(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 70 – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप – 3☆
तीसरा शब्द-दीप
आज भाईदूज है। प्रातःभ्रमण पर हूँ। हर तरफ सुनसान, चुप। दीपावली के बाद शहर अलसाया हुआ है। सोसायटी का चौकीदार भी जगह पर नहीं है। इतनी सुबह दुकानें अमूमन बंद रहती हैं पर अख़बार वालों, मंडी की ओर जाते सब्जीवालों, कुछ फलवालों, जल्दी नौकरी पर जाने वालों और स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों से सड़क ठसाठस भरी रहती है। आज सार्वजनिक छुट्टी है। नौकरीपेशा, विद्यार्थी सब अपने-अपने घर पर हैं। सब्जी मंडी भी आज बंद है। अख़बारों को कल छुट्टी थी। सो आज अख़बार विक्रेता भी नहीं हैं। वातावरण हलचल की दृष्टि से इतना शांत जैसे साइबेरिया में हिमपात के बाद का समय हो।
वातावरण का असर कुछ ऐसा कि लम्बे डग भरने वाला मैं भी कुछ सुस्ता गया हूँ। डग छोटे हो गये हैं और कदमों की गति कम। देह मंथर हो तो विचारों की गति तीव्र होती है। एकाएक इस सुनसान में एक स्थान पर भीड़ देखकर ठिठक जाता हूँ। यह एक प्रसिद्ध पैथालॉजी लैब का सैम्पल कलेक्शन सेंटर है। अलसुबह सैम्पल देने के लिए लोग कतार में खड़े हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें वृद्धों के साथ-साथ मध्यम आयु के लोग काफी हैं। मुझे स्मरण हो आता है, ‘ शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा।’
सबसे बड़ी सम्पदा स्वास्थ्य है। हम में से अधिकांश अपनी जीवन शैली और लापरवाही के चलते प्रकृति प्रदत्त इस सम्पदा की भलीभाँति रक्षा नहीं कर पाते हैं। चंचल धन और पार्थिव अधिकार के मद ने आँखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि हम त्योहार या उत्सव की मूल परम्परा ही भुला बैठे हैं। आद्य चिकित्सक धन्वंतरी की त्रयोदशी को हमने धन की तेरस तक सीमित कर लिया। रूप की चतुर्दशी, स्वरूप को समर्पित कर दी। दीपावली, प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने, मूल्यों की विजय एवं अर्चना का प्रतीक न होकर केवल द्रव्यपूजन का साधन हो गई।
उत्सव और त्योहारों को उनमें अंतर्निहित उदात्तता के साथ मनाने का पुनर्स्मरण हमें कब होगा? कब हम अपने जीवन के अंधकार के विरुद्ध एक दीप प्रज्ज्वलित करेंगे? जिस दिन एक भी दीपक सुविधा के अर्थ के अंधेरे के आगे सीना ठोंक कर खड़ा हो गया, यकीन मानिये, अमावस्या को दीपावली होने में समय नहीं लगेगा।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 70 – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप – 2☆
दूसरा शब्द-दीप
आज बलि प्रतिपदा है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि। देश के अनेक भागों में बोलचाल की भाषा में इसे पाडवा कहते हैं।
शाम के समय फिर बाज़ार में हूँ। बाज़ार के लिए घर से अमूमन पैदल निकलता हूँ। दो-ढाई किलोमीटर चलना हो जाता है, साथ ही पात्र-परिस्थिति का अवलोकन और खुद से संवाद भी।
दीपावली यानी पकी रसोई के दिन। सोचता हूँ फल कुछ अधिक ले लूँ ताकि पेट का संतुलन बना रहे। मंडी से फल लेकर मेडिकल स्टोर की ओर आता हूँ। एक आयु के बाद फलों से अधिक बजट दवाइयों का होता है।
सड़क खचाखच भरी है। दोनों ओर की दुकानों ने सड़क को अपने आगोश में ले लिया है या सड़क दुकानों में प्रवेश कर गई है, पता ही नहीं चलता। दुकानदार मुहूर्त की बिक्री करने में और ग्राहक उनकी बिक्री करवाने में व्यस्त हैं। जहाँ पाँव धरना भी मुश्किल हो उस भीड़ में एक बाइक पर विराजे ट्रिप्सी ( ट्रिपल सीट का यह संक्षिप्त रूप आजकल खूब चलन में है) मतलब तीन नौजवान गाड़ी आगे ले जाने की नादानी करना चाहते हैं। कोलाहल में हॉर्न की आवाज़ खो जाने से कामयाबी कोसों दूर है और वे बुरी तरह झल्ला रहे हैं। भीड़ मंथर गति से आगे बढ़ रही है। देह की भीड़ में मन का एकांत मुझे प्रिय है। मन खुद से बातें करने में तल्लीन है और देह भीड़ के साथ कदमताल। किर्रररर .. किसी प्राणी के एकाएक आगे आ जाने से कोई बस ड्राइवर जैसे ब्रेक लगाता है, वैसे ही भीड़ की गति पर विराम लग गया। कौतुहलवश आँखें उस स्थान पर गईं जहाँ से गति शून्य हुई थी। देखता हूँ कि दो फर्लांग आगे चल रही लगभग अस्सी वर्ष की एक बूढ़ी अम्मा एकाएक ठहर गई थीं। अत्यंत साधारण साड़ी, पैरों में स्लीपर, हाथ में कपड़े की छोटी थैली। बेहद निर्धन परिवार से सम्बंध रखने वाली, सरकारी भाषा में ‘बीपीएल’ महिला। हुआ यों कि विपरीत दिशा से आती उन्हीं की आयु की, उन्हीं के आर्थिक वर्ग की दूसरी अम्मा उनके ठीक सामने आकर ठहर गई थीं। दोनों ओर का जनसैलाब भुनभुना पाता उससे पहले ही विपरीत दिशा से आ रही अम्मा भरी भीड़ में भी जगह बनाकर पहली के पैरों में झुक गईं। पूरी श्रद्धा से चरण स्पर्श किये। पहली अम्मा के चेहरे पर मान पाने का नूर था। स्मितहास्य दोनों गालों पर फैल गया था। हाथ उठाकर पूरे मन से आशीर्वाद दिया। प्रणाम करने वाली ने विनय से ग्रहण किया। दोनों अपने-अपने रास्ते बढ़ीं, भीड़ भी चल पड़ी।
दीपावली की धोक देना, प्रतिपदा को मिलने जाना, प्रणाम करने की परम्पराएँ जाने कहाँ लुप्त हो गईं! पश्चिम के अंधानुकरण ने सामासिकता की चूलें ही हिलाकर रख दीं।
हिलाकर रखनेवाला एक तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सर्वाधिक युवाओं का देश, भविष्य में सर्वाधिक वृद्धों का होगा। परम्पराओं की तरह उपेक्षित वृद्ध या वृद्धों की तरह उपेक्षित परम्पराएँ! हम अपनी परम्पराओं को धोक देंगे, उनका चरणस्पर्श करेंगे, उनसे आशीर्वाद ग्रहण करेंगे या ‘हाय’ कहकर ‘बाय’ करते रहेंगे? आज बलि प्रतिपदा है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि। देश के अनेक भागों में बोलचाल की भाषा में इसे पाडवा कहते हैं।
शाम के समय फिर बाज़ार में हूँ। बाज़ार के लिए घर से अमूमन पैदल निकलता हूँ। दो-ढाई किलोमीटर चलना हो जाता है, साथ ही पात्र-परिस्थिति का अवलोकन और खुद से संवाद भी।
दीपावली यानी पकी रसोई के दिन। सोचता हूँ फल कुछ अधिक ले लूँ ताकि पेट का संतुलन बना रहे। मंडी से फल लेकर मेडिकल स्टोर की ओर आता हूँ। एक आयु के बाद फलों से अधिक बजट दवाइयों का होता है।
सड़क खचाखच भरी है। दोनों ओर की दुकानों ने सड़क को अपने आगोश में ले लिया है या सड़क दुकानों में प्रवेश कर गई है, पता ही नहीं चलता। दुकानदार मुहूर्त की बिक्री करने में और ग्राहक उनकी बिक्री करवाने में व्यस्त हैं। जहाँ पाँव धरना भी मुश्किल हो उस भीड़ में एक बाइक पर विराजे ट्रिप्सी ( ट्रिपल सीट का यह संक्षिप्त रूप आजकल खूब चलन में है) मतलब तीन नौजवान गाड़ी आगे ले जाने की नादानी करना चाहते हैं। कोलाहल में हॉर्न की आवाज़ खो जाने से कामयाबी कोसों दूर है और वे बुरी तरह झल्ला रहे हैं। भीड़ मंथर गति से आगे बढ़ रही है। देह की भीड़ में मन का एकांत मुझे प्रिय है। मन खुद से बातें करने में तल्लीन है और देह भीड़ के साथ कदमताल। किर्रररर .. किसी प्राणी के एकाएक आगे आ जाने से कोई बस ड्राइवर जैसे ब्रेक लगाता है, वैसे ही भीड़ की गति पर विराम लग गया। कौतुहलवश आँखें उस स्थान पर गईं जहाँ से गति शून्य हुई थी। देखता हूँ कि दो फर्लांग आगे चल रही लगभग अस्सी वर्ष की एक बूढ़ी अम्मा एकाएक ठहर गई थीं। अत्यंत साधारण साड़ी, पैरों में स्लीपर, हाथ में कपड़े की छोटी थैली। बेहद निर्धन परिवार से सम्बंध रखने वाली, सरकारी भाषा में ‘बीपीएल’ महिला। हुआ यों कि विपरीत दिशा से आती उन्हीं की आयु की, उन्हीं के आर्थिक वर्ग की दूसरी अम्मा उनके ठीक सामने आकर ठहर गई थीं। दोनों ओर का जनसैलाब भुनभुना पाता उससे पहले ही विपरीत दिशा से आ रही अम्मा भरी भीड़ में भी जगह बनाकर पहली के पैरों में झुक गईं। पूरी श्रद्धा से चरण स्पर्श किये। पहली अम्मा के चेहरे पर मान पाने का नूर था। स्मितहास्य दोनों गालों पर फैल गया था। हाथ उठाकर पूरे मन से आशीर्वाद दिया। प्रणाम करने वाली ने विनय से ग्रहण किया। दोनों अपने-अपने रास्ते बढ़ीं, भीड़ भी चल पड़ी।
दीपावली की धोक देना, प्रतिपदा को मिलने जाना, प्रणाम करने की परम्पराएँ जाने कहाँ लुप्त हो गईं! पश्चिम के अंधानुकरण ने सामासिकता की चूलें ही हिलाकर रख दीं।
हिलाकर रखनेवाला एक तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सर्वाधिक युवाओं का देश, भविष्य में सर्वाधिक वृद्धों का होगा। परम्पराओं की तरह उपेक्षित वृद्ध या वृद्धों की तरह उपेक्षित परम्पराएँ! हम अपनी परम्पराओं को धोक देंगे, उनका चरणस्पर्श करेंगे, उनसे आशीर्वाद ग्रहण करेंगे या ‘हाय’ कहकर ‘बाय’ करते रहेंगे?
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 70 – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप – 1☆
पहला शब्ददीप
दीपावली की शाम.., बाज़ार से लक्ष्मीपूजन के भोग के लिए मिठाई लेकर लौट रहा हूँ। अत्यधिक भीड़ होने के कारण सड़क पर जगह-जगह बैरिकेड लगे हैं। मन में प्रश्न उठता है कि बैरिकेड भीड़ रोकते हैं या भीड़ बढ़ाते हैं?
प्रश्न को निरुत्तर छोड़ भीड़ से बचने के लिए गलियों का रास्ता लेता हूँ। गलियों को पहचान देने वाले मोहल्ले अब अट्टालिकाओं में बदल चुके। तीन-चार गलियाँ अब एक चौड़ी-सी गली में खुल रही हैं। इस चौड़ी गली के तीन ओर शॉपिंग कॉम्पलेक्स के पिछवाड़े हैं। एक बेकरी है, गणेश मंदिर है, अंदर की ओर खुली कुछ दुकानें हैं और दो बिल्डिंगों के बीच टीन की छप्पर वाले छोटे-छोटे 18-20 मकान। इन पुराने मकानों को लोग-बाग ‘बैठा घर’ भी कहते हैं।
इन बैठे घरों के दरवाज़े एक-दूसरे की कुशल क्षेम पूछते आमने-सामने खड़े हैं। बीच की दूरी केवल इतनी कि आगे के मकानों में रहने वाले इनके बीच से जा सकें। गली के इन मकानों के बीच की गली स्वच्छता से जगमगा रही है। तंग होने के बावजूद हर दरवाज़े के आगे रंगोली रंग बिखेर रही है।
रंगों की छटा देखने में मग्न हूँ कि सात-आठ साल का एक लड़का दिखा। एक थाली में कुछ सामान लिए, उसे लाल कपड़े से ढके। थाली में संभवतः दीपावली पर घर में बने गुझिया या करंजी, चकली, बेसन-सूजी के लड्डू हों….! मन संसार का सबसे तेज़ भागने वाला यान है। उल्टा दौड़ा और क्षणांश में 45-48 साल पीछे पहुँच गया।
सेना की कॉलोनी में हवादार बड़े मकान। आगे-पीछे खुली जगह। हर घर सामान्यतः आगे बगीचा लगाता, पीछे सब्जियाँ उगाता। स्वतंत्र अस्तित्व के साथ हर घर का साझा अस्तित्व भी। हिंदीभाषी परिवार का दाहिना पड़ोसी उड़िया, बायाँ मलयाली, सामने पहाड़ी, पीछे हरियाणवी और नैऋत्य में मराठी। हर चार घर बाद बहुतायत से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते पंजाबी। सबसे ख़ूबसूरत पहलू यह कि राज्य या भाषा कोई भी हो, सबको एकसाथ जोड़ती, पिरोती, एक सूत्र में बांधती हिंदी।
कॉलोनी की स्त्रियाँ शाम को एक साथ बैठतीं। खूब बातें होतीं। अपने-अपने के प्रांत के व्यंजन बताती और आपस में सीखतीं। सारे काम समूह में होते। दीपावली पर तो बहुत पहले से करंजी बनाने की समय सारणी बन जाती। सारणी के अनुसार निश्चित दिन उस महिला के घर उसकी सब परिचित पहुँचती। सैकड़ों की संख्या में करंजी बनतीं। माँ तो 700 से अधिक करंजी बनाती। हम भाई भी मदद करते। बाद में बड़ा होने पर बहनों ने मोर्चा संभाल लिया।
दीपावली के दिन तरह-तरह के पकवानों से भर कर थाल सजाये जाते। फिर लाल या गहरे कपड़े से ढककर मोहल्ले के घरों में पहुँचाने का काम हम बच्चे करते। अन्य घरों से ऐसे ही थाल हमारे यहाँ भी आते।
पैसे के मामले में सबका हाथ तंग था पर मन का आकार, मापने की सीमा के परे था। डाकिया, ग्वाला, महरी, जमादारिन, अखबार डालने वाला, भाजी वाली, यहाँ तक कि जिससे कभी-कभार खरीदारी होती उस पाव-ब्रेडवाला, झाड़ू बेचने वाली, पुराने कपड़ों के बदले बरतन देनेवाली और बरतनों पर कलई करने वाला, हरेक को दीपावली की मिठाई दी जाती।
अब कलई उतरने का दौर है। लाल रंग परम्परा में सुहाग का माना जाता है। हमारी सुहागिन परम्पराएँ तार-तार हो गई हैं। विसंगति यह कि अब पैसा अपार है पर मन की लघुता के आगे आदमी लाचार है।
पीछे से किसी गाड़ी का हॉर्न तंद्रा तोड़ता है, वर्तमान में लौटता हूँ। बच्चा आँखों से ओझल हो चुका। जो ओझल हो जाये, वही तो अतीत कहलाता है।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का एक अत्यंत विचारणीय आलेख बेमानी रिश्ते. यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 70 ☆
☆ बेमानी रिश्ते ☆
रिश्ते जब मज़बूत होते हैं/ बिन कहे महसूस होते हैं…मात्र कपोल-कल्पना है। आधुनिक युग में रिश्तों की अहमियत रही नहीं और कोई भी रिश्ता पावन नहीं रहा। हर रिश्ता टूटने की कग़ार पर है; मुंह चिढ़ा रहा है। रिश्ते चाहे खून के हों या दोस्ती के, प्यार, समर्पण व त्याग का भाव इनमें से इस प्रकार नदारद हैं, जैसे चील के घोंसले से मांस। आजकल रिश्तों से व्याप्त है…छल, कपट, अविश्वास व तक़रार और अपने भी, अपने बनकर अपनों को छल रहे हैं। यह मंज़र सबसे हृदय-विदारक होता है, जब अपने अपनों से मुख मोड़ लेते हैं या अपने दुश्मनों का साथ निभाने हित अपनों से छल-कपट करते हैं। इंसान दूसरों द्वारा किए गए प्रहार तो सहन कर लेता है, परंतु जब अपने पीठ पीछे से छुरा घोंपते हैं, तो वह पीड़ा असहनीय होती है। इन विषम व असामान्य परिस्थितियों में रिश्तों के मज़बूत होने की उम्मीद रखना बेमानी है। आजकल मानव का हृदय पाषाण हो गया है और उसके अंतर्मन में निहित दैवीय भाव लुप्त हो गए है। सो! उन्हें महसूस करने की कल्पना कैसे की जा सकती है?
चंद वर्ष पहले घर-परिवार में पति-पत्नी व अन्य संबंधियों में स्नेह-सौहार्द होता था और संयुक्त- परिवार व्यवस्था थी। एक कमाता था, दस खाते थे। घर-आंगन में दीवारें नहीं पनपती थीं। परंतु आजकल वह सब गुज़रे ज़माने की बातें हो गयी हैं। एकल- परिवार व्यवस्था के कारण परिवार पति-पत्नी तथा बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं। भले ही विश्व ग्लोबल विलेज बनकर रह गया है, परंतु दिलों के फ़ासले निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। पति-पत्नी दोनों धन कमाने में व्यस्त हैं और बच्चे नैनी व आया की छत्र-छाया में रहने को विवश हैं। वे उनके आश्रय में पल-बढ़ रहे हैं और उनकी दुनिया टी•वी• व मोबाइल तक सिमट कर रह गई है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद हैं। संबंध-सरोकार समाप्त हो गए हैं। मामा, बुआ, दादा-दादी व नाना-नानी के रिश्तों को ग्रहण लग गया है, जिसका मूल कारण है… हम दो, हमारा एक। इसलिए हर संबंध में अजनबीपन का अहसास सिर चढ़कर बोल रहा है। पति-पत्नी एक छत के नीचे अजनबी की भांति रहने को विवश हैं। सो! अलगाव की स्थितियां सुरसा के मुख की भांति अपने पांव पसार रही हैं। पति-पत्नी के संबंध स्वार्थ पर टिके हैं और वे दुनियादारी निभा रहे हैं। उनमें स्नेह-सौहार्द व मर्यादा का भाव रहा ही नहीं। जीवन- मूल्य दरक़ रहे हैं। उनके जीवन का मूल लक्ष्य एक-दूसरे को कोंचना, कचोटना, बुरा-भला कहना व नीचा दिखाना रह गया है और वे इसमें सुक़ून का अनुभव करते हैं।
हर तकलीफ़़ से इंसान दु:खता बहुत है, परंतु सीखता भी ज़रूर है। दु:ख जीवन की पाठशाला है, जिससे हमें अनुभव प्राप्त होता है। सुख-दु:ख तो क्रमानुसार आते-जाते रहते हैं। परंतु मानव कभी भी अपने जीवन से संतुष्ट नहीं रहता। उसे और …और…और अधिक पाने की तमन्ना बनी रहती है। संसार में ऐसा कोई नहीं हुआ, जो आशाओं का पेट भर सके, क्योंकि मनुष्य की आशाएं समुद्र के समान विशाल हैं, वे कभी भरती अर्थात् समाप्त नहीं होतीं। बावरा मन सदैव उनकी पूर्ति में मग्न रहता है। इसलिए वह सदैव दु:खी रहता है। गुलज़ार जी के मतानुसार ‘जीवन में कुछ नहीं बदलता। हां! उम्र के साथ बचपन की ज़िद्द समझौतों में बदल जाती है।’ जी! हां, समय के साथ हमारी सोच व व्यवहार परिवर्तित होते रहते हैं। पहले हम ठान लेते थे और उस वस्तु को प्राप्त करने के पश्चात् सुक़ून प्राप्त करते थे। परंतु उम्र के साथ-साथ हम समझौते करना सीख जाते हैं और जो मिला है, उसे नियति स्वीकार लेते हैं। इसी आधारशिला पर महफूज़ रहते हैं रिश्ते, जो अब दिखावा-मात्र रह गये हैं। हर इंसान मुखौटा धारण कर, एक-दूसरे को छल रहा है और जो जितना अधिक छल करता है, उतना ही क़ामयाब इंसान कहलाता है। आइए! नकाब उतार कर एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए, अपनी संस्कृति की ओर लौट चलें और अपने बच्चों को सुसंस्कारों से पल्लवित करें। करुणा व त्याग को अपने जीवन का मकसद बनाएं और स्नेह व सौहार्द से अपने जीवन को आप्लावित करें। सेवा व सम्मान को जीवन में स्थान दें और दूसरों के प्रति ऐसा व्यवहार करें, जिसकी अपेक्षा हम उनसे करते हैं। दुनिया गोल है और जैसा हम करते हैं, वही लौट कर हमारे पास आता है। ‘कर भला, हो भला।’ यदि आप दूसरों की राह में कांटे बिछाओगे, तो फूल कहां से प्राप्त करोगे?
हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म हमारे भाग्य- विधाता हैं। उनकी उपेक्षा मत करो। ज़िंदगी में कुछ लोग बिना रिश्ते के रिश्ते निभाते हैं, वे दोस्त कहलाते हैं तथा वे नि:स्वार्थ भाव से काम करते हैं। जीवन में वाकिंग डिस्टेंस भले ही रख लें, परंतु टॉकिंग डिस्टेंस कभी मत रखें। संवाद जीवन-रेखा है, जीवन की मात्र धुरी है। सो! संवाद की सूई व स्नेह के धागा उधड़े रिश्तों की तुरपाई कर देता है। परंतु आजकल संवादहीनता इस क़दर पांव पसार रही है कि संवेदन-
हीनता जीवन का अभिन्न अंग बन कर रह गई है, जिसके परिणाम-स्वरूप अजनबीपन का अहसास गहरे में अपनी जड़ें स्थापित कर के बैठ गया है। इसका मुख्य कारण है, संस्कृति व संस्कारों से अलगाव के कारण पनप रही दूरियां, विवाहेतर- संबंधों व लिव-इन के रूप में द्रष्टव्य है। सो! जीवन में लंबे समय तक शांत रहने व संबंधों को बनाए रखने का सर्वोत्तम उपाय है… ‘जो जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार करें।’ विवेकानंद जी के शब्दों में ‘दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए मूल्यों का समझौता मत करो। आत्म-सम्मान बनाए रखो और चले आओ।’ दूसरों की खुशी में अपनी खुशी देखना सबसे बड़ा हुनर है। जो यह हुनर सीख जाता है, कभी दु:खी नहीं होता और उसके चाहने वालों की फेहरिस्त भी बहुत लंबी होती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, महात्मा बुद्ध की वे पंक्तियां…’ जो तुमसे स्नेह रखते है, प्रशंसा करो; जिन्हें ज़रूरत है, सहायता करो; जो चोट पहुंचाते हैं, क्षमा करो। जो तुम्हें छोड़ गए, उन्हें भूल जाओ।’ इसलिए हमेशा शांत रहें, जीवन में खुद को मज़बूत पाएंगे, क्योंकि लोहा ठंडा होने पर ही मज़बूत रहता है। गर्म रहने पर तो उसे किसी भी आकार में ढाल लिया जाता है। अंत में मैं कहना चाहूंगी ‘अहसासों की नमी ज़रूरी है हर रिश्ते में/ रेत भी सूखी हो, तो हाथों से फिसल जाती है।’ इसलिए ज़िंदगी की तपिश को सहन कीजिए, क्योंकि अक्सर वै पौधे मुरझा जाते हैं, जिनकी परवरिश छाया में होती है।
( हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। दीपावली पर्व के विशेष अवसर पर उन्होंने एक अनुकरणीय उदहारण ‘आचार्य कुंदनलाल की अनूठी दीवाली’ साझा किया है। सहज ही विश्वास नहीं होता कि अभी भी समाज में ऐसी वंदनीय वरिष्ठतम पीढ़ी है जिनसे हमें सीखने की आवश्यकता है। हम आपसे उनकी अनुभवी कलम से ऐसे ही आलेख समय समय पर साझा करते रहेंगे।)
☆ आलेख ☆ दीपावली विशेष – आचार्य कुंदनलाल की अनूठी दीवाली ☆
हिसार शहर की अग्रसेन कॉलोनी में रह रहे हमारे पड़ोसी 83 वर्षीय आचार्य कुंदनलाल का परिवार पिछले करीबन दस दिन से दीवाली उपहार के किट तैयार करने में जुटा है। लक्ष्य 108 उपहार का है जिन्हे वे अपने पैतृक गांव डोभी की गौशाला के मजदूर परिवारों व अन्य गरीब घरों को प्रदान करेंगे। गौशाला 35 एकड़ क्षेत्र में बनी है और वहां लगभग 8500 गाएं रखी गई हैं।
हर उपहार किट में दी जा रही सामग्री भी अनुपम है।
लक्ष्मी गणेश जी की प्रतिमा -1,
बड़ा दीपक -1,
छोटे दीपक -21,
सरसों तेल बोतल -1,
रोली – 1,
मोली – 1,
चावल – 500 ग्राम
मोमबत्ती – 2,
तैरती मोमबत्ती – 2,
धूपबत्ती डब्बी – 1,
अगरबत्ती डब्बी – 1
रुई की बत्ती – 21
माचिस – 1
बिस्कुट पैकेट – 4
टॉफी – 10
फिक्की खील – 100 ग्राम
मिट्ठी खील – 250 ग्राम
इतर शीशी – 1
सूती चद्दर का सेट – 1
(उल्लेखनीय है कि किट में पटाखे, फुलझड़ी या बॉम्ब आदि बिल्कुल नहीं हैं।)
“भगवान रामचन्द्र जब बनवास से लौटे तो अयोध्यावासियों ने दीपमाला कर उनका स्वागत किया था। पटाखों व बंबों से नहीं। इनका चलन एक ग़लत प्रथा है। ये प्रदूषण फैलाते हैं जो इन दिनों एक भारी समस्या बन गई है। दिल्ली में ज्यों ज्यों प्रदूषण बढ़ा है, त्यों त्यों कोरोना महामारी के केस बढ़ते जा रहे हैं।
जो लोग पटाखे आदि चलने को धार्मिक सांस्कृतिक परंपरा मानते हैं, वे ग़लत प्रचार कर रहे हैं। किसी धर्म ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं है”, आचार्य जी स्पष्ट करते हैं।
कुंदनलाल जी के घर पर लगभग एक हज़ार धार्मिक पुस्तकों की लाइब्रेरी है। वे बाज़ार में गीता प्रेस की व अन्य धार्मिक पुस्तकें बेचते हैं। उन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ज़रूरी सामग्री की एक अलग दुकान भी की है।
असल में कुंदनलाल बहुत पढ़े लिखे नहीं है। वे केवल आठवीं पास हैं पर उनके जानकार उन्हे आचार्य कह कर ही संबोधित करते हैं। वे धार्मिक ग्रंथों के ज्ञाता हैं। वे धार्मिक संस्थानों में प्रवचन करते हैं। उनके जानकार इसीलिए उन्हें आचार्य जी कह कर संबोधित करते हैं।
( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “भारतीय शिक्षा और पाश्चात्य गुण-दोष“. )
☆ किसलय की कलम से # 22 ☆
☆ भारतीय शिक्षा और पाश्चात्य गुण-दोष ☆
भारतीय शिक्षा का गरिमामय इतिहास संपूर्ण विश्व के लिए अद्वितीय है। वैदिक युग से वर्तमान तक भारतीय शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। गुरुकुल परंपरा के अंतर्गत राम और कृष्ण की शिक्षा के प्रमाण मिलते हैं। वर्तमान में नालंदा विश्वविद्यालय, काशी, उज्जयनी, गोलकी मठ जैसे शिक्षा केंद्र अस्तित्व में रहे हैं। बाल्यकाल में ही विद्यार्थियों को भाषा, राजनीति, धर्म, युद्ध, कला, शस्त्र-शास्त्रों सहित समग्र व्यवहारिक ज्ञान में पारंगत कर दिया जाता था। आज जैसे वेतनभोगी गुरुजन उन दिनों नहीं हुआ करते थे। गुरुजनों का सम्मान राजा-महाराजाओं से कहीं अधिक हुआ करता था।
भारत में हमेशा से ही धर्म, नीति और व्यवहारिक शिक्षा पर जोर दिया जाता रहा है। समय के साथ शिक्षा में बदलाव होते गए। मुगलों और अंग्रेजों के आते-आते शिक्षा के मायने ही बदलने लगे। अंग्रेजों ने शिक्षा नीति ही ऐसी बनाई जिसमें केवल ऐसी शिक्षा पर जोर दिया गया जहाँ शिक्षा प्राप्त कर केवल बाबूगिरी, मुंशीगिरी और कानून समझने वाले पैदा किए जा सकें जो अंग्रेजी प्रशासन के कुशल संचालन में मदद कर सकें। स्वतंत्रता प्राप्ति के बहुत बाद तक वही स्थिति रही, लेकिन पिछले चार दशकों में बहु-आयामी शिक्षा का प्रचार प्रसार त्वरित गति से बढ़ा। आज भाषा, राजनीति, तकनीकि, भूगोल, भूगर्भ, अंतरिक्ष, समुद्र सहित चिकित्सा एवं ब्रह्मांड संबंधी शिक्षा तक हमारी पहुँच बन चुकी है। आज हम बहुविषयक शिक्षा की बदौलत विकास के मार्ग पर गतिमान हैं। उपरोक्त ज्ञान एवं उपलब्धियों ने हमें खुशियाँ तो दी हैं परंतु हम स्वदेशी शिक्षा से इतने दूर निकल गए हैं कि अब पीछे मुड़ना संभव नहीं है। आज हम विदेशी भाषाओं विदेशी अविष्कारों एवं विदेशी परिवेश पर आधारित ज्ञान को प्राप्त कर रहे हैं। विश्व के समकक्ष खड़े होना तो ठीक है लेकिन अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंपराएँ, परिवेश और वैदिक ज्ञान को भूलना अथवा उन से अनभिज्ञ होते जाना भी उचित नहीं है। भारतीय अद्भुत ज्ञान हमारे पूर्वजों ने यूँ ही नहीं प्राप्त किया। सदियों, सहस्राब्दियों की कठिन तपस्या और साधना के प्रतिफल को आज हम भुलाते जा रहे हैं । क्या यह भी उचित है? लेकिन हम इतना अवश्य कह सकते हैं कि जो ज्ञान आज की भारी-भरकम एवं जटिल यंत्रों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है, हमारे पूर्वज उसे चुटकियों में ज्ञात कर लेते थे।
भारतीय शिक्षा का वर्तमान में जो पश्चिमीकरण हुआ है उससे मूल भारतीय समाज स्वदेशी से कटकर पश्चिमोन्मुखी होता जा रहा है। हमारे देश की परिस्थितियाँ, सभ्यता और संस्कृति शेष विश्व से अलग है। यहाँ तक कि हमारे द्वारा निर्वहन किए जाने वाले रिश्ते, मान-मर्यादा एवं व्यवहारिकता में भी बहुत अंतर है। हमारे दिलों में संवेदनशीलता पश्चिम से कहीं अधिक पाई जाती है। पश्चिमी शिक्षा का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय परिवारों पर पड़ा है। परिवारों का बिखराव, आत्मीयता में कमी होना, मन की जगह बुद्धि का इस्तेमाल होना तथा लोगों का प्रयोगवादी होना, यह सब पश्चिम की ही देन है। पाश्चात्य गुण दोषों से भारतीय शिक्षा भी आज नए स्वरूप में दिखाई देने लगी है।
आज पाश्चात्य जगत में जिस गति से विज्ञान, तकनीकि एवं अंतरजालीय क्षेत्र में प्रगति और प्रयोग हो रहे हैं, उससे मानव पूर्णतः यांत्रिक होता जा रहा है। लिंगपरिवर्तन, वनस्पतियों की संकर फसलें तथा तरह-तरह के कृत्रिम उत्पाद प्रकृति को चुनौती देने लगे हैं। वैज्ञानिक उपकरणों और नवीनतम अविष्कारों ने भारतीय शिक्षा को हाशिए पर खड़ा कर दिया है। आज भारतीयता की पहचान किसी कोने में सिसक रही है। हमारी संतानें उच्च शिक्षा ग्रहण कर पश्चिमी देशों में चली जाती हैं और उनके माँ-बाप संतानों से दूर एकाकी और बिना संतानसुख के जीवन यापन करते हुए भगवान को प्यारे हो जाते हैं। अनेक लोगों को तो बेटों के कंधे भी नसीब नहीं होते। किसी भारतीय माँ-बाप के लिए इससे बड़ी बदनसीबी और क्या हो सकती है कि उनकी अर्थी को उनका बेटा भी कंधा न दे सके। वहीं पश्चिमी रंग-ढंग में रची बसी अधिकांश संताने माँ-बाप को जानबूझकर नजरअंदाज करती हैं अथवा उन्हें अपने पास नौकरों की तरह रखती हैं। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि अर्थ के अतिरिक्त पाश्चात्य समाज में ऐसा क्या है जिसे महत्त्व दिया जाता हो। वहीं भारतीयता में पहला स्थान माँ-बाप का है, रिश्तों का है, फिर कहीं जाकर अर्थ की बात आती है। पाश्चात्य शिक्षा हमें उच्च पद तो दिला सकती है लेकिन रिश्ते और स्वास्थ्य नहीं। रिश्तों में आत्मीयता की कमी और समयपूर्व बी पी, मोटापा, चश्मा और हृदय रोग भी अपनी जड़े जमाने लगते हैं। इंसान के स्वास्थ्य के लिए मात्र दवाईयाँ ही पर्याप्त नहीं होती। प्रेम, शांति और नियमितता भी आवश्यक है, जो पाश्चात्य संस्कृति अथवा उच्च शिक्षा से प्राप्त प्रभुता के कारण नहीं मिलती। पश्चिम से प्रभावित फैशन, ड्रग्स, रहन-सहन एवं खान-पान भारतीयता को कभी रास नहीं आया। रिश्तों की अस्थिरता और टूटते परिवार इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। आज हम देखते हैं कि कितने ही ऐसे सनाढ्य हैं जो अपनी शानो शौकत छोड़कर शांति की तलाश में भारत आकर भारतीय जीवन शैली अपना लेते हैं।
मेरा मानना यह कदापि नहीं है कि भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी गुण-दोषों का ही बुरा प्रभाव पड़ा है। भारतीय शिक्षा के नवीनीकरण हेतु पाश्चात्य शैक्षणिक गुणों का जितना योगदान है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। वैश्वीकरण के दौर में यदि हमने पाश्चात्य शिक्षा को न अपनाया होता तो हम आज विश्व में अलग-थलग खड़े होते। यह बात अलग है कि हमारी मौलिकता बरकरार रहती परंतु मौलिकता के संरक्षण हेतु नवीनता की अनदेखी करना कितना उचित है यह प्रबुद्ध वर्ग के चिंतन का विषय है।
मेरा तो बस इतना कहना चाहता हूँ कि हर भारतीय छात्र को शिक्षा ग्रहण करते समय उन सभी अच्छे पाश्चात्य गुणों को आत्मसात करना चाहिए जो हमारे लिए उचित हो। जो हमारे सफल भविष्य के लिए हो। बस इतनी सतर्कता हमें पश्चिमी दोषों से बचा सकती है, इसलिए यहाँ यह कहना यथोचित होगा कि संपूर्ण विश्व में गुण और दोष एक साथ पाए जाते हैं, लेकिन जिस तरह हंस पानी छोड़ कर केवल दूध पी लेता है, उसी तरह हम और हमारे विद्यार्थी पश्चिमी दोषों को छोड़कर पाश्चात्य शिक्षा के गुणों को ग्रहण करेंगे तो कोई ऐसी ताकत नहीं है, जो आप पर बुरा प्रभाव डाल सके।
आईए, हम अपनी भारतीय शिक्षा को तो समग्र रूप से आत्मसात करें। पश्चिमी शिक्षा की सभी अच्छी बातों को भी ग्रहण करें। विश्व में स्वयं को श्रेष्ठ निरूपित करें तथा भारतीय शिक्षा को विश्वशिखर पर पहुँचाएँ।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की एक विचारणीय एवं सार्थक आलेख ‘भजनं नाम रसनं’. इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक रंजन जी का हार्दिकआभार। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 81 ☆
☆ आलेख – भजनं नाम रसनं ☆
प्रमुखतः शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत और लोक संगीत के रूपों में भारतीय संगीत की व्यापक विवेचना की जाती है. सुगम संगीत की एक शैली भजन है जिसका आधार शास्त्रीय संगीत या लोक संगीत ही होता है. उपासना की प्रायः भारतीय पद्धतियों में भजन को साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है. तय है कि भजन के स्वरो के जादू से कई मंदिरो में युगो युगो तक कई साधको को परमात्मा प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता रहेगा.
भजनं नाम रसनं, भजन का अर्थ होता है स्वाद लेना. ‘भजनं नाम आस्वादनम’ मतलब स्मरण करके आनंद लेना, यह भी भजन का ही एक प्रकार है. दरअसल भजन का गूढ़ अर्थ होता है, प्रीति पूर्वक सेवा. प्रीति मन से होती है. यह और बात है कि कौन कहां मन लगा पाता है.
चाहे हाथ से पूजा करें, चाहे पाँव से प्रदक्षिणा करें, चाहे जीभ से स्तुति करें, चाहे साष्टांग दण्डवत करें और चाहे मन में ध्यान करें, भजन दरअसल प्रीति है. प्रीति का व्यापक अर्थ होता है तृप्ति. मंदिर मंदिर, तीरथ तीरथ भ्रमण, भगवान् के नाम, धाम, रूप, भगवान की लीला, भगवान की सेवा, भगवान के दर्शन से जो आत्मिक शांति और तृप्ति मिलती है वही वास्तविक भजन है. नेता जी तीर्थ करवा कर वोट लेने को ही भजन मानते हैं. चमचे नेता जी को दण्डवत कर उन्हें ही अपना इष्ट मानते हैं. सबके अपने अपने देवता होते हैं.
“संभोग से समाधि तक” लिखकर दार्शनिक चिंतक रजनीश ने इसी तृप्ति से भगवान को अनुभव करने की विशद व्याख्या की है. वे सारी दुनियां में चर्चित रहे. रजनीश ने भी कोई नई विवेचना नहीं की थी. खजुराहो के मंदिरों की दार्शनिक विवेचना की जाये तो यही समझ आता है कि परमात्मा तो भीतर है, बाहर महज वासना है. काम, क्रोध, को बाहर छोड़कर मंदिर के छोटे दरवाजो से जब, आत्म सम्मान को त्याग कर, सर झुकाकर हम मंदिर के अंदर प्रवेश कर पाते हैं तभी हमें भीतर भगवान की प्राप्ति हो पाती है. जिसने ऐसा कर लिया वह ज्ञानी, वरना सब अहंकारी तो हैं ही.
गजल भी मूलतः खुदा की इबादत में कही जाती थी, शायर खुदा के प्रेम में ऐसा तल्लीन हो जाता है कि न भिन्नं. माशूका से एकाकार होने जैसा एटर्नल लव गजल को जन्म देता है. कालान्तर में परमात्मा से यह एकात्म किंचित वैभिन्य का स्वरूप लेता गया और अब गजल बिल्कुल नये प्रयोगो से गुजर रही है. रब से शराब की गजल यात्रा अब शबाब के सैलाब से गुजर रही है.
कृष्ण और राधा के एटर्नल लव के कांसेप्ट से हम ही नहीं पाश्चात्य जगत भी असीम सीमा तक प्रभावित है, इस्कान के मंदिरो में भारतीय पोशाक में विदेशियो की भीड़ वही आत्मिक प्रेम ढ़ूंढ़ती नजर आती है. किसी को प्रेम मिलता है किसी को भगवान, किसी को जीवंत तो किसी को आभासी प्रेम मिलता है. कोई राधा के चक्कर में रुक्मणी से ही उलझ जाता है.
यू दीवाने हमेशा से उलटी ही राह चलते हैं. वे सनम के दीदार के लिये आंखो को बंद करते हैं. जरा नजरो को झुकाते हैं और हृदय में देख लेते हैं अपने आशिक को. जिसने राधा भाव से इस आशिकी में कृष्ण के दर्शन कर लिये वह संत हो जाता है, वरना मेरे आप की तरह लौकिक प्रेम के भौतिक प्रेमी हाड़ मांस में ही परम सुख ढ़ूढ़ते जीवन बिता देते हैं. और यही कहते रह जाते हैं कि “मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो.” वास्तव में “मेरे मन में राम मेरे तन में राम, रोम रोम में राम रे” होते तो हैं पर उन्हें ढ़ूढ़कर मन मंदिर में बसा सकना ही भजन का वजन है.
कोई सफेद चोंगे में चर्च में भगवान की जगह नन ढूंढ लेता है कोई भगवा में भक्तिनो को धोखा देता है, कोई बुर्के को तार तार कर रहा है. जन्नत की हूरों की तलाश में जमीन पर आतंक फैला रहा है.
भगवान करे सबको उनके लक्ष्य ही मिले. जैसे बच्चा माँ के बिना, प्यासा पानी के बिना रह नहीं सकता, ऐसे ही जब हम भगवान के बिना रह न सकें तो इस प्रक्रिया का ही नाम भजन होता है. करोड़पति पिता से कुछ हजार रूपये लेकर अलग होकर बेटा, पिता की सारी सत्ता से जैसे वंचित रह जाता है ठीक उसी तरह परम पिता भगवान से कुछ माँगना उनसे अलग होना है, उनसे एकात्म बनाये रहने में ही हम भगवान की सारी सत्ता के हिस्से बने रह सकते हैं. परमात्मा में विलीन होना ही जीवन मरण के बंधन से मुक्ति पाना है. बच्चा माँ पर अधिकार अपनेपन से करता है, तपस्या, सामर्थ्य या योग्यता से नहीं. तपस्या से सिद्धि और शक्ति भले ही प्राप्त हो जावे प्रेम नहीं मिल सकता. निष्काम होने से मनुष्य मुक्त, भक्त सब हो जाता है. भगवान के साथ सम्बन्ध रखें तो सांसारिक कामनायें स्वतः ही शांत हो जाती हैं. यह भजन का वजन है. संसार में आसक्ति का अर्थ है, भगवान में वास्तविक प्रेम की अनुभूति का अभाव. किंतु यह सत्य जानकर भी हममें से ज्यादातर इसे समझ नही पाते.
जो भी हो पर हम आप जो रोटी, कपड़ा और मकान के चक्कर में ही आजीवन उलझे रह जाते हैं, वे बेचारे आम आदमी भगवान को पाने के चक्कर में कईयो को सिद्ध बाबा बना देते है. जनता के लिए “भूखे भजन न होंहि गोपाला ” का सिद्धांत और सवाल ही सबसे बड़ा बना रह जाता है लेकिन जिस दिन लगन लग जायेगी मीरा मगन हो जायेगी यही भजन का वास्तविक वजन है.
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का एक अत्यंत विचारणीय आलेख आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर. यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 69 ☆
☆ आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर ☆
‘यदि दूसरे आपकी सहायता करने को इनकार कर देते हैं, तो मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं, क्योंकि उनके न कहने के कारण ही मैं उसे करने में समर्थ हो पाया। इसलिए आत्मविश्वास रखिए; यही आपको उत्साहित करेगा,’ आइंस्टीन के उपरोक्त कथन में विरोधाभास है। यदि कोई आपकी सहायता करने से इंकार कर देता है, तो अक्सर मानव उसे अपना शत्रु समझने लग जाता है। परंतु यदि हम उसके दूसरे पक्ष पर दृष्टिपात करें, तो यह इनकार हमें ऊर्जस्वित करता है; हमारे अंतर्मन में आत्मविश्वास जाग्रत कर उत्साहित करता है और हमें अपनी आंतरिक शक्तियों का अहसास दिलाता है, जिसके बल पर हम कठिन से कठिन अर्थात् असंभव कार्य को भी क्रियान्वित करने अथवा अंजाम देने में सफल हो जाते हैं। सो! हमें उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए, जो हमें बीच मझधार छोड़ कर चल देते हैं। सत्य ही तो है, जब तक इंसान गहरे जल में छलांग नहीं लगाता, वह तैरना कैसे सीख सकता है? उसकी स्थिति तो कबीरदास के नायक की भांति ‘मैं बपुरौ बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ’ जैसी होगी।
सो! यह मत कहो कि ‘मैं नहीं कर सकता’, क्योंकि आप अनंत हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं।’ स्वामी विवेकानंद जी की यह उक्ति मानव में अदम्य साहस के भाव संचरित करती है; उत्साहित करती है कि आप में अनंत शक्तियां संचित हैं; आप कुछ भी कर सकते हैं। हमारे गुरुजन, आध्यात्मिक वेद-शास्त्र व उनके ज्ञाता विद्वत्तजन, हमें अंतर्मन में निहित अलौकिक शक्तियों से रू-ब-रू कराते हैं और हम उन कल्पनातीत असंभव कार्यों को भी सहजता- पूर्वक कर गुज़रते हैं। इसके लिए मौन का अभ्यास आवश्यक है, क्योंकि वह साधक को अंतर्मुखी बनाता है; जो उसे ध्यान की गहराइयों में ले जाने में सहायक सिद्ध होता है। महर्षि रमण, महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर वर्द्धमान आदि ने भी मौन साधना द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार किया।
मौन रूपी वृक्ष पर शांति के फल लगते हैं अर्थात् मौन से हमारे अंतर्मन में अलौकिक शक्तियां जाग्रत होती हैं, जिसके परिणाम-स्वरूप जीवन में सकारात्मकता दस्तक देती है। वास्तव में मौन जीवन का सर्वाधिक गहरा संवाद है। सो! मानव को शब्दों का चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि यह महाभारत जैसे महायुद्ध के जनक भी हो सकते हैं।
स्वामी योगानंद जी के शब्दों में ‘यह हमारा छोटा-सा मुख एक तोप के समान है और शब्द बारूद के समान हैं– जो पल भर में सब कुछ नष्ट कर देते हैं। सो! व्यर्थ व अनावश्यक मत बोलो और तब तक मत बोलो; जब तक तुम्हें यह न लगे कि तुम्हारे शब्द कुछ अच्छा कहने जा रहे हैं।’ इसलिए मौन मानव की वह मन:स्थिति है, जहां पहुंच कर तमाम झंझावात शांत हो जाते हैं और मानव को विभिन्न मनोविकारों चिंता, तनाव, आतुरता व अवसाद से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। इसलिए स्वामी योगानंद जी मानव-समाज को अपनी अमूल्य शक्ति व समय को व्यर्थ के वार्तालाप में बर्बाद न करने का संदेश देते हैं; वहीं वे भोजन व कार्य करते समय भी मौन रहने की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं।
सो! जब आपके हृदय की भाव-लहरियां शांत होती हैं, उस स्थिति में आपको अच्छे विकल्प सूझते हैं; आप में आत्मविश्वास का भाव जाग्रत होता है और आप उन लोगों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं; जिनके कारण आप उस असंभव कार्य को अंजाम देने में समर्थ हो सके। परंतु इस समस्त प्रक्रिया में तथाकथित अनुकूल परिस्थितियों व आपकी सकारात्मक सोच का भी अभूतपूर्व योगदान होता है। इसलिए ‘मैं कर सकता हूं’ को जीवन का मूल-मंत्र बनाइए और आजीवन निराशा को अपने हृदय में प्रवेश न पाने दीजिए। इस स्थिति में दोस्त, किताबें, रास्ता व सोच अहम् भूमिका निभाते हैं। यदि वे ठीक हैं, तो आपके लिए सहायक सिद्ध होते हैं; यदि वे ग़लत हैं, तो गुमराह कर पथ-भ्रष्ट कर देते हैं और उस अंधकूप में धकेल देते हैं; जहां से मानव कभी बाहर आने की कल्पना भी नहीं पाता। इसलिए सदैव अच्छे दोस्त बनाइए; अच्छी किताबें पढ़िए; सकारात्मक सोच रखिए और सही राह का चुनाव कीजिए… राग-द्वेष व स्व-पर का त्याग कर, ‘सर्वेभवंतु सुखीनाम्’ की स्वस्ति कामना कीजिए, क्योंकि जैसा आप दूसरों के लिए करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है। सो! संसार में स्वयं पर विश्वास रखिए और सदैव अच्छे कर्म कीजिए, क्योंकि वे आपकी अनमोल धरोहर होते हैं; जो आपको जीते-जी मुक्ति की राह पर चलने को प्रेरित ही नहीं करते; आवागमन के चक्र से भी मुक्त कर देते हैं।
( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “आम हिन्दी पाठकों को हिंग्लिश परोसते कुछ अखबार“. )
☆ किसलय की कलम से # 21 ☆
☆ आम हिन्दी पाठकों को हिंग्लिश परोसते कुछ अखबार ☆
भूमंडलीकरण या सार्वभौमिकता की बात कोई नई नहीं है। हमारे प्राचीन ग्रंथ ‘वसुधैव कुटुंबकम्” की बात लिख कर इसकी आवश्यकता पहले ही प्रतिपादित कर चुके हैं, लेकिन इसका आशय यह कदापि नहीं है कि आवश्यकता न होते हुए भी हम अपनी संस्कृति ,रीति-रिवाज, परंपराओं, धर्म एवं भाषा तक को दरकिनार कर दूसरों की गोद में बैठ जाएँ। बेहतर तो यह है कि हम स्वयं को ही इतना सक्षम बनाने का प्रयास करें कि हमें छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरों का मुँह न ताकना पड़े। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हम केवल और केवल नकलची बनकर नकल न उतारते फिरें। परिस्थितियों एवं परिवेश की आवश्यकतानुरूप स्वयं को ढालना अच्छी बात है, परंतु बिना सोचे-समझे अंधानुकरण को बेवकूफी भी कहा जाता है। एक छोटा सा उदाहरण है ‘नेक टाई’ का। इसे गले में बाँधने का सिर्फ और सिर्फ यही उद्देश्य है कि ठंडे देशों में गले और गले के आसपास ठंड से बचा जा सके परंतु हमारे यहाँ मई-जून की गर्मी में भी मोटे कोट-पेंट के साथ नेक टाई पहन कर लोग अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा बताने से नहीं चूकते। आंग्ल भाषा की उपयोगिता अथवा आवश्यकता हो या न हो कुछ पढ़ेलिखे नासमझ अंग्रेजी झाड़े बिना नहीं रह पाते। हम केवल परस्पर वार्तालाप की बात करें तब क्या दो विभिन्न भाषी एक दूसरे की बात समझ पाएँगे? कदापि नहीं। बस, मैं यही कहना चाहता हूँ कि आजकल हमारे कुछ हिंदी अखबार वालों का मानना है कि वे देवनागरी में इंग्लिश लिखकर अपनी ज्यादा लोकप्रियता अथवा पहुँच बना लेंगे। ऐसा करना क्या, सोचना भी गलत होगा। एक हिंदी के आम पाठक को उसकी अपनी भाषा के अतिरिक्त चीनी, रूसी, जापानी या अंग्रेजी के शब्दों को देवनागरी में लिखकर पढ़ाओगे तो क्या वह आपके द्वारा लिखी बात पूर्णरूपेण समझ सकेगा? नहीं समझेगा न। आप सोचते हैं जो लोग अंग्रेजी समझते हैं उनके लिए आसानी है, तो जिसे अंग्रेजी आती है फिर आपके हिन्दी अखबार क्यों पढ़ेगा। दूसरी बात जिसे हिंदी कम आती है अथवा अहिंदी भाषी है, तब तो ऐसे लोग हिंदी के बजाय अपनी भाषा को ज्यादा पसंद करेंगे, अथवा अंग्रेजी को रोमन में न पढ़कर पूरा अंग्रेजी अखबार ही न खरीदेंगे।
मेरे मत से इन तथाकथित अखबार वालों की भाषा से यदि हिंग्लिश तबका जुड़ता है, जिसे ये हिंग्लिश पाठकों की अतिरिक्त वृद्धि मानते हैं तो उन्हें स्वीकारना पड़ेगा कि उससे कहीं ज्यादा इनके हिन्दी पाठकों में कमी हो रही है। उनके पास अन्य पसंदीदा अखबारों के विकल्प भी होते हैं। आज के अंतरजालीय युग में जब हर सूचना हमारे पास आप से पहले पहुँच रही है, तब इन तथाकथित अखबारों की प्राथमिकताएँ बची कहाँ हैं। आज के तकनीकी युग एवं खोजी पत्रकारिता के चलते छोटे से छोटा अखबार भी पिछड़ा नहीं है। अब तो ग्रामीण अंचल तक अद्यतन रहते हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी की मर्यादा, सम्मान एवं संवर्धन हमारा कर्तव्य है। हिन्दी के पावन आँचल में किसी गैर भाषा के इस तरह थिगड़े लगाने का प्रयास राष्ट्रभाषा का अपमान और मेरे अनुसार राष्ट्रद्रोह जैसा है। विश्व की किसी भी भाषा, संस्कृति अथवा परंपराओं से घृणा अथवा अनादर हमारी संस्कृति में नहीं है। हमारे नीति शास्त्रों में ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ भी लिखा है। आज हिन्दी की विकृति पर तुले हुए लोग हठधर्मिता की पराकाष्ठा पार करते नजर आ रहे हैं। इनकी अपने देश, अपनी संस्कृति एवं अपनी राष्ट्रभाषा संबंधी प्रतिबद्धता भी संशय के कटघरे में खड़ी प्रतीत होने लगी है। आज आप किसी भी पाठक से पूछ लीजिए, वह आज लिखी जा रही विकृत भाषा एवं अव्यवहारिक संस्कृति से स्वयं को क्षुब्ध बतलायेगा। अब तो सुबह-सुबह अखबार पढ़ कर मन में कड़वाहट सी भर जाती है। अप्रिय भाषा एवं अवांछित समाचारों की बाढ़ सी दिखाई देती है, वहीं अखबारों की यह भी मनमानी चलती है कि हम अपने घर, अपने समूह या विज्ञापन का चाहे जितना बड़ा भाग प्रकाशित करें, मेरी मर्जी। पाठक के दर्द की किसी को चिंता नहीं रहती। सरकार भी इनकी नकेल नहीं कस पाती। सरकारी, बड़े व्यवसायियों एवं नेताओं के विज्ञापनों की बड़ी कमाई से अखबार बड़े उद्योगों में तब्दील हो गए हैं। हम चाहे जब अखबार के मुख्य अथवा नगर पृष्ठ तक में एक अदद पूरी खबर के लिए तरस जाते हैं, फिर नगर, देश-प्रदेश एवं समाज की बात तो बहुत दूर है। समाचार पत्रों से स्थानीय साहित्य भी जैसे लुप्त होता जा रहा है। आज दरकार है आदर्श भाषा की, आदर्श सोच की और आदर्श अखबारों की। साथ ही देश तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व की। मैं मानता हूँ कि समाज सुधार का ठेका अखबारों ने नहीं ले रखा है, किंतु यह भी सत्य है कि, ये तथाकथित अखबार क्या मानक गरिमा का ध्यान रख पाते हैं।
अंत में पुनः मेरा मानना है कि आज जब हर छोटे-बड़े शहरों में पहले जैसे एक-दो नहीं पचासों अखबार निकलते हैं, तब ऐसे में अपनी व्यावसायिक तथा निजी सोच पर नियंत्रण कर ये विशिष्ट अखबार हम असंगठित पाठकों को मनमाना परोसने से परहेज करें। राष्ट्रभाषा हिंदी को हिंग्लिश बनने से बचाने के प्रयास करना हम सभी का नैतिक कर्त्तव्य है, इसे अमल में लाने का विनम्र अनुरोध है।
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. लेख में वर्णित विचार श्री अरुण जी के व्यक्तिगत विचार हैं। ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक दृष्टिकोण से लें. हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ प्रत्येक बुधवार को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “छात्रों में बड़ी ऊर्जा है ”)
☆ गांधी चर्चा # 43 – बापू के संस्मरण – 23 ☆
☆ छात्रों में बड़ी ऊर्जा है ☆
1927 की बात है। मैसूर मे स्टूडेंट वर्ल्ड फ़ेड़रेशन का अधिवेशन था। उसके अंतेर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रेवेरेंट मार्ट गांधी जी से मिलने अहमदाबाद आए।
जब उनकी मुलाक़ात गांधीजी से हुई तब उन्होने गांधीजी से छात्र समस्यायों पर बातें की।गांधीजी ने स्पष्ट कहा कि वे छात्रो को अपने छात्र जीवन मे राजनीति मे प्रवेश के पक्षधर नहीं हैं। उन्हे पहले अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए। अगर वे चाहें तो ग्रामो मे जाकर उनके बीच सेवा कार्य कर सकते हैं। छात्रो मे बड़ी ऊर्जा है लेकिन उन्हे अपनी ऊर्जा का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
मार्ट ने गांधीजी से पूछा कि “आपके जीवन मे आशा निराशा के कई प्रसंग आते होंगे ,उनमे आपको किस चीज़ से ज्यादा आश्वासन मिलता है?”
गांधी जी ने उत्तर दिया कि “हमारे देश की जनता शांतिप्रिय है। उससे लाख छेडछाड़ की जाये, वह अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ेगी।”
उनका दूसरा प्रश्न था कि – “आपको कौन सी चीज़ ज्यादा चिंतित करती है।”
तब गांधी जी ने कहा कि – “शिक्षित लोगो मे दया भाव सूख रहा है और, वह मुझे ज्यादा चिंतित कर रही है।”