हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९५ – व्यंग्य – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९५ – व्यंग्य  – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शादी से पहले की बातचीत और चाय की पत्ती में एक समानता होती है। शुरुआत में दोनों खूब रंग देती हैं खुशबू ऐसी कि पूरा मोहल्ला जान जाए कि कुछ उबल रहा है। फिर धीरे धीरे समय बीतता है और वही चाय की पत्ती बर्तन के कोने में पड़ी सूखी घास जैसी लगने लगती है। हमारे बीच भी यही हुआ। शादी के फेरों के समय जिस इंसान ने सात जन्मों का वादा किया था उसने सात महीने में ही खुद को एक स्क्रीन के भीतर बंद कर लिया। अब वह घर आता है तो सोफे पर लेटकर बस अंगूठा चलाता रहता है। रील्स की वो पंद्रह सेकंड की दुनिया मेरे पूरे जीवन से ज्यादा कीमती हो गई है। उसकी उंगलियां स्क्रीन पर ऐसे फिसलती हैं जैसे कोई जादूगर ताश के पत्ते पलट रहा हो। मैं बगल में बैठी चाय का कप लिए ताकती रहती हूँ पर उसकी नजरें कभी नहीं भटकतीं। ऐसा लगता है कि मैं उस घर का कोई पुराना फर्नीचर हूँ जिस पर धूल जम चुकी है और जिसे हटाने की जहमत भी कोई नहीं उठाना चाहता।

एक दिन मैंने कहा “सुनो मुझे कुछ बात करनी है।“ उसने बिना आंखें ऊपर किए कह दिया “अभी बिजी हूँ यार बाद में देखेंगे” यह “बाद में“ कभी नहीं आता। मर्द जब व्यस्त होने का नाटक करता है तो वह असल में अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा होता है। इस अकेलेपन के सन्नाटे को तोड़ने के लिए मैंने एक नया रास्ता निकाला। मैं अपने ही मोबाइल से अपने ही नंबर पर फोन लगा देती। जब उधर से आवाज आती कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है तो मेरे सीने में एक अजीब सा सुकून उतर आता। कम से कम कोई तो कह रहा था कि मैं व्यस्त हूँ। कोई तो था जो मेरी मौजूदगी को दर्ज कर रहा था भले ही वह एक कंप्यूटर की रिकॉर्डेड आवाज ही क्यों न हो। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा वियोग था कि मुझे खुद को यह समझाने के लिए अपने ही नंबर का सहारा लेना पड़ता था कि दुनिया में मेरा भी एक वजूद है।

तभी घर के सामने एक नया युवक रहने आया था। वह मुझसे उम्र में दो साल छोटा था और शायद इसीलिए दुनिया की चालाकियों से थोड़ा दूर था। वह मेरे अकेलेपन को मेरे चेहरे की उदासी से भांप गया था। जब घर का मालिक सोफे पर रील्स स्क्रोल करने में व्यस्त रहता तब वह लड़का मेरी खामोशी को पढ़ रहा था। पति के घर पर न रहने के समय वह कभी नमक के बहाने तो कभी चाय पत्ती के बहाने मेरे घर पर आता था। उसकी आँखों में एक अजीब सी हमदर्दी थी जो मुझे इस मरुस्थल जैसी जिंदगी में ठंडी फुहार जैसी लगती थी। उसने बातों बातों में एक दिन बड़ी सादगी से बताया कि उसकी अभी शादी नहीं हुई है। मुझे लगा कि विधाता ने मेरे इस एकांतवास को समाप्त करने के लिए ही उसे मेरे सामने वाले मकान में भेजा है।

हमारी मुलाकातें जब बढ़ने लगीं तो मेरे भीतर की सूखी नदी में फिर से बाढ़ आने लगी। हर बार जब मैं उसके साथ इस घुटन भरे माहौल से दूर भागने की योजना बनाती तो वह मुस्कुराकर कहता “जल्दबाजी मत करो। कल कुछ प्लान बनाते हैं” मुझे लगता कि वह हमारी सुरक्षा के लिए ऐसा कह रहा है। पुरुष का कल कभी कभी स्त्री की पूरी जिंदगी का इंतजार बन जाता है। वह हर बार कोई न कोई बहाना बना देता और मैं फिर से उसी रील्स वाले सोफे के किनारे आकर बैठ जाती। प्रेम जब किश्तों में मिलने लगे तो उसकी कीमत और बढ़ जाती है। मैं उसके दिए उसी झूठे दिलासे के सहारे अपने दिन काट रही थी और खुद को दिलासा दे रही थी कि एक दिन यह अंधेरा छंटेगा।

एक दिन अचानक उसने खुद सामने से आकर मुझसे कहा “कल हम हमेशा के लिए कहीं दूर चले जाएंगे। सामान बांधकर तैयार रहना” उस दिन मुझे लगा कि मेरी सालों की तपस्या सफल हो गई। मैंने चुपचाप अपनी अलमारी से अपनी पसंदीदा साड़ियां निकालीं और उन्हें सूटकेस में बंद करने लगी। पतिदेव बगल वाले कमरे में मोबाइल पर किसी प्रैंक वीडियो को देखकर ठहाके लगा रहे थे। उनकी हंसी मेरे कानों में किसी नुकीली कील की तरह चुभ रही थी। मुझे तरस आ रहा था उस इंसान पर जिसे यह भी नहीं पता था कि उसकी छत के नीचे से जमीन खिसकने वाली है। मैंने अपनी जिंदगी के सबसे कड़वे सच को एक पोटली में बांधा और उस सुबह का इंतजार करने लगी जो मेरी विदाई की गवाह बनने वाली थी।

जब मैं उसके पास अपना सारा सामान बांधकर पहुंची तब तक वह वहां से जा चुका था। सामने वाले मकान का ताला लटक रहा था और वहां सिर्फ धूल उड़ रही थी। मेरी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं और सूटकेस हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया। अगल बगल देखने पर जब कोई नहीं मिला तो मैंने पास के एक दुकानदार से उसके बारे में पूछा। दुकानदार ने जो सच बताया उसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही गायब कर दी। दुकानदार ने तंबाकू थूकते हुए बड़े सहज भाव से कहा “अरे वो तो शादीशुदा था उसकी पत्नी बेंगलूरु में रहती है और वह सुबह तड़के ही उसे लेने आई थी दोनों पहली बस से निकल गए”

यह सुनते ही मेरे भीतर का सब कुछ बिखर गया। जिस लड़के को मैं अपने अकेलेपन का मसीहा समझ रही थी वह खुद एक छलावे के सिवा कुछ नहीं था। वह तो बस अपने खाली समय को काटने के लिए मेरे घर की चाय पत्ती और नमक का इस्तेमाल कर रहा था। वियोग का इससे वीभत्स रूप और क्या हो सकता था कि जिसे मैंने अपनी मुक्ति का मार्ग समझा उसने मुझे और गहरे कुएं में धकेल दिया था। मैं उस सूने मकान की दहलीज पर बैठकर हंसने लगी क्योंकि रोने के लिए मेरे पास आंसू कम पड़ गए थे। पूरा खेल बस टाइमपास का था चाहे वह रील्स देखना हो या पड़ोस में नमक मांगना।

मैंने कांपते हाथों से अपना सूटकेस उठाया और वापस अपने उसी पुराने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए जहां सन्नाटा मेरा इंतजार कर रहा था। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था और सोफे से अभी भी वही रील्स की आवाजें आ रही थीं। पति ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और स्क्रीन देखते हुए ही कहा “अरे आ गई तुम जरा देखना नमक खत्म हो गया है क्या” मैंने बिना कुछ बोले रसोई की तरफ देखा जहां नमक का डिब्बा पहले से ही आधा भरा हुआ था। मुझे समझ आ गया कि इस संसार में हर कोई अपनी अपनी स्क्रीन और अपनी अपनी कहानियों में व्यस्त है और दूसरों की भावनाएं बस मनोरंजन का साधन हैं।

मैंने अपना फोन निकाला और फिर से अपने ही नंबर पर डायल कर दिया। उधर से फिर वही जानी पहचानी आवाज आई कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है। मैंने फोन को कान से सटाए रखा और उस व्यस्त टोन के सुकून को महसूस करने लगी। अब मुझे इस बात का पूरा यकीन हो गया था कि इस मतलबी और फरेबी दुनिया में सिर्फ मेरा अपना नंबर ही था जो मेरे एकांत को कभी धोखा नहीं दे सकता था भले ही वह हमेशा व्यस्त रहने का ढोंग ही क्यों न करता हो। प्रेम की इस अंतिम विदाई ने मुझे पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१५ ☆ व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है!  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१५ ☆

? व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इन दिनों देश-विदेश के राजनीतिक मौसम की रंगत बड़ी अजब है। बाहर हवा ठंडी हो या गरम, लेकिन सत्ता के गलियारों में अंतरराष्ट्रीय दबाव का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है। कल तक जो विदेशी नुमाइंदे हमारे देश में  सिर्फ पर्यटन के खूबसूरत ठिकानों की बातें करते थे, व्यापारिक सौदों पर दस्तखत करते थे और हमारे विशाल बाजार को देखकर लार टपकाते थे, वे आज अचानक हाथ में माइक थामकर और चेहरे पर दुनिया भर की फिक्र ओढ़कर हमारे अभिभावक की भूमिका में नजर आने लगे हैं।

अभी हाल ही में, जब देश के सर्वोच्च ‘प्रधान’ सुदूर यूरोप के एक खूबसूरत, ट्यूलिप के फूलों और पवन चक्कियों वाले साइकिल-प्रिय मुल्क की यात्रा पर थे, तब वहां की एक तीखे तेवरों वाली विदेशी महिला पत्रकार साहिबा ने सात समंदर पार से लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों और प्रेस की आजादी के कुछ  सुलगते हुए सवाल दाग दिए कि दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में भी पूरे सचिवालय का एसी अचानक फेल होने लगा।

इस नजारे को देखकर पृष्ठभूमि में वही पुराना और घिसा-पिटा फिल्मी गाना बजने लगता है, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा!”

हमारे विदेश मंत्रालय को इन विदेशी पड़ोसियों का यह मुफ्त में बंटने वाला ज्ञान और अपनी धोती को छोड़कर पूरे जमाने की चिंता करने की आदत बड़ी नागवार और चिंतनीय लग रही है। उनका पत्रकारिता इंडेक्स नम्बर एक होगा , हम अपने 157 नम्बर में ही खुश बने रहना चाहते हैं।

पड़ोसियों का तो शाश्वत धर्म ही यही होता है कि वे अडोस-पड़ोस के हर फटे में टांग अड़ाएं। जब आपका घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा हो, रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही हो, तब वे अपनी खिड़की से झाँककर बड़े मासूम चेहरे से पूछते हैं कि, “अरे भाई, आपके घर में जो कड़ाही चढ़ी है, उसके तेल की बू कुछ तीखी सी आ रही है। सब खैरियत तो है?”

उस नीले-सफेद आसमान वाले ठंडे मुल्क की उन विदेशी पत्रकार महोदया को भी हमारे यहाँ की इस तपती हुई लोकतांत्रिक गर्मी की कुछ ज्यादा ही फिक्र हो रही थी। उनकी यह फिक्र बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती है जैसे किसी मोहल्ले की कोई  बुजुर्ग ‘ताई’ किसी नए-नवेले दूल्हे को घेरकर पूछने लगे कि, “सुना है तुम अपनी दुल्हन को बोलने ही नहीं देते, उसकी आवाज बाहर तक क्यों नहीं आती?”

ताई रूपी इन जोशी पड़ोसियों के तीखे सवालों पर हमारे सिस्टम का बिल्कुल खामोश हो जाना और अपने फोन को साइलेंट मोड पर डाल लेना एक बेहद मजेदार और सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। यह एक ऐसी सधी हुई ‘कूटनीतिक चुप्पी’ थी जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती है। एक ऐसी चुप्पी जो सामने वाले के चेहरे पर देखकर मुस्कुराते हुए कहती है कि, “तुम ठहरे परदेसी, तुम्हें हमारे घर के अंदरूनी झगड़ों की कड़वाहट और हमारे आपसी प्यार की गहराई के बारे में भला क्या खाक पता होगा!”

जब उस अंतरराष्ट्रीय मंच से लोकतंत्र और जन अधिकारों जैसे भारी-भरकम शब्दों के गोले फेंके जा रहे थे, तब हमारा पूरा तंत्र मन ही मन सोच रहा था कि तुमने पूछा तो पूछा, पर हम तुम्हें जवाब देकर मुफ्त का फुटेज और टीआरपी क्यों दें? आखिर कैमरे के सामने ‘नो कॉमेंट्स’ कहकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरने की जो कला हमारे साहब को आती है, वह दुनिया की किस यूनिवर्सिटी में सिखाई जाती है?

 इस पूरे अंतरराष्ट्रीय नाटक का सबसे दिलचस्प और यू-टर्न वाला मोड़ तब आता है, जब यही सुलगता हुआ सवाल देश के भीतर का ही कोई विपक्षी या अपना स्वदेशी और घरेलू पत्रकार पूछ बैठता है। यहाँ आकर सत्ता का व्याकरण और नियम एकदम सीधे और स्पष्ट हो जाते हैं।

सात समंदर पार का  गोरी चमड़ी वाला विदेशी पत्रकार सवाल पूछे, तो हम होठों पर वैश्विक मुस्कान बिखेरकर और ‘जोशी पड़ोसी’ गाते हुए बगल से सुरक्षित निकल सकते हैं। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘अतिथि देवो भव’ का पालन करते हुए उन्हें चाय-समोसा खिलाना और हाथ मिलाकर विदा करना हमारी कूटनीति की महान कला है।

लेकिन जैसे ही वही सुलगता हुआ सवाल अपने ही घर का कोई पत्रकार पूछ लेता है, तो तंत्र की भौहें तन जाती हैं और आँखों में अंगारे उतर आते हैं कि,”अच्छा! तुम्हारी इतनी जुर्रत कि तुम सवाल करो? तुम देशद्रोही हो या किसी विदेशी टूलकिट का हिस्सा?”

विदेशी मेहमानों के सामने जिस खामोशी को कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक बताया जाता है, वही चुप्पी जब घर के अंदर देश के नागरिकों पर लागू होती है तो उसे ‘अनुशासन’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ से  जोड़ दिया जाता है। घरेलू पत्रकार अगर ज्यादा समझदार या सयाना बनने की कोशिश करे तो उसे बहुत सलीके से याद दिला दिया जाता है कि, “बेटा! इस मोहल्ले का राशन कार्ड, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारी फाइलें हमारे ई डी, आई  टी दफ्तर की दराजों में ही बंद हैं।

हमारे यहाँ अब सवालों की भी  ‘नागरिकता’ तय कर दी गई है। अगर सवाल विदेशी पासपोर्ट के साथ आए तो उसे ‘इंटरनेशनल प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज किया जाता है, और अगर सवाल देसी जुबान में निकले तो उसे ‘देश को बदनाम करने की साजिश’ मानकर सीधे कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है।

महामंत्र है , हे संजय !  “तू पूछता बहुत है, पूछ मत , सुन और ताली बजा!”

इसलिए अगली बार जब भी समाज, तंत्र या दफ्तर में कोई ऐसा तीखा सवाल पूछ ले जिसका सीधा जवाब  मौजूद न हो, या जिसे सुनते ही ब्लड प्रेशर बढ़ने लगे, तो बिल्कुल घबराने की जरूरत नहीं है।

बस एक गहरी सांस लीजिए, सामने लगे कैमरे की तरफ देखकर एक सम्मोहक, टेलीप्रॉम्प्टर वाली मुस्कान बिखेरिए और मन ही मन गुनगुनाना शुरू कर दीजिए, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा…”

सच तो यह है कि ट्यूलिप के फूल तो सिर्फ कुछ दिन महकते हैं, असली खुशबू तो अपनी कड़ाही के तीखे तेल में ही होती है!

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ परजीवी आखिर कौन है ? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ परजीवी आखिर कौन है ? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

काक्रोच देखकर दो फुट ऊपर उछलने वाली गृहपत्नी, गृहप्रबंधक, गृहनिर्मात्री ललना इस तरह आतंकित हो उठती है मानो उसने डायनासोर देख लिया हो। आपदा में अवसर देखते ही पतिदेव सक्रिय हो उठते हैं। काक्रोच पर हिट छिड़कते हैं या जूते-चप्पल के प्रहार से उसका काम तमाम कर अजेय योद्धा के रूप में पत्नी के सामने अवतरित होते हैं। पत्नी गदगद ,भला ऐसा हर्क्यूलियन टास्क करना सबके बूते की बात नहीं है। वे धन्यता भाव से भर उठती हैं।

शास्त्र कहते हैं, पृथ्वी पर जो कुछ भी पाया जाता है उसमें कुछ भी निरुपयोगी नहीं होता। सभी का कोई न कोई मकसद या जरूरत जरूर है। काक्रोच के निर्माण के पीछे ऊपर वाले का क्या मकसद हो सकता है, मई दो हज़ार छब्बीस में समझ में आया। कहते हैं ना, कभी न कभी घूरे के दिन भी फिरते हैं।

एक बात चिंतन-मनन को विवश करती है कि क्या काक्रोच को जिंदा रहने , देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार है या नहीं? काक्रोच की भाषा मनुष्य नहीं जानता। पर मनुष्य की आहट से ही काक्रोच भयभीत हो जाता है। वह जानता है इस खतरनाक जीव की मंशा क्या है।दिखता है वैसा कभी नहीं होता।काक्रोच मौका देखकर चाल चरित्र चेहरा नहीं न बदलता।

सियासत, धर्म, क्रिकेट, फिल्म या अन्य कोई भी इलाका क्यों न हो, वर्तमान के विज्ञापनजीवी जमाने में दिखने-दिखाने का चलन जोरों पर है। काक्रोच को रूप के नाम पर ईश्वर ने ठेंगा दिखाया है, पर किसी भी सूरत में जिंदा रहने की ललक से नवाज़ा है। है कोई मनुष्य  ऐसा जिसका सिर कट जाए और फिर भी वो जिंदा रहे ? है कोई ऐसा जो हफ्तों बिना खाए पिए भी अपने जीवन की घोषणा करे और फिर भी काक्रोच परजीवी?

अभी तक समझ में नहीं आया कि आखिर परजीवी कहते किसे हैं? जीवी तो कई तरह के हैं- श्रमजीवी,मिथ्याजीवी, स्वप्नजीवी, कैमराजीवी, मसिजीवी और न जाने कितने। पर सभी किसी न किसी रूप में परजीवी तो हैं।

बेशक काक्रोच के पांव और शरीर पर बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी कृमि होते हैं जो मनुष्य का नुकसान करते हैं। पर क्या मनुष्य किसी का नुकसान नहीं करता? वह तो काक्रोचों से भी ज्यादा डरावना है।उसे गिरगिट की तरह रंग बदलने में महारत है।

दरअसल काक्रोच प्रकृति के सफाईकर्मी हैं। सिर्फ शक्ल-सूरत के डरावने और घिनौने हो जाने से उसके मन का पता नहीं लगता। दुनिया में शक्ल ही तो सब कुछ नहीं, कुछ कारनामे भी देखने चाहिए। अच्छी शक्लवालों के भी खयाल बदसूरत पाए जाते हैं ।काक्रोच के नसीब ही ऐसे हैं कभी वे मानवाकृति नजर आ सकते हैं तो  कभी मानव भी काक्रोचाकृति । सारा माया का खेल है ।अब उनके बीच में जो पाए जाते हैं जेन जी और अल्फा काक्रोच उनकी मंशा का पता लगाना बहुत कठिन है। संभवत प्रकृति के विकास क्रम में उनमें भी कोई परिवर्तन आया हो।

ये काक्रोच पढ़ते-लिखते नहीं तो क्या !  कितने ही पढ़े-लिखों ने कौन सा तीर मार लिया आज भी लकीर के फकीर बने हुए हैं ।अक्ल को घुटनों में छुपाए रहते हैं ।

गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाने वाले इस दुनिया में हमेशा तकलीफ झेलते हैं, सलाखों के पार पाए जाते हैं, फांसी के तख्ते पर झूल जाते हैं या फिर मार दिए जाते हैं ।उन पर कई किस्म की तोहमत लगाई लगती फिर भी काक्रोच अपना धर्म नहीं भूलते। मनुष्य भूल रहा है । हैरानी तो देखिए जो धर्म भूल रहा है वही आरोप लगा रहा है । जो धर्म भूल रहा है उसे छोड़कर इल्जाम काक्रोचों पर लगाया जा रहा है। संभवतः इसे ही कलियुग कहते हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३५ ☆ व्यंग्य – दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘दलबदलुओं के लिए सहूलियत ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

संसद और विधानसभा में दल-बदल की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र सरकार ने दलबदलुओं की सहूलियत के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। अभी अपनी पार्टी से तलाक लेने की इच्छा होने पर दलबदलू को नयी पार्टी के नेताओं के दरबार में जाकर चरण-वरण छूने पड़ते हैं, कुछ शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है। उन्हें इस जिल्लत से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि संसद और राज्यों की विधानसभाओं के बाहर ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ का निर्माण किया जाए।  जब भी किसी दलबदलू के पेट में मरोड़ होगी, पुराने दल को छोड़कर किसी मलाईयुक्त पार्टी में संतरण करने की इच्छा बलवती होगी, तब वह वह इस कक्ष के भीतर प्रवेश कर आसन पर बैठ जाएगा और यह खबर तत्काल जंगल की आग की तरह फैल जाएगी कि नेताजी की ‘अक्कल दाढ़’ निकल आयी है और वे दल बदलने की मंशा से पीड़ित हैं। फिर नेताजी उम्मीद करेंगे कि दूसरी पार्टी वाले उन पर डोरे डालेंं और उन्हें बाइज़्ज़त, गाजे-बाजे के साथ अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए ले जाएं।

पुराने ज़माने में यह काम राजाओं के ‘कोप भवन’ के द्वारा होता था। जब रानियां किसी बात पर रुष्ट हो जाती थीं तो वे कोप भवन में प्रवेश कर जाती थीं और सबको पता चल जाता था कि रानी रूठ गयी हैं। फिर राजा साहब सारा राज- काज छोड़कर रानी की रुसवाई को दूर करने में लग जाते थे। कुछ ऐसा ही असर नेताजी के ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ में प्रवेश करने से अपेक्षित है।

दलबदलुओं के साथ एक  गड़बड़ यह होती है कि दल बदलने के साथ उनके ‘सुर’ में ज़रूरी तब्दीली नहीं हो पाती। आदत न होने की वजह से कई बार असावधानी में वे पुराने दल और पुराने नेता का गुणगान और नई पार्टी को पूर्ववत गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसा एक दो दलबदलुओं के साथ हो चुका है। ज़्यादा दल बदलने वालों के सामने यह संकट अक्सर खड़ा हो जाता है। हमारे गायक मन्ना डे ने सही सुर साधने की इसी समस्या को एक गीत में व्यक्त किया है— ‘सुर ना सधे, क्या गाऊं मैं? सुर के बिना जीवन सूना।’ राजनीति ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली चीज़ होती है। दलबदलू  की सही सुर पकड़ने की असावधानी उसके भविष्य के लिए घातक हो सकती है। इसलिए निर्णय लिया गया है कि संसद और विधानसभाओं के निकट ‘सुर’ सुधारने वाले क्लिनिक स्थापित किये जाएंगे जहां ऑपरेशन के द्वारा दलबदलुओं के स्वर-यंत्र में ज़रूरी सुधार किये जाएंगे ताकि वे अपने पुराने दल की भर्त्सना और नये दल की तारीफ बिना चूके कर सकें। इन क्लिनिक्स में चिकित्सा के लिए सरकार ‘सब्सिडी’ प्रदान करेगी।

इसके बाद भी जिन दलबदलुओं का सुर नहीं सुधरेगा, जो अपराध-बोध या आत्मग्लानि से पीड़ित रहेंगे, या जिनकी अंतरात्मा उन्हें फटकारती  रहेगी, उनके लिए बाकायदा ‘हार्ट ट्रांसप्लांट क्लिनिक’ स्थापित किए जाएंगे जहां दिल बदलने का काम किया जाएगा, ताकि दिल और आत्मा की खटखट ही ख़त्म हो जाए। यानी दल-बदल और दिल-बदल का कार्यक्रम साथ-साथ संपन्न होगा। इसके लिए भी सरकार ‘सब्सिडी’ का प्रावधान करेगी।

सरकार को भरोसा है कि इन सुविधाओं से प्रभावित होकर ज़्यादा से ज़्यादा सदस्य सरकारी दल में शामिल होकर उसकी ताकत में इज़ाफ़ा करेंगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६२ ☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ।)

☆ शेष कुशल # ६२ ☆

☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन – शांतिलाल जैन 

सूरज आज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा. लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में मुल्क का भ्रष्टाचारियों, अपराधियों से मुक्त हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

आज हुआ ये श्रीमान् कि इसके पहले कि आला कचहरी में वकील सा. अपने मुवक्किल के निर्दोष होने की अपील-दलील पेश कर पाते, जिरह होती, गवाहों सबूतों की बिला पर अपने मुवक्किल को दोषमुक्त करा पाते – प्रॉसिक्यूशन ने केस ही वापस ले लिया!!! अभियुक्त पिछली रात नौ बजे तक अपोजिशन में था, अगली सुबह नौ बजे हाकिम के दल में शामिल हो गया. सुबह का भूला था श्रीमान्, अगले दिन सुबह घर आ गया था, सो आप उसे भूला नहीं कह सकते. कभी मिला करती थी क्लीन चिटें अदालतों से, अब हाकिम ने मुकदमा वापिस लेकर उसकी जरूरत ही ख़तम कर दी है. रख लें अदालतें अपनी चिटें अपने पास.

हाकिम ने पार्टी का बड़ा और भव्य दफ्तर बनवाया है मगर बाहर डोर-बेल नहीं लगवाई. दरवज्जे पे न्याय का घंटा जो लटकवा लिया है. बजाईए. अंदर जाईए. क्लीन चिट पाईए और पाईए एक मलाईदार ओहदा भी. स्मार्ट लीडर्स करप्शन करके कारागार का रुख नहीं करते, उनके गेट पर लटका न्याय का घंटा बजा लेते हैं और सेफ झोन में प्रवेश कर जाते हैं. ‘सत्तापक्ष में कोई भ्रष्टाचारी नहीं होता और विपक्ष में कोई ईमानदार नहीं होता.’ न्यायशास्त्र का ये नया सिद्धांत है, जो इस अवधारणा को स्थापित करता है कि एक विपक्षमुक्त मुल्क ही भ्रष्टाचार मुक्त मुल्क का पर्याय होता है. देखते देखते न विपक्ष में न कोई नेता बचा है न मुल्क में भ्रष्टाचार का कोई आरोपी. इस तरह आज का मुकदमा दीवानी अदालतों में आख़िरी मुकदमा साबित हुआ.

क्रिमिनल केसेस पहले ही अदालतों में पेश होना बंद हो चुके थे. इसे आप कल्लू मिर्ची के केस से समझिए. उसकी बदमाशी का मुआमला सामने आया और हाकिम के नुमाईंदे जेसीबी पर सवार होकर निकल पड़े. देखते देखते उसका मकान ध्वस्त कर दिया गया. लो साहब, हो गया न्याय. धरा रह गया सत्र न्यायालय और बैठे रह गये ‘युवर ऑनर’. पड़ीं रह गईं एफआईआर, तफ़्तीश, साक्ष्य, विवेचना, केसडायरी, रिमांड, जमानत, चार्जशीट, भारतीय न्याय संहिता, वकील, मुवक्किल. कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अब ना हाकिम पड़ता है न उसके नुमाईंदे. उनकी मर्ज़ी ही ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ है. मुल्क के आईन में अब अदालतों की जरूरत ही नहीं बची. पूरी न्यायपालिका एक झटके में बेरोज़गार हो गई है. वकीलों, न्यायाधीशों, कचहरी के कारकूनों का रोज़गार छिन गया हैं. जस्टिस सर की बेंच पर नया कोई केस लिस्ट हो नहीं रहा. कारकून खाली बैठे हैं. वकील मुवक्किलों की तलाश में भटक रहे हैं. ‘हाजिर हो’ की आवाजें गुम हैं, निस्तब्ध निरापद सन्नाटा पसरा पड़ा है. आज का दिन न्यायपालिका की सम्मानजनक विदाई का दिन है.

लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में ही न्यायपालिका की जरूरत का ख़त्म हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३४ ☆ व्यंग्य – ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई  इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

छोटेलाल ‘बेजोड़’ नगर के वज़नदार लेखक हैं। व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में ही बात करते हैं। अब तक पैंतालीस किताबें छपवा चुके हैं और  एक सौ अस्सी सम्मान या अभिनंदन करवा चुके हैं। उनकी तमन्ना भारत के हर शहर में सम्मान कराने की थी, जो पूरी हो चुकी है। हर शहर में उनका कोई न कोई चेला बैठा है जो सम्मान का जुगाड़ बैठाता रहता है।

यों तो ‘बेजोड़’ जी खासे मशहूर हैं, लेकिन लेखन में उन्हें वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे आकांक्षी हैं। गंभीर साहित्य की दुनिया में उनकी पूछ-कदर नहीं है। यही बात ‘बेजोड़’ जी को सालती रहती है। उनकी सबसे ज़्यादा दुखती रग परसाई जी हैं। जब कहीं भी वे अपनी रचनाओं की चर्चा का जुगाड़ बैठाते हैं, घूम-घाम कर परसाई जी  रचनाओं से तुलना होने लगती है। हर बार निष्कर्ष यह निकलता है कि  ‘बेजोड़’ जी अच्छा  लिख रहे हैं, लेकिन परसाई जी से कुछ सीख लेते तो अच्छा होता। सुनकर ‘बेजोड़’ जी खिन्न हो जाते हैं। आयोजन वे जमाते हैं और तारीफ परसाई जी बटोर ले जाते हैं।

अपने वक्तव्यों में ‘बेजोड़’ जी अक्सर कहते हैं— ‘अब परसाई जी का ज़माना लद गया। अब हम जैसे लेखकों का ज़माना है। आलोचकों से  कहो कि परसाई जी को लांघ कर हम तक आयें।कब तक ‘परसाई’ ‘परसाई’ जपते रहेंगे?’

परसाई जी के वामपंथी होने पर भी बेजोड़ जी तल्ख टिप्पणी करते हैं। कहते हैं— ‘वामपंथी अच्छा लेखक हो ही नहीं सकता। वह एक विचारधारा में कैद हो जाता है, जड़ हो जाता है, कूपमंडूक हो जाता है। उसे अपनी नाक से आगे का कुछ दिखायी नहीं पड़ता। वह एक आंख से ही दुनिया को देखता है, दूसरी नहीं खोलता। इसीलिए मैं परसाई को महान लेखक नहीं मानता। लेखक को तो समुद्र की तरह विशाल हृदय वाला होना चाहिए। विचारधारा के फेर में नहीं पड़ना चाहिए। वामपंथियों ने ज़बरदस्ती तारीफ कर कर के परसाई को महान बना दिया है।’

कई बार वे कहते हैं— ‘परसाई जी ने लिखा क्या है? कहीं वे लिखते हैं कि जिन राज्यों में दंगे हुए हैं उन्हें गणतंत्र दिवस की झांकी में दंगे ही दिखाना चाहिए। कहीं कहते हैं कि लड़कों को अपने बाप का आदेश नहीं मानना चाहिए। कहीं लिखते हैं कि पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी के कंधों पर सवार हो गयी है। कहीं सुशीला उस लड़की को कहते हैं जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पीएफ का पैसा बचा देती है। यह सब नयी पीढ़ी को बरगलाना नहीं तो और क्या है? नयी पीढ़ी को उत्तम संस्कार देने के बजाय ऊलजलूल बातें सिखा रहे हैं और फिर भी महान बने हुए हैं।’

कुछ दिनों से ‘बेजोड़’ जी एक नयी थियरी लेकर सामने आये हैं। कहते हैं, ‘एक रात मुझे सोचते-सोचते अचानक समझ में आया कि परसाई को महान क्यों माना जाता है। दरअसल  वे इसलिए बड़े माने जाते हैं क्योंकि विरोधियों के हाथों उनकी पिटाई हो गयी थी। इसमें कोई शक नहीं कि व्यंग्यकार के जीवन में प्रताड़ना का बहुत महत्व होता है। पिटाई हो जाए तो व्यंग्यकार एकदम ऊपर उठ जाता है। परसाई जी के बड़प्पन का यही राज़ है।

‘यह समझ में आने के बाद मैं लगातार कोशिश में हूं कि मेरी भी वाजिब पिटाई हो जाए ताकि मैं परसाई जी से आगे निकल जाऊं। इसी कोशिश में दो बार पटना में छात्रों के धरने में शामिल हो गया, लेकिन मेरे बालों की सफेदी देखकर पुलिस ने छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश के किसी आंदोलन में शामिल होने की सोची थी, लेकिन हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वहां पिटाई से ज़्यादा ‘एनकाउंटर’ होते हैं। अब राजस्थान जाने की सोच रहा हूं, वहां बेरोज़गारों के आंदोलन की संभावना है। हरयाणा में एक कज़िन पुलिस में हैं, उनसे भी कह रखा है। वे बुलाएंगे तो वहां चला जाऊंगा। वे पिटाई का इंतज़ाम कर देंगे। परसाई जी का पैर खराब था, चलने फिरने से मजबूर थे, इसलिए उन्हें जबलपुर में ही पिटना पड़ा। मैं तो देश में कहीं भी पिट सकता हूं। पिटने  के बाद फोटो के साथ अखबारों में भेज दूंगा। छपते ही मेरा  कद एकदम बढ़ जाएगा। फिर परसाई को न कोई याद करेगा, न कोई पढ़ेगा। सब तरफ हम ही हम होंगे।’

अब ‘बेजोड़’ जी के चेले मनाते हैं कि ‘बेजोड़’ जी की मनोकामना शीघ्र पूरी हो और वे साहित्य में ऐसी बुलन्दी पर पहुंचें जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो, परसाई भी नहीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ – हास्य-व्यंग्य – “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  डुप्लीकेट जिंदाबाद

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ 

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सबेरे कोई मेरे घर का दरवाजा लगातार खटखटाए जा रहा था।  मैं भी बिस्तर में दुबका उसके धीरज की परीक्षा ले रहा था, किंतु लंबे समय के बाद भी जब दरवाजे पर खटखटाहट बंद नहीं हुई तो मैं समझ गया कि दरवाजे पर मेरे पड़ोसी वर्मा जी के सिवा और कोई नहीं हो सकता।  कहीं दरवाजा न टूट जाए इस आशंका से मैंने तुरंत चादर फेंका और दरवाजा खोल दिया। मेरा अनुमान सही था बाहर वर्मा जी खड़े थे। उन्होंने मुझे एक ओर करते हुए घर के अंदर प्रवेश किया और सोफे पर पसरते हुए कहा – “भाई साहब, अख़बार पढ़ा आपने, अब डुप्लीकेट ताजमहल भी बन गया !”

मैंने आंखें मलते हुए कहा, वर्मा जी मुझे अख़बार पढ़ने की जरूरत कहां पड़ती है, आप ही सारी खबरें सुना जाते हैं और रही डुप्लीकेट ताजमहल की बात तो वह तो मेरे घर की आलमारी में भी बंद है। वर्मा जी बोले – “भाई साहब मैं आपकी आलमारी वाले ताजमहल की बात नहीं कर रहा, मैं तो उस विशाल डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा हूं जो एक पंजाबी उद्योगपति ने कुछ समय पहले 40 लाख अमरीकी डॉलर खर्च करके दुबई में बनवाया है। मैंने कहा भाई साहब इससे आपको क्या परेशानी हो रही है ? आजकल तो जमाना ही डुप्लीकेट का चल रहा है, वह समय गया जब किसी वस्तु या व्यक्ति का डुप्लीकेट होना सम्मानजनक नहीं समझा जाता था अब तो डुप्लीकेट की मांग ने ओरिजनल को पछाड़ दिया है। साबुन से लेकर सिंदूर तक सब डुप्लीकेट मिल रहा है। टी वी, कैमरा, सीडी की बात तो छोड़ो अब तो गीत और संगीत भी डुप्लीकेट मिलने लगे हैं और पसंद किए जा रहे हैं। डुप्लीकेट सामान के निर्माण में लोगों ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब ओरिजनल के पहले डुप्लीकेट सामग्री बाजार में आ जाती है। दुकानदार ग्राहक को ओरिजनल सामान दिखाने की कोशिश करता है तो वह डुप्लीकेट चाहिए कहकर दुकान से बाहर हो जाता है। डुप्लीकेट सामान बेचना दुकानदारों की भी मजबूरी बन गई है। बाजार में डुप्लीकेट की बढ़ती मांग के कारण देश के न जाने कितने उद्योगपतियों ने ओरिजनल वस्तुओं की जगह डुप्लीकेट का कारोबार शुरू कर दिया है। ओरीजनल समान बनाने और बेचने वाले अलसेट (मुसीबत) में हैं, डुप्लीकेट बनाने और बेचने वाले चांदी पीट रहे हैं।

लंबा बोलने के बाद जैसे ही मैंने सांस ली, वर्मा जी ने तुरन्त फायदा उठाया। बोले भाई साहब “आपने तो डुप्लीकेट पर भाषण ही दे डाला। मैं तो डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा था। ” मैने कहा – भाई जी आप ताजमहल को पकड़ का क्यों बैठे हैं ? अपने चारों ओर देखिए, हर तरफ डुप्लीकेट की माया है। आपको देश में दूध, दही, घी, तेल, सौंदर्य प्रसाधन, टी वी, कैमरा, रेडियो, कपड़ों से लेकर दवाएं तक डुप्लीकेट मिल जाएंगी। डुप्लीकेट गोविंदा, शाहरुख, सलमान, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या, करीना तो हैं ही डुप्लीकेट गांधी और मोदी भी घूम रहे हैं। “डुप्लीकेट जिंदाबाद” बोलिए और विदा लीजिए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३३ ☆ व्यंग्य – साहित्यकारी के दांव-पेंच ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘साहित्यकारी के दांव-पेंच‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ साहित्यकारी के दांव-पेंच डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सयानेलाल ‘साहित्यप्रेमी’ जल्दी ही साहित्य के मामले में सयाने, समझदार हो गये। कुछ दिन कविता कहानी लिखी, फिर समझ गये कि इससे कुछ ठोस हासिल होने वाला नहीं। ऊसर में खेती करना है। संपादक, प्रकाशक के चक्कर काटते रहो। कोई लेखक दूसरे को पढ़ता नहीं, पाठक पीठ देकर बैठा है। कितनी भी चिरौरी करो, कान नहीं देता।

लेकिन इस मायूसी के बीच सयानेलाल ने साहित्य में निहित मुनाफे की संभावनाओं को खोज लिया। लिखने से भले कुछ न मिले, साहित्य-सेवा के और भी आयाम हैं जो फलदायी हो सकते हैं। ‘जिन खोजा तिन पाइयां।’ सिर्फ  अक्ल दौड़ाने की ज़रूरत है। उन्होंने सोच विचार करके लेखन के बजाय सम्मान-विमोचन का तुरत फल देने वाला धंधा शुरू कर दिया। अब दस-बीस लेखक उनके चक्कर लगाते रहते हैं, दिन भर फोन आते हैं— ‘बड़े भैया, दो साल से सम्मान नहीं हुआ। कब तक सबर करें? एक बार तो करा दो।’

जल्दी ही सयानेलाल पूरे प्रदेश में सम्मान-विमोचन के विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो गये। अब साल में तीन चार सम्मान कार्यक्रम हो ही जाते हैं। हर कार्यक्रम में कवि-लेखक परिवार और इष्ट-मित्रों सहित पहुंचते हैं। मेले का माहौल बन जाता है। कई सम्मानित भावुक होकर परिवार से लिपटकर रोते हुए दिखायी पड़ते हैं।

सयानेलाल जी की पॉलिसी बिल्कुल साफ है। सम्मान-विमोचन का पूरा खर्चा लेखक को उठाना पड़ेगा। खर्चे की रकम और हिसाब सयाने लाल जी  के पास रहेंगे। हिसाब पूछने की मुमानियत है। जो पूछे उससे आंखें तरेरकर कहते हैं, ‘हिसाब मांगना है तो अब आगे सम्मान कराने के लिए हमारे पास मत आना। दो ठो दोहे लिखे नहीं कि सम्मान की लाइन में लग गये।’ सम्मानित सिकुड़ जाता है, दांत निकाल कर कहता है— ‘रहने दीजिए। गुस्सा मत होइए। हमने तो वैसइ पूछ लिया था।’ ज़ाहिर है खर्चे में से सयानेलाल पर्याप्त सेवा-शुल्क बचा लेते हैं।

सयानेलाल पर दबाव सिर्फ विमोचन और सम्मान के लिए ही नहीं होता, उनके कार्यक्रमों में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए भी होता है। कुर्सी-प्रेमी अनेक लोग अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए कुछ ‘त्याग’ करने को भी तैयार हो जाते हैं।

एक दिन सयानेलाल नगर के जाने-माने विद्वान डॉक्टर त्रिपाठी के पास पहुंचे। चरण छूकर  बोले, ‘आदरणीय,16 तारीख को बीस पच्चीस लेखकों का सम्मान करना है। आप कृपा करके कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार कर लें तो कार्यक्रम में चार चांद लग जाएंगे।’ त्रिपाठी जी भले आदमी थे। राज़ी हो गये। बोले, ‘वाहन की व्यवस्था कर देना। मैं आ जाऊंगा।’

सयानेलाल जी पुन: चरण छूकर खुशी खुशी विदा हुए।

कार्यक्रम से तीन दिन पहले अचानक वे फिर त्रिपाठी जी के घर उपस्थित हुए। बड़ी देर तक बैठे उंगलियां मरोड़ते रहे, जैसे किसी असमंजस में हों। थोड़ी देर में बोले, ‘आदरणीय, बड़े धर्मसंकट में हूं। कैसे कहूं? आप विकल जी को जानते होंगे। कविता लिखते हैं। वे पीछे पड़ गये हैं कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता का मौका उनको दूं। दरअसल वे अगले महीने बेटी के पास बंबई जा रहे हैं। कह रहे थे पता नहीं कब लौटना हो, इसलिए मेरे मार्फत आपसे प्रार्थना की है कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्हें कर लेने दें। कहा है कि इस कृपा के लिए आपके बहुत आभारी होंगे। लेकिन मेरे लिए यह बड़े संकट की बात है।’

त्रिपाठी जी ठहरे सज्जन व्यक्ति। तुरंत बोले, ‘ठीक है। वे ही अध्यक्षता करें। क्या फर्क पड़ता है?’

सयाने जी चेहरे पर पश्चात्ताप का भाव पहने बाहर निकले, लेकिन स्कूटर पर बैठते ही उनका भाव बदला और वे मुस्कराते हुए आगे बढ़ गये।

दूसरे दिन त्रिपाठी जी के पास नगर के साहित्यकारों में ‘नारद’ की उपाधि पाये ‘बेदर्द’ जी का फोन आ गया। पूछने लगे, ‘सुना है आप सयाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता नहीं कर रहे हैं?’ त्रिपाठी जी ने पूरी जानकारी दी तो ‘बेदर्द’ जी बोले,  ‘सयानेलाल बहुत काइंयां है और आप बहुत भोले हैं। विकल जी बड़े प्रचार-प्रेमी हैं। उन्होंने  अध्यक्षता के लिए सयाने  को ग्यारह  हज़ार रुपये का वादा किया है। वे अपने साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर बीस पच्चीस श्रोता भी लाएंगे। साथ ही वे सभी श्रोताओं की चाय का खर्चा भी उठाएंगे। यह सब मुझे खुद सयानेलाल ने बताया। वह विकल जी को बुलाकर बहुत खुश है। आप आजकल की साहित्यकारी के लटके झटके से वाकिफ़ नहीं हैं।’

त्रिपाठी जी हंसकर बोले, ‘ठीक कहते हो, भैया। यह आजकल की साहित्यकारी समझना हम जैसे अनाड़ियों के बस का नहीं है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३३ – स्टैच्यू..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३३ स्टैच्यू..! ?

संध्याकाल है। शब्दों का महात्म्य देखिए कि प्रत्येक व्यक्ति उनका अर्थ अपने संदर्भ से ग्रहण कर सकता है। संध्याकाल, दिन का अवसान हो सकता है तो जीवन की सांझ भी। इसके सिवा भी कई संदर्भ हो सकते हैं। इस महात्म्य की फिर कभी चर्चा करेंगे। संप्रति घटना और उससे घटित चिंतन पर मनन करते हैं।

सो अस्त हुए सूर्य की साक्षी में कुछ सौदा लेने बाज़ार निकला हूँ। बाज़ार सामान्यत: पैदल जाता हूँ। पदभ्रमण, निरीक्षण और तदनुसार अध्ययन का अवसर देता है। यूँ भी मुझे विशेषकर मनुष्य के अध्ययन में ख़ास रुचि है। संभवत: इसी कारण एक कविता ने मुझसे लिखवाया, ‘उसने पढ़ी आदमी पर लिखी किताबें/ मैं आदमी को पढ़ता रहा।’

आदमी को पढ़ने की यात्रा पुराने मकानों के बीच की एक गली से गुज़री। बच्चों का एक झुंड अपने कल्लोल में व्यस्त है। कोई क्या कह रहा है, समझ पाना कठिन है। तभी एक स्पष्ट स्वर सुनाई देता है, ‘गौरव स्टेच्यू!’ देखता हूँ एक लड़का बिना हिले-डुले बुत बनकर खड़ा हो गया है। . ‘ ऐ, जल्दी रिलीज़ कर। हमको खेलना है’, एक आवाज़ आती है। स्टैच्यू देनेवाली बच्ची खिलखिलाती है, रिलीज़ कर देती है और कल्लोल जस का तस।

भीतर कल्लोल करते विचारों को मानो दिशा मिल जाती है। जीवन में कब-कब ऐसा हुआ कि  परिस्थितियों ने कहा ‘स्टैच्यू’ और अपनी सारी संभावनाओं को रोककर  बुत बनकर खड़ा होना पड़ा! गिरना अपराध नहीं है पर गिरकर उठने का प्रयास न करना अपराध है। वैसे ही नियति के हाथों स्टैच्यू होना यात्रा का पड़ाव हो सकता है पर गंतव्य नहीं। ऐसे स्टैच्यू सबके जीवन में आते हैं। विलक्षण होते हैं जो स्टैच्यू से निकलकर जीवन की मैराथन को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते हैं।

नये आयाम देनेवाला ऐसा एक नाम है अरुणिमा सिन्हा का। अरुणिमा, बॉलीबॉल और फुटबॉल की उदीयमान युवा खिलाड़ी रही। दोनों खेलों में अपने राज्य उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी थी। सन 2011 में रेलयात्रा करते हुए बैग और सोने की चेन लुटेरों के हवाले न करने की एवज़ में उन्हें चलती रेल से नीचे फेंक दिया गया। इस बर्बर घटना में अरुणिमा को अपना एक पैर खोना पड़ा। केवल 23 वर्ष की आयु में नियति ने स्टैच्यू दे दिया।

युवा खिलाड़ी अब न फुटबॉल खेल सकती थी, न बॉलीबॉल। नियति अपना काम कर चुकी थी पर अनेक अवरोधक लगाकर सूर्य के आलोक को रोका जा सकता है क्या? कृत्रिम टांग लगवाकर अरुणिमा ने पर्वतारोहण का अभ्यास आरम्भ किया।  नियति दाँतो तले उँगली दबाये देखती रह गयी जब 21 मई 2013 को अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया। अरुणिमा सिन्हा स्टैच्यू को झिंझोड़कर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचने वाली पहली दिव्यांग पर्वतारोही बनीं।

चकबस्त का एक शेर है,

कमाले बुज़दिली है, पस्त होना अपनी आँखों में

अगर थोड़ी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं।

स्टैच्यू को अपनी जिजीविषा से, अपने साहस से स्वयं रिलीज़ करके, अपनी ऊर्जा के सकारात्मक प्रवाह से अरुणिमा होनेवालों  की अनगिनत अद्भुत कथाएँ हैं। अपनी आँख में विजय संजोने वाले कुछ असाधारण व्यक्तित्वों की प्रतिनिधि कथाओं की चर्चा उवाच के अगले अंकों में करने का यत्न रहेगा। प्रक्रिया तो चलती रहेगी पर कुँवर नारायण की पंक्तियाँ सदा स्मरण रहें, ‘हारा वही जो लड़ा नहीं।’..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९३ – व्यंग्य – यादों की अर्थी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – यादों की अर्थी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९३ – व्यंग्य  – यादों की अर्थी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार थे। सामने डैशबोर्ड पर रखा मोबाइल फोन किसी देवता की तरह चमक रहा था, जिसमें एक निर्जीव स्त्री की आवाज़ हमें स्वर्ग का रास्ता दिखा रही थी। “अगले सौ मीटर पर बाएं मुड़ें,” उस आवाज़ में वह भरोसा था जो अक्सर धोखेबाज वकीलों की बातों में होता है। मैंने स्टीयरिंग घुमाया, पर सामने सड़क नहीं, एक गहरा नाला था जो शहर की सारी गंदगी समेटे इतिहास की तरह बह रहा था। सुजाता ने ठंडी आह भरी, “मैंने कहा था न, वह दाहिने कह रही है, तुम हमेशा औरतों को गलत समझते हो।” मैंने मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा, वह नीली रेखा अब किसी घायल सांप की तरह छटपटा रही थी। मुझे लगा जैसे वह नक्शा नहीं, मेरा चरित्र प्रमाण पत्र है, जिसे एक उपग्रह अंतरिक्ष से बैठकर लिख रहा है।

“री-रूटिंग…” फोन से आवाज़ आई। यह शब्द सुनते ही सुजाता का चेहरा ऐसा हो गया जैसे मैंने उसकी शादी का गहना गिरवी रख दिया हो। “देखो, यह मशीन भी मान रही है कि तुम भटक गए हो। इसे दोष मत दो, यह तो विज्ञान है। तुम्हारी बुद्धि ही पत्थर की हो गई है।” गाड़ी अब एक ऐसी संकरी गली में थी जहाँ धूप भी घुसने से पहले दो बार सोचती होगी। बगल की दुकान पर बैठे एक बूढ़े ने हमें ऐसे देखा जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से आए शरणार्थी हों। मैंने चीखकर कहा, “यह बाएं बोल रही है, पर यहाँ तो दीवार है!” सुजाता ने मोबाइल छीन लिया और उसे अपनी छाती से ऐसे लगा लिया जैसे वह उसका सर्वस्व हो। “बेचारी को डराओ मत, वह सही कह रही है, तुमने ही इसे ठीक से पकड़ा नहीं होगा। देखो, वह रो रही है!” वास्तव में, स्क्रीन पर पसीने की एक बूंद गिरी थी, जो सुजाता के विलाप का हिस्सा लग रही थी।

कार अब एक सुनसान श्मशान घाट के गेट पर खड़ी थी। जीपीएस की वह स्त्री अब फुसफुसा रही थी, “आप गंतव्य पर पहुँच चुके हैं।” चारों तरफ खामोशी थी, सिवाय इंजन की गड़गड़ाहट और सुजाता की सिसकियों के। “देखा? पहुँच गए न? अब खुश हो? अपनी ज़िद के चक्कर में तुमने इसे भी पागल कर दिया।” उसने फोन को डैशबोर्ड पर पटक दिया। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। हम यहाँ क्यों आए? हमें तो अपनी बेटी की शादी के रिसेप्शन में जाना था, जो शहर के सबसे बड़े होटल में था। मैंने खिड़की से बाहर देखा, वहाँ कोई लाइट नहीं थी, कोई संगीत नहीं था। बस कुछ टूटी हुई कब्रें थीं और उन पर जमी धूल। सुजाता ने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया, “तुमने इस बेचारी मशीन को इतना प्रताड़ित किया कि इसने हार मान ली। तुमने इसे गलत साबित करने के लिए पूरा रास्ता ही बदल दिया!”

मैंने कांपते हाथों से फोन उठाया। स्क्रीन धुंधली थी। तभी मेरी नज़र पीछे वाली सीट पर पड़ी। वहाँ एक सफेद लिफाफा रखा था। वह शादी का कार्ड नहीं था। वह मेमोरी लॉस और अल्जाइमर की मेडिकल रिपोर्ट थी, जिस पर मेरा नाम बड़े अक्षरों में लिखा था। मैं हक्का-बक्का था। होटल? शादी? वह तो पिछले साल हो चुकी थी। तभी मेरी नज़र बगल वाली सीट पर पड़ी—वह खाली थी। वहाँ न सुजाता थी, न उसकी सिसकियाँ, बस उसकी एक पुरानी बनारसी साड़ी की गंध हवा में तैर रही थी। अचानक बिजली की तरह दिमाग में एक कौंध गई और दिल की धड़कनें किसी ढहती इमारत की तरह बैठ गईं। सुजाता को मरे हुए तो तीन साल बीत चुके थे; इसी श्मशान की आग ने उसे राख में बदला था। अल्जाइमर के अंधेरे गलियारों में भटकता मेरा दिमाग हर बार जीपीएस की उस नीली रेखा को सुजाता की आवाज़ समझ बैठता था। मैं हर शाम अपनी यादों के मलबे में दबी उसकी चिता तक खिंचा चला आता था। वह मशीन गलत नहीं थी, मेरा अस्तित्व ही ‘री-रूटिंग’ के जाल में फंसा था। उस निर्जन कब्रिस्तान में फोन फिर बोल उठा—”गंतव्य पर पहुँच चुके हैं।” सामने सुजाता की चिता जल रही थी। मैं अपनी ही याददाश्त की अर्थी उठाए खड़ा था। फोन पर वही नीली रेखा अब स्थिर हो चुकी थी। फोन से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने खुद से पूछा, “बाएं मुड़ना था या दाएं?” तभी जीपीएस की आवाज़ फिर गूंजी, “वापस मुड़ें, आप फिर से अपनी यादों के गलत मोड़ पर आ गए हैं।” उस सन्नाटे में मुझे अहसास हुआ कि मैं जीपीएस को गलत नहीं ठहरा रहा था, मैं तो उस हकीकत से लड़ रहा था जो मेरी सुध-बुध के साथ ही दफन हो चुकी थी। कार वहीं खड़ी थी, और मैं मैप की उस आखिरी बिंदु पर था, जहाँ से आगे कोई सड़क नहीं थी, सिर्फ एक गहरा अंधेरा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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