हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ जन्मदिवस विशेष – “मेरी नजर में हरिशंकर परसाई” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

?  आलेख – मेरी नजर में हरिशंकर परसाई ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(परसाई जी के 101वे जन्मदिन पर विशेष)

मेरी नजर में भारतीय व्यंग्य का वह नाम , जो किसी परिभाषा या आकलन में बंधता ही नहीं, हरिशंकर परसाई है। उन्हें पढ़ो तो वे व्यंग्यकार कम और समाज के इतिहासकार ज्यादा लगते हैं। इतिहास तो तारीखों और घटनाओं का ब्यौरा भर देता है, पर परसाई उन तारीखों और घटनाओं के बीच छिपे मनुष्य के मनोभाव, उसकी दोहरी सोच और उसके छलावे को पकड़ते हैं। वे ऐसी टार्च वाले हैं, जो समाज के अंधेरे कोनों में प्रकाश डाल कर वहां की गंध, वहां की सड़ांध, वहां की विडंबना को पाठक के सामने सजीव कर देती है।

उन को पढ़ते हुए लगता है जैसे हमारे ही घर के आंगन में कोई आईना रख दिया गया है। हम अक्सर समाज की आलोचना बड़े आराम से करते हैं लेकिन जब वही समाज हमारे भीतर की कमज़ोरियों को उजागर कर देता है, तब हम बरबस चौंकते हैं। परसाई की यही ताकत है। वे हंसाते हैं, और उसी हंसी में हमें हमारा कुरूप प्रतिबिंब दिखा देते हैं।

वो व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं करता, बल्कि पूरी व्यवस्था की पोल खोलता है। नेता, अफसर, बाबू, पंडित, साधु सब उनकी दृष्टि में समान रूप से कटघरे में खड़े होते हैं।  ऐसा बिलकुल नहीं कि वे स्वयं बहुत आदर्श के पुतले ही थे लेकिन वे सिर्फ दूसरों पर नहीं, अपने ही वर्ग और अपने ही जीवन पर भी तंज कसने से पीछे नहीं हटे। यही उनकी ईमानदारी है, यही उनकी प्रामाणिकता है।

हरिशंकर परसाई हिंदी के पहले लेखक थे, जिन्होंने नए स्वरूप में व्यंग्य को साहित्य की मुख्यधारा में स्थापित किया। उन्होंने व्यंग्य को अखबारी स्तंभ से उठाकर साहित्यिक गरिमा दी। उन्होंने साबित किया कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि चिंतन है। उनकी लेखनी किसी तलवार से कम नहीं थी, पर यह तलवार लहू नहीं बहाती थी, बल्कि पाठक की आंखें खोल देती थी।

मेरी नजर में परसाई सिर्फ व्यंग्यकार नहीं, बल्कि एक सामाजिक पर्यवेक्षक तथा दार्शनिक थे। उन्होंने यह दिखाया कि हास्य और व्यंग्य सिर्फ हंसाने की कला नहीं है, बल्कि समाज को बदलने का सबसे सशक्त उपकरण है। परसाई को पढ़ते हुए लगता है कि जैसे वे हमारे सामने बैठे हों और हमारी ही भाषा में हमारी कमियों को हमें सुना रहे हों।

हर दौर में परसाई प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनकी व्यंग्य दृष्टि किसी समय विशेष तक सीमित नहीं है। वे आदमी की उस आदत पर चोट करते हैं, जो हर युग में वही रहती है, पाखंड, लालच, ढोंग, सत्ता का दुरुपयोग शाश्वत प्रवृत्ति है। यही कारण है कि आज भी जब हम उन्हें पढ़ते हैं तो लगता है कि वे हमारे आज पर लिख रहे हैं, जबकि वे दशकों पहले चले गए।

मेरे लिए परसाई की लेखनी वह चेतावनी है कि यदि समाज अपनी कमजोरियों को पहचान कर सुधार नहीं करेगा तो उसका पतन निश्चित है। वे हंसते-हंसते हमें रुला जाते हैं और यही उनका सबसे बड़ा साहित्यिक अवदान है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – धुंध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – धुंध ? ?

परिचितों की फेहरिस्त जहाँ तक आँख जाती है, अपनों की तलाश में पर नज़र धुंधला जाती है।

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 11:21बजे,  12 नवंबर 2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६२ ⇒ एक और अश्वत्थामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक और अश्वत्थामा।)

?अभी अभी # ७६२  ⇒ आलेख – एक और अश्वत्थामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज मुझे दर्द है,फिर भी लिख रहा हूं। दर्द नहीं होता,तब भी लिखना तो था ही। कहीं पढ़ा है,दर्द का अहसास हो,तो लेखन अच्छा होता है। अब सुबह सुबह दर्द ढूंढने कहां जाऊँ,जब घर बैठे कमर में दर्द उठा,सोचा क्यों न गंगा नहाऊं।

दर्द जिस्मानी भी होता है,और रूमानी भी ! यूं तो दर्द रूहानी भी होता है,लेकिन उसका कॉपीराइट मीरा और सूर जैसे भक्तों के पास होता है। जिस्मानी दर्द लिखने से नहीं,उपचार से ठीक होता है। उसके लिए दर्द को छुपाना नहीं पड़ता,किसी हमदर्द को बताना पड़ता है। बात दवा दारू तक पहुंच जाती है। ।

मैंने मांडू देखा,कई बार देखा ! लेकिन वह मांडू नहीं देखा,जिसका जिक्र स्वदेश दीपक ने “मैंने मांडू नहीं देखा” में किया है। साफ साफ शब्दों में कहूं तो मैंने अभी खंडित जीवन का कोलाज नहीं देखा। क्या जीवन में सुख ही सुख है,दुख नहीं, अथवा दुख ही दुख है,सुख नहीं ! सृजन स्वांतः सुखाय किया जाता है तो क्या यही सृजन सुख कभी कभी स्वांतः दुखाय भी हो सकता है।

एक लेखक खयाली घोड़े दौड़ाता है,लेकिन वे घोड़े खयाली नहीं होते,कभी कभी असली भी होते हैं। यथार्थ और कल्पनाशीलता का मिश्रण गल्प कहलाता है,फिर आप चाहे आप इसे कथा कहें या कहानी। लेखक यथार्थ से पात्र उठाता है,उसे अपना नाम और रूप देकर भूल जाता है। जब ये ही पात्र सजीव बनकर कथा कहानियों में उतर जाते हैं,तो एक कहानी अथवा उपन्यास बन जाता है।।

बस यहीं से ये काल्पनिक पात्र,जिन्हें लेखक ने मूर्त रूप दिया है,उसके पीछे पड़ जाते हैं। परमात्मा को जिस तरह यह जीव घेरे रहता है,उसके पात्र रात दिन उसके पीछे पड़े रहते हैं। क्या तुमने मेरे साथ न्याय किया। क्या तुम मुझे एक कठपुतली की तरह नहीं नचाते रहे। जब कोई लेखक, लेखन में डूब जाता है,तब ऐसा ही होता है।

एक कवि की कल्पना को ही ले लीजिए,जहां न पहुंचे रवि ! यानी जहां तक रवि का प्रकाश न पहुंचे,कवि पहुंच जाता है। तो फिर वहां तो अंधकार ही हुआ न ! तो कहीं सूर,सूर्य बन जाते हैं,और तुलसी शशि, केशव अगर तारे हैं तो शेष जुगनू। कहने को आचार्य रामचंद्र शुक्ल कह गए, लेकिन फिर भी एक लेखक तमस, संत्रास, कुंठा और अवसाद के अंध कूप में जब जा बैठता है, तब उस स्वदेश का दीपक भी बुझ जाता है। ।

बिना डूबे भी कोई लेखक बना है,कवि बना है। कलम तो स्याही में डूबकर अपनी प्यास बुझा लेती है,कवि को अपनी कविता के लिए किसी प्रेरणा की जरूरत होती है तो लेखक को डूबने के लिए शराब का सहारा लेना पड़ता है। बहुत दुखी करते हैं,उसके ही बनाए हुए पात्र उसे। वह क्या करे। होते हैं कुछ नील कंठी,जो अपने पात्रों का गरल ,

कंठ में ही धारण कर लेते हैं,लेकिन शेष को तो उसमें डूबना ही पड़ता है।

दुख का अहसास इतना ही काफी है मेरे लिए। मैं अपने पात्रों का दुख दर्द सहन नहीं कर सकता। मैं स्वदेश दीपक नहीं बन सकता। मैंने मांडू नहीं देखा। मैने मांडू नहीं देखा। मैं एक और अश्वत्थामा नहीं बनना चाहता जो सृजन के संसार में तो अमर है, लेकिन उसका शरीर कहीं तो आत्मा कहीं। हे सुदर्शन चक्रधारी,उसे तार दे। उसका दर्द मेरा है। हर लेखक का है, जो लेखन का दर्द जानता है। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५५ ☆ वैचारिक सुदृढ़ता… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वैचारिक सुदृढ़ता। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५५ ☆ वैचारिक सुदृढ़ता

जीवन में बाधाएँ आपको मजबूत बनाने हेतु आती हैं । जो होता है; अच्छे के लिए होता है , यही स जीवन का मूल मंत्र है ।

किसी ने कह दिया आप से कुछ नहीं बनता और आपने मान लिया ये कहाँ तक उचित है ? किसी को इतना हक देना कि वो आपके कार्यों का मूल्यांकन करे बिल्कुल उचित नहीं, ईश्वर ने हर व्यक्ति को विशिष्ट बनाया है , एक के जैसा दूसरा हो ही नहीं सकता, जब हमारे हाथ की उँगलियाँ , एक ही माता- पिता की सन्ताने , एक गुरु के शिष्य, एक वृक्ष के फल , एक डाल के फूल ,ये सब परस्पर भिन्न हैं तो हम आपस में ये उम्मीद क्यों करते हैं, कि सब कुछ हमारे अनुरूप हो ।

कभी आपने गौर किया कि किस तरह छोटे- छोटे कीड़े, मकड़ी न सिर्फ़ फूल वरन पत्तियों को भी खाते हैं , जिसका उपचार तो कीट नाशकों द्वारा कर दिया जायेगा पर हमारे जीवन में जो घुन रूपी कीड़ें हैं उनका इलाज़ कैसे हो इसका चिन्तन अवश्य करना चाहिए ।

केवल उदास होने से कोई हल नहीं मिलता, दृढ़ इच्छा शक्ति व मजबूत हृदय से ही आप जीवन में आने वाले बाधा रूपी कीटों का उन्मूलन कर सकते हैं । जीवन में खर पतवारों को गाजर घास की तरह न पनपने दें, सही समय पर जागें अन्यथा मानसिक अवसाद से कोई नहीं बचा पायेगा ।

एक बार पुनः सोचें कि धरती के अलग- अलग हिस्सों में मौसम एक सा नहीं रहता, खान- पान, संस्कृतियाँ सब कुछ भिन्न , ऐसी स्थिति में समझदारी से निर्णय लेना चाहिए, केवल अंतरात्मा की आवाज के आधार पर निर्णय कर सही गलत का भेद करें क्योंकि परम आत्मा ही अन्तरात्मा है ।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३० ☆ आलेख – इंसानियत का अपराधीकरण… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “इंसानियत का अपराधीकरण“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३० ☆

✍ आलेख – इंसानियत का अपराधीकरण… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

किसी के प्राण निकाल लिए जाएं तो क्या न्याय होगा उसके बाद। किसी की इज्जत लूट ली जाए या नाम पर धब्बा लगा दिया जाए तो क्या न्याय होगा और कौन कर पाएगा न्याय। कांच का बर्तन जब टूट जाए तो कौन जोड़ पाएगा उसे और जब तक उसे ‌जोडा नहीं जाता तब तक न्याय कहां और कैसा? और जोड़ना असंभव है तो न्याय भी असंभव है। जिस तरह जान के बदले जान न्याय का एक मानदंड बनाया गया था वैसे ही इज्जत के बदले इज्जत न्याय का मानदंड बन सकता है?

लेकिन यहां तो प्राण और इज्जत ‌दोनों के मूल्य ही बदल गए हैं।   एक के प्राण बहुमूल्य तो दूसरे के प्राण का कोई मूल्य नहीं। इसी प्रकार एक की इज्जत पूरे समाज व देश की इज्जत तो दूसरे की इज्जत मिट्टी बराबर भी नहीं। कोई मूल्य नहीं, कोई महत्व नहीं।

बड़े बड़े लोग मानवीयता की बात करते हैं, इंसानियत की बात करते हैं – लेकिन तभी तक जब तक उनके ऊपर नहीं बीतती। इसके अलावा जाति के आधार पर अपराध की परिभाषा बदल जाती है तो कभी राजनीतिक रंग देकर अपराध का स्वरूप ही बदल जाता है।  आम जन अपराध के समाचार से कितना आहत होता है, उसके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी चिंता तो किसी को है, ऐसा लगता ही नहीं। सब कुछ खेल की रिपोर्टिंग की तरह चलता रहता है। अभी मनुष्य इतना उन्नत नहीं हुआ है कि वह अपराध समाचार को खेल भावना से महसूस करे।  इससे मनुष्य की महसूस करने की क्षमता की कोमलता नष्ट हो रही है। कोमल भावनाएं कुचल रही हैं और दया करुणा की भावनाओं का अंत होता दिखाई पड़ रहा है।  इस कोमलता को कायरता में बदल‌ दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। पीड़ित को दुश्चरित्र, और अपराधी को मासूम‌ बता कर अपराध के स्वरूप को ही बदल दिया जाए तब भी आश्चर्य नहीं होगा।

जिन गुणों के कारण मनुष्य इंसान कहलाता है और इंसानियत को उच्च प्राथमिकता प्राप्त है तो अपराधों को जाति, धर्म, राजनीति के आधार पर उच्चताबोध प्रदान किया जाएगा, अपराध की जघन्यता वादी प्रतिवादी में बँट जाएगी, भावनाएं  पत्थर समान कठोर हो जाएंगी तो इंसानियत का भी अपराधीकरण हो जाएगा और जीने की सार्थकता भी अर्थ खो बैठेगी।  इंसानियत को बचाने का अभी समय है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६१ ⇒ एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन।)

?अभी अभी # ७६१  ⇒ आलेख – एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बुखार, सरदर्द, सर्दी जुकाम और हाथ पाँव टूटना मानव शरीर का धर्म है। इन्हें दैहिक ताप कहा गया है। समय के साथ इन्हें बीमारियों के साथ जोड़ा जाता है, इनको नए नए नाम दिए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है, मच्छरों के काटने से मलेरिया हो जाता है। अधिक शारीरिक परिश्रम, मानसिक थकान इत्यादि से हाथ पाँव में टूटन और जुकाम से सरदर्द भी हो सकता है।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। चिकित्सा विज्ञान में भी आविष्कार हुए। आयुर्वेद, यूनानी और होमियोपैथी चिकित्सा के साथ ही साथ अंग्रेज अपने साथ अंग्रेजी दवा भी लेते आए। कई घरों में आज भी प्राकृतिक चिकित्सा पर ही जोर दिया जाता है। लेकिन बीमारियां हैं कि बढ़ती ही जाती हैं, और उन्हें नए नए नाम दे दिए जाते हैं। ।

एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन की तिकड़ी, पुरानी भारतीय क्रिकेट टीम के स्पिन गेंदबाज, प्रसन्ना, वेंकटराघवन और चंद्रशेखर की याद ताजा कर देती हैं। इन गेंदबाजों की तिकड़ी ने मिल जुलकर कितने डंडे उखाड़े, इनके कारण कितने विदेशी बल्लेबाजों को बुखार आया, सरदर्द हुआ, इतिहास गवाह है।

तब ना तो घरों में टी. वी. था, और ना ही लोगों के हाथ में मोबाइल।

सभी विज्ञापन रेडियो, अखबारों और पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों की जबान पर चढ़ जाते थे। एक और जबरदस्त माध्यम था विज्ञापन का, सिनेमाघर का विशाल परदा, जहां डॉक्यूमेंट्री फिल्म के साथ साथ इन दवाओं की तिकड़ी यानी एस्प्रो, एनासिन और सेरिडोन के विज्ञापन प्रसारित होते थे। अच्छी और खराब फ़िल्म से इन दवाओं का भी व्यापार घटता बढ़ता रहता था। तब एस्प्रो की गोली को टिकिया बोलते थे। ।

नर्सरी राइम्स की तरह इन दवाओं के विज्ञापन बच्चे बच्चे की जुबान पर रटे हुए थे। सर्दी जुकाम में, एस्प्रो देता है आराम। सर का दर्द भगाता है, दर्द बदन का जाता है। एस्प्रो ले लो, ले लो एस्प्रो ! और उसके बाद अमीन सयानी की राहत भरी आवाज़। सेरिडोन के चार फायदे चार उंगलियों के माध्यम से गिनाए जाते थे। सरदर्द, बुखार, जुकाम और बदन दर्द। एक गोली में सब गायब।

आजकल वैक्सीन का दौर चल रहा है। क्रिकेट की स्पिन तिकड़ी की तरह लोग इस संकट मोचक तिकड़ी को भी भूल गए हैं। अब इस तिकड़ी को नया नाम दिया गया है, पैरासिटामोल। साधारण भाषा में क्रोसिन पैन रिलीफ और फिर जितनी ऊँची दुकान, उतने ही महंगे पकवान।

अगर बुखार उतर नहीं रहा है तो डेंगू, चिकनगुनिया की आशंका के चलते पहले खून की जांच भी जरूरी हो जाती है।

इस तिकड़ी की पुरानी सहेली सेरिडोन को वापस विज्ञापन में देखकर बचपन के दिन याद आ गए। एस्प्रो ले लो, ले लो एस्प्रो।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४३ – देश-परदेश – International Homeless Animals Day 17th August ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४३ ☆ देश-परदेश – International Homeless Animals Day 17th August ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विगत एक सप्ताह से इस विषय को लेकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर अनेक प्रतिक्रियाएं, विरोध रैली से लेकर कुछ संगठन आवश्यकता से अधिक सक्रिय हो गए हैं।

सभ्य समाज के वो लोग जो घर से निकलने से पूर्व अपने ड्राइवर से कार का एयर कंडीशनर चालू करवाकर कार में बैठ पाते है, धूप में पसीना बहाते दिखे। ऐसे लोगों ने तो कार की बंद खिड़कियों से ही गली के कुत्तों को कार के पीछे दौड़ते हुए देखा होगा।

सड़कों पर हमारे द्वारा फैलाए गए कचरे को अलसुबह बीन कर अपना पेट भरने वाले गरीबों पर सड़क के ये कुत्ते काटने को दौड़ते हैं, मानो सड़क के कचरे पर सिर्फ इन कुत्तों का ही हक हैं।

NGO के माध्यम से अनेक लोग बड़ी रकम प्राप्त कर अपने ऐशो आराम पर उड़ा देते हैं। अंग्रेजी भाषा में प्रवीण ऐसे लोग अत्यधिक मुखर प्रवृत्ति के होते हैं। ये लोग क्या ही गली के कुत्तों के लिए कुछ कर पाते हैं। अधिकतर कुत्ते तो गरीबों के घर के आस पास रहकर वहीं रुख सूखा खा लेते हैं। बड़े परिसरों के आस पास वहां के गार्ड्स ही इनके लिए भोजन की व्यवस्था करते है।

कुत्तों की बढ़ती आबादी से बिल्लियां बहुत कम रह गई हैं। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, कम बिल्लियों के कारण कबूतरों की आबादी तो आसमान से भी ऊपर चली गई हैं। उनकी बढ़ती संख्या मानव जीवन के लिए खतरा हो चुकी हैं।

धार्मिक प्रवृति के लोग भी जानवरों और कबूतरों को लेकर सक्रिय हो चुके हैं। “Excess of every thing is bad” से तो ये ही अर्थ निकलता है, मानव, कुत्ते और कबूतरों की बढ़ती आबादी पृथ्वी के लिए बोझ बन रही हैं।

मानव आबादी पर नियंत्रण के परिणाम आने लगे है, उम्मीद करते हैं, इसी प्रकार से अन्य जीवों की आबादी को नियंत्रण में रखने के लिए स्वयंभू पशु प्रेमी भी विचार करेंगे, वर्ना फिर न्यायालय जैसी संस्थाओं को आगे आना पड़ रहा हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६०  ⇒ दस्तक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दस्तक।)

?अभी अभी # ७६०  ⇒ आलेख – दस्तक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दस्तक, किसी के आगमन की आहट भी हो सकती है, और किसी प्रिय घटना की पूर्व-सूचना भी ! यह कोई गरजने-बरसने वाली स्थिति नहीं होती, कोयल की एक मधुर कूक होती है, जो याद दिलाती है, किसी के आने की, एक थपथपाहट होती है दरवाजे पर, क्या मैं अंदर आ सकता हूँ ?

दस तक गिनती गिनने में जितना वक्त लगता है, वह एक दस्तक ही होती है। दस्तक में धैर्य होता है, क्योंकि इसका प्रदर्शन घंटे-घड़ियाल अथवा डोअर बेल बजाकर नहीं किया जा सकता !

हाथ, जिसे दस्त भी कहते हैं, की पाँच उँगलियों में प्रमुख, अँगूठे की पड़ोसन अनामिका को मोड़कर जब दरवाज़े पर हौले-हौले ठक-ठक की जाती है, तब उसे दस्तक कहते हैं।।

दस्तक का दहलीज से बड़ा करीबी का संबंध है। आप फ़ोन पर, एस एम एस द्वारा, अथवा ई-मेल से दस्तक नहीं दे सकते। हाँ ! किसी के दिल के करीब जा, धीरे से दस्तक दे सकते हैं। दस्तक की आहट सबको सुनाई नहीं देती। जिसे दस्तक दी जाती है, उसे ही वह सुनाई देती है।

जब जवानी दस्तक देती है, किसे पता चलता है ! जब जीवन में अनायास खुशियां छा जाती हैं, किसी का प्रेम दिल पर दस्तक देता है, मन की किवड़िया खुल जाती है, सैयां जी आन, द्वारे खड़े होते हैं। ।

कभी कभी सिर्फ़ किसी के आने की आहट होती है, दरवाज़ा हवा से हिलता है, महसूस होता है, किसी ने दस्तक दी ! बड़ी उम्मीद से दरवाज़ा खोलते हैं, निराशा ही हाथ लगती है;

कौन आया है यहाँ,

कोई न आया होगा !

मेरा दरवाज़ा, हवाओं ने

हिलाया होगा।।

प्यासे सावन को बारिश की दस्तक की दरकार है, धरती तरस रही है, आसमाँ दस्तक दे। आज तो छूट है, चाहे छप्पर फाड़ दे।

अल्ला मेघ दे, पानी दे, गुड़ धानी दे।।

जिसे देर रात तक, फिक्र के मारे नींद नहीं आती, वह चाहता है, निद्रा देवी आँखों पर दस्तक दे, वह बाहें फैलाकर, आँख मूँदकर उसे अपने आगोश में ले ले।

कई दिनों से तलाश थी, कभी अच्छे दिनों की भी दस्तक हो !

पोस्टमैन जब कोई मनीऑर्डर लेकर आता था, दरवाज़े पर दस्तक बड़ी प्यारी लगती थी। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई है, देखता हूँ, शायद एक अच्छा दिन ही हो। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆ – हेमन्त बावनकर ☆

आचार्य भगवत दुबे

(www.e-abhivyakti.com  में आज संस्कारधानी जबलपुर के आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित इस आलेख को प्रस्तुत करते  हुए हम गौरवान्वित अनुभव करते हैं। अंतरराष्ट्रीय खातिलब्ध आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संक्षिप्त में लिखना असंभव है। आपकी गिनती हिन्दी साहित्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर के साहित्य मनीषियों में होती है। आचार्य भगवत दुबे जी से दूरभाष इंटरव्यू एवं सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित आलेख।)

🙏 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्रद्धेय आचार्य भगवत दुबे जी को जन्म दिवस १८ अगस्त पर शत शत प्रणाम 🙏

☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆ – हेमन्त बावनकर ☆

(यह आलेख २१ अप्रैल २०१९ को स्मृतिशेष जयप्रकाश पाण्डेय जी के प्रोत्साहन पर प्रकाशित किया गया था – हेमन्त बावनकर ) 

आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 3 पी एच डी (4थी पी एच डी पर कार्य चल रहा है) तथा 2 एम फिल  किए गए हैं। डॉ राज कुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी के साथ रुस यात्रा के दौरान आपकी अध्यक्षता में एक पुस्तकालय का लोकार्पण एवंआपके कर कमलों द्वारा कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किए गए।

बचपन से ही प्रतिभावन आचार्य जी अपने गुरुओं के प्रिय रहे हैं। वे आज भी अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने गुरुवर सनातन कुमार बाजपेयी जी को देते हैं  जिन्होने न सिर्फ उन्हें प्रोत्साहित किया अपितु, उन्हें हिन्दी और अंग्रेजी की शिक्षा भी दी और आर्थिक सहायता भी। आज ऐसे गुरुवर मिलना अत्यंत सौभाग्य की बात है। हम हमेशा ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि ऐसी  गुरु-शिष्य परंपरा सदैव जीवित रहे।

संयोगवश आज “पृथ्वी दिवस” पर यह उल्लिखित करन मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है कि – आपकी पर्यावरण विषय पर कविता ‘कर लो पर्यावरण सुधार’ को तमिलनाडू के शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। प्राथमिक कक्षा की मधुर हिन्दी पाठमाला में प्रकाशित आचार्य की कविता में छात्रों को सीखने-समझने के लिए शब्दार्थ दिए गए हैं। साथ ही मौखिक अभ्यास प्रश्नावली भी दी गई है।

आपके महाकाव्य ‘दधीचि’ का उल्लेख के बिना यह आलेख अधूरा होगा। दधीचि महाकाव्य नौ सर्गों में विभक्त है जिनके नाम क्रमशः -‘दधीचि, सुरक्षा, गुरू, वृत्तासुर, मंत्रणा, सुषमा, आश्रम, बलिदान तथा युद्ध है । प्रारम्भ में मंगलाचरण और अन्त में दधीचि वंदना भी दी गयी है । दधीचि की कथा श्रीमद्भागवत, शिवपुराण, महाभारत, स्कन्द पुराण उपनिषद तैत्तिरीय संहिता तथा विभिन्न चरित कोषों में वर्णित है। दधीचि मंत्रवृष्टा ऋषि थे। आपने अपनी मौलिक कल्पना से इस चिर पुरातन कथा को एक नवीन स्वरूप प्रदान कर दिया है। आपने दधीचि को पहले राजा स्वीकार किया है । फिर उनकी आदर्श राज्य व्यवस्था का वर्णन किया है।

आपके ही शब्दों में  ‘‘मैने निश्चय कर लिया कि राजा दधीचि से ऋषि दधीचि तक का वर्णन कर मैं अपनी बात कहूंगा । इस महाकाव्य में दधीचि सर्ग का आधार मेरी यही मौलिक कल्पना शीलता है, जो पुराण प्रसिद्ध दधीचि के आख्यान से प्र्याप्त भिन्न होने हुए भी मूल कथानक से सामंजस्य बनाकर ही सुविकसित हुई है ।

इन्द्र और वृत्तासुर के युद्ध वर्णन पर वे लिखते हैं –

इक ओर वनुज कज्जल गिरि सा, तो लगते मेरू परंदर थे ।
दोनों पहाड़ करके दहाड़ टकाराकर गिरे भयंकर थे ।।
विक पाल डरे दिग्गज डोले, घबड़ाकर चतुर्दिशाओं के ।
जब वाण परंदर के छोड़े जाज्वल्यमान उल्काओं के ।।

Sanso ke Santoor by Acharya Bhagwat Dubey by [Dubey, Acharya Bhagwat] Aakad Bakad by Acharya Bhagwat Dubey: अक्कड़ - बक्कड़

आपके कई ईबुक के स्वरूप में अमेज़न पर उपलब्ध है। इनमें से प्रमुख  साँसों के संतूर एवं अक्कड़-बक्कड़ प्रमुख हैं। साँसों के संतूर काव्य संग्रह  में समाहित दार्शनिक जीवन दृष्टि एवं सत्यम, शिवम, सुंदरम की आराधना हैं,  चिंतन दर्शन सृजन का पाथेय हैं । सासों के संतूर में एक हजार से ज्यादा दोहे हैं इन में श्रंगार सौंदर्य के साथ अन्याय, अनीति,मूल्यों के संकट, शोषण पर प्रहार किया हैं। किन्तु आपकी अधिकतम पुस्तकें प्रिंट स्वरूप में ही हैं।

 

संस्कारधानी के ही वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी ने अभी हाल ही में आचार्य जी से एक संक्षिप्त चर्चा की एवं उनके अनुरोध पर आचार्य भगवत दुबे जी ने लोकतन्त्र के महापर्व पर चुनाव-चकल्लस के अंतर्गत “घोषणा पत्र” शीर्षक से अपनी व्यंग्य रचना का पाठ किया।

इस विशेष विडियो के लिए हम श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के हृदय से आभारी हैं।

(स्मृतिशेष जयप्रकाश पाण्डेय जी द्वारा उस समय  प्रेषित  विडियो प्रस्तुत है जिसमें आचार्य भगवत दुबे जी ने अपनी  व्यंग्य कविता “घोषणा पत्र” का काव्य पाठ किया है।)

विस्तृत परिचय

नाम   – आचार्य भगवत दुबे
पिता  – स्व. ओंकार प्रसाद जी दुबे
माता – श्रीमती रामकली दुबे
पत्नी  – स्व.श्रीमती विमला दुबे (आदर्श शिक्षिका)
जन्म  – 18.08.43
जन्म स्थान – डगडगा हिनौता चरगवां रोड, जबलपुर (म.प्र.)
शिक्षा  – एम.ए. एल.एल.बी. कोविद (संस्कृत)
व्यावसायिक विवरण-
(1) कृषि (2) रत्नावली महिला महाविद्यालय गढा, जबलपुर में पाच वर्ष तक आचार्य पद पर कार्य किया । (3) मेडिको सोशल वर्कर, मेडीकल कालेज जबलपुर से सेवा निवृत्त  ।

43 प्रकाशित कृतियां: (कुछ प्रमुख)

(1) स्मृतिगंधा  वियोग श्रंगार प्रधान गीत संग्रह 1990 प्रकाशक हिन्दी मंच भारती, जबलपुर.
(2) अक्षर मंत्र  साक्षरता से संबंधित गीत संग्रह 1996 जिला साक्षरता साहित्य समिति, जबलपुर.
(3) शब्दों के संवाद  एक हजार दोहों का संग्रह  1996 मेघ प्रकाशन दिल्ली.
(4) हरीतिमा  पर्यावरण विषयक दोहा संग्रह 1996 विकास एवं पर्यावरण संस्था.
(5) रक्षा कवच  विभिन्न रोगों के लक्षण, कारण, दुष्परिणाम एवं निदान विषयक गीत संग्रह(स्वास्थ्य शिक्षा हेतु) 1997 पलाश प्रकाशन.
(6) संकल्परथी  वनवासियों की जीवन पद्धति, संस्कृति और पंचायती राज की परिकल्पना पर केन्द्रित काव्य कृति 1997 एन आई डब्ल्यू, सी वाई डी, जबलपुर.
(7) बजे नगाडे काल के  जबलपुर की भूकम्प त्रासदी पर केन्द्रित दोहा संग्रह 1997 महापौर जबलपुर.
(8) वनपांखी (गीत)   जल, जंगल, जमीन, विस्थापन एवं लोक संस्कृति पर केन्द्रित गीत संग्रह 1998 आदिवासी स्वशासन के लिए राष्ट्रीय मोर्चा.
(9) दधीचि (महाकाव्य)   विश्वशांति के लिए समकालीन प्रासंगिकता के परिपे्रक्ष्य में महर्षि दधीचि के आत्मोत्सर्ग पर केन्द्रित बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य 1998 समय प्रकाशन दिल्ली.
(10) जियो और जीने दो (गीत)       मानवाधिकारों पर केन्द्रित काव्य कृति 1990 मानव अधिकार कानून नेटवर्क की ओर से
(11) विषकन्या (मद्यनिषेध)  मद्य निषेध विषयक गीत-लोकगीत संग्रह 1999 एन आई डब्ल्यू, सी वाई डी, जबलपुर.
(12) शंखनाद (राष्ट्रीय गीत)    राष्ट्रीय पृष्ठभूमि पर केन्द्रित ओज गीत संग्रह 1999 समय प्रकाशन दिल्ली
(13) चुभन (गजलें)   गजल संग्रह 2000 प्रकाशन मंचदीप जबलपुर
(14) दूल्हा देव  कहानी संग्रह (अधिकांश आंचलिक कहानियां) 2000 समय प्रकाशन दिल्ली
(15) शब्द विहंग (दोहे)   एक हजार दोहों का संग्रह 2001 पाथेय प्रकाशन जबलपुर
(16) प्रणय ऋचाएं (गीत)  श्रंगार गीत संग्रह 2000 पाथेय प्रकाशन जबलपुर
(17) कांटे हुए किरीट (काव्य)  व्यंग्य गीत संग्रह 2001 कांटे हुए किरीट म.प्र.आंचलिक साहित्यकार परिषद.
(18) करूणा यज्ञ पशु-पक्षी, जीव-जन्तु पर्यावरण एवं गोरक्षा पर केन्द्रित काव्यकृति 2001 श्री कृष्ण गोपाला जीव रक्षा केन्द्र दुर्ग, छत्तीसगढ.
(19) हिन्दी तुझे प्रणाम  हिन्दी भाषा की दशा-दिशा एवं संवर्धन की पृष्ठभूमि पर केन्द्रित काव्य संग्रह 2003 अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद.
(20) कसक (गजलें)  गजल संग्रह 2003 अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद.
(21) शिकन (गजलें)   गजल संग्रह 2004 अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद.
(22) हिरण सु्रगंधों के (नवगीत)   नवगीत संग्रह
(23) घुटन  गजल संग्रह
(24) हम जंगल के अमलतास नवगीत संग्रह
(25) अक्कड बक्कड  बाल गीत
(26) मां ममता की मूर्ति          गीत संग्रह
(27) सांई की लीला अपार       गीत संग्रह
(28) अटकन चटकन  बाल गीत
(29)  यादों के लाक्षागृह  नवगीत संग्रह
(30)  चहकते चितचोर  बालगीत संग्रह
(31)  गीत ये पीरी पही के  जनगीत संग्रह
(32)  गरजते शिला खण्ड  व्यंग्य संग्रह
(33)  मृग तृष्णा   लघुकथा संग्रह
(34)  संशय के संग्राम  खण्ड काव्य
(35)  गागर में सागर  हाकु काव्य
(36)  भक्ति की भागीरथी   भक्ति गीत संग्रह
(37)  सृजन सोपान  गद्य आलेख
(38) संस्कृतियों के सेतु   चिन्तन आलेख संग्रह
(39) अटकन चटकन  बाल गीत संग्रह
(40)  अक्कड़ बक्कड़  बाल गीत संग्रह
इसके अतिरिक्त पाँच हजार दोहे अभी भी अप्रकाशित हैं ।

संपादन –
(1)  मधुसंचय    जबलपुर के कवियों की रचनाओं का संकलन
(2)  मानस मंदाकिनी  गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व पर केन्द्रित स्मारिका
(3)  गौरवान्विता   कादम्बिनी क्लब जबलपुर की स्मारिका
(4)  यशस्विनी कादम्बरी के साहित्यकार/पत्रकार सम्मान समारोह की स्मारिका
(5)  धरोहर    काव्य संकलन
(6)  विरासत   काव्य संकलन
(7)  अमानत   काव्य संकलन
(8)  सौगात    काव्य संकलन
(9)  दीपशिखा    त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका

विशेष
शताधिक पुस्तकों की समीक्षा तथा अनेक पुस्तकों की भूमिका लेखन ।

कैसिट्स –
(1)  ह्यूमन वेलफेयर एण्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन इन्दौर द्वारा रक्षा कवच के गीतों का कैसिट ।
(2)  श्री अजय पाण्डेय राष्ट्रीय अध्यक्ष मानवाधिकार समिति द्वारा बनवाया गया राष्ट्रीय रचनाओं का कैसिट ‘दुर्गावती‘    श्रीमती सोनिया गांधी अ.भा.राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा लोकार्पित ।
(3)  लगभग एक दर्जन लोक गायकों के कैसिटों में लोकगीत सम्मिलित ।
(4)  श्री आशोक गीते खण्डवा द्वारा व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक ‘अभिव्यक्ति‘ का प्रकाशन ।
(5)  परिक्रमा संस्था जबलपुर द्वारा सन् 2003 के लिए कराये गये एक गुप्त सर्वेक्षण में जबलपुर के दस चर्चित व्यक्तित्वों में सम्मानित।
(6)  क्राइस्ट चर्च व्यापस सीनियर सेकेन्डरी स्कूल के तीन छात्रों द्वारा लघु शोध पत्र ।
(7)  कुसुम महाविद्यालय सिवनी मालवा एम.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा द्वारा व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य संपन्न
(8)  पी.एच.डी. के अनेक शोध प्रबन्धों में संदर्भ ।
(9)  कुरूक्षेत्र विश्व विद्यालय से दोहों पर एम.फिल. (हिसार से राजकुमार द्वारा)
(10) कामराज युनिवर्सिटि से नवगीत पर एम.फिल. प्रारंभ (छात्रा निर्मला मलिक द्वारा, निदेशक ्रडाॅ. राधेश्याम शुक्ल)
(11) डॉ ओंकार नाथ द्विवेदी के निर्देशन में, प्रियंका श्रीवास्तव द्वारा सुल्तानपुर से महाकाव्य दधीचि पर पी..एच.डी. प्रारंभ

शताधिक सम्मान – अलंकरण (कुछ प्रमुख) 

1)  कहानी ‘दूल्हादेव‘ के लिये म.प्र.आंचलिक साहित्यकार परिषद की ओर से स्व. श्री रामेश्वर शुक्ला अंचल की अध्यक्ष्ता में मुख्य  अतिथि कादम्बिनी के पूर्व संपादक श्री राजेन्द्र अवस्थी द्वारा स्व. नर्मदा प्रसाद खरे स्मृति सम्मान 1000 रू. नगद।
(2)  दोहा संग्रह ‘शब्दों के संवाद‘  पर अखिल भरतीय संस्था अभियान द्वारा ‘भाषा भूषण‘ अलंकरण एक हजार रूपये के पुरस्कार।
(3)  दधीचि महाकाव्य पर स्व. रामानुजलाल श्रीवास्तव ‘ऊंट‘ बिलहरवी की स्मृति में ‘महाकवि निराला सम्मान‘ मुख्य अतिथि डॉ राममूति त्रिपाठी द्वारा।
(4) दधीचि महाकाव्य पर ‘गुजरात हिन्दी विद्यापीठ‘ की ओर से मुख्य अतिथि महामहिम राज्यपाल श्री सुन्दर सिंह भण्डारी द्वारा ‘हिन्दी गरिमा सम्मान‘ (ताम्रपत्र)
(5) 1999 की सर्वश्रेष्ठ पद्यकृति ‘दधीचि‘ के लिए अ.भा. अभियान संस्था जबलपुर द्वारा ‘दिव्य‘ अलंकरण ‘हिन्दी रत्न‘ एवं पाँच हजार रूपये ।
(6)  ‘मंचदीप‘ जबलपुर की ओर से ‘दधीचि‘ महाकाव्य पर पद्म श्री गोपाल दास नीरज सम्मान 11000 रूपये एवं भव्य अलंकरण स्वयं नीरज जी के कर कमलों से ।
(7) अखिल भारतीय साहित्यकार कल्याण मंच रायबरेली द्वारा कहानी संग्रह ‘दूल्हा देव‘ पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान मुख्य अतिथि डॉ गिरिजाशंकर त्रिवेदी संपादक नवनीत (मुम्बई) द्वारा ।
(8) डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय अस्मिता दर्शी साहित्य अकादमी उज्जैन (म.प्र.) द्वारा दधीचि महाकाव्य पर ‘डॉ. अम्बेडकर सम्मान‘ अध्यक्ष डॉ. पुरूषोत्तम सत्यप्रेमी एवं मुख्य अतिथि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा ।
(9) म.प्र.आंचलिक साहित्यकार परिषद के सप्तम अधिवेशन हर्रई जागीर में दधीचि महाकाव्य पर श्रीमती राधा सिंह संस्कृति सम्मान 1100 रू. मुख्य अतिथि डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी द्वारा ।
(10) अ.भा. साहित्य कला मंच मुरादाबाद द्वारा समग्र लेखन पर स्व. सतीश चन्द्र अग्रवाल स्मृति सम्मान साहित्य श्री 2100 रू. डॉ. विश्वनाथ शुक्ल द्वारा ।
(11) अ.भा. सृष्टि समाकलन समिति जालौन (उ.प्र.)द्वारा महाकाव्य दधीचि पर ‘काव्य किरीट‘ सम्मान ।
(12) शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदा पुरम (म.प्र.) द्वारा महाकाव्य दधीचि पर ‘पं. राधेलाल शर्मा हिामंशु‘ सम्मान ।
(13) 4 मई, 2003 को साहित्य, संस्कृति कला संगम अकादमी परियावा प्रताप गढ द्वारा समग्र लेखन पर ‘विद्यावाचस्पति‘ मानदोपाधि ।
(14) हिन्दी प्रचारिणी समिति छिन्दवाडा द्वारा सारस्वत सम्मान ।
(15) साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था छिन्दवाडा द्वारा महाकाव्य दधीचि के लिए सम्मानित ।
(16) यू.एस.एम. पत्रिका तथा युवा साहित्य मंडल गाजियाबाद के वार्षिकोत्सव पर त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल डाॅ माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल बी सत्यनारायण रेड्डी द्वारा वरिष्ठ साहित्य सेवी सम्मान ।
(17) श्री ऋषिकेश सेवाश्रम (धर्माधिष्ठान) अलीगढ द्वारा धर्मनिष्ठ सम्मानोपाधि ।
(18) आपदा प्रबंधन संस्थान भोपाल एवं संवाद सोसायटी फार एडवोकेसी एण्ड डेवलपमेंट जबलपुर द्वारा भूकम्प त्रासदी पर लिखित काव्यकृति ‘बजे नगाडे काल के‘ पर प्रशस्ति पत्र ।
(19) 1999 में ध्रुव प्रकाशन अहमदाबाद द्वारा श्रेष्ठ सृजन हेतु सारस्वत सम्मान ।
(20) म.प्र.लेखक संघ बैतूल (म.प्र.) द्वारा 16.4.2001 को ‘काव्याचार्य‘ सम्मानोपाधि ।
(21) नव सप्तक साहित्य श्रंखला के अंतर्गत प्रथम काव्यसप्तक के लिए चयनित एवं उसमें प्रकाशन के लिए उद्योग नगर गाजियाबाद द्वारा गौरवशाली रचनाकार के रूप् में सम्मानित ।
(22) माण्डवी प्रकाशन गाजियाबाद द्वारा काव्यकृति ‘कांटे हुए किरीट‘ के लिए ‘निर्मला देवी साहित्य स्मृति‘ सम्मान ।
(23) अ.भा.कवि सम्मेलन संयोजन समिति हाथरस द्वारा ‘काव्य प्रसून‘ सम्मान ।
(24) इंडियन फिजिकल सोसायटी सेन्ट्रल जोन द्वारा मनोरोग एवं चिकित्सा शिक्षा विषयक काव्यकृति ‘रक्षा कवच‘ के लिए सम्मानित ।
(25) सन् 2002 में ऋतंभरा साहित्यिक मंच कुम्हारी (छत्तीसगढ) द्वारा उत्कृष्ट काव्य धर्मिता के लिए सम्मानित ।
(26) कला साहित्य एवं उल्लेखनीय समाज सेवा के लिए साहित्यिक  संस्था खजुरी कला (भोपाल) द्वारा ‘दर्पण सृजन श्री‘ सम्मान ।
(27) अ.भा.साहित्यकार कल्याण मंच रायबरेली द्वारा वर्ष 2001 में दधीचि महाकाव्य पर ‘‘सूफी संत कवि जायसी सम्मान‘‘।
(28) साहित्यिक सांस्कृतिक क्रीडा एवं समाज सेवी संस्था जबलपुर द्वारा साहित्य सृजन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा के लिए ‘हरिशंकर परसाई‘ सम्मान ।
(29) मानव सेवा संस्थान, भोपाल द्वारा 1998 में उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए ‘साहित्य श्री‘ सम्मान एवं 252 रू. नगद।
(30) अमेरिकन बायोगाफिकल संस्था द्वारा राशि भुगतान करने की शर्त का विरोध करने के बाद भी रिसर्च बोर्ड की मानद सदस्यता प्रदत्त ।
(31) अ.भा. साहित्य परिषद बालाघाट द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदत्त ।
(32) संस्कार भारती राष्ट्रीय संगोष्ठी मेरठ प्रान्त द्वारा ‘संस्कार भारती सम्मान 2001.
(33) महावीर सेवा संस्थान कादीपुर, प्रतापगढ द्वारा दोहा संग्रह शब्दों के संवाद के लिए हिन्दी दिवस 1999 को ‘‘साहित्य शिरोमणि‘‘ सम्मान।
(34) 10 नवम्बर 2002 को भारती परिषद प्रयाग द्वारा उ.प्र. के विधान सभाध्यक्ष पं. केशरी नाथ त्रिपाठी के जन्मोत्सव पर श्रेष्ठ साहित्य सृजन के लिए सम्मानित ।
(35) संस्कार भारती शिक्षण संस्थान विक्रमपुर सुल्तानापुर द्वारा सुदीर्घ, उत्कृष्ठ सृजन साधना के लिए ‘बाबा पुरूषोत्तम दास स्मृति हस्त्राब्दि प्रतिभा सम्मान 2001.
(36) श्री राज राजेश्वरी त्रिपुर सुन्दरी मंदिर पवई, अमरपुर की ओर से माननीय श्री विश्वनाथ दुबे नगर निगम जबलपुर एवं गृह मंत्री श्री रघुवंशी द्वारा ‘सप्तर्षि सम्मान‘.
(37) पाथेय प्रकाशन जबलपुर द्वारा पाथेय श्री अलंकरण ।
(38) 24 दिसम्बर, 2001 को म.प्र. लेखक संघ जबलपुर द्वारा पत्रकार ‘स्व. हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह में सम्मानित ।
(39) उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दैनिक सी. टाइम्स जबलपुर की ओर से परम पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी द्वारा प्रशस्ति पत्र ।
(40) विमल स्मृति संस्था एवं आदर्श महिला मण्डल सीहोर द्वारा 6 जून, 2001 को उत्कृष्ट एवं प्रचुर साहित्य सृजन के लिए सम्मानित ।
(41) कहानी सग्रह दूल्हादेव पर नर्मदा अभियान द्वारा श्रीनाथ द्वारा राजथान से ‘‘हिन्दी भूषण‘‘ सम्मान ।
(42) सरिता साहित्य परिषद सहिनवां सुलनपुर द्वारा ‘कीर्ति भारती‘ (सर्वोच्च) सम्मान ।
(43) साहित्य साधना परिषद मैनपुरी द्वारा समग्र लेखन पर 20.02.05 को ‘‘कौशलो देवी अग्रवाल सम्मान‘‘ ।
(44) अखिल भारतीय साहित्य संस्कृति कला संगम अकादमी परियावा (प्रतापगढ) द्वारा समग्र लेखन पर ‘विद्यावारिधि‘ मानद उपाधि 2005.
(45) जन पत्रकार संघ नई दिल्ली द्वारा अभिनन्दन 2005.
(46) खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती संस्था द्वाराा मध्यप्रदेश काव्य रत्न सम्मान 2005.
(47) डॉ. राम निवास ‘मानव‘ अभिनन्दन समिति हिसार (हरियाणा) द्वारा साहित्य शिरोमणि सम्मान.
(48) कांटे हुए किरीट पर ‘दुष्यंतसम्मान‘ खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती हाजी मलंग शाह बाडी बी ओ बाडी पो. कल्याण 42130 ठाणे द्वारा 2.10.2005 को ।
(49) अखिल भारतीय साहित्य परिषद (कोटा इकाई) राजस्थान द्वारा डाॅ महेन्द्र सम्मान 2005.
(50) भारत भारती संस्थान गुना द्वारा स्वर्ण जयन्ती सृजनधर्मी सम्मान 2005.
(51) हिन्दी भाषा कुंभ दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा बैंगलोर द्वारा सम्मनित 2006.
(52) हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा मथुरा अधिवेश में ‘वाग्विदांवर‘ सम्मान 6 अगस्त 2006 को ।
(53) मध्यप्रदेश हिन्दी  लेखक संघ भोपाल द्वारा वर्ष 2006 का ‘अक्षर आदित्य‘ सम्मान 2100 रूपये ।
(54) म.प्र. तुलसी साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा वर्ष 2005 के लिए ‘तुलसी सम्मान‘ 1100 रूपये ।
(55) डॉ. चित्रा चतुर्वेदी द्वारा अपने पिता न्यायमूर्ति स्व. ब्रज किशोर चतुर्वेदी की स्मृति में स्थापित तुलसी सम्मान वर्ष 2006.
(56) हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा विधावागीश सम्मान 2006.
(57) हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा महादेवी वर्मा सम्मान 2007.
(58) कवि ‘‘रत्न‘‘ सम्मान भारती परिषद प्रयाग 2007.
(59) विद्यावारिधि (मानद) साहित्य प्रभा शिखर सम्मान 2007 देहरादून ।
(60) हिन्दी साहित्य सम्मेलन  कटक (उडीसा) 24 जून, 2007 ‘‘सारस्वत संस्तन‘‘ सम्मान ।
(61)  हिन्दी भाशा सम्मेलन पटियाला द्वारा 18 अपे्रल, 2010 को ‘‘साहित्य भूशण अलंकरण ।
(62)  14 सितंबर, 2010 को प्रतिभा सम्मेलन समारोह समिति गढा जबलपुर द्वारा गढा गौरव सम्मान ।
(63)  विक्रमशिला विश्वविद्यालय गांधीनगर ईशुपुर (भागलपुर) द्वारा ‘विद्यासागर‘ मानद उपाधि ।

आचार्य भगवत दुबे
प्रकाशन – बहुचर्चित दधीचि (महाकाव्य) एवं दूल्हादेव (कहानी संग्रह)
सहित काव्य विधा की तेईस कृतियां प्रकाशित । देश की शताधिक पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
संपादन – मधुसंचय, धरोहर,अमानत, विरासत, सौगात एवं उपलब्धि काव्य संग्रह तथा त्रैमासिक  दीपशिखा के साथ ही मानस मंदाकिनी एवं कादम्बरी (स्मारिका) का प्रतिवर्ष संपादन ।
विशेष  – तीन लघु शोध पत्र, दो एम फिल संपन्न एवं पी.एच.डी., संपन्नता की ओर ।
सम्मान – देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं उपाधियां/ अलंकार ।

© हेमन्त बावनकर  

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५९ ⇒ छेड़ने की उम्र ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छेड़ने की उम्र।)

?अभी अभी # ७५९  ⇒ आलेख – छेड़ने की उम्र ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

छेड़ा मेरे दिल ने,

तराना तेरे प्यार का

जिसने सुना खो गया

पूरा नशा हो गया ….

जब भी छेड़ने की बात छिड़ती है, बात eve teasing, यानी, छेड़खानी पर आकर ठहर जाती है। उत्तरप्रदेश में भाइयों की छेड़खानी पर बैन है, बैन यानी बंदिश। सहूलियत के लिए इन भाइयों को मजनू भाई कहा जाता है। बहन चाहें तो भाइयों को छेड़ सकती हैं। भाई बहनों का रिश्ता ही ऐसा है। बोलो बहना, ये सच है ना ?

छोड़ो छेड़ने की बातें, हमें इनसे क्या लेना देना।

हर काम की एक उम्र होती है। जब गुरुकुल का जमाना था, गुरु दक्षिणा स्वरूप, शिष्य जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ते थे। समय बदलता चला गया। गुरुकुल स्कूल, कॉलेज और संकुल होते चले गए। गुरु शिष्य संबंध फिर भी कायम रहा। हमारे स्कूल कॉलेज की उम्र में लड़के लोग जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ने की जगह ट्यूशन फीस के बदले लड़कियां ही छेड़ लेते थे।।

छेड़छाड़ और छेड़खानी में जमीन आसमान का अंतर है। बचपन में भाई बहन के बीच, संगी साथियों के बीच बात बात में एक दूसरे को चिढाना तथा परेशान करना आम बात है। किसी की किताब छुपा देना, तो किसी का एक पांव का मोजा, भी शैतानी और मसखरी की परिभाषा में आता था। भाई बहन की चोटी खींच रहा है और बहन मां से शिकायत कर रही है। यह छेड़छाड़ बड़े होकर एक मधुर स्मृति बन जाती है। बचपन के दिन भी क्या दिन थे।

किसी भी उम्र की लड़की अथवा महिला को गलत इरादे से छेड़ना अथवा उस पर फब्तियां कसना एक घृणित अपराध है, एक ऐसा पैशाचिक कृत्य है, जो दुर्भाग्य से जानवरों में नहीं, सिर्फ इंसानों में पाया जाता है, और यही कृत्य उन्हें इंसान से दरिंदा बना देता है। ईश्वर ने हर इंसान को निगाह भी दी है और नीयत भी। अगर निगाह अच्छी हो और नीयत साफ, तो छेड़खानी का एक अलग ही स्वरूप सामने आता है, जिस पर हम चर्चा करेंगे। ।

ताली दो हाथ से बजती है। आपस का परिचय हमारे मेलजोल और अच्छे व्यवहार से बढ़ता है। हर रिश्ते में प्रेम, आदर और समझदारी के साथ परिपक्वता भी जरूरी है। स्वस्थ संवाद और हंसी मजाक हमें न केवल खुशमिजाज बनाता है, यह रिश्तों में अपनापन बढ़ाता है और उन्हें और अधिक मजबूती प्रदान करता है।

शिक्षा और सह – शिक्षा का संबंध बाल मनोविज्ञान से है। एक समय था, जब सरकारी स्कूल लड़कों के अलग होते थे, और लड़कियों के अलग। केवल प्राइवेट और कॉन्वेंट स्कूल में ही सह – शिक्षा का चलन था। कॉलेज का मुंह देखने के साथ ही बाल मन लड़कियों का मुंह भी कक्षा में देख पाता था। कहीं इस बाल मन में जिज्ञासा, संकोच, शालीनता, नैतिकता और आदर के संस्कार शामिल थे तो कहीं व्यवहार में खुलापन, बेशर्मी, अनादर और बदतमीजी। कॉलेज में लड़के अच्छे भी होते थे, और बुरे भी। लड़कियां सब अच्छी ही होती थी। कुछ संकोची, शर्मीली, तो कुछ मिलनसार, खुशमिजाज। ।

फिल्मों का सबसे अधिक असर युवा पीढ़ी पर ही पड़ा। नायक नायिका का बाग बगीचों में मिलना, नाचना गाना और खलनायक का प्रवेश, छेड़छाड़ और रोमांस का रोमांच परदे से उठकर उनके बाल मन में भी प्रवेश कर गया। गुलशन नंदा और रानू के सस्ते साहित्य का भी इसमें अच्छा खासा योगदान रहा जिसका असर आगे चलकर उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। समाज अच्छा बुरा एक दिन में नहीं बन जाता।

जब कोई कृत्य अपराध की शक्ल ले ले, तो यह समाज और मानवता के लिए कलंक है। खेद है छेड़छाड़ की आड़ में हमारे देश की माता बहनों ने इसकी भारी कीमत चुकाई है। कई अनकही कहानियां उजागर ही नहीं हुई, कितनी पीड़िताओं ने अपने कलेजे पर पत्थर रख, उसे दबा दिया, कितनों ने अस्मिता के साथ समझौता किया, कितनों ने आवाज उठाई, प्रतिकार किया, इस बुराई से लोहा लिया, बहुत लंबी, दुखभरी दास्तान है, जिसे छेड़ना अथवा कुरेदना हमारा मकसद नहीं। ।

उम्र के साथ समझ भी आती है। आटे दाल के भाव जवानी के जोश को ठंडा कर देते हैं फिर भी कहीं कहीं बासी कढ़ी में उबाल आया ही करता है। सुंदरता की तारीफ़ किसे बुरी लगती है। कहीं तारीफ अच्छी नीयत से की जाती है तो कहीं खराब नीयत से। अच्छी नीयत से की गई तारीफ रिश्तों में मिठास, समझदारी और छेड़छाड़ के उस स्वस्थ स्वरूप को उजागर करती है, जिसमें आदर, सम्मान के साथ एक अनौपचारिक नोक झोंक भी शामिल होती है। जहां खुलकर हंसी के ठहाके लगते हैं, रिश्ते व्यक्तिगत नहीं पारिवारिक और सार्वजनिक हो जाते हैं।

सत्तर वर्ष की उम्र में मुझे एक अंग्रेजी शब्द prank का शब्दकोश में अर्थ ढूँढना पड़ा।

यह छेड़छाड़ आजकल सोशल मीडिया पर भी शुरू हो गई है।

छेड़खानी शब्द पुराना और दकियानूस हो गया है और लोग शब्दों के साथ भी फ्लर्ट करने लगे हैं। युवा पीढ़ी बहुत आगे निकल गई है और हम रूढ़िवादी मिडिल क्लास मानसिकता वाले आज भी आदर्श और नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं। ।

मुझे खुशी है कि मेरी छेड़ने की उम्र अब शुरू हुई है। सुबह सुबह हमाम में नहाते वक्त जब अपना बेसुरा सुर छेड़ता हूं, तो अपने आपको सुर सम्राट पाता हूं। चाय की प्याली जब टेबल पर पड़ी पड़ी ठंडी हो जाती है तो पत्नी का पंचम स्वर गूंज उठता है, कर दी न चाय ठंडी। पत्नी के गर्म मिजाज के कारण ठंडी चाय से भी मुंह जल जाता है। मेरी बदनसीबी, अगर पत्नी के सामने, शब्दों से छेड़छाड़ हो गई, तो अपनी खैर नहीं। यह कोई उम्र है हमें छेड़ने की ! जब उम्र थी तब तो घास डाली नहीं, और अब इस उम्र में, आया सावन झूम के ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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