी। समय के प्रति हमेशा सावधान रहा करते थे। जैसे राजा दशरथ को भी दर्पण निहारने पर एक दिन सिर के पके बाल दिखे। जो अनुभव और चिंतन उनने किया, वही रामप्रसाद को हुआ था। उन्होंने अपने सभी बेटों को काम से लगाकर और शादी विवाह करके स्वयं चिन्तामुक्त हो गये थे। अब उनके पास समय ही समय था। पर दूसरों के पास भी तो समय होना चाहिए।

रामप्रसाद के जीवन में बस दो मीठे बोल की ही चाहत रह गयी थी। वे नाते -रिश्तों के अपनेपन और उसकी मिठास के स्वाद से भली भाॅंति परिचित थे। जो आज इस भागती हुयी दुनियाॅं में पता नहीं कहाँ गुम होती जा रही थी। तब ऐसी विषम परिस्थितियों में उनके लिए एक मोबाईल ही तो सहारा बन कर रह गया था। जो उनके व्याकुल मन की लंका पर विजय पाने के लिए, एक आवश्यकता बन गई थी। सतयुग में शांति स्वरूपा सीता को खोजने के लिए लोगों में एक दूसरे के सहयोग की होड़ मची रहती थी। उनके संग में वानर भालू तक तत्पर हो गए थे। पर आज के युग में चिराग लेकर भी ढूँढ़ोगे तो भी शायद कोई मिल जाए सम्भव नहीं।

आज हर घर के बेटों में राम लखन के भातृत्व भाव कम ही देखने मिलते हैं। तो परायों के बारे में सोचना ही व्यर्थ हैै। बनवास के समय साथ चलने की जिद तो केवल रामायण काल की बात थी। इस कलयुग में कौन किसी के साथ, संग निभाता और चलता है। अगर किसी सतयुगी महाशय ने अपने मन में ऐसी अपेक्षायें पाल भी लीं, तो कभी न कभी एक दिन उसका मोह भंग अवश्य हो जाता है। तब ऐसी विषम परिस्थिति में मोबाईल ही एक मात्र सहारा है। कम से कम दूर से ही सही संबंधों की डोर में कुछ बंधे तो हैं। मन की लंका में उथल पुथल न हो और हृदयाघात से बचना है, तो मोबाईल का होना जरूरी है। वार्तालाप करके ही हर मानव सीता रूपी शांति को तो पा जाता है। खोज जब होगी, तब देखा जाएगा। कुशल क्षेम के जरिये दोनों के मन में तसल्ली तो बनी रहेगी।

अचानक रामप्रसाद को वर्षों पूर्व का एक वाकया याद आया। जब प्रमोशन के दौरान नए शहर में उसका जाना हुआ, तब परदेश में मोबाईल से बातचीत करके एक मित्र बनाया। जिसके परिणाम स्वरूप वह आफिस में उस मित्र का दोस्त नहीं वरन् उसका बड़ा भाई बन गया था। वह उस शहर में अपना बड़ा भाई कहकर सबसे मिलवाता था। उसे बहुत खुशी होती। चलो परदेश में ही सही, उसे एक अपना छोटा भाई तो मिला। वह मित्र अपने घर की शादी विवाह में, उसे अपना बड़ा भाई प्रस्तुत कर सम्मान दिलाता रहा। वह भी बड़े गर्व से उस शहर में बड़े भाई की भूमिका दस वर्षों तक निभाता रहा। और अपने आप को उस शहर का ही बड़ा भाई मानने लगा था।

एक दिन उसका ट्रान्सफर फिर दूसरे शहर में हो गया। दो वर्ष गुजर चुके थे। भातृत्व की चाह उसे बार बार अपने छोटे भाई से मिलने को प्रेरित करती। आफिस में लगातार चार दिन के अवकाश ने उसकी चाह की राह खोल दी। उसने इस बार अपने गृह नगर जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया। चूंकि अपने इस छोटे भाई से मिलने की उत्कंठा उसके अंदर प्रबल हो गयी थी। उसने तुरंत मोबाईल पर फोन करके अपनी इच्छा प्रगट की। दो तीन दिन तक फोन लगाता रहा पर रिंग टोन जाती रही पर बात नहीं हो पायी। किसी अज्ञात आशंका से वह परेशान हो उठा था। अतः चौथे दिन टेलीफोन लगाया तो मालूम पड़ा वह अपनी ससुराल में है। उससे मिलना असंभव है। पर बड़े भाई की व्यग्रता ने बगैर सोचे समझे तत्काल में रिजर्वेशन करवा लिया था। तब इस समस्या से मुक्ति के लिए सोचा, मन ने कहा- चलो छोटे भाई से न सही और भी यार दोस्तों से मुलाकात हो जायेगी। क्या बुरा है। बिछुड़े शहर से एक बार फिर मुलाकात हो जाएगी। और फिर पहुँच गया उस शहर, अपनी मधुर स्मृतियों को तरोताजा करने के लिए।

उस शहर में एक दिन होटल में चाय की चुस्कियों के साथ अतीत के दिनों की याद कर ही रहे थे कि वे छोटे भाई साहब एकाएक सामने से गुजरे। उनको देखते ही उनके मुख से आवाज निकल गयी। अचानक बड़े भाई को देख उनके चेहरे से हवाईयाॅं उड़ती नजर आईं। देखकर उनकी समझ में आ गया था कि उनके साथ केवल दस वर्षों तक ही बड़े भाई का अनुबंध था। मोबाईल का एक झूठ पकड़ा जा चुका था। उसे सकपकाया देख उन्होंने ही स्नेह से पूँछा -क्या ससुराल जाने का कार्यक्रम रद्द हो गया ? चलो कम से कम आपसे मुलाकात तो हो गयी, कह कर उस छोटे भाई को अपने गले लगाकर अपने बड़े भाई के बड़प्पन को बरकरार रखा। और उसकी शर्मिन्दगी को अपने गले लगाकर उसे मुक्त कर दिया।

बहत्तर वर्षीय रामप्रसाद को याद है कि वह मजबूरी में ही मोबाईल खरीदने ‘मोबाईल मार्केट’ में गया था। वह पूर्व में मोबाईल की आलोचना करने में कभी नहीं थकता था। सभी के सामने उसे बेकार की वस्तु कहते रहते थे। उसके दुष्परिणामों की जब कोई खबर अखबारों में छपती तो वह उनको कंठस्थ कर लेते और हर किसी को सुनाने की कोशिश करते। जैसे अखबार को तो बस यही पढ़ता था, बाकी तो सारे अनपढ़ों की फौज में शामिल थे। उसे जब भी मौका मिलता लोगों को रटे रटाए तोते के समान सुना देता- भाई साहब आपको मालूम है, मोबाईल से आपके हार्ट पर दुष्प्रभाव पड़ता है, उसकी ध्वनि तरंगों से ढेर सारी समस्यायें पैदा होती हैं …बीमारियाँ फैलती हैं …मस्तिष्क रूग्ण होता है …और गाड़ी चलाते बात करना तो समझो मौत …आदि। लम्बे अंतराल के बाद उसे सबके हाथों में मोबाईल देखकर कुछ ईर्ष्या सी भी होने लगी थी। स्वयं को पिछड़े पन की हीन भावना में पाने लगा था। उसे लगा कि मैं अपनो से व समाज से कटता जा रहा हॅूं तब वह अंतिम निश्चय कर पाया था।

यह भी कोई बात हुई, नम्बर लगाओ और बात कर लो। न आमना और न सामना। न प्रेम न व्यवहार, हलो हाय किया, काम की बात की और फोन कट। उसे हर समय ऐसा लगता था कि एक दूसरे से मिलने जुलने से जो अपनत्व का पुल बनता था, वह आजकल लगभग टूटता जा रहा था। ‘अतिथि देवो भव’ तो वेदों में ही सिमिट कर रह गया था। यह तो हमारे पंडितों के मुख से ही अच्छा लगता था। हमारे आपस में मिलने जुलने की संस्कृति तो बस किताबो में सिमिटती जा रही थी। किसी आगंतुक का आगमन घर वालों के माथे पर चिन्ता की लकीरें खींच देता है। स्नेह, प्रेम- प्यार, मिलन आदि आज निज स्वार्थ की भट्टी में तप कर बिल्कुल राख हो चुका था।

तभी तो आज एक ही शहर में अलग अलग कालोनी में रहने वाले उनके दोनों बेटों के पास समय नहीं था। छोटा बेटा विकास अपने बड़े भाई समीर के घर दो दो माह तक नहीं आता था। जो बात उसे अपने छोटे भाई से करनी होती, तो वह अपने घर से ही मोबाईल में कर लेता था। यहाँ तक कि अपने माता पिता की भी खैर खबर का जरिया, यह मोबाईल ही रह गया था। उसे तो विचित्र तब लगता जब होली दीवाली में भी उनके बेटे एसएमएस से ही तीज त्यौहार निपटा लेते थे। फिलहाल वह अपने बड़े बेटे के साथ ही रहा करता था। बड़े बेटे का यह प्यार था या कर्तव्य। वह इस पचड़े में बिल्कुल भी नहीं पड़ा क्योंकि वह केवल यह जानता था कि यह मकान उसने ही बनवाया था। उसके ही नाम पर था। इंसान की ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती है, सब अपने अपने परिवारों में बँट जाते हैं, अपनी अपनी दुनियाँ में खो जाते हैं। दूसरे शब्दों में उसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अपने अपने कमरों में ही सिमिट जाते हैं। दोनों बेटे बट गये थे। बस अभी तक बँटी नहीं थी तो उनकी बेटी। जिसे यह संसार सदियों से पराया धन कह कर हर माँ बाप को समझाता चला आ रहा है।

शादी होने के बाद बेटी दूर शहर में रहती थी। सही अर्थों में उसने मोबाईल अपनी बेटी के लिए ही लिया था। फोन करते ही उसकी खनकती हुयी आवाज उसके कानों में किसी मंदिर की घंटियों के समान बजने लगती थी। कैसे हो पापा … कैसी तबियत है…क्या कर रहे हो पापा …. जैसे न जाने कितने एक साथ प्रश्न दाग देती थी कि बात कहाँ से शुरू करूँ। रामप्रसाद क्षण भर सोच में पड़ जाते। अगर अस्वस्थता की जानकारी देता हूँ तो किसी चिकित्सक की भाँति सावधानियाँ एवं दवाइयों की लम्बी फेहरिस्त प्रस्तुत करने लगती। शादी होने के बाद से ही वह सयानी हो गई थी। अब वह अपने पापा को पापा नही समझती थी। यह बात और थी कि अभी उसकी उमर उससे आधी से भी कम थी। आखिर वह उसकी गोद में ही खेलकर बड़ी हुई थी। पर आजकल वह तो उसके माँ के समान व्यवहार करने लगती। लगता था कि मेरी हर समस्या का निदान उसके पास था। दूर रहते हुए भी जब मोबाईल में बातचीत कर रही होती है तो लगता है कि वह मेरे सामने खड़े होकर बात कर रही हो। बात खत्म हो जाने के बाद वह कितनी बार अपने घर आने का आग्रह करती।

पापा आप कबसे नहीं आए …पिछली बार जब आए थे, तो दो माह बाद आने का वादा कर गये थे। शादी होने के बाद क्या मैं परायी हो गई … क्या मैं आपकी बेटी नहीं हॅूं ….पापा आ जाओ …कब आ रहे हो …. और आप बस से नहीं ट्रेन से आना … हम रिजर्वेशन करवा कर भेज देंगे आदि आदि….कभी कभी उसे लगने लगता था कि पिता जी लड़की के घर आने से संकोच कर रहे हैं, तो वह अपनी सासू माँ को मोबाईल पकड़ा कर अपने घर की मुखिया का आमंत्रण दिलवाने का प्रयास करने लगती है।

जब कभी बेटी के घर में इस तरह बार बार न आने की बात को कहने का दुस्साहस करता, तो वह उलट कर -बेटी के घर को ‘पराया घर ’कहने वालों की खिंचाई पर उतारू हो जाती। उस संस्कृति के विरोध में आकर खड़ी हो जाती और उनको एक पिता जी की तरह डाँटने लगती है। शायद इसी अपनत्व बोध को पाने के लिए उसने मोबाईल लिया था। जिसे आज भी वह शर्ट के बाएँ जेब में जहाँ उसका दिल धड़कता है, वहाँ बड़े प्यार से सीने से लगा कर रखता है और इंतजार करता रहता है, दो मीठे बोल की… अपनत्व की…जिससे उसके मन मंदिर में पूजा की घंटियाँ अनवरत बजती रहें और वह निरंतर उसकी ध्वनि को सुनता रहे…

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#65 – जाग्रतावस्था… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– जाग्रतावस्था…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 65 — जाग्रतावस्था — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैंने सपने में देखा कहीं बहुत ठंड पड़ रही है और हालत यह कि वहाँ का एकमात्र सौ वर्षीय गरीब आदमी बिना कंबल के सोया हुआ है। ठंड असहनीय होने से वह कराह रहा है। यह लिखने पर तो पीड़ा की एक अद्भुत रचना बन जाती। पर अभी आधी रात बीती थी और वह गरीब शेष आधी रात इसी तरह ठिठुरे सोया होता। मैं अभी सपने में ही सही, उस पर कंबल डाल देता। सुबह जाग्रतावस्था में लेखन हो जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

31 –- 05 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सरेआम ” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कथा-कहानी – “सरेआम” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-भई यह घर आपने बहुत ही सही लोकेशन पर लिया है। इसकी बायीं ओर मार्केट, दायीं ओर मार्केट और बिल्कुल सीधे जाओ तो लोकल बस व ऑटो मिलने के लिए चौक ! बहुत खुशकिस्मत हो आप !

जब हमने मकान खरीदा तब आसपास के लोगों का यही कहना था। वैसे हम इसी मकान में पिछले पांच साल से किराये पर रह रहे थे। तब छत पराई लगती थी, अब अपनी लगने लगी !

शुरू शुरू में हमने भी यह बात महसूस की थी और अब तो लोगों ने इस पर मोहर लगा दी थी।

हम यानी आमतौर पर मैं और बेटी ही बायीं ओर की मार्केट शाम को सब्ज़ी, दूध और दूसरे जरूरी सामान लेने जाते हैं। पत्नी को बाज़ार जाने का कम ही शौक है। वह कहती है कि आप गांव में रहते थे तो आप ही जाइये सब्ज़ियां लेने ! अब पांच साल तो किसी अनजान जगह और शहर में अपनी और दूसरों की पहचान में लग ही जाते हैं और हमारी भी मार्केट वालों से जान पहचान हो गयी। इतना भरोसा तो जीत ही लिया कि यदि भूलवश कमीज़ बदलते समय पैसे डालने रह गये और दुकान पर सामान खरीदने के बाद पता चला तो दुकानदार कहने लगे कि कोई बात नहीं भाई साहब, आप सामान ले जाओ‌ ! आप पर भरोसा है। हमारे पैसे कहीं नहीं जाते ! आ जायेंगे ! यह तो बरसों का भरोसा है और बनते बनते बनता है ! यही नहीं आस पड़ोस भी अब दिन त्योहार पर घर की घंटी बजा कर उसमें शामिल होने का न्यौता देने लगा ! हालांकि पहले पहल हमें पंजाब से होने के चलते रिफ्यूजी तक मानते रहे और यह दंश भी देश के किसी हिस्से में रहने पर झेलना ही पडता है सबको! अपने ही देश में रिफ्यूजी! फिर दिन बीतने के साथ साथ सब हंसने खेलने लगे हमसे!

अब मार्केट में सब्ज़ी की रेहड़ियां शाम के समय खूब लगती हैं, जैसे पूरी सब्ज़ी मंडी ही चलकर इस मार्केट में रेहड़ियों पर लद कर आ गयी हो ! शाम के समय खूब चहल पहल और कितने ही कुछ जाने और कुछ अनजाने चेहरे देखने को मिलते हैं ! पर एक बात मेरी समझ में न आ रही थी कि आखिर शाम के धुंधलके में या अंधेरा छा जाने पर ये रेहड़ी वाले बिजली कहां से लेते हैं? इनकी रेहड़ियां इतनी जगमगाती कैसे हैं?

इसका भी रहस्य खुला सिमसिम की तरह ! एक दिन हम थोड़ा जल्दी ही मार्केट चले गये। क्या देखता हूँ कि एक आदमी हर रेहड़ी वाले से बीस बीस रुपये वसूल कर रहा है, बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में ! जैसे ही बीस रुपये हाथ में आते, रेहड़ी पर रोशनी जगमगाने लग जाती ! यह कैसा जादू है? रेहड़ी वाले गरीब आदमी, मुंह खोलते भी डरते ! क्या करिश्मा है और बिना कनैक्शन बिजली आती कहां से है? वैसे तो एक आम आदमी को इससे क्या लेना देना? अरे आखें बंद कर, कानों में रुई डाल और चुपचाप सामान खरीद और सुरक्षित घर को लौट! वो लिखा रहता है न कि घर कोई आपका इ़तज़ार कर रहा है तो ऐसे में न बायें देख, न दायें, सीधा घर को देख और घर चल ! पर मुझसे रहा नहीं जा रहा था। फिल्मी हीरो तो था नहीं कि उससे भिड़ जाता! बस, अंदर ही अंदर कसमसाता रहता कि आखिर यह हफ्ता वसूली क्यों? वे गरीब, परदेसी रेहड़ी वाले खामोश रुपये देते रहते ! देखते समझते तो और भी होंगे लेकिन वे मस्त लोग थे, सौदा सुल्फ लिया और ये गये और वो गये ! कौन क्या कर रहा है, इससे क्या मतलब?

पता चला कि यह सरेआम बिजली चोरी प्रशासन के ध्यान में आ ही गयी और आखिरकार यह हफ्ता वसूली कुछ दिन रुकी और फिर आठवां आश्चर्य हुआ जब सुनने में आया कि उसी अधिकारी की ट्रांसफर हो गयि, जिसने यह बिजली चोरी रोकी थी ! हैं घोर कलयुग? रेहड़ी वाले राहत की सांस भी न ले पाये कि हफ्ता वसूली फिर शुरू ! सुनने में आया कि जो बिजली कनैक्शन देने आता था, वह तो मोहरा भर था, असली बाॅस तो उस एरिया का बड़ा नेता था ! अब यह बात कितनी सच, कितनी झूठ, हम बीच बाज़ार कुछ नहीं कह सकते भाई ! हमें माफ करो !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १० – लघुकथा – रोशनी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १० ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ रोशनी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

चाँदनी रात भरपूर मुस्कुराहट भी बिखेर नहीं पाई थी कि घनघोर काले बादलों की काली साया ने उसे ढक लिया।

खिलखिलाती हुई रोशनी के होठों की खुशियां अचानक स्तब्ध हो गयीं। पतली पतली बांस की फंठीयों पर चढ़ी हुई प्लास्टिक की पन्नीयाँ फड़फडाती हुई मानो कह रही थी, रोशनी, …अब मैं इससे ज्यादा तुम्हारी हिफाजत नहीं कर सकती। अपनी पूरी बात करने के पहले ही रोशनी के सिर ऊपर पड़ी काली चादर कहां चली गई पता नहीं चला।

फटे दुप्पटे में स्वयं को छुपाए, रोशनी यह नहीं समझ पा रही थी, कि आखिर वह जाए तो जाए कहाँ।

पानी की तेज बौछारें रोशनी को बेइंतहा दर्द दे रही थी।

अचानक आकाश में बिजली तड़की और तड़कती बिजली की रोशनी में एक काली छतरी ओढ़े सुंदर सी काया उसके पास आयी।

अरे, यहां क्या कर रही है रोशनी? चल, घर चल।

अरे भाभी आप.. आप यहाँ कैसे चली आयीं? ऐसी हालत में तो आपको आना ही नहीं चाहिए था.. भाभी।

भाभी… आप भीगती हुई क्यों चली आयीं। आपकी तबीयत खराब हो जाएगी। आपको तो इस वक्त अपनी सेहत का बहुत ही ध्यान रखना चाहिए,

ऐसा कहते हुए रोशनी डल्लू भाभी से चिपट कर रो पड़ी।

तेज हवा और हल्की हल्की बूंदा बांदी के बीच रोशनी को अपनी छतरी में ले डल्लू धीरे धीरे अपने कदम बढ़ा रही थी। डॉक्टर ने उसे इस अवस्था में ऐसे ही चलने की सलाह दी थी।

ऊपरी मंजिल से रोशनी के आशियाने को हर रोज निहारने वाली वाली डल्लू, बड़ी मुश्किल से छत की सीढ़ियों से नीचे उतर पायी थी।

डल्लू भाभी के घर की लाबी में बिछे बिस्तर पर दुबकी रोशनी खुद को लिहाफ से लपेटकर गर्म करने की कोशिश कर रही थी।

डल्लू ने चाय का गर्म गर्म प्याला रोशनी हाथों में पकड़ाया तो वह बोल पड़ी….

अरे भाभी!!..आप मेरे लिए इतना मेहनत कर रही हो?

नहीं भाभी नहीं.. रोशनी के आँखों से आंसू की धारा निकल पड़ी।

अरे मेहनत, ..!! यह क्या बोल रही हो रोशनी, ..मुझे तो तुम एक सींक भी सरकाने नहीं देती मेरी बिटिया रानी। वैसे भी बर्तन पोछा करने के बाद, तेरा काम समाप्त हो जाता है लेकिन रोशनी, … इसके बाद मेरे लिए कोई काम बाकी ही कहाँ छोड़ती हो।

रोशनी!.. तुम अंधेरी रात में जलता हुआ एक खूबसूरत दीया हो, जिसकी रोशनी बहुत दूर तक जाने वाली है।

ऐसा कहते हुए डल्लू ने दोबारा रोशनी को गले लगा लिया। इस बार डल्लू और रोशनी दोनों रो रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 229 – पानी की कीमत ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “पानी की कीमत”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 229 ☆

🌻लघु कथा🌻 पानी की कीमत🌻

गाँव की परंपरा रीति रिवाज हृदय को प्रसन्नता से भर देती है। जब कोई मेहमान घर आ जाए, तो दरवाजे पर ही लोटे का जल, भरी बाल्टी रखा जाता। पैर धोकर जब वह अंदर आए, तो घर के छोटे पैर छूकर प्रणाम करें। आशीषों की झड़ी लग जाती। इसी भाव पर जीये जा रहे थे रेशम लाल।

बेटे के घर शहर जा रहे थे पहली बार। सिर पर पगड़ी, काँधे पर गमछा और प्रेस किया हुआ धोती कुर्ता। साथ में साड़ी के पल्लू से बंधी हुई टोकरी, जिसमें धर्मपत्नी ने घर के शुद्ध घी की मिठाई बाँध रखी थी।

खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। पतंग की तरह लहरा रहे थे कि कब बेटे बहू के घर पहुंच जाए। जैसे ही घर पहुंचे। डोर बेल बजी, दरवाजा खुलते  पिताजी ने देखा बेटा सामने ही बैठा है। अंदर जाने के पहले पैर धोना चाह रहे थे।

बेटे को आवाज देकर बोले– बेटा पानी चाहिए। बेटे ने तुरंत एक पानी से भरी बोतल, जो टेबल पर राखी थी पकड़ा दिया। पिताजी ने सोचा शायद इसी से पैर धोना है।

उन्होंने बोतल के पानी से पैर धो लिए। जैसे ही अंदर हुए गमछे से पैर को फटकारते पर यह क्या???  बेटे ने तो झड़ी लगा दी – – आपने इतनी महंगी बिसलरी बाँटल का पानी पैर धोकर बहा दिया। कुछ तो ख्याल किया होता।

बहू की भौहें भी चढ़ी हुई थीं। पैर छूना तो दूर वह तो कह उठी – – – ऑफिस का समय हो रहा है। अब तुम ही इन्हें संभालो, मैं तो चली।

रेशम लाल मानो, कटी पतंग जैसे गिरने लगे। मान सम्मान तो दूर आते ही पानी की कीमत बता रहे बेटा बहू। नीचे फर्श पर बैठते सोचने लगे – – –

किसी ने सच ही कहा है – – –

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सुन।

पानी गये न उबरे, मोती मानुष चुन।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – गद्य क्षणिका – आभास… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय गद्य क्षणिका “– आभास…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ — आभास — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैंने अपने बचपन के पाँवों के काँटे बहुत निकाले हैं। मेरा बचपन नदी में डूबा है तो मैंने उसे बचाया है। अकसर ऐसा भी हुआ मेरे बचपन को थप्पड़ मारा गया। मैंने दर्द झेल लिया और अपने बचपन से कहा तुम हँसा करो। अपने प्रति मुझे इतना समर्पित देखने पर मेरा बचपन मुझे अपना आराध्य मानता था। आज मुझे अपने बचपन का ही डर रहता है, कहीं आराध्य की वह मूर्ति भग्न न हो जाये।

© श्री रामदेव धुरंधर
24 – 05 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बेतार” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बेतार?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मैं अपने परिवार सहित एक चाय की दुकान पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था और‌ सर्दी के चलते गर्मागर्म पकौड़े भी मंगवा रखे थे!

इतने में एक मजदूर किस्म का दिखने वाला आदमी आया ! मुझे लगा कि वह मेरे से कुछ मांगेगा या मांगना चाहता है लेकिन मेरे पास से निकल कर पीछे रखा पानी पीने चला आया। पानी पीकर वह फिर मेरे पास से गुजरा और‌ चुपचाप सड़क किनारे खड़ा हो गया – बिल्कुल उदास!

अचानक मैंने जैसे कोई संदेश उसकी आंखों में पढ़ लिया! मैंने बेटी से कहा कि इससे पूछकर आओ कि चाय पीओगे?

बेटी ने पूछा- पहले आप बताओ कि अगर वह हामी भर दे तो क्या आप चाय पिलाओगे?

– हां, क्यों नहीं?

बेटी भागकर गयी पूछने !

वह आदमी बिना ना नुकर‌ किये खामोशी से चला आया और बोला- बाबू जी, आया तो मैं इस सर्दी में आप से एक कप चाय पीने ही लेकिन यह कह नहीं पाया। आप कैसे जान गये?

-कभी डाकखाने गये हो?

– जी बाबू जी!

-वो टिक टिक करती तार देखी है?

– हां।

– तो वहाँ बिना किसी तार के संदेश जाता है कि नहीं?

– पता नहीं, बाबू जी!

– जाओ! चाय आ गयी!

और वह बिना कुछ समझे आंखें झपकाए चाय पीने लगा!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ९ – श्री राम के मर्यादित चरित्र से भरा मानस ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ९ ☆

☆ कथात्मक साहित्यिक लेख ☆ ~ श्री राम के मर्यादित चरित्र से भरा मानस… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(श्री रामचरित मानस – भारतीय संस्कृति की आचार संहिता)

परिवार में नित्यप्रति होते कलह को देखकर विनय की विनम्रता टूटने के कगार पर पहुंच गई। परिवार का बंटवारा तो काफी दिनों पहले हो चुका था, लेकिन जगह -जमीन- संपत्ति का विवाद अभी भी सम्पूर्ण बंटवारे की तलाश कर रहा था। यद्यपि कि भौतिक सम्पत्ति की हिस्सा – हिस्सादारी लगनी शेष नहीं थी, लेकिन मन के तराजू पर चढ़े पसंगें ने कभी तराजू की डंडी को सीधा होने नहीं दिया। अक्सर जब विनय अपना बस्ता निकालकर  पढ़ने के लिए बैठता, तो आंगन और बाहर दोनों तरफ से कुछ न कुछ फुसफुसाहट साथ बातें शुरू होतीं और धीरे-धीरे यह फुसफुसाहट तेज लड़ाई में बदल जाती है। यह सिर्फ एक दिन की कहानी नहीं थी। ऐसा तो लगभग आए दिन ही हुआ करता था।

आठ-नौ साल के विनय को यह समझ में नहीं आता था, कि उसके चाचा और उसके बाबूजी से इस तरह से क्यों लड़ते हैं। वहीं उसे अपनी मम्मी की चुगलखोरी भी कहीं किसी कोने से कम नहीं थी। एक दिन तो बात इस हद तक बिगड़ गयी कि हाथापाही की नौबत आ गई। चाचा के हाथ में लगे चोट को देखकर विनय दुःखी हो गया। दरअसल यह चोट उसकी मम्मी और चाची के बीच में हो रही लड़ाई के बीच बचाव करने के कारण चाचा को लगी। दोनों मांओ को एक इस तरह से लड़ते देख विनय फूट-फूट कर रोने लगा। विनय को ऐसे रोते देख, खेलकर अभी -अभी वापस आया विभव परेशान हो गया। वह दौड़ता हुआ विनय के पास गया। अपने धूल से सने हाथों से उसने अपने छोटे चचेरे भाई के आंसुओं को पोछा तो विनय भी प्यार से उससे लिपट गया।

थोड़ी ही देर में पंचायत बैठी। जिनके घर के खुद के झगड़े सुलझ नहीं रहे थे, वे आज दो भाइयों के बीच हो रही लड़ाई को सुलझाने के लिए पंच बनकर बैठे हुए थे।

बटोही दादा ने जब यह कहते हुए अपनी मुट्ठी कस कर तख़्त पर पटकी कि मुझे नहीं समझ में आ रहा कि आप लोगों के इस रोज रोज की किच-किच का आखिर हल कहां से निकलेगा!

ठीक उसी समय बाबा के कोठरी में रखी लाल कपडे में बंधी भारी -भरकम पुस्तक को अपने हाथों में उठाये विनय और विभव बटोही दादा के तख़्त के पास पहुंच गए। रामचरितमानस को बटोही दादा हाथों मैं रखते हुए उन दोनों ने एक साथ बोला, हम दोनों भाइयों की राय मानो तो आप बड़े बुजुर्गों के रोज-रोज के हो रहे कलह का वास्तविक हल इस पुस्तक में है। दो नन्हे नन्हे बच्चों के मुंह से एक साथ निकली इस बात को सुनकर, पारिवारिक जंग लड़ रहे दोनों भाई दंग हो गए। वहीं पंच की गद्दी पर बैठे बटोही दादा के हाथ उस पुस्तक को थामने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे थे।

श्रीराम के मर्यादित चरित्र से भरा मानस इधर पंच दादा के तख़्त पर विराजी, उधर विनय और विभव दोनों के पापा आपस में चिपट कर रो पड़े, मानो सारे गिले शिकवे उनकी आँखों से आंसू बनकर तेजी से निकल रहे थे।

इधर विनय और विभव के कानों में अपने दिवंगत हो चुके दादाजी की यह बात जोर जोर से गूंज रही थी कि…

“ए बबुआ तें पूछत बाडिस न कि ए बाबा! ई किताब कइसन ह? त सुनु..

एहि किताब में अपना रामजी के कहानी बड़ूवे। ई किताब हमनी सबके बतावे ले कि रामजी के आचरण के अपना भीतर उतार के कैसे जियल जाला, कैसे परिवार चलावल जाला अउर कैसे पारिवारिक – सामजिक रिस्ता निभावल जाला।

ए बाबुओ! ई रामायन भारतीय संस्कृति के आचार संहिता हउवे, समझल नु?”

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – आ लौट चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ लघुकथा – आ लौट चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

“क्यों कलुआ की माँ,शहर में ही रहना है,या गाँव वापस चलना है ?”

“नहीं कलुआ के बापू हमें तो अपना गाँव ही भलौ है।क्या, करेंगे शहर में रहकर?”

“हां!दो-चार दिन के  रहने की बात और है,पर हमेशा को बिल्कुल नहीं,कलुआ की माँ।”

“हाँ!आप ठीक कह रहे हो। कलुआ तो सरकारी नौकर हो गया है,अब वह तो गाँव लौटने से रहा, वह तो यहीं शहर में ही रहेगा कलुआ के बापू।”

“बिल्कुल सही! पर हमारे तो अपने गांव,अपनी ज़मीन-जायदाद,अपनी माटी ,अपनी खेती-बाड़ी में जान बसती है, कलुआ की माँ।”

“अच्छा ठीक है हम यहाँ और नहीं रह रहे,कल ही गाँव लौट चलते हैं।”

“पर तुम खाना तो खा लो। गरम रोटियाँ गैस के चूल्हे पर सिंकी, कलुआ के बापू।”

” पर कलुआ की माँ! एक बात तो है कि यहाँ शहर में तो सब कुछ मशीनों से ही चलता है। चाहे रोटी हो चाहे ज़िन्दगी, गाँव के देशी चूल्हे पर सिंकी देशी रोटियों जैसा स्वाद यहाँ कहाँ?”

“हाँ कलुआ के बापू! चलो कल ही लौट चलें।”

इस पर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं।

 

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 20 ☆ लघुकथा – व्यथा-कथा धरती माता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा  – “व्यथा-कथा धरती माता“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 20 ☆

✍ लघुकथा – व्यथा-कथा धरती माता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

जैसे ही मुकुंद  फ्लैट में घुसे तो पत्नी ने पानी का गिलास हाथ में देते हुए कहा कि बच्चे कहते रहते हैं कि अपना घर कब होगा।  कुछ कीजिए न।

मुकुंद सपरिवार किराए के एक फ्लैट में रहते थे। वह निजी कंपनी में काम करते थे। उनकी पत्नी सुनाम्या घर संभालती थी मतलब गृहिणी थी। उनके दो बच्चे थे, बेटा दस वर्षीय अक्षय और बेटी आठ वर्षीय आम्या।  अक्षय चौथी और आम्या दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। छोटा परिवार सुखी परिवार। बच्चे स्कूल में तरह तरह की बातें सुनते हैं और उसी प्रकार घर में अपनी मांग रखते हैं।  दोनों बच्चों की क्लास में अक्सर घर की चर्चा होती। जो अपने घर में रहते वे अपने पर गर्व करते। किराए पर रहने वालों को कुछ अजीब सी दृष्टि से देखते। इसका अक्षय और आम्या दोनों को अपमानजनक सा लगता।  वे मन ही मन धरती माता से प्रार्थना करते कि अपने एक टुकड़े पर हमारे लिए भी घर बना कर दे दो। उन्होंने सुन रखा था कि धरती माता सबकी माता है और सबकी सुनती है।

दोनों बच्चे घर आकर मां से कहते कि मां हमने धरती माता से प्रार्थना की है कि हमें अपने एक टुकड़े पर अपना घर बना कर दे दे। मां कहती कि घर में रह तो रहे हो, अपना और किराए का क्या। बच्चे कहते नहीं मां जिनका अपना घर होता है वे किराए वालों को नीची निगाह से देखते हैं। चाहती तो सुनाम्या भी थी कि अपना घर और पति से कहती भी रहती थी कि छोटा ही सही पर अपना घर होना चाहिए। अपना घर अपना ही होता है। उसने मुकुंद को बच्चों की मांग दोहराई।  मुकुंद मुस्कराते हुए बोले, सुनाम्या क्या मैं नहीं चाहता कि अपना भी घर हो। बस धरती माता जगह दे दे।

एक जमीन पर प्लॉट बिकने की एक विज्ञप्ति अखबार में छपी थी। उसे लेकर मुकुंद का एक दोस्त उसके पास आया और कहने लगा, यार  इस जगह पर प्लाटिंग हो रही है। चलो हम एक एक प्लॉट खरीद लेते हैं। धीरे धीरे घर भी बन जाएगा। कब तक किराया भरते रहेंगे। काम खत्म होने पर दोनों अखबार में छपे पते पर गए। डेवलपर ने  प्लॉट दिखाए और जमीन के बारे में कई आश्वासन दिए। उसने घर बनाने के लिए कर्ज दिलाने में मदद करने का वादा भी किया। मुकुंद और उसका दोस्त दोनों खुश हो गए।  घर आकर सुनाम्या को बताया तो बहुत खुश हुई और बच्चे तो उछल पड़े और धरती माता को धन्यवाद देने लगे। मुकुंद ने अपनी बचत और सुनाम्या ने अपने कुछ जेवर की बलि देकर प्लॉट खरीद लिया। डेवलपर ने एक निजी बैंक से कर्ज भी दिलवा दिया। यूँ एक साल के अंदर घर बन गया। धीरे धीरे तीस चालीस घरों की एक कालोनी बन गई।

बच्चों का एडमिशन इस कालोनी के पास ही बने एक नये स्कूल में हो गया। स्कूल ज्यादा दूर न होने से बच्चे पैदल ही स्कूल जाते आते। सब कुछ ठीक चल रहा था। यहां रहते हुए भी तीन चार साल हो गए थे। एक दिन बच्चे स्कूल से घर आ रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनकी कालोनी में काफी शोर शराबा है और घरों से धूल उड़ रही है। नजदीक जाने पर देखा कि उनके घर को वुलडोजर से तोड़ा जा रहा है। दोनों बच्चे दहाड़ मार कर रो पड़े। थोड़ी दूर खड़े मां बाप भी रो रहे थे।  आम्या मां का हाथ पकड़ कर चिल्लाने लगी कि मां हमें जगह धरती माता ने दी थी न, फिर ये लोग क्यों घर को तोड़ रहे हैं। सुनाम्या ने बेटी को गले से लगाया तथा और जोर से रो पड़ी, हां बेटी धरती माता ने ही जगह दी थी पर अब वो हमसे रूठ गई है।  जिन्होंने वहां घर बनाए वे सभी रो रहे थे। कोई रोते रोते तोड़ने वालों को गाली देता, कोई चिल्लाता। पर किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। आम्या मां बाप की ओर देखते हुए रो रही थी और कहती जा रही थी कि अब हम कहां रहेंगे। धरती माता रोक क्यों नहीं रही इन्हें। और, सुनाम्या यह कह कर बेटी को सांत्वना दे रही थी कि यह जगह धरती माता की नहीं, इन लोगों की है। और रो पड़ी, हे धरती माता!

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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