हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३८ – पंडित जी की भविष्यवाणी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – पंडित जी की भविष्यवाणी।)  

☆  चुभते तीर # १३८ – व्यंग्य  – पंडित जी की भविष्यवाणी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शर्मा जी भाग्य और हस्तरेखा पर इतना अटूट विश्वास रखते थे कि सुबह का पहला कदम भी पंचांग देखकर ही घर की चौखट से बाहर निकालते थे। उनके मोहल्ले में नए आए पंडित विद्याधर शास्त्री का दावा था कि वे इंसान के पैर का अंगूठा देखकर बता सकते हैं कि उसका आने वाला समय कैसा बीतेगा।

शर्मा जी रविवार की सुबह अपनी दाहिनी हथेली और पैर का अंगूठा लिए पंडित जी के आश्रम पहुँच गए। आश्रम में पहले से ही दफ़्तर के दो-तीन लोग अपनी किस्मत का ताला खुलवाने के इंतज़ार में बैठे थे।

पंडित जी ने अपनी बड़ी सी ऐनक नाक पर टिकाई, शर्मा जी के पैर के अंगूठे को दो मिनट तक गौर से देखा, फिर गहरी सांस छोड़कर अपना सिर हिलाया।

“शर्मा जी, मामला बहुत गंभीर है,” पंडित जी ने गंभीर आवाज़ में कहा, “आपके ग्रह बता रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे के भीतर आपके साथ एक बहुत बड़ा धोखा होने वाला है। कोई अपना ही व्यक्ति आपके धन पर हाथ साफ़ करने वाला है।”

शर्मा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके दिमाग में तुरंत अपने साले, दफ़्तर के जूनियर और दूध वाले का चेहरा घूमने लगा। उन्होंने तुरंत पूछा, “पंडित जी, कोई उपाय? कोई ताबीज?”

पंडित जी ने मुस्कुराकर एक लाल धागा निकाला और बोले, “यह सिद्ध धागा अपनी दाहिनी कलाई पर बांधिए और अगले चौबीस घंटे तक अपने सारे पैसे, बटुआ और क्रेडिट कार्ड किसी गुप्त स्थान पर छुपाकर रख दीजिए। किसी पर विश्वास मत कीजिए।”

शर्मा जी ने ₹1100 दक्षिणा दी, धागा बंधवाया और भागे-भागे घर आए। घर पहुँचते ही उन्होंने अलमारी से अपना सारा नकद और पर्स निकाला और उसे अपने पुराने जूतों के डिब्बे में डालकर पलंग के सबसे गहरे कोने में छुपा दिया। यहाँ तक कि पत्नी को भी भनक नहीं लगने दी, क्योंकि पंडित जी ने कहा था—’कोई अपना ही धोखा देगा!’

पूरा दिन शर्मा जी जासूसों की तरह घर के हर कोने पर नज़र रखे रहे। जब भी पत्नी पास आती, वे अपना हाथ जेब पर रख लेते। रात भर वे सो नहीं पाए। हर आहट पर उन्हें लगता कि कोई चोर उनका जूतों का डिब्बा चुराने आ रहा है।

अगली सुबह आठ बज गए। पूरे चौबीस घंटे बीत चुके थे। शर्मा जी ने राहत की लंबी सांस ली। पंडित जी की भविष्यवाणी झूठी साबित हुई थी! उनका खजाना सुरक्षित था।

वे मुस्कुराते हुए पलंग के नीचे झुके और जूतों का डिब्बा बाहर निकाला। डिब्बा खोला तो शर्मा जी के होश उड़ गए! डिब्बा बिल्कुल खाली था। अंदर न पर्स था, न एक भी रुपया!

शर्मा जी चीखते हुए बाहर भागे, “चोरी हो गई! धोखा हो गया!”

तभी उनकी पत्नी हाथ में झाड़ू लिए आई और शांत भाव से बोलीं, “चिल्लाना बंद कीजिए। कल जब आप पंडित जी के यहाँ गए थे, तो कबाड़ी आया था। मैंने आपके पलंग के नीचे पड़े पुराने गल चुके जूतों के डिब्बे कबाड़ में ₹50 में बेच दिए। पर हाँ, डिब्बे के अंदर आपका पर्स मिला था, तो मैंने उससे पंडित जी की ₹1100 दक्षिणा और महीने का राशन चुकता कर दिया।”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया। पंडित जी की भविष्यवाणी सौ फ़ीसदी सच साबित हुई थी—धोखा चौबीस घंटे के अंदर ही हुआ था, और करने वाला कोई ‘अपना’ ही था!

शर्मा जी सिर पकड़कर वहीं बैठ गए। पूरा मोहल्ला एकत्र हो गया और पंडित जी की इस ‘सटीक भविष्यवाणी’ की महिमा पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३७ – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर।)  

☆  चुभते तीर # १३७ – व्यंग्य  – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के जीवन का एक ही स्वर्णिम सिद्धांत था—’छूट चाहे एक रुपये की हो, उसे छोड़ना पाप है।’ उनके फ़ोन में दुनिया भर की शॉपिंग ऐप्स का ऐसा जाल बिछा था कि नोटिफिकेशन आते ही उनका अंगूठा अपने आप ‘बाय नॉव’ पर चला जाता था।

एक दिन अचानक उनके फोन पर लाल अक्षरों में चमचमाता हुआ मैसेज आया—’महा-बचत ऑफर! केवल अगले दस मिनट के लिए, ₹50,000 का प्रीमियम एयर प्योरिफायर पाएं मात्र ₹499 में!’

गुप्ता जी की बाछें खिल गईं। उन्होंने न बाएं देखा न दाएं, तुरंत क्रेडिट कार्ड का नंबर डाला और ऑर्डर कन्फर्म कर दिया। अगले ही पल उनके खाते से ₹499 कटने का मैसेज आ गया। गुप्ता जी ने ऐसे राहत की सांस ली जैसे किसी युद्ध में आख़िरी किला फतह कर लिया हो। वे पूरे मोहल्ले में घूम-घूमकर अपनी इस ‘ऐतिहासिक खरीददारी’ की शेखी बघारने लगे।

तीन दिन बाद कूरियर वाला एक बहुत बड़ा कार्डबोर्ड का बक्सा लेकर आया। बक्से का आकार इतना विशाल था कि उसे ड्राइंग रूम में रखने के लिए गुप्ता जी को अपने सोफ़े की जगह बदलनी पड़ी। पत्नी ने संदेह भरी नजरों से बक्से को देखा, “इस बक्से में सचमुच पंखा और फिल्टर है भी या केवल डिब्बा खरीद लाए हैं?”

गुप्ता जी ने मूंछों पर ताव दिया, “अरे तुम क्या जानो कॉर्पोरेट मार्केटिंग के दांव-पेच! कंपनियां कई बार प्रचार के लिए घाटे में सामान बेचती हैं।”

गुप्ता जी ने कैंची उठाई और बक्से को टेप काटकर खोला। अंदर एक और बक्सा था। उस बक्से को खोला तो उसके अंदर एक और छोटा बक्सा निकला। जैसे-जैसे बक्से खुलते गए, गुप्ता जी के माथे पर पसीने की बूंदें गहरी होती गईं। यह किसी जापानी खिलौने की तरह डिब्बे के अंदर डिब्बे का सिलसिला था।

आखिरकार जब छठा और सबसे छोटा बक्सा खुला, तो उसके अंदर से एक छोटा सा प्लास्टिक का पौधा और एक छोटी सी पर्ची निकली।

पर्ची पर लिखा था: “बधाई हो! यह मनी प्लांट का प्राकृतिक एयर प्योरिफायर है। यह हवा में ऑक्सीजन घोलता है और ज़हरीली गैसों को सोखता है। 100% प्राकृतिक और बिना बिजली का!”

पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं। गुप्ता जी का चेहरा ऐसा उतर गया जैसे किसी ने गरमा-गरम चाय में नींबू का रस निचोड़ दिया हो। ₹499 में उन्होंने दरअसल ₹10 का एक प्लास्टिक का गमला और उसकी पैकिंग का खर्च उठाया था।

तभी दरवाज़े पर पड़ोसी शर्मा जी आ पहुंचे। शर्मा जी ने उस बड़े बक्से और छोटे गमले को देखा और मुस्कुराते हुए बोले, “क्यों गुप्ता जी, हवा शुद्ध हुई या सिर्फ़ पॉकेट हल्की हुई?”

गुप्ता जी ने एक पल का विराम लिया, तुरंत अपना चश्मा ठीक किया और मुस्कुराकर बोले, “शर्मा जी, इसे कहते हैं असली दूरदर्शिता! बिजली का बिल शून्य, ज़ीरो मेंटेनेंस, और देखिए डिब्बों का कबाड़ बेचकर मुझे ₹500 वापस भी मिल गए! यानी प्योरिफायर बिल्कुल मुफ़्त!”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया और पूरा परिवार गुप्ता जी की इस बेमिसाल जुगाड़-बुद्धि पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६८ ☆ व्यंग्य – “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” ।)

☆ शेष कुशल # ६८ ☆

☆ व्यंग्य – “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख – शांतिलाल जैन 

पिछले अठ्ठाइस दिनों से कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. उन शॉलों की संख्या में भी इज़ाफा नहीं हो रहा जिनके बारे में उनके मन में एक अदम्य लेकिन भोला विश्वास है कि एक दिन वे कोलकाता के द रसेल एक्सचेंज में नीलाम की जाएँगी और हिंदी जगत का कोई धरोहर प्रेमी कोई उन्हें ऊँची बोली लगाकर खरीद लेगा. उनके शेल्फ में लकड़ी के चौकोर गत्ते पर टिके लगभग नौ इंच ऊँचे तीन जगह से टेढ़े हुए जा रिए स्मृति चिन्ह की वृद्धि दर स्थिर हो गई है. फूलमालाओं की एडिक्ट हो चुकी गर्दन के अपने तकाज़े हैं. रह रह कर एक तलब सी उठती है. कर कमल बुके ग्रहण करने को कुलबुलाने लगते हैं. दरअसल, वे भी चाहते हैं कुरते-पजामे पहने जाएँ मगर विवश हैं. ऑकेजन बन ही नहीं रहा. ऐसा नहीं है कि पिछले अठ्ठाइस दिनों में उन्होंने किसी गोष्ठी की अध्यक्षता न की हो. की है. तीन-चार की है, मगर ऑनलाइन, वर्चुअल. आग लगे ऐसी तकनालॉजी को जिसने अध्यक्षीय ठाठ ख़त्म कर दिए. अध्यक्षता गूगल मीट पर हो तो चाय भी घर की पीनी पड़ती है श्रीमान्. टू-जीबी डेटा ज़ेब का लग जाता है सो अलग. हैरान हैं वे – बारात में जाना और पान-सुपारी घर की खाना, ये कौनसी बात हुई!!

ऑफ़लाइन अध्यक्षयाई के दिन भी क्या स्वर्णिम दिन हुआ करते थे. सुदूर शिमला-मसूरी-नैनीताल तक से ऑफर आया करते थे. जलवा हुआ करे था अध्यक्षजी का. सेकंड एसी से यात्रा. एक्सक्लूसिव टैक्सी का इंतजाम. थ्री स्टार स्टे, मिसेज अध्यक्ष के साथ साईट सीइंग के आनंद का प्रबंध. क्लोज डोअर रसरंजन की सुविधा. मेमोरेबल गिफ्ट. आयोजक बिछे-बिछे जाते थे. डिजिटल क्रांति ने अध्यक्षीय रुतबे पर पानी फेर दिया है. वे बड़े लेखक हैं. चालीस साल पहले उन्होंने एक उपन्यास लिखकर चतुर्दिक ख्याति पाई है. उसके बाद वे चाहकर भी कभी कुछ नहीं लिख पाए, साहित्यिक जगत उन्हें अध्यक्षता से विराम जो लेने नहीं दे रहा. इन चार दशकों में उन्हें अध्यक्ष होने की लत लग गई है. कितना कारूणिक है यह सब कि उम्र और साहित्यिक यात्रा के इस मोड़ पर उन्हें ऑनलाइन के दुःख झेलने पड़ रहे हैं.

सुदूर डेस्टिनेशन तो छोड़िए, इन दिनों शहर के शहर में आयोजक ऑनलाइन कार्यक्रम करा लेते हैं. पर्देदारी यह कि दूसरे शहर से भी कुछ वक्ताओं को जोड़ना है सर. ऑनलाइन से पूर्व के कालखंड में जब अपने ही शहर में हुआ करता था ऑफ़लाइन व्याख्यान तब अध्यक्षजी का जलवा देख देख कर स्थानीय प्रतीक्षारत अध्यक्षीय उम्मीदवारों के कलेजों पर साँप लोट जाया करते थे. ‘हाय हमारा नंबर कब आएगा?’ दो वालिंटियर कार लेकर पंद्रह मिनट पहले घर के बाहर हाज़िर. साहित्य में फिजीकल योगदान देते कार्यकर्ता घंटी देने के बाद अध्यक्षजी के घर से बाहर आने की प्रतीक्षा करते. आपस में बतियाते. बीच बीच में मरियल सी देसी कुतिया को लतियाकर भगाते हुए समय काट रहे हैं. कुतिया भी अध्यक्षजी को लेने आई कार का रियर व्हील भिगोने के मिशन पर है. प्रतिबद्ध. उसे एक सिंपल सा फैक्ट नहीं पता है – एक प्रतिबद्ध प्राणी हर दौर में लतियाया ही जाता है. खैर, साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों वालिंटियर्स का है, दोनों निस्पृह भाव से सड़क पर खड़े उनकी प्रतीक्षा जो कर रहे हैं.

चलिए, अध्यक्षजी तैयार हैं मगर बाहर नहीं आ रहे. टाईम से बाहर निकल आएँ तो अध्यक्ष होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता. एनवक़्त पर डियो मिल नहीं रहा.  बेडरूम से ड्राइंगरूम तक आने में समय लग रहा है. कोई बात नहीं – बड़े आदमी हैं. हाँ कर दी यही बहुत है. प्रस्ताव आया तब तो उन्होंने मना ही कर दी थी. मिनिमम तीन मनुहार से कम में हाँ करते ही कब हैं? कहा कि इस दिन मुझे देहरादून एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करने जाना है. काफी मनुहार के बाद उन्होंने देहरादून का कार्यक्रम निरस्त करके इस स्थानीय कार्यक्रम की हाँ की है. घंटाभर प्रतीक्षा भी करना पड़े तो कोई बात नहीं. बड़े आदमी हैं. थैंक गॉड. आधे घंटे बाद ही बाहर आ गए हैं. कार में बैठते बैठते पूछा – अरे आप लोगों ने चाय ली? (पानी तक मयस्सर नहीं हुआ). मगर – नहीं नहीं सर, अभी नहीं. पहले चलते हैं. देर हो गई है. डियो की तेज़ महक से रास्तेभर वालिंटियर्स का जी मिचलाता रहा. मैंने ऊपर बताया ना आपको – साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों कार्यकर्ताओं का है.   

बहरहाल, अध्यक्ष होने का जन्मसिद्ध अधिकार पाए साहित्यकार को ऑनलाइन के कारण हिंदी साहित्य में ऐसे बुरे देखने पड़ेंगे उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. ऊँचा मंच, बीच में उनकी दो इंच ऊँची कुर्सी, बिसलेरी का पानी, संचालिका से बीच बीच में बतियाने का सुख काफ़ूर हो गया है. सामान्यतः मिनिमम ऑडियंस की भूमिका में उनकी अपनी एक निजी सेना होती है. लगभग हर स्थानीय कार्यक्रम में मौजूद. अपनी चेयर पर बैठे बैठे जड़ हो जाने तक जमी रहती. नई किताब की भूमिका लिखवाने की गरज से आखिर तक जमे रहते कुछ नए लेखक, अध्यक्षजी की आँखों की शर्म से रुक जाया करते जूनियर लेखक. कुछ मोबाइल पर बात करने की एक्शन करते करते  हॉल से एग्जिट कर जाते,  फिर भी कुछ तो अध्यक्षीय उद्बोधन के समाप्त होने तक रुकते ही. क्या तो सुख था! फोटोग्राफर के लेन्स की जद में आते ही अध्यक्षजी सीरियस हो जाते, गंभीर मुद्रा में सोचने लगते या कुछ नोट्स लेने की अदाएँ फोटो में कैद करा लेते. अब तो बस स्क्रीन शॉट है, इनसेट-वन-बी से मौसम की ली हुई तस्वीर से मिलता जुलता. और है एक मसोसा हुआ मन. अध्यक्षीय धज ख़त्म जो हो गई है.

ऑनलाइन कार्यक्रमों से आयोजकों के अलावा किसी को आराम मिला है तो वो माँ शारदे को मिला है. डेढ़ बाय दो की फ्रेम में कैद माँ को आभार प्रदर्शन की आख़िरी पंक्ति तक सुनना पड़ती थी. चार अगरबत्तियों की खुशबू में साढ़े तीन घंटे गुजारना कितना भारी पड़ता था उन्हें. इनके चक्कर में वीणा बजाने की रियाज़ छूट जाया करती सो अलग. प्रोग्राम के बाद अध्यक्षजी तो कार में निकल जाया करते, उन्हें किसी वालिंटियर की एक्टिवा के फुट-बोर्ड पर लौटना पड़ता. प्रसन्न हैं वे, ऑफ़लाइन में शिरकत करने की विवशताएँ ख़त्म जो हो गई हैं.

आशा पर आकाश टिका है श्रीमान्. ऑफ़लाइन का बीज अभी पूरी तरह डूबा नहीं है. रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह बीच बीच में कहीं कहीं ऑफ़लाइन बुलावे भी आ रहे हैं. अठ्ठाइस दिन पहले एक ऑफ़लाइन कार्यक्रम में बुलाए जाने से मिले रिजुविनेशन से चार हफ्ते कट गए.  अब फिर कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. पुराने दिन वैसे के वैसे लौटेंगे कि नहीं पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता. हम तो यही चाहेंगे आग लगे गूगल-मीट, झूम-मीटिंग, माइक्रोसॉफ्ट-टीम, मेटावर्स की तकनालॉजी में. अध्यक्षजी के अच्छे दिन लौट आएँ – हमारी शुभकामनाएँ.

फ़िल-वक़्त “Meeting Ended by Host”.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३६ – शादी का गुलाब जामुन – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – शादी का गुलाब जामुन।)  

☆  चुभते तीर # १३६ – व्यंग्य  – शादी का गुलाब जामुन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

 अवधेश जी के जीवन का एक ही ध्येय था—शादी के मंडप में बने ‘वीआईपी’ खाने की गुणवत्ता का निरीक्षण करना। वे मोहल्ले के ऐसे पारखी थे जो बिना न्यौता कार्ड देखे भी बता सकते थे कि किस मैरिज हॉल में असली देसी घी का इस्तेमाल हो रहा है और कहाँ रिफाइंड का गोलमाल चल रहा है।

इस बार शादी उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी, पड़ोस के वर्मा जी के बेटे की थी। वर्मा जी ने तीन महीने पहले से ही शेखी बघारना शुरू कर दिया था कि उन्होंने लखनऊ के सबसे महंगे हलवाई को बुलाया है और जो गुलाब जामुन उनकी शादी में मिलेगा, वैसा पूरे प्रदेश में कहीं नहीं बना होगा।

अवधेश जी शादी में पहुंचे तो उनकी नज़र सीधे मीठे के स्टॉल पर टिकी। वहाँ एक विशाल पीतल के कड़ाहे में गरमा-गरम बड़े-बड़े गुलाब जामुन तैर रहे थे। खुशबू ऐसी थी कि दूर खड़े आदमी के मुंह में भी पानी आ जाए। अवधेश जी ने अपनी प्लेट उठाई और गुलाब जामुन के काउंटर की तरफ कदम बढ़ाए।

लेकिन जैसे ही वे पहुँचे, हलवाई ने एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया—’आरक्षित: केवल समधी जी और विशेष अतिथियों के लिए’।

अवधेश जी की अनाहत भावना तिलमिला उठी। एक तरफ वर्मा जी दूर खड़े होकर उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे, जैसे कह रहे हों—’आज तो तरसते ही रह जाओगे अवधेश जी!’

अवधेश जी ने ठान लिया कि चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, वे वह गुलाब जामुन खाकर ही रहेंगे। उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने देखा कि समधी जी का परिवार एक अलग बने लाल शामियाने में बैठा हुआ था, जहाँ वेटर हाथ में ढकी हुई चांदी की थालियाँ लेकर जा रहे थे।

अवधेश जी ने झट से अपनी जैकेट उतारी, गले में एक लाल गमछा लपेटा और एक खाली थाल उठाकर सीधे वीआईपी शामियाने की तरफ बढ़ गए। वे ऐसे हाव-भाव से चलने लगे जैसे शादी के मुख्य प्रबंधक वही हों।

शामियाने के गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने उन्हें रोका, “सर, आप अंदर कहाँ जा रहे हैं?”

धेश जी ने आंखें तरेरीं और कड़क आवाज़ में बोले, “मूर्ख! दिखता नहीं कि समधी जी की स्पेशल प्लेट में एक गुलाब जामुन कम है? अगर उन्होंने बुरा मान लिया तो शादी रुक जाएगी, ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी?”

सुरक्षाकर्मी डर के मारे पीछे हट गया। अवधेश जी सीधे मुख्य मेज़ पर पहुंचे जहाँ दूल्हे के पिता यानी स्वयं समधी जी बैठे थे। अवधेश जी ने बहुत ही आदर से प्लेट उनके सामने रखी और एक बड़ा सा गुलाब जामुन अपनी प्लेट में उठाकर कोने में टेबल पर बैठ गए।

पहला चम्मच मुंह में डालते ही अवधेश जी की आंखें बंद हो गईं। सचमुच, ऐसा अद्भुत स्वाद उन्होंने पहले कभी नहीं चखा था। लेकिन तभी पीछे से वर्मा जी की कड़क आवाज़ गूंजी, “अवधेश जी! आप समधी जी के निजी शामियाने में क्या कर रहे हैं?”

पूरा शामियाना शांत हो गया। समधी जी ने अवधेश जी की तरफ देखा। अवधेश जी का राज़ खुल चुका था।

अवधेश जी आराम से खड़े हुए, मुंह का निवाला निगला और मुस्कुराकर बोले, “वर्मा जी, मैं तो बस यह जांचने आया था कि आपके समधी जी को सबसे बेहतरीन चीज़ मिल रही है या नहीं। और अब मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि समधी जी, आपने बिल्कुल सही घर में रिश्ता जोड़ा है, जहाँ मेहमानावजी दिल से होती है!”

समधी जी खुशी से गद्गद हो गए। उन्होंने उठकर अवधेश जी को गले लगा लिया और कहा, “वाह! ऐसे फ़िक्र करने वाले पड़ोसी किस्मत वालों को मिलते हैं।”

पूरा शामियाना तालियों से गूंज उठा। वर्मा जी का मुंह बन गया, लेकिन उन्हें भी मुस्कुराकर ताली बजानी पड़ी, जबकि अवधेश जी आराम से दूसरा गुलाब जामुन उठाने लगे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३५ – बॉस की पुरानी डायरी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – बॉस की पुरानी डायरी)  

☆  चुभते तीर # १३५ – व्यंग्य  – बॉस की पुरानी डायरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के रिटायर्ड होते ही दफ़्तर की अलमारी की सफ़ाई का काम नए नवेले जूनियर क्लर्क रमन को सौंपा गया। अलमारी का निचला ड्रॉर पिछले बीस सालों से बंद पड़ा था। उसके ताले पर जंग की ऐसी मोटी परत चढ़ी थी जैसे किसी पुराने रिश्ते पर वक्त की धूल। जब रमन ने हथौड़ी से ताला तोड़ा, तो अंदर से कागज़ों के कबाड़ के बीच चमड़े के ज़िल्द वाली एक पुरानी काली डायरी निकली।

उस डायरी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’दफ़्तर के गुप्त रहस्य और तरक्की का अचूक मंत्र’।

रमन की आंखों में चमक आ गई। कॉर्पोरेट दुनिया में सीधे रास्ते से चलने वाले अक्सर दफ़्तर के दरवाज़े पर ही खड़े रह जाते हैं, जबकि शॉर्टकट वाले लिफ़्ट से सीधे पाँचवें माले पर पहुँचते हैं। रमन ने डायरी को अपनी जैकेट में छुपाया और चाय के टपरे पर जाकर पन्ने पलटने लगा।

डायरी में कोई सरकारी हिसाब नहीं था, बल्कि दफ़्तर के हर साहब की कमज़ोरियों का पूरा आलेख था। लिखा था कि बड़े साहब को जब गुस्सा आए तो अदरक वाली चाय में आधा चम्मच शहद डालकर दो, उनका गुस्सा मक्खन की तरह पिघल जाएगा। दूसरे साहब को अगर मीटिंग में हराना हो, तो बातों-बातों में उनकी पुरानी गाड़ी की तारीफ़ कर दो, वे खुश होकर हर फाइल पर दस्तखत कर देंगे।

रमन ने डायरी के हर पन्ने को किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह रट लिया। अगले दो महीनों में दफ़्तर में चमत्कार होने लगा। जो बड़े साहब बात-बात पर क्लर्कों पर गरजते थे, वे रमन को देखते ही मुस्कुराने लगते। जिसकी फाइलें तीन-तीन महीने लटकी रहती थीं, रमन का नाम लेते ही वो फाइलें हवा की रफ्तार से आगे बढ़ने लगतीं। पूरे दफ़्तर में फुसफुसाहट शुरू हो गई कि रमन पर ज़रूर किसी सिद्ध संत का हाथ है।

वार्षिक समीक्षा का दिन आया। इस बार ‘बेस्ट एम्पलाई’ के पुरस्कार के लिए रमन का नाम सबसे ऊपर था। पुराने सीनियर साहब, जो रमन की इस अचानक तरक्की से जलते थे, उन्होंने भरे हॉल में माइक संभाल लिया।

उन्होंने रमन पर निशाना साधते हुए कहा, “रमन ने काम क्या किया, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन इसके पास ज़रूर कोई ऐसी जादुई छड़ी है जिससे यह हर साहब को अपनी उंगलियों पर नचाता है। मैं मांग करता हूँ कि इसकी इस जादुई डायरी को सबके सामने पेश किया जाए!”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। रमन का दिल दहल गया। अगर डायरी का सच बाहर आया, तो उसकी नौकरी का जनाज़ा निकल जाएगा। रमन ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वह काली डायरी निकाली और मंच पर जाकर बड़े साहब के हाथ में थमा दी।

बड़े साहब ने चश्मा लगाया और डायरी का अंतिम पन्ना खोला, जो अब तक रमन ने भी नहीं पढ़ा था।

अंतिम पन्ने पर गुप्ता जी की लिखावट में लिखा था: “यदि आप यह डायरी पढ़ रहे हैं, तो समझ लीजिए कि यह कोई जादू नहीं है। दफ़्तर में काम कागज़ों से नहीं, इंसान के स्वभाव को समझने से होता है। जो इंसान अपनों का मूड समझ ले, वही असली अफ़सर है।”

बड़े साहब की आंखें भर आईं। उन्होंने डायरी बंद की और रमन को गले लगा लिया। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। रमन ने राहत की सांस ली और मन ही मन माना कि सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ वही है जो बिना लड़े मैदान जीत ले।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३४ – मुख्य अतिथि का भाषण – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – मुख्य अतिथि का भाषण)  

☆  चुभते तीर # १३४ – व्यंग्य  – मुख्य अतिथि का भाषण ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शास्त्री नगर की ‘साहित्य कला परिषद’ का वार्षिक उत्सव बिना किसी रोड़े के पूरा हो जाए, ऐसा होना सूरज के पश्चिम से निकलने जैसा असंभव था। इस बार का मुख्य आकर्षण थे प्रसिद्ध लेखक और विचारक डॉ. पी. एन. त्रिपाठी, जिन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। त्रिपाठी जी का एक ही असूल था—भाषण जितना लंबा और उबाऊ होगा, उनकी विद्वत्ता उतनी ही गहरी मानी जाएगी।

सभागार खचाखच भरा हुआ था। पहली पंक्ति में बैठे संस्था के अध्यक्ष गुप्ता जी बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे। शाम के सात बज चुके थे, और आयोजकों को डर था कि अगर भाषण आठ बजे से आगे खिंचा, तो पूरा हॉल खाली हो जाएगा क्योंकि पास के मैरिज हॉल में मुफ़्त का शाही भोजन तैयार हो रहा था।

त्रिपाठी जी मंच पर आए। उन्होंने अपने भारी-भरकम चश्मे को नाक पर टिकाया, कागजों का एक मोटा पुलिंदा मेज़ पर रखा और बोलना शुरू किया। विषय था: ‘आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों की गिरती हुई दीवारें और हमारी वैचारिक जिम्मेदारी’।

शुरुआती पंद्रह मिनट में ही ऑडिटोरियम में बैठे आधे लोगों की पलकें भारी होने लगीं। बीस मिनट बीतते-बीतते पीछे की पंक्ति के दो सदस्य गहरी नींद में खर्राटे लेने लगे। गुप्ता जी ने मंच के कोने में खड़े सचिव को इशारा किया कि किसी तरह भाषण समेटा जाए।

सचिव ने हिम्मत करके एक छोटी सी पर्ची पर लिखा—’सर, समय कम है, कृपया अंतिम निष्कर्ष पर आएं’—और उसे बड़ी चालाकी से पानी के गिलास के नीचे सरका दिया।

त्रिपाठी जी ने गिलास उठाया, पर्ची देखी, चश्मा ठीक किया और ज़ोर से बोले, “हमारे अध्यक्ष जी ने मुझे याद दिलाया है कि समय सीमा समाप्त हो रही है। लेकिन क्या विचार कभी समय के पाबंद हो सकते हैं? नहीं! इसलिए मैं अपने भाषण का दूसरा भाग प्रस्तुत करने जा रहा हूँ!”

यह सुनते ही दर्शकों के बीच एक ठंडी सी हरकत हुई। कई लोग उठकर भागने की ताक में दरवाज़े की तरफ देखने लगे। गुप्ता जी का पसीना छूटने लगा। अगर मेहमान भाग गए, तो अगले साल का चंदा डूब जाएगा।

तभी बिजली अचानक गोल हो गई। पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया।

लोग राहत की सांस लेने ही वाले थे कि त्रिपाठी जी की गर्जती हुई आवाज़ गूंजी, “अंधेरा मेरे विचारों की रोशनी को नहीं रोक सकता! मैं बिना माइक के भी जारी रखूँगा!” और वे अंधेरे में ही अपने कागज़ पढ़ने लगे।

तभी पीछे के दरवाज़े से एक छोटे बच्चे की मासूम आवाज़ गूंजी, “पापा! बाहर शाही पनीर और गुलाब जामुन खत्म हो रहे हैं, कैटरिंग वाले कह रहे हैं कि सिर्फ़ दस प्लेट बची हैं!”

फिर क्या था! बिजली आने से पहले ही पूरे हॉल में ऐसी भगदड़ मची कि पंद्रह सेकंड के अंदर पूरी जनता ऑडिटोरियम से बाहर मैरिज हॉल की तरफ दौड़ पड़ी। जब तीन मिनट बाद जनरेटर चालू हुआ, तो मंच पर केवल त्रिपाठी जी खड़े थे और सामने पूरे हॉल में सिर्फ़ खाली कुर्सियाँ उनका इंतज़ार कर रही थीं।

त्रिपाठी जी ने खाली हॉल की तरफ देखा, मुस्कराए और पानी का घूंट पीकर बोले, “देखा गुप्ता जी? मेरे भाषण का प्रभाव इतना तीव्र था कि लोग सत्य की खोज में तुरंत क्रियाशील हो गए!”

पीछे छुपे गुप्ता जी ने बाहर आकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाना शुरू कर दिया, यह सोचते हुए कि कम से कम गुलाब जामुन बचाने का विचार एकदम सटीक निकला।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३३ – वीआईपी पास का चक्कर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆  चुभते तीर # १३३ – व्यंग्य  – वीआईपी पास का चक्कर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शहर में गज़ल गायक उस्ताद मुश्ताक अली का प्रोग्राम था। यह कोई आम महफ़िल नहीं थी; यहाँ प्रवेश का मतलब था कि आप शहर के संभ्रांत और ‘कलाप्रेमी’ वर्ग में गिने जाते हैं। गुप्ता जी के पास प्रोग्राम का कोई टिकट नहीं था, लेकिन उनकी मूंछों का सवाल था। उनके पड़ोसी शर्मा जी सुबह से ही अपने ‘वीआईपी गोल्ड पास’ का रौब झाड़ रहे थे।

गुप्ता जी ने ठान लिया कि वे न सिर्फ़ प्रोग्राम में जाएंगे, बल्कि शर्मा जी से आगे वाली रो (Row) में बैठकर दिखाएंगे। उन्होंने अपने पुराने मित्र और नगर निगम में क्लर्क, रामदीन को फोन घुमाया। रामदीन ने बहुत जुगाड़ बिठाकर गुप्ता जी को एक काले रंग का लिफ़ाफ़ा थमा दिया और कहा, “गुप्ता जी, यह पास सीधा आयोजकों के मुख्य दफ़्तर से आया है। इसे दिखाकर सीधे पहली पंक्ति में बैठना।”

प्रोग्राम की शाम गुप्ता जी कड़क कुरता-पाजामा पहनकर ऑडिटोरियम पहुंचे। दरवाज़े पर सुरक्षाकर्मियों की लंबी कतार थी। शर्मा जी भी अपनी पत्नी के साथ लाइन में खड़े थे। गुप्ता जी ने अपनी मूंछों पर ताव दिया, शर्मा जी को एक विजयी मुस्कान दी और सीधे ‘वीआईपी एंट्री’ गेट की तरफ बढ़ गए।

गेट पर तैनात बाउंसरों ने गुप्ता जी को रोका, “सर, अपना पास दिखाइए।”

गुप्ता जी ने बहुत ही शान से अपनी जेब से वह काला लिफ़ाफ़ा निकाला और बाउंसर के हाथ में थमा दिया। बाउंसर ने लिफ़ाफ़ा खोला, अंदर रखा कार्ड देखा और उसकी आंखें फ़टी की फ़टी रह गईं। उसने तुरंत अपने साथी को इशारा किया। दूसरे बाउंसर ने आकर कार्ड देखा और मुस्कुराते हुए गुप्ता जी को सर झुकाकर प्रणाम किया।

“आइए सर, आपका ही इंतज़ार था,” बाउंसर ने बहुत ही इज़्ज़त के साथ कहा और उन्हें स्टेज के ठीक बगल वाले विशेष कमरे में ले गया।

गुप्ता जी का सीना चौड़ा हो गया। वे मन ही मन सोच रहे थे कि रामदीन ने ज़रूर किसी बड़े अफ़सर का पास दिलवा दिया है। दूर से खड़े शर्मा जी यह सब देखकर हक्के-बक्के रह गए थे।

दस मिनट बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। पर्दा उठा, उस्ताद मुश्ताक अली मंच पर पधारे। पूरे हॉल में तालियां गूंज उठीं। तभी आयोजक माइक पर आए और बोले, “सज्जनों, उस्ताद जी की महफ़िल शुरू करने से पहले, हम अपने मुख्य प्रायोजक और इस शाम के विशेष मेहमान का स्वागत करना चाहेंगे, जिन्होंने कलाकारों के जलपान की पूरी व्यवस्था की है—श्रीमान गुप्ता जी! कृपया मंच पर आएं और उस्ताद जी को हार पहनाएं!”

गुप्ता जी के होश उड़ गए। रामदीन ने जो पास दिया था, वह दर्शकों का नहीं, बल्कि ‘कैटरिंग स्पॉन्सर’ (खान-पान के मुख्य ठेकेदार) का वीआईपी पास था, जिसका सारा बिल गुप्ता जी के नाम फटने वाला था!

गुप्ता जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। लेकिन अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था। वे भारी कदमों से मंच पर गए, उस्ताद जी को हार पहनाया और माइक हाथ में लेकर बोले, “कला की सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं है। आज की शाम चाय और समोसे मेरी तरफ से आप सभी के लिए बिल्कुल मुफ़्त हैं!”

पूरा हॉल ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने लगा। शर्मा जी भी खड़े होकर ताली बजा रहे थे। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर मंच से हाथ हिलाया, यह सोचते हुए कि बैंक बैलेंस भले ही साफ़ हो गया हो, लेकिन मोहल्ले में इज़्ज़त का झंडा गाड़ दिया गया है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२८ ☆ व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२८ ☆

?  व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं।

सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत  की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा।

 लेखक को वर्षों की तपस्या , प्रकाशक की मिन्नत , जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा, “सम्मान अमूल्य होता है।” लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”

आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।

ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं।

डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र।

प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा।

शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।

महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।

सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी ।

हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर “टेक केयर” का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते ।

दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं।

अंत में लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”

और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३२ – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट)  

☆  चुभते तीर # १३२ – व्यंग्य  – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

वर्मा जी के घर में दिवाली की सफ़ाई किसी राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान से कम नहीं थी। इस अभियान के सेनापति थे वर्मा जी स्वयं, और उनकी एकमात्र सिपाही थीं उनकी पत्नी, जिनकी पारखी नज़र से सोफ़े के पीछे फंसी मकड़ी की जाली भी नहीं बच सकती थी। इस बार का मुख्य लक्ष्य था—ड्रॉइंग रूम का वह पुराना लाल सोफ़ा, जो पिछले दस सालों से एक ही जगह पर अंगद के पैर की तरह जमा हुआ था।

वर्मा जी ने गहरी सांस ली, अपनी धोती कसकर बांधी और सोफ़े को खिसकाना शुरू किया। सोफ़ा थोड़ा सा खिसका ही था कि उसके नीचे से धूल के बादलों के साथ लाल रंग का एक मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा बाहर निकला। वर्मा जी ने झट से झुककर उसे उठाया। वह दो सौ रुपये का एक पुराना नोट था। वर्मा जी के चेहरे पर ऐसी चमक आई जैसे किसी गोताखोर को समुद्र की गहराई में मोती मिल गया हो।

“अरे वाह! किस्मत हो तो ऐसी,” वर्मा जी ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा।

पत्नी ने तुरंत झाड़ू हाथ में संभाली और कड़क आवाज़ में बोलीं, “ज़्यादा खुश मत होइए, यह वही नोट है जो तीन महीने पहले आपके कुरते की जेब से गिरा था और आपने मुझ पर शक किया था कि मैंने चुरा लिया।”

वर्मा जी का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा, लेकिन सोफ़े के नीचे छिपे खज़ाने की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने सोफ़े को और ज़ोर से धक्का दिया। इस बार सोफ़े के कुशन के बीच की दरार से एक काला लिफ़ाफ़ा नीचे गिरा।

माहौल में अचानक सन्नाटा छा गया। लिफ़ाफ़े पर किसी का नाम नहीं लिखा था। वर्मा जी ने पत्नी की तरफ देखा, पत्नी ने वर्मा जी की तरफ। दोनों की आंखों में जासूसी वाली चमक थी।

“इसे मत खोलना,” पत्नी ने चेतावनी दी, “हो सकता है यह तुम्हारे किसी दोस्त की उधारी का हिसाब हो, जो तुम मुझसे छुपा रहे थे।”

“या फिर हो सकता है कि तुम्हारी उस सुनारी की पर्ची हो, जिसकी किश्त तुमने गुप्त रूप से जमा की थी,” वर्मा जी ने पलटवार किया।

दोनों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि दिवाली की सफ़ाई का युद्ध अब एक पारिवारिक अदालत में बदल चुका था। पड़ोस के शर्मा जी भी शोर सुनकर दरवाज़े पर आ खड़े हुए। मामला बहुत गंभीर हो चुका था। लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था और दोनों पक्ष उसे ऐसे घूर रहे थे जैसे वह कोई टाइम बम हो।

आखिरकार शर्मा जी को मध्यस्थ बनाया गया। शर्मा जी ने चश्मा सीधा किया, लिफ़ाफ़ा उठाया और कांपते हाथों से उसकी सील तोड़ी। अंदर से कागज़ का एक छोटा सा पन्ना निकला।

शर्मा जी ने पन्ना पढ़ा और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। वर्मा जी और उनकी पत्नी दोनों एक साथ चिल्लाए, “क्या लिखा है उसमें?”

शर्मा जी ने कागज़ सीधा करके दिखाया। उस पर लिखा था: “यदि आप यह लिफ़ाफ़ा पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपने आखिरकार दस साल बाद इस सोफ़े को खिसकाने की ज़हमत उठाई है। धन्यवाद! – सोफ़ा बेचने वाला दुकानदार।”

पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा। वर्मा जी और उनकी पत्नी ने एक-दूसरे को देखा, अपनी मूर्खता पर मुस्कुराए और ज़ोरदार तालियां बजाने लगे। दिवाली का बोनस भले न मिला हो, लेकिन दस साल पुरानी सुस्ती का जवाब ज़रूर मिल गया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६७ ☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ।)

बस यूँ ही, बैठे ठाले:-

☆ शेष कुशल # ६७ ☆

☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन – शांतिलाल जैन 

थैंक यू मि. स्टीव चेन, आपने स्किप का बटन बनाया. न बनाया होता तो चिढ़, खीज और झुँझलाहट के मारे अपन इतने बाल नोंच चुके होते कि आनेवाले सात जन्मों तक गंजे ही जन्म लेते.

सोचिए श्रीमान्. आप यू-ट्यूब पर हैं. डियर शशांक दुबे की रिकमंडेशन पर, शंकर-जयकिशन की धुन पर, लता मंगेशकर के गाने पर झूम रहे हैं. ‘अज़ीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू..’ कि एक चीनी मास्टर आपको रोज़ाना 15 मिनट ताई-ची करने को कह रहा है. अनचाहे ही, थोड़ी-थोड़ी देर में वो आपसे मुख़ातिब होता है, बाहर झूलती तोंद से निजात दिलाने का पैकेज आपको बेचना चाहता है. आप खीजते हैं,  झल्लाते हैं,  फिर स्क्रीन पर स्किप बटन के उभरने का बेसब्री से इंतिज़ार करते हैं. अब आपने साँस रोक ली है, चौकन्ने हो गए हैं, पूरी एकाग्रता से तर्जनी तैयार करके रखी है, स्किप का बटन उभरा और आपने दबाया. थैंक गॉड. राहत की एक लम्बी सांस ले पाए आप. कॉकरोच जैसी जीजिविषा वाले विज्ञापनों को आप किल तो नहीं कर पाए मगर कुछ देर के लिए निजात पा लेते हैं. वे फिर आएँगे. बार-बार आएँगे. तर्जनी अभिशप्त है. वो ईवीएम का बटन दबाए कि स्किप का – जिन्हें हटाना चाहती है वे ही बार बार लौट आते हैं.

स्किप एक जिद्दी बटन है श्रीमान्. समय से पहले हटेगा नहीं. टाईमर लगा होता है. स्किप ऐड इन फ़ाईव सेकंड्स. यही पाँच सेकंड्स आपके सुभाव में सेरेनिटी, आपके धैर्य, आपकी सहनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं. आप फेल भी हो सकते हैं. फिंगर है श्रीमान्, टारगेट से चूकी और एक विज्ञापन सा खुल जाता है, आप संसार के सबसे लक्की फेलो हैं. बस एक क्लिक और!! ये आपकी दुनिया बदल सकता है. जीवन में हर कष्ट स्थायी नहीं होता, कुछ कष्ट केवल पाँच सेकंड्स के होते हैं, लेकिन दिन में कई-कई बार होते हैं. निदान की शर्त बस इतनी कि आपकी नज़र स्क्रीन पर बनी रहे और आपकी अंगुली सही समय पर सही स्थान पर पहुँचे.

इन दिनों राष्ट्रीय प्रतीकों के बदलने की बहस सी चल रही है. स्किप बटन को राष्ट्रीय बटन घोषित करने का यही सही समय है. स्किप सही मायनों में समाजवादी, लोकत्रांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष बटन जो ठहरा. संविधान के अनुच्छेद 15 का अनुपालन करता है. धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करता. स्त्री पुरुष, गरीब अमीर, शहरी ग्रामीण, अगड़ों-पिछड़ों के, सबके फोन में समभाव से उभरता है. ये भजन के बीच भी उसी शिद्दत से उभर आता है जिस शिद्दत से गुरबानी, कव्वाली या साम-गीत के दौरान उभरता है. जाने किस धातु का बना है, रात में भी आराम नहीं करता. जब आप भारत में सो रहे होते हैं तब ग्लोब के दूसरी ओर की दुनिया के लोग इसे दबा रहे होते हैं. ईडन गार्डन से सिलिकॉन वैली तक मानव सभ्यता के सफ़र में सबसे ज्यादा दबाए जानेवाला बटन कोई है तो वो स्किप का बटन है. आदम और हव्वा के बीच सेब तो अब भी एक ही है,  मोबाईल दो हो गए है. सेब तो बाद में भी खा लेंगे फ़िलवक्त दोनों अपने अपने स्किप दबाने में बिजी हैं. अंगुली और स्किप बटन के बीच जुगलबंदी कुदरत की सबसे बड़ी सौगात है. 

एक अनुमान है कि दुनियाभर में तर्जनियाँ एक दिन में कोई टेन मिलियन टाईम्स तो स्किप का बटन दबा ही लेती हैं. इंसा इन दिनों परमात्मा को कम याद करता है, स्किप ज्यादा दबाता है. लोग सारांश पढ़ते हैं, किताबें स्किप कर जाते हैं. रील देखते हैं, व्याख्यान स्किप कर जाते हैं. हेडलाइन पढ़ते हैं, विश्लेषण स्किप कर जाते हैं. स्किप संस्कृति की जकड़ में है समय समाज. बाज़ार ने सभ्यता के दाएँ कोने में एक अदृश्य स्किप बटन लगा दिया है, जहाँ सिर्फ मैं और मेरी पसंद ही मायने रखती हैं बाकी कसमें-वादे, प्यार-वफ़ा, रिश्ते-नाते सब कुछ स्किप किए जा सकते हैं.

स्किप स्कूल के जमाने में अपन का सबसे पसंदीदा एक्शन हुआ करे था, क्लास स्किप करना सबसे पसंदीदा शग़ल था, बेंत की मार पड़ा करती थी. पिताजी को भी हमें जुतियाने का चाहत भरा अवसर मिल जाया करता. इसके बावजूद स्किप अपन का पसंदीदा एक्शन बना रहा. आज भी सबसे पसंदीदा एक्शन है. थैंक यू मि.स्टीव चेन.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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