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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #94 – मानसून की पहली बूंदे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता   ‘मानसून की पहली बूंदे….….’। ) ☆  तन्मय साहित्य  # 94 ☆  ☆ मानसून की पहली बूंदे…. ☆ मानसून की पहली बूंदे धरती पर आई महकी सोंधी खुशबू खुशियाँ जन मन में छाई।   बड़े दिनों के बाद सुखद शीतल झोंके आए पशु पक्षी वनचर विभोर मन ही मन हरसाये, बजी बांसुरी ग्वाले की बछड़े ने हाँक लगाई।   ताल तलैया पनघट सरिताओं के पेट भरे पावस की बौछारें प्रेमी जनों के ताप हरे, गाँव गली पगडंडी में बूंदों ने धूम मचाई।   उम्मीदों के बीज चले बोने किसान खेतों में पुलकित है नव युगल प्रीत की बातें संकेतों में, कुक उठी कोकिला गूँजने लगे गीत अमराई। मानसून की पहली बूंदें धरती पर आई महकी सुध खुशबू जन-जन में छाई।   © सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश मो. 9893266014 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈...
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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #77 – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट”) ☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #77 – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट☆  भारत लम्बे समय तक ब्रिटिश...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 45 ☆ मौत से रूबरू ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर (श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता ‘मौत से रूबरू ’। )    Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा     ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 45 ☆ ☆ मौत से रूबरू ☆ वैसे तो मुझे यहां से जाना ना था, मुझे अभी तो और जीना था, कुछ मुझे अपनों के काम आना था, कुछ अभी दुनियादारी को निभाना था, एक दिन अचानक मौत रूबरू हो गयी, मैं घबरा गया मुझे उसके साथ जाना ना था, मौत ने कहा तुझे इस तरह घबराना ना था, मुझे तुझे अभी साथ ले जाना ना था, सुनकर जान में जान आ गयी, मौत बोली तुझे एक सच बतलाना था, बोली एक बात कहूं तुझसे, यहाँ ना कोई तेरा...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 97 ☆ स्फुट ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 97 ☆ ☆ स्फुट ☆ मी डोळे उघडले सकाळी सात वाजता, तेव्हा नवरा स्वतःचा चहा करून घेऊन, टेरेस वरच्या फुलझाडांना पाणी द्यायला गेलेला! मी फेसबुक, व्हाटस् अॅप वर नजर टाकली..... काल रात्री एक कवयित्री मैत्रीण म्हणाली, "अगं तू "सुंदर" का म्हणालीस त्या पोस्टला? किती खोटं आहे ते सगळं....." खरंतर न वाचताच सांगीवांगी मी त्या पोस्टला "सुंदर" म्हटलेलं, मग फेसबुक वर जाऊन वाचलं ते आणि काढून टाकलं लाईक आणि कमेन्ट खरंतरं न वाचताच मत देत नाही मी कधीच पण अगदी जवळच्या व्यक्तीनं भरभरून कौतुक केलेलं पाहून,  मी ही ठोकून दिलं...."सुंदर"! आता ते ही डाचत रहाणार दिवसभर....!   तिनं सांगितलं....एका कवीनं स्वतःचीच तारीफ करण्यासाठी फेसबुक वर खोटी अकाऊंटस उघडल्याची आणि ते उघडकीस आल्यावर त्याला नोकरीवरून काढून टाकल्याची बातमी! खोट्या पोस्ट टाकणा-यांनाही होईल अशीच काही शिक्षा!   बापरे...आत्मस्तुतीसाठी काहीही.....   काल रात्रीचा भात कावळ्याला ठेवण्यासाठी टेरेसवर गेले तर... नवरा मोबाईल वर कुणाचा तरी "समझौता" घडवून आणत असलेला.... मी खुडली मोग-याची फुलं, वीस मिनिटं कोवळी  उन्हं अंगावर घेत, नाष्टा बनवायला खाली उतरले, पण मोबाईल वाजला... दोन मिनिटं बोलली सखी छानसं...   तर मोबाईल वर दिलीप सायरा ची छबी! आजकाल मला सायरा सती सावित्री वाटायला लागली आहे, पुन्हा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 83 ☆ रंग भरा तोहफ़ा ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा (सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता “रंग भरा तोहफ़ा”। ) आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं – यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 83 ☆ ☆ रंग भरा तोहफ़ा ☆ वो सीली सी महक... वो यादों की चहक... मजबूर कर रही थी मुझे कुछ बंद कमरे खोलने के लिए... कुछ भी तो नहीं था बस में मेरे, और चल पड़ी मैं दिल के मकाँ के अन्दर बने इन ख़ाली-ख़ाली से कमरों में...   धूल से ऐसी मटमैली लग रही थीं दीवारें और कमरे के कैनवास के रंग...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शब्द मेरे अर्थ तुम्हारे – 2 ☆ श्री हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर ☆ शब्द मेरे अर्थ तुम्हारे - 2 ☆ हेमन्त बावनकर☆   लोकतन्त्र का उत्सव मतदान लोकतन्त्र का पर्व ! शायद इसीलिए कुछ लोग मना लेते हैं सपरिवार महापर्व ।   दलदल सजग मतदाताओं ने घंटों पंक्तिबद्ध होकर किया मताधिकार मनाया - लोकतन्त्र का पर्व!    किसी ने अपने विवेक से किसी ने अविवेक से।   किसी ने धर्म से प्रेरित होकर किसी ने जाति से प्रेरित होकर।   अंत में जो जीता उसने बदल लिया अपना ही दल।   किंकर्तव्यमूढ़ मतदाता ! देख रहा है लोकतन्त्र का भविष्य? समझ नहीं पा रहा है कि वह किसी दल में है या किसी दलदल में?   © हेमन्त बावनकर, पुणे  15 जून 2021 प्रातः7.57 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 108 ☆ पं. रामेश्वर गुरू – आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी द्वारा लिखित रामेश्वर गुरू स्मृति शताब्दि समारोह के अवसर पर वैचारिक आलेख - पं. रामेश्वर गुरू - आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार। इस ऐतिहासिक रचना के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।) रामेश्वर गुरू स्मृति शताब्दि समारोह के अवसर पर वैचारिक आलेख  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 108 ☆ पं. रामेश्वर गुरू - आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार पं. रामेश्वर गुरू  कलम से ही नहीं मैदानी कार्यो से भी आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार  वर्ष १९५० का दशक,...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 89 –विनाश और विकास के मध्य संतुलन !!– ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  समसामयिक विषय पर आधारित एक विचारणीयआलेख  “ विनाश और विकास के मध्य संतुलन !!”। इस सामयिक एवं सार्थक रचना के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 89 ☆   आलेख - विनाश और विकास के मध्य संतुलन !!   आपने कभी सोचा कि हर प्रार्थना का उत्तर नहीं आता है और कई बार भगवान का भेजा हुआ संदेश इंसान समझ नहीं पाता है?? ऐसा क्यों होता है कि - अपनों का साथ बीच में ही छूट जाता है? आज जो विषम परिस्थितियां बनी हैं। वे पहले भी बन चुकी हैं। एक सृष्टिकर्ता केवल सृष्टि करते जाए तो सोचिए क्या होगा ? वसुंधरा तो पूरी तरह नष्ट हो जाएगी न। इसीलिए विनाश या जिसे प्रलय या नष्ट होना कहा जाता है। इसका होना भी नितांत आवश्यक...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 97 ☆ जिद्द पेरली ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 97 ☆ ☆ जिद्द पेरली ☆ जीवनाच्या मातीमध्ये जिद्द पेरली मी होती केले अश्रुंचे सिंचन कुठे होती सोपी शेती   माझ्या सागराच्या तळी गाळ साठलेला किती पापण्यांच्या शिंपल्यात काही पिचलेले मोती   घरामध्ये नाही तेल आणू कुठून मी वाती तुला ओवळण्यासाठी फक्त माझ्या दोन ज्योती   आला मेघ भेटायला तहानलेल्या घागरी सोडा कोरडा विचार ठोवा पाणी हे भरुनी   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की#50 – दोहे – ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ (संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)   लेखनी सुमित्र की #50 –  दोहे  शब्द वहां बेमायने, जहां तीव्र अहसास । कितनी भी दूरी रहे, प्रिय लगता है पास।।   अनदेखी आत्मा बड़ी, छोटा बहुत शरीर।  मिलन बिंदु के मध्य में, खींची एक प्राचीर।।   बस तन ही माध्यम बना, करें प्रेम अहसास।  आत्मा को तो मानिए, मरुथल का मधुमास।।   सीढ़ी से तुम उतरती, सधे हुए लय ताल।  एड़ी की आभा रचे, नए इंद्र के जाल।।   चाह चाहती चांदनी, मनचाहे मकरंद । इन यादों का क्या करूं, रचती शोध प्रबंध।।   © डॉ राजकुमार “सुमित्र” 112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश...
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