हिंदी साहित्य – आलेख ☆ बुन्देली दिवस विशेष – “बुंदेली की पाठशाला – डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे ☆

डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे

परिचय 

शिक्षा – एम.एस.सी. होम साइंस, पी- एच.डी.

पद : प्राचार्य,सी.पी.गर्ल्स (चंचलबाई महिला) कॉलेज, जबलपुर, म. प्र. 

विशेष – 

  • 39 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव। *अनेक महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के अध्ययन मंडल में सदस्य ।
  • लगभग 62 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण।
  • इंडियन साइंस कांग्रेस मैसूर सन 2016 में प्रस्तुत शोध-पत्र को सम्मानित किया गया।
  • अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान शोध केंद्र इटली में 1999 में शोध से संबंधित मार्गदर्शन प्राप्त किया। 
  • अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘एनकरेज’ ‘अलास्का’ अमेरिका 2010 में प्रस्तुत शोध पत्र अत्यंत सराहा गया।
  • एन.एस.एस.में लगभग 12 वर्षों तक प्रमुख के रूप में कार्य किया।
  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अनेक वर्षों तक काउंसलर ।
  • आकाशवाणी से चिंतन एवं वार्ताओं का प्रसारण।
  • लगभग 110 से अधिक आलेख, संस्मरण एवं कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

 प्रकाशित पुस्तकें- 1.दृष्टिकोण (सम्पादन) 2 माँ फिट तो बच्चे हिट 3.संचार ज्ञान (पाठ्य पुस्तक-स्नातक स्तर)

☆ “बुंदेली की पाठशाला – डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे 

(जन्म दिवस 1 सितम्बर “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

देखना चाहा न अपना भार कितना ?

और कलियों में चटक श्रृंगार कितना ?

चल रहे दो पैर जिस विश्वास में

कर्म का निर्वाह थकती सांस में

दे चुके सर्वस्य यह जीवन त्याग में

डूब कर मिलजुल सजल अनुराग में। 

किसी विद्वान कवि की यह पंक्तियां मानो डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के लिए ही लिखी गई हैं, जो कि उनके व्यक्तित्व को उजागर करती हैं। 01 सितंबर 1916 को डॉ. श्रीवास्तव का जन्म कटनी जिले के पीपल के वृक्षों से घिरे हुए गाँव “पिपरहटा” में हुआ। चूँकि आपके पिताश्री प्यारेलाल श्रीवास्तव कटनी में ही शासकीय सेवा में थे अतः आप की प्रारंभिक शिक्षा कटनी में हुई। शिक्षा के प्रति गहन रुचि और परिश्रमी स्वभाव ने उन्हें उच्च शिक्षा हेतु जबलपुर आने बाध्य कर दिया। शिक्षा प्राप्ति के साथ आपने लेखन कार्य भी जारी रखा। नागपुर विश्वविद्यालय से आपने हिंदी विषय में स्नातकोत्तर परीक्षा मेरिट में पास की। बुंदेली भाषा के अटूट प्रेम ने ही आपको ‘बुंदेली लोक साहित्य’ पर शोध कार्य हेतु प्रेरित किया। जबलपुर विश्वविद्यालय के इतिहास में ‘बुंदेली साहित्य’ पर यह प्रथम शोध था। डॉ. श्रीवास्तव ने जबलपुर के सर्वाधिक प्राचीन शिक्षा संस्थान हितकारिणी महाविद्यालय में प्राध्यापकीय कार्य किया एवं प्राचार्य पद को भी सुशोभित किया। उन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय के एम. ए. के पाठ्यक्रम में ‘लोक- साहित्य’ को एक विषय के रूप में सम्मिलित कराया। आपके निर्देशन एवं मार्गदर्शन में अनेक शोधार्थियों ने ‘विद्यावाचस्पति’ की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

डॉक्टर श्रीवास्तव एक श्रेष्ठ शिक्षक थे। वे अपने विद्यार्थियों के अंतस से सदैव जुड़े रहे। उनके विद्यार्थी उन्हें अपना सच्चा हितैषी एवं पथ प्रदर्शक मानते थे। देश- प्रदेश को उन्होंने संस्कारवान एवं ख्यातिलब्ध शिष्य प्रदान किए। जिनमें प्रमुख रूप से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ शिव प्रसाद कोष्टा, प्रसिद्ध दार्शनिक डॉ. जे. पी. शुक्ला, आध्यात्म गुरु स्वामी प्रज्ञानंद जी, पूर्व राज्यपाल निर्मल चंद जैन, पूर्व महाधिवक्ता श्री राजेंद्र तिवारी, जबलपुर के पूर्व महापौर शिवनाथ साहू, मानस मर्मज्ञ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत”, मध्यप्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री राजबहादुर सिंह ठाकुर आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि डॉ. पूरनचंद जी की लोक साहित्य, संस्कृति एवं लोक विज्ञान में विशेष रुचि थी किंतु उनकी कलम भूगोल, सामाजिक विज्ञान, प्रकृति के सौंदर्य, पर्यावरण, व्रत व त्यौहारों, विभिन्न व्यक्तित्व और उनके कृतित्व, आत्मकथा, बाल साहित्य के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी खूब चली। ‘यदि ये बोल पाते’ के रूप में उन्होंने चेतन बोध कराने वाली अद्भुत कथाएं भी लिखीं, जिसमें वृक्षों, पक्षियों, पत्थरों आदि के भावों को सुंदर शब्दों में व्यक्त कर अनोखा सृजन किया। ‘भौंरहा पीपर’, ‘रानी दुर्गावती खण्ड-काव्य’, ‘यदि ये बोल पाते’ आदि उनकी अत्यंत ही चर्चित बुंदेली-हिंदी रचनाएं हैं। बुंदेली लोक साहित्य का अध्ययन, उनकी समालोचनात्मक व्याख्या, बुंदेली शब्द भंडार का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, बुंदेली शब्द भंडार के स्रोत, बुंदेली शब्दकोश, संस्कृत की कहावतों और मुहावरों का बुंदेली कहावतों और मुहावरों पर प्रयोग, लोक साहित्य और परिनिष्ठित साहित्य का पारस्परिक संबंध आदि आदि उनकी प्रमुख और प्रतिष्ठित रचनाएं हैं। ‘बुंदेली साहित्य’ पर सम्भवतः इतना अधिक कार्य किसी ने नहीं किया। आपने बुंदेली-साहित्य का न केवल संरक्षण किया वरन उसका संवर्धन कर उसे क्षितिज तक पहुँचाने का प्रयास भी किया। लेखन के साथ-साथ नागपुर, जबलपुर, भोपाल के आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्र द्वारा उनकी कविताओं, लेखों और वार्ताओं का समय-समय पर प्रसारण होता रहा। अनेक गायक-गायिकाओं ने उनके लिखे बुन्देली गीत गाए जो आज भी पसंद किए जाते हैं। अनेक गौरवशाली संस्थाओं ने संस्कारधानी के इस ‘गौरव- पुरुष’ को सम्मानित किया। बुंदेली साहित्य के उनके इस अनुपम और अद्वितीय महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही उनके जन्मदिवस 01 सितम्बर को ‘बुंदेली दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी बहुआयामी व्यक्तित्व वाले डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव अक्खड़-फक्कड़ प्रवृत्ति के माने जाते थे, किंतु वे अत्यंत सहृदय और सर्वप्रिय थे। वे आत्मवंचना एवं आत्मप्रदर्शन से सदैव दूर रहे। ग्रामीण परिवेश, वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को बड़ी खूबी के साथ उन्होंने शब्दों में उकेरा। अनुपम कृति “भौंरहा पीपर” की अविस्मरणीय पंक्तियों में उनका लेखन बड़ा अद्भुत और मर्मस्पर्शी जान पड़ता है। जिसमें उनके गांव का पीपल अपना इतिहास बताता है-

मैं पीपर को बिरछ, गांव में अबलौं एक खडो हों,

बहुत दिना भए बीरन सें, अकबर सें तनक बड़ो हों।

प्रेम-उल्लास से भरे बुंदेली तीज-त्यौहारों का वर्णन आपकी कविताओं में बड़ी सरसता के साथ देखने को मिलता है। दूसरी ओर वीर-रस से भरी कविताएं जिसमें “वीरांगना रानी दुर्गावती” (खंडकाव्य) अत्यंत ही चर्चित और रोमांचित करने वाला बुंदेली खंडकाव्य है –

चली प्रलय से जूझन रानी रणचंडी अकुलाई।

 गंग-यमुन उत उठीं हिलौरें, इत रेवा उमड़ाई।। 

सदैव संतुष्ट दिखाई देने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी के जीवन में संघर्ष और बाधाएं भी आईं, किंतु उन्होंने न केवल उन बाधाओं, कंटकों को हटाया वरन लोगों को भी साहस और धीरज का पाठ पढ़ाया। उनकी एक कविता की बानगी देखिए-

साहस ही सम्बल है,

धीरज धर भरिए डग. .

करिए सब काम।

डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी प्राध्यापक होते हुए भी उपदेश देने पर विश्वास नहीं रखते थे वरन उनका व्यक्तित्व ही उपदेश था। उनका आंतरिक मन जितना मानवीय गुणों से श्रृंगारित था बाह्य स्वरूप उतना ही सादगी पूर्ण और आडंबर रहित था। उनकी स्मृति कर्म और कर्तव्य का बोध कराती है। डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव साहित्य के ऐसे अमिट हस्ताक्षर हैं, जिन्हें भूल पाना नामुमकिन है। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से सुरभित होता है और व्यक्तित्व, कृतित्व से। अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण उन्हें याद किया जाता रहेगा। हर बार, और बार-बार…कहा गया है –

ए अज़ल आदमी दुनिया से गुजर सकता है

 पर कारनामा तेरे मारे नहीं मर सकता. .। 

© डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे 

प्राचार्य, चंचलाबाई पटेल महिला महाविद्यालय, जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७१ ⇒ हाइपर बोल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हाइपर बोल।)

?अभी अभी # ७७१ ⇒ आलेख – हाइपर बोल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

|•• hyperbole ••|

हिंदी व्याकरण में एक अलंकार है, अतिशयोक्ति अलंकार, जिसे अंग्रेजी में hyperbole (हाइपरबोल) कहते हैं। हमने अंग्रेजी सहित कई भाषाओं को आत्मसात किया है, और उन्हें हमारी बोलचाल की भाषा में ढाल लिया है।

अधिक बोलने वाली महिलाओं को अक्सर सर में हेडएक (headache) और अपच के कारण कई पुरुषों को पेट में भी हेडएक होने लगता है।

Ten thousand saw I at a glance. यह मैं नहीं कह रहा, अंग्रेजी कवि विलियम वर्डस्वर्थ कह रहे हैं। जिसे हम अतिशयोक्ति अलंकार कहते हैं, वह अंग्रेजी का figure of speech, hyperbole ही है। ।

मान लिया आप कवि हो, पर दस हज़ार डफोडिल्स एक झलक में, भाई साहब आप भले ही इसे अपनी भाषा में हाइपरबोल कह लें, लेकिन ये बोल ज़रा, जरूरत से ज्यादा ही हाइपर हो गए हैं। जिस तरह आपकी भाषा है, हमारी भी एक भाषा है, संस्कृति है, विचार है।

जब कोई ज्यादा फेंकता है, तो हम भी हाइपर हो जाते हैं।

ऐसे बोल जिससे हमारे सर में हेडएक हो, हमारा टेंपर हाइपर हो, उसे हम हाइपरबोल ही कहते हैं। हमारे हिंदी कवियों ने भी अतिशयोक्ति अलंकार का भरपूर प्रयोग किया और आजकल हमारे राजनेता भी इन्हीं अलंकारों से लदे हुए हैं। अतिशयोक्ति की भी हद होती है। पहले जहां तौलकर बोला जाता था, वहीं आजकल, बिना तराजू से तौले, क्विंटल में फेंका जा रहा है। ।

कितना बढ़िया शब्द चुना है आप लोगों ने अतिशयोक्ति अलंकार के लिए, हाइपरबोल ! हम गांव के सीधे सादे आपस में राम राम से अभिवादन करने वाले, आज कहां से कहां पहुंच गए। इस्स, लाज आती है बताते हुए। किसी ने कहा हरि बोल, तो हमने भी हरि बोल कहा। हनुमान जी के भक्त ने जय बजरंग बली कहा, तो हमने हनुमान जी की भी जय जयकार करी।

हमारे लिए सब भगवान एक हैं, आप चाहे जय श्री कृष्ण कहें अथवा जय श्री राम, हमें तो बस भगवान का नाम लेने से काम।

लेकिन हमारे राजनेता बड़े चतुर निकले। उन्हें जब अपनी भी जय जयकार करवानी हो, रैलियां निकालनी हों, तो वे अपने नाम के साथ भगवान के नाम की भी जय जयकार करवाने लगे। क्या यह अतिशयोक्ति नहीं हुई, इसमें कोई आभूषण नहीं, कोई अलंकार नहीं, हमारे लिए यह बकवास बोल है, जिसके लिए हमने आपका अलंकार hyperbole हाइपर बोल उधार लिया है। ।

हाइपरबोल में आज हम thousand से मिलियन और बिलियन तक पहुंच गए हैं। हमारा राजनेताओं का आंकड़ों का गणित आज जहां तक पहुंचा हुआ है, वहां तक कभी आपका कोई पहुंचा हुआ कवि, नहीं पहुंच पाया होगा। हमारी नज़र हजारों से हटकर करोड़ों तक पहुंच गई है।

आपका तो नाम ही कविवर Wordsworth था, जिसका हर शब्द कीमती था, words worth, अतः आपसे क्षमा मांगते हुए हमने आपके अलंकार हाइपरबोल पर अपना कॉपीराइट स्थापित कर लिया है। अतिशयोक्तिपूर्ण कथन में कोई हमसे बाजी नहीं मार सकता। बोल बोल, जब भी बोल हाइपरबोल। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०४ – मन एव मनुष्याणां ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆ —

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०४ ☆ मन एव मनुष्याणां… ?

मेरे शुरुआती दिनों में उसने मेरे साथ बुरा किया था। अब मेरा समय है। ऐसी हालत की है कि ज़िंदगी भर याद रखेगा।’…’मेरी सास ने मुझे बहुत हैरान-परेशान किया था। बहुत दुखी रही मैं। अब घर मेरे मुताबिक चलता है। एकदम सीधा कर दिया है मैंने।’…’उसने दो बात कही तो मैंने भी चार सुना दीं।’…आदि-आदि।

सामान्य जीवन में असंख्य बार प्रयुक्त होते हैं ऐसे वाक्य।

यद्यपि  पात्र और परिस्थिति के अनुरूप हर बार प्रतिक्रिया भिन्न हो सकती है पर मनुष्य के मूल में मनन न हो तो मनुष्यता को लेकर चिंता का कारण बनता है।

मनुष्यता का सम्बंध मन में उठनेवाले भावों से है। मन के भाव ही बंधन या मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। कहा गया है,

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः

अर्थात मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है।

वस्तुत: भीतर ही बसा है मोक्ष का एक संस्करण, उसे पाने के लिए, उसमें समाने के लिए मन को मनुष्यता में रमाये रखो। मनुष्यता, मनुष्य का प्रकृतिगत लक्षण है।प्रकृतिगत की रक्षा करना मनुष्य का स्वभाव होना चाहिए।

एक साधु नदी किनारे स्नान कर रहे थे। डुबकी लगाकर ज्यों ही सिर बाहर निकाला, देखते हैं कि एक बिच्छू बहे जा रहा है। साधु ने समय लगाये बिना अपनी हथेली पर बिच्छू को लेकर जल से निकालकर भूमि की ओर फेंकने का प्रयास किया। फेंकना तो दूर जैसे ही उन्होंने बिच्छू को स्पर्श किया, बिच्छू ने डंक मारा। साधु वेदना से बिलबिला गये, हथेली थर्रा गई, बिच्छू फिर पानी में बहने लगा। अपनी वेदना पर उन्होंने बिच्छू के जीवन को प्रधानता दी। पुनश्च बिच्छू को हथेली पर उठाया और क्षणांश में ही फिर डंक भोगा। बिच्छू फिर पानी में।…तीसरी बार प्रयास किया, परिणाम वही ढाक के तीन पात। किनारे पर स्नान कर रहा एक व्यक्ति बड़ी देर से घटना का अवलोकन कर रहा था। वह साधु से बोला, ” महाराज! क्यों इस पातकी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। आप बचाते हैं और यह काटता है। इस दुष्ट का तो स्वभाव ही डंक मारना है।” साधु उन्मुक्त हँसे, फिर बोले, ” यह बिच्छू होकर अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो मैं मनुष्य होकर अपना स्वभाव कैसे छोड़ दूँ?”…

लाओत्से का कथन है, “मैं अच्छे के लिए अच्छा हूँ, मैं बुरे के लिए भी अच्छा हूँ।” यही मनुष्यता का स्वभाव है। मनन कीजिएगा क्योंकि ‘मन एव मनुष्याणां…।’

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७० ⇒ • स्पर्श • ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – • स्पर्श •।)

?अभी अभी # ७७० ⇒ आलेख – • स्पर्श • ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(sense of touch)

एक पौधा होता है छुईमुई का (Mimosa pudica), जिसे छुओ, तो मुरझा जाता है, और थोड़ी देर बाद पुनः पहले जैसी स्थिति में आ जाता है। हर पालतू प्राणी, स्पर्श का भूखा होता है, इंसान की तो बात ही छोड़िए। छेड़ा मेरे दिल ने तराना तेरे प्यार का, किसी वाद्य यंत्र के तार मात्र को छूने से वह झंकृत हो जाता है, स्पर्श की महिमा जानना इतना आसान भी नहीं।

हमारी पांच ज्ञानेंद्रियां हैं, आंख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ! वैसे तो कर्मेंद्रियां भी पांच ही हैं, लेकिन त्वचा ही वह ज्ञानेंद्रिय है, जहां हमें कभी सुई तो कभी कांटा चुभता है, और गर्मागर्म चाय जल्दी जल्दी सुड़कने से जीभ जल जाती है। चाय का जला, कोल्ड्रिंक भी फूंक फूंक कर पीता है। ।

बड़ों के पांव छूना, हमारे संस्कार में है। मंदिर में प्रवेश करते ही, हमारे हाथ एकाएक जुड़ जाते हैं। हमारी इच्छा होती है, मूर्ति के करीब जाकर प्रणाम करें, वह तन का ही नहीं, मन का भी स्पर्श होता है। कुछ भक्त तो अपने इष्ट के सम्मुख साष्टांग प्रणाम भी करते हैं, जिसमें शरीर के सभी अंग(पेट को छोड़कर) ठुड्डी, छाती, दोनों हाथ, घुटने, पैर और पूरा शरीर धरती को स्पर्श करता है। इसे साष्टांग दंडवत प्रणाम भी कहते हैं। अहंकार त्यागकर स्वयं को अपने इष्ट अथवा ईश्वर को सौंप देना ही साष्टांग दंडवत प्रणाम का अर्थ है।

समय के साथ मानसिक स्पर्श अधिक व्यावहारिक हो चला है। मुंह से बोलकर अथवा चिट्ठी पत्री में ही पांव धोक, प्रणाम और दंडवत होने लग गए हैं। हृदय पर हाथ रखकर भी आजकल प्रणाम किया जाने लगा है। नव विवाहित युगल जब बड़ों को प्रणाम करता था तो दूधों नहाओ और पूतों फलो तथा मराठी में महिलाओं को अष्टपुत्र सौभाग्यवती का आशीर्वाद मिलता था। ।

हैजा एक संक्रामक बीमारी है। महामारी की बात छोड़िए, हाल ही में, मानवता ने कोरोनावायरस जैसी त्रासदी का सामना किया है, जिसके आगे विज्ञान क्या, ईश्वरीय शक्ति भी नतमस्तक हो गई थी। इंसान इंसान से दूर हो गया था, मंदिर का भगवान भी अपने भक्त से दूर हो गया था। लेकिन सृजन और प्रलय सृष्टि का नियम है, आज मानवता पुनः खुली हवा में सांस ले रही है। प्रार्थना और पुरुषार्थ में बल है। God is Great!

स्पर्श एक नैसर्गिक गुण है। इसे भौतिक सीमाओं में कैद नहीं कर सकते। डाली पर खिला हुआ एक फूल हमारे मन को स्पर्श कर जाता है। फूलों का स्पर्श अपने इष्ट को, अपने आराध्य को और अपनी प्रेमिका को, कितना आनंदित और प्रसन्न कर जाता है। पत्रं पुष्पं, नैवेद्यं समर्पयामी ! एक फूल तेरे जूड़े में, कह दो तो लगा दूं मैं; गुस्ताखी माफ़। ।

एक नवजात, फूल जैसे बालक का स्पर्श, एक बालक का अपने गुड्डे गुड़ियों और आज की बात करें तो टैडी बच्चों की पहली पसंद होती है। मिट्टी के खिलौनों में बच्चों का स्पर्श जान डाल देता है। आज हमारे हाथ का मोबाइल और डेस्कटॉप महज कोई हार्डवेयर अथवा सॉफ्टवेयर नहीं, अलादीन का चिराग है। मात्र स्पर्श से खुल जा सिम सिम।

अब बहुत पुरानी हो गई स्पर्श की थ्योरी, जब आंखों आंखों में ही बात हो जाती है और दिल से दिल टकरा जाता है, मत पूछिए क्या हो जाता है। नजरों के तीर से दिल घायल होता है, फिर भी कोई शिकवा शिकायत नहीं, कोई एफआईआर नहीं। ।

किसी के मन को छूना आज जितना आसान है, उतना ही कठिन है, किसी के मन को पढ़ पाना। कोई गायक किसी गीत को अपने होठों से मात्र छू देता है और वह गायक और गीत अमर हो जाता है। ये किसने गीत छेड़ा।

स्पर्श शरीर की नहीं, मन की वस्तु है। केवल सच्चे मन से मीठा बोला जाए, तो रिश्तों में चाशनी घुल जाए। किसी तन और मन से बीमार व्यक्ति को संजीदा शब्दों का स्पर्श भी कभी कभी संजीवनी का काम करता है। और कुछ नहीं है, स्पर्श चिकित्सा अथवा spiritual healing, कुछ दिल से दिल की बात कही, और रो दिए। लोगों पर हंसना छोड़िए, किसी के आंसू पोंछिए, रूमाल से नहीं, अपने शब्दों के स्पर्श से।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६९ ⇒ सिमटती दीवारें ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ७६९ ⇒ आलेख – अंतिम साँसें ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब घर में बच्चे होते हैं, छोटा घर भी बड़ा लगने लगता है। बच्चे बड़े होने लगते हैं। समय के साथ, ज़रूरत के साथ, घर भी बड़ा होने लगता है। अचानक बच्चे बहुत बड़े हो जाते हैं। घर में नहीं समाते। उनके पर लग जाते हैं। वे परदेस चले जाते हैं। घर फिर छोटा हो जाता है।

बच्चों के बिना, घर बहुत ही छोटा हो जाता है।

पहले घर, सिर्फ़ घर नहीं होता था, घर के साथ आँगन भी होता था, जिसमें आम, नीम, जाम और जामुन के पेड़ भी होते थे। आँगन में बाहर खाट पड़ी रहती थी, बच्चे खेलते रहते थे, सुबह-शाम दरवाज़े पर गाय रंभाती रहती थी। घर के साथ आँगन भी बुहारा जाता था। सभी वार त्योहार, शादी ब्याह तक उस अँगने में सम्पन्न हो जाते थे।।

इंसानों के दायरे विस्तृत हुआ करते थे। कुछ घर-आँगन मिलकर मोहल्ला हो जाता था। सभी घर बच्चों के हुआ करते थे। कौन बच्चा किस घर में खा रहा है, और किस घर में सो रहा है, कोई हिसाब किताब नहीं रखा जाता था। एक घर के अचार की खुशबू कई दीवारें पार कर जाती थी।

ज़िन्दगी घरों में नहीं, आंगनों में ही गुज़र जाती थी। गर्मी के दिनों में कौन घरों के अन्दर मच्छरदानी और आल आउट में सोता था ! माँ की लोरी और आसमान के तारे गिनते-गिनते, कब नींद लग जाती, कुछ पता ही नहीं चलता था। सुबह उठो, तो सूरज आसमान में सर पर नज़र आता था। अब किसी के घोड़े नहीं बिकते। सुबह का अलार्म, दूधवाला और अखबार वाला, बच्चों के स्कूल की तैयारी और काम वाली बाई की दस्तक, सब नींद चुराकर ले जाते हैं।।

अब घर बड़े हो गए, आँगन साफ़ हो गए, पड़ोस से सटी मोटी-मोटी दीवारें चार इंची हो गई, इस पार से उस पार की ताका-झाँकी, वस्तुओं का आदान-प्रदान बंद हो गया। सब घरों में सबके अपने अपने बेडरूम हो गए, अलग अलग सपने हो गए। इंसान सम्पन्न होता गया, अपने आप में सिमटता चला गया।

आज घर की पक्की दीवारें महँगे एक्रेलिक पेंट से पुती हुई होती हैं, जिनमें एक खील भी ड्रिलिंग मशीन से ठोकी जाती है। याद आती हैं वे दीवारें, जिनमें ताक हुआ करती थी। बच्चे, पेंसिल, पेन जो हाथ लगे, से दीवारों पर चित्रकारी किया करते थे। आड़ी-तिरछी लकीरें बच्चों की मौज़ूदगी का अहसास दिलाती थी। हर भगवान के कैलेंडर के लिए एक नई खील ठोकी जाती थी। कपड़े खूँटी पर टांगे जाते थे।

आज सहमी सी, सिमटी सी, साफ-सुथरी दीवारें बच्चों के लिए तरस जाती हैं। छोटे छोटे नाखूनों से दीवार में बड़े बड़े छेद कर दिये जाते थे, चोरी से वही मिट्टी खाई जाती थी। आज दीवारों से बात करने वाला कोई नहीं। महँगे कालीन को बच्चों से बचाया जाता है। बच्चे घर गंदा कर देते हैं। घरों को बच्चों से बचाया जाता है। घर मन मसोसकर रह जाता है। घर की खामोश लिपी-पुती दीवारें मन ही मन सोचती हैं, अरे नादानों ! बच्चों से ही तो घर, घर होता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९० ☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रतिशोध नहीं परिवर्तन। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९० ☆

☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆

‘ऊंचाई पर पहुँचते हैं वे, जो प्रतिशोध के बजाय परिवर्तन की सोच रखते हैं।’ प्रतिशोध उन्नति के पथ में अवरोधक का कार्य करता है तथा मानसिक उद्वेलन व क्रोध को बढ़ाता है; मन की शांति को मगर की भांति लील जाता है… ऐसे व्यक्ति को कहीं भी कल अथवा चैन नहीं पड़ती। उसका सारा ध्यान विरोधी पक्ष की गतिविधियों पर ही केंद्रित नहीं होता, वह उन्हें नीचा दिखाने के अवसर की तलाश में मग्न रहता है। उसका मन अनावश्यक उधेड़बुन में उलझा रहता है, क्योंकि उसे अपने दोष व अवगुण नज़र नहीं आते और अन्य सब उसे दोषों व बुराइयों की खान नज़र आते हैं। फलत: उसके लिए उन्नति के सभी द्वार बंद हो जाते हैं। उन विषम परिस्थितियों में अनायास सिर उठाए कुकुरमुत्ते, हर दिन सिर उठाए उसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में नज़र आते हैं और हर इंसान उसे उपहास अथवा व्यंग्य करता-सा दिखाई पड़ता है।

ऊंचा उठने के लिए पंखों की ज़रूरत पक्षियों को पड़ती है। परंतु मानव जितना विनम्रता से झुकता है; उतना ही ऊपर उठता है। सो! विनम्र व्यक्ति सदैव झुकता है; फूल-फल लगे वृक्षों की डालियों की तरह… और वह सदैव ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर के भाव से मुक्त रहता है। उसे सब मित्र-सम भासते हैं और वह दूसरों में दोष-दर्शन न कर आत्मावलोकन करता है… अपने दोष व गुणों का चिंतन कर वह ख़ुद को बदलने में प्रयासरत रहता है। प्रतिशोध की बजाय परिवर्तन की सोच रखने वाला व्यक्ति सदैव उन्नति के अंतिम शिखर पर पहुंचता है। परंतु इसके लिए आवश्यकता है– अपनी सोच व रुचि बदलने की; नकारात्मकता से मुक्ति पाने की; स्नेह, प्रेम व सौहार्द के दैवीय गुणों को जीवन में धारण करने की; प्राणी-मात्र के हित की कामना करने की; अहं को कोटि शत्रुओं-सम त्यागने की; विनम्रता को जीवन में धारण करने की; संग्रह की प्रवृत्ति को त्याग परमार्थ व परोपकार को अपनाने की; सबके प्रति दया, करुणा और सहानुभूति भाव जाग्रत करने की। यदि मानव उपरोक्त दुष्प्रवृत्तियों को त्याग, सात्विक वृत्तियों को जीवन में धारण कर लेता है, तो संसार की कोई शक्ति उसे पथ-विचलित व परास्त नहीं कर सकती।

इंसान, इंसान को धोखा नहीं देता, बल्कि उम्मीदें धोखा देती हैं; जो वह दूसरों से करता है। इससे  संदेश मिलता है कि हमें दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इंसान ही नहीं, हमारी अपेक्षाएं व आकांक्षाएं ही हमें धोखा देतीं हैं, जो इंसान दूसरों से करता है। वैसे यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि ‘पैसा उधार दीजिए; आपका पक्का दोस्त भी आपका कट्टर निंदक अर्थात् दुश्मन बन जाएगा।’ सो! उधार देने के पश्चात् भूल जाइए, क्योंकि वह पैसा लौट कर कभी भी नहीं आने वाला है। यदि आप वापसी की उम्मीद रखते हैं, तो यह आपकी ग़लती ही नहीं, मूर्खता है। जिस प्रकार दुनिया से जाने वाले लौट कर नहीं आते; वही स्थिति ऋण के रूप में दिये गये धन की है। यदि वह लौट कर आता भी है, तो वह आपके सबसे प्रिय मित्र भी शत्रु के रूप में सीना ताने खड़ा दिखाई पड़ता है। सो! प्रतिशोध की भावना को त्याग, अपनी सोच व विचारों को बदलें– जैसे एक हाथ से दिए गए दान की खबर, दूसरे हाथ को कदापि नहीं लगनी चाहिए। उसी प्रकार उधार देने के पश्चात् उसे भुला देने में ही सबका मंगल है। सो! जो इंसान अपने हित के बारे में ही नहीं सोचता; वह दूसरों के लिए क्या ख़ाक सोचेगा?

समय परिवर्तनशील है और प्रकृति भी पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी यथा-समय बदलते रहते हैं। सो! मानव को श्रेष्ठ संबंधों को कायम रखने के लिए स्वयं को बदलना होगा। जैसे अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है; उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी मानव के लिए कष्टकारी

होता है। सो! अपनी ‘इच्छाओं पर अंकुश लगाएं और तनाव को दूर भगाएं…दूसरों से उम्मीद मत रखें, क्योंकि वह तनाव का कारण होती हैं।’ महात्मा बुद्ध की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है कि ‘आवश्यकता से अधिक सोचना, संचय करना व सेवन करना– दु:ख और अप्रसन्नता का कारण है, जो हमें सोचने पर विवश करता है कि मानव को व्यर्थ के चिंतन से दूर रहना चाहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब वह आत्मचिंतन करता है और दुनियादारी व दोस्तों की भीड़ से दूरी बनाकर रखता है।

वास्तव में दूसरों से अपेक्षा करना हमें अंध-कूप में धकेल देता है, जिससे मानव चाह कर भी बाहर निकल नहीं पाता। वह आजीवन ‘तेरी-मेरी’ में उलझा रहता है तथा ‘लोग क्या कहेंगे’–यह सोचकर अपने हंसते-खेलते जीवन को अग्नि में झोंक देता है। यदि इच्छाएं पूरी नहीं होती, तो क्रोध बढ़ता है और पूरी होती हैं तो लोभ। सो! उसके लिए हर स्थिति में धैर्य बनाए रखना अपेक्षित है। ‘इच्छाओं को हृदय में अंकुरित मत होने दें, अन्यथा आपके जीवन की खुशियों को ग्रहण लग जाएगा और आप क्रोध व लोभ के भंवर से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। कठिनाई की  स्थिति में केवल आत्मविश्वास ही आपका साथ देता है, इसलिए सदैव उसका दामन थामे रखिए। ‘तुलना के खेल में स्वयं को मत झोंकिए, क्योंकि जहां इसकी शुरुआत होती है, वहां अपनत्व व आनंद समाप्त हो जाता है और कोसों दूर चला जाता है।’ इसलिए जो मिला है, उससे संतोष कीजिए। स्पर्द्धा भाव रखिए, ईर्ष्या भाव नहीं। ख़ुद को बदलिए, क्योंकि जिसने संसार को बदलने की कोशिश की, वह हार गया और जिसने ख़ुद को बदल लिया, वह जीत गया। दूसरों से उम्मीद रखने के भाव का त्याग करना ही श्रेयस्कर है। सो! उस राह को त्याग दीजिए, जो कांटों से भरी है, क्योंकि दुनिया भर के कांटों को चुनना व दु:खों को मिटाना संभव नहीं। इसलिए उस विचार को समूल नष्ट करने में सबका कल्याण है। इसके साथ ही बीती बातों को भुला देना कारग़र है, क्योंकि गुज़रा हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए वर्तमान में जीना सीखिए। अतीत अनुभव है। उससे शिक्षा लीजिए तथा उन ग़लतियों को वर्तमान में मत दोहराएं, अन्यथा आपके भविष्य का अंधकारमय होना निश्चित है।

वैसे तो आजकल लोग अपने सिवाय किसी के बारे में सोचते ही नहीं, क्योंकि वे अपने अहं में इस क़दर मदमस्त रहते हैं कि उन्हें दूसरों का अस्तित्व नगण्य प्रतीत होती है। अब्दुल कलाम जी के शब्दों में ‘यदि आप किसी से सच्चे संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो आप उसके बारे में जो जानते हैं; उस पर विश्वास रखें… न कि जो उसके बारे में सुना है’…  यह कथन कोटिश: सत्य है। आंखों-देखी पर सदैव विश्वास करें, कानों-सुनी पर नहीं, क्योंकि लोगों का काम तो होता है कहना व आलोचना करना; संबंधों में कटुता उत्पन्न करने के लिए इल्ज़ाम लगाना; भला-बुरा कहना व अकारण दोषारोपण करना। इसलिए मानव को व्यर्थ की बातों में समय नष्ट न करने, बाह्य आकर्षणों व ऐसे लोगों से सचेत रहने की सीख दी गयी है, क्योंकि ‘बाहर रिश्तों का मेला है/ भीतर हर शख्स अकेला है/ यही ज़िंदगी का झमेला है।’ इसलिए ज़रा संभल कर चलें, क्योंकि तारीफ़ के पुल के नीचे सदैव मतलब की नदी बहती है अर्थात् यह दुनिया पल-पल गिरगिट की भांति रंग बदलती है। लोग आपके सामने तो प्रशंसा के पुल बांधते हैं, परंतु पीछे से फब्तियां कसते हैं; भरपूर निंदा करते हैं और पीठ में छुरा घोंपने से तनिक भी गुरेज़ नहीं करते।

‘इसलिए सच्चे दोस्तों को ढूंढना/ बहुत मुश्किल होता है/ छोड़ना और भी मुश्किल/ और भूल जाना नामुमक़िन।’ सो! मित्रों के प्रति शंका भाव कभी मत रखिए, क्योंकि वे सदैव तुम्हारा हित चाहते हैं। आपको गिरता हुआ देख, आगे बढ़ कर थाम लेते हैं। वास्तव में सच्चा दोस्त वही है, जिससे बात करने में खुशी दोगुनी व दु:ख आधा हो जाए…केवल वो ही अपना है, शेष तो बस दुनिया है अर्थात् दोस्तों पर शक़ करने से बेहतर है… ‘वक्त पर छोड़ दीजिए/ कुछ उलझनों के हल/ बेशक जवाब देर से मिलेंगे/ मगर लाजवाब मिलेंगे।’ समय अपनी गति से चलता है और समय के साथ मुखौटों के पीछे छिपे लोगों का असली चेहरा उजागर अवश्य हो जाता है। सो! यह कथन कोटिश: सत्य है कि ख़ुदा की अदालत में देर है, अंधेर नहीं। अपने विश्वास को डगमगाने मत दें और निराशा का दामन कभी मत थामें। इसलिए ‘यदि सपने सच न हों/ तो रास्ते बदलो/ मुक़ाम नहीं/ पेड़ हमेशा पत्तियां बदलते हैं/ जड़ नहीं।’ सो! लोगों की बातों पर विश्वास न करें, क्योंकि आजकल लोग समझते कम और समझाते ज़्यादा हैं। तभी तो मामले सुलझते कम, उलझते ज़यादा हैं। दुनिया में कोई भी दूसरे को उन्नति करते देख प्रसन्न नहीं होता। सो! वे उस सीढ़ी को खींचने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं तथा उसे सही राह दर्शाने की मंगल कामना नहीं करते।

इसलिए मानव को अहंनिष्ठ व स्वार्थी लोगों से सचेत व सावधान रहने का संदेश देते हुए कहा गया है, कि ‘घमंड मत कर ऐ!दोस्त!/  सुना ही होगा/ अंगारे राख ही बनते हैं’…जीवन को समझने से पहले मन को समझना आवश्यक है, क्योंकि जीवन और कुछ नहीं, हमारी सोच का साकार रूप है…’जैसी सोच, वैसी क़ायनात और वैसा ही जीवन।’ सो! मानव को प्रतिशोध के भाव को जीवन में दस्तक देने की कभी भी अनुमति नहीं प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि आत्म-परिवर्तन को अपनाना श्रेयस्कर है। सो! मानव को अपनी सोच, अपना व्यवहार, अपना दृष्टिकोण, अपना नज़रिया बदलना चाहिए, क्योंकि नज़र का इलाज तो दुनिया में है, नज़रिए का नहीं। ‘नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। नज़रिया बदलो/ दुनिया के लोग ही नहीं/ वक्त के धारे भी बदल जाएंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६८ ⇒ कुबेर खैनी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुबेर खैनी।)

?अभी अभी # ७६८ ⇒ आलेख – कुबेर खैनी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुबेर न तो खैनी खाता था, और न ही उसका खैनी का कारखाना था, वह तो स्वयं ही धन का देवता था। जिसे रावण ने अपने यहां बंदी बना लिया हो, उस रावण की लंका, अगर सोने की हो, तो इसमें आश्चर्य कैसा।

आज स्विस बैंक को हम कुबेर का खजाना कह सकते हैं। लेकिन ऐसे कई कुबेर के खजाने हमारे देश में मौजूद हैं। देश के विकास में कुबेर ग्रुप के विकास मालू और किंगफिशर के विजय माल्या के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।।

विजय माल्या को रावण की तरह आप एक आवश्यक बुराई मानकर भुला भी सकते हैं, लेकिन कुबेर खैनी को आप नहीं भुला सकते। खैनी किसी को कुबेर नहीं बनाती, लेकिन जो खैनी बनाते और बेचते हैं, वे किसी धन कुबेर से कम नहीं होते। टीम इंडिया की तरह ही खैनी निर्माताओं की भी एक टीम है, जिसमें मानकचंद, विमल, पान पराग, कमलापसंद, सिमला, गोआ गुटका और रजनीगंधा भी शामिल हैं।

खैनी एक धुआं रहित तम्बाकू उत्पाद है और १०४ मिलियन वयस्कों द्वारा इसका सेवन किया जाता है। वैसे खैनी और कुछ नहीं, तम्बाकू और जलयोजित चूना है। आप चाहें तो इसे तम्बाकू के पान का विकल्प भी कह सकते हैं। जब चूना और तंबाकू को हथेली के बीच रखकर मसला जाता है, तो खैनी तैयार हो जाती है।

भूल जाइए पान बनारस वाला, जब पाउच में ही उपलब्ध है, पान मसाला।।

धूम्रपान निषेध एवं स्वच्छ भारत अभियान का जितना असर सिगरेट और पान की दुकानों पर पड़ा है, उतना असर पान मसाला, गुटका और खैनी पर नहीं पड़ा है। शराब की तुलना में यह कम अधिक बदनाम और सात्विक, शाकाहारी नशा है, जो एक इंसान को दूसरे इंसान के करीब लाता है।

जल्दी पुड़िया निकलती है, और दो अजनबियों के बीच संवाद शुरू हो जाता है।

पान, सुपारी, कत्था चूना और तम्बाकू की जड़ें हमारे समाज में बहुत गहरी हैं।

जो मजदूर दिन भर मेहनत कर पसीना बहाता है, उसके पसीने में पान, बीड़ी और तम्बाकू की गंध भी शामिल होती है।

हमारे देश में उपभोक्ता नहीं, इन उत्पादों का उत्पादक ही धन कुबेर कहलाता है। कितने भी छापे पड़ जाएं, इनके ठिकानों पर, इनका नोट छापना बंद नहीं हो सकता।।

धर्म और राजनीति के नशे के आगे तो यह नशा फिर भी कुछ नहीं, फिर भी बद अच्छा, बदनाम बुरा। पैसे की बर्बादी और सेहत के साथ खिलवाड़। लेकिन इस उद्योग में जितनी जान है उतनी और कहीं नहीं।

आप नहीं जानते, आज के धन कुबेरों की उड़ान कहां कहां तक है।

आपने कल्याण का नाम तो सुना होगा लेकिन शायद कल्याण मटके का नहीं। अगर अमीरों के लिए शेयर बाजार है तो गरीबों के लिए भी कुबेर २२० मटका सट्टे की व्यवस्था है। जहां सरकारी शराब के ठेके कानूनी हैं, उस देश में नशाबंदी और सस्ते नशों के खिलाफ लोगों को जागरुक करना इतना आसान भी नहीं।

फिल्म स्टार हों या क्रिकेट स्टार, जब करोड़ों रुपए लेकर पान पराग और रजनीगंधा के पाउच खोलते हैं, तो गरीब तो गरीब ही रहता है, लेकिन घी तो धन कुबेरों की थाली में ही जाता है। फिर भी, सही को सही और गलत को गलत तो कहना ही पड़ेगा। बुरी है लत बीड़ी, सिगरेट, शराब, गुटका और खैनी तम्बाकू की, क्योंकि यह राह है बर्बादी की। अगर देश का और अपना विकास चाहते हैं, तो इनसे दूर रहें बिकास बाबू।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६९ ⇒ प्यार और परवाह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार और परवाह।)

?अभी अभी # ७६९ ⇒ आलेख – प्यार और परवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार में आह भी है और वाह भी। प्यार भले ही बेपरवाह हो, लेकिन बिना परवाह के भी कभी प्यार पनपा है, पल्लवित हुआ है। परवाह का दूसरा नाम ही प्यार है।

एक मां अपने बच्चे की देखभाल और चिंता करती है, क्या परवरिश शब्द आपको परवाह का करीबी नहीं लगता। परवाह शब्द में क्या कुछ कुछ अपनत्व, ममत्व और जिम्मेदारी का बोध नहीं होता ? प्यार में अपनापन होता है, परायापन नहीं।।

प्यार में जितनी अपेक्षा होती है, उतनी ही शिकायत भी। जहां अपेक्षा होती है, वहीं ना जाने कहां से उपेक्षा भी दबे पांव प्रवेश कर ही जाती है। प्यार उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकता और लापरवाही तो कतई नहीं। देखिए प्यार में शिकायत का अंदाज ;

जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में

जाने तुझको खबर कब होगी …

चोरी डकैती जैसा इल्ज़ाम भी लगा दिया जाता है, जब कोई किसी का दिल लूट ले जाता है। चोर, लुटेरे, डाकू

जैसे विशेषण तो ठीक है, निष्ठुर, ज़ालिम और ना जाने क्या क्या सुनना पड़ता है, प्यार में गिरफ्त एक इंसान को ;

चोरी चोरी आग सी

दिल में लगा के चल दिए

हम तड़फते रह गए

वो मुस्कुराकर चल दिए।।

लेकिन प्यार की कोई हद नहीं होती, प्यार की कोई सीमा नहीं होती। प्यार और परवाह का मूल स्रोत एक ही जगह है। हम सब जानते हैं, महसूस करते हैं, जब हमारे ऊपर उस करुणानिधान की अहैतुक कृपा की वर्षा होती है और

हम सिर्फ इतना ही कह पाते हैं ;

तू प्यार का सागर है

तेरी एक बूंद के प्यासे हम ..

बस यही एक बूंद है जो प्यार को कभी परवाह में बदल देती है तो कभी बलिदान में। प्यार में कोई दुनिया छोड़ देता है तो कोई पूरी दुनिया को कृष्ण की तरह प्यार का संदेश देता नजर आता है। प्यार में जान ली भी जाती है, और दी भी जाती है।

मातृभूमि के लिए जान देने से बढ़कर कोई कुर्बानी नहीं। प्यार में परवाह का यह एक उत्कृष्ट तरीका है।

प्यार शब्द एक है, लेकिन इसके कई अर्थ हैं। एक प्रेमी के लिए अगर यह इश्क है तो मीरा के लिए विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम। प्रकृति हो या पुरुष, नर हो या नारी, सभी प्रेम के आभारी। कहीं प्रेम का स्वरूप उदात्त है तो कहीं जरूरत से अधिक विनम्र और शालीन ;

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा

पर लेकिन फिर भी

ये बता दे के तुझे

प्यार करूं या ना करूं।।

प्यार में अगर आसक्ति है तो देहासक्ति भी, जहां भक्ति है वहीं देशभक्ति भी। जितना प्यार करना जरूरी है, उतना ही जरूरी प्यार बांटना भी। गुलजार प्यार को प्यार ही रहने देना चाहते हैं, कोई नाम नहीं देना चाहते। पर प्यार को परवाह का नाम तो आसानी से दिया जा सकता है। प्यार में बेपरवाही चल सकती है, लापरवाही नहीं। जिसने नहीं की कभी प्यार की परवाह, उसके मुंह से न कभी निकली आह, और न ही कभी वाह। आप प्यार करें या ना करें, लेकिन प्यार की परवाह अवश्य करें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३६७ ☆ आलेख – “व्यंग्य साहित्य में जोशी,  परसाई और त्यागी की त्रयी के साम्य” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६७ ☆

?  आलेख – व्यंग्य साहित्य में जोशी,  परसाई और त्यागी की त्रयी के साम्य ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य साहित्य के तीन ऐसे समकालीन प्रारंभिक लेखक हैं जिन्होंने अपनी कलम से समाज की विसंगतियों, राजनीति की धूर्तताओं और व्यक्ति की कमजोरियों को पकड़कर इस ढंग से प्रस्तुत किया कि पाठक हंसते हुए भी भीतर से कटु यथार्थ का अनुभव कर सके। तीनों के लेखन में विषय  लगभग समानांतर हैं, अंतर केवल शैली और प्रस्तुति का है।

कोई समाज की नसों पर उस्तरे की धार रख देता है, तो कोई उसकी चोट को मुस्कान में लपेट देता है। यही कारण है कि जब इनकी कृतियों को साथ पढ़ा जाए तो लगता है मानो अलग-अलग नदी की धाराएं शाश्वत विसंगति के एक ही सागर की ओर बढ़ रही हों।

शरद जोशी की लेखनी व्यंग्य में भाषा की सरलता और आम आदमी के अनुभव से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने एक जगह लिखा कि गांव का आदमी अब शहर को इस तरह देखता है जैसे किसी बड़े रिश्तेदार का घर हो, जहां हमेशा कुछ न कुछ मुफ्त में मिल सकता है। यह टिप्पणी न केवल गांव-शहर के बीच बढ़ते अंतर को उजागर करती है, बल्कि उस मानसिकता पर भी करारा व्यंग्य है जिसमें हम निरंतर सुविधा पाने की आस में जीते हैं। इसी तरह परसाई जब लिखते हैं कि लोकतंत्र का असली खेल चुनाव जीतने के बाद शुरू होता है, तो उनकी दृष्टि सीधे सत्ता और समाज के बीच मौजूद उस फरेब को उजागर करती है जिसे सामान्य जनता अक्सर देख कर भी अनदेखा कर देती है। रवींद्र त्यागी की शैली यहां भिन्न है, वे आम आदमी की असहायता को हल्की फुल्की हंसी में बांधते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने एक जगह कहा कि आज का आदमी बिजली बिल देखकर इस तरह कांपता है जैसे प्रेम पत्र पत्नी के हाथ में आ गया हो। यह तुलना हास्य से भरपूर है लेकिन साथ ही उस भयावह आर्थिक बोझ पर भी तीखी टिप्पणी है जो आज भी हर घर में मौजूद है।

तीनों लेखकों की सामूहिक समानता यह है कि ये सीधी भाषा में गहरे सच बोल जाते हैं। शरद जोशी के व्यंग्य में अक्सर रोजमर्रा की घटनाएं मिलती हैं। वे जब कहते हैं कि आदमी अब आदमी कम और पद अधिक हो गया है, तो इसमें हमारे समाज की पद-पूजा की विडंबना स्पष्ट होती है। यही बात परसाई और त्यागी भी अलग अंदाज में कहते हैं। परसाई इसे राजनीतिक दृष्टि से खोलते हैं कि नेता के पास नाम कम, पद अधिक होता है और त्यागी इसे पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में दिखाते हैं कि घर के बड़े बूढ़े भी अब केवल अपने पदनाम से सम्मानित होते हैं, उनकी वास्तविकता को कोई याद नहीं करता।

परसाई की धार सबसे तीखी तब दिखती है जब वे कहते हैं कि जो समाज ईमानदार आदमी को मूर्ख मानने लगे वहां की नैतिकता का अंत हो चुका है। यह कथन हमें चौंकाता है और सोचने पर विवश करता है। इसके बरक्स शरद जोशी जब यह लिखते हैं कि आदमी आज इतना समझदार हो गया है कि मूर्ख बनने से डरने लगा है, तो वह भी समाज की इसी मानसिकता का दूसरा पहलू प्रस्तुत करते हैं। वहीं रवींद्र त्यागी इस विडंबना को हल्का कर देते हैं और लिखते हैं कि ईमानदार आदमी अपने जीवन में वही है जो जूते बिना बारिश में चल रहा हो, सब तरफ कीचड़ है और उसे बार-बार पैर धोना पड़ता है। तीनों की दृष्टि एक ही तथ्य को अलग-अलग लेंस से उनके अपने शब्द परिप्रेक्ष्य से पकड़ती है।

व्यंग्यकारों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी समयानुकूलता होती है। चुनावी राजनीति हो या भ्रष्टाचार, परिवार की टूटती संरचना हो या विज्ञान और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता, हर विषय पर इन लेखकों ने अपना व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण दिया। शरद जोशी ने जब कहा कि आदमी अब अखबारों के शीर्षकों में ही जीने लगा है, तो उन्होंने मीडिया पर भी तीखा व्यंग्य किया। परसाई ने अखबारों की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए लिखा कि ये वही दर्पण हैं जिनमें चेहरा असली नहीं दिखता बल्कि सजाया हुआ दिखता है। वहीं रवींद्र त्यागी ने समाचार की बेतुकी प्रवृत्ति पर लिखा कि अब अखबार का सबसे अच्छा हिस्सा विज्ञापन रह गया है, क्योंकि बाकी खबरें तो आदमी का मूड ही बिगाड़ देती हैं।

भ्रष्टाचार पर तीनों की कलम लगभग एक स्वर में उठी। शरद जोशी ने टिप्पणी की कि अब तो रिश्वत लेना भी कला हो गई है, ठीक वैसे जैसे कोई कलाकार ब्रश से चित्र बनाता है। परसाई ने सीधे कहा कि भ्रष्टाचार अब भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है और ईमानदारी इतिहास की वस्तु है। रवींद्र त्यागी ने इसे व्यंग्य में हल्का बनाते हुए लिखा कि ईमानदार अफसर वही है जिसकी नौकरी बस पेंशन तक पहुंच जाए, बाकी सब तो रास्ते में मिलते हुए स्टेशनों पर टिकट कलेक्टर की तरह कुछ न कुछ वसूलते जाते हैं।

व्यक्तिगत जीवन और परिवार पर भी इन तीनों की दृष्टि महत्वपूर्ण है। शरद जोशी ने लिखा कि पति-पत्नी का रिश्ता आजकल बिजली और पंखे जैसा है, दोनों साथ हों तो हवा मिलती है और न हों तो घुटन। परसाई ने परिवार की विडंबना इस रूप में रखी कि हर घर में लोकतंत्र की बातें होती हैं लेकिन घर का बजट तानाशाही से ही चलता है। वहीं रवींद्र त्यागी ने परिवार की स्थिति का मजाक उड़ाते हुए लिखा कि आजकल घर का सबसे शांत सदस्य टीवी है, बाकी सब तो शोर मचाने में लगे रहते हैं।

इन सब उद्धरणों से स्पष्ट है कि शरद जोशी, परसाई और रवींद्र त्यागी तीनों की रचनात्मक दृष्टि समाज की गहराइयों तक उतरती है। कोई उसे तीखे शब्दों में प्रस्तुत करता है, कोई मुस्कान के पीछे छिपा देता है। तीनों की लेखनी पाठक को हंसाती भी है, चुभोती भी है और सोचने पर मजबूर करती है। विसंगति पर कटाक्ष से प्रहार की यही साहित्यिक समानता उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। जब हम इन्हें पढ़ते हैं तो लगता है कि तीनों ने मिलकर हमारी सामाजिक चेतना का एक विशाल दर्पण तैयार किया है, जिसमें हम अपनी ही विडंबनाओं को देख सकते हैं।

इस प्रकार शरद जोशी के सहज और चुटीले व्यंग्य, परसाई की गहरी सामाजिक दृष्टि और रवींद्र त्यागी की हल्की फुल्की हास्यपूर्ण शैली मिलकर हिंदी व्यंग्य साहित्य को ऐसी ऊंचाई पर ले गए हैं जहां हंसी और गहराई साथ-साथ बहती है। उनके रचनाओं से उद्धृत साहित्यिक उदाहरण यह दिखाते हैं कि भाषा, शैली और दृष्टिकोण चाहे अलग-अलग क्यों न हों, पर उनका लक्ष्य एक ही है कि समाज आईने में अपना असली चेहरा देख सके। यह साहित्यिक समानता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके लेखन काल में थी और शायद यही उनकी रचनाओं की स्थायित्व की शक्ति है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६७ ⇒ कुछ तो बोलो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुछ तो बोलो।)

?अभी अभी # ७६७ ⇒ आलेख – कुछ तो बोलो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ हमसे बात करो !

कुछ लोग बोलने को, बातें करने को तरस जाते हैं।

वे बोलते हैं, तो उन्हें कोई सुनने वाला नहीं होता, वे चाहते हैं, कोई उनसे सुख दुख की बात करें, लेकिन उन्हें कोई बात करने वाला ही नहीं मिलता।

बातों से हमारे जज्बात जुड़े रहते हैं। किसी की बात समझने के लिए, उसके दिल की गहराइयों तक जाना पड़ता है, लेकिन हम इतने खुदगर्ज होते हैं कि जब तक किसी से कोई फायदा मतलब ना हो, हम किसी को घास नहीं डालते। होती है एक उम्र बेफिक्री और नादानी की, जिसमें सब अपने ही नजर आते हैं। किसी से भी दिल खोलकर बातें करने की। ।

बच्चा जब छोटे से बड़ा होने लगता है, तो सबसे पहले चलना और बोलना सीखता है। वह लगातार चलते ही रहना चाहता है, बिना रुके बोलते रहना चाहता है। वह सुनता है, समझता है और छोटे छोटे वाक्य बनाकर अपनी बातें समझाना चाहता है, कभी तुतलाता है, तो कभी हकलाता है।

कितनी प्यारी लगती है, बच्चों की बोली ! है न, है न, है न, के बिना गाड़ी ही स्टार्ट नहीं होती। और एक बार गाड़ी स्टार्ट हुई तो फिर जिंदगी भर रुकने का नाम नहीं लेती। बातों से पेट नहीं भरता, लेकिन बात है कि हजम भी नहीं होती। ।

लेकिन अचानक क्या बात हो जाती है, कि कभी कभी बात ही नहीं बन पाती। कुछ बातें कही नहीं जाती, और कुछ बातें, कहे बिना रहा नहीं जाता। इंसान समझ ही नहीं पाता, जाएं तो जाएं कहां ! समझेगा, कौन यहां, दिल की जुबां।

कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो, हर बात पे रोना आया !

अचानक उसे लगता है, वह बहुत अकेला है। ।

उनको ये शिकायत है कि,

हम कुछ नहीं कहते।

अपनी तो ये आदत है कि

हम कुछ नहीं कहते।

लेकिन ऐसा होता क्यों है, क्योंकि कुछ कहने पे, तूफान उठा लेती है ये दुनिया। अब इस पे कयामत है कि, हम कुछ नहीं कहते।

यूं हसरतों के दाग, मुहब्बत में धो लिए। खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिए। होठों को सी चुके तो जमाने ने यूं कहा, यूं चुप सी क्यूं लगी है, अजी कुछ तो बोलिए। ।

बोलने से इंसान हल्का होता है, जब कोई नहीं सुनता, तो इंसान खुद को ही सुनाता है, कभी खुद से बात करता है, कभी आईने से। कभी रूमाल गीले करता है तो कभी कागज़ रंग देता है। कभी गज़ल, रुबाई, कविता, तो कभी महाकाव्य प्रकट हो जाता है।

हम वही सुनना चाहते हैं जो कर्णप्रिय हो। बच्चों की मीठी बातें, कोयल की कूक, सुर संगीत की तान, किसी का दुखड़ा, किसी की कर्कश आवाज, क्रोध और अपमान भरे शब्द कौन सुनना चाहेगा। ।

और आखिरकार उम्र का एक पड़ाव ऐसा भी आ जाता है कि आदमी अकेला पड़ जाता है ;

साथी ना कोई मंजिल

दीया है न कोई महफिल

चला मुझे लेके ऐ दिल

अकेला कहां …

और वह बेचारा कहता रह जाता है, बीती बातों का कुछ खयाल करो। कुछ तो बोलो, कुछ हमसे बात करो। तुम मुझे यूं भुला न पाओगे। ।

अपनी अपनी सभी कहना चाहते हैं, दूसरों की कोई सुनना नहीं चाहता, फिर भी एक अदृश्य श्रोता है, जो सबकी सुनता भी है, और सबको समझता भी है, बस उसे ही सुनाएं अपना हाले दिल, करें अपनी दास्तान बयान, वह सुनेगा, मन लगाकर सुनेगा, आपके अंदर बैठकर सुनेगा। उसके रहते कभी आप अकेले नहीं, असहाय नहीं, बेचारे नहीं।

सुनता है गुरु ज्ञानी ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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