हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अब तक 2192!. ✍☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अब तक 2192 !.✍️ ? ?

(दैनिक लेखन का सातवाँ वर्ष)

(ई-अभिव्यक्ति की ओर से इस साहित्यिक यात्रा के सहयात्री श्री संजय भारद्वाज जी को २१९२ साहित्यिक रचनाओं के सहयोग के लिए हृदय से आभार. यह इस यात्रा के मील का एक पत्थर है. इस कीर्तिमान के लिए — अभिनन्दन 💐🙏) 

आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।

प्रसंग यह है कि लेखन करते हुए लगभग चार दशक से अधिक बीत चुके। उसमें गत आठ-नौ वर्ष से लिखना नियमित-सा रहा। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही। 15 जून 2019 से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। 

फिर संपादक आदरणीय बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?” 

संजयकोश’ में यूँ भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।

इस दैनिक यात्रा ने आज सातवें वर्ष में चरण रखा है।

आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इन  वर्षों ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित दैनिक लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकम्पा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।

अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर किल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं।

तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।

नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरम्भ कर दिया है। अनेक मित्रों ने इसका श्रेय दिया तो अनेक कंजूसी भी बरत गए। इतना अवश्य है कि  रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।

विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।

आदरणीय भाई हेमंत बावनकर जी इस नियमितता के प्रथम कारण और कारक बने। ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ के सम्पादक श्रीकांत पाराशर जी विगत पाँच चार वर्ष से साप्ताहिक उवाच को बैंगलुरू और चेन्नई दोनों संस्करणों में स्थान दे रहे हैं। भिवानी से दैनिक ‘चेतना’ के सम्पादक श्रीभगवान वसिष्ठ जी भी साढ़े चार वर्ष से ‘उवाच’ और ‘दृष्टि’ दोनों स्तम्भ नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं। आप तीनों महानुभावों को हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद। नियमित रूप से मेरे लेखन को पढ़नेवाले और अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभारी हूँ। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।

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© संजय भारद्वाज  

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 738 ⇒ ||•• गं ध ••|| ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – ||•• गं ध ••||।)

?अभी अभी # 738 ⇒ आलेख – ||•• गं ध ••|| ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

~~ smell ~~

आप सुगंध कहें या खुशबू, किसे महकता वातावरण पसंद नहीं। बात चाहे वादियों और फिज़ाओं की हो, अथवा गंधमादन पर्वत की, सुंदरता और मादकता को न तो आप परिभाषित कर सकते हैं, और न ही उसे किसी तस्वीर में उतार सकते हैं। किसी बदन की खुशबू और किसी गुलाब की महक किसी नुमाइश की मोहताज नहीं। कब ‘आंख ‘ सूंघ ले, और कब ” नाक ‘ देख ले, कुछ कहा नहीं जा सकता। एक सस्ता सा शेर भी शायद यही बात दोहरा रहा है ;

सच्चाई छुप नहीं सकती

बनावट के उसूलों से।

कि खुशबू आ नहीं सकती

कभी काग़ज़ के फूलों से।।

सभी प्राणियों में सूंघने की शक्ति होती है, किसी में कम, किसी में ज्यादा। जिस तरह लोग स्वाद के शौकीन होते हैं, उसी तरह कई लोग खुशबू के भी शौकीन होते हैं। कजरा अगर सुंदरता का प्रतीक है तो गजरा खुशबू का। रसिकों का क्या है, वे तो सुनने के भी शौकीन होते हैं ;

पायल वाली देखना,

यहीं तो कहीं दिल है ;

पग तले आए ना।।

रस और गंध का गुण धर्म राजसी है। स्वर्ग में राजसी सुख है, वैभव है, नृत्य और संगीत है। हम मंदिर में अपने इष्ट को पुष्प और गंध दोनों अर्पित करते हैं। धूप बत्ती और कर्पूर आरती का भी प्रावधान है। गंध से आसुरी शक्तियां पास नहीं फटकती। सुगंधित पदार्थों और जड़ी बूटियों से ही यज्ञ और हवन संपन्न होते हैं।

पुष्प समर्पयामि। गंधं समर्पयामि ! चित्त का शांत होना ही शांति का प्रतीक है।

सूंघने का विभाग नाक का है। एक विभाग के भी दो भाग हैं, जिनमें वेंटिलेटर्स लगे हैं। हमारे फेफड़ों में प्राणवायु का प्रवेश और कार्बन डाइऑक्साइड की निकासी भी तो इसी नाक से होती है। नस नाड़ियों का जाल हमारे शरीर का नेटवर्क है। सूर्य चंद्र नाड़ी का अनुपात शरीर को गर्म ठंडा रखता है। संत कबीर तो इड़ा पिंगला की बात करते करते सीधे सुषुम्ना यानी सहज समाधि तक पहुंच जाते हैं।।

यह हमारा शरीर भले ही हाड़ मांस का पुतला हो, लेकिन अगर किसी के बदन में खुशबू है तो किसी के शरीर में बदबू भी हो सकती है, क्योंकि हमारी प्रवृत्ति भी सात्विक, राजसी और तामसिक होती है तामसी पदार्थों के सेवन से बदन में खुशबू नहीं, बदबू ही आती है। जैसा अन्न वैसा मन ;

फूल सब बगिया खिले हैं

मन मेरा खिलता नहीं क्यों।

फूल तो खुशबू बिखेरें

मैं रहा बदबूऍं क्यों।।

हमारे ही शरीर में आभा भी है और ओज भी, जिसे विज्ञान की भाषा में aura कहते हैं। किसी के आने पर सजना, धजना, संवरना भी प्रसन्नता का ही द्योतक होता है। बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है। खुशी से हमारा चेहरा खिलता क्यों है, जब उदास होते हैं, तो मुरझाता क्यों है।

चमन में बहार है तो खुशबू है। जिस घर में महक और खुशबू जैसी बहनें हों, वहां तो बहार ही बहार है। किसी के पड़ोसी अगर मिस्टर गंधे हैं तो किसी के समधी श्री सुगंधी हैं। एक सुगंधा मिश्रा है, जो आज तक यह तय नहीं कर पा रही, कि वह एक अच्छी गायिका है या मिमिक्री आर्टिस्ट।।

अक्सर, जब सर्दी जुकाम हो जाता है, तो हमारी सूंघने की शक्ति काम नहीं करती। हम समझते हैं, रसोई में अभी दाल ही नहीं गली, जब कि दाल जलकर खाक हो चुकी होती है। पेट में जब चूहे कूदने लगते हैं, तो दूर किसी झोपड़ी से चूल्हे की आग में सिक रही रोटी की महक, छप्पन भोग को मात कर देती है।

हमारी माटी की गंध का भी जवाब नहीं। तपती गर्मी के बाद, जब बारिश की कुछ बूंदें, धरती पर पड़ती है, तो वह सौंधी सौंधी खुशबू, बड़ी प्यारी लगती है। नेकी ही खुशबू का झोंका है और बदी, असह्य बदबू।

षडयंत्र की बू सभी को आ जाती है लेकिन अच्छाई कभी अपना प्रचार नहीं करती। फूल कभी नहीं कहता, मुझे सूंघो, उसकी खुशबू चलकर आपके पास आती है। हमारा स्वभाव ही हमारी असली पहचान है, डियोड्रेंट और आर्टिफिशियल फ्रेगरेंस ( कृत्रिम सुगंध ) नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व

सावन मास सुहावन लागे । हरियाली के साथ भगवा रंग को धारण किये हुए श्रद्धा व विश्वास की शक्ति को काँधे पर लिए भक्त गंगा जल या नगर ,ग्राम में जो भी नदियाँ हैं उनके जल को काँवर  में भरकर बांस की छड़ी  जिसके दोनों ओर जल से भरे घड़े लटके रहते हैं ।

आस्था ,संस्कार की पूर्णता,ब्रह्मचर्य नियम का पालन, पद यात्रा, बम- बम भोले का  जाप करते हुए शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं ।

*

कांवड़िया चलते हैं आगे

भाव भावना भगवन जागे

भोले की भक्ति को धारे

बम बम बम का नाम पुकारे ।

*

भगवा वस्त्र धार कर रहते

शिव शंकर को गुरुवर कहते

जलाभिषेक करें  पावनता

बिगड़े काम सकल जन बनता ।।

*

बारिश की बूंदों में भींगते हुए, बिना रुके, कदम से कदम मिलाते हुए पूरे जुलूस के साथ, झांझ, मंजीरा, भजन, जयकारे, मंत्र जाप की अनुगूँज । महिलाएँ गोद में बच्चों को लिए, उँगली पकड़े, व सखी सहेलियों के साथ, पूरे परिवार, समाज के संग भोलेनाथ को मनाने शिव मंदिर पहुँचती हैं । यही सब तो  अपनी संस्कृति से जुड़ने व समझने के लिए मार्ग तैयार करता है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख वो भी क्या दिन थे।)

☆ आलेख – राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

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राष्ट्रीय प्रसारण दिवस का इतिहास:

भारत में पहला रेडियो प्रसारण बॉम्बे स्टेशन से 23 जुलाई 1927 को किया गया था। तब स्टेशन का स्वामित्व इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी नामक एक निजी कंपनी के पास था।

सरकार ने 1 अप्रैल 1930 को प्रसारण का कार्यभार संभाला और इसका नाम बदलकर भारतीय राज्य प्रसारण सेवा (आईएसबीएस) कर दिया ।

यह शुरू में प्रायोगिक आधार पर था।  बाद में यह स्थायी रूप से 1932 में सरकारी नियंत्रण में आ गया।

8 जून, 1936 को भारतीय राज्य प्रसारण सेवा ऑल इंडिया रेडियो बन गई । 1956 में इसका नाम आकाशवाणी रखा गया।

वर्तमान में, आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है।

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(प्रसारण दिवस की सभी साथियों को बधाई। मुझे अपने स्कूल समय की एक रोचक घटना याद आ रही है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। – श्री अजीत सिंह)

एक रेडियो उद्घोषक ने रेलवे स्टेशन मंज़ूर करवा लिया… 

राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर, मुझे उस समय की याद आती है जब एक रेडियो उद्घोषक अपने गांव के लिए एक रेलवे स्टेशन मंजूर करवा सकता था । यह साल 1956 या 57 के आसपास की बात है।जब मैं छठी या सातवीं क्लास का स्कूल छात्र था ।

उस समय हरियाणा पंजाब राज्य का हिस्सा था। जिला करनाल  में सरकारी हाई स्कूल कैमला में हमारे शिक्षक ने हमें एक दिन पास के गांव कोहंड तक पैदल मार्च करने के लिए कहा, जहां एक मंत्री को एक जनसभा को संबोधित करना था।  हम यात्रा का आनंद लेने के लिए बहुत खुश थे और लगभग तीन किलोमीटर की दूरी कोई बड़ी बात नहीं थी।

रेल राज्य मंत्री श्री शाहनवाज कुछ समय बाद पंडित हिरदे राम के साथ आए, जो कि कोहंड गांव के रहने वाले आकाशवाणी दिल्ली के देहाती कार्यक्रम के एक लोकप्रिय कंपीयर थे।

अपने स्वागत भाषण में हिरदे राम ने रेलवे स्टेशन की मांग की और बदले में मंत्री ने मांग स्वीकार कर ली।  हम सभी ने ताली बजाई।  ऐसा लग रहा था कि हिरदे राम पहले से ही दिल्ली में मंत्री के साथ डील कर चुके थे।

एक दो महीने के बाद, हम फिर से कोहंड के लिए मार्च कर रहे थे जब पहली ट्रेन वहां रुकी थी। यह एक उत्सव का समय था। इसमें ग्रामीण बैंड बाजे के साथ शामिल हुए।  सरपंच और उसके आदमियों ने मिठाई से भरी  टोकरियां हर डिब्बे में डाली।  बर्फी का एक डब्बा स्टेशन मास्टर के लिए और दूसरा इंजन ड्राइवर के लिए था। पतासों के साथ हमने भी अपनी जेबें भरी थीं।

ट्रेन उस दिन करीब दस मिनट के लिए रुकी। स्टेशन मास्टर ने घोषणा की कि आगे से रेलगाड़ी का ठहराव केवल एक मिनट के लिए होगा ।

असल में, स्टेशन को ट्रैफिक की मात्रा के आधार पर परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया था।  ट्रैफिक ज्यादा नहीं था।  स्थानीय पंचायत ने एक रास्ता तैयार किया: पहला, कोई भी बिना टिकट यात्रा नहीं करेगा और दूसरा, पंचायत निर्धारित न्यूनतम कोटा पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिदिन रेलवे टिकट खरीदेगी।

कोहंड रेलवे स्टेशन अभी भी एक छोटा स्टेशन है।  जाहिर है, अब टिकटों की आवश्यक बिक्री को पूरा करने के लिए पर्याप्त ट्रैफिक है।   मुश्किल से एक या दो ट्रेनें वहां रुकती हैं।  पानीपत और करनाल के लिए यात्री यहां से ट्रेनें लेते हैं।

हमारे गांव में एक सामुदायिक रेडियो सेट था और लोग हर्षोल्लास के साथ देहाती कार्यक्रम सुनते थे। कभी कभी  कोई कहता सुनाई पड़ता कि साहब  के रूप में बोल रहा आदमी वही व्यक्ति है जिसने अपने गांव कोहंड के लिए रेलवे स्टेशन  मंजूर करा लिया था।

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जब मैं अस्सी के दशक में आकाशवाणी जम्मू में संवाददाता के तौर पर काम कर रहा था तो  एक सहयोगी ने मुझे एक श्रोता से मिली चिट्ठी दिखाई जिस पर पता लिखा था, “स्टेशन मास्टर, रेडियो कश्मीर, जम्मू” । अक्सर पत्र डायरेक्टर के नाम से आते थे। मैंने कहा इसमें श्रोता की कोई खास गलती नहीं है। अगर रेलवे स्टेशन  का मुखिया स्टेशन मास्टर हो सकता है तो रेडियो स्टेशन का मुखिया भी स्टेशन मास्टर क्यों नहीं हो सकता ?

हा हा!

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 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 737 ⇒ घोड़ा, घास और यारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घोड़ा, घास और यारी।)

?अभी अभी # 737 ⇒ आलेख – घोड़ा, घास और यारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घोड़ा घास से यारी नहीं करता ! घोड़े पर अक्सर सवारी की जाती है। आप गाय और कुत्ते की तरह घोड़े को नहीं पाल सकते। घोड़ा बिना घुड़सवार के शोभा नहीं देता। गाय और कुत्ता तो कोई भी रहम दिल इंसान पाल सकता है, घोड़े को पालने के लिए शारीरक बल के अलावा एक अस्तबल की भी आवश्यकता होती है।

युद्ध की कलाओं में घोड़े का विशिष्ट स्थान है। अश्वारोही सेना के बिना कोई भी युद्ध अधूरा होता था। महाराणा प्रताप हों, छत्रपति शिवाजी हों या फिर रानी लक्ष्मीबाई, घोड़ा ही इनकी पहचान थी। अश्व – विश्व में चेतक का नाम अमर है।।

फ़ौज में आज भी कैवेलरी यूनिट, अश्ववाहिनी सेना होती है। कर्फ्यू के वक्त कुछ बीएसएफ के जवान सड़कों पर मार्च करते देखे जा सकते हैं। कभी इंदौर शहर भी ताँगों का शहर हुआ करता था। आज शहर से घोड़ा और घास दोनों गायब हैं।।

घुड़सवारी अगर एक शौक है, तो घुड़दौड़ एक जुनून। मुम्बई का महालक्ष्मी रेस कोर्स घुड़दौड़ के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ घोड़ों पर दाँव लगाया जाता है। यह एक तरह का जुआ है, जिसमें कई रईस अपनी दौलत लुटा बैठते हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई राय साहब बने चरित्र अभिनेता किसी नंबर के घोड़े पर दाँव लगाकर अपना सब कुछ हार जाते हैं, और दिल के दौरे में अपनी जान गँवा बैठते हैं। तब हीरो रायसाहब की लड़की और माँ को सहारा देता है। अंग्रेजों का यह एक प्रिय खेल था, इसलिए हर छोटे-बड़े शहर में रेस कोर्स रोड और पोलोग्राउंड आज भी देखे जा सकते हैं।

कभी घोड़े तांगा और बग्घी में जोते जाते थे। महाभारत काल में कृष्ण जिस अर्जुन के रथ के सारथी बने थे, उसमें भी घोड़े ही शोभायमान होते थे। जब घोड़े को घास मिलनी बंद हो गई, तो ताँगों का स्थान सायकल रिक्शा और ऑटो रिक्शा ने ले लिया। एक आम इंसान ने भले ही ज़िन्दगी में कभी कोई घोड़ा न खरीदा हो, सोते वक्त वह अक्सर घोड़े बेचकर ही सोता है।।

जो लोग धंधे-व्यवसाय को यारी से अधिक महत्व देते हैं, वे दोस्ती के लिहाज में एक पैसा नहीं छोड़ते। उनका यह तकिया कलाम होता है, भैया ! घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खायेगा क्या ? उन्हें यारी से ज़्यादा घास प्यारी है। उसूल अपना अपना।

अब तो घोड़ा बस बारात में देखा जा सकता है। माफ़ कीजिये, वह भी शायद घोड़ी ही होती है। घोड़ी पे हो के सवार … गाना चला करता है। दूल्हे राजा घोड़े पर बैठे हैं। एक रस्म में घोड़े को आग्रहपूर्वक एक पात्र में भीगी हुई चने की दाल खिलाई जाती है। बस शायद यही एक मौका होता है, जब घोड़ा घास से नहीं, चने की दाल से भी यारी कर लेता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

साइकोलोजी की पढ़ाई करते हुए कभी सोचा ही नहींं, बस मुट्ठी भर ख्वाब लिए तरक्की के लिए बढती रही। उम्र  के साथ साथ माँ की थपकी ना जाने कब हिदायत में बदल गई और कपड़ों का पहनावा समाजिक सम्मान से जुड़ गया मालूम ना चला।

गणित कमज़ोर रहा अतः दुनियाँदारी में हमेशा ठगी गई फिर भी साइकोलोजी की पढ़ाई पूरी हूई और  नाते रिश्तेदारों में फुसफुसाहट होने लगा बिटिया सयानी हो गई फिर देरी कहाँ हुई और पिता जी ने थमा दिया हाथ पिया के देहरी से।

अजीब है न ! स्त्री अर्धांगिनी बनते ही पूर्णता दर्शाने की कोशिश करने के लिए कदम ताल मिलाने की भरपूर कोशिश करतीं हैं और पुरुष समाज यह समझ लेता है कि स्त्री उसका अधिपत्य है।

मकान से घर और घर से पिहर – माया का के बीचों बीच फंसी स्त्री मन हमेशा कोशिश करता रहा कि उसके घर की खिड़की दरवाजे भले लकड़ी के हो लेकिन उसके जीवन साथी का हृदय विस्थापित जंगल हो जहाँ उसके लिए कोई रोक टोक ना हो बिल्कुल माता पार्वती जी के जैसे वह केवल अपने शिव रुपी पति की संगनी रहना चाहतीं है उसके लिए सम्पति तो केवल उसका पति होता है।

अनगिनत भ्रम में जीवित रहतीं स्त्रियाँ केवल ऊपरी सतह के परतों में लिप्त हाथों में  हरी – हरी चुड़ियाँ डालकर कहती है –

शिव का सावन आ गया जबकि सच्चाई तो यह है कि उनके मन के अंदर एक घुटन ढूढ़ती हैं एक विस्थापित जंगल जिस जंगल में वह अपने शिव के साथ बैठीं केवल शिवमय होकर अनंत में मिलने से पहले खिल खिलाकर बोले –

“देखो शिव सावन आ गया”

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 736 ⇒ भूरि भूरि प्रशंसा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भूरि भूरि प्रशंसा।)

?अभी अभी # 736 ⇒ आलेख – भूरि भूरि प्रशंसा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Panegyrize)

जब हम किसी की तारीफ करते हैं, तो खुलकर करते हैं, और जब बुराई करते हैं तो जमकर। याने जो भी काम करते हैं, तबीयत से करते हैं। इन दोनों के मिले जुले स्वरूप को ही निंदा स्तुति भी कहते हैं। राजनीति में कड़ी निंदा की जाती है और ईश्वर की स्तुति आंख बंद करके की जाती है। वह स्तुति, जिसे चापलूसी कहते हैं, वह तो जी खोलकर की जाती है।

तारीफ शब्द थोड़ा उर्दू और थोड़ा फिल्मी है, जब कि प्रशंसा शब्द शुद्ध और सात्विक रूप से हिंदी शब्द है। इतना सात्विक कि इस प्रशंसा को भूरि भूरि प्रशंसा भी कहा जाता है। यानी किसी की जब बुराई करने का मन हो, तो उसे खरी खोटी सुनाना, और प्रशंसा करने का मन किया तो भूरि भूरि प्रशंसा।।

निंदा स्तुति अथवा बुराई और भूरि भूरि प्रशंसा एक ही मुंह से की जाती है। लेकिन प्रशंसा में चाशनी घोलने के लिए यह जरूर कहा जाता है, आपकी प्रशंसा किस मुंह से करूं ! अरे भाई, उसी मुंह से करो, जिस मुंह से कल बुराई कर रहे थे। कल जो कलमुंहा था, आज उसका चेहरा चांद सा कैसे हो गया।

चलिए, हमें इससे क्या, हमारा मन तो आज भूरि भूरि प्रशंसा करने का हो रहा है, इसलिए आज हम गुस्से से लाल पीले नहीं होने वाले। प्रशंसा लाल नहीं होती, नीली, पीली, हरी नहीं होती यह भूरि ही क्यों होती है।

स्तुति और प्रशस्ति के करीब, भूरि’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है बहुत, प्रचुर मात्रा में और बार-बार। जैसे भूरि दान =प्रचुर मात्रा में दिया गया दान। भूरि-भूरि प्रशंसा का अर्थ है बहुत-बहुत प्रशंसा, बारम्बार प्रशंसा।।

अंग्रजी भाषा इतनी संपन्न नहीं। आप किसी की अंग्रेजी में brown brown praise नहीं कर सकते, उसके लिए उनके पास एकमात्र शब्द पेनिगराइज़ (panegyrize) है। यह शब्द हमें अपोलोज़ाइज

(apologize) का करीबी लगता है, , लेकिन इसका और panegyrize का छत्तीस का आंकड़ा है, जहां भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती, उल्टे माफी मांगी जाती है।

ईश्वर की प्रशंसा नहीं की जाती, गुणगान किया जाता है। हमें तो भूरि भूरि प्रशंसा में चापलूसी अथवा चाटुकारिता की कतई बू नहीं आती। सज्जनों, मनीषियों, अथवा विद्वत्जनों की भूरि भूरि प्रशंसा करने में कोई दोष नहीं, अतिशयोक्ति नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 735 ⇒ सूर सूर, तुलसी शशि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूर सूर, तुलसी शशि।)

?अभी अभी # 735 ⇒ आलेख – सूर सूर, तुलसी शशि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आगे क्या लिखूँ, आप खुद समझदार हो। केशव दास को उड़गन यानी तारा बता दिया, और आज के कवियों के बारे में तो मत पूछिए, क्या क्या कह डाला, कहने वाले ने। बेचारों को जुगनू बनाकर रख दिया। हिंदी में इस उक्ति पर हमें निबंध भी लिखना पड़ता था। निबंध क्या, हम तो बस अर्थ कर देते थे, सूर तुलसी तो हम आज तक पढ़ते आ रहे हैं। केशवदास को हमने स्कूल के बाद कभी हाथ नहीं लगाया, बस बच्चन की मधुशाला और नीरज के कारवां गुजर गया, में ही अटके रहे।

जब पढ़ने की उम्र थी, तब तो बस जो कोर्स में था, वही पढ़ लेते थे। वह भी इसलिए, क्योंकि वह परीक्षा में आता था। उसी दौरान हमने तोते की तरह गिरधर की कुंडलियां, मीरा के भजन, कबीर की साखी और संस्कृत के कुछ श्लोक रट लिए थे। लेकिन असली पढ़ाई तो तब शुरू हुई, जब हमारे कॉलेज की पढ़ाई खत्म हुई।।

उसके बाद, हम अपनी मर्जी के मालिक थे, जो मर्जी हुई पढ़ा, जो पसंद नहीं आया, वह नहीं पढ़ा।

हिंदी तो खैर हमारी मातृभाषा भी रही है और घर में बोलचाल की भाषा भी, लेकिन अंग्रेजी से हमारा वास्ता तब पड़ा, जब हमें छठी का दूध याद आया, यानी छठी कक्षा से ही हमें अंग्रेजी का अक्षर ज्ञान हुआ।

जब हमें ज्ञात हुआ कि ये विचार तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हैं, तो उनका व्यक्तित्व हमारी आंखों के समक्ष आ गया। उनके आगे कोई बड़ी लकीर नहीं खींची जा सकती। आप किसी आलोचक की आलोचना नहीं कर सकते, हां, उस पर विमर्श अवश्य कर सकते हैं।।

सूरदास अष्ट छाप के कवि थे और वैष्णव सम्प्रदाय के होकर कृष्ण भक्त थे, जब कि आचार्य तुलसीदास राम भक्त थे, और उनके द्वारा रचित रामचरितमानस का आज भी घर घर पाठ होता है। कई को सुन्दरकाण्ड कंठस्थ है तो कुछ को पूरी की पूरी रामायण। सूरदास के कुछ पद और रामायण की कुछ चौपाई तो खैर हमें भी याद है, लेकिन मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो सुनकर अनूप जलोटा का ही खयाल आता है, ना कि सूरदास जी का।

सही बात बोलें तो जितनी श्रद्धा जन मानस की तुलसीदास जी में है, उतनी सूरदास जी में नहीं। केवल ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी लिखने से तुलसीदास जी का महत्व कुछ कम नहीं हो जाता। हमने तो “सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ” का भावार्थ यह भी सुना है, तब सूरदास जी ने हंसते हुए, यशोदा जी को गले लगा लिया।।

सूर, तुलसी, मीरा, कबीर, रहीम और जायसी, सभी भक्तिकाल के कवि थे, और शायद इसीलिए इस काल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल माना गया है।

राजनीति की तरह इन पर कीचड़ नहीं उछाला जाता, इन पर शोध ग्रंथ लिखे जाते हैं।

इसी संदर्भ ने मानस पीयूष, Gita Press, Gorakhpur द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस पर एक विस्तृत टीका है। इसे “रामचरितमानस की सबसे बड़ी टीका” के रूप में जाना जाता है, जिसे संत विद्वान श्री अंजनी नंदन शरण जी ने संपादित किया है. यह सात खंडों में उपलब्ध है, और इसमें रामकथा के विभिन्न विद्वानों, विचारकों और संतों की व्याख्याओं का संग्रह है।।

कवि और आलोचक अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन सूरदास जी को सूर्य बताना और तुलसीदास जी की तुलना चंद्रमा से करना, हमें कुछ हजम नहीं हुआ। हमारे समकालीन पंत, निराला, और महादेवी जैसे कई कवि क्या कवल साहित्यकाश में टिमटिमा रहे हैं। आचार्य शुक्ल स्वयं धुरंधर विद्वान एवं विचारक थे। हम तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित सभी आलोचकों और संत कवियों को सादर नमन करते हुए अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

वैष्णव कृष्ण भक्तों को जय श्री कृष्ण और तुलसी के राम भक्तों को जय राम जी की..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥
© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 140 – देश-परदेश – विश्व आइसक्रीम दिवस: तीसरा रविवार, जुलाई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 140 ☆ देश-परदेश – 🧁 विश्व आइसक्रीम दिवस: तीसरा रविवार, जुलाई 🍦 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गूगल ने आज ये जानकारी प्रदान करी, कि आज “आइसक्रीम दिवस” है। मन को बड़ी ठंडक मिली, गर्मी से बहुत बुरा हाल हो रहा हैं। तभी मन के भीतर से आवाज़ आई, कि हमारा तो गला बहुत खराब है। आइसक्रीम ग्रहण करने से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता हैं। इसलिए मन की,ये ठंडक तो मात्र कुछ क्षण की थी।

बचपन में हमारे घर पर जब फ्रिज नहीं था,हाथ की मशीन से आइसक्रीम बनती थी। बर्फ और नमक के उपयोग से दूध को इतना ठंडा किया जाता था,और बहुत अधिक मेहनत के बाद ही वो आइस क्रीम का आकार ले पाता था। मेहनत का फल मीठा होता है,शायद आइस क्रीम बनाने की क्रिया से ही बना होगा।

परिचित अमीरों के विवाह में आइस क्रीम भी सीमित मात्रा में खाने को मिलती थी। एक छोटा सा क्वालिटी ब्रांड का कप प्रचलन में हुआ करता था। समय के अनुसार ईंट (ब्रिक्स ) आकर की आइसक्रीम विवाह आदि कार्यक्रमों में भी खूब खाई थी।

युवावस्था में परिवार के विवाह कार्यक्रमों में आइसक्रीम के स्टॉल पर ड्यूटी लगती थी। एक बार विवाह में ब्रिक्स को काटकर हम आइसक्रीम का वितरण कर रहे थे। एक परिचित को जब हमने ब्रिक्स को काट कर उनको दिया, तो वो बोले मैं बाद में ले लूंगा। अंतिम टुकड़े को जब काट रहे थे, तो वो परिचित बोले, अब और कितने टुकड़े करोगे, इस प्रकार से उन्होंने दो व्यक्तियों के बराबर की आइसक्रीम डकार ली थी।

विवाह आदि में आज भी मीठे के स्टॉल भर सबसे अधिक भीड़ मिल जाती हैं। घर में जिन व्यक्तियों को शुगर की बीमारी के कारण मीठा प्रतिबंधित रहता है, ऐसे व्यक्ति मौक़े पर चौके लगा लेते हैं।

बाजार में तो शुगर रोगियों के लिए “शुगर फ्री” आइसक्रीम भी उपलब्ध हो गई है, आने वाले समय में खांसी/गले के रोगियों के लिए भी शायद” खांसी फ्री ” आइसक्रीम आ सकती हैं। हमें तो तब तक इंतजार ही करना पड़ेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 12 – आलेख – “डॉ. रंजीत की स्मृति-सामग्री पर चिंतन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख डॉ. रंजीत की स्मृति-सामग्री पर चिंतन

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 12 ☆

☆ आलेख ☆ “डॉ. रंजीत की स्मृति-सामग्री पर चिंतन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

(संदर्भ : श्री हेमन्त बावनकर की लघुकथा इस लिंक पर क्लिक कर अथवा आलेख के अंत में पढ़ें सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें“**)

संवेदनशील साहित्यकार – कथाकार भाई हेमन्त बावनकर की लघुकथा “सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह और पुस्तकें” सोचने को विवश करती है कि क्या हमारी अगली पीढ़ी के लिए हमारे द्वारा अर्जित, संग्रहित धन – संपत्ति के अतिरिक्त बाकी सब व्यर्थ है ? कथाकार या तो रंगीन कल्पना की उड़ान भरता है या दुनिया – समाज में देखी, अनुभव की गई वास्तविक घटनाओं को अपने द्वारा रचित पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत करता है । हेमन्त जी की यह कथा समाज की नई पीढ़ी के रचनात्मकता से दूर सिर्फ आवश्यकता की पूर्ति वाले जीवन दर्शन का चित्र भी है जिसमें उन्होंने अपनी कथा में दिवंगत हो चुके साहित्यकार डॉ. रंजीत के पुत्र सुजीत और रंजीत के मित्र सेवकराम के माध्यम से लोगों के सामने एक समस्या रखी है ।

कथा में डॉ. रंजीत स्मृति शेष साहित्यकार बताए गए हैं । उनके जीवन काल में उन्हें अनेक सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह मिले साहित्यिक रुचि के कारण धीरे –  धीरे उनके पास पुस्तकों का भंडार भी एकत्रित हो गया । लोग सच ही कहते हैं कि सबको एक दिन सब यहीं छोड़कर जाना पड़ता है । दुनियां में शेष रहता है व्यक्ति का यश – अपयश, उसके द्वारा संग्रहित चल – अचल संपत्ति । सम्पत्ति तो परिजनों को बहुत अच्छी लगती है किंतु यदि अगली पीढ़ी में कोई उसकी रुचि का, अपनी विरासत का सम्मान करने वाला नहीं है तो व्यक्ति द्वारा छोड़े गए ढेरों फोटो, सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह पुस्तकें, गिटार – सितार, रंग – ब्रश अथवा उसकी रुचि या पेशे से संबंधित सभी वस्तुएं घर के लोगों को व्यर्थ जगह घेरने वाली लगने लगती हैं और वे स्मृति शेष व्यक्ति की अत्यंत प्रिय वस्तुओं को भी अल्प दामों में अथवा मुफ्त ही कबाड़ी को देने में भी नहीं हिचकते । मैं अनेक ऐसे लोगों को जानता हूं जिन्हें अपने पिता के दुनिया से जाने के बाद उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुएं कचरा नजर आने लगीं । डॉ. रंजीत का बेटा सुजीत भी इसी तरह का पुत्र है । सुजीत अपने पिता के मित्र सेवकराम से कहता है कि उनके पिता के सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह और पुस्तकें लेने कोई तैयार नहीं अब इन्हें कैसे ठिकाने लगाया जाए । सेवकराम सोच में पड़ जाती हैं और सलाह देने के लिए कुछ समय मांग लेते हैं ।

मुझे लगता है कि जहां पुत्र ने अपने पिता का ही पेशा और रुचि अपनाई है वहीं पिता की रुचिकर सामग्री व उपलब्धियों का सम्मान है उसे उपयोगी धरोहर माना जाता है क्योंकि उससे पुत्र को अपना मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिलती है । साहित्यकार पिता के साहित्य समझने वाले पुत्र, डॉक्टर के डॉक्टर पुत्र, वकील के वकील पुत्र, व्यवसायी के व्यवसायी पुत्र को पिता के विरासत व नाम से लाभ मिलता है किंतु जहां पुत्र का पेशा अलग हुआ उसकी रुचियां व आवश्यकताएं भी अलग हो जाती हैं और विरासत नष्ट हो जाती है । ऐसी स्थिति में किसी भी पिता को मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि उसके द्वारा संग्रहित सामग्री का विनिष्टीकरण तय है । किसी भी नगर – कस्बे में इतनी बड़ी संख्या में ऐसे संग्रहालय भी नहीं हैं जो आम साहित्य अथवा कला साधकों की “स्मृति – सामग्री” को अपने संग्रहालय में स्थान दे सकें । सामान्यतः तो बहुसंख्यक साहित्य – कला साधक आर्थिक रूप से कमजोर ही होते हैं और जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं उनमें अधिकांश कृपण । इस स्थिति के चलते इनके संयुक्त चंदे से भी किसी ऐसे स्थल का निर्माण संभव नहीं है जहां स्मृतिशेष साहित्य – कला साधकों की सामग्री को सुरक्षित रखा जा सके । बिरले ही सम्पन्न और स्वयं के लिए उदार रचनाधर्मी या तो स्वयं जीवित रहते अपने नाम का संग्रहालय बनवाने की व्यवस्था कर जाते हैं अथवा लाखों में किसी भाग्यशाली का पुत्र ऐसा होता है जो पिता की स्मृतियों को सम्हालने के लिए कुछ करता है ।

सेवकराम जी डॉ. रंजीत के पुत्र सुजीत से रंजीत जी की पुस्तकों, सम्मान पत्रों आदि की व्यवस्था पर सोच – विचार के लिए समय तो ले आए हैं पर मुझे विश्वास नहीं है कि वे कोई समाधान लेकर उसके पास लौटेंगे । रंजीत जी की सामग्री के साथ वही होगा जो आमतौर पर होता आया है ।

☆ ☆ ☆ ☆

** हेमन्त बावनकर की मूल कथा ⇒ ☆ सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆

सेवकराम जी को अपने प्रिय साहित्यकार मित्र डॉ रंजीत की काफी याद आ रही थी. उनका देहावसान बीस दिन पूर्व ही हुआ था. उनके जाने के एक माह पूर्व ही उनकी पत्नी रंजना भाभी का देहावसान हो गया था.

उन्होंने अपना सारा जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में निकाल दिया. उनके सुशील और सेवाभावी पुत्र सुजीत और विनम्र पत्नी सुनीता ने रंजीत जी और रंजना भाभी की अंत तक सेवा की. ऐसे भाग्यशाली बहुत कम ही देखने को मिलते हैं. डॉ रंजीत ने अपने बेटे को बमुश्किल शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी भी दिला दी थी.

आज सेवाराम जी को डॉ रंजीत की याद उनके घर तक ले गई थी. सुजीत उन्हें डॉ रंजीत जी के कमरे में ले गया.  वे टेबल के पास कुर्सी पर बैठ गए जैसा हमेशा बैठते थे. कमरा अब भी वैसा ही था.

औपचारिकतावश सुजीत से उन्होंने पूछा – “बेटे मेरे लायक कुछ हो तो निसंकोच बताना.”

सुजीत ने झिझकते हुए अपनी समस्या साझा करना चाहा- “चाचा जी, आप यह सब जो इस कमरे में चारों ओर देख रहे हैं न, पिताजी के सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकों से भरी बुकशेल्फ! इतनी ही पुस्तकें इस दो कमरे के घर में भरी पड़ी हैं। मैं इनका क्या करूँ? कोई इन्हें लेने के लिए भी तैयार नहीं है. शहर में एक भी पुस्तकालय नहीं बचे जहाँ ये पुस्तकें दी जा सकें. उनके कोई मित्र भी लेने को तैयार नहीं हैं.”

अब सेवकराम जी का मस्तिष्क शून्य हो गया. उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बड़े मुश्किल से वह यही कह सके – “बेटा सुजीत, मु -झे सोचने के लिए थोडा वक्त दो.”

और वे चुपचाप घर की ओर निकल पड़े.

(श्री प्रतुल जी का हृदय से आभार. ऐसी कई सकारात्मक एवं तटस्थ प्रतिक्रियाएं आईं हैं जिन्हें शीघ्र ही साझा करने का मानस है. – हेमन्त बावनकर )

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© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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