हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६०☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ।)

☆ शेष कुशल # ६० ☆

☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ – शांतिलाल जैन 

आदाब, नमस्कार. खुशामदीद ख़वातीन-ओ-हज़रात. सुनो सुनो. सात समंदर पार का दर्दनाक किस्सा सुनो. चश्म-ए-नम कर देने वाला किस्सा सुनो. दिल चीर देने वाला किस्सा सुनो. सीना चाक न कर दे तो नाम बदल देना किस्सागो का.

यूँ तो सुने आपने अब तक किस्से बादशाहों के, शहंशाहों के, राजाओं के, महाराजाओं के, निज़ाम के, सियासी रहनुमाओं के. आज सुनिए आप किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ. एक रहे आए अंकल सैम, पढ़े लिखे अंकल सैम! सभ्य अंकल सैम! समृद्ध अंकल सैम! दुनिया के चौधरी अंकल सैम! पर्शिया में निज़ाम बदलवाने निकले अंकल सैम! असली मकसद तो तेल बेचना. तेल बेचने निकले अंकल सैम! तेल कब्ज़ाने निकले अंकल सैम! तेली नंबर-वन का मिशन लिए निकले अंकल सैम! क्रूर अंकल सैम! लालच में अंधे अंकल सैम! पर्शियन ख़वातीनों को आज़ाद कराने निकले, एक सौ पैसठ बच्चियों को फ़ानी दुनिया से आज़ाद करा बैठे.

वो कैसे किस्सागो ?

ख़वातीन-ओ-हज़रात, खुलुक खुदा का, मुलुक अंकल सैम का, हुकुम ट्रंप साहेब का. हुकुम हुआ मिसाईल चलाने का. टॉमहॉक चली तो गिरी जाकर मिनाब शहर के इलेमेंट्री स्कूल पर. अल्लाह को प्यारी हो गईं डेढ़ सैंकड़ा बच्चियाँ. न डॉलर जानती थीं न पेट्रो डॉलर. न टैरिफ न बेलेंस ऑफ़ पेमेंट. मरहूम बच्चियाँ. मासूम बच्चियाँ. अम्मी-अब्बू की उम्मीदों की बच्चियाँ. उनकी अँखियों की नूर बच्चियाँ. टूटे ख्वाबों की बच्चियाँ. उनके ख्वाबों में तालीम थी. ख्वाब टीचर बनने के. ख्वाब डॉक्टर बनने के. ख्वाब साइंटिस्ट बनने के. अम्मी जैसा घर बसाने के ख्वाब. अपने हिस्से की आधी दुनिया को खूबसूरत बनाने के ख्वाब. अंकल सैम की नफ़रत, हिंसा और क्रूरता से चूर चूर ख्वाब.

ख़वातीन-ओ-हज़रात,  बच्चियों से पुरानी दुश्मनी रही आई अंकल सैम की. एक्जोटिक आईलेंड पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ मुँह काला करके आए थे, छोटी छोटी बच्चियों के स्कूल पर मिसाईल दाग बैठे. चमड़ी का रंग सफ़ेद मगर हरकतों में मुँह काला, हाथ काले, काला ही ठहरा मन. चले थे शांति का नोबेल लेने, अबोध बालिकाओं का वध कर बैठे. मस्ती के मंज़र एपस्टीन की फाईल में, तबाही का मंज़र स्कूल के दालान में. अधजले दुपट्टे, अधखाए लंच बॉक्स, बिखरे स्कूल बेग, बिखरी पॉकेट मनी, खून से लथपथ होमवर्क की कॉपियाँ, कॉपियों में यहाँ वहाँ चितरी बे-तरतीब ड्राईंग, गुस्सैल टीचर के मुँह चिढ़ाते रेखाचित्र, जुगराफियों के तितर-बितर नक़्शे, नक्शों पर खीचीं सरहदें बदलने की ज़िद में चली टॉमहॉक मिसाईल. काँप उठी कायनात, बच्चियों की चीख से नहीं, खामोश जन्नत नशींनी से. 

हाँ तो ख़वातीन-ओ-हज़रात,  इसके बाद किस्से में रह ही क्या जाता है. अलबत्ता, जंग जारी है. जंग के किस्से ख़त्म नहीं होते… रुंध जाए गला किस्सागो का तो किस्से को विराम लेना ही होता है. अलविदा.

अरे!! रुको रुको किस्सागो, चश्म-ए-नम तो हमारी भी हैं मगर इतना तो बताते जाओ उसी समय जंबूद्वीप में क्या हुआ?

कुछ नहीं हुआ ख़वातीन-ओ-हज़रात. एक होर्डिंग खड़ा था वहाँ, अपने सीने पर बड़े बड़े हर्फ़ों में एक जागतिक नारा चस्पाँ किए – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’.  होर्डिंग ख़ामोश खड़ा रहा.

होर्डिंग अब भी ख़ामोश है.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२ – हास्य-व्यंग्य – “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२

☆ व्यंग्य ☆ “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

शिक्षक “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर” है। लोग मानते हैं कि शिक्षक से कुछ भी कराया जा सकता है। इसे यदि आप सम्मानजनक शब्दों में कहना चाहे तो शिक्षकों को सर्वगुण सम्पन्न भी कह सकते हैं। हमारे देश का सौभाग्य है कि चाहे यहां के पुराने राजा – महाराजा रहे हों अथवा आज के सरकारी प्रमुख सभी गुणों के पारखी होने के साथ साथ गुण ग्राहक भी हैं। इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने कॉलेजों के परिसरों में आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकने का जिम्मा प्राचार्यों को सौंप दिया है। 11 मार्च 26 को भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार “प्रदेश के सभी सरकारी और निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालय परिसरों में आवारा पशु और कुत्तों की एंट्री रोकने के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने निर्देश जारी किया हैं। कॉलेजों में प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जो परिसर की सुरक्षा करने और वहां आवारा पशुओं को रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि नोडल अधिकारी का नाम और मोबाइल नम्बर परिसर में प्रदर्शित किया जाए। जरूरत पड़ने पर स्थानीय निकायों से सहयोग लिया जाए। समाचार बड़ा है अंत में क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालकों को सभी कॉलेजों में इन निर्देशों के पालन की जांच कर रिपोर्ट भेजने के लिए कहा गया है। बताया गया कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एक प्रकरण में दिए गए निर्देशों के पालन में जारी किया गया है। लोग कहते हैं कि शिक्षक ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ? जो सभ्यता – संस्कृति, देश और सरकार तक को बना और बिगाड़ सकता है क्या वह कालेज और विश्वविद्यालय के परिसरों से आवारा पशुओं, कुत्तों को नहीं भगा सकता क्या ? यहां विचारणीय यह है कि आवारा पशुओं को परिसरों से किस विधि से भगाया जाए, परिसर में “पशुओं का प्रवेश वर्जित” लिखे पोस्टर लगाने या उन्हें सम्मान पूर्वक भगाने से तो वे नहीं भागेंगे। उन्हें हट – हट कहते हुए भगाया जाए, छड़ी या डंडा दिखाकर अथवा मारकर  भगाया जाए आखिर परिसर में अवैध घुसपैठ करने वाले पशुओं को कैसे भगाया जाए, इसका उल्लेख सरकारी निर्देश में नहीं किया गया है। कुछ कालेज प्राचार्य भयभीत हैं कि यदि वे अपने सोचे किसी तरीके से आवारा पशुओं को भगाते हैं और यदि वह तरीका उन आवारा पशुओं के पालकों, पशु प्रेमियों अथवा सरकार को पसंद नहीं आता तब क्या होगा ?

अतः कुछ कॉलेजों के प्राचार्य स्टाफ मीटिंग करके, कुछ प्राचार्य क्षेत्रीय समाजसेवियों – नेताओं से विचार विमर्श करके आवारा पशुओं को परिसरों से भगाने का सर्वमान्य तरीका खोजना चाह रहे हैं। सरकारी आदेशों – निर्देशों को अपने चातुर्य से लंबे समय तक लटकाए रखने में  माहिर एक प्राचार्य ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि वे इस सरकारी आदेश पर सरकार से यह मार्गदर्शन मांगने पत्र भेज रहे हैं कि आवारा पशुओं को भगाने के लिए कौन – कौन से उपाय किए जा सकते हैं। किसी प्रकार का विवाद होने की स्थिति में नोडल अधिकारी के पास क्या विशेषाधिकार होंगे आदि – आदि।

मैं यह लिख ही रहा था कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण संबंधी नगर पालिका निगम, जबलपुर के सहायक आयुक्त सह स्वास्थ्य अधिकारी का एक पत्र भी वाट्स एप पर देखने मिला। इसे पढ़कर लगा कि शायद सुप्रीम कोर्ट के डर से आवारा पशुओं, कुत्तों आदि पर नियंत्रण को लेकर शासन – प्रशासन की नींद खुल गई है। नगर निगम ने समस्त शासकीय – अशासकीय शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मेडिकल कॉलेज, खेल स्टेडियमों, बस स्टेंडों, रेलवे स्टेशनों आदि को आवारा पशुओं, कुत्तों से मुक्त रखने नोडल अधिकारी नियुक्त करने दिशा निर्देश जारी किए हैं। परिसरों की बाउंड्रीवाल बनवाने – सुधारने, गेट लगाने/सुधारने, साफ सफाई रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। तीन माह में नगर निगम कमेटी सभी जगह निरीक्षण करके सुनिश्चित करेगी कि सब ठीक चल रहा है। कुछ हो न हो बाउंड्रीवाल और गेट आदि बनवाने/ सुधरवाने के टेंडर तो हो ही जाएंगे। इसमें कमीशन बाजी का अंदेशा तो है ही। अब आगे तीन माह बाद तब लिखूंगा जब नगर निगम का एक निरीक्षण हो जाएगा।

यहां एक बात और विचारणीय है कि जब इन परिसरों में आराम फरमा रहे आवारा पशुओं को सड़कों पर खदेड़ा जाएगा तब राहगीरों की सुरक्षा का क्या होगा। पुलिस आवारा पशुओं का चालान कटेगी क्या ?

 

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२७ ☆ व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ भुल्लन भैया की मूर्ति

हमारे शहर के रत्न भुल्लन भैया जन-जन के हृदय में निवास करते रहे। दो बार भारी बहुमत से एमैले का चुनाव जीते। चुनाव के समय दारू, कंबल, पैसे का मुक्त-हस्त से वितरण करते थे।उसके बाद भी कोई विरोध करे तो हाथ में डंडा या जूता धारण कर नये अवतार में प्रकट होते थे। उनके चेलों-चांटों की संख्या विशाल रही। पार्टी में ऊपर तक उनकी रसाई थी।

एक रात मित्रों के साथ ‘गीली’ पार्टी में हिस्सा लेकर लौटते भुल्लन भैया की कार एक नाले में प्रवेश कर गयी। ड्राइव करने वाला उनका मित्र भी सुरा के सुरौधे में था। परिणामत: दोनों ही स्वर्ग या नरक की राह पर निकल गये।

शहर में खबर फैलते ही खलबली मच गयी। बड़े-बड़े नेता भुल्लन भैया के संभावनाशील सुपुत्र लल्लन को धीरज बंधाने आने लगे। लल्लन भैया हिलक हिलक कर कहते थे, ‘ऐसे बिना बोले बताये चले गये। हम कुछ सेवा नहीं कर पाये।’ भुल्लन भैया के क्रिया-कर्म में भारी भीड़ उमड़ी। कई चेले आंसू बहाते और सस्वर विलाप करते देखे गये।

चुनाव-क्षेत्र में स्वर्गीय भुल्लन भैया का असर देखकर पार्टी ने लल्लन भैया को उनके पिताजी के स्थान पर स्थापित करने के प्रयास शुरू कर दिये। जल्दी ही लल्लन भैया में भी उनके स्वर्गवासी या नरकवासी पिता के गुण प्रकट होने लगे। मुहल्ले में उनकी अघोषित सल्तनत कायम हो गयी।

पिताजी के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करने के लिए लल्लन भैया ने जल्दी ही घोषणा की कि पास के चौराहे पर स्वर्ग या नरक वासी उनके पिताजी की विशाल मूर्ति लगेगी। धन्नासेठों से चन्दा इकट्ठा होने लगा। अपने रसूख और ताकत का इस्तेमाल कर लल्लन भैया ने जल्दी ही इतना धन इकट्ठा कर लिया जो मूर्ति के अलावा उनके चुनाव अभियान और दीगर खर्चों में काम आ सके। राजस्थान के एक कलाकार को मूर्ति का ऑर्डर दे दिया गया।

तीन-चार महीने में मूर्ति बनकर आ गयी। लल्लन भैया ने उसे चौराहे पर ऊंचे आधार पर स्थापित करवा दिया। मूर्ति के नीचे आठ दस पंक्तियों में भुल्लन भैया के गुणों और उपलब्धियों का बखान कर दिया गया। सिर्फ एक तरफ का पत्थर खाली रहा जिस पर मूर्ति के अनावरण का ब्यौरा और तारीख लिखी जानी थी। इसके बाद अनावरण के इंतज़ार में मूर्ति को पूरी तरह कपड़े से ढंक दिया गया।

इसके बाद लल्लन भैया अड़ गये कि उनके यशस्वी पिता की मूर्ति का अनावरण ‘राश्टपति’ या ‘उपराश्टपति’ के कर-कमलों से होगा, अन्यथा मूर्ति ऐसे ही ढंकी-मुंदी खड़ी रहेगी। नगर के सांसद महोदय को चेतावनी दे दी गयी कि उपरोक्त विभूतियों को बुलाने का इंतज़ाम करें, अन्यथा स्वर्गीय भुल्लन भैया के चुनाव-क्षेत्र में पार्टी के लिए सूखा पड़ जाए तो लल्लन भैया को दोष न दिया जाए। सांसद महोदय सांसत में पड़ गये। दिल्ली तक फोन बजने लगे। अंततः सांसद महोदय उपराष्ट्रपति जी की मंज़ूरी लेने में सफल हो गये।

उपराष्ट्रपति जी पधारे। अनावरण का कार्यक्रम शानदार संपन्न हुआ। लल्लन भैया फूले फूले घूमते थे। कार्यक्रम में उन्होंने एक पढ़े- लिखे दोस्त से लिखवाया हुआ स्वागत-भाषण पढ़ा, लेकिन पढ़ने में उनकी गाड़ी वैसे ही अटकने लगी जैसे किसी मोटर के आगे गड्ढे आने से अटकती है। उन्होंने दांत-दर्द का बहाना करके भाषण का कागज उसे लिखने वाले दोस्त को ही पकड़ा दिया। बाद में उन्होंने दोस्त को उलाहना दिया— ‘जरा ढंग का लिखते जो हम पढ़ सकते। इतने बड़े लोगों के सामने हमारी ‘इंसल्ट’ करा दी।’

अनावरण संपन्न हो गया। उपराष्ट्रपति जी के कार्यक्रम पर करदाता के कुल दो-तीन करोड़ खर्च हुए, जिसका लल्लन भैया गर्व से बखान करते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२६ ☆ व्यंग्य – मिलावट-प्रधान देश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मिलावट-प्रधान देश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मिलावट-प्रधान देश डॉ कुंदन सिंह परिहार

हमारा देश धर्म-प्रधान होने के साथ-साथ मिलावट-प्रधान भी है। यह कहना मुश्किल है कि वह धर्म-प्रधान ज़्यादा है या मिलावट-प्रधान, क्योंकि यहां करीब-करीब हर चीज़ में मिलावट होती है। मिलावट का हाल यह है कि अब शुद्ध आदमी मिलना मुश्किल हो गया है। मिलावट करने वाले पूरी निष्ठा और समर्पण-भाव से अपने काम में लगे हैं। उनके काम की निपुणता और सफाई देखकर आश्चर्य होता है। मजाल है आदमी असली नकली में भेद कर पाये। मिलावट के मामले में उनके नये-नये प्रयोग देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं।

यहां मिलावट का आलम यह है कि शुद्ध चीज़ मिलना सौभाग्य की बात मानी जाती है। बाहरी उपयोग की चीज़ें छोड़ दीजिए, जो चीज़ें शरीर के भीतर जाती हैं उन्हें भी बख्शा नहीं जाता। दाल, चावल, मसाला, घी, खोया, मिठाइयां, दवाएं, फल, सब्ज़ियां, ईनो, आटा, बेसन, दूध, मक्खन, पनीर, सरसों, शराब, जीरा, हल्दी, सब में पूरे सेवा- भाव से मिलावट की जा रही है। नकली दवाओं का मतलब समाज के लिए क्या होता है यह समझा जा सकता है। कहीं पढ़ा कि अंडे भी मिलावटी हो रहे हैं, यद्यपि मेरे लिए समझ पाना मुश्किल है कि नकली अंडे कैसे होते होंगे।

चावल में कंकड़, मसाले में बुरादा, हल्दी में पीली मिट्टी मिलना आम है। नकली दवाओं का बाज़ार अरबों का है। अभी नकली कफ़ सीरप पीकर इंदौर में कई बच्चे काल-कवलित हुए। निम्न वर्ग के शराबी हर साल मिलावटी शराब पीकर मरते हैं।

फलों और सब्ज़ियों को कार्बाइड की मदद से जल्दी पकाया और तैयार किया जाता है, लेकिन कार्बाइड मनुष्य-शरीर के लिए बहुत हानिकारक है। चने भी नकली होने की ख़बर पढ़ी। मिट्टी से बनने वाले सीमेंट के बारे में भी पढ़ा।

हाल ही में राज्यसभा में एक सदस्य ने वक्तव्य  दिया कि जांच में दूध के 71% नमूनों में यूरिया और 64% में न्यूट्रलाइज़र पाये गये, जबकि कुल  खाद्य नमूनों में 25% मिलावटी निकले। यह भी बताया गया कि गर्म मसाले में ईंट और लकड़ी का बुरादा, चाय में सिंथेटिक रंग, शहद में शुगर सीरप और मिठाइयों में देसी घी की जगह वनस्पति की मिलावट पायी गयी।

हमारे देश में नकली डिग्री, नकली आधार कार्ड, नकली प्रमाण-पत्र उपलब्ध होना मुश्किल नहीं है, बशर्ते कि आप जोखिम लेने को तैयार हों। कई नेताओं की झूठी डिग्री पर प्रश्न उठते रहे हैं। नकली नोट छापने वालों की सक्रियता के प्रमाण जब-तब मिलते रहते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ नकल के धंधे का एक नया रूप है, जिसमें कई लोगों को करोड़ों रुपयों का चूना लग चुका है।

सबसे ताज़ा ख़बर यह पढ़ी कि जूते भी नकली बन रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि नकली जूतों में क्या नकली होगा। शायद ये पहनने के अलावा दूसरे काम के लिए बन रहे होंगे। शायद नकली जूतों के प्रहार से आदमी की इज़्ज़त कम ख़राब होगी।

बाबा रामदेव के गाय के घी के बारे में पढ़ा कि वह दो प्रयोगशालाओं में जांच में खाने योग्य नहीं पाया गया। उनके मिर्च पाउडर की गुणवत्ता का मामला भी संसद में उठाया गया था।

आदमी भी अब खरा नहीं रहा। मुंह पर कुछ बोलता है, मन में कुछ और रचता है।टेक्नोलॉजी के विकास के साथ स्वार्थपरता और संकीर्णता बढ़ रही है, रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं, सुविधाओं का मोह बढ़ रहा है। नतीजतन आदमी अपने आप में सिमटता जा रहा है, टापू होता जा रहा है। इसीलिए शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखा— ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।’

मैं यह सोच सोच कर परेशान हूं कि कई नेता और धर्मगुरु धार्मिक एकता की बातें करते हैं, दूसरे धर्म वालों को अपने से कमतर समझते हैं, लेकिन धार्मिक एकता में ये मिलावट के लिए समर्पित हुनरमंद लोग कहां ‘फिट’ होंगे? क्या धार्मिक एकता के लिए ये मिलावटखोर मिलावट करना छोड़ देंगे? क्या इनका हृदय-परिवर्तन हो जाएगा? क्या ये आसानी से मिल रहे बड़े मुनाफे का लालच छोड़ देंगे? फिलहाल तो ये अपने धर्म वालों का ही मुंडन कर रहे हैं।

हम गज़ा में सत्तर हज़ार निर्दोष लोगों की मौत पर सिहरते हैं, दुखी होते हैं, लेकिन हमारे देश में सीधे हत्या के बजाय धीमे ज़हर के द्वारा करोड़ों की ‘स्लो डेथ’ का इंतज़ाम है। हम बाकी मामलों में भले ही विश्वगुरु न बन पायें, मिलावट के मामले में हमारे विश्वगुरु होने में कोई संदेह नहीं हो सकता। अन्य देश आयें और हमसे उपयोगी शिक्षा ग्रहण करें।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य  – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

मनुष्य के जीवन में ‘संकल्प’ और ‘समोसे’ का वही रिश्ता है जो चूहे और बिल्ली का होता है। आप कितनी भी बड़ी ‘डाइट कंट्रोल’ की दीवार खड़ी कर लें, एक गरम समोसा उस दीवार के नीचे से ‘सुरंग’ बनाकर आपके आत्मबल को धराशायी कर देता है। हमारे मित्र ‘गजाधर बाबू’ ने जब से डॉक्टर की यह बात सुनी कि उनका शरीर अब ‘इंसानी शरीर’ कम और ‘फैट का गोदाम’ ज्यादा लग रहा है, उन्होंने ‘डाइट’ का भीषण व्रत ले लिया।

गजाधर बाबू ने घोषणा कर दी कि अब वे केवल ‘घास-फूस’ यानी सलाद पर जीवित रहेंगे। उनके डाइनिंग टेबल पर अब खीरे, ककड़ी और उबली हुई लौकी का साम्राज्य था। वे इन चीजों को ऐसे देखते थे जैसे कोई मुजरिम अपनी हथकड़ियों को देखता है। श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहें तो, गजाधर बाबू का यह त्याग वैसा ही था जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी रिटायरमेंट के बाद ‘सत्य और अहिंसा’ पर प्रवचन देने लगे।

लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम गजाधर बाबू दफ्तर से लौट रहे थे। रास्ते में ‘मुन्ना हलवाई’ की दुकान थी। मुन्ना हलवाई के यहाँ समोसे तलने की क्रिया किसी ‘यज्ञ’ से कम नहीं होती। कड़ाही में खौलता हुआ तेल, और उसमें गोते खाते हुए सुडौल समोसे—जैसे स्वर्ग की अप्सराएँ अमृत कुंड में स्नान कर रही हों।

समोसे की वह सोंधी खुशबू जब गजाधर बाबू की नासिकाओं से टकराई, तो उनके ‘डाइट संकल्प’ के फेफड़े फूलने लगे। उनका मन चिल्लाया— “भाग गजाधर, ये मायाजाल है!” पर उनका पेट पलटकर बोला— “अबे रुक! देख तो सही, आलू का वो श्रृंगार, मसालों की वो जुगलबंदी!”

गजाधर बाबू दुकान के सामने ऐसे ठिठक कर खड़े हो गए जैसे कोई सन्यासी अपनी पुरानी प्रेमिका को देख ले। उन्होंने सोचा, “एक समोसे से क्या होगा? न्यूटन ने भी तो कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, तो एक समोसे की प्रतिक्रिया में मैं कल दो किलोमीटर ज्यादा चल लूँगा।” यह वह तर्क है जो दुनिया का हर डाइट करने वाला इंसान खुद को ‘बेवकूफ’ बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।

वे दुकान के करीब पहुँचे। समोसा एकदम गरम था, उसकी पपड़ी ऐसी कुरकुरी कि छूने मात्र से ‘साहित्यिक संगीत’ पैदा हो। गजाधर बाबू ने समोसे को हाथ में लिया। वह उनके हाथ में ऐसे थिरक रहा था जैसे कोई नवजात शिशु। उन्होंने उसे चटनी में डुबोया—हरी चटनी यानी तीखा प्रहार और लाल चटनी यानी मीठा धोखा।

जैसे ही उन्होंने पहला निवाला लिया, उन्हें लगा कि उनके भीतर की ‘कैलोरी’ पुलिस ने हड़ताल कर दी है और ‘कोलेस्ट्रॉल’ के गुंडे जश्न मनाने लगे हैं। स्वाद ऐसा कि उन्हें लगा जैसे मोक्ष का द्वार उनके तालू में खुल गया है।

गजाधर बाबू अभी दूसरे समोसे पर हाथ साफ़ कर ही रहे थे कि अचानक उनके पीछे एक परिचित आवाज़ गूँजी— “अरे गजाधर भाई! ये क्या? आप तो कह रहे थे कि अब आप केवल उबला हुआ पानी और हवा खाकर जिएंगे?”

पीछे उनके डॉक्टर खड़े थे, जो खुद हाथ में ‘जलेबी’ का दोना थामे हुए थे। गजाधर बाबू का समोसा उनके हाथ में ही जम गया। वे हड़बड़ाए, पर हार मानने वाले कहाँ थे।

गजाधर बाबू ने बड़ी गंभीरता से कहा, “अरे डॉक्टर साहब, आप गलत समझ रहे हैं। दरअसल मैं तो इस समोसे का ‘पोस्टमार्टम’ कर रहा था। मैं देख रहा था कि मुन्ना हलवाई इसमें कितना ‘हानिकारक’ फैट डालता है, ताकि मैं कल सुबह ग्रुप में सबको इसके नुकसान बता सकूँ। और आप? आप ये जलेबी क्यों ले रहे हैं?”

डॉक्टर साहब ने भी बिना पलक झपकाए जवाब दिया, “मैं? मैं तो इस जलेबी की ‘कुंडली’ चेक कर रहा था कि आखिर ये इतनी टेढ़ी क्यों होती है! विज्ञान के लिए बलिदान देना पड़ता है गजाधर बाबू!” अब दोनों ‘विज्ञानी’ एक-दूसरे की चोरी पर हाथ मिला चुके थे और मुन्ना हलवाई सोच रहा था कि अगर ये दोनों वैज्ञानिक हैं, तो फिर ‘पागल’ कौन है!

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२ – व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२

☆ व्यंग्य – बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।

“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”

हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”

बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”

“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।

सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।

सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।

अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।

सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।

बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।

उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।

—– 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

29-01- 2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – हास्य – व्यंग्य ☆ अरी भागवान – क्यों लाल पीली हो रही हो…? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ अरी भागवान – क्यों लाल पीली हो रही हो…? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

-अरे अरे,ये क्या ले आये ? धनिया, पालक,चुकंदर, मेहंदी, अनार, पलाश — मैंने तो रंग- गुलाल लाने कहा था।

— रंग ही तो लाया हूँ। ध्यान से देखो —

हुस्न रंगीन है न सादा है

बस अपनी अपनी निगाह होती है

— मेरी निगाह दुरुस्त है। मजाक ऐसा भी करते हैं क्या।

— मैं तो होली के मूड में हूं। मजाक तो शेयर मार्केट जनता के अरमानों से कर रहा है। धम्म धड़ाम धड़ाम धप्प–!

— तुम्हें ना हर बात में राजनीति का रंग पोतने की आदत है।आज तो बख्श़ दो।नेता क्यों नहीं बन जाते ?

— कैसे बनूँ।ईमानदार हूँ।

— आप ही बताओ अब टोटो को क्या जवाब दूँ।वो कब से इंतज़ार कर रहा है।

— ऐसे कहो ना।तुम्हें सिंथेटिक रंग चाहिए।

— और क्या !जो जमाना कर रहा है उससे अलग चलकर क्या बताना चाहते हो ?

तुम मुझे किम जोंग तो नहीं कह रही हो।

— लगता है तीर निशाने पर लगा है।

और ये कोकोनट ऑइल और क्रीम किसलिए?

— छोड़ो भागवान।बहुत कुछ तुम्हारे बस का नहीं है।चलो पुराने कपड़े निकाल दो।

— ‘सारे होलीयाने मौसम का कचरा कर दिया।तुम कब सुधरोगे ?

— जब ट्रंप सुधरेंगे।ही ही ही ही

तुम खुद को जेलेंस्की समझ रही हो क्या ?

— नहीं मैं जार्जिया मेलोनी समझूं, तुम्हें क्या !

एक और पैकेट है।दही और बेसन।चालीस में ही सठिया गये हो लगता है।हे भगवान।तुम्हें क्या हो गया है।

— मुझे रंगरोग हो गया हो।तुम समझती क्यों नहीं।

— ‘तो समझाओ ना

— आओ ना। थोड़ा और करीब आओ। नज़र तो मिलाओ।

— लगता है रोमांस की भाँग चढ़ गयी है।

— एक दिन तो रंगीन होने दो। यह पति का संवैधानिक मूलभूत अधिकार है। सरकारें आयेंगी जायेंगी पर इसमें अमेंडमेंट नहीं होने वाला।

— पड़ोसन आ रही है।

— आने दो।काहे का डर है।बाली उमर है।

— तुमसे तो बात ही करना बेकार है।

— तो चीत करो ना।बातचीत बन जायेगी।

— देखो डार्लिंग। अब काम की बात करें। रासायनिक रंगों से तौबा करो। इनसे कैंसर, अंधत्व और त्वचा रोग का खतरा रहता है।

रंग खेलने से पहले धूप का चश्मा लगाओ। रंग न छूटे तो दही बेसन का लेप लगाओ।

— हां जी सच कहते हो हर्बल रंगों का ही उपयोग करना चाहिए

— ‘अरे अरे अरे– ये क्या तुमने तो टेसू के रंग से रंग डाला।

— खुद को फन्ने खाँ समझते हो। मैं पहले ही टेसू उबाल चुक थी।

ही ही ही ही।नहले पे दहला।

बुरा न मानो होली है। होली है भई होली है। कबीरा सर र र, सर र र।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – हास्य-व्यंग्य ☆ सौम्य, सरल, सर्वप्रिय! ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 हास्य-व्यंग्य – सौम्य, सरल, सर्वप्रिय! 🌷

वाटिका में भ्रमण के उपरांत, देवी अपनी सखी के संग, प्रासाद के प्रवेश द्वार पर पहुँची ही थीं कि दृष्टि ठिठक गई। यह क्या! द्वारपाल के बगल में साक्षात् नारद मुनि, अपनी वीणा हाथों में थामे, विराजमान हैं। मुख पर वही शाश्वत मुस्कान, जैसे युगों से समस्त लोकों का रहस्य जानकर भी निष्पाप बने हों।

“नारायण, नारायण! एक लघु निवेदन है,” उन्होंने वीणा के तारों को हलके से झंकृत करते हुए कहा, “संध्याकाल में भीतर देवियाँ गोष्ठी करती हैं। अति आनंददायक! हास्य, विनोद, रस-परिहास—सब कुछ। आपकी भी उपस्थिति प्रार्थनीय है। अवश्य पधारें!”

वीणा के स्वरों ने मानो आकाश में अदृश्य कमल खिला दिए। वे स्वर ऐसे थे कि वायु भी ठिठककर सुनने लगे। देवियों के हृदय में उनके स्मरण का एक कोमल कक्ष निर्मित हो गया—जहाँ वे प्रतिदिन संध्या से पूर्व जाकर विराजते।

संध्याकाल में वे गोष्ठी स्थल के आसपास अपनी वीणा के तार झंकृत करते दृष्टिगोचर होते। कभी किसी की आरती की थाली सँभाल देते, कभी किसी की पायल का टूटा घुँघरू जोड़ देते। संरक्षण का ऐसा भाव कि मानो स्वयं त्रिलोक के अभिभावक हों। देवियाँ उनके इस सौजन्य से अभिभूत रहतीं—“देखो, कितने सज्जन हैं! कितने सरल!”

और वे, अत्यंत विनीत भाव से, थोड़ी दूरी पर खड़े रहकर भी सबके निकट बने रहते—जैसे चन्द्रमा, जो स्पर्श तो नहीं करता, पर प्रकाश से सबको अपने घेरे में ले लेता है।

महाशिवरात्रि का पर्व निकट आया। पुनः वही मधुर मुस्कान, वही सम्मोहन।

“शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में अति सुंदर आयोजन है। अवश्य पधारें, महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करें,” उन्होंने कहा।

उत्सव की संध्या पर वे भोले बाबा-सी अलमस्त चाल में चहुं दिशा विचरते रहे। कहीं दीपक प्रज्वलित करा रहे हैं, कहीं भस्म का तिलक लगा रहे हैं। देवियाँ श्रद्धा से गदगद। कोई कहे—“क्या तपस्वी पुरुष हैं!” कोई कहे—“कितने सजग, कितने सतर्क!”

किंतु अद्भुत यह कि जहाँ-जहाँ देवियाँ एकत्र हों, वहीं-वहीं वे अनायास प्रकट हो जाते—जैसे वसंत की हवा, जिसे किसी ने बुलाया न हो, फिर भी वह आ ही जाती है।

और आज—होली का दिवस।

वह कृष्ण-कन्हैया मुद्रा में हैं। अधर पर मुरली, नेत्रों में अर्धनिमीलित करुणा और चपलता का संगम। गोपिकाएँ उन्हें घेरे हुए हैं। गुलाल और पुष्पों की वर्षा हो रही है। वातावरण में रंगों का ऐसा जादू कि स्वयं इन्द्रधनुष भी ईर्ष्या से फीका पड़े।

उनकी सौम्यता आज भी अक्षुण्ण है। मुख पर वही सहजता, मानो कुछ हुआ ही न हो। परन्तु रंग की एक महीन परत उनके वस्त्रों पर नहीं, उनके चारों ओर फैली प्रतिष्ठा पर भी चढ़ती प्रतीत होती है।

आँखें मूँदकर, वे मन ही मन गुनगुना रहे हैं—

“रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे…”

वीणा के तार जैसे स्वयं ही थिरक उठते हैं।

देवियाँ हँसती हैं, इठलाती हैं, उन्हें और रंगती हैं। और वे—सबके प्रिय, सबके हितैषी, सबके ‘अपने’—रंगों के इस महासमर में भी अदृश्य मर्यादा की रेखा खींचे रहते हैं, जिसे कोई देख नहीं पाता, पर सभी मानते अवश्य हैं।

लोक-लाज के आँगन में, भलमनसाहत की ओट में, उनका यह चिर-परिचित चरित्र यूँ ही विचरता रहता है—

सौम्य, सरल, सर्वप्रिय।

(बुरा न मानो, होली है!)

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२५ ☆ व्यंग्य – विदेश का गड़बड़झाला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘विदेश का गड़बड़झाला‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विदेश का गड़बड़झाला   

ऑस्ट्रेलिया से एक भारतीय लड़की ने वीडियो डाला। लड़की ने वहां के सिस्टम के बारे में जो बताया उसे सुनकर बहुत परेशान हूं। बताया कि  वहां भुगतान मेहनत के हिसाब से मिलता है, शैक्षणिक योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं। एक घंटे के श्रम के 25 डॉलर मिल जाते हैं और आदमी दिन में कम से कम 50 डॉलर कमा ही लेता है।

लड़की ने यह भी बताया कि वहां सबसे ज़्यादा भुगतान शारीरिक श्रम करने वालों— जैसे प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, खदान श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों— को मिलता है। इन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ का नाम दिया जाता है, और समाज में सबको बराबर सम्मान मिलता है, कोई ऊंचा नीचा का भेद नहीं।

लड़की की बात सुनकर दिमाग ख़राब हो गया। यह कैसा देश है, भाई, जहां पांचों उंगलियों को बराबर माना जाता है। हमारे देश में ऐसा हो जाए तो हाहाकार मच जाए। फिर जाति- प्रथा का मतलब ही क्या रह जाएगा? ऑस्ट्रेलिया में जिन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ कह कर अच्छा वेतन देते हैं उन्हें यहां दिन में चार-पांच सौ कमाने में देवता याद आ जाते हैं। समाज में इज़्ज़त पाने की बात करें तो  देश में इन ‘प्रोफेशनल्स’ को कोई बैठने के लिए स्टूल नहीं देता, कुर्सी की बात छोड़ दीजिए। ज़्यादातर को शस्य श्यामला भूमि पर ही आसन मिलता है। ‘डिगनिटी ऑफ लेबर’ यानी श्रम की प्रतिष्ठा का यह हाल है कि बड़ा आदमी वही माना जाता है जो अपने हाथ से लेकर पानी भी न पिये।

ऑस्ट्रेलिया जैसा किस्सा न्यूज़ीलैंड का भी सुनने को मिला था जहां मेरे एक परिचित प्रोफेसर किसी अध्ययन के लिए गये थे। वहां उनके दफ्तर में सफाई कर्मी आता था जिसे ‘जेनिटर’ कहते थे। जब प्रोफेसर साहब के भारत लौटने का वक्त आया तो जेनिटर ने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया और शाम को उन्हें अपनी कार से घर ले गया। वहां उनके लिए विशेष तौर से शाकाहारी भोजन तैयार कराया गया था। मैंने सोचा कि यदि भारत में कोई सफाई कर्मचारी हमें भोजन के लिए आमंत्रित करे तो हम उस आमंत्रण से बचने की कोशिश करेंगे। सोचेंगे कि इस बंदे के पास खुद के खाने को है या नहीं, या हमें ऐसे ही न्योत रहा है। लगेगा कि उसका दिमाग़ चल गया है।

हमारे यहां सबसे अधिक पैसा उन्हें मिलता है जो कम से कम श्रम करते हैं। कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों का भुगतान लाखों में होता है, लेकिन काम का आकलन कोई नहीं। इसीलिए मोटापे और उच्च रक्तचाप का रोना आम है। शारीरिक श्रम करने वाले का जीवन एक-एक दिन के हिसाब से चलता है। कल का कोई भरोसा नहीं। कभी एक अधिकारी के बारे में सुना था जिन्होंने अपना एक कोट कुर्सी पर स्थायी रूप से टांग दिया था। वे खुद दफ्तर से ग़ायब रहते थे, लेकिन किसी के पूछने पर कोट की तरफ इशारा कर दिया जाता था कि ‘यहीं कहीं गये हैं।’ ऐसे ही नौकरी करते-करते वे वैतरणी पार कर गये।

कुर्सी की शोभा बढ़ाने वालों को तनख्वाह के अलावा एक और भत्ता मिलता है जिसे रिश्वत-कम-कमीशन भत्ता कहते हैं। जितना बड़ा और ताकतवर पद, उतना ही ज़्यादा रिश्वत-भत्ता। कई अफसर हर सरकार के प्रियपात्र बने रहते हैं तो कई हर सरकार की आंख में चुभते हैं। हरियाणा में आई. ए. एस. खेमका जी हर छः महीने में ट्रांसफर झेलते अंततः रिटायर हो गये। उनके रिटायर होने पर बहुतों ने राहत की सांस ली होगी।

दूसरी तरफ, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक को पूरी मज़दूरी मिल जाए, वही बहुत है। उसमें भी ठेकेदार का कमीशन कटता है। बिना सुरक्षा- उपकरण के कहीं बिजली के खंभे पर सुधार के लिए चढ़ा दिया जाता है तो कहीं बिना सुरक्षा- उपकरण के गैस से भरे सीवर में उतार दिया जाता है। ‘चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम।’

ऐसे में हमें लगता है कि हमें अपने देश से परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन की तरह कुछ अधिकारियों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में भेजना चाहिए जो वहां के सिस्टम में ज़रूरी सुधार करवा सकें। अभी तो लड़की की बातें सुनकर मेरे दिमाग़ ने काम करना बन्द कर दिया है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८३ – व्यंग्य – जहाँ नेहियाँ बोलता है और गोपाल दुबे सुनते हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाक्टरेट ऑन डिस्काउंट)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८३ – व्यंग्य  – जहाँ नेहियाँ बोलता है और गोपाल दुबे सुनते हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाँव नेहियाँ का भूगोल भले सरकारी कागज़ों में छोटा दर्ज हो, पर उसका सामाजिक ब्रह्मांड इतना फैला हुआ है कि हर आदमी खुद को उसका ध्रुवतारा समझता है। इसी ब्रह्मांड के केंद्र में, ठीक वहाँ जहाँ सड़क वर्षों से विकास की कहानी सुनाती हुई सीधी और चमकदार खड़ी है, मेरे जीजा गोपाल दुबे की पान की दुकान मौजूद है—मानो लोकतंत्र का असली दफ्तर यहीं चलता हो। सुबह होते ही दुकान पर ऐसी भीड़ लगती है जैसे पंचायत, संसद और गली-मोहल्ले की अदालत एक साथ बैठ गई हो। कोई पान लेने आता है, कोई ताज़ा खबर सुनाने, और कुछ लोग तो सिर्फ अपनी राय थूकने आते हैं। जीजा हर ग्राहक का स्वागत ऐसी स्थिर मुस्कान से करते हैं जैसे उन्हें जन्म से ही सार्वजनिक सहनशीलता का ठेका मिला हो। लोग खेती से लेकर राजनीति और पड़ोसी की बकरी तक पर फैसला सुना देते हैं, और जीजा कत्था लगाते हुए सिर हिलाते रहते हैं। नेहियाँ में आम धारणा है कि अगर धैर्य को बोतल में बंद किया जाए, तो उस पर जीजा की दुकान का लेबल लगेगा।

दिन के उजाले में यह दुकान शिष्टाचार की प्रदर्शनी लगती है। लोग आते हैं, पान लेते हैं, दाम चुकाते हैं और जाते समय “राम-राम” कहकर अपनी सभ्यता की रसीद जमा कर देते हैं। लेकिन सूरज ढलते ही नेहियाँ का सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाता है। कुछ ग्राहक ऐसे प्रवेश करते हैं जिनकी चाल से लगता है कि धरती से उनका समझौता अस्थायी है। वे आते ही भाषा को इस तरह मरोड़ते हैं कि शब्द भी किनारे खड़े होकर सोचें—हमने ऐसा क्या अपराध किया। जीजा इस भाषाई उथल-पुथल के बीच वैसे ही शांत रहते हैं जैसे ध्यानस्थ साधु; फर्क बस इतना कि यहाँ धूप-दीप की जगह कत्थे और तंबाकू की खुशबू है। सामने खड़ा व्यक्ति आवाज़ ऊँची करके अपनी वीरता साबित कर रहा होता है और जीजा उसी नाप-तौल से पान लगाते हैं, मानो कह रहे हों—बोल लो भाई, आखिर में सब चबाया ही जाएगा।

रात के ये ग्राहक संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन करते हैं। हर वाक्य ऐसा फेंकते हैं जैसे अखाड़े में दांव चला रहे हों। जीजा चाहें तो दो तमाचे रखकर भाषाई सुधार अभियान चला दें, पर कानून का खयाल उनके कंधे पर बैठे समझदार सलाहकार की तरह हमेशा मौजूद रहता है। वे मन ही मन हिसाब लगाते हैं—गुस्सा अभी, झंझट बाद में क्यों मोल लें। इस गणित ने उन्हें ऐसा संत बना दिया है कि तपस्या करने वाले भी उनसे प्रशिक्षण लेना चाहें। ग्राहक गरजते हैं, मेज थपथपाते हैं, और जीजा बस इतना पूछते हैं—“मीठा रखूँ?” यह सवाल ऐसा जादू करता है कि आधी बहादुरी कत्थे में घुल जाती है। नेहियाँ के लोग कहते हैं कि अगर संयम की दौड़ हो, तो जीजा बिना दौड़े जीत जाएँ।

गाँव वालों ने इस दुकान को अनौपचारिक मनोरंजन केंद्र घोषित कर रखा है। लोग थोड़ा दूर खड़े होकर तमाशा देखते हैं—आज कौन क्या बोलेगा, जीजा कितना सहेंगे। बुजुर्ग इसे धैर्य प्रशिक्षण शिविर कहते हैं और दावा करते हैं कि जो आदमी यहाँ एक हफ्ता टिक जाए, उसे जीवन में कोई नहीं हिला सकता। रात के ग्राहक जब आवाज़ ऊँची करते हैं, तो दर्शक ऐसे आनंद लेते हैं जैसे मुफ्त का नाटक चल रहा हो। कोई मुस्कुराता है, कोई कानाफूसी करता है, पर जीजा अपनी लय में पान बनाते रहते हैं। उनका हाथ मशीन की तरह चलता है, चेहरा शांत रहता है, और वातावरण में हास्य की महीन परत फैल जाती है—ऐसी कि तनाव भी हँसते-हँसते हल्का हो जाए।

जीजा की दुकान नेहियाँ का असली लोकतंत्र है जहाँ कत्था, चूना और सुपारी सबको बराबरी का दर्जा देते हैं। दिन में जो लोग एक-दूसरे से दूरी बनाकर चलते हैं, रात को एक ही कतार में खड़े पान का इंतज़ार करते मिलते हैं। नशे की हालत में कुछ ग्राहक खुद को भाषण विशेषज्ञ समझ लेते हैं और जीजा से ऐसे उलझते हैं जैसे किसी बहस का अंतिम दौर चल रहा हो। जीजा हर तर्क का जवाब पान से देते हैं। उनका सिद्धांत सरल है—बहस जितनी लंबी होगी, पान उतना मीठा होना चाहिए। धीरे-धीरे ग्राहक बोलते-बोलते चबाने लगते हैं और उनका जोश सुपारी के साथ ठंडा पड़ जाता है।

नेहियाँ की सड़कें अपने आप में विकास का प्रमाणपत्र हैं—सीधी, चमकदार और इतनी समझदार कि बाहर से आने वाला आदमी प्रभावित हुए बिना न रहे। पर यही सड़क शाम ढलते ही गाँव के असली चरित्र की परेड देखने लगती है। गंजेड़ी ऐसे टहलते हैं मानो हवा की गुणवत्ता की निजी जाँच कर रहे हों। नशेड़ी अपने कदमों से नई ज्यामिति रचते हैं—सीधी सड़क पर तिरछा चलने की कला का जीवंत प्रदर्शन। पियक्कड़ हर खंभे को पुराना दोस्त समझकर उससे संवाद करते मिल जाते हैं। और गालीबाज भाषा को ऐसे उछालते हैं जैसे शब्द कोई खिलौना हों। सड़क चुपचाप यह सब सहती रहती है—ऊपर से विकास, नीचे से मानवीय विविधता। यह दृश्य ऐसा है जहाँ चमकती डामर और लड़खड़ाते कदम मिलकर नेहियाँ का सबसे सच्चा व्यंग्य रचते हैं।

रात गहराती है तो यही सड़क सामाजिक रंगमंच बन जाती है। दिन में जिस पर बच्चे साइकिल चलाते हैं, रात में वही मंच बनकर मानवीय आदतों का खुला प्रदर्शन करती है। गंजेड़ी दार्शनिक मुद्रा में खड़े होकर जीवन के ऐसे निष्कर्ष सुनाते हैं जिन्हें सुनकर दीवारें भी सोच में पड़ जाएँ। नशेड़ी संतुलन की अपनी निजी परिभाषा गढ़ते हुए चलते हैं, और पियक्कड़ ऊँची आवाज़ में दुनिया सुधारने का संकल्प लेते हैं। गालीबाज भाषा की ऐसी कसरत करते हैं कि शब्द खुद विश्राम माँग लें। मज़े की बात यह है कि सड़क हर रात यह सब देखकर सुबह फिर वैसी ही मासूम दिखती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। नेहियाँ के लोग हँसकर कहते हैं—हमारी सड़क तो शरीफ है, बस उस पर चलने वाले चरित्रवान होने का अभ्यास कर रहे हैं।

नेहियाँ के बच्चे यह सब देखकर बड़े हो रहे हैं। वे सीख रहे हैं कि असली ताकत हाथ उठाने में नहीं, हाथ रोक लेने में है, और हँसकर टाल देने में भी एक किस्म की जीत छिपी होती है। जीजा का धैर्य अब लोककथा बन चुका है। लोग कहते हैं कि अगर सहनशीलता का मंदिर बने, तो पुजारी वही होंगे। रात की आवाज़ें चाहे जितनी ऊँची हों, जीजा की शांति पुरानी घड़ी की टिक-टिक जैसी स्थिर रहती है। ग्राहक आते हैं, अपनी भड़ास निकालते हैं, और पान के साथ उसे निगल भी जाते हैं। यह रोज़ का अभ्यास नेहियाँ को सिखा रहा है कि हास्य और संयम मिलकर सबसे बड़ी आग को भी धुआँ बना सकते हैं।

एक रात एक महाशय ऐसे जोश में आए कि शब्दों की रेलगाड़ी बिना ब्रेक दौड़ा दी। भीड़ जमा हो गई, मानो कोई ऐतिहासिक क्षण घटने वाला हो। जीजा ने शांत स्वर में कहा—“पहले पान खा लीजिए, बाकी दुनिया बाद में सुधार लीजिए।” इतना सुनना था कि आसपास खड़े लोग हँसी से दोहरे हो गए। महाशय भी पान मुँह में दबाकर शांत हो गए, जैसे कत्थे ने उनके जोश पर हल्का विराम लगा दिया हो। उस क्षण नेहियाँ ने समझ लिया कि हास्य सबसे असरदार जवाब है—बिना टकराव, बिना हंगामे। जीजा ने फिर उसी सहजता से अगला पान लगाना शुरू कर दिया, मानो जीवन अपनी पटरी पर लौट आया हो।

आज नेहियाँ में जीजा की दुकान सिर्फ पान बेचने की जगह नहीं, सामाजिक प्रयोगशाला है जहाँ रोज साबित होता है कि धैर्य, हास्य और समझदारी मिल जाएँ तो हर तूफान तमाशा बन जाता है। जीजा हर रात शब्दों की आँधी झेलते हैं और सुबह फिर उसी मुस्कान के साथ दुकान खोल देते हैं। गाँव वाले मानते हैं कि असली ताकत वही है जो हाथ नहीं उठाती, बल्कि माहौल को हल्का कर देती है। उनकी दुकान पर हँसी इतनी खुलकर बहती है कि कभी-कभी लगता है—अगर हँसी का वजन किया जाए, तो नेहियाँ की धरती थोड़ा झुककर सलाम कर दे।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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