हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९३ ⇒ बड़े बूढ़े और महान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े बूढ़े और महान…“।)

?अभी अभी # ८९३ ⇒ आलेख – बड़े बूढ़े और महान ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

जन्म से कोई बड़ा नहीं होता। बिना बड़ा हुए कोई बूढ़ा भी नहीं होता। कुछ लोग बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन कभी बूढ़े नहीं होते। ऐसे लोग बोलचाल की भाषा में बिग बी कहलाते हैं। बिन्दास रोमांस और कम उम्र की लड़कियों के साथ फ्लर्ट करते हैं, और अगर इन्हें बूढ़ा कहो, तो पलटकर जवाब देते हैं, बूढ़ा होगा तेरा बाप।

होते हैं, होते हैं कुछ लोग ऐसे भी, जो ठीक से बड़े भी नहीं हो पाते, और बूढ़े हो जाते हैं। नीरज ने शायद इशारों इशारों में ही सही, यही बात कही है ;

नींद भी खुली ही न थी

कि हाय धूप ढल गई

पांव जब तलक उठे

कि जिंदगी फिसल गई

बड़ा होने, और बूढ़ा होने में बहुत फर्क है। जहां बड़प्पन और बुढ़ापा एक साथ नजर आता है, वहीं आसपास हमें एक बड़ा बूढ़ा नजर आता है। ए.के.

हंगल को आपमें हर दृष्टि से एक बड़ा बूढ़ा नजर आएगा।।

बहुत पहले डाबर च्यवनप्राश का एक विज्ञापन आता था, जिसमें एक अधेड़ व्यक्ति को सीढियां चढ़ते दिखाया जाता था, इस शीर्षक के साथ, साठ साल के बूढ़े अथवा साठ साल के जवान ? आजकल ऐसे विज्ञापन आउट ऑफ फैशन हो गए हैं, क्योंकि योगा और जिम, मेन्स पार्लर और विमेंस ब्यूटी पार्लर, हेयर डाई, डेंटल केयर और आई एंड फेशियल सर्जरी इंसान को बूढ़ा होने ही नहीं देती। कल के एक पैंतालीस वर्ष के अधेड़ इंसान के आगे आज का एक पचहत्तर वर्ष का आधुनिक इंसान, पुराने लेकिन हमेशा जवां गीत की तरह आकर्षक और मनमोहक प्रतीत होता है।

बढ़े और बूढ़े के बीच की एक अवस्था और होती है जहां आदमी बड़ा होने के बाद और भी बड़ा होता चला जाता है। इसे आप बोलचाल की भाषा में कामयाबी कह सकते हैं। कामयाबी कभी इंसान को बूढ़ा नहीं होने देती। आदमी पढ़ लिखकर बड़ा आदमी तो बन सकता है, लेकिन उपलब्धियां ही उसे एक कामयाब इंसान भी बनाती है।।

उपलब्धियां कोई लॉलीपॉप नहीं और ना ही कोई फूले हुए रंग बिरंगे गुब्बारे। कामयाबी से प्रसिद्धि, प्रसिद्धि से उपलब्धि और अल्टीमेट उपलब्धि तो खैर महानता ही है, जो इंसान को न तो बूढ़ा होने देती है और न ही मरने देती है। महान लोग अमर हो जाते हैं।

कहने वाले तो यहां तक कह गए हैं, कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ महान बनकर दिखाते हैं, और कुछ पर महानता थौंप दी जाती है। जन्म से महानता की बात तो हमारी समझ से परे है, और बाकी के बारे में, नो कमेंट्स।।

कोई साधारण व्यक्ति कब एक बड़ा आदमी बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। बूढ़ा होना भी कहीं कोई उपलब्धि है।

पहले सिटिजन थे, फिर सीनियर सिटिजन बन गए। वे तनकर चले, जब तक वेतन था, लाइफ सर्टिफिकेट पर तो झुककर ही हस्ताक्षर किया जाता है।

अगर आप बूढ़ा नहीं होना चाहते, हमेशा बड़ा बने रहना चाहते हैं तो उपलब्धियों की बैसाखी को थामे रहिए। कुछ पद्म पुरस्कार, कुछ सार्वजनिक सम्मान, एक ठौ साहित्य अकादमी सम्मान, ऐसी संजीवनी है, जो आपको अपनी निगाहों में ऊंचा उठा देगी। हो सकता है, महानता आपकी राह देख रही हो, अथवा बिल्ली के भाग से छींका टूट जाए और आप पर महानता थौंप दी जाए। महानता तेरा बोलबाला, बुढ़ापा, तेरा मुंह काला।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६२ – देश-परदेश – विंबलडन की विंडम्बना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६२ ☆ देश-परदेश – विंबलडन की विंडम्बना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

लॉन टेनिस खेल की सबसे पुरानी प्रतियोगिता प्रतिवर्ष लंदन शहर में बरसो से आयोजित होती आ रही है। प्रतिवर्ष जून के अंतिम सप्ताह से आरंभ होकर जुलाई के मध्य तक चलने वाली प्रतियोगिता जब लंदन में आयोजित होती है, तो वहां का मौसम भी खुशनुमा रहता है।

हमारे देश में इस समय गर्मी चरम पर रहती है। देश के अधिकतर अमीरजादे, क्रिकेटर और बॉलीवुड के बिगड़ैल गर्मी से निजात पाने के लिए विंबलडन खेल देखने के बहाने लंदन शहर चले जाते हैं। इनके पास दौलत इतनी अधिक है, कि खर्च नहीं हो पाती है।

बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध लेखक/ गीतकार जो शरीर के दर्द दूर करने की दवा का टीवी पर विज्ञापन भी करते है, विंबलडन देखने गए हुए हैं। उनकी वर्तमान पत्नी और पूर्व पत्नी का पुत्र भी अपनी वर्तमान पत्नी के साथ लंदन गया हुआ है। मीडिया में छाए रहने के लिए हवाई यात्रा कंपनी की तारीफ में भी कशीदे पढ़ दिए, कि इनके वायुयान में बैठने के लिए बहुत खुला स्थान उपलब्ध है, ये नहीं बताया कि वो “बिजनेस क्लास” से यात्रा कर रहें हैं।

इस खेल को देखने अधिकतर वो व्यक्ति जाते हैं, जो घर में एक ग्लास पानी का स्वयं उठाकर नहीं पीते हैं। रईसों की दुनिया में विंबलडन प्रतियोगिता देखना अब एक “स्टेटस” की श्रेणी में आता है। एक लड़के के विवाह बायो डाटा में भी लिखा हुआ था, कि लड़का तीन बार विंबलडन देखने जा चुका है। ऐसे लड़के जीवन में घर के कभी फ्यूज बल्ब तक नहीं बदले होंगे।

विंबलडन प्रतियोगिता में बॉल उठाने के लिए युवा लड़के और लड़कियां सेवा में रहती हैं, ताकि खिलाड़ी खेल पर अधिक ध्यान दे सकें। खिलाड़ियों के जैसे ये युवा भी बहुत फुर्तीले और फिट रहते हैं।

गोल्फ, लॉन टेनिस, क्रिकेट जैसे अंग्रेजों के खेल में सहायक की आवश्यकता होती है। अंग्रेजों ने तो पूरी दुनिया पर लंबे समय तक राज़ कर गुलामों से ऐसे कार्य करवाते थे। अब तो अंग्रेज़ अपने देश तक ही सीमित हो चुके हैं, लेकिन गुलामों/नौकर रखने की आदतें अभी भी हैं। सही कहा गया है” bad habits die hard”.

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९२ ⇒ सूत उवाच ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूत उवाच …“।)

?अभी अभी # ८९२ ⇒ आलेख – सूत उवाच ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यारों, शीर्षक हमारे पर मत जाओ ! कल एक भूले बिसरे मित्र का फोन आया, प्रदीप भाई कैसे हो !

ठंड में कोई खैरियत पूछे तो वैसे ही बदन में थोड़ी गर्मी आ जाती है। क्या आपने कभी पतंग उड़ाई है, उनका अगला प्रश्न था। उन्होंने मेरे जवाब का इंतजार नहीं किया और दूसरा प्रश्न दाग दिया, क्या कभी मांजा सूता है ? जो प्रश्न उन्हें सूत जी से पूछना था, वह उन्होंने मुझसे पूछ लिया। इसके पहले कि सूत उवाच, मैं अवाक् !और मैं पुरानी यादों में खो गया।

आज जिसे हमारे स्वच्छ शहर की कान्हा नदी कहा जाता है, तब यह खान नदी कहलाती थी, और हमें इसकी गंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। रामबाग और कृष्णपुरा ब्रिज के बीच, एक पुलिया थी, जिसे हम बीच वाली पुलिया कहते थे। यह हमारे घर और मिडिल स्कूल को आपस में जोड़ती थी। खान नदी के आसपास तब बहुत सा, हरा भरा मैदान था, जो हमारे लिए खुला खेल प्रशाल था। यह पुलिया सूत पुत्रों के लिए मांजा सूतने के काम आती थी। कांच को बारीक पीसने से लगाकर पतंग उड़ाने, काटने और लूटने का काम यहां बड़े मनोयोग से किया जाता था।।

ऐसा नहीं कि हमने कभी पतंग नहीं उड़ाई। जब भी उड़ाई, पतंग ने आसमान नहीं देखा, हमने हमेशा मुंह की खाई। जिसके खुद के पेंच ढीले होते हैं, वे दूसरों की पतंग नहीं काटा करते। लूटमार से हम शुरू से ही दूर रहे हैं, किसी की कटी पतंग भला हम क्यों लूटें।

हमारे इसी शांत स्वभाव के कारण हमने देवानंद की फिल्म लूटमार और ज्वेल थीफ़ भी नहीं देखी।

जब मांजा सूतने में हमने कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई तो मित्र ने अगला प्रश्न किया, अच्छा आपने सराफे की चाट तो खाई ही होगी और कभी दाल बाफले भी तो सूते ही होंगे और जब स्कूल में माड़ साब बेंत से सूतते थे, तब कैसा लगता था। पहले चाट और दाल बाफले और बाद में सुताई, यह क्या है भाई, हम फोन रखते हैं भाई। और हमने फोन रख दिया।।

हमारा यह मिडिल स्कूल वैसे भी सुभाष मार्ग और महात्मा गांधी मार्ग के बीच सैंडविच बना हुआ था। हमारे गांधीवादी हेडमास्टर ने हमसे चरखा भले ही नहीं चलवाया हो, तकली पर सूत जरूर कतवाया है।

हम यह भी जानते हैं कि सूत को सूत्र भी कहते हैं और पुरुष मंगलसूत्र नहीं,

यज्ञोपवीत धारण करते हैं, जो सूत के धागों से ही बनती है। सूत पुत्र दासी के पुत्र को भी कहते हैं और पवन के पुत्र को भी पवनसुत कहते हैं।।

आज तिल गुड़ का दिन है, जिन्हें मांजा सूतना है, मांजा सूतें, पतंग उड़ाएं, पेंच लड़ाएं, किसी की पतंग तो किसी के विधायक लूटें, हम तो बस मीठा खाएंगे मीठा बोलेंगे, मांजा नहीं, मज़ा लूटेंगे और भरपूर प्यार लुटाएंगे।

शुभ मकर सक्रांति !

सूत उवाच ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९१ ⇒ सेवा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सेवा …“।)

?अभी अभी # ८९१ ⇒ आलेख – सेवा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

  • Service •

प्रेम में अगर ढाई अक्षर हैं, तो सेवा में तो सिर्फ दो ही अक्षर हैं। प्रेम का पाठ पढ़कर अगर कोई पंडित हो सकता है तो सेवा करने से उसे मेवा भी मिल सकता है। पोथी पढ़ पढ़कर अगर कोई पंडितजी बन जाए और ढाई आखर की डिग्री ले आए, तो वह शासकीय सेवा में लग जाए और प्रेम से मेवा खाए। A, B, C, D, E, F, G, क्लास में बैठे पंडित जी।

आओ प्यार करें, तो बहुत सुना है, आओ सेवा करें, कोई नहीं कहता। इसका तो यही मतलब हुआ कि जितना आसान प्यार है, उतनी ही कठिन सेवा है। अगर भक्तों ने प्यार ही पूजा है, का उदघोष किया, तो किसी ने काम ही पूजा है (work is worship) का नारा भी दे दिया। हमारे योगेश्वर कृष्ण ने अगर अपनी बाल लीलाओं में प्रेम का सन्देश दिया तो कुरुक्षेत्र में निष्काम कर्म का ज्ञान भी दिया।।

अगर कर्म को ईश्वर की सेवा समझकर किया जाए, तो वह निष्काम हो जाता है। सेवा के भाव में, नि:स्वार्थ भाव निहित है।

अगर आप प्रेम से कहीं शासकीय सेवा कर रहे हो, तो आप दोनों काम कर रहे हैं, प्रेम का प्रेम और सेवा की सेवा और ऊपर से तन की सेवा के लिए वेतन रूपी मेवा भी।

सेवा शब्द बड़ा व्यापक है। सेवा को अंग्रेजी में सर्विस भी कहते हैं। नौकरी चाकरी अगर मजबूरी का शब्द है तो सेवक एक सम्मानसूचक उद्बोधन है। अंग्रेजी में जो सेवा करते हैं, उन्हें सर्वेंट कहते हैं। जो अधिकारपूर्वक सेवा करते हैं, वे सिविल सर्वेंट कहलाते हैं। हमने उन्हें राजपत्रित अधिकारी के पद पर सुशोभित कर दिया।।

जो ईश्वर की सेवा करते हैं, वे दास भी कहलाते हैं। कल ही एक ईश्वर के सेवक, सुर के सेवक, येशुदास का जन्मदिन था। अगर एक दास हो तो ठीक, भक्ति काल में तो सूरदास, तुलसीदास, रैदास, हरिदास, कुंभनदास के अलावा कई अष्ट छाप के कवि अपने इष्ट के दास थे। आज भी आपको घर घर असंख्य मात्रा में रामदास, कृष्णदास, रामस्वरूप और भगवानदास जैसे दास नजर आ जाएंगे।

अजी साहब, दास की तो बस पूछिए ही मत। हमारा दासबोध तो देखिए, हमने दासप्रथा ही अपना ली थी। सब मालिकों, जमींदारों, जागीरदारों के अपने अपने दास थे। राजा महाराजा हों और उनकी दास दासियां ना हो, असंभव। हमारे मंदिरों का भी जवाब नहीं।

दासी तो ठीक, देवदासी तक हमारे मंदिरों की शोभा बढ़ाती थी।।

आज अगर आप कहीं सर्विस करते हैं तो ईमानदारी से काम करते हैं, पसीना बहाते हैं, सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, लेकिन अपना स्वाभिमान गिरवी नहीं रखते। आप नौकरी ही करते हैं किसी की चाकरी नहीं। आजकल मुफ्त की तनख्वाह वैसे भी कौन देता है। हम कोई विधायक, सांसद, नेता, अथवा मंत्री जैसे सेवक तो हैं नहीं।

ये भक्त भी बड़े अजीब होते हैं। कोई रामभक्त हनुमान राम काज को आतुर, तो कोई मीरा अरज लगाती है, श्याम मोहे चाकर राखो जी। कोई भक्त है, कोई दास है, कोई सेवक तो कोई चाकर है। अगर आप ढूंढेंगे तो शायद किंकर भी मिल जाए। लेकिन मुफ्त में कौन आजकल without any cause कामकाज करता है, और किसी की चाकरी, तो कतई नहीं। वैसे भी किसी नेता की चाकरी भी, नसीब वाले को ही मिलती है।।

आजकल मुफ्त सेवाओं पर प्रतिबंध है। सभी सेवाएं सशुल्क हैं। जो कभी सेवा शुल्क था, आज वही जीएसटी कहलाता है। आज के युग में हर सेवा एक सुविधा है। अगर कहीं किसी सेवा सुविधा में त्रुटि है तो कंज्यूमर फोरम, यानी उपभोक्ता समिति भी है।

हर सुविधा भोगी एक उपभोक्ता है। आजकल तो 4 जी और 5 जी सुविधा भी उपलब्ध है। आप बस, सेवा का अवसर दें।

सेवा से पैसा ही नहीं, पुण्य भी कमाया जा सकता है।

सोचो साथ क्या जाएगा, अगर आपके पास पैसा है तो दीन दुखी, दिव्यांगो की सेवा ही कर दें, दान, चंदा, ही नहीं आप स्वयं भी सेवा कार्य में अपने आपको समर्पित कर सकते हैं।

शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिसमें निःस्वार्थ सेवकों की कमी हो।।

छोटा मुंह बड़ी बात, समाज सेवा से बड़ी कोई निःस्वार्थ सेवा नहीं। सेवक बनें, देशसेवक बनें, स्वयंसेवक बनें। हमारी अगर बोली कभी फल जाए तो हम तो यह भी कह गुजरें, आप देश के प्रधान सेवक बन जाएं, कांटों का ताज आपके सर पर हो, लेकिन फिर भी आप तन, मन और धन से देशवासियों की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दें।

शुरुआत आज से ही करें।

बस बिना किसी लोभ लालच के सेवा में जुट जाएं। विकास की चकाचौंध में आज भी कई ऐसे घर हैं, जहां अंधेरा है, कहीं अशिक्षा का, तो कहीं गरीबी और मुफलिसी का।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४१ – आलेख – रिश्ते की भावभीनी खुशबू से सराबोर होते थे हमारे तीज, त्यौहार एवं संस्कृतियाँ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४१ ☆

☆ आलेख ☆ ~ रिश्ते की भावभीनी खुशबू से सराबोर होते थे हमारे तीज, त्यौहार एवं संस्कृतियाँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

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फेसबुक पर वायरल हो रहे इस वीडियो को देखकर मुझे अतीत की याद आ रही है। एक पिता का अपने पुत्री के के लिए सर पर चूड़ा एवं हाथ में दही का कमंडल लेकर जा रहा है। व वास्तव में यह भाउक कर देने वाली और अतीत को याद करने वाली आज के जमाने में विरले ही देखी जाने वाली तस्वीर है। यूट्यूब से जुड़े लोग इस तस्वीर के अलग मायने निकालते हुए, इसमें संभवत: कहीं कुछ देखते हैं, लेकिन मैं तो समझता हूं कि उन्होंने इस भावुक करने वाली तस्वीर को खींच कर, युवकों के लिए एक नई चीज और हम सबके लिए एक पुरानी याद जरूर ताज की है। एक पिता का पुत्री के प्रति कितना प्रेम हो सकता है और किस स्तर का हो सकता है यह इसमें स्पष्ट रूप से झलकता है। पुत्री के प्रति उसका स्नेह और श्रम साफ साफ देखा जा सकता है। मैं यह नहीं कह रहा कि आज के युग में यह प्रेम कही से भी कमतर है। लेकिन इस चित्र दिख रहा प्रेम, प्रेम की पराकाष्ठा है।

जैसा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अँचल में बेटी के यहां यहाँ तीज और खिचड़ी, भेजने की प्रथा है लेकिन दही और चूड़ा जो कि पूर्वांचल और बिहार में खिचड़ी का खास व्यंजन है इसे पहुचाने का सीधा-साधा अर्थ यह है कि हर पिता का या परिवार का उद्देश्य होता है कि यदि हमारे घर में दूध दही की प्रचुर मात्रा में है और कोई तीज त्यौहार है तो यह घर पर बनाए जाने वाला व्यंजन, अपने प्रियजन के पास तो जरूर पहुंचे।

यहां तक कि इसके अंदर जो प्रेम भाव होता है उसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। उस व्यंजन को ले जाने का खर्च बाजार से खरीद कर देने से कहीं ज्यादा हो जाएगा, लेकिन जो आनंद उसको लेकर पहुंचने में और उसे देने में है वह शायद रुपए पैसा या खरीद कर देने में तो बिल्कुल ही नहीं है।

पूर्व के काल में पिता अपने पुत्री के घर कुछ लेकर ही जाता था, वह कभी खाली हाथ जाता ही नहीं था। उसकी मंशा यह होती थी कि मैं वहां सिर्फ दूंगा ही दूंगा। मैं बेटी के यहाँ से कुछ भी नहीं लाऊंगा। यहां तक कि वह अपने बेटी के घर में भोजन भी नहीं करता था और अक्सर देखा जाता था कि यदि पिता बेटी के घर में एक रात ठहर गया तो बेटी या उसके ससुराल वाले किसी दूसरे के घर से भोजन – पानी मंगा कर भोजन कराते थी

हमारे तीज त्योहारों की मौलिकता कैसी है, जिसमें की एक पिता खाने पीने की चीज लेकर बिना शर्म किये सिर पर बोरी और हाथ में दही का कमंडल लेकर निकल जाता ही जाता है। यह प्राचीन परंपरा यद्यपि समाप्त की ओर बढ़ चली है, या यूँ कहें कि लगभग समाप्त ही हो चुकी है। पिता का बेटी के घर आना जाना बेटी का पिता के घर आना जाना किसी समय या किसी त्योहार पर आधारित नहीं है।

अब मैं आगे का जो दृष्टांत बताने जा रहा हूं इसे ध्यान से पढियेगा ओर समझिएगा। विगत दिनों में अपने गांव बलिया गया था और जब लौटने लगा तो मेरे ससुराल के लोगों ने घर का चुरा तिलवा लिया अच्छा आदि पैक करके हमारे साथ रखवा दिया। यानी मेरे घर इसी खिचड़ी परंपरा के अनुसार कुछ खाने पीने की चीज आ गयीं थी, जोकि पूर्ण रूप से घर की बनी थी, और इसमें गांव की खुशबू साफ-साफ देखी जा रही थी। पिछले 15 जनवरी को मकर संक्रांति यानी खिचड़ी का त्यौहार था। मेरे कार्यालय में भी अवकाश था। मेरी दो बेटियां हैं और दोनों बेटी दामाद लखनऊ में ही रहते हैं।

यद्यपि वायरल हो रहे इस चित्र को मकर संक्रांति के दिन तो मैंने फेसबुक पर नहीं देखा था, लेकिन न जाने क्या हुआ मेरे मन में इस बार आया, कि चलूँ, आज मकर संक्रांति के दिन है, थोड़ा चूड़ा, तिलवा ओर गुड़ दोनों बेटियों के लिए, लिए चलते हैं। इन्हीं विचारों के साथ दो छोटे-छोटे झोलों में यह सामग्रियां रखवाया और कार्य पर रखकर चल दिया। मैंने अपने पहुंचने की सूचना अपने बेटियों को नहीं दी थी। मैं उन्हें सरप्राइज रूप से यह गांव का बना हुआ उपहार देना चाहता था। यह वही प्रेम था जो प्रेम इस वायरस चित्र में उस वृद्ध व्यक्ति के अंदर अपने पुत्री के प्रति प्रदर्शित हो रहा है।

अब आपको सच बताऊँ, जिस समय मैं इस झोले को लेकर जा रहा था। उस झोले में रखें रसद का मूल्य तो कुछ नहीं था, लेकिन मेरा स्नेह अपरंपार था जिसे मैं अपनी कर से लेकर बेटी के घर जा रहा था। लखनऊ के इस पॉस एरिया में रह रही मेरी बेटी जहां ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के बीच जहां रह रही थी, जहां आधुनिकता के पैमाने पार हो रहे थे। वहां जब मैं पहुंचा तो मेरी बेटी मुझे गले लगा कर, अपना स्नेह लूट रही थी, या मैं उसको स्नेह दे रहा था, मेरे सामने वही दृश्य उपस्थित हो रहा है, जो आज एक आप अपनी बेटी के लिए पैदल चूड़ा दही लेकर जा रहा है। जब मैंने अपनी बेटी को ये थोड़ा स्नेह देकर गले लगाया, तो मैंने महसूस किया कि आखिरकार बाप बेटी के बीच का स्नेह क्या होता है।   

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९० ⇒ सूरज को अरज ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूरज को अरज…“।)

?अभी अभी # ८९० ⇒ आलेख – सूरज को अरज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जगत भर की रोशनी के लिए

करोड़ों की जिंदगी के लिए

सूरज रे, जलते रहना

सूरज रे, जलते रहना…

जो खुद जलते रहते हैं और पूरे जगत को रोशन करते रहते हैं, इनके जलवों का क्या कहना। मन तो करता है, इन आदित्यनाथ की आरती उतारें, लेकिन वह तो सूरज को एक तरह से दीपक दिखाना ही हुआ।

इसमें कोई शक नहीं कि ऊपर वाले की सरकार और हमारी दिल्ली सरकार में ज्यादा अंतर नहीं, कहीं मुफ्त बिजली तो कहीं मुफ्त प्रकाश। लगता है आसमान में भी चुनाव होने वाले हैं। चुनाव हों अथवा ना हों, कोई फर्क नहीं पड़ता, सब जानते हैं, स्वर्ग का राजा तो इंद्र को ही रहना है। वैसे भी ज्यादा फर्क नहीं हमारे मंत्रिमंडल और उनके तारामंडल में। काम कोई भी करे, मेवा तो नवग्रह को ही मिलना है।।

क्या आप जानते हैं, ऊपर वाले की सरकार इतने वर्षों से टिकी क्यों हुई है, अजी सब कुछ मुफ्त मिल रहा है, हवा पानी, राशन, प्रकाश ! और इधर हमारी सरकारें है, उसका न केवल उपभोग करती है, विकास और कल्याण के नाम पर उन सुविधाओं की कीमत भी वसूल कर लेती है। अश्वशक्ति को हमने हॉर्स पावर बना दिया और आपकी शक्ति को सोलर एनर्जी। दोनों की मिलीभगत और सांठगांठ से धरती और स्वर्ग की सरकारें चल रही हैं। आप चाहें तो कह सकते हैं nexus between Man and the God.

एक आम आदमी आजकल सिर्फ उपभोक्ता नहीं होता, वह सरकार का भक्त भी होता है। अपनी सरकार के लिए वह जी जान लगा भी सकता है और नाराज होने पर तख्ता पलट भी सकता है।

चुनाव के वक्त जनता में जितनी शक्ति होती है, चुनाव के पश्चात उसकी सारी शक्ति चुने हुए प्रतिनिधियों में प्रवेश कर जाती है। कल तक जो दाता था, वह भिखारी बन जाता है। भगत के बस में है भगवान गाने वाला, बहुत ही जल्द, तू दाता मैं भिखारी बन जाता है।।

हम जानते हैं हमारी आवाज में इतना दम नहीं कि उस सर्वशक्तिमान की मर्जी के खिलाफ आवाज उठाएं, लेकिन एक भक्त और मतदाता, दोनों के कुछ अधिकार होते हैं, इस कारण दिनकर, उर्फ भास्कर, उर्फ भानुप्रकाश उर्फ आदित्यनाथ यानी सूर्यदेव से हम इतनी विनती तो कर ही सकते हैं कि भैया चुनाव के बाद नेता की तरह ठंड के मौसम में, बादलों में मत छुप जाया करो।

हे सूर्यदेव गर्मी में तो आपको उगने की बड़ी जल्दी मची रहती है तो ठंड में क्या हो जाता है। शाम को भी जल्दी बोरिया बिस्तर समेट लेते हो जब कि गर्मी में ओवरटाइम भी कर लेते हो। क्या यह आपकी मनमानी नहीं।।

हमारे लिए आप कोई हाड़ मांस के अवसरवादी नेता नहीं, साक्षात भगवान हो।

हम सुबह सबसे पहले आपको नमस्कार करते हैं, अपनी औकात अनुसार जल भी चढ़ाते हैं, चतुर्थी की ही तरह छठ का व्रत रखते हैं, और अर्घ्य भी चढ़ाते हैं। बस ठंड के दिनों में जरा हमारे बाल बच्चों का खयाल रख लिया करो। बेचारों को ठंड में भी स्कूल भागना पड़ता है।

हम जानते हैं अनशन, भूख हड़ताल और बंद जैसी गीदड़ भभकियों से आपका बाल भी बांका नहीं होना, अतः केवल अरज है, ठंड में थोड़ा अपने यूनिवर्सल हीटर का रेगुलेटर बढ़ा दिया करो और समय पर आ जाया करो। क्या आप भी इसे अपना सरकारी दफ्तर समझने लगे। कौन कहता है आप भी किसी की देखा देखी में १८ – १८ घंटे काम करो लेकिन क्या करें,

काटे नहीं कटते दिन रात ये। इसलिए सूरज रे, जलते रहना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०५ ☆ अपेक्षा व उपेक्षा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अपेक्षा व उपेक्षा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०५ ☆

☆ अपेक्षा व उपेक्षा… ☆

‘अत्यधिक अपेक्षा मानव के जीवन को वास्तविक लक्ष्य से भ्रमित कर मानसिक रूप से दरिद्र बना देती है।’ महात्मा बुद्ध मन में पलने वाली अत्यधिक अपेक्षा की कामना को इच्छा की परिभाषा देते हैं। विलियम शेक्सपीयर के मतानुसार ‘अधिकतर लोगों के दु:ख एवं मानसिक अवसाद का कारण दूसरों से अत्यधिक अपेक्षा करना है। यह पारस्परिक रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।’ वास्तव में हमारे दु:ख व मानसिक तनाव हमारी ग़लत अपेक्षाओं के परिणाम होते हैं। सो! दूसरों से अपेक्षा करना हमारे दु:खों का मूल कारण होता है, जब हम दूसरों की सोच को अपने अनुसार बदलना चाहते हैं। यदि वे उससे सहमत नहीं होते, तो हम तनाव में आ जाते हैं और हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है; जो हमारे विघटन का मूल कारण बनता है। इससे पारिवारिक संबंधों में खटास आ जाती है और हमारे जीवन से शांति व आनंद सदा के लिए नदारद हो जाते हैं। सो! मानव को अपेक्षा दूसरों से नहीं; ख़ुद से रखनी चाहिए।

अपेक्षा व उपेक्षा एक सिक्के के दो पहलू हैं। यह दोनों हमें अवसाद के गहरे सागर में भटकने को छोड़ देते हैं और मानव उसमें डूबता-उतराता व हिचकोले खाता रहता है। उपेक्षा अर्थात् प्रतिपक्ष की भावनाओं की अवहेलना करना; उसकी ओर तवज्जो व अपेक्षित ध्यान न देना दिलों में दरार पैदा करने के लिए काफी है। यह सभी दु:खों का कारण है। अहंनिष्ठ मानव को अपने सम्मुख सब हेय नज़र आते हैं और  इसीलिए पूरा समाज विखंडित हो जाता है।

मनुष्य इच्छाओं, अपेक्षाओं व कामनाओं का दास है तथा इनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता रहता है। अक्सर हम दूसरों से अधिक अपेक्षा व उम्मीद रखकर अपने मन की शांति व सुक़ून उनके आधीन कर देते हैं। अपेक्षा भिक्षाटन का दूसरा रूप है। हम उसके लिए कुछ करने के बदले में प्रतिदान की अपेक्षा रखते हैं और बदले में अपेक्षित उपहार न मिलने पर उसके चक्रव्यूह में फंस कर रह जाते हैं। वास्तव में यह एक सौदा है, जो हम भगवान से करने में भी संकोच नहीं करते। यदि मेरा अमुक कार्य सम्पन्न हो गया, तो मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा या तीर्थ-यात्रा कर उनके दर्शन करने जाऊंगा। उस स्थिति में हम भूल जाते हैं कि वह सृष्टि-नियंता सबका पालनहार है; उसे हमसे किसी वस्तु की दरक़ार नहीं। हम पारिवारिक संबंधों से अपेक्षा कर उनकी बलि चढ़ा देते हैं, जिसका प्रमाण हम अलगाव अथवा तलाक़ों की बढ़ती संख्या को देखकर लगा सकते हैं। पति-पत्नी की एक-दूसरे से अपेक्षाओं की पूर्ति ना होने के कारण उनमें अजनबीपन का एहसास इस क़दर हावी हो जाता है कि वे एक-दूसरे का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते और तलाक़ ले लेते हैं। परिणामत: बच्चों को एकांत की त्रासदी को झेलना पड़ता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हुए अपने-अपने हिस्से का दर्द महसूसते हैं, जो धीरे-धीरे लाइलाज हो जाता है। इसका मूल कारण अपेक्षा के साथ-साथ हमारा अहं है, जो हमें झुकने नहीं देता। एक अंतराल के पश्चात् हमारी मानसिक शांति समाप्त हो जाती है और हम अवसाद के शिकार हो जाते हैं।

मानव को अपेक्षा अथवा उम्मीद ख़ुद से करनी चाहिए, दूसरों से नहीं। यदि हम उम्मीद ख़ुद से रखते हैं, तो हम निरंतर प्रयासरत रहते हैं और स्वयं को लक्ष्य की पूर्ति हेतू झोंक देते हैं। हम असफलता प्राप्त होने पर भी निराश नहीं होते, बल्कि उसे सफलता की सीढ़ी स्वीकारते हैं। विवेकशील पुरुष अपेक्षा की उपेक्षा करके अपना जीवन जीता है। अपेक्षाओं का गुलाम होकर दूसरों से उम्मीद ना रखकर आत्मविश्वास से अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहता है। वास्तव में आत्मविश्वास आत्मनिर्भरता का सोपान है।

क्षमा से बढ़ कर और किसी बात में पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात्’ अर्थात् क्षमा सबसे बड़ा धन है, जो पाप को पुण्य में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। क्षमा अपेक्षा और उपेक्षा दोनों से बहुत ऊपर होती है। यह जीने का सर्वोत्तम अंदाज़ है। हमारे संतजन व सद्ग्रंथ इच्छाओं पर अंकुश लगाने की बात कहते हैं। जब हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेंगे, तो हमें किसी से अपेक्षा भी नहीं रहेगी और ना ही नकारात्मकता का हमारे जीवन में कोई स्थान होगा। नकारात्मकता का भाव हमारे मन में निराशा व दु:ख का सबब जगाता है और सकारात्मक दृष्टिकोण हमारे जीवन को सुख-शांति व आनंद से आप्लावित करता है। सो! हमें इन दोनों मन:स्थितियों से ऊपर उठना होगा, क्योंकि हम अपना सारा जीवन लगा कर भी आशाओं का पेट नहीं भर सकते। इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण व नज़रिए को बदलना होगा; चिंतन-मनन ही नहीं, मंथन करना होगा। वर्तमान स्थिति पर विभिन्न आयामों से दृष्टिपात करना होगा, ताकि हम अपनी संकीर्ण मनोवृत्तियों से ऊपर उठ सकें तथा अपेक्षा उपेक्षा के जंजाल से मुक्ति प्राप्त कर सकें। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहें तथा निराशा को अपने हृदय मंदिर में प्रवेश ने पाने दें तथा प्रभु कृपा की प्रतीक्षा नहीं, समीक्षा करें, क्योंकि परमात्मा हमें वह देता है, जो हमारे लिए हितकर होता है। सो! हमें उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला देनी चाहिए और सदा उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हमें हर घटना को एक नई सीख के रूप में लेना चाहिए, तभी हम मुक्तावस्था में रहते हुए जीते जी मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे। इस स्थिति में हम केवल अपने ही नहीं, दूसरों के जीवन को भी सुख-शांति व अलौकिक आनंद से भर सकेंगे। ‘संत पुरुष दूसरों को दु:खों से बचाने के लिए दु:ख सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने का हर उपक्रम करते हैं।’ बाल्मीकि जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। सो! अपेक्षा व उपेक्षा का त्याग कर जीवन जीएं। आपके जीवन में दु:ख भूले से भी दस्तक नहीं देगा। आपका मन सदा प्रभु नाम की मस्ती में खोया रहेगा–मैं और तुम का भेद समाप्त हो जाएगा और जीवन उत्सव बन जाएगा।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८९ ⇒ नासिका ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नासिका…“।)

?अभी अभी # ८८९ ⇒ आलेख – नासिका ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

नासिका, जिसे हम नाक भी कहते हैं, हमारी काया की नायिका है। हमारी नाक के नीचे क्या हो रहा है, यह उसे देख भले ही नहीं सकती हो, सूंघ ज़रूर सकती है। देखने के लिए इसने अपने ऊपर दो दो आंखें जो बिठा रखी हैं। लेकिन हाय रे बदनसीब आंख, अपनी ही नाक को देखने के लिए भले ही वह इसी नाक पर चश्मा चढ़ा ले, उसे अपनी ही नाक नजर नहीं आती। आइना देखकर इन आंखों को यकीन होता है, अपनी ही नाक पर। लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या, हम दोनों हाथ छूकर ही यकीन कर लेते हैं, अपनी नाक सही सलामत है।

तूने खूब बनाया भगवान, खिलौना माटी का ! यह हमारी काया है, जिसे आप ढांचा भी कह सकते हैं, उस बनाने वाले ने एक जैसे सांचे में ढाला है। कितना दिमाग लगाया होगा, इस माटी के पुतले को बनाने में। दो दो कान, दो दो आंखें, एक छोटी सी नाक, और बड़ा सारा मुंह, और उससे भी बड़ी देह। केवल हाथ पांव ही नहीं, जीती जागती मशीन बना दी उस ऊपर वाले ने और उसमें प्राण फूंक दिए।।

नायक – नायिका भेद की तरह नासिका भेद भी होता है इस हाड़ – मांस के पुतले में। कोई नाक पतली होती है, कोई मोटी, तो कोई चपटी। कहते हैं, नासिक में, राम के भाई लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटी थी। कोई नायिका अगर प्रणय निवेदन करे, तो क्या नायक उसकी नासिका काट ले ? लेकिन जो किसी दूसरे की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण रेखा खींचते हैं, वे स्वयं भी मर्यादित आचरण में रहते हैं। तब से ही लोग अपनी नाक के प्रति सजग हो गए। ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे समाज में हमारी नाक कटे।

बचपन में भाई बहन एक दूसरे को नकटा, नकटी कहकर चिढ़ाते थे। और बचपन की दोस्ती भी कैसी ! जब लड़ाई हुई, तो कट्टी कट्टी, साबुन की बट्टी, इधर दांत से अंगूठे को काटा, और जा तेरे घर। लेकिन कब तक ? जल्द ही यह नौबत ही आ जाती। नकटे की नाक नहीं, बोले बिना चैन नहीं।

और दोनों उंगलियों को चूमकर, फिर से पक्की दोस्ती।।

अगर आपने लक्ष्मण के पुराने कार्टून देखे हैं तो उनमें सबसे अधिक कार्टून इंदिरा गांधी के हैं और पूरे कार्टून की जान होती थी, इंदिरा जी की नाक। एक ऐसी नाक जिसने कभी देश की नाक रखी , तो कभी देश की नाक नीची भी की। अपनी नाक बचाने के लिए आपातकाल भी लगाया और इसी नाक पर मुंह की भी खाई। लगता है लक्ष्मण और नाक का संबंध त्रेता युग से ही चल रहा है। मूंछें हो तो रामलाल जैसी और नाक हो तो लक्ष्मण के कार्टून्स की इंदिरा जैसी।

आज हमें नाक की बहुत चिंता है। समाज में, परिवार में, राजनीति में, सभी जगह कोई अपनी नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता। घर में बच्चे हों या राजनीति में विपक्ष, नाक में दम कर रखा है। जानवर हो तो नाक में नकेल डाल दें, बच्चों को तो स्कूल में डाल दिया, अब क्या विपक्ष को जेल में डाल दें।

हम नाक से ही सांस लेते हैं और छोड़ते हैं। आदमी सब कुछ भूल सकता है, सांस लेना नहीं भूल सकता। सांस की बीमारियों से ही दमा होता है जो मरीज को आखिरी सांस तक दम नहीं लेने देता। Ear, nose और throat यानी नाक, कान और गले की आपस में बहुत घुटती है। इनकी आपसी मिलीभगत को ही nexus नेक्सस कहते हैं।।

लंबी गहरी सांस लेना, मुंह से नहीं नाक से सांस लेना, थोड़ी भस्रिका, कपालभाति और अनुलोम विलोम आपको स्वस्थ व प्रसन्न रखेगा और बीमारियों से आपकी रक्षा करेगा। आपके प्राण पर बाबा रामदेव का नहीं, आपका कॉपीराइट है। पहले प्राण बचाएं, वचन बाद में निभाएं। दूसरों के मामलों में व्यर्थ ही अपनी नाक ना घुसाएं। Don’t poke your nose into others affairs !!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७३ ☆ मकर संक्रांति – साधना पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मकर संक्रांति – साधना पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७३ ☆ मकर संक्रांति – साधना पर्व… ☆

☆

सजा है आसमाँ  पतंगों   से 

नेह के  गीत गुनगुनायेंगे ।

पेंच पड़ते हुए गजब देखो

डोर मिल प्रीत की बढ़ायेंगे ।।

*

दृश्य क्या खूब हुआ मौसम का

इंद्रधनुषों की ही बहारे हैं ।

जीत होवे सदा से उनकी जो

कर्म करके जहाँ सजायेंगे ।।

*

पर्व पावन है संक्रति का

दान तिल गुड़ का करते जायेंगे।

डुबकी अमृत भरी चलो लेकर

नर्मदे हर ही नित्य गायेंगे ।।

*

भोग खिचड़ी का सब लगाया जो

सूर्य आराधना समर्पित है ।

उत्तरायण हुआ है मंगल जो

गीत भजनों को हम सुनायेंगे।।

☆

जब आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती हैं, तब लगता है मानो जीवन स्वयं हमें पुकार रहा हो—

“उड़ो, पर अपनी जड़ों को मत भूलो।”

मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि ऊँचाई पाने के लिए कटुता नहीं, कटौती चाहिए—अहंकार की, आलस्य की, नकारात्मक सोच की।

जैसे किसान नई फसल की तैयारी करता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में नए संकल्पों के बीज बोने चाहिए।

जो स्वयं को साध ले, वही सच में ऊँचा उड़ता है।

सूर्य का तेज आपके जीवन को प्रकाशित करे,

अन्न की समृद्धि आपके घर में बनी रहे,

और आपके जीवन की पतंग सदैव ऊँचाइयों को छुए।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८८ ⇒ सूरज के तेवर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूरज के तेवर…“।)

?अभी अभी # ८८८ ⇒ आलेख – सूरज के तेवर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ये महाशय सूरज,

ऊंचे घोर अंबर में रहाते हैं

जेठ की भरी दुपहरी में

तो तमतमाते हैं ,

और जब पौस माह में

आसमान में ड्यूटी देते हैं

तो ठंड में कंपकंपाते हैं ।

अजीब फितरत है इनकी

कभी आग का गोला

तो कभी बर्फ का गोला !

दिन के चौकीदार हैं ये

खुद रात को तानकर सोते हैं;

कल तो इन्होंने हद कर दी

दिन भर बादलों का

कंबल ओढ़कर पड़े रहे

और अपनी रोशनी को

भी कंबल में छुपा लिया ।।

तलवार में जंग नहीं लगती

तलवार जंग लड़ने के लिए होती है ;

सूरज भी रोशनी देने के लिए होता है,

उसे भी कहीं जाड़ा लगता है !

लेकिन समय का फेर देखिए,

दिन में भी कभी यह सूरज

मुंह छुपाता है

तो कभी बारिश के रूप में

घड़ियाली आंसू बहाता है ।।

कभी तो मन करता है

एक रूमाल से इसके आंसू

पोंछ दूं,

थोड़ी इसको भी विक्स

की भाप दे दूं

इस बेचारे का कौन है

उस बेरहम आसमान में ।

फिर खयाल आता है

जब सूरज को ग्रहण लगता है तो पुजारी भगवान का मंदिर भी नहीं खोलता !

कौन देवता बड़ा है

मंदिर वाला अथवा

आसमान वाला यही

हमारा आदित्यनाथ ।।

सर्वशक्तिमान भुवन भास्कर की

यह दशा हमसे देखी नहीं जाती ।

इस धरा के हर प्राणी की निगाह आसमान पर ही लगी रहती है । उसका तेज ही हमारा तेज है ।

काश गलत हो हमारा अनुमान !

आज नहीं ऐसा कोई बाल हनुमान,जो फिर सूरज को बर्फ का गोला समझ मुंह में धर ले ।

समस्त वसुन्धरा की ओर से हमारा सूर्य नमस्कार

स्वीकार करें ।

यह ईश्वर का कोप हो

अथवा प्रकृति का प्रकोप

प्रकृति से खिलवाड़ करने वाले हम इंसान ही हैं ।

हमारी खता माफ़ हो ।

अपनी लीला समेटें !

स्वयं प्रकाशित हों

और समस्त चराचर को भी अपनी स्वर्ण रश्मियों से आलोकित एवं आल्हादित करें ।

ॐ सूर्याय नम:

ॐ हिरण्यगर्भाय नम‌:

ॐ रवये नम:

ॐ खगाय नम:

ॐ मित्राय नमः

ॐ पूष्णे नमः

ॐ मारीचाय नम:

ॐ सावित्रे नम:

ॐ अर्काय नमः

ॐ भानवे नम:

ॐ आदित्याय नमः:

ॐ भास्कराय नमः

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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