☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र २६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले☆
।। श्री नारद उवाच ।।
फलरूपत्वात् ॥ २६ ॥
अर्थ : पराभक्ती स्वतःच फलस्वरूप असल्याने ती कर्म ज्ञान, योग यापेक्षा श्रेष्ठ आहे.
विवेचन: मागील सूत्रात भक्ती ही कर्म-ज्ञान-योग यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे असे सांगितले. कर्म-ज्ञान-योग इत्यादि साधनांना भक्तीची अपेक्षा आहे, पण भक्ती ही स्वतः निरपेक्ष आहे. सहसा मनुष्याची विषय सेवनाकडे प्रवृत्ती असते. ती दूर करून मल म्हणजे पापवासना या दोषातून मुक्त होण्याकरिता वेदाने विहित कर्माचे विधान सांगितले आहे.
भक्ताचे चित्त सदैव भगवंताच्या ध्यानात, चिंतनातच असते. ज्याची सर्व कायिक, वाचिक, मानसिक कर्मे भगवंताप्रीत्यर्थच होतात त्याला पुन्हा वेगळे विहित कर्म करण्याची आवश्यकताच काय?
संत तुकाराम महाराज आपल्या एका अभंगात म्हणतात,
भक्त ऐसे जाणा जे देहीं उदास । गेले आशापाश निवारूनि ॥०१॥
विषय तो त्यांचा जाला नारायण । नावडे जन धन माता पिता ॥०२॥
निर्वाणीं गोविंद असे मागेंपुढें । कांहींच सांकडें पडों नेदी ॥०३॥
(संदर्भ: अभंग क्रमांक ७४८, सार्थ तुकाराम गाथा, धार्मिक प्रकाशन संस्था)
जो अखंड नामस्मरणात आहे, त्याच्या प्रत्येक क्षणावर नामाची सत्ता काम करीत असते, तो श्वास घेताना नाम घेतो, श्वास सोडताना नाम घेतो, नव्हे श्वास म्हणून नाम घेत आणि नामच बाहेर सोडत असतो….! अशी स्थिती अन्य मार्गांमध्ये येईलच असे नाही, पण भक्तिमार्गात मात्र खात्रीनं येऊ शकते, असे नारद महाराज आपल्याला सांगत आहेत. संत तुकाराम महाराज आपल्याला वरील अभंगात त्याची साक्ष देतात.
भक्तीचे अनेक मार्ग आहेत. आपण उदा. म्हणून नामस्मरण भक्ति पाहू. नाम घेणारा मनुष्य सुरुवातीला नाम घेऊ लागतो, त्यावेळी तो निव्वळ नाम घेत असतो. जसजशी त्याच्या मनात नामाची व्याप्ति आणि खोली वाढू लागते, तसतसे त्याचे स्मरण दृढ होऊ लागते. एकवेळ अशी येते की नाम सुद्धा सुरू असते आणि त्याचवेळी स्मरणही असते. तो साधक ज्याचे नाम घेत असतो, त्या आराध्याचे, सद्गुरुंचे सान्निध्य त्याला जाणवू लागते. याची परमोच्च सीमा अशी असते की सर्व सदगुरूच सर्व करत आहे आणि हा निवांत बसला आहे… (असा साधक देहाने सर्व कर्म करीत असतो, पण त्याच्या चित्तात मात्र अतिव शांतता, स्थिरता असते…!)
संत कबीर एका ठिकाणी म्हणतात,
“माला जपूँ ना कर जपूँ, मुख से कहूँ ना राम राम हमारा हमें जपे है, हम पायो विश्राम ।”
…. आता मला सांगा, ज्याचा जप स्वतः भगवंत करतो, (विचार केला तर तोच सर्व काही करत असतो, त्याची जाणीव साधना केल्याने होत असते…..) त्याला कसली ददात?
इथे भक्ति हेच साधन आणि साध्य असते. सर्व संत म्हणून भगवंताकडे मागणी करतात की जन्मोजन्मी आम्हाला गर्भवास दे आणि तुझ्या नामाचे प्रेम दे. कारण तुझी भक्ति करताना होणारा आनंद तुला सुद्धा कळणार नाही. मुक्ति दिलीस तर तुझी भक्ति करता येणार नाही देवा!!
हें चि दान देगा देवा । तुझा विसर न व्हावा ॥१॥
गुण गाईन आवडी । हे चि माझी सर्व जोडी ॥२॥
न लगे मुक्ती आणि संपदा । संतसंग देई सदा ॥३॥
तुका म्हणे गर्भवासीं । सुखें घालावें आह्मासी ॥४॥
(संदर्भ: अभंग क्रमांक २२२२, सार्थ तुकाराम गाथा, धार्मिक प्रकाशन संस्था)
भक्ती ही केवळ आनंदाचे साधन नसून ती स्वतः आनंदरूपच आहे; म्हणजे साध्यस्वरूप, पुरुषार्थस्वरूप म्हणून फलस्वरूप आहे. भक्ति म्हणजे बीज, कोंब, रोपटे, झाड, फांद्या, पान, फुल, फळ आहे….! सर्व एकच आहे. भक्तीचे बीज रोवले की यथावकाश भक्तीची फळे खात्रीने मिळणार….!
संत एकनाथ महाराज सांगतात,
भावें करितां माझी भक्ती । भाविकां कोण पां अप्राप्ती । विवेकवैराग्यज्ञानसंपत्ती । पायां लागती मद्भक्तांच्या ॥ ४०४ ॥
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २६२ ☆ कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय… ☆
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को आँवला नवमी,अक्षय नवमी या धात्री नवमी भी कहा जाता है।इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है।
माना जाता है कि इस वृक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी सहित निवास करते हैं।जो व्यक्ति इस दिन आँवले की पूजा और इसका दान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और गरुड़ पुराण में इसे“अमृत फल” कहा गया है ।इसकी छाया में बैठने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं। ये सब तो आध्यात्मिक महत्व है । इसके साथ ही इसके औषधीय गुण भी हैं जैसे-
त्रिदोष नाशक: वात, पित्त, कफ — तीनों दोषों को संतुलित करता है।
विटामिन C का भंडार: एक आँवले में एक संतरे से 20 गुना अधिक विटामिन C होता है।
प्रतिरक्षा शक्ति (इम्युनिटी) बढ़ाता है।
बालों को काला और घना रखता है।
आंखों की रोशनी में सुधार करता है।
पाचन क्रिया सुधारता है।
त्वचा को चमकदार बनाता है।
च्यवनप्राश, त्रिफला, आंवला मुरब्बा, रस, तेल आदि में मुख्य घटक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ।
हरियाली से जुड़े पर्व सनातन संस्कृति को वैज्ञानिक आधार पर भी संपुष्ट करते हैं ।
यह वृक्ष यह हवा को शुद्ध करता है।इसके पत्ते, फल, और जड़ सब उपयोगी है।भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद करता है।
हमारी संस्कृति हमें अध्यात्म के साथ- साथ चैतन्य भी बनाती है, हम सपरिवार वनभोज करने आँवला वृक्ष के नीचे जाते हैं, उसकी छायातले बैठकर, पूजन अर्चन करके महाप्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं ।
आइए मिलकर संकल्प लें कि इस तरह के त्योहारों से अपने बच्चों को जरूर जोड़ेंगे जिससे ये चेतना दिनों दिन बढ़े और हमारी धरती हरी- भरी रहे ।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – रिश्तों की शवपेटी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६८ – लघुकथा – रिश्तों की शवपेटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
रिश्ते कभी मंदिर की घंटियों की तरह मधुर बजते हैं और कभी अस्पताल की मॉर्चरी की चुप्पी की तरह डरावने हो जाते हैं; शुरुआत में उनका स्पर्श हर पल खिले गुलाब की पंखुड़ी जैसा नर्म लगता है, लेकिन समय के साथ वही पंखुड़ियाँ सूखकर काँटे बन जाती हैं और भीतर तक चुभने लगती हैं। पहले मैं उसकी बातों में मिठास खोजता था, उसके नखरों में अपनापन और उसके तुनकमिजाजी को मासूमियत का आवरण मान लेता था; पर यह सब धीरे-धीरे शक, उसके बाद कड़वाहट और अंततः दमघोंटू कैद में बदल गया। मैंने जब उसे एक कैफे में बुलाया तो आसपास संगीत बह रहा था पर मुझे लग रहा था जैसे हत्या के बाद खून धोने के लिए नल खुला हो और पानी फालतू बह रहा हो। मैंने शांत स्वर में कहा—“जब इस ब्रह्मांड में असंगति ही अंतिम लय है तो रिश्ते कैसे निष्कलंक संगीत हो सकते हैं! सांस बिना जीवन नहीं और विश्वास बिना रिश्ता नहीं, और जब ये टूटते हैं तो सिर्फ शरीर बाकी रह जाता है, आत्मा कब्र में चली जाती है।” उसका चेहरा देखने में उतना ही सरल था जितना किसी निर्दोष भक्त का, मगर उसकी आँखों में वही भय था जो पेशी पर खड़े अपराधी की पुतलियों में लिखा होता है। उसने ठंडी आवाज़ में पूछा—“क्यों?” और यह ‘क्यों’ पेट की अंदरूनी आंतों को निचोड़ने वाला होता है, क्योंकि इसका जवाब मृत्यु प्रमाणपत्र के हस्ताक्षर जैसा अंतिम होता है। मैंने हल्की हँसी के व्यंग्य में कराह छिपाते हुए कहा—“इसे ‘नैचरल डेथ’ समझो; ताकि किसी पर दोष न चढ़े।” और यह कहकर मैं बाहर निकल आया, जैसे कोई डॉक्टर लाश के पास से निकल जाए और घोषणा कर दे कि इलाज संभव नहीं था। बाहर की सड़क पर अनगिनत लोग आ-जा रहे थे, हज़ारों रौशनी जल रही थीं, पर मुझे लगा पूरी दुनिया अंधेरी हो गई है और जो रौशनी थी, वह किसी शवपेटिका में रखे शरीर पर जलते बल्ब की तरह निर्बल और अर्थहीन। भीतर व्यंग्य मुस्कुरा रहा था कि देखो, हमने बड़े सलीके से एक मौत को ‘प्राकृतिक’ बता दिया, पर आत्मा कराह रही थी कि यह मौत प्राकृतिक नहीं, निर्मम हत्या थी—और हत्यारा भी वही था जिसने इसे ‘स्वाभाविक’ लिखकर सच से चुप्पी का सौदा कर डाला।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो ! ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७९ ☆
व्यंग्य – लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो ! श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
वो जमाना गया जब लोग अख़बार में “आज का विचार” पढ़कर दिन की शुरुआत करते थे। अब लोग सुबह उठते ही मोबाइल उठाकर “आज की वायरल रील” देखते हैं जिसमें कोई बाल सुखा रहा है, कोई नाच रहा है, और कोई तो बिना वजह ही होंठ चबा कर भद्दे इशारे रही है। गोया कि होंठ चबाना भी कोई राष्ट्रीय खेल बन गया हो। टिकटॉक और रील्स ने दुनिया को ऐसा उलझाया है कि लोग अब रील्स पर दिखाने के लिए कपड़े बदलते हैं। एक आउटफिट से तीन-तीन रील्स! कपड़ों की एक्सपायरी डेट नहीं होती पर रील्स की होती है । “अरे ये वाला तो कल ही पोस्ट किया था, आज दूसरा पहनना पड़ेगा, नहीं तो लोग ट्रोल करेंगे।”
एक जमाना था जब लोग खाने से पहले “बिस्मिल्लाह” कहते थे, अब “वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन” करते हैं। यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ये खा रहे हैं, या इंस्टाग्राम पर दिखाने के लिए खाने की एक्टिंग कर रहे हैं? खाना ठंडा हो जाए तो चलेगा, पर रील का एंगल परफेक्ट होना चाहिए। “अरे ज़रा चम्मच ऐसे पकड़ो, लाइट इधर से आ रही है… हाँ! परफेक्ट! अब चबाओ स्लो मोशन में।” खाना अब पेट नहीं, फोन भरता है। रील की इनकम पेट भर सकती है।
घर की दादी, जो पहले तक ‘व्हाट्सएप’ को ‘व्हाट्शैप’ कहती थीं, अब खुद ‘रील क्वीन’ बन चुकी हैं। चश्मा चढ़ाकर ट्रेंडिंग साउंड सुनती हैं और बोलती हैं “बहू, ये वाला गाना तो हमारे ज़माने का है, इस पर हम भी रील बनाएंगे!” और फिर शुरू होता है परिवार का सामूहिक प्रोडक्शन हाउस। पोते कैमरामैन बनते हैं, बेटा डायरेक्टर, पति कैमरामैन और दादी हीरोइन। “दादी, एक बार और! इस बार हाथ थोड़ा ऊपर उठाना।” दादी की फिटनेस एक्सरसाइज अब योग से नहीं, रीटेक से हो रही है।
“आज ये डायलॉग ट्रेंड में है, इसका वीडियो बना दो ज़रा”, पत्नी कहती हैं, और फिर शुरू होता है उनका गायन सह अभिनय जिसे यदि शंकर महादेवन देख लें तो सुर की समाधि में चले जाएं। “अरे सुनो न, लिप सिंक गड़बड़ हो गया, एक बार और!” पति जो पहले ऑफिस में बॉस की डाँट खाते थे, अब घर में ‘डायरेक्टर बीवी’ की सुनते हैं। “तुमने फोन हिला दिया! फोकस बिगड़ गया! तुमसे एक काम सही से नहीं होता!” अब शादी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पति कितनी अच्छी रील बना देता है।
दुनिया हकीकत से अधिक, कैमरे में जी रही है। कभी लोग पार्क में टहलने जाते थे, अब ट्राइपॉड लेकर रील्स बनाने जाते हैं। पेड़-पौधों से बात नहीं करते, उनके पीछे खड़े होकर डांस करते हैं। वो पेड़ भी सोचता होगा “मुझे ऑक्सीजन देने दो या बैकड्रॉप बनने दो, कुछ एक तो तय करो!” और अगर गलती से कोई इनकी शूटिंग के बीच से निकल जाए, तो उसे ऐसे घूरते हैं जैसे उसने फ़िल्मफेयर अवार्ड छीन लिया हो। “अरे भाई, दिखता नहीं शूटिंग चल रही है? अब पूरा फिर से बनाना पड़ेगा!” वो बेचारा सोचता है “ये पार्क है या मल्टीप्लेक्स शूट स्टूडियो?”
अब रील्स ही असली हैं,ज़िंदगी बैकग्राउंड में चल रही है। शादी हो तो पहले पंडित नहीं, कैमरामैन बुलाओ। “बेटे की शादी में तो पाँच रीलमेकर रखे थे, हर एंगल से कवर हो!” लड़का लड़की एक दूसरे को नहीं, कैमरे को देख रहे होते हैं। फेरे ले रहे हैं, पर निगाह फोन पर होती हैं । लाइव पर “कितने व्यूज आए?” मेहमान खाना नहीं खा रहे, रील बना रहे हैं। “अरे पनीर टिक्का कैसा लग रहा है फ्रेम में?”
टिकटॉक बंद हुआ तो लगा कुछ चैन मिलेगा, पर इंस्टाग्राम छा गया। और यूट्यूब शॉर्ट्स ने तो जैसे कसम खा ली है “हर इंसान को कम से कम एक वीडियो ज़रूर बनवा कर ही मानेंगे।” अब तो फेसबुक भी रील्स लेकर आ गया। यानी, भागो कहीं भी, रील्स का भूत पीछा करेगा ही। लिंक्डइन पर भी लोग प्रोफेशनल रील्स बना रहे हैं “देखिए कैसे मैं ऑफिस में कॉफी पीते हुए प्रोडक्टिव रहता हूँ।”
बुद्धिजीवी अब ‘बुक क्लब’ नहीं, ‘रील क्लब’ में शामिल हैं। “कैसे बनाएं वायरल वीडियो?” पर सेमिनार होते हैं। “लाइक नहीं आए तो आत्ममंथन करें” ये आज का गंभीर विषय है। प्रकाशक मुझसे बोला सर कविता कहां ले आए ? कुछ युवाओं के लायक लिखी पांडुलिपि लाइये मसलन ” रील से पैसे कैसे बनाएं”
इंजिनियरिंग कॉलेज में पहले इंजीनियरिंग पढ़ाई जाती थी, अब “वायरल मार्केटिंग 101” कोर्स शुरू होने वाला है। MBA की डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है “10 लाख फॉलोअर्स”। नौकरी के इंटरव्यू में अब पूछा जाता है “आपके इंस्टाग्राम पर कितने फॉलोअर्स हैं?” बायोडाटा में लिखा होता है , “अनुभव: 5 साल, वायरल रील्स: 12″।
अब लोग परीक्षा में कम नंबर आने पर नहीं, वीडियो पर कम लाइक्स आने पर बच्चे डिप्रेशन में जाने लगे हैं। “मम्मी, मेरी रील पर सिर्फ 200 लाइक्स आए!” माँ दिलासा देती है “बेटा, टाइमिंग गलत थी, शाम को पोस्ट करना था।” पहले बच्चे बोर्ड एग्ज़ाम के रिज़ल्ट से डरते थे, अब रील के व्यूज से। काउंसलर भी अब नई समस्याओं से जूझ रहे हैं “डॉक्टर साहब, मेरी रील वायरल नहीं हो रही, मुझे लगता है मैं असफल हूँ।”
सोचता हूँ, ये रील बनाने वाले आखिर करते क्या हैं? तो जवाब आता है “रील बनाते हैं, और वही करते हैं।” दिन की शुरुआत रील से, अंत रील से। सुबह उठे “गुड मॉर्निंग “। नाश्ता किया “ब्रेकफास्ट रील”। ऑफिस गए तो भी रील”। लंच किया “फूड रील”। शाम को जिम किया तो “वर्कआउट रील”। रात को सोए “गुडनाइट रूटीन रील”। यानी, ज़िंदगी एक बड़ी रील है और हम सब उसमें महज एक्स्ट्रा किरदार हैं।
घर में बर्तन गिरते हैं तो पत्नी चिल्लाती नहीं, कहती है “सुनो न, मैं फिर से गिराती हूं, जरा इसका स्लो मोशन बना लो!” नया आइडिया है। है न! बच्चा रो रहा है तो पहले फोन उठाओ। “अरे रुको, रिकॉर्डिंग ऑन करने दो, ये ‘क्यूट बेबी क्राइंग’ रील बनेगी।” बच्चा चुप हो गया तो बोलो “बेटा, फिर से रो ले, एंगल गड़बड़ हो गया था।” प्यार भी अब रिहर्सल माँगता है।
पढ़ाई छोड़, करियर छोड़, रिश्तेदार छोड़ , सब छोड़ कर लोग अब केवल “वायरल होने” की साधना कर रहे हैं। गुरुकुल में अब योगासन नहीं, “कंटेंट स्ट्रैटेजी” सिखाई जाती है। संन्यासी भी अब हिमालय नहीं, स्टूडियो में वर्चुअल ध्यान करते हैं “फॉलोअर्स बढ़ाने का मंत्र, अगली रील में।” गलती से जो कोई वीडियो चल गया, तो समझो “ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया।” तब फिर क्या, बाकी ज़िंदगी वही फॉर्मूला रिपीट करो। “वो वाला ही डांस फिर करो, वही बैकग्राउंड, वही ओछे चमकीले कपड़े!”
हाल यह है कि दुनिया के बड़े-बड़े सवालों के जवाब हमें शॉर्ट वीडियो में मिलते हैं। चाहे जीवन का उद्देश्य हो, या सिक्स पैक ऐब्स बनाने की शिक्षा । सब कुछ 30 सेकंड में समझा दिया जाता है। “क्वांटम फिजिक्स समझें 60 सेकंड में!” “महाभारत की पूरी कहानी एक रील में!” ज्ञान की गहराई अब 30 सेकंड की है। पहले गुरु कहते थे “बेटा, वर्षों लगेंगे समझने में”, अब रील गुरु कहते हैं “बस एक मिनट दो, सब क्लियर हो जाएगा।” यानी, ज्ञान अब ज्ञान नहीं कंटेंट बन गया है। और सबसे बड़ी बात “फॉलो करना मत भूलना!”
ऊपर की ओर स्क्रॉल करते हुए समय कब बीत जाता है, किसे पता चलता है। सुबह 10 बजे फोन खोला सोचकर “बस एक रील देखूँ।” अचानक नज़र घड़ी पर दोपहर के 2 बज गए! ये कौन-सी आइंस्टीन की थ्योरी है जिसमें 10 मिनट 4 घंटे के बराबर हो रहे हैं? रील्स में टाइम ट्रैवल होता है, बस भविष्य की तरफ ही। वापस नहीं आ सकते। लोगों की नींद उड़ गई है, टाइम पास हो रहा है। सोने जा रहे हो “चलो सोते हैं, पर पहले एक रील।” फिर एक, फिर एक, और सुबह की नमस्ते! रात 2 बजे अचानक याद आता है “अरे, कल मीटिंग है!” पर फिर सोच “चलो एक और लास्ट देख लेते हैं।”
हम सब डिजिटल कंटेंट क्रिएटर बनकर उस डॉलर की प्रतीक्षा में हैं जो हमारी रील्स के व्यूज, लाइक, रीपोस्ट और सब्सक्राइब से टोटल टाइम ऑफ वॉचिंग से आएगा। बच्चे अब डॉक्टर इंजीनियर से अधिक बड़े “इन्फ्लुएंसर” बनना चाहते हैं। “मम्मी, मैं बड़ा होकर यूट्यूबर बनूँगा!” पहले माता-पिता कहते थे “बेटा, पढ़-लिख कर कुछ बनो”, अब बच्चे कहते हैं “पापा, आपको नहीं पता, मेरे 5000 फॉलोअर्स हैं!” और पापा गर्व से कहते हैं “हमारा बेटा इन्फ्लुएंसर है!”
जिस दिन इंटरनेट डाउन हो गया, उस दिन ये पूरी रील असेंबली पूछेगी , “अब मैं क्या करूं, जाऊं तो जाऊं कहाँ?” लोग सड़कों पर भटकेंगे, हाथ में फोन लिए, निगाह खाली स्क्रीन पर। “नेटवर्क कब आएगा?” ये नया राष्ट्रीय प्रश्न बन जाएगा। बच्चे रोएंगे, बड़े घबराएंगे, और दादी बोलेंगी “हमारे ज़माने में तो बिजली जाती थी, फिर भी हम रहते थे।” पर कोई सुनेगा नहीं, क्योंकि बिना रील्स के सुनने की आदत ही खत्म हो गई है।
असली ज़िंदगी अब “अनस्क्रिप्टेड कंटेंट” लगने लगी है , बोरिंग, बिना एडिट का, बिना फिल्टर का। “अरे ये तो रियल लाइफ है, कौन देखेगा इसे?” रिश्ते अब “कोलैबोरेशन” हैं। “चलो मिलते हैं और एक साथ मस्त रील बनाते हैं।” दोस्ती की परिभाषा बदल गई “जो तुम्हारी हर रील पर पहला कमेंट करे, वही सच्चा दोस्त।”
और हाँ, सबसे बड़ी बात, अब तो शादियों में भी लड़के लड़की एक दूसरे के इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखते हैं। “लड़की है तो अच्छी, पर फॉलोअर्स कम हैं।” “लड़का कमा तो अच्छा रहा है, पर एस्थेटिक सेंस नहीं है, रील्स देखो इसकी।” बायोडाटा में अब लिखा होता है “नेट वर्थ: 50 लाख, फॉलोअर्स: 1 लाख”। और सास-बहू की पहली बातचीत “बेटा, तुम रील्स बनाती हो? हमारे घर की पारंपरिक पोशाक पहनकर एक बना देना, वायरल हो जाएगी!”
@ कैमरा ऑफ. लेखक ऑफ. दिमाग स्टैंड बाई मोड पर।
पर रुकिए… ये आर्टिकल तो बहुत लंबा हो गया। अब इसे भी 30-30 सेकंड के पार्ट में बाँटना पड़ेगा। क्योंकि अब कोई पूरा आर्टिकल पढ़ता ही कहाँ है? सब रील में चाहिए। तो अगली रील में मिलते हैं “व्यंग्य, पर शॉर्ट फॉर्म में!”लाइक करो, शेयर करो, और हाँ… फॉलो करना मत भूलना!
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख “पर्यटन – एलोरा का धर्मराजेश्वर मंदिर”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२५ ☆
☆ पर्यटन- एलोरा का धर्मराजेश्वर मंदिर☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
अजंता, एलोरा, धर्मनार की गुफाएं हो या यहां के मंदिर, सभी एक ही शैल को तराश कर बनाए गए हैं। इस कारण ये अलौकिक वास्तुशिल्प के सर्वोत्कृष्ट नमूने, पच्चीकारी की बारिश शैली की उन्नत तकनीक और भारतीय वास्तु निर्माण शैली की वैज्ञानिक विधि को दर्शाते हैं। इसी कारण देश-विदेश के पर्यटक इन्हें निहारने, इनकी कला को अपने दिल दिमाग में बैठाने, भारतीय वास्तु शैली को दिलों में सजौने आते हैं। ताकि वह गर्व के साथ बता सके कि भारतीय प्राचीन परंपरा व यहां की वास्तु निर्माण शैली कितनी सर्वोत्कृष्ट थी।
अजंता एलोरा की श्रंखला वहीं तक सीमित नहीं है। यह मंदसौर जिले के चंदवासा के धमनार तक फैली हुई है। यहां की चंदन की पहाड़ियों में अजंता के कैलाश मंदिर की तरह धर्मराजेश्वर का मंदिर उत्कीर्ण है। दोनों ही मंदिर शैल उत्कृष्ट शैली पर बने हुए हैं।
इसे अंग्रेजी में इंडियन रॉक कट आर्किटेक्चर कहते हैं। हिंदी में किसी विशेष चट्टान को तराश कर बनाया गया वास्तुशिल्प कहते हैं। इसकी विशेषता यह होती है कि इसे एक ही चट्टान को तराश कर खोदा जाता है। तत्पश्चात उसे मंदिर का रूप दिया जाता है। इसे ही शैल उत्कीर्ण वास्तुकला कहते हैं।
भारत में अजंता-एलोरा के साथ-साथ धमनार की गुफाएं इसी शैली में बनी हुई है। यह मानव द्वारा निर्मित वास्तु कला का अदभुत, अनोखा व उत्कृष्टता का बेहतरीन नमूना है। इसे देखने के लिए लाखों लोग यहां पर्यटन करने आते हैं।
पर्यटन के आकाश में अजंता एलोरा की गुफाएं व मंदिर तो दिखाई देते हैं मगर इसी शैली में मंदसौर जिले में बने धमनार का धर्मराजेश्वर मंदिर का कहीं नाम नहीं आता है। यह सदा से ही उपेक्षित रहा है।
भारत के ह्रदय में बसे मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की शामगढ़ तहसील में धमनार की गुफाओं के पास धर्मराजेश्वर मंदिर उत्कीर्ण है। यह मंदिर चंदन की पहाड़ियों को तराश कर बनाया गया है। एक ही शैल पर उत्कीर्ण मंदिर उत्तर भारतीय नागरी शैली में बना हुआ है। जबकि कैलाश मंदिर दक्षिण भारतीय द्रविण शैली में निर्मित है।
कैलाश मंदिर की तरह तरह धर्मराजेश्वर मंदिर के प्रांगण में मुख्य मंदिर के साथ-साथ 7 लघु मंदिर उत्कीर्ण कर बनाए गए हैं। यहां का मुख्य मंदिर पहले विष्णु मंदिर था बाद में इसे शिव मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया। मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग तथा द्वार के प्रस्तर पर विष्णु की प्रतिमा उत्कीर्ण है।
यह मंदिर 14.53 मीटर और 10 मीटर चौड़ाई में बना हुआ है। इस मंदिर में द्वार मंडप, सभा मंडप, अर्ध मंडप, गर्भ गृह और कलात्मक शिखर निर्मित है। इसका शिखर उन्नत तथा कलश युक्त है। मुख्य द्वार पर भैरव व भवानी की प्रतिमा उत्कीर्ण है।
इस मंदिर के साथ-साथ 7 लघु मंदिर है। इसमें वराह, दशावतार, शेषषायी, विष्णु, पंचमहादेवी आदि की मूर्तियां उत्कीर्ण है।
आठवीं व नौवीं शताब्दी में प्रतिहार राजवंश द्वारा इसका निर्माण किया गया था। यहां प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर मेला का आयोजन किया जाता है। यह पूरा मंदिर 104 गुणित 67 फिट की लंबाई चौड़ाई के साथ 30 फीट गहरी चट्टान को तराश कर बनाया गया है। इसी मंदिर के पास अजंता एलोरा की तरह 50 गुफाएँ निर्मित की गई है। यह अजंता एलोरा की शैलियों और उसी उद्देश्य पर बनाई गई है।
इस पर्यटन स्थल पर मंदसौर, शामगढ़ भानपुरा से ट्रेन बस द्वारा जाया जा सकता है। शामगढ़ से 22 किलोमीटर दूर और गरोठ से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंदवासा गांव से 3 किलोमीटर की दूरी पर धमनार स्थित है। यहीं धर्मराजेश्वर मंदिर बना हुआ है।
यहां तक पहुंचने के लिए इंदौर, भोपाल, उदयपुर, कोटा से हवाई जहाज द्वारा पहुंचा जा सकता है। विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर मंदसौर से 122 किलोमीटर दूर, चंबल, गांधी सागर से पास में यह स्थान स्थित है। यहां बस, ट्रेन और निजी साधनों से जाया जा सकता है।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(पूर्वसूत्र- त्या दिवशी ऑफिसमधून बाहेर पडल्यानंतरही माझ्या मनात तक्रारदार सहस्त्रबुध्दे ठाण मांडून बसले होते. तोपर्यंत कधीच न पाहिलेल्या त्या माणसाने त्याच्याही नकळत माझ्या मनात एक प्रकारची बेचैनी निर्माण करून ठेवली होती. रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली तरी स्वस्थता नव्हतीच.)
त्या अस्वस्थतेत मनात रूतून बसलेला एकच विचार मला बोचत राहिला होता. उद्या नेमकं काय होईल? ते माझ्याशी मोकळेपणाने बोलतील कीं प्रभूदेसाईंसारखंच मलाही घरात न घेता बाहेरच्या बाहेर हाकलून लावतील?
हीच अस्वस्थता मनात घेऊन दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी त्यांच्या फ्लॅटची डोअरबेल वाजवली. एकदा. दोनदा. कांही क्षण बोचऱ्या शांततेत गेले आणि यथावकाश दार उघडलं गेलं.
” काय हवंय..? “
अर्धवट उघडलेल्या दारात एक मुलगी उभी होती. उदास चेहरा. गोंधळलेली प्रश्नार्थक नजर.
“सहस्त्रबुद्धे आजोबा आहेत ना? मला भेटायचं होतं. “
“आपण..? “
“मी.. लिमये. अरविंद लिमये. एक महत्त्वाचं काम होतं. “
” बाबा आहेत,.. पण नुकतीच पूजा आवरून ‘गुरुचरित्र’ वाचायला बसलेत.
आजचा अध्याय मोठा आहे,.. थोडा वेळ लागेल. आणि नंतर त्यांना लगेच बाहेर जायचंय. “
मला काय बोलावं सुचेना.
” मी फार वेळ घेणार नाहीय. निदान त्यांची ओळख तरी होईल. ते म्हणाले तर मग मी उद्या येईन. त्यांचं आवरेपर्यंत थांबू कां मी? “
ती क्षणभर विचारात पडली. मग “या. ” म्हणून आत वळली. भिंतीजवळच्या खुर्च्यांकडे निर्देश करीत ‘बसा’ म्हणाली. आत जाऊन लगबगीनं पाण्याचं तांब्याभांडं आणून ठेवलंन् न् आत निघून गेली.
सहस्त्रबुद्धे पूजा आवरून ‘गुरुचरित्र’ वाचायला बसलेत हे त्यांच्या मुलीकडून ऐकल्यानंतर काल मनात येऊन गेलेलेच विचार मला आठवले…
‘उद्या काय होणार आहे मला माहित नाही. त्यांना स्वतः जाऊन भेटणं एवढंच माझ्या हातात आहे. यश येणार की अपयश हे आता सहस्त्रबुद्धेंच्या नव्हे तर फक्त ‘त्या’च्याच हातात आहे…. ‘ माझ्या अस्वस्थ मनाला तेव्हा स्पर्शून गेलेल्या ‘त्या’च्या विचाराचा धागा माझ्या मनात नकळत सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या ‘गुरूचरित्र’ वाचनाशी जोडला गेला आणि मनावरचं जड झालेलं ओझं कुणीतरी अलगद उतरवून घ्यावं तसं मला एकदम हलकं वाटलं. समोरच्या तांब्यातलं घोटभर पाणी पिता पिताच नजर नकळत सभोवतालचा अंदाज घेत राहिली. रंग उडालेल्या
भिंतीवरचं जुनंपुराणं घड्याळ, एक लोखंडी कॉट, जुनं लोखंडी कपाट आणि भिंतीलगतच्या फोल्डिंगच्या लाकडी खुर्च्या..! नजरेनं क्षणार्धात टिपलेल्या या साधेपणात एक प्रकारचं औदासिन्यही भरून राहिलेलं होतं!
” हं.. बोला… ”
मी भानावर आलो. दचकून वर पाहिलं आणि एखाद्या प्रतिक्षिप्त क्रियेसारखा उठून उभा राहिलो.
” सर, नमस्कार.. “
“नमस्कार,.. बसा” ते हसतमुखाने म्हणाले. सहस्त्रबुद्धे आजोबाच ना हे किं…? मलाच प्रश्न पडला. या माणसाचं हसतमुख, सौम्य रूप प्रभुदेसाईनी वर्णन केलेल्या संतापी, तर्कटी, हेकेखोर अशा विक्षिप्त वृध्द माणसाच्या प्रतिमेला परस्पर छेद देणारंच होतं.
” एस्. एस्. सहस्त्रबुद्धे आपणच ना..? ” स्वतःचीच खात्री करून घ्यावी तशा सहजस्वरांत मी विचारलं.
“हो.. आपण? “
” मी… मी ए. जी. लिमये. चीफ मॅनेजर म्हणून युनियन बॅंकेच्या इथल्या झोनल आॅफिसमधे मी नुकताच चार्ज घेतलाय आणि… “
बॅंकेचं नाव ऐकताच त्यांच्या चेहऱ्यावरचं स्मितहास्य क्षणार्धात विरून गेलं. चेहरा आक्रसला.
” काम काय आहे ते बोला… ” त्यांनी फर्मावलं.
” तुम्ही एका ब्रॅंचमॅनेजर विरूध्द केलेल्या तक्रारीबाबतची फाईल माझ्या वाचनात आली आणि म्हणून… “
” म्हणून वाट वाकडी करून आज इथं आलात? ” ते कडाडले. ” दूधखुळा समजलात कां मला..? आजपर्यंत दर आठवड्याला एकेक पोस्टकार्ड खरडून दरवर्षी ५२ या हिशोबाने गेल्या ३ वर्षात १५६ स्मरणपत्रं पाठवल्यानंतर आज जागी झाली कां तुमची बॅंक..? “
“नाही तसं नाही.. पण.. “
“पण-परंतुच्या गप्पा मला सांगू नका. तुमच्या बँकेचं नाव सहज जरी कानावर पडलं तरी तुमच्या त्या निर्लज्ज ब्रॅंचमॅनेजरचा चेहरा माझ्या डोळ्यासमोर उभा रहातो आणि माझ्या तळपायाची आग मस्तकांत जाते. या तुम्ही. ती फाईल व्यवस्थित वाचलीयत ना तुम्ही? मग त्या बेजबाबदार माणसाविरूध्द आधी कारवाई करा. यामधे ब्रह्मदेव उतरून आला तरी तडजोड होणे शक्य नाहीss. या तुम्ही. ” ते ताडकन् उठले…
सगळं हातून निसटून जाण्यापूर्वी ते घट्ट धरून ठेवणं आवश्यक होतं पण….
” सर.. मला जे सांगायचंय ते निदान ऐकून तरी घ्या ना प्लीज… “
” मला फाफटपसारा नकोsय. बोलाs.. काय सांगायचंय..?
“तुम्ही म्हणालात तशी ती फाईल वाचलीय मी. तुम्ही लिहिलेली स्मरणपत्रंही पाहिलीत. त्यासंबंधीच तुमच्याशी मोकळेपणानं बोलायचं होतं सर. म्हणून… “
” मी बोललोय सर त्यांच्याशी ” मी शांतपणे म्हणालो. “पण कोणत्याही प्रश्नाला दोन बाजू असतात ना सर? तुमची बाजू न ऐकताच, ती समजून न घेताच, कोणत्याही निष्कर्षाप्रत येणं मला योग्य वाटलं नाही म्हणून मी आलोय. यात माझा कोणताही स्वार्थ नाहीय. माझ्यावरची जबाबदारी स्वत:शी प्रामाणिक राहून मला पूर्ण करायचीय. हे करताना तुमच्यावर नकळत अन्याय होऊ नये असं मला मनापासून वाटतंय. म्हणून फक्त तुमची बाजू जाणून घ्यायला मी आलोय. मला सहकार्य करायचं कीं नाही हे तुम्ही ठरवायचंय.
तेही एक उपचार म्हणून आजच्याआज ठरवावं असा माझा आग्रह नाहीय. तुम्ही शांतपणे विचार करा, मग सांगा.
तुमचा गुरूचरित्र सप्ताह सुरू आहे ना? त्याची आधी सांगता होऊ दे. त्यात व्यत्यय नको. हवंतर त्यानंतरच्या तुम्ही सांगाल त्या दिवशी मी पुन्हा येईन. “
ते विचारात पडल्याचे पाहून मी घुटमळलो.
“सप्ताह असं नाही. माझं रोज एक अध्याय असं नित्यवाचनच असतं. आज मला बाहेर जायचंय एका कामासाठी. तुम्हाला शक्य असेल तर असंच उद्या सकाळी आलात तरी चालेल… ” ते शांतपणे म्हणाले.
” पण त्या माणसावर कारवाई होण्याच्या बाबतीत कोणतीही तडजोड होणार नाहीs.. हे लक्षात ठेवा. “
“मी समजू शकतो सर. येतो मी. “
त्यांचा निरोप घेऊन मी बाहेर पडलो. यातून पुढे काय निष्पन्न होणाराय मला माहित नव्हतं. पण आज माझ्यासाठी निदान सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या मनाची दारं थोडीतरी किलकिली झाली होती आणि त्या दाराआड ‘तो’ साक्षीरूपाने उभा असणार आहे हा एक शुभसंकेतच होता माझ्यासाठी. म्हणूनच तिथून बाहेर पडताना फार कांही न मिळताही बरंच काही गवसल्याचं समाधान मनात भरून राहिलं होतं..!!
☆ परमेश्वराचे दर्शन… लेख क्र. १७ – देणाऱ्याचे हात हजार… ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे ☆
देणाऱ्याचे हात हजार…
माझ्या वर्गातील ऋजुताच्या (नाव बदललेले) वडिलांचा अपघात झाला होता.
घरची अत्यंत गरिबी. नोकरी नव्हती कारण कंपनी बंद झालेली होती. नाईलाज म्हणून कुठेतरी ताडीच्या दुकानावर रात्री दहा वाजेपर्यंत काम करत. तिथूनच रात्री घरी परत येताना त्यांना अपघात झाला.
समजल्याबरोबर बघायला हॉस्पिटलमध्ये गेले. त्यांना पाहिलं मात्र, मला भडभडून आलं. परिस्थितीनं माणूस किती अगतिक आणि लाचार बनतो, नाही का! पायात सळी घातल्याने पूर्ण पाय प्लॅस्टरमध्ये आणि पराकोटीचा केविलवाणा चेहरा. खूप वाईट वाटलं.
“ऋजुताची आई कुठे आहे? , ” विचारलं, तर त्या फोन करायला खालच्या मजल्यावर गेल्या आहेत असं कळलं. त्या येईपर्यंत ऋजुताच्या वडिलांशी गप्पा मारत बसले.
पंधरा वीस मिनिटांनी पाय ओढत येणाऱ्या ऋजुताच्या आई दिसल्या. त्यांच्याकडून कळलं की धावपळ करणारे कोणी नव्हते, त्या एकट्याच सगळीकडे पळत होत्या. रात्री वॉर्डमध्ये बायकांना राहण्याची परवानगी नव्हती म्हणून गावाहून त्यांनी भावाला बोलवलं होतं.
त्या स्वतः स्वयंपाकाची कामं करत, तीही बंद झाली होती, कारण त्यांना दिवसभर दवाखान्यात रहावं लागायचं. हे सगळं सांगताना त्यांना आतून येणारे दुःखाचे कढ मला जाणवत होते.
मी त्यांच्या खांद्यावर हात ठेवला मात्र, त्यांच्या दुःखाचा बांध फुटला.
“काही काळजी करू नका, बाबांना लवकर बरं वाटेल. जीवावरचं पायावर निभावलं म्हणून देवाचे आभार माना. काही मदत लागली तर मला नक्की सांगा, ” असं म्हणून मी पर्समधले पाचशे रुपये काढून त्यांना दिले.
“नको बाई पैसे. तुम्ही स्वतः यांना भेटायला – बघायला हॉस्पिटलमध्ये आलात हेच आमच्यासाठी खूप आहे, ” असं म्हणत त्या पैसे परत देऊ लागल्या.
मी म्हटलं, “काय हो? तुमच्या मोठ्या बहिणीने पैसे दिले असते तर घेतले असते ना? ”
खरंच, त्यांना पैशांची खूप गरज होती. एरवी मला पैशांचं कौतुक नसतं, पण त्या घटकेला माझ्याजवळ जास्त पैसे असायला हवे होते, असं मला राहून राहून वाटायला लागले.
घरी आल्यावर, सर्वप्रथम मी त्या हॉस्पिटलमध्ये कामाला असलेल्या माझ्या एका माजी विद्यार्थ्याशी संपर्क साधला आणि ऋजुताच्या बाबांना सर्व मदत करायची विनंती केली. त्यानेही आज्ञाधारक विद्यार्थ्याप्रमाणे ती मान्य केली. ते हॉस्पिटलला असेपर्यंत ते रोज त्यांच्याकडे चौकशीला जात असे, औषधे देत असे.
पण त्यांच्या उपचाराच्या खर्चासाठी, तात्पुरते तरी घर चालवण्यासाठी पैशांची काहीतरी तजवीज करणं गरजेचं होतं.
काही विचार करून मी ऋजुताच्या वर्गातील काही निवडक पालकांना भेटायला बोलावलं. भीतभीतच मी ऋजुताच्या वडिलांच्या अपघातांविषयी आणि त्यांच्या घरच्या सध्याच्या परिस्थितीविषयी सविस्तर माहिती दिली आणि यथाशक्ती मदतीचं आवाहन केलं.
आमच्या शाळेतल्या बहुसंख्य विद्यार्थ्यांची आर्थिक स्थिती सर्वसाधारणच होती. त्यामुळे क्षणभर मला वाटलंही की पालक म्हणतील, “तुम्हाला करायची असेल तर करा तुम्ही मदत, आम्हाला कशाला वेठीस धरता? “
पण मी याही बाबतीत किती भाग्यवान आहे हे पुन्हा एकदा सिद्ध झालं. “बाई, अशा गोष्टींसाठी आम्हाला हक्कानं बोलवायचंच. आम्ही सगळेच मदत गोळा करू. तुम्ही सांगताय म्हणजे पैसे योग्य पद्धतीनेच वापरले जाणार याची आम्हाला खात्री आहे. तुम्ही कोणताही संकोच बाळगू नका. “अशी उत्स्फूर्त प्रतिक्रिया पालकांकडून मिळाली.
आणि हे नुसतं, तोंडदेखलं आश्वासन नव्हतं. पालकांनी पैसे आणून द्यायला सुरुवात केली. पन्नास रुपयांपासून अगदी पाच हजार रुपयांपर्यंत लोकांनी मदत केली.
वेळोवेळी जमा झालेले पैसे ऋजुताच्या आईला देत गेलेच. नंतर आलेले पैसे आणि साडी देऊन, मातृदिनाच्या दिवशी त्यांची ओटी भरावी, आणि त्यांच्या चेहऱ्यावरील हरवलेलं हास्य, थोड्या प्रमाणात का होईना, त्यांना परत मिळवून द्यावं, हीच इच्छा आहे.
आणि हजारो हातांनी देणाऱ्या माझ्या दानशूर आणि मनाने तितक्याच श्रीमंत असणाऱ्या पालकांमुळे ती नक्कीच पूर्ण होईल.
(ऋजुताच्या वडिलांचे पाय व्यवस्थित सुधारले. आता ऋजुता, आई व वडील सर्व छान आहेत.)
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “किसने है इन्हें जाना…” ।)
☆ तन्मय साहित्य #२९८ ☆
☆ किसने है इन्हें जाना… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “रुकना नहीं” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # ११९ ☆ रुकना नहीं ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆