हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४३ ☆ व्यंग्य – बाबाओं का स्वर्णकाल ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य  – ‘बाबाओं का स्वर्णकाल‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बाबाओं का स्वर्णकाल ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शिब्बू ऐसे ही दोस्तों के कहने पर बाबा के दरबार में चला गया था। दरबार में हज़ारों की भीड़ थी, महिलाएं संख्या में ज़्यादा। बाबा का प्रवचन चल रहा था। एक तरफ गायन-मंडली बैठी थी। बाबा प्रवचन के बीच में कोई धुन छेड़ देते और फिर गायन मंडली उसे उठा लेती। इस तरह बाबा को थोड़ी राहत मिल जाती थी।

बाबा की शोहरत कुछ दिनों में बड़ी तेज़ी से फैली थी। चर्चा थी कि वे  बड़े ज्ञानी थे। सब शंकाओं का समाधान कर देते थे। इसीलिए देर रात तक आश्रम में भक्तों की भीड़ बनी रहती थी।

शिब्बू और उसके दोस्त बाबा की गद्दी के पास ही बैठे थे। बाबा के दाढ़ी-मूंछ से ढंके चेहरे को देखते-देखते शिब्बू को लगा बाबा को उसने पहले देखा है। अचानक वह उठकर खड़ा हो गया, बाबा को संबोधन करके बोला, ‘आप तिरलोकी नाथ मासाब तो नहीं हैं?’

सवाल सुनकर बाबा का चेहरा उतर गया, संभल कर बोले, ‘अरे शिवदयाल, तुम यहां कैसे?’

शिब्बू बोला, ‘बस ऐसे ही दोस्तों के साथ आ गया।’

बाबा बोले, ‘इस सत्संग के बाद हमारे कक्ष में मिलना।’

सत्संग खत्म हुआ तो शिब्बू बाबा के कक्ष में पहुंचा। बाबा मसनद के सहारे उठंगे थे। शिब्बू उनके चरन छूकर बैठ गया। फिर पूछा, ‘आपने तीन साल मुझे स्कूल में पढ़ाया था। आप बाबा कैसे बन गये?’

बाबा कुछ असमंजस में दिखे, फिर बोले, ‘यह मेरा दूसरा जनम है। पिछला सब छोड़ दिया है।’

शिब्बू बोला, ‘आप तो अच्छा पढ़ाते थे, फिर यह बाबा बनने की बात कैसे आपके मन में आयी?’

बाबा कुछ देर आंखें बंद किये मौन बैठे रहे, फिर बोले, ‘एक घटना के बाद मेरा मन अचानक मास्टरी से उचट गया। हमारे क्षेत्र के मंत्री चमनलाल के पास एक दिन स्कूल के लिए अतिरिक्त फंड मंज़ूर कराने का प्रस्ताव लेकर गया था। मंत्री जी अपने चुनाव क्षेत्र का दौरा करके लौटे थे। सोफे पर लंबे लेटे थे। मुझे जानते थे लेकिन देख कर भी उठे नहीं। लेटे ही लेटे बात की। बीच-बीच में झपकी लेते रहे। मुझे बैठने को भी नहीं कहा। कहा कि आवेदन बाहर पीए को दे दूं। तीन चार दिन बाद स्थानीय अखबार में देखा कि वे एक बीस पच्चीस साल के बारहवीं पास बाबा के चरणों में औंधे पड़े हैं। बस तभी मास्टरी छोड़कर बाबा बनने का निश्चय कर लिया। हमारे पास इन बाबाओं से ज़्यादा ज्ञान है, बोलने की कला है, लेकिन ये अनपढ़ बाबा हमसे ज्यादा इज़्ज़त पाते हैं। यही ऐसा धंधा है जिसमें पैसा और सम्मान दोनों एक साथ मिलते हैं। जो बाबा भक्तों को माया से दूर रहने का उपदेश देते हैं वे खुद चार करोड़ की गाड़ी में घूमते हैं और पांच करोड़ का सोना शरीर पर पहनते हैं। पूछने पर जवाब मिलता है सब भक्तों का दिया हुआ है, उनकी नज़र में तो सोने और मिट्टी में कोई फर्क नहीं है। पुलिस वाले इन पर हाथ डालने से डरते हैं। इन पर आयकर लागू नहीं होता। मास्टर को देश की भावी पीढ़ी का निर्माता कहा जाता है, लेकिन समाज में बाबा ज़्यादा पुज रहे हैं। हमारी क्लास में बीस छात्र भी नहीं जुटते, इनके दरबार में लाखों जुटते हैं क्योंकि इनके अनुसार इनके पास आदमी के हर दु:ख की दवा मिलती है।

‘मास्टर से अपेक्षा की जाती है कि मेहनत से पढ़ाये और अच्छा रिज़ल्ट लाये। अच्छा रिज़ल्ट न लाने पर मास्टर को दंड मिलता है। लेकिन एक बाबा बिना पढ़े पास होने का नुस्खा बताते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। इन बाबा के हिसाब से पढ़ाई-लिखाई की कोई ज़रूरत नहीं है। यही बाबा भक्तों से पूछते हैं कि उन्हें रात में सफेद साड़ी और बड़ी बिन्दी वाली चुड़ैल दिखी थी या नहीं। एक बाबा सीधे रावण और हनुमान जी से बात करते हैं और अपने दरबार में प्रेतबाधा से ग्रस्त आदमी को बीस पच्चीस फीट दूर से थप्पड़ मारते हैं। आदमी भी उनके हाथ की हरकत के साथ ज़मीन पर लुढ़कता पुढ़कता है, जैसे कि बाबा का थप्पड़ उसे लग रहा हो। विडंबना यह है कि सैकड़ों उच्च शिक्षा प्राप्त लोग दरबार में हाजि़र होकर चुपचाप यह तमाशा देखते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और सेनाध्यक्ष उनके सामने सिर नवाते हैं। कई साल पहले उत्तर प्रदेश के एक बाबा भक्तों से कहते थे कि रात को उनके घर शिवजी आये थे, फिर पूछते थे कि क्या उन्होंने डमरू की आवाज़ सुनी थी, और भक्त एक स्वर में जवाब देते थे कि उन्होंने सुनी थी।

‘स्वतंत्रता के पचहत्तर साल बाद तरक्की यह हुई है कि बाबागीरी का विस्फोट हुआ है। रोज़ दस बीस बाबा पैदा हो रहे हैं। कोई जीभ निकाले दौड़ रहा है तो कोई आंखें फाड़े। एक युवा साध्वी दिखीं जो शरीर पर भभूत लपेटे थीं और भभूत को घिस घिस कर, उतारकर भक्तों में बांट रही थीं। संविधान के मूल कर्तव्यों में कहा गया है कि देश में वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, लेकिन वैज्ञानिक सोच कितना बढ़ रहा है यह सबके सामने है। ऐसे में बेचारा मास्टर बच्चों को क्या पढ़ाये?

‘बाबाओं के दरबार में शंका करने की इजाज़त नहीं होती। ज़्यादा सवाल पूछोगे तो भक्त लाठी लेकर दौड़ेंगे और शंकालु की कपाल-क्रिया हो जाएगी। बाबा स्त्रियों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि वे सवाल नहीं पूछतीं, बाबा जिस तरफ इशारा करे उधर ही सिर पर कलश रखकर चल पड़ती हैं।’

शिब्बू ने पूछा, ‘तो क्या आप अब बाबा ही बने रहेंगे?’

मासाब बोले, ‘हम धर्म का असली मर्म समझाने के लिए इस लाइन में आये हैं। अभी धर्म के नाम पर महज़ कर्मकांड और अंधानुकरण हो रहा है। हम तो कुछ अच्छा करने की कोशिश करेंगे, लेकिन देखना यह है कि ये धंधे वाले बाबा हमें कब तक टिकने देते हैं।’

—–

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२० – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य।)  

☆  चुभते तीर # १२० – व्यंग्य  – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

महानगरों का ट्रैफिक इंसान को अध्यात्म की ओर ले जाता है। जब आप तीन घंटे तक एक ही जगह पर खड़े होकर सामने वाली गाड़ी की नंबर प्लेट पढ़ रहे होते हैं, तो आपको जीवन की नश्वरता का अहसास होता है। हॉर्न बजाना यहाँ का राष्ट्रीय शगल है; लोगों को लगता है कि जितना तेज़ हॉर्न बजाएंगे, सामने वाली गाड़ी उतनी ही जल्दी गायब हो जाएगी। रेड लाइट पर हरा रंग होते ही पीछे से ऐसे हॉर्न बजते हैं मानो कोई एम्बुलेंस सीधे सीधे यमराज के घर जा रही हो। सड़कें इतनी गड्ढों से भरी हैं कि समझ नहीं आता कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा। सरकार हर साल टैक्स बढ़ाती है ताकि आपको और बेहतर तरीके से जाम में फंसने का अवसर मिल सके। इस ट्रैफिक में सिर्फ गाड़ियां ही नहीं रुकतीं, बल्कि इंसान का विकास भी रुक जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११९ – सोशल मीडिया पर दिखावा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆  चुभते तीर # ११९ – व्यंग्य  – सोशल मीडिया पर दिखावा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

अगर आप अपनी सुबह की चाय की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करते, तो माना जाएगा कि आपकी सुबह ही नहीं हुई। आज का इंसान हर पल को जीने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने में व्यस्त है। एक्सीडेंट हो जाए तो लोग एम्बुलेंस बुलाने से पहले रील्स बनाना शुरू कर देते हैं। ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ आज की नई मुद्रा हैं। जितने ज़्यादा लाइक्स, इंसान उतना ही सुखी। लोग महंगी गाड़ियों के सामने खड़े होकर इस तरह पोज़ देते हैं मानो वह गाड़ी उनके दादाजी वसीयत में छोड़ गए हों। फ़िल्टर्स ने चेहरों का भूगोल इतना बदल दिया है कि आधार कार्ड वाले भी अपनी असली पहचान भूल जाएं। विडंबना देखिए कि जिस इंसान के घर में कोई उससे बात नहीं करता, उसके सोशल मीडिया पर दस हज़ार ‘फॉलोअर्स’ हैं जो उसकी हर बकवास बात पर तालियाँ बजाते हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११८ – कॉरपोरेट मीटिंग्स की माया – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – कॉरपोरेट मीटिंग्स की माया)  

☆  चुभते तीर # ११८ – व्यंग्य  – कॉरपोरेट मीटिंग्स की माया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कॉरपोरेट जगत में काम करने से ज़्यादा ज़रूरी है काम करते हुए दिखना, और इसका सबसे बड़ा साधन है ‘मीटिंग’। एक तीन घंटे की मीटिंग का कुल निष्कर्ष यह होता है कि अगली मीटिंग कब होगी। मीटिंग में जो जितना भारी अंग्रेजी शब्द जैसे ‘सिनर्जी’, ‘पैराडाइम शिफ्ट’ या ‘लो-हैंगिंग फ्रूट’ बोलता है, उसे उतना ही बुद्धिमान माना जाता है। बॉस एक पीपीटी दिखाता है जिसमें ग्राफ हमेशा ऊपर की तरफ जा रहा होता है, भले ही असलियत में कंपनी डूब रही हो। कर्मचारी उस ग्राफ को देखकर इस तरह सिर हिलाते हैं मानो उन्हें साक्षात ईश्वर के दर्शन हो गए हों। सबसे मज़ेदार बात यह है कि जो काम एक साधारण ईमेल से हो सकता था, उसके लिए पंद्रह लोगों का कीमती समय बर्बाद किया जाता है, ताकि अंत में सब मिलकर समोसे खा सकें और एक-दूसरे को बधाई दे सकें।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३४ – हास्य-व्यंग्य – “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य-व्यंग्य  गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३४

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

यह तो सुना था कि गधों को पंजीरी खिलाई जाती है और वे बड़ी रुचि से इसे खा कर खिलाने वाले के वश में हो जाते हैं और उसके बताए अनुसार काम करने लगते हैं,  किन्तु यह पहली बार पता लगा कि गधों को गुलाब जामुन खिलने से भी वे मनोनुकूल परिणाम दिला सकते हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मानसून की बेरुखी और बारिश न होने से परेशान लोगों ने इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए गधों को गुलाब जामुन खिला कर अच्छी बारिश की कामना की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने गधों के माध्यम से इंद्र देव से झमाझम बारिश की प्रार्थना की। इससे आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि गधों की पहुंच कहां तक हो सकती है।

मुझे लगता है कि किसी की सत्ता को बनाए रखने में हमेशा गधों अर्थात विमूढ़ों (मूर्खो) का महत्वपूर्ण स्थान होता है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा है  –

सबसे भले विमूढ़,

जिन्हें न व्यापे जगत गति।

यों तो हर व्यक्ति के अंदर एक गधा छिपा रहता है जो अवसर आने पर प्रकट हो जाता है। महापंडित – ज्ञानी रावण का तो एक सिर ही गधे का प्रदर्शित किया जाता है। रावण के अंदर छिपे गधे ने ही उससे सीता हरण करवाया। उसके बाद भी वह उसके जीवन में अनेक बार प्रकट हुआ। रावण का अधिकांश दरबार गधों से भरा पड़ा था। लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठा हर व्यक्ति बुद्धिमान सहयोगियों से बचता है। बुद्धिमानों से उसे अपनी कुर्सी खतरे में नजर आने लगती है। सहयोगियों के रूप में हमेशा गधे उसकी पहली पसंद होते हैं। वह उन्हें पंजीरी अथवा गुलाब जामुन खिला कर संतुष्ट रखता है और उसकी सत्ता निर्विघ्न चलती रहती है। शायद इंद्र देव भी इसी नीति पर चलते हुए अनंत काल से देवराज बने बैठे हैं। इंद्रासन प्राप्त करने के लिए किसी बुद्धिजीवी  साधक के प्रयासों से इंद्रासन डोलने लगता है और इंद्र तत्काल एन – केन – प्रकारेण उसकी तपस्या अथवा प्रयत्नों पर पलीता लगाने अपने दरबार में शामिल गधत्व से भरे अपने सेवक – सेविकाओं को सक्रिय कर देते   हैं। मानव लोक में भी सत्ता पाने एवं सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए सत्ताधारी भी यही मंत्र अपनाते हैं। बुद्धिमानों से दूर रहो, पंजीरी खाकर खुश रहने वाले बुद्धि हीन, विचार हीन लोगों को सहयोगी बनाओ। … लेकिन ध्यान रहे कि जो आपकी नजरों में गधा या मूर्ख है वह स्वयं को मूर्ख नहीं अपितु आपके समकक्ष समझता है। अतः यदि आप मूर्खो का सहयोग लेकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो आपके मूर्ख साथियों को  कदापि यह आभास नहीं होना चाहिए कि आप उन्हें मूर्ख समझते हैं। नाराज होने पर मूर्ख याने गधे आपका खेल बिगाड़ सकते हैं, वे दुलत्ती झाड़ कर आपको आपके लक्ष्य से दूर फेंक सकते हैं।

अपना काम निकालने के लिए जहां तक संभव हो गधों  को पंजीरी रूपी रिश्वत देते रहें और उनके बेतुके (ढेंचू – ढेंचू) आलापों, प्रस्तावों, सुझावों की प्रशंसा करते रहें। ध्यान रखें बुद्धिमानों को अपने रंग में रंगने का प्रयास कभी सफल नहीं होता। जिसने गधों को अपना बना लिया वही बादशाह बन सकता है। “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” बीते युग की बात थी, आज सफलता का मूल मंत्र मूर्खम् शरणम् गच्छामि है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४२ ☆ व्यंग्य – शवयात्रा का इंतज़ाम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘शवयात्रा का इंतज़ाम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ शवयात्रा का इंतज़ाम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

भाई नटवरलाल 70 साल की उम्र तक राजनीति का आनन्द लेते रहे। तीन बार अंतरात्मा की पुकार पर दल बदले, लंबे समय तक मंत्री रहे, लेकिन अब कई साल से राजनीति के कबाड़खाने में थे। अब कोई पूछ-कदर नहीं थी, जानने वाले मुंह फेर कर निकल जाते थे।

भाई नटवरलाल जब मंत्री थे तब उनका बड़ा जलवा था। जहां भी वे भाषण देने जाते वहां भारी भीड़ जुटती। मेला लग जाता। दरअसल उस भीड़ का इंतज़ाम नटवरलाल खुद करते थे। पार्टी के कार्यकर्ताओं को कोटा बांध दिया जाता था कि कितने लोगों को हांक कर लाना है। रेट पांच सौ रुपये प्रति व्यक्ति और भोजन। बसें ज़बरदस्ती बुला ली जातीं। शिक्षकों को निर्देश देकर स्कूली बच्चों को लाकर कार्यक्रम में बैठा दिया जाता,  जहां बैठे वे  ऊंघते रहते। बदले में मिलता नाश्ते का पैकेट। कार्यक्रम का सारा खर्च पार्टी या समर्थकों पर मढ़ दिया जाता और भाई नटवरलाल राजनीति के सुख- सागर में गोते लगाते रहते।

लेकिन अब भाई नटवरलाल चिन्ताग्रस्त थे। चिन्ता यह थी कि जीते जी तो उन्होंने अपने कार्यक्रमों में खूब भीड़ जुटायी, लेकिन मरने के बाद उनकी शवयात्रा में भीड़ नहीं जुटी तो उनकी नाक कट जाएगी। ज़िन्दगी भर की कमाई एक पल में राख हो जाएगी। लोगों का कोई भरोसा नहीं, आदमी के पद से हटते ही उससे कन्नी काटने लगते हैं। अब उन्हें बीच-बीच में सपने में यमराज दिखने लगे थे, इसलिए चिन्ता और गहरी हो गयी थी।

परेशान, वे राजनीति के अपने बड़े भैया रौनक भाई के पास पहुंचे। उनसे अपनी आशंका बतायी, बोले, ‘दादा, डर लगता है कि मौत के बाद हम हीरो की जगह जीरो साबित न हो जाएं। ज़िंदगी भर अपने कार्यक्रमों में झूठी भीड़ खड़ी करते रहे। लगता है अब सारी लोकप्रियता की कलई खुल जाएगी। सोच सोच कर रात को नींद नहीं आती।’

रौनक भाई उनकी बात सुनकर हंसे, बोले, ‘क्या बात करते हो! अब ज़माना बदल गया है। ए आई का ज़माना है। अब ज़मीन पर भीड़ भले ही न जुटे, सोशल मीडिया में जितनी चाहो भीड़ दिख जाएगी। ज़मीन की भीड़ देखने कौन जाता है, सब घर में बैठे मीडिया की भीड़ देखते हैं। ईरान के अयातुल्लाह के जनाज़े में कितनी बड़ी भीड़ दिखी थी, उसे ज़मीन पर देखने तुम ईरान गये थे क्या? ‘बाहुबली’ फिल्म में जो शानदार नगर दिखाया गया था वह सब नकली, कंप्यूटर का कमाल था। ‘जुरासिक पार्क’ का ख़ूंख़्वार डायनासोर वास्तव में कहीं था ही नहीं, लेकिन उसे देखकर दर्शकों की हालत खराब हो गयी। तुम बिलकुल चिन्ता मत करो। हम तुम्हारी शवयात्रा में ऐसी भीड़ दिखाएंगे कि अयातुल्लाह के जनाज़े की भीड़ फीकी पड़ जाएगी।’

बड़े भैया से ऐसा आश्वस्तिदायक आश्वासन पाकर भाई नटवरलाल निश्चिंतता को प्राप्त हुए। विश्वास हो गया कि उनके स्वर्ग सिधारने के बाद भी उनकी नाक सलामत रहेगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११७ – शादी और वेडिंग प्लानर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – शादी और वेडिंग प्लानर)  

☆  चुभते तीर # ११७ – व्यंग्य  – शादी और वेडिंग प्लानर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

आजकल शादियां दो दिलों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों की फिक्स्ड डिपॉजिट का विसर्जन होती हैं। वेडिंग प्लानर नामक प्राणी के आने के बाद से दूल्हा-दुल्हन सिर्फ मूक दर्शक बनकर रह गए हैं। शादी में एंट्री ऐसी होनी चाहिए जैसे कोई अंतरिक्ष यात्री चांद पर उतर रहा हो। हल्दी की रस्म में सब पीले रंग के कपड़े पहनकर इस तरह बैठते हैं मानो पीलिया का कोई सामूहिक इलाज चल रहा हो। प्री-वेडिंग शूट के लिए जोड़ा ऐसी जगहों पर जाता है जहाँ उन्होंने कभी पैर भी न रखा हो। कैमरे के सामने नकली हंसी हंसते-हंसते दूल्हे के जबड़े दुखने लगते हैं। खाना इतना वैरायटी का होता है कि मेहमानों को समझ नहीं आता कि शुरुआत चाट से करें या जापानी सुशी से। अंत में, करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी फूफा जी सिर्फ इसलिए नाराज़ होकर चले जाते हैं क्योंकि उन्हें पनीर की सब्ज़ी में काजू कम मिले थे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११६ – न्यूज़ चैनलों का सर्कस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – न्यूज़ चैनलों का सर्कस)  

☆  चुभते तीर # ११६ – व्यंग्य  – न्यूज़ चैनलों का सर्कस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शाम के नौ बजते ही टीवी स्क्रीन एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो जाती है, जहाँ एंकर बिना किसी हथियार के सिर्फ अपनी आवाज़ से दर्शकों के कान के पर्दे फाड़ देता है। पैनल में दस लोग बैठे होते हैं, जिनमें से कोई किसी की बात नहीं सुनता, लेकिन सब चिल्ला रहे होते हैं। चाहे जो भी हो—देश की अर्थव्यवस्था हो या किसी अभिनेता की बिल्ली का खो जाना—बहस का स्तर हमेशा पाताल में ही रहता है। स्क्रीन पर लाल रंग की पट्टियाँ इस तरह चमकती हैं मानो तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका हो। ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के नाम पर आपको वह सब दिखाया जाता है जिसका आपके जीवन से कोई वास्ता नहीं है। सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि इसे ‘सूचना’ कहा जाता है। दो घंटे के इस शोर-शराबे के बाद दर्शक मानसिक रूप से इतना थक जाता है कि वह भूल जाता है कि वह क्या जानने के लिए टीवी के सामने बैठा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६४ ☆ व्यंग्य – “मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट…” ।)

☆ शेष कुशल # ६४ ☆

☆ व्यंग्य – “मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट – शांतिलाल जैन  

मेरी एक विनम्र सलाह है श्रीमान. अपने परिजनों से कह कर रखें कि आपका अंतिम समय जब भी आए तो आपका मृत्यु प्रमाणपत्र आपके सिरहाने रख दिया जाए. साथ में ले जाने में सुभीता रहे. ट्रेवल डॉक्यूमेंट है श्रीमान्, इहलोक से परलोक तक की यात्रा का वैध दस्तावेज. हालाँकि यह आपके आर्यावर्त के नागरिक होने का प्रमाण नहीं है, तब भी यात्रा के दौरान लगता है. क्या!! पासपोर्ट के बाबत नहीं सुना आपने? पासपोर्ट आपके नागरिक होने का प्रमाण नहीं है – ट्रेवल डॉक्यूमेंट है. मृत्यु प्रमाणपत्र में इतना तो लिखा है कि आप मरे हैं मगर यह नहीं लिखा कि आप आर्यावर्त के नागरिक के तौर पर मरे हैं.

क्या कहा आपने? मरने से पहले मरने का प्रमाणपत्र कैसे बनेगा? तो या तो आप बहुत भोले हैं या बेवकूफ़. रिश्वत के बाबत नहीं सुना आपने? इसे दिए जाने के बाद आप हर उस सज्जन का डेथ सर्टिफिकेट बनवा सकते हैं जो कभी जन्मा ही नहीं. प्रॉविजिनल डेथ सर्टिफिकेट भी बनवाकर रख सकते हैं – सब्जेक्ट टू बी इफेक्टिव फ्रॉम दी एक्चुअल टाईम ऑफ़ डेथ. मेरी बात को सिंसियरली लीजिए श्रीमान्, इस बार आप झूमरीतलैया तक नहीं जा रहे, बैकुंठधाम व्हाया अंतरिक्ष जा रहे हैं. वैतरणी पड़ेगी रास्ते में. हो सकता है डेथ सर्टिफिकेट के अभाव में कामधेनु पूँछ पकड़वाने से मना कर दे. कागज़ दिखाए बगैर वैतरणी पार नहीं कर पाएँगे आप.

अब आप पूछेंगे कि मुझे कैसे पता परलोक यात्रा के बारे में? तो मैं बताना चाहता हूँ कि मैं अभी अभी जाकर वापस आया हूँ. वापस क्या आया हूँ वापस भेज दिया गया हूँ.  वो तो अच्छा है मैंने अपना डेथ सर्टिफिकेट पहले से बनवाकर रखा था, रास्ते में दिक्कत नहीं आई. लेकिन पहुँचने पर मुझे बैकुंठधाम के दरवाजे से ही बैक-टू-पेवेलियन कर दिया गया. हालाँकि मेरे पास आधार कार्ड भी था. बोले – आधार केवल आपकी पहचान और पते का दस्तावेज़ है, नागरिकता का नहीं. बैकुंठ में प्रवेश की अनुमति आर्यावर्त के नागरिक शांतिलाल जैन वल्द मोतीलाल जैन, उम्र 66 वर्ष, हाल मुकाम उज्जैन के नाम की है. आपकी पहचान तो साबित हो रही है नागरिकता साबित नहीं होती. उसके बिना आप अंदर नहीं जा सकते.

‘हे देव, मैं आया नहीं हूँ, आपके प्रतिनिधि ही मुझे लाए हैं. क्या वे सिर्फ पहचान का प्रमाणपत्र देखकर लाते हैं?’

उन्होंने कहा – “नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी आपकी स्वयं की है.”

“हे देव, मेरे पास मतदाता पहचान पत्र भी है.”

वे बोले – “मतदाता पहचान पत्र सिर्फ मतदान करने का अनुमति पत्र है, नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है. आपने 2003 में वोट दिया था? यदि हाँ, तो विधान सभा क्रमांक, बूथ क्रमांक, वोटर सीरियल नंबर बताईए.”

“वो तो याद नहीं है.”

“तब तो कुछ नहीं हो सकता. “

“हे देव, मैंने अपना जन्म प्रमाणपत्र संभालकर रखा है. कुछ देर के लिए भैंसा दिलवा दें तो जाकर ले आता हूँ.”

“अकेले आपके जन्म प्रमाणपत्र से नहीं होगा. आपके माता-पिता का, उनके माता-पिता का, उनके भी माता-पिता का बर्थ सर्टिफिकेट लगेगा.”

“वो तो नहीं है हमारे पास.”

“तब तो आप आर्यावर्त के नागरिक नहीं हैं. जल्दी वापस निकल जाईए.”

“हे देव, मैं उस दुखियारी दुनिया में वापस जाना नहीं चाहता जहाँ मुझे बार-बार अपनी नागरिकता साबित करनी पड़े.”

देखिए बैकुंठधाम केवल आर्यावर्त के नागरिकों के लिए आरक्षित है. विवश होकर  हमें आपको डिटेंशन सेंटर में रखना पड़ेगा जो पहले ही भरा पड़ा है, पाँव रखने की भी जगह नहीं है. आप तुरंत लौट जाएँ – यही बेहतर होगा आपके लिए.

मरता क्या न करता!  बल्कि मरा हुआ क्या ही करता!! परिजनों को भनक लगे उससे पहले वापस आकर शरीर में दाख़िल हो गया हूँ और अब आपसे मुख़ातिब हूँ. नागरिकता किस डॉक्यूमेंट से साबित होती – यदि आपको पता तो मुझे अवश्य बताएँ – आभारी रहूँगा आपका.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११५ – आधुनिक डाइट और उपवास – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – आधुनिक डाइट और उपवास)  

☆  चुभते तीर # ११५ – व्यंग्य  – आधुनिक डाइट और उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

आजकल लोग वजन घटाने के लिए ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ करते हैं, जिसे हमारे पूर्वज साधारण शब्दों में ‘भूखा रहना’ कहते थे। पुराने ज़माने में उपवास में भगवान याद आते थे, आज के उपवास में केवल कैलोरी काउंटिंग ऐप याद आता है। इंसान चौबीस घंटे में से सोलह घंटे घड़ी देखता है कि कब खाने का समय होगा। जैसे ही खाने की खिड़की खुलती है, वह इस तरह टूट पड़ता है मानो अकाल पीड़ित हो। सलाद के नाम पर घास-फूस को इस तरह खाया जाता है जैसे वह कोई दिव्य जड़ी-बूटी हो। एवोकाडो और चिया सीड्स जैसी विदेशी चीज़ों ने हमारी रसोई पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। जो इंसान कल तक दो पराठे घी लगाकर खाता था, वह आज ग्रीन-टी पीकर खुद को संन्यासी घोषित कर रहा है। विडंबना देखिए, इस पूरी प्रक्रिया में वजन भले ही न घटे, लेकिन इंसान का मानसिक संतुलन और जेब का वजन ज़रूर घट जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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