हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ पुरस्कृत कहानी – कोबरा – स्व. डॉ गायत्री तिवारी ☆ साभार – डॉ. भावना शुक्ल ☆

स्व. डॉ गायत्री तिवारी

☆ पुरस्कृत कहानी – कोबरा – स्व. डॉ गायत्री तिवारी ☆ साभार – डॉ. भावना शुक्ल ☆

मेरी नियुक्ति ग्रामीण क्षेत्र के एक स्कूल में हुई। मन निराशा से भर उठा। विवशता थी, जाना ही पड़ा। कम आबादी वाले तीन गाँव पास-पास थे, जैसे शहर में मुहल्ले होते हैं। जिस गाँव की आबादी कुछ ज्यादा थी, वहाँ स्कूल खोला गया था। मैं जैसे तैसे गाँव पहुँची। स्कूल का पता लगाया। स्कूल क्या था मालगुजार के ढोरों की सार थी। आधी जगह में जानवर बँधते और आधी जगह में पहली दूसरी के बच्चे बैठते। स्कूल नाम की जगह में दस-बारह बच्चे बैठे थे। एक सज्जन एक टूटी कुर्सी पर बैठे कुछ पढ़ा रहे थे। मुझे देखते ही वे हडबड़ा कर उठे, गनीमत थी कि कुर्सी से गिरे नहीं। मैंने अपना परिचय दिया। देखा कि उनके चेहरे का भाव बदल रहा था। लगा कि मुझे देखकर उन्हें जो गलतफहमी हुई थी, वह दूर हो गई है। और वे आश्वस्त हो गये हैं। बोले- “यही स्कूल है, और मैं हूँ हेडमास्टर, ठाकुर रामसिंह। मूँछें गवाही दे रही थीं कि वे ठाकुर हैं। मेरी समझ में नहीं आया कि वे ‘हेडमास्टर’ पर जोर दे रहे हैं या ‘ठाकुर पर’। बाद में समझी कि वे ‘ठाकुर पहले हैं और हेडमास्टर बाद में। बहरहाल आदमी भले थे, भले न होते तो अपने प्रभाव से मुझे किराये का मकान न दिलवाते । उन्होंने तत्परता के साथ गाँव में जगह तलाशी। सिफारिश की। और मुझे रहने का ठिकाना मिला। दूध, अनाज, किराना और साग सब्जी कहाँ से और कैसे मिलेगी, यह बताना भी नहीं भूले। मेरे भले की उन्हें फिक्र थी सो समझाइश दी कि मैं मालगुजार साहब से रामजुहार कर लूँ। वे इतना कह के नहीं रह गये, मुझे मालगुजार की बखरी तक ले भी गये। मालगुजार यानी बड़े ठाकुर। साठ-पैंसठ की उम्र, कानों तक खिंचे गलमुच्छे। देखकर डर सा लगा। लेकिन उनकी बोली की मिठास से मैं अभय हो गई। बोले-“बेटी, कोई तकलीफ हो तो बता देना। हाँ, एक बात समझ लेना, नीच जातों को मुँह मत लगाना।”

मैं ठाकुर साहब की सीख लेकर लौटी और दूसरे दिन से अपने काम में लगने की कोशिश करने लगी। स्कूल बनाम ढोरों की सार में बैठना शुरू हुआ। गोबर की गंध, मक्खी, मच्छर, चीटी और जानवरों की आवाजाही के माहौल से सिर भन्ना उठा। मैनें हेडमास्टर साहब से कहा तो बोले- “बात ठीक है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं?” मैनें कहा- “कम से कम मालगुजार साहब से निवेदन तो कर सकते हैं।” शाम के धुँधलके में हम बखरी पहुँचे। आगे मैं, पीछे हेडमास्टर। बखरी की परछी में तख्त पर ठाकुर साहब विराजमान थे। हेडमास्टर उनके सामने दंडवत हो गये। मैंने नमस्ते की। उन्होंने प्रश्नवाचक मुद्रा में मेरी ओर देखा। फिर स्वर में भलमनसाहत उड़ेलते हुए कहा-” आइये, बैठिये।” मैंनें इधर उधर देखा। बैठने को कुछ नहीं था। मैनें कहा- “बस ठीक है। मैं तो यह अर्ज करने आई थी कि यदि आप जानवरों को दूसरी जगह बाँधने का इंतजाम कर, पूरी दहलान स्कूल के लिये दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।” बड़े ठाकुर कुछ क्षण चुप रहे फिर कारिन्दे को बुलाकर पूछा- “क्यों रे, बखरी के पीछे के दो कमरों में क्या रखा है?” “अंगड़-खंगड़ भरा है, सरकार।” हूँ। वा को खाली कराके स्कूल वालों को दे दो। फिर मेरी ओर देखकर कहा- “बोलो अब तो खुश हो न?” मैंने कृतज्ञता व्यक्त की और विदा लेकर लौट पड़ी। आगे मैं पीछे हेडमास्टर। लेकिन उनका स्वर बदला हुआ था। लग रहा था कि मैं हेडमास्टर हूँ और वे मेरे मातहत। नयी जगह ठीक ठाक थी। खिड़की दरवाजे थे। दो कक्षाओं के लिये काफी जगह थी। मालगुजार के हुक्म से एक सफाई वाली बाई रोज स्कूल के बाहर साफ-सफाई कर जाती। कमरों में झाडू लगाने का काम परम्परागत रूप से बच्चे ही करते। सफाई वाली बाई के साथ एक लड़का भी आता था जो सफाई में हाथ बटाता और फिर कक्षा के दरवाजे से टुकुर-टुकुर भीतर की ओर ताका करता। एक दिन ध्यान गया कि बाईं तो चली गई हैं लेकिन लड़का नहीं गया। वह दरवाजे पर ही जमा है।

मैंनें उसे बुलाया। वह मेरी ओर भौंचक सा देखता रहा। मैंने कहा- “इधर आओ।” उत्तर मिला- “हम नई आय सकत। मैं कुछ पूछती इसके पहले ही क्लास के बच्चे चिल्ला पड़े वो हमें छू नई सकत। मैं दूसरे ही क्षण आसमान से जमीन पर आ गई। सोचा-“अरे ये शहर नहीं गाँव है, जहाँ अभी भी छुआछूत जारी है।” मैं अपनी जगह से उठकर दरवाजे पर आई और पूछा- बेटा, तुमाओ नाम का है? “कोबरा।” कोबरा। यह कैसा नाम है, मैं सोचती रह गई। फिर पूछा- “तुम पढोगे?” “पढ़ने तो है मनो…… मोय गिनती सोइ आत है।” “कहाँ सीखी?” “इतइ, आप औरन पढ़ात हो, सुन खें याद हो गई।” मुझे लगा कि लड़का प्रतिभाशाली है। उसकी मां से बात की। उसने बताया- हेडमास्टर साब से कही हती। बे कहन लगे का करहौ पढ़ा कें। बॉमनों ठाकुरों के लड़कों के साथ जो कैसे बैठ है ? “कोबरा नाम का इतिहास भी पता चला कि जिस दिन लड़का पैदा हुआ था, बाप को साँप ने डस लिया था। जिज्ञासा हुई कि फिर क्या हुआ? “का होतो। सालभर बाद मोहे दूसरे घर बैठने पड़ो। ए को दूसरो बाप सोइ ढंग को नईया, खूबई नसाखेरी करत है।” मैं समझ गई कि स्थिति विकट है। मैं फिर बड़े ठाकुर के दरवाजे पहुंची। लडके के बारे में उन्हें बताया। वे विद्रूप स्वरों में बोले- हम आपको मना नहीं करते। आप उसका नाम लिख लें लेकिन उसे दरवाजे के बाहर रखें, हमारे लड़कों के साथ न बैठायें। मैंने कहा- “मनुष्यता के नाते……..” वाक्य पूरा होने से पहले ही बडे ठाकुर गरजे काहे की मनुष्यता अरे ये सब साँप हैं, कोबरा हैं, कोबरा। मैं चाहती तो बहस कर सकती थी लेकिन बहस से बात और बिगड़ती। मैं चली आई। मैंने कोबरा का नाम दर्ज किया। कोबरा का नाम विवेक मानव रख दिया।

मैं कई साल गाँव में रही। स्कूल मिडिल तक हो गया। दुक्खम-सुक्खम विवेक पढ़ता बढ़ता गया। उसकी पढ़ाई का कुल खर्चा मैं ही उठाती रही।

आठवीं के बाद दिक्कत आई। विवेक पढना चाहता था। मैंने उसे नागपुर भिजवा दिया। एक परिचित उसे छात्रवृत्ति देने लगे। इधर मैं दिल्ली चली गई।

फिर बैंगलोर । विवेक ने मेट्रिक किया, तब तक उसके पत्र आते रहे। फिर व्यवधान पड़ गया ।

वर्षो बाद की बात है । मुझे आकस्मिक रूप से जबलपुर से भोपाल जाना था। स्टेशन पहुँचकर टिकिट तो ले ली किन्तु रिजर्वेशन न होने से चिंतित थी ।

सोचती विचारती प्लेटफार्म के बुकस्टाल के पास खड़ी हो गई ।

कुछ तभी एक सुदर्शन व्यक्ति सामने आकर खड़ा हो गया। उसने एक क्षण मेरे चेहरे को देखा और दूसरे ही क्षण पाँव छूने झुक गया।

मैं अचंभित थी। सोचा-पता नहीं कौन है? शायद किसी रिश्तेदार का पुत्र हो, शायद मेरा कोई पुराना विद्यार्थी हो ।

ऊहापोह के बीच स्वर झंकृत हुआ- “माताजी, मैं तो आपको पहचान गया। आपने मुझे पढ़ाया है। आज जो भी हूँ आपकी ममता से बना हूँ।

मैंने पहचानने की कोशिश करते हुए कहा- “सूरत काफी बदली हुई लग रही है, नाम भी याद नहीं आ रहा?”

“जी, मैं विवेक मानव हूँ विवेक मानव, नाम ने अतीत के दृश्य स्मृति पटल पर उकेर दिये ।

आप कहाँ जा रही हैं?”

‘जाना तो भोपाल है लेकिन रिजर्वेशन नहीं है । “

विवेक तत्परता से बोला- ” कोई बात नहीं। आप ‘एस फोर’ में जाकर बैठिये। मैं अभी आया । “

मैं डिब्बे में बैठ गई। थोड़ी देर बाद दरवाजे के सिरे पर कालाकोट दिखाई दिया। और विवेक का अभी पता नहीं था ।

टिकिट चेकर जब लगभग पास आया तब मैं किंचित आश्चर्य और प्रसन्नता से भर उठी। अरे, यह तो ‘विवेक’ है।

चेकिंग पूरी कर विवेक मेरे पास आया । और टिकिट चेकर की सीट के पास, एक बर्थ मेरे नाम एलाट कर दी।

ट्रेन में जितनी बातचीत संभव थी, हमने की। सुबह ट्रेन भोपाल पहुँची। मैंने बैग सम्हाँला ही था कि विवेक बोल उठा-लाइये मुझे दीजिये। पहले आपको मेरे साथ चलना है, मेरे घर। दो घंटे बितालें फिर आप जहां कहेंगी पहुँचा दूँगा। विवेक के प्रेमाग्रह ने मुझे विवश कर दिया। विवेक ने आटो किया। हम लगभग चालीस मिनट में घर पहुँचे। घर के दरवाजे पर ताला बंद था। विवेक ने पर्स से चाबी निकालकर दरवाजा खोला। छोटा सा घर था। साफ सुथरा। सजा संवरा। मैंने पूछा-“बहू और बच्चे?” “तीनों जन अपने अपने स्कूल गये होंगे। आपकी बहू भी टीचर है।” मैं सोफे पर बैठी थी। विवेक चाय लेकर आ गया। फिर कहा- “बाथरूम सामने है, आप नहाकर आराम करें, तब तक सब लोग आ जायेंगे।” मैंने स्नान पूजन किया और लेट गई। सफर में थकान के कारण झपकी लग गई। अकस्मात लगा कि कोई कुछ कह रहा है। विवेक मुझे जगा रहा था। “उठिये, भोजन तैयार है।” तभी गुड़िया-सी बहू ने पाँव छुए। नाती और नातिन भी आ गये। बड़े प्यारे बच्चे थे। भोजन करते-करते विवेक ने अपनी पत्नी और बच्चों से कहा- “मैं हमेशा इन्हीं माताजी की चर्चा किया करता था। ये मेरी गुरू भी हैं और माता भी। इनकी कृपा न होती तो पता नहीं मेरा क्या होता।” पढ़े लिखे, नौकरी में लगे, घर परिवार वाले विवेक को देखकर हदय प्रसन्न हो रहा था। मैं सोच रही थी कि ‘मानव’ को ‘कोबरा’ नहीं ‘विवेक’ बनना चाहिये। नहीं, नहीं, शायद भेद मूलक व्यवस्था को समाप्त करने के लिये ‘मानव’ को ‘कोबरा’ भी बनना चाहिये।

 

स्व. डॉ. गायत्री तिवारी

साभार – डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#७६ – विचित्र यात्रा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– विचित्र यात्रा…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७६ — विचित्र यात्रा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

उसकी एक ‘कल्पना’ चल रही थी। वह असाध्य बीमारी झेलते पलंग पर था। उसे प्यास लगने पर पानी पिलाया जाता कि पूरा परिवार रोने लगा। वह अपनों को रोने से मना करता कि उसे लगा कोई उसे लेने आया है। चाहे भगवान ही आए, वह क्यों जाता? तभी उसने सुना उसकी माँ कह रही है — मेरा बेटा चला गया ! माँ के इन शब्दों के साथ उस पर मृत्यु की चादर चढ़ा दी गई। यहीं उसकी ‘कल्पना’ का पटाक्षेप हो गया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “दुखवा में कासे कहूं ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “दुखवा में कासे कहूं?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

घर के निरीह बूढ़े प्राणी की अंतिम सांसें चल रही थीं पर उसके प्राण कुछ कहने के लिए तड़प रहे थे। आंखों की पुतलियां बेचैनी में बार बार धरती को, आसमान को ताके जा रही थीं। होंठ थे कि कुछ कहने के लिए खुलते पर फिर कसमसा कर बंद हो जाते थे।

परिवार के सभी छोटे बड़े सदस्य उनकी चारपाई के इर्द गिर्द घेरा डाले हुए खड़े थे। आखिर उनके प्यारे पोते से उनकी हालत देखी न गयी, आंसुओं से बाबा के पांव को नम करने के बाद, माथा टिकाते कहा- कहिए न बाबा। आप जो कहना चाहते हैं ताकि आपकी आत्मा को मुक्ति मिले।

बाबा ने कोशिश करके मुंदी आंखें खोलीं, फिर परिवारजनों को निहारा और धीमे सुर में कहना शुरू किया -मेरे बच्चो। मेरा जन्म उस पंजाब में हुआ, जिसमें अमृतसर और लाहौर एक दूसरे की ओर पीठ करके नहीं बैठते थे बल्कि एक दूसरे के गले मिलते थे,,, हाय,,, फिर इनका बिछुड़ना भी इन आंखों ने देखा। कैसे कहूं?

-कहिए न बाबा,,,

-मेरे बच्चो। मेरी जवानी उस पंजाब के खेतों को हरा भरा करने में निकल गयी जिसे इंसानी लहू से सोंचा क्या था। आह,,, कैसे कहूं,,, ? कैसा भयानक दौर आया। बंटवारे की धुंधली तस्वीर फिर सामने आ खड़ी हुई। और तुम मुझे पंजाब की अनजान धरती पर ले आए। अब,,,

-दुख कहो न बाबा,,,

-अब उस धरती पर अपने प्राण त्याग रहा हूं जहां मैंने न जन्म लिया, बचपन बिताया, न जवानी भोगी,,, तुम लोगों ने मेरा बुढ़ापा खराब कर दिया। हे भगवान्,,,, । कुछ और मंज़र दिखाने से पहले इस धरती से मुझे उठा ले,,, उठा ले,,,

इतना कहते कहते बाबा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी,,, एक प्रश्नचिन्ह बनाती हुई,,,

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – पर्यावरण की हितेषी – जुगनू…  ☆ डॉ. सीमा शाहजी ☆

डॉ. सीमा शाहजी

(डॉ. सीमा शाहजी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत.  आप महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय इंदौर  में सहायक प्राध्यापक  अतिथि विद्वान हिंदी के पद पर कार्यरत हैं। रचना यात्रा – करीब डेढ़ दशक से विभिन्न विधाओं में लेखन एवम प्रकाशन।आकाशवाणी से प्रसारण ।कई संस्थाओं से सम्मानित। उल्लेखनीय-  आदिवासी संस्कृति व इस संस्कृति में महिलाओं की स्थिति पर आपने व्यापक अध्ययन। भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय द्वारा  सीनियर फ़ैलोशिप (2016-17) हेतु चयनित. “21 वीं सदी और आदिवासी महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम- सन्दर्भ- झाबुआ जिला मप्र”)

? लघुकथा – पर्यावरण की हितेषी – जुगनू…  ☆ डॉ. सीमा शाहजी  ? ?

?

मेरी प्रिय सहेली जुगनू. दूध सा गौरवर्ण. तराशे हुए नैन नक्श. अंडाकार मुख भंगिमा. सुराहीदार गर्दन. आकर्षण उड़ेलते नीले नीले नैन. सचमुच ही वो लावण्य से भरी पूरी थी. उसका विवाह स्थानीय था. मैं जब भी मायके जाती उससे मिलने जरुर जाती. मैंने जैसे ही उसके ड्राइंग रूम में कदम रखा. भव्यता सजावट बहुमूल्य थी. लेकिन मेरा ध्यान सोफे के नजदीक कोने में अटक गया. बैठक के कोने में एक बड़ा सा गोल पिंजरा रखा था. मैं पहले भी आई थी, तब मैंने ये पिंजरा नही देखा था.

जुगनू मेरे लिए स्पेशल चाय बनाने चली गयी. और मैं उस पिंजरे का मुआयना करने लगी. मैंने देखा चारों और जाली लगा पंछियों का नकली घर और उसमें देशी विदेशी तोतों का जमघट. कुल मिलाकर बीस तोते तो होंगे ही. जगह जगह छोटे छोटे पानी के सकोरे, मोटी मोटी लोहे की पट्टियां लगी थी. उन पर तोते अपनी भाषा में राम राम कर रहे थे. कुछ उड़ने का प्रयास कर जाली से टकराकर टकराकर थके जा रहे थे. कभी कोई छोटा तोता टूटे सकोरे पर बैठ कर लालमिर्च के टुकड़े कर आधा खाता आधा पिंजरें में गिरा देता. तो कोई तोता कुतर  कुतर कर टाइम पास कर रहा था जैसे, अवश होकर फड़फड़ाना मेरी वेदना के विचलन को बढ़ा गया. चाय आ गयी थी. बेमन से मैंने चाय पी. मेरा ध्यान उन हरे हरे तोतों, उनकी लाल लाल चोंच और उनकी आजादी के बारे में ही केन्द्रित था.

आखिर मुझसे रहा नही गया. और मैंने पूछ ही लिया, “जुगनू तुम तो बड़ी सामजिक कार्यकर्ता हो. पर्यावरण, मानव, पशु पक्षी सभी की आजादी की हामीदार. शहर में कितने ही सकोरों में पानी भरकर पेड़ों पर पंछियों के लिए लगवाती हो गर्मी में. मेरे इतना कहने पर वो गर्व से बोली, ”देखों ! पेड़ पोधों, पशु पक्षी और दु:खी मानव की रक्षा सहायता करना तो मेरे जीवन का उद्देश्य है. मैंने कहा, फिर तुमने इन तोतों को क्यों कैद कर रखा है? अरे छोड़ों प्रभा, यह मुझे मेरे पति अनीश ने मेरे विवाह की वर्षगांठ  पर दिया है. उन्हें ऐसे बंधन में बंधे फडफडाते हरे हरे तोते बहुत पसंद है. अब अगली वर्षगाँठ पर चिड़ियों का पिंजरा उपहार में देंगे. तू है ना, नाहक परेशान हो रही है. एक नौकर मैंने इन्ही के लिए रखा है. जो इन्हें नहलाता धुलाता, खाना खिलाता है. मैंने कहा, “ किसी की आजादी छिनना क्रूर कर्म है. अपराध के दायरे में आता है.

मेरी बात सुनकर वो चुप हो गई, मेरे विचार से तोतें के पिंजरे बनाम जुगनू के आलिशान घर के बंद दायरे समानांतर थे. जहाँ पिंजरें में पंछी कैद थे. वहीं जुगनू भी आजादी के दायरे में पति की बंधक ही तो थी. मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया था. पर्यावरण की हितेषी जुगनू के प्रति मोह भंग हो गया था.

थके कदमों से उसकी दहलीज पार की. मुझे लगा की दिखावटी पर्यावरण प्रेम की. . . . . कुंदक गुंजलक. . . . से मैं सुकून की आजाद जमीन पर खड़ी हूँ. जहाँ से मेरे घर का रास्ता सीधा है, सरल है. जहाँ पेड़ पोधों पर पंछी फुदकते है. आजादी के सरमाये में खुली साँस लेते है. चिड़ियों की ची. . ची. . तोतों की राम राम, भंवरों की गुनगुन और कबूतरों से की गुंटर गुं. . कितनी मिठास घोलकर हमें सुकून जिन्दादिली और आजादी से जीने का सबक देते रहते है. उन  आजाद पंछियों की आजादी के लिए मैं जुगनू को यह कहने का साहस जरुर करूंगी. कि किसी पंछी को गुलाम बनाकर उसकी आह से वाह लुटने का ढोंग ना करें.

© डॉ. सीमा शाहजी

सम्पर्क – 325 महा गांधी मार्ग थांदला (जिला झाबुआ, मप्र) पिन 457777. मो 7987678511, ईमेल seemashahji07@gmail. Com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सीसीटीवी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सीसीटीवी ? ?

शहर में लगे सीसीटीवी कैमरों से उसका धंधा लगभग चौपट हो चला था। मॉल, दुकानें, बंगले, सोसायटी कोई जगह नहीं छूटी थी जहाँ सीसीटीवी नहीं था। अनेक स्थानों पर तो उसी की तरह चोर कैमरा लगे थे। सब कुछ रेकॉर्ड हो जाता।

आज सीसीटीवी और चौकीदारों को मात देकर वह उच्चवर्ग वाली उस सोसायटी के एक फ्लैट में घुस ही गया। तिजोरी तलाशते वह एक कमरे में पहुँचा और सन्न रह गया। बिस्तर पर जर्जर काया लिए एक बुढ़िया पड़ी थी जो उसे ही टकटकी लगाये देख रही थी। बुढ़िया की देह ऐंठी जा रही थी, मुँह से बोल नहीं निकल रहे थे। शायद यह जीवन को विदा कहने का समय था।

क्षण भर के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ। फिर निश्चिंत होकर अपने काम में जुट गया। बहुत जल्दी नकदी और कुछ जेवर उसके हाथ में थे। एहतियातन उसने दो-तीन बार बुढ़िया को देखा भी। मानो कुछ कहना चाह रही हो या पानी मांग रही हो या परिजनों को जगाने की गुहार लगा रही हो। लौटते समय उसने अंतिम बार बुढ़िया की ओर देखा। देह ऐंठी हुई स्थिति में ज्यों की त्यों रुक गई थी, आँखें चौड़ी होकर शून्य ताक रही थीं।

वापस आते हुए भी उसे सीसीटीवी कैमरों से अपना बचाव करना पड़ा। खुश था कि बहुत माल मिला पर अजीब बेचैनी निरंतर महसूस होती रही। बुढ़िया की आँखें लगातार उसे अपनी देह से चिपकी महसूस होती रहीं। पहले टकटकी लगाए आँखें, फिर आतंक में डूबी आँखें, फिर कुछ अनुनय करती आँखें और अंत में मानो ब्रह्मांड निहारती आँखें।

अमूमन धंधे से लौटने के बाद वह गहरा सो जाता था। आज नींद कोसों दूर थी। बेचैनी से लगातार करवटें बदलता रहा वह। उतरती रही उसकी आँखों में सीसीटीवी कैमरों से बचने की उसकी जद्दोज़हद और बुढ़िया की आँखें। आँखें खोले तो वही दृश्य, बंद करे तो वही दृश्य। प्ले, रिप्ले…, रिप्ले, रिप्ले, रिप्ले। वह हाँफने लगा।

आज उसने जाना कि एक सीसीटीवी आदमी के भीतर भी होता है। कितना ही बच ले वह बाहरी कैमरों से, भीतर के कैमरा से खींची तस्वीर अमिट होती है। इसे डिलीट करने का विकल्प नहीं होता।

उसका हाँफना लगातार बढ़ रहा था और अब उसकी आँखें टकटकी बांधे शून्य को घूर रही थीं।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सुबह सवेरे अखबार बांटने जब एक छोटा सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढ़ते लिखते क्यों नहीं? या पापा पढ़ाते क्यों नहीं? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में आता है?

एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर जाने लगा तब मैंने रोक कर पूछा -रुकना, ऐ लड़के।

-कहिए।

-क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते?

-जाता हूं और नौवीं में पढ़ता हूं।

-फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं?

-पापा बीमार हैं और मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।

-कल सुबह मैं तुम्हें कुछ नोट बुक्स देना चाहता हूं।

-क्यों? मैं खुद कापियां किताबें ले सकता हूं , सर। जो नहीं ले सकते उन्हें दीजिए न।

इतना कह कर उसने साइकिल के पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २१ – लघुकथा – मजबूरी की नींद ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ मज़बूरी की नींद ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

प्रीतम ने टिफिन को साहब के मेज पर रखा लेकिन स्वयं को खड़ा नहीं रख पाया। मेज को सहारा देते हुए आखिरकार वह उकुडू होकर जमीन पर बैठ गया ।

यह क्या प्रीतम! तुम्हारी तबीयत ठीक तो है न बेटा?

तुम्हें तो आज आराम करना चाहिए था… रजनीश जी ने  कहा।

प्रीतम कुछ भी जवाब नहीं दे पाया, उसने रजनीश जी की बात से अपनी सहमति जताते हुए  सिर हिला दिया, मानो वह कह रहा था कि..सर! सच में मेरी तबीयत आज बहुत खराब है।

वैसे इस समय बहुत तेज वायरल फैला हुआ है,.. तुम्हें आज नहीं आना चाहिए था।

अच्छा तुम अपना बारकोड दिखाओ। मैं कल के टिफिन का ऑनलाइन पेमेंट किये देता हूँ.. रजनीश ने कहा।

प्रीतम ने किसी तरह से जींस के जेब से मोबाइल निकाला और बारकोड खोलकर रजनीश जी के आगे कर दिया। उसके मोबाइल में कल वाले टिफिन का पेमेंट आ गया था ।

प्रीतम ने थम्भ का सिम्बल बनाते हुए कहा.. सर पेमेंट आ गया। तेज ज्वर के बीच हल्की सी सुकून भरी मुस्कान के साथ वह आफिस से बाहर निकल गया।

प्रीतम ने जिस दिन दस हजार रूपये प्रति माह – फिक्स वेतन वाली आउट सोर्स की नौकरी छोड़कर, टिफिन सप्लाई का छोटा सा बिजनेस खोला था, उस दिन उसके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। उसका उत्साह परवान चढ़ रहा था। पैसे की तंगी के चलते वह स्वयं ही खाना बनाता था, साथ ही साथ स्वयं ही करीब 20-25 लोगों को विभिन्न ऑफिसेज में टिफिन सप्लाई करता था। उसका पूरा दिन खाना बनाने में और टिफिन सप्लाई करने में बीत जाता था।

ऑफिस बंद होने का वक्त हो गया था लेकिन अभी तक प्रीतम न तो पैसा लेने आया न ही खाली टिफिन उठाने आया था।

शायद आज उसके छोटे से व्यापार, थोड़ी सी खुशियाँ एवं तनिक से उत्साह तीनों के अवकाश का दिन था। वह बुखार से बुरी तरह तप रहा था और पेरासिटामोल की 650 एमजी की गोली खाकर मज़बूरी और चिंता की नींद सो रहा था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चातक ? ?

माना कि अच्छा लिखते हो। पर कुछ ज़माने को भी समझो। कोई हमेशा गंगाजल नहीं पी सकता। दुनियादारी सीखो।  कुछ मिर्च- मसालेवाला लिखा करो। नदी, नाला, पोखर, गढ्ढा जो मिले, उसमें उतर जाओ, अपनी प्यास बुझाओ। सूखा कंठ लिये कबतक जी सकोगे?

चातक कुल का हूँ मैं। पिऊँगा तो स्वाति नक्षत्र का पानी अन्यथा मेरी तृष्णा, मेरी नियति बनी रहेगी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

शलभ– यार मृतका मिसेज माला का बेटा तो है ना !

प्रतीक– हां है तो —

शलभ–फिर उन्हें सबसे छोटी बेटी ने ही मुखाग्नि दी और कपाल क्रिया भी उसी ने की !

प्रतीक–शायद तुम कुछ भी नहीं जानते ।

शलभ– बरसों पहले ये लोग हमारे पड़ोसी हुआ करते थे। काफी अच्छे रिश्ते थे परिवार से। फिर बरसों बीत गये। मेरा ट्रान्सफर होता रहा — अब लौटकर इसी शहर में आ गया हूं। मुझे स्टाफ के एक सदस्य ने बताया जो उनका रिश्तेदार है। मालाजी के निधन का ऐसे पता चला।

प्रतीक– अब मुझसे सुनो— मालाजी तीसरे एक्सीडेंट के बाद जिन्दा लाश में तब्दील हो चुकी थीं। बेटे बहू ने  पाँच वर्ष तक खूब सेवा की। बेटा मलय पांच वर्ष तक बोलता था। फिर किसी बीमारी के बाद उसकी आवाज़ और सुनने की क्षमता भी चली गयी। उसने स्वयं गूँगा होने के कारण गूँगी लड़की से  ही शादी की।

शलभ—फिर

प्रतीक— फिर क्या! बहू भी पोस्ट ऑफिस में सर्विस करती थी। देखा नहीं  मालाजी की अंतिम यात्रा की तैयारी के समय बहू की मूक बधिर सहेलियां ही लगभग सारा काम संभाल रही थीं।

शलभ–सचमुच अत्यन्त करुण कथा है।

प्रतीक– आगे भी है शलभ। बेटे बहू ने  क्रिश्चियन धर्म स्वीकार कर लिया इस तकलीफ के साथ कि बरसों तक पूजा पाठ पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करने के बाद भी  इस भगवान ने हमें क्या दिया–केवल जानलेवा दर्द।

शलभ की आँखों में अब किसी सवाल के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३१ ☆ लघुकथा – अफसोस… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “अफसोस“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३१ ☆

✍ लघुकथा – अफसोस… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राज कमल किसी काम से अहमदाबाद गए तो काम पूरा होने के बाद अपनी बेटी के यहां चले गए। उनकी बेटी श्वेता का विवाह अहमदाबाद में एक सुशील कुमार के साथ हुई थी। सुशील एक होनहार इंजीनियर थे और सूरत में तैनात थे। अहमदाबाद में उनका अपना घर था। घर में माता पिता के साथ उनकी पत्नी श्वेता व पुत्री रहती थी। श्वेता पढ़ी लिखी थी और विवाह से पहले शिक्षिका थी। पर विवाह होने के बाद उसने नौकरी नहीं की। सास ससुर की सेवा और अपनी तीन वर्षीय बेटी के लालन पालन को अधिक महत्व दिया। उसकी सास उसके सेवा कार्य से बहुत खुश थीं और खुशी खुशी श्वेता की दिनचर्या बता दी कि वह सुबह अपनी बेटी को स्कूल पहुंचा कर दूध लेती आती है। आकर चाय बनाती है और सास ससुर के लिए नहाने के पानी गरम करती है। खुद नहा धोकर नाश्ता बनाती है। सास ससुर को नाश्ता कराकर बेटी को स्कूल से लेने जाती है और लौटते हुए सब्जी वगैरह भी लेती आती है। फिर घर आकर खाना बनाती है और सास ससुर को खाना खिला कर बेटी का होमवर्क पूरा कराती है।

बेटी का होमवर्क पूरा कराते और उसे खिलाते पिलाते शाम के चार बज जाते हैं जो चाय का समय होता है। चाय पिलाकर बेटी को पार्क में खेलने के लिए ले जाती है। बेटी खेलते खेलते थक जाती है तो उसे घर लेकर आती है और उसके सोने से पहले खाना खिला देती है। फिर घर का भोजन बनाती है और समय पर सास ससुर को भोजन कराकर दवा वगैरह खिला देती है। फिर स्वयं भोजन करती है। भोजन के बाद सवेरे की तैयारी करके सोने का समय मिल पाता है। रसोई झाड़ू पोंछा बर्तन साफ करने के बाद दिन में समय मिलता है तो मशीन में कपड़े डालती है और रात में सोने से पहले सुखाने डाल देती है। उसके नाश्ते भोजन और आराम का कोई समय नहीं है। बहुत मेहनत करती है।

राज कमल से बेटी की  सास बोली, “समधी जी, आपने श्वेता को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। हमारा बेटा बाहर नौकरी करता है पर श्वेता के कारण हमें उसकी कमी महसूस नहीं होती।” राज कमल मुस्कुरा कर रह गए। दूसरे दिन उन्होंने श्वेता की दिनचर्या देखी तो परेशान हो गए। क्योंकि दिनचर्या वैसी ही थी जैसा सास ने बताया। बेटी को बिल्कुल आराम न मिल पाने पर उन्हें बहुत दुख हुआ। वे सोचने लगे कि सुशील को अच्छा वेतन मिलता होगा। कम से कम झाड़ू पोंछा और बर्तन मांजने के लिए कामवाली रख सकते हैं। अपनी बेटी को नौकरानी जैसी स्थिति में देख कर दुखी होते रहे।  ऊपर से उसकी सास के बोल, “अरे श्वेता बेटी थोड़ा आराम कर लो और अपने पिताजी के पास थोड़ा बैठ लो” उनके घाव पर नमक छिड़कने लगे, क्योंकि श्वेता तो मशीन की तरह लगी रहती, उसके आराम की बात तो किसी के मन में आती ही नहीं। वे बेटी को दिए संस्कारों पर मन ही मन अफसोस करने लगे। राज कमल बेटी के यहां एक दिन और रुक गए। शाम को बाहर से आए तो उनके साथ एक औरत थी।  उसकी ओर इशारा करते हुए श्वेता से बोले, “बेटी कल से ये तुम्हारे यहां झाड़ू पोंछा और बर्तन साफ किया करेंगी। कुछ और भी मदद ले सकती हो। इनका वेतन मैं दिया करूंगा।” श्वेता “पापा” कह कर उनसे लिपट गई और सास ससुर मूक दर्शक बने खड़े थे। राज कमल का अफसोस धीरे धीरे पिघलने लगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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