हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य  – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

मनुष्य के जीवन में ‘संकल्प’ और ‘समोसे’ का वही रिश्ता है जो चूहे और बिल्ली का होता है। आप कितनी भी बड़ी ‘डाइट कंट्रोल’ की दीवार खड़ी कर लें, एक गरम समोसा उस दीवार के नीचे से ‘सुरंग’ बनाकर आपके आत्मबल को धराशायी कर देता है। हमारे मित्र ‘गजाधर बाबू’ ने जब से डॉक्टर की यह बात सुनी कि उनका शरीर अब ‘इंसानी शरीर’ कम और ‘फैट का गोदाम’ ज्यादा लग रहा है, उन्होंने ‘डाइट’ का भीषण व्रत ले लिया।

गजाधर बाबू ने घोषणा कर दी कि अब वे केवल ‘घास-फूस’ यानी सलाद पर जीवित रहेंगे। उनके डाइनिंग टेबल पर अब खीरे, ककड़ी और उबली हुई लौकी का साम्राज्य था। वे इन चीजों को ऐसे देखते थे जैसे कोई मुजरिम अपनी हथकड़ियों को देखता है। श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहें तो, गजाधर बाबू का यह त्याग वैसा ही था जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी रिटायरमेंट के बाद ‘सत्य और अहिंसा’ पर प्रवचन देने लगे।

लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम गजाधर बाबू दफ्तर से लौट रहे थे। रास्ते में ‘मुन्ना हलवाई’ की दुकान थी। मुन्ना हलवाई के यहाँ समोसे तलने की क्रिया किसी ‘यज्ञ’ से कम नहीं होती। कड़ाही में खौलता हुआ तेल, और उसमें गोते खाते हुए सुडौल समोसे—जैसे स्वर्ग की अप्सराएँ अमृत कुंड में स्नान कर रही हों।

समोसे की वह सोंधी खुशबू जब गजाधर बाबू की नासिकाओं से टकराई, तो उनके ‘डाइट संकल्प’ के फेफड़े फूलने लगे। उनका मन चिल्लाया— “भाग गजाधर, ये मायाजाल है!” पर उनका पेट पलटकर बोला— “अबे रुक! देख तो सही, आलू का वो श्रृंगार, मसालों की वो जुगलबंदी!”

गजाधर बाबू दुकान के सामने ऐसे ठिठक कर खड़े हो गए जैसे कोई सन्यासी अपनी पुरानी प्रेमिका को देख ले। उन्होंने सोचा, “एक समोसे से क्या होगा? न्यूटन ने भी तो कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, तो एक समोसे की प्रतिक्रिया में मैं कल दो किलोमीटर ज्यादा चल लूँगा।” यह वह तर्क है जो दुनिया का हर डाइट करने वाला इंसान खुद को ‘बेवकूफ’ बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।

वे दुकान के करीब पहुँचे। समोसा एकदम गरम था, उसकी पपड़ी ऐसी कुरकुरी कि छूने मात्र से ‘साहित्यिक संगीत’ पैदा हो। गजाधर बाबू ने समोसे को हाथ में लिया। वह उनके हाथ में ऐसे थिरक रहा था जैसे कोई नवजात शिशु। उन्होंने उसे चटनी में डुबोया—हरी चटनी यानी तीखा प्रहार और लाल चटनी यानी मीठा धोखा।

जैसे ही उन्होंने पहला निवाला लिया, उन्हें लगा कि उनके भीतर की ‘कैलोरी’ पुलिस ने हड़ताल कर दी है और ‘कोलेस्ट्रॉल’ के गुंडे जश्न मनाने लगे हैं। स्वाद ऐसा कि उन्हें लगा जैसे मोक्ष का द्वार उनके तालू में खुल गया है।

गजाधर बाबू अभी दूसरे समोसे पर हाथ साफ़ कर ही रहे थे कि अचानक उनके पीछे एक परिचित आवाज़ गूँजी— “अरे गजाधर भाई! ये क्या? आप तो कह रहे थे कि अब आप केवल उबला हुआ पानी और हवा खाकर जिएंगे?”

पीछे उनके डॉक्टर खड़े थे, जो खुद हाथ में ‘जलेबी’ का दोना थामे हुए थे। गजाधर बाबू का समोसा उनके हाथ में ही जम गया। वे हड़बड़ाए, पर हार मानने वाले कहाँ थे।

गजाधर बाबू ने बड़ी गंभीरता से कहा, “अरे डॉक्टर साहब, आप गलत समझ रहे हैं। दरअसल मैं तो इस समोसे का ‘पोस्टमार्टम’ कर रहा था। मैं देख रहा था कि मुन्ना हलवाई इसमें कितना ‘हानिकारक’ फैट डालता है, ताकि मैं कल सुबह ग्रुप में सबको इसके नुकसान बता सकूँ। और आप? आप ये जलेबी क्यों ले रहे हैं?”

डॉक्टर साहब ने भी बिना पलक झपकाए जवाब दिया, “मैं? मैं तो इस जलेबी की ‘कुंडली’ चेक कर रहा था कि आखिर ये इतनी टेढ़ी क्यों होती है! विज्ञान के लिए बलिदान देना पड़ता है गजाधर बाबू!” अब दोनों ‘विज्ञानी’ एक-दूसरे की चोरी पर हाथ मिला चुके थे और मुन्ना हलवाई सोच रहा था कि अगर ये दोनों वैज्ञानिक हैं, तो फिर ‘पागल’ कौन है!

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२ – व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२

☆ व्यंग्य – बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।

“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”

हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”

बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”

“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।

सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।

सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।

अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।

सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।

बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।

उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।

—– 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

29-01- 2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – हास्य – व्यंग्य ☆ अरी भागवान – क्यों लाल पीली हो रही हो…? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ अरी भागवान – क्यों लाल पीली हो रही हो…? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

-अरे अरे,ये क्या ले आये ? धनिया, पालक,चुकंदर, मेहंदी, अनार, पलाश — मैंने तो रंग- गुलाल लाने कहा था।

— रंग ही तो लाया हूँ। ध्यान से देखो —

हुस्न रंगीन है न सादा है

बस अपनी अपनी निगाह होती है

— मेरी निगाह दुरुस्त है। मजाक ऐसा भी करते हैं क्या।

— मैं तो होली के मूड में हूं। मजाक तो शेयर मार्केट जनता के अरमानों से कर रहा है। धम्म धड़ाम धड़ाम धप्प–!

— तुम्हें ना हर बात में राजनीति का रंग पोतने की आदत है।आज तो बख्श़ दो।नेता क्यों नहीं बन जाते ?

— कैसे बनूँ।ईमानदार हूँ।

— आप ही बताओ अब टोटो को क्या जवाब दूँ।वो कब से इंतज़ार कर रहा है।

— ऐसे कहो ना।तुम्हें सिंथेटिक रंग चाहिए।

— और क्या !जो जमाना कर रहा है उससे अलग चलकर क्या बताना चाहते हो ?

तुम मुझे किम जोंग तो नहीं कह रही हो।

— लगता है तीर निशाने पर लगा है।

और ये कोकोनट ऑइल और क्रीम किसलिए?

— छोड़ो भागवान।बहुत कुछ तुम्हारे बस का नहीं है।चलो पुराने कपड़े निकाल दो।

— ‘सारे होलीयाने मौसम का कचरा कर दिया।तुम कब सुधरोगे ?

— जब ट्रंप सुधरेंगे।ही ही ही ही

तुम खुद को जेलेंस्की समझ रही हो क्या ?

— नहीं मैं जार्जिया मेलोनी समझूं, तुम्हें क्या !

एक और पैकेट है।दही और बेसन।चालीस में ही सठिया गये हो लगता है।हे भगवान।तुम्हें क्या हो गया है।

— मुझे रंगरोग हो गया हो।तुम समझती क्यों नहीं।

— ‘तो समझाओ ना

— आओ ना। थोड़ा और करीब आओ। नज़र तो मिलाओ।

— लगता है रोमांस की भाँग चढ़ गयी है।

— एक दिन तो रंगीन होने दो। यह पति का संवैधानिक मूलभूत अधिकार है। सरकारें आयेंगी जायेंगी पर इसमें अमेंडमेंट नहीं होने वाला।

— पड़ोसन आ रही है।

— आने दो।काहे का डर है।बाली उमर है।

— तुमसे तो बात ही करना बेकार है।

— तो चीत करो ना।बातचीत बन जायेगी।

— देखो डार्लिंग। अब काम की बात करें। रासायनिक रंगों से तौबा करो। इनसे कैंसर, अंधत्व और त्वचा रोग का खतरा रहता है।

रंग खेलने से पहले धूप का चश्मा लगाओ। रंग न छूटे तो दही बेसन का लेप लगाओ।

— हां जी सच कहते हो हर्बल रंगों का ही उपयोग करना चाहिए

— ‘अरे अरे अरे– ये क्या तुमने तो टेसू के रंग से रंग डाला।

— खुद को फन्ने खाँ समझते हो। मैं पहले ही टेसू उबाल चुक थी।

ही ही ही ही।नहले पे दहला।

बुरा न मानो होली है। होली है भई होली है। कबीरा सर र र, सर र र।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – हास्य-व्यंग्य ☆ सौम्य, सरल, सर्वप्रिय! ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 हास्य-व्यंग्य – सौम्य, सरल, सर्वप्रिय! 🌷

वाटिका में भ्रमण के उपरांत, देवी अपनी सखी के संग, प्रासाद के प्रवेश द्वार पर पहुँची ही थीं कि दृष्टि ठिठक गई। यह क्या! द्वारपाल के बगल में साक्षात् नारद मुनि, अपनी वीणा हाथों में थामे, विराजमान हैं। मुख पर वही शाश्वत मुस्कान, जैसे युगों से समस्त लोकों का रहस्य जानकर भी निष्पाप बने हों।

“नारायण, नारायण! एक लघु निवेदन है,” उन्होंने वीणा के तारों को हलके से झंकृत करते हुए कहा, “संध्याकाल में भीतर देवियाँ गोष्ठी करती हैं। अति आनंददायक! हास्य, विनोद, रस-परिहास—सब कुछ। आपकी भी उपस्थिति प्रार्थनीय है। अवश्य पधारें!”

वीणा के स्वरों ने मानो आकाश में अदृश्य कमल खिला दिए। वे स्वर ऐसे थे कि वायु भी ठिठककर सुनने लगे। देवियों के हृदय में उनके स्मरण का एक कोमल कक्ष निर्मित हो गया—जहाँ वे प्रतिदिन संध्या से पूर्व जाकर विराजते।

संध्याकाल में वे गोष्ठी स्थल के आसपास अपनी वीणा के तार झंकृत करते दृष्टिगोचर होते। कभी किसी की आरती की थाली सँभाल देते, कभी किसी की पायल का टूटा घुँघरू जोड़ देते। संरक्षण का ऐसा भाव कि मानो स्वयं त्रिलोक के अभिभावक हों। देवियाँ उनके इस सौजन्य से अभिभूत रहतीं—“देखो, कितने सज्जन हैं! कितने सरल!”

और वे, अत्यंत विनीत भाव से, थोड़ी दूरी पर खड़े रहकर भी सबके निकट बने रहते—जैसे चन्द्रमा, जो स्पर्श तो नहीं करता, पर प्रकाश से सबको अपने घेरे में ले लेता है।

महाशिवरात्रि का पर्व निकट आया। पुनः वही मधुर मुस्कान, वही सम्मोहन।

“शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में अति सुंदर आयोजन है। अवश्य पधारें, महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करें,” उन्होंने कहा।

उत्सव की संध्या पर वे भोले बाबा-सी अलमस्त चाल में चहुं दिशा विचरते रहे। कहीं दीपक प्रज्वलित करा रहे हैं, कहीं भस्म का तिलक लगा रहे हैं। देवियाँ श्रद्धा से गदगद। कोई कहे—“क्या तपस्वी पुरुष हैं!” कोई कहे—“कितने सजग, कितने सतर्क!”

किंतु अद्भुत यह कि जहाँ-जहाँ देवियाँ एकत्र हों, वहीं-वहीं वे अनायास प्रकट हो जाते—जैसे वसंत की हवा, जिसे किसी ने बुलाया न हो, फिर भी वह आ ही जाती है।

और आज—होली का दिवस।

वह कृष्ण-कन्हैया मुद्रा में हैं। अधर पर मुरली, नेत्रों में अर्धनिमीलित करुणा और चपलता का संगम। गोपिकाएँ उन्हें घेरे हुए हैं। गुलाल और पुष्पों की वर्षा हो रही है। वातावरण में रंगों का ऐसा जादू कि स्वयं इन्द्रधनुष भी ईर्ष्या से फीका पड़े।

उनकी सौम्यता आज भी अक्षुण्ण है। मुख पर वही सहजता, मानो कुछ हुआ ही न हो। परन्तु रंग की एक महीन परत उनके वस्त्रों पर नहीं, उनके चारों ओर फैली प्रतिष्ठा पर भी चढ़ती प्रतीत होती है।

आँखें मूँदकर, वे मन ही मन गुनगुना रहे हैं—

“रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे…”

वीणा के तार जैसे स्वयं ही थिरक उठते हैं।

देवियाँ हँसती हैं, इठलाती हैं, उन्हें और रंगती हैं। और वे—सबके प्रिय, सबके हितैषी, सबके ‘अपने’—रंगों के इस महासमर में भी अदृश्य मर्यादा की रेखा खींचे रहते हैं, जिसे कोई देख नहीं पाता, पर सभी मानते अवश्य हैं।

लोक-लाज के आँगन में, भलमनसाहत की ओट में, उनका यह चिर-परिचित चरित्र यूँ ही विचरता रहता है—

सौम्य, सरल, सर्वप्रिय।

(बुरा न मानो, होली है!)

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२५ ☆ व्यंग्य – विदेश का गड़बड़झाला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘विदेश का गड़बड़झाला‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विदेश का गड़बड़झाला   

ऑस्ट्रेलिया से एक भारतीय लड़की ने वीडियो डाला। लड़की ने वहां के सिस्टम के बारे में जो बताया उसे सुनकर बहुत परेशान हूं। बताया कि  वहां भुगतान मेहनत के हिसाब से मिलता है, शैक्षणिक योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं। एक घंटे के श्रम के 25 डॉलर मिल जाते हैं और आदमी दिन में कम से कम 50 डॉलर कमा ही लेता है।

लड़की ने यह भी बताया कि वहां सबसे ज़्यादा भुगतान शारीरिक श्रम करने वालों— जैसे प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, खदान श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों— को मिलता है। इन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ का नाम दिया जाता है, और समाज में सबको बराबर सम्मान मिलता है, कोई ऊंचा नीचा का भेद नहीं।

लड़की की बात सुनकर दिमाग ख़राब हो गया। यह कैसा देश है, भाई, जहां पांचों उंगलियों को बराबर माना जाता है। हमारे देश में ऐसा हो जाए तो हाहाकार मच जाए। फिर जाति- प्रथा का मतलब ही क्या रह जाएगा? ऑस्ट्रेलिया में जिन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ कह कर अच्छा वेतन देते हैं उन्हें यहां दिन में चार-पांच सौ कमाने में देवता याद आ जाते हैं। समाज में इज़्ज़त पाने की बात करें तो  देश में इन ‘प्रोफेशनल्स’ को कोई बैठने के लिए स्टूल नहीं देता, कुर्सी की बात छोड़ दीजिए। ज़्यादातर को शस्य श्यामला भूमि पर ही आसन मिलता है। ‘डिगनिटी ऑफ लेबर’ यानी श्रम की प्रतिष्ठा का यह हाल है कि बड़ा आदमी वही माना जाता है जो अपने हाथ से लेकर पानी भी न पिये।

ऑस्ट्रेलिया जैसा किस्सा न्यूज़ीलैंड का भी सुनने को मिला था जहां मेरे एक परिचित प्रोफेसर किसी अध्ययन के लिए गये थे। वहां उनके दफ्तर में सफाई कर्मी आता था जिसे ‘जेनिटर’ कहते थे। जब प्रोफेसर साहब के भारत लौटने का वक्त आया तो जेनिटर ने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया और शाम को उन्हें अपनी कार से घर ले गया। वहां उनके लिए विशेष तौर से शाकाहारी भोजन तैयार कराया गया था। मैंने सोचा कि यदि भारत में कोई सफाई कर्मचारी हमें भोजन के लिए आमंत्रित करे तो हम उस आमंत्रण से बचने की कोशिश करेंगे। सोचेंगे कि इस बंदे के पास खुद के खाने को है या नहीं, या हमें ऐसे ही न्योत रहा है। लगेगा कि उसका दिमाग़ चल गया है।

हमारे यहां सबसे अधिक पैसा उन्हें मिलता है जो कम से कम श्रम करते हैं। कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों का भुगतान लाखों में होता है, लेकिन काम का आकलन कोई नहीं। इसीलिए मोटापे और उच्च रक्तचाप का रोना आम है। शारीरिक श्रम करने वाले का जीवन एक-एक दिन के हिसाब से चलता है। कल का कोई भरोसा नहीं। कभी एक अधिकारी के बारे में सुना था जिन्होंने अपना एक कोट कुर्सी पर स्थायी रूप से टांग दिया था। वे खुद दफ्तर से ग़ायब रहते थे, लेकिन किसी के पूछने पर कोट की तरफ इशारा कर दिया जाता था कि ‘यहीं कहीं गये हैं।’ ऐसे ही नौकरी करते-करते वे वैतरणी पार कर गये।

कुर्सी की शोभा बढ़ाने वालों को तनख्वाह के अलावा एक और भत्ता मिलता है जिसे रिश्वत-कम-कमीशन भत्ता कहते हैं। जितना बड़ा और ताकतवर पद, उतना ही ज़्यादा रिश्वत-भत्ता। कई अफसर हर सरकार के प्रियपात्र बने रहते हैं तो कई हर सरकार की आंख में चुभते हैं। हरियाणा में आई. ए. एस. खेमका जी हर छः महीने में ट्रांसफर झेलते अंततः रिटायर हो गये। उनके रिटायर होने पर बहुतों ने राहत की सांस ली होगी।

दूसरी तरफ, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक को पूरी मज़दूरी मिल जाए, वही बहुत है। उसमें भी ठेकेदार का कमीशन कटता है। बिना सुरक्षा- उपकरण के कहीं बिजली के खंभे पर सुधार के लिए चढ़ा दिया जाता है तो कहीं बिना सुरक्षा- उपकरण के गैस से भरे सीवर में उतार दिया जाता है। ‘चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम।’

ऐसे में हमें लगता है कि हमें अपने देश से परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन की तरह कुछ अधिकारियों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में भेजना चाहिए जो वहां के सिस्टम में ज़रूरी सुधार करवा सकें। अभी तो लड़की की बातें सुनकर मेरे दिमाग़ ने काम करना बन्द कर दिया है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८३ – व्यंग्य – जहाँ नेहियाँ बोलता है और गोपाल दुबे सुनते हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाक्टरेट ऑन डिस्काउंट)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८३ – व्यंग्य  – जहाँ नेहियाँ बोलता है और गोपाल दुबे सुनते हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाँव नेहियाँ का भूगोल भले सरकारी कागज़ों में छोटा दर्ज हो, पर उसका सामाजिक ब्रह्मांड इतना फैला हुआ है कि हर आदमी खुद को उसका ध्रुवतारा समझता है। इसी ब्रह्मांड के केंद्र में, ठीक वहाँ जहाँ सड़क वर्षों से विकास की कहानी सुनाती हुई सीधी और चमकदार खड़ी है, मेरे जीजा गोपाल दुबे की पान की दुकान मौजूद है—मानो लोकतंत्र का असली दफ्तर यहीं चलता हो। सुबह होते ही दुकान पर ऐसी भीड़ लगती है जैसे पंचायत, संसद और गली-मोहल्ले की अदालत एक साथ बैठ गई हो। कोई पान लेने आता है, कोई ताज़ा खबर सुनाने, और कुछ लोग तो सिर्फ अपनी राय थूकने आते हैं। जीजा हर ग्राहक का स्वागत ऐसी स्थिर मुस्कान से करते हैं जैसे उन्हें जन्म से ही सार्वजनिक सहनशीलता का ठेका मिला हो। लोग खेती से लेकर राजनीति और पड़ोसी की बकरी तक पर फैसला सुना देते हैं, और जीजा कत्था लगाते हुए सिर हिलाते रहते हैं। नेहियाँ में आम धारणा है कि अगर धैर्य को बोतल में बंद किया जाए, तो उस पर जीजा की दुकान का लेबल लगेगा।

दिन के उजाले में यह दुकान शिष्टाचार की प्रदर्शनी लगती है। लोग आते हैं, पान लेते हैं, दाम चुकाते हैं और जाते समय “राम-राम” कहकर अपनी सभ्यता की रसीद जमा कर देते हैं। लेकिन सूरज ढलते ही नेहियाँ का सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाता है। कुछ ग्राहक ऐसे प्रवेश करते हैं जिनकी चाल से लगता है कि धरती से उनका समझौता अस्थायी है। वे आते ही भाषा को इस तरह मरोड़ते हैं कि शब्द भी किनारे खड़े होकर सोचें—हमने ऐसा क्या अपराध किया। जीजा इस भाषाई उथल-पुथल के बीच वैसे ही शांत रहते हैं जैसे ध्यानस्थ साधु; फर्क बस इतना कि यहाँ धूप-दीप की जगह कत्थे और तंबाकू की खुशबू है। सामने खड़ा व्यक्ति आवाज़ ऊँची करके अपनी वीरता साबित कर रहा होता है और जीजा उसी नाप-तौल से पान लगाते हैं, मानो कह रहे हों—बोल लो भाई, आखिर में सब चबाया ही जाएगा।

रात के ये ग्राहक संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन करते हैं। हर वाक्य ऐसा फेंकते हैं जैसे अखाड़े में दांव चला रहे हों। जीजा चाहें तो दो तमाचे रखकर भाषाई सुधार अभियान चला दें, पर कानून का खयाल उनके कंधे पर बैठे समझदार सलाहकार की तरह हमेशा मौजूद रहता है। वे मन ही मन हिसाब लगाते हैं—गुस्सा अभी, झंझट बाद में क्यों मोल लें। इस गणित ने उन्हें ऐसा संत बना दिया है कि तपस्या करने वाले भी उनसे प्रशिक्षण लेना चाहें। ग्राहक गरजते हैं, मेज थपथपाते हैं, और जीजा बस इतना पूछते हैं—“मीठा रखूँ?” यह सवाल ऐसा जादू करता है कि आधी बहादुरी कत्थे में घुल जाती है। नेहियाँ के लोग कहते हैं कि अगर संयम की दौड़ हो, तो जीजा बिना दौड़े जीत जाएँ।

गाँव वालों ने इस दुकान को अनौपचारिक मनोरंजन केंद्र घोषित कर रखा है। लोग थोड़ा दूर खड़े होकर तमाशा देखते हैं—आज कौन क्या बोलेगा, जीजा कितना सहेंगे। बुजुर्ग इसे धैर्य प्रशिक्षण शिविर कहते हैं और दावा करते हैं कि जो आदमी यहाँ एक हफ्ता टिक जाए, उसे जीवन में कोई नहीं हिला सकता। रात के ग्राहक जब आवाज़ ऊँची करते हैं, तो दर्शक ऐसे आनंद लेते हैं जैसे मुफ्त का नाटक चल रहा हो। कोई मुस्कुराता है, कोई कानाफूसी करता है, पर जीजा अपनी लय में पान बनाते रहते हैं। उनका हाथ मशीन की तरह चलता है, चेहरा शांत रहता है, और वातावरण में हास्य की महीन परत फैल जाती है—ऐसी कि तनाव भी हँसते-हँसते हल्का हो जाए।

जीजा की दुकान नेहियाँ का असली लोकतंत्र है जहाँ कत्था, चूना और सुपारी सबको बराबरी का दर्जा देते हैं। दिन में जो लोग एक-दूसरे से दूरी बनाकर चलते हैं, रात को एक ही कतार में खड़े पान का इंतज़ार करते मिलते हैं। नशे की हालत में कुछ ग्राहक खुद को भाषण विशेषज्ञ समझ लेते हैं और जीजा से ऐसे उलझते हैं जैसे किसी बहस का अंतिम दौर चल रहा हो। जीजा हर तर्क का जवाब पान से देते हैं। उनका सिद्धांत सरल है—बहस जितनी लंबी होगी, पान उतना मीठा होना चाहिए। धीरे-धीरे ग्राहक बोलते-बोलते चबाने लगते हैं और उनका जोश सुपारी के साथ ठंडा पड़ जाता है।

नेहियाँ की सड़कें अपने आप में विकास का प्रमाणपत्र हैं—सीधी, चमकदार और इतनी समझदार कि बाहर से आने वाला आदमी प्रभावित हुए बिना न रहे। पर यही सड़क शाम ढलते ही गाँव के असली चरित्र की परेड देखने लगती है। गंजेड़ी ऐसे टहलते हैं मानो हवा की गुणवत्ता की निजी जाँच कर रहे हों। नशेड़ी अपने कदमों से नई ज्यामिति रचते हैं—सीधी सड़क पर तिरछा चलने की कला का जीवंत प्रदर्शन। पियक्कड़ हर खंभे को पुराना दोस्त समझकर उससे संवाद करते मिल जाते हैं। और गालीबाज भाषा को ऐसे उछालते हैं जैसे शब्द कोई खिलौना हों। सड़क चुपचाप यह सब सहती रहती है—ऊपर से विकास, नीचे से मानवीय विविधता। यह दृश्य ऐसा है जहाँ चमकती डामर और लड़खड़ाते कदम मिलकर नेहियाँ का सबसे सच्चा व्यंग्य रचते हैं।

रात गहराती है तो यही सड़क सामाजिक रंगमंच बन जाती है। दिन में जिस पर बच्चे साइकिल चलाते हैं, रात में वही मंच बनकर मानवीय आदतों का खुला प्रदर्शन करती है। गंजेड़ी दार्शनिक मुद्रा में खड़े होकर जीवन के ऐसे निष्कर्ष सुनाते हैं जिन्हें सुनकर दीवारें भी सोच में पड़ जाएँ। नशेड़ी संतुलन की अपनी निजी परिभाषा गढ़ते हुए चलते हैं, और पियक्कड़ ऊँची आवाज़ में दुनिया सुधारने का संकल्प लेते हैं। गालीबाज भाषा की ऐसी कसरत करते हैं कि शब्द खुद विश्राम माँग लें। मज़े की बात यह है कि सड़क हर रात यह सब देखकर सुबह फिर वैसी ही मासूम दिखती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। नेहियाँ के लोग हँसकर कहते हैं—हमारी सड़क तो शरीफ है, बस उस पर चलने वाले चरित्रवान होने का अभ्यास कर रहे हैं।

नेहियाँ के बच्चे यह सब देखकर बड़े हो रहे हैं। वे सीख रहे हैं कि असली ताकत हाथ उठाने में नहीं, हाथ रोक लेने में है, और हँसकर टाल देने में भी एक किस्म की जीत छिपी होती है। जीजा का धैर्य अब लोककथा बन चुका है। लोग कहते हैं कि अगर सहनशीलता का मंदिर बने, तो पुजारी वही होंगे। रात की आवाज़ें चाहे जितनी ऊँची हों, जीजा की शांति पुरानी घड़ी की टिक-टिक जैसी स्थिर रहती है। ग्राहक आते हैं, अपनी भड़ास निकालते हैं, और पान के साथ उसे निगल भी जाते हैं। यह रोज़ का अभ्यास नेहियाँ को सिखा रहा है कि हास्य और संयम मिलकर सबसे बड़ी आग को भी धुआँ बना सकते हैं।

एक रात एक महाशय ऐसे जोश में आए कि शब्दों की रेलगाड़ी बिना ब्रेक दौड़ा दी। भीड़ जमा हो गई, मानो कोई ऐतिहासिक क्षण घटने वाला हो। जीजा ने शांत स्वर में कहा—“पहले पान खा लीजिए, बाकी दुनिया बाद में सुधार लीजिए।” इतना सुनना था कि आसपास खड़े लोग हँसी से दोहरे हो गए। महाशय भी पान मुँह में दबाकर शांत हो गए, जैसे कत्थे ने उनके जोश पर हल्का विराम लगा दिया हो। उस क्षण नेहियाँ ने समझ लिया कि हास्य सबसे असरदार जवाब है—बिना टकराव, बिना हंगामे। जीजा ने फिर उसी सहजता से अगला पान लगाना शुरू कर दिया, मानो जीवन अपनी पटरी पर लौट आया हो।

आज नेहियाँ में जीजा की दुकान सिर्फ पान बेचने की जगह नहीं, सामाजिक प्रयोगशाला है जहाँ रोज साबित होता है कि धैर्य, हास्य और समझदारी मिल जाएँ तो हर तूफान तमाशा बन जाता है। जीजा हर रात शब्दों की आँधी झेलते हैं और सुबह फिर उसी मुस्कान के साथ दुकान खोल देते हैं। गाँव वाले मानते हैं कि असली ताकत वही है जो हाथ नहीं उठाती, बल्कि माहौल को हल्का कर देती है। उनकी दुकान पर हँसी इतनी खुलकर बहती है कि कभी-कभी लगता है—अगर हँसी का वजन किया जाए, तो नेहियाँ की धरती थोड़ा झुककर सलाम कर दे।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५९ ☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ।)

☆ शेष कुशल # ५९ ☆

☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए – शांतिलाल जैन 

विक्रम सम्वत् 2103, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी, दिनांक 18 अगस्त, 2047, रविवार. इंद्रलोक में आज साप्ताहिक अवकाश है. सभा में अप्सराएँ नृत्य करने नहीं आएँगी. देव छोटे छोटे समूह बनाकर अनौपचारिक विमर्श में लीन थे. एक छोटे से समूह में देव अपने पूर्वलोक में सर्वत्र बिखरे विकास का आलोक निहार रहे हैं.

विकसित जंबूद्वीप. जितना दृश्य उनके नेत्रों में समा पाता है सड़कें ही सड़कें दिखाई पड़तीं हैं. नश्वर संसार में अविनाशी राजमार्गों का चमचमाता विशाल जाल देखकर मन पुलकित हो उठा है. नीली छतरी के पार से जिस तरफ दृष्टि जितनी दूर तक जा पाती है पिछड़ेपन की कोई निशानी दिखाई नहीं पड़ती, न वन और न वन्य जीव, न चौपाए, न पक्षी, न खेत, न नदी, न तालाब, न झरने, न पहाड़, न हरे-भरे खेत, न लहराती फ़सलें, न हरीतिमा के विस्तार, न छोटे गाँव, न मिट्टी के घर. इन सब को एक संग्रहालय में समेट दिया गया जिसे आप वर्किग-डे में 11 से 5 के बीच टिकट खरीदकर देख सकते हैं. बहरहाल, देव देख पा रहे हैं तो बस तेज़ रफ्तार मोटरें, हैचबैक,  सेडान,  प्रीमियम सेडान, टेस्ला, बीवाईडी,  लिमोजिन,  फ्लाईओवर, टोल प्लाज़ा, लेन-ही-लेन, सड़कें-ही-सड़कें. कहीं कहीं खुली जगह के टापू जो दीख रहे हैं उन पर भी धड़ल्ले से सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है. खुली जगह एक इंच बचेगी नहीं. लेन के दोनों ओर चमचमाते रिसोर्ट, ढ़ाबे और रिट्रीट दृष्टिगोचर हो रहे हैं. हर लेन में वाहनों की लम्बी कतारें, कतारों में दौड़ता विकास, तेज़ी से घूमते टायरों से घरघराती आवाज़ निकालता विकास, ओजोन परत में छेद करता विकास, कार्बन से धरती को तप्त करता विकास. कुछेक वर्ष पूर्व तक कितना पिछड़ा हुआ था उनका अपना पूर्वलोक!! युगों युगों से जम्बूद्वीप की राजसत्ता पर्यावरण बचाने के फेर में विकास की उपेक्षा करती रही, अब सब ठीक हो गया लगता है.

एक अन्य देव ने कहा – ‘वह पर्वत भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जिसकी कंदराओं में बैठकर हमने घोर तपश्चर्या की थी.’

‘हाँ देव, वह उस ओर था. अब उसे समतल कर सड़क बना दी गई है. राष्ट्रीय राजमार्ग. एनएच-92947. राजमार्गों ने शतकों का शतक पूरा कर लिया है. राजमार्ग भी कितने चौड़े, बाप-रे-बाप!! उस ओर दृष्टि डालिए देव, आपके नेत्र खुले-के-खुले रह जाएँगे. दिल्ली मुंबई राजमार्ग. चार सौ बत्तीस लेन का. दो सौ सोलह लेन पर जानेवाली गाड़ियाँ, दो सौ सोलह लेन पर आनेवाली गाड़ियाँ. इसे कहते हैं विकास!’

‘वह आश्रम भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जहाँ इंद्र हमारी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के हेतु से ऋषि कन्याएँ डेपुट किया करते थे. वह अरण्य भी दिखाई नहीं दे रहा जहाँ हम वानप्रस्थ के लिए निकले थे और नश्वर देह का विसर्जन किया था.’

‘हाँ देव, पहले वहाँ रिसोर्ट बना, अब एक चमचमाता मॉल बन गया है. जंबूद्वीप इतना विकसित तब हो गया होता तो हम वानप्रस्थ में जाते ही क्यों. फ़ाईवस्टार ओल्ड एज होम में जीवन का अंतिम समय गुजार लेते.’

विमर्श के दौरान देवों को अपने पूर्वलोक में चौड़ी होती जाती सड़क की निरंतर बहती धाराओं को अवलोकित कर गर्व की अनुभूति हो रही थी. मगर तभी, एक देव का कमल सदृश मुख मुरझाने लगा. वे बोले – ‘सब कुछ अच्छा है मगर पर्यावरण लील लिए जाने का दुःख लग रहा है!!’

‘आपका भाग्य अच्छा है देव, आप यहाँ बैठकर पर्यावरण पर रंज प्रकट कर रहे हैं. जंबूद्वीप में करते तो टूलकिट उपयोग करने के आरोप में कारागार में डाल दिए जाते. बरसों नागरिकों ने चार फुटिया सड़क का अभिशाप झेला है, अब वे चार सौ बत्तीस लेन की सड़क आनंद उठा रहे हैं, और आप हैं कि पर्यावरण का रोना लेकर बैठ गए हैं.’

‘तो क्या देव जंबूद्वीप के सभी नागरिकों ने ऐसा ही राष्ट्र चाहा था ?’

‘नहीं देव. एक्टिविस्ट का छोटा सा समूह था वहाँ, अर्बन नक्सली कहाता था. वो उन दीन-हीन मनुष्यों की पक्षधरता में खड़ा रहता जिनका जल, जंगल, जमीन सब छिनता चला जा रहा था. वो कभी जैव-विविधता की बात करता, कभी अल-नीनो की. विकास उसे सुहाता नहीं था. आंदोलनजीवी कहाता. वो घर और भूमि से बेदख़ल किए जाने वाले नागरिकों के लिए आंदोलन करता. धरती बचाने की पहल करते करते राजसत्ता से भिड़ जाता. लेकिन राज्य व्यवस्था के कर्ण पर कभी जूँ नाम का प्राणी रेंगा भी नहीं. विकास थमा नहीं देव, और थमेगा भी नहीं. चार हज़ार बत्तीस लेन की सड़क की डीपीआर रेडी है. जनसामान्य का मानस बना दिया गया है कि वे सड़क-निर्माण को ही विकास का पर्याय मान लें. जंबूद्वीप में वे ही नागरिक बचे रह पाएँगे जो विकास के संग-संग दौड़ लगा पाने के सक्षम हों, शेष तो बस…..’

अर्बन नक्सली टाईप के देव को छोड़कर शेष सभी ने जंबूद्वीप के अतिविकसित हो जाने पर गहरा संतोष व्यक्त किया और विमर्श को विराम देते हुए अपने अपने वैमनिकों में प्रस्थान कर गए.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२४ ☆ व्यंग्य – होनी को टालने के टोटके ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘होनी को टालने के टोटके‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ होनी को टालने के टोटके डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

कुछ समय पहले एक अखबार में मजे़दार खबर पढ़ी थी कि राजस्थान में हर साल करीब 200 नेता, अफसर, बिल्डर जेल का खाना खाते हैं। कारण यह बताया गया कि ज्योतिषी ने उनकी कुंडली में ‘कारागार योग’ या ‘जेल योग’ बताया था और कहा था कि जेल का खाना खाने से ‘जेल योग’ का संकट टल सकता है। यानी अगर वे जेल का खाना खा लेंगे तो ऊपर वाले के रिकॉर्ड में आगे संभावित सज़ा से बच जाएंगे। हमारे यहां इसे ‘अलफ़’ टालना कहते हैं। एक ज्योतिषी जी ने संवाददाता को बताया कि जेल का खाना खाने का टोटका 50% तक काम करता है।

एक विधायक प्रत्याशी ने अखबार  के संवाददाता को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ कई प्रदर्शन किये हैं, इसलिए उन्हें भय है कि उन्हें किसी भी मामले में फंसा कर जेल में डाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे जेल से बाहर रहकर समाज की सेवा करना चाहते हैं, इसलिए ‘जेल योग’ टालने के लिए जेल का खाना खाते हैं।

कुछ लोग लोकलाज के कारण जेल में ही खाने के बजाय खाने को बंधवाकर घर ले जाते हैं। यह भी पढ़ने को मिला कि कुछ आईएएस अधिकारियों को ज़मानत नहीं मिल रही थी तो उनके ज्योतिषी ने उन्हें घर का खाना मंगाने के बजाय जेल का खाना खाने की सलाह दी थी। पता नहीं इस टोटके का कुछ असर हुआ या नहीं।

मुझे अपने छात्र जीवन की याद आती है जब एक बार हम चार पांच छात्र किसी मरीज़ को देखने अस्पताल गये थे। हम में से एक वहां की एक ‘बेड’ पर लंबा हो गया। पूछने पर भाई ने बताया कि वह अपनी ‘अलफ़’ टाल रहा था, यानी यदि उसकी किस्मत में ‘अस्पताल योग’ हो तो वह अभी खारिज हो जाए। आदमी अब इतना होशियार हो गया है कि उसने होनी को भी टालने के जुगाड़ ढूंढ़ लिये हैं।

गांव में जब हमें किसी ‘अशुभ’ दिन पर बाहर निकलने की ज़रूरत होती थी तो एक दिन पहले अपने किसी सामान को आगे वाले पड़ोसी के घर में रखा दिया जाता था। माना जाता था कि ‘प्रस्थान’ एक दिन पहले हो गया और अब यात्रा दूसरे दिन निर्विघ्न की जा सकती है।

मृत्यु के बाद के कर्मकांड में भी अब ‘शॉर्टकट’ ढूंढ़े जा रहे हैं। आज के आदमी को कर्मकांडों के हिसाब से चलने की फुरसत नहीं है। उसके लिए अपना काम और अपनी कमाई सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसलिए अब तेरहीं और ‘बरसी’ एक दिन के अंतर से निपटने लगी है, जब कि ‘बरसी’ एक बरस बाद होनी चाहिए। यह भी देखा कि मृतक की संतानें अग्निसंस्कार के बाद पंडित जी को बता देती हैं कि तेरहीं के लिए उनका आना संभव नहीं है, इसलिए जो कुछ भी करना है, तत्काल करा दीजिए। बेचारे पंडित जी भी अपनी जान बचाते हुए सुरक्षित रास्ता खोजते रहते हैं।

आज का आदमी नये और पुराने के बीच में झूलने के लिए अभिशप्त है। पुराने संस्कारों को छोड़ नहीं पाता, इसलिए उन्हें यथासंभव तोड़- मरोड़कर ज़िंदगी की गाड़ी को आगे ठेल रहा है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा ☆ श्री हिमांशु राय ☆

श्री हिमांशु राय 

(ई-अभिव्यक्ति  के पाठकों के साथ समय समय अपने अनुभव और साहित्य को साझा करने के लिए  संस्कारधानी  जबलपुर के वरिष्ठ  नाट्यकर्मी एवं साहित्यकार श्री हिमांशु राय जी   का हृदय से आभार। आप  इप्टवार्ता के संपादक एवं  विवेचना थियेटर ग्रुप के सचिव भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा)

✍  व्यंग्य – डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा – श्री हिमांशु राय ✍

डोरीलाल से एक व्यक्ति मिला। वो बहुत प्रसन्न था। उसने बताया कि अभी अभी उसकी जेब कट गई है। इसलिए बहुत खुश है। उसने बताया कि उसकी रोज जेब कटती है। आज सुबह से नहीं कटी थी तो वह बहुत चिन्तित था मगर दोपहर तक कट गई तो अब उसने चैन की सांस ली है। उसने बताया कि पिछले कई वर्षों से उसे जेब कटवाने की आदत पड़ गई है और जिस दिन जेब नहीं कटती वो बैचेन हो उठता है। उसके अच्छे स्वास्थ्य और खुश रहने का राज है रोज जेब कटवाना। उसकी जेबकतरे से लगन लग गई है।

डोरीलाल को भरोसा नहीं हुआ। मैंने पूछा कि ये क्या बात हुई ? ऐसा कैसे हो सकता है। जिस बात पर तुम्हें गुस्सा आना चाहिए, उस पर तुम खुश हो रहे हो ? उसने कहा शास्त्रों में कहा गया है कि क्रोध पाप का मूल है और पाप मूल अभिमान। तो मुझे किसी बात पर गुस्सा नहीं आता। अब वैसे भी मेरी चिन्ता जीवन जीना नहीं है। जीवन से पीछा छुड़ाना है। मुझे मोक्ष चाहिए। मुझे मुक्ति चाहिए। मैं ऐसी जगह जाना चाहता हूं जहां कोई जेबकतरा न हो।

मैंने कहा कि तुमने अपने रोग की पहचान में गलती की है। तुम अपने को दोषी मान रहे हो जबकि तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार तो जेबकतरा है। तुम जेबकतरे की गर्दन नापने के बजाए अपनी गर्दन नापने की सोच रहे हो। ये ठीक नहीं है। क्या तुम जेबकतरे को पहचानते हो ?

उसने कहा – बिल्कुल पहचानता हूं। मैं ही क्या हर कोई उसे पहचानता है। वो खुद भी अपनी पहचान बताने में कभी संकोच नहीं करता। उसकी फोटो हर जरूरी और गैर जरूरी जगह पर लगी है। उसने खुद लगवाई है। उसे बड़ा शौक है। अपनी फोटो लगवाने का।

मैं समझ गया कि यह आदमी भगवान से खार खाये बैठा है। इसलिए सर्वशक्तिमान परम पिता परमेश्वर की बात इस तरह से कर रहा है। मैंने कहा देखो भाई ईश्वर के मामले में इस तरह की बातें उचित नहीं हैं। धार्मिक मामला अलग है। भगवान की फोटो श्रद्धावश लोग जहां तहां लगा देते हैं। जेबकटी के मामले में भगवान को बीच में लाने की जरूरत नहीं है। आज देश में कई लोग जेब कतरने जैसे छोटे छोटे उद्योग व्यवसाय में लगे हैं। वे प्रभावशाली हैं। उनमें से कोई तुम्हारी भी जेब काट रहा है। तुम्हारी शिकायत वाजिब है। मगर डोरीलाल को ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होगा कि तुम इस छिछोरे जेबकतरे की बराबरी ईश्वर से करो।

अब उसे गुस्सा आया। उसने कहा मि. डोरीलाल मैं भी यही कह रहा हूं कि भगवान और उस जेबकतरे को एक न समझो। वो कोई भगवान नहीं है। वो छिछोरा जेबकतरा ही है। मैं भी जानता हूं और मेरे जैसे सारे लोग जानते हैं। जैसे नशेबाज को नशे में कोई बुराई नहीं दिखती। जैसे शराबी को शराब में कोई बुराई नहीं दिखती वैसे ही रोज हमारी जेबकटती है मगर हमें जेबकतरे में कोई बुराई नहीं दिखती। हम जेब कतरे के भक्त हो गए हैं। अब बात काफी आगे बढ़ गई है। अब तो हमें जेब कटवाने में तरह तरह के फायदे दिखाई देने लगे हैं।

जेब कटवाना अब एक सामाजिक राजनैतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बड़े बड़े वकील, जज, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, अधिकारी, व्यापारी सब कूद कूद कर जेब कटवाते हैं। जो खुद दूसरों की जेब काटते हैं वो भी उस जेबकतरे से जेब कटवाते हैं। जिसकी नहीं कटती वो अपने को कमतर समझने लगता है। उसे लगता है कि कल तक वो निपट जाएगा। वो दौड़कर जेबकतरे के पास जाकर गिड़गिड़ाता है मेरी जेब काट लो। जब तक कट नहीं जाती पैरों से लिपटा रहता है।

जेबकतरा परेशान है। आज देश में हर कोई जेब कटवाने के लिए तैयार खड़ा है। जेब न कटे तो लड़ाईयां हो जाती हैं। कटवाने की ऐसी होड़ लगी है कोई छूटना नहीं चाहता। सब चाहते हैं जेब कट जाए। इसीलिए गांव गांव शहर शहर महानगर चंहुओर विराट सामूहिक जेबकट सम्मेलन आयोजित होते हैं। उसमें हजारों लाखों लोग जाकर अपनी जेब कटवाते हैं। गांव गांव में पुड़ी भाजी के पैकेट के साथ मुफ्त बसों में भरकर जेब कटवाने वालों को सम्मेलन में लाया जाता है। जेब कटने के बाद सब लोग खुशी खुशी फोटो वाला झोला लेकर अपने अपने घरों को जाते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखकर देवगण ऊपर से ईर्ष्या के फूल बरसाते हैं। उन्होंने जिस सृष्टि का सृजन किया उसमें जेबकतरे के प्रति अगाध श्रद्धा देखकर देवगण जलभुनकर राख हो जाते हैं। बहुत सारे छुटभैइये जेबकतरे गुरूपूर्णिमा के अवसर पर अपने आराध्य जेबकतरे का पूजन करते हैं और अपनी ’मेहनत’ की कमाई का अंश उन्हें गुरू दक्षिणा के रूप में श्रद्धापूर्वक चढ़ाते हैं।

डोरीलाल ने पूछा कि जेबकतरे को पहचान लेने के बाद भी जेब कटवाते रहते हो, रोज कटवाते हो, तुम आदमी हो या कीट पतंगा ? तुम्हारी मेहनत की कमाई कोई लूट रहा है और तुम मजे कर रहे हो ? तुम विरोध क्यों नहीं करते ? इंकार कर दो हम नहीं कटवायेंगे जेब। कोई जबरदस्ती है ?

डोरीलाल जी, हम लोग छोटे लोग हैं। हम क्या विरोध करेंगे। जेबकतरे के पास पुलिस, अदालत, वकील, जज, बड़े बड़े अधिकारी व्यापारी हैं। हमारे लिए बोलने वाला कौन है ? जो लोग बोल सकते हैं वो खुद लपक लपक कर जेब कटवा रहे हैं। हम इसी लायक हैं कि ठगे जाएं। जेब कटवाना ही हमारा भाग्य है। कम से कम हमें इस लायक तो समझा गया है कि हमारी जेब काटी जाए। उल्टे हमें तो डर लगा रहता है कि जेबकतरा कहीं गुस्सा होकर हमारी जेब काटना बंद न कर दे। हम तो कहीं के न रहेंगे।

हमारे पास कोई काम नहीं है। बचा है तो केवल एक काम – जेब कटवाना।

डोरीलाल ’जेबकतरा प्रेमी’

© श्री हिमांशु राय

जबलपुर, मध्यप्रदेश

14 02 2026

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८२ – व्यंग्य – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८२ – व्यंग्य  – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शहर के पास वाले उस ढाबे पर, जहाँ चाय कम और धूल ज़्यादा मिलती है, मेरी भेंट एक ‘डिजिटल स्वामी’ से हो गई। स्वामी जी ऐसे थे कि अगर उन्हें किसी मल्टीनेशनल कंपनी के बोर्डरूम में बैठा दिया जाए, तो वे वहाँ भी ‘परमपिता की कृपा’ का प्रेजेंटेशन पावर-प्वाइंट पर दे दें। बदन पर मलमल का कुर्ता, गले में रुद्राक्ष की ऐसी माला जिसे देखकर किसी भी जौहरी का ईमान डोल जाए, और बगल में एक आईपैड, जिस पर वे निरंतर ‘स्टॉक मार्केट’ और ‘अध्यात्म’ का संतुलन बिठा रहे थे।

मैंने पूछा, “स्वामी जी, यह झोला और लैपटॉप लेकर किस महाकुंभ की ओर प्रस्थान हो रहा है?”

स्वामी जी ने एक ऐसी रहस्यमयी मुस्कान फेंकी, जो केवल उन लोगों के पास होती है जिनके पास स्विस बैंक का खाता और मोक्ष का नक्शा, दोनों साथ होते हैं। बोले, “बच्चा, हम ‘स्मार्ट विलेज’ का शिलान्यास करने जा रहे हैं। गाँव की मिट्टी को सिलिकॉन वैली बनाना है।”

मैंने चाय का घूँट भरा—जिसमें चीनी इतनी थी कि मधुमेह को भी शर्म आ जाए। पूछा, “महाराज, गाँव में तो बिजली आठ घंटे रहती है और सड़कें ऐसी हैं कि आदमी चलते-चलते ही योग की कठिन मुद्राएं सीख जाए। वहाँ आप स्मार्टनेस का कौन सा इत्र छिड़केंगे?”

स्वामी जी ने आईपैड पर एक ग्राफ दिखाया। “यही तो तुम्हारी अज्ञानता है। हम गाँव वालों को यह नहीं सिखाएंगे कि खेती कैसे करें, हम उन्हें यह सिखाएंगे कि ‘खेती को इवेंट’ कैसे बनाएं। हम वहाँ एक ऐसा आश्रम बना रहे हैं जहाँ शहर के अमीर लोग आकर ‘गरीबी का अनुभव’ करेंगे। वे देखेंगे कि गोबर कैसे थापा जाता है और फिर उसकी सेल्फी लेकर इंस्टाग्राम पर ‘मिट्टी की सौंधी खुशबू’ लिखेंगे। इसे ही हम ‘ग्रामीण पुनरुद्धार’ कहते हैं।”

मैंने कहा, “पर महाराज, गाँव का असली किसान तो कर्ज में दबा है, उसे तो खाद और बीज चाहिए।”

स्वामी जी हँसे, जैसे किसी ने उनसे कह दिया हो कि कद्दू के पेड़ पर आम लगते हैं। बोले, “बच्चा, किसान को खाद मिल गई तो वह आत्मनिर्भर हो जाएगा, फिर हमारे प्रवचनों में भीड़ कौन लगाएगा? हमें उसे ‘संतोष’ सिखाना है। हम उसे समझाते हैं कि ‘साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए’। जब उसके पास कम होगा, तभी तो वह चमत्कार की उम्मीद में हमारे पास आएगा। और रही बात खाद की, तो हमने योजना बनाई है कि गाँव के पास एक बड़ा गोल्फ कोर्स बनाएंगे। वहाँ की घास को ‘पवित्र घास’ घोषित कर देंगे, जिसे उगाने के लिए किसान मुफ्त में श्रम करेगा। इसे हम ‘श्रमदान’ का नाम देंगे।”

मैंने कहा, “वाह! यानी ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’। पर स्वामी जी, आप तो खुद गाँव में रुकेंगे नहीं, आपकी काया तो एसी की आदी लगती है?”

स्वामी जी ने एक डकार ली, जो सीधे देसी घी के पराठों की गवाही दे रही थी। “बच्चा, शरीर तो नश्वर है, पर इसे ठंडा रखना आत्मा का कर्तव्य है। हम शहर में रहकर गाँव का ‘विजन’ तैयार करते हैं। देखो, विकास का सबसे बड़ा नियम यह है कि वह कभी ज़मीन पर नहीं दिखना चाहिए। अगर विकास दिख गया, तो वह खत्म हो गया। उसे हमेशा ‘पाइपलाइन’ में रहना चाहिए। जैसे हमारे यहाँ की सरकारी फाइलें—चलती रहती हैं, पहुँचती कभी नहीं।”

मैंने पूछा, “और इन सबमें धर्म का क्या योगदान होगा?”

स्वामी जी की आँखें चमक उठीं। “धर्म ही तो वह गोंद है, बच्चा, जो टूटे हुए विकास को चिपका कर रखता है। जब सड़क पर गड्ढा हो, तो वहाँ एक पत्थर रखकर उसे ‘स्वयंभू महादेव’ घोषित कर दो। फिर जनता सड़क की शिकायत नहीं करेगी, बल्कि वहाँ मत्था टेकेगी। जब पानी न आए, तो ‘वरुण देव’ की उपेक्षा पर प्रवचन दो। राजनीति और धर्म का यही तो गठबंधन है—एक हाथ से स्वर्ग दिखाओ, दूसरे हाथ से जेब साफ करो।”

मैंने अंतिम सवाल किया, “स्वामी जी, क्या इस ‘स्मार्ट विलेज’ में आम आदमी के लिए भी कुछ है?”

स्वामी जी ने अपना बैग उठाया और खड़े होते हुए बोले, “आम आदमी के लिए ‘उम्मीद’ है, बच्चा! और उम्मीद ही वह चीज़ है जो आदमी को तब भी जीवित रखती है जब उसकी थाली खाली हो। हम उसे सपने बेचते हैं और वह हमें श्रद्धा देता है। सौदा खरा है।”

इतने में उनकी लग्जरी गाड़ी धूल उड़ाती हुई आ गई। स्वामी जी उसमें ऐसे ओझल हुए जैसे चुनावी वादे चुनाव के बाद होते हैं। मैं वहीं बैठा रहा, और ढाबे वाले से कहा, “भाई, एक चाय और दे, ज़रा चीनी कम रखना, क्योंकि कड़वा सच सुनने के बाद मीठा अब झेला नहीं जाता।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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