(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “करो तालीम हासिल हो जहाँ से…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२३ ☆
करो तालीम हासिल हो जहाँ से… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है…।)
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “लक्ष्मी स्तुति… “।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन जीने की दिशा।)
☆ लघुकथा # ८७ – जीवन जीने की दिशा☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
“क्या अम्मा हमेशा सब्जी बेचने टोकनी उठा कर आ जाती हो? कभी आराम नहीं करती? कोई तिथि त्यौहार नहीं मानती हो क्या?? रागिनी ने कहा।
बूढी अम्मा कमला ने मुस्कुराते हुए कहा – “बेटा यदि त्यौहार मनाने लगे तो हम खाएंगे क्या? हमारे लिए तो क्या त्यौहार और क्या सब दिन एक बराबर ही है बेटा, आप जैसे लोग कुछ खरीद लेते हो तो हमारा त्यौहार मान जाता है, मेरा छोड़ो बेटा यह बताओ तुमने इस त्यौहार में क्या मनाया? थोड़ा पानी पिला दो एक तुम ही हो जो थोड़ा चाय और पानी पिला देती हो।”
“अम्मा तुम्हारे बहाने मेरा भी कुछ समय तो कट जाता है वरना बच्चे और पति दिनभर बाहर निकल जाते हैं सब शाम को आते हैं तुम्हारे साथ थोड़ी देर बैठकर मैं भी अपने घर के कामों से आराम कर लेती हूं।”
“पितृ पक्ष आ रहे हैं श्राद्ध में क्या तुमने दाल की पूरी बनाई है?”
“अम्मा बना तो लूं पूरी और सारा पकवान पर कोई स्वाद से खाता नहीं है यह सब चीज मुझे तो बहुत पसंद है पर किसी को पसंद नहीं आती इसलिए बनाने का मन नहीं करता।”
चाय पीते हुए बुढ़िया मां कमला कुछ गहरी चिंता में खो गई।
“अम्मा क्या हुआ?” रागिनी ने कहा।
“कुछ नहीं बेटा जब मेरे पति जिंदा थे वह एक फैक्ट्री में नौकरी करते थे, बहुत खुश थी बच्चों को पढ़ाया लिखाया लेकिन अब वही बच्चे नौकरी करने लग गए और मुझे पराया कर दिया। पति की थोड़ी पेंशन मिलती है जिससे घर का किराया भर देती हूं और सब्जी बेचने से मेरा समय कट जाता है।”
“आपकी तरह पढ़ी-लिखी नहीं हूं बेटा बचपन में ही मेरी शादी हो गई थी बस घर गृहस्थी ही सीखा है लेकिन अब यह टोकरी उठाकर कहीं जाया नहीं जाता यदि एक दो घर में खाना बनाने का काम मिल जाए तो तुम मुझे बता देना।”
“ठीक है अम्मा मेरी पड़ोस में जो भाभी रहती है वह नौकरी करती है वह कई एक खाना बनाने वाली को ढूंढ रही थी।”
“आप रुको दाल पुरी की तैयारी करती हूं और साथ ही बच्चों की पसंद का नाश्ता भी बना दूंगी क्या आप मेरी मदद करोगी?”
“क्यों नहीं बेटा?”
“बच्चों और पति के लिए बड़ी प्रेम पूर्वक में खाना बनाती थी सब कहते हैं मेरे हाथों में बहुत स्वाद है। जा बेटा तू आराम कर और यह अपना कोई और काम कर ले आज का खाना तेरी रसोई में ही बना कर रख देती हूं” और कमला मां उसे बड़े प्यार से खाना परोसने लग गई।
“मां के बाद आज पहली बार आपने गरम-गरम खाना बना कर खिलाया। मां को गए तो बरसों हो गए मायके में भी कभी यह सुख नहीं मिला।”
“कोई बात नहीं बेटा।”
“पर अम्मा आपने इतना काम किया मैंने आपसे सब्जी भी नहीं खरीदी कुछ सब्जियां तो ले लेती हूं।”
“नहीं नहीं बेटा आज मुझे एक बेटी मिल गई है इसी तरह मैं दोपहर में आया करूंगी और तुम मुझे कोई काम बता दिया करना।”
दोनों के चेहरे पर एक विजय मुस्कान सी थी जैसे लग रहा था कि दोनों को जीवन जीने की एक दिशा मिल गई है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२१ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २१ ☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – प्रभु मुझको वरदान यही दो”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # १९४ – गीत – प्रभु मुझको वरदान यही दो ☆
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७८ ☆
व्यंग्य – जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
जेन जी ने एक ऐसी भाषा गढ़ी है जिसने व्याकरण नामक चीज को सीधे तौर पर चैलेंज कर दिखाया है। यह भाषा नहीं, एक क्रांति है, जिसे हम ‘जेन जी’ यानि जनरेशन जी की ‘लोल’ भाषा कह सकते हैं। यह भाषा मोबाइल और चैट की दुनिया की वह शॉर्टहैंड है जहां शब्दों का मतलब बदल जाता है, वर्ण विलीन हो जाते हैं और इमोजी एक पूरी वाक्य की भूमिका निभाने लगते हैं। इसे समझने के लिए आपको किसी डिक्शनरी की नहीं, बल्कि संदर्भ के अनुरूप एक विशेष समझ की जरूरत होती है।
इस भाषा का मूल सिद्धांत है ‘जो दिखे सो नहीं, जो लिखे सो है’। मसलन, ‘यू’ ‘आप’ नहीं, ‘तू’ हो जाता है। ‘आर’ ‘हैं’ नहीं, ‘हो’ बन जाता है। और ‘लोल’? अरे भाई, ‘लोल’ तो हंसने की आवाज़ नहीं, जीवन जीने का एक तरीका है! लाफ आउट लाउडली। यह भाषा इतनी लचीली है कि इसमें ‘थैंक्यू’ ‘थेंक्स’ बनता है, फिर ‘थैंक्स’ से ‘टी.एन.एक्स’ और फिर सीधे ‘टी.क्यू’ तक पहुंच जाता है। यानी, जाकी रही भावना जैसी , वह समझे बोली वैसी। शब्दों में अक्षरों का वजन घटता चला जाता है। क्लासिक टेस्ट क्रिकेट, फिफ्टी फिफ्टी, 20 .. 20 से होते हुए इस भाषा में सुपर ओवर बन जाता है। युवाओं की इस भाषा में अक्षरों की बलि चढ़ाना आम बात है। स्वरों को तो जैसे दरबार से निकाल बाहर किया गया है। ‘व्हाट आर यू डूइंग?’ जैसा भद्दा और लंबा वाक्य इस नई भाषा में ‘व्हाट आर यू डूइंग?’ न रहकर ‘वट आर यू डूइंग?’ बन जाता है और फिर धीरे-धीरे ‘वट आर यू डूइन’ और अंततः ‘डूइन वट?’ तक सिमट चुका है। यह एक तरह से भाषा का मिनिमलिज्म है, जहां कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा भाव अभिव्यक्त हो रहे हैं।
रही सही कसर असर दार इमोजी निकाल रहे हैं। इमोजी इस मजेदार भाषा की आत्मा हैं। एक हंसता हुआ चेहरा जिसकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं (एल.ओ.एल.) वह खुशी, गम, हैरानी, या फिर सिर्फ ‘यार, मजाक था’ तक का संदेश दे सकता है।
एक लाल दिल (लव) प्यार, दोस्ती, शुभकामना या फिर ‘ओके, बाय’ का इशारा कर सकता है। यह एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है जो देश, काल, जाति, धर्म के बंधन तोड़कर सीधे दिल से दिल तक रात बिरात बात पहुंचाती नजर आती है।
इस भाषा ने एक नए प्रकार के सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है। वे जो इस कोड को समझते हैं और वे जो नहीं समझते। एक मां का अपने बेटे के मैसेज ‘पी.सी.एम., जी.एन., टी.सी., आई.एल.वाय’ को देखकर हैरान होना और फिर उसे समझने के लिए इंटरनेट की मदद लेना, आज के दौर की एक सामान्य घटना है। ‘पी.सी.एम.’ यानी ‘पेरेंटल कंट्रोल मच’, ‘जी.एन.’ यानी ‘गुड नाइट’, ‘टी.सी.’ यानी ‘टेक केयर’ और ‘आई.एल.वाय’ यानी ‘आई लव यू’। यह एक छोटा सा संदेश एक पूरी भावनात्मक बातचीत को समेटे हुए है। इसके सम्मुख बंद हो चुके मार्स कोड वाला टेलीग्राम पानी भर रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर, यह ‘लोल’ भाषा महज शब्दों का संक्षिप्तिकरण नहीं है। यह एक सांस्कृतिक बदलाव है, जो तकनीक और समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश है। युवाओं के पास समय का अभाव हो सकता है, या उनकी आयोडीन नमक सेवन वाली बुद्धि की कुशाग्र समझ का परिणाम हो सकता है । पुरानी पीढ़ी को यह अजीब लगे, लेकिन यह नई पीढ़ी की अपनी मौलिकनपहचान है।
इसलिए अगली बार जब कोई आपको ‘आई.डी.के.’ (आई डोंट नो) लिखे, तो नाराज न हों। बस ‘एस.एम.एच.’ (शेकिंग माय हेड) करते हुए ‘टी.टी.वाय.एल.’ (टॉक टू यू लेटर) लिख दें। क्योंकि अगर आपने इस भाषा का विरोध किया, तो ‘जी.ओ.ए.टी.’ (ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम) जनरेशन आपको ‘टी.एल.डी.आर.’ (टू लॉन्ग, डिड नॉट रीड) कहकर नजरअंदाज कर देगी। और हां, ‘एफ.वाय.आई’ (फॉर यूअर इनफार्मेशन), इस पूरे लेख को पढ़ने के लिए ‘टी.वाय’ (थैंक यू)!
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “महालक्ष्मी”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆
🌻लघुकथा🌻 🛕महालक्ष्मी 🛕
पेशे से इंजीनियर राहुल, पर सारा गुणांक उसकी पत्नी करती थी। आज माँ फिर से दिपावली पर पूरे घर की साफ सफाई कर घर की लक्ष्मी (बहु) आने का इंतजार कर रही थी।
छोटा बेटा अपनी माँ का पूरा ध्यान रखता, पर हाय रे विदेश में रहने वाले बेटा बहु!!
पेंशन में जितना मिलता घर का खर्च चलता। माँ ने खुश होकर साड़ी सुहाग का समान बहु के आने पर उपहार स्वरूप देने लगी।
अरे मम्मी जी – – माना कि आपके पास नही है। पर दे ही रही तो चाँदी के सिक्के देती तो कुछ काम आता।
ये मेरे किस काम के – – सामने खड़ी घर में काम करती बाई को देते फोन पर काल करने लगी।
छोटा बेटा दिये लगा रहा था। मुझे तो महालक्ष्मी ही सर्वोपरि है। बेटे के सिर पर हाथ फेरती माँ बोल उठी मुझे भी दीपक का उजाला आज दिखाई दिया है।
दोनों एक दूसरे की बात समझ। पूजन की तैयारी करने लगे।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५० ☆ देश-परदेश – International Coffee Day ☆ श्री राकेश कुमार ☆
(1st October)
अंग्रेजों ने हमारे देश की चाय को हमें ही पीना सिखाया था। काफ़ी भी पश्चिम की देन मानी जा सकती है। हमारे देश में तो खालिस याने कि शुद्ध दूध पीने का रिवाज़ हुआ करता था। अब हम लोग उसी दूध की दिन भर चाय या काफी पीते रहते हैं। दूध से होने वाले सारे लाभ, चाय और काफी के उपयोग से गवां देते हैं।
एक जमाना था, जब अंग्रेजों का राज आधी दुनिया पर हुआ करता था, उन्होंने कमाई के चक्कर में हमारे देश की चाय को खूब बेचा था। अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में चाय के बहिष्कार को आजादी का हथियार बनाया गया था। चाय के बदले काफ़ी के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया। इसलिए अमेरिका में आज भी काफी का ही चलन है।
हमारे देश के दक्षिण भाग में भी काफी का चलन बहुत अधिक है। देश के उत्तरी और पश्चिम भाग में काफी के प्रसार में “इंडियन काफी हाउस” नामक चेन ने बहुत बड़ा रोल निभाया था।
कुछ दशकों तक काफी अमीरों के यहां पी जाती थी, मध्यम वर्ग में भी धीरे धीरे खास मेहमानों के लिए काफी परोसे जाने लगी है।
हमारे कुछ मित्र भी जब कभी घर आते है, तो कहते है, हम चाय नहीं पीते, काफी पिलवा दो। इसके विपरीत हम जब उनके घर जाते है, तो चाय परोस देते है, ये कहते हुए तुम तो चाय ही पीते हो, और खुद भी हमारे नाम से चाय ही पीते हैं।
पश्चिम ने काफ़ी को केक, चाकलेट, आइसक्रीम के माध्यम से भी हमारी जुबां के जायके को बदलने की भी साजिश की गई थी। जिंदगी भर चाय पीने वाली महिलाएं भी दुकान पर “काफी कलर” की साड़ी की मांग करती हुई मिल जाएंगी। गर्मी में काफी से तोबा करने वालों के लिए “आइस कॉफ़ी” लोकप्रिय की गई है। जबकि ठंडी या कड़वी चाय का मतलब हमारे देश के युवा अच्छे से जानते हैं।
सिनेमा घर और रेलवे स्टेशन पर एस्प्रेसो काफी की मशीनें लगाई गई थी। शादियों में केसर बादाम वाले दूध के स्थान पर काफी परोसी जाने लगी है। काफी की कड़वाहट कम करने के लिए चाकलेट/ कोको पावडर छिड़ककर स्वादिष्ट बनाया जाता था।
आज काफी की काफ़ी चर्चा हो गई है, अब मेहनत करके घर पर देसी एस्प्रेसो यानी काफी को चम्मच से रगड़ कर पिया जाएगा।