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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 82 ☆ व्यंग्य – चला-चली का खेला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार (वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक  बेहद मजेदार व्यंग्य  'चला-चली का खेला '। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 82 ☆ ☆ व्यंग्य – चला-चली का खेला ☆ नगर की जानी-मानी सांस्कृतिक संस्था 'हंगामा' ने सुराचार्य का संगीत कार्यक्रम आयोजित किया। 'सांस्कृतिक' शब्द बड़ा व्यापक है। उसमें...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 81 ☆ पिंजरा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ संजय उवाच # 81 ☆ पिंजरा ☆ मानवीय मनोविज्ञान के अखंडित स्वाध्याय का शाश्वत गुरुकुल है सनातन अध्यात्मवाद। भारतीय...
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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 37 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 37 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 37) ☆  Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 38 ☆ नवगीत – सड़क पर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ (आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी  द्वारा रचित  ‘नवगीत - सड़क पर ’। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 38 ☆  ☆ नवगीत - सड़क पर ☆  फ़िर सड़क पर भीड़ ने दंगे किए . आ गए पग भटकते-थकते यहाँ छा गए पग अटकते-चलते यहाँ जाति, मजहब, दल, प्रदर्शन, सभाएँ, सियासी नेता ललच नंगे हुए . सो रहे कुछ थके सपने मौन हो पूछ्ते खुद खुदी से, तुम कौन हो? गए रौंदते जो, कहो क्यों चंगे हुए? . ज़िन्दगी भागी सड़क पर जा रही आरियाँ ले हाँफ़ती, पछ्ता रही तरु न बाकी खत्म हैं आशा कुंए . झूमती-गा सड़क पर बारात जो रोक ट्रेफ़िक कर रही आघात वो माँग कन्यादान भिखमंगे हुए . नेकियों...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – ये उत्सव है लोकतंत्र का ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” (आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  श्री सूबेदार पाण्डेय जी की श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के जन्मदिवस पर एक भावप्रवण कविता “ये उत्सव है लोकतंत्र का”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  ये उत्सव है लोकतंत्र का ☆ ये उत्सव है लोकतंत्र का, मतदाता का दिन आया।   रणभेरी दुंदुभी बज उठी, सबने लालच का जाल बिछाया। अपना अपना मतलब साधे, देखो उनका अनर्गल प्रलाप। जाति पांति मजहब भाषा के, ले मुद्दे करते विलाप। ।। ये उत्सव है लोकतंत्र का ।।1।।   ये विकास का ख्वाब दिखाते, नारों से भरमाते हैं। जनता की सुधि ले न सके, बस इसी लिए घबराते हैं। जाति धर्म से ऊपर उठकर, राष्ट्र धर्म का गान करो। लोकतंत्र के उत्सव में निर्भय हो मतदान करों। ।। ये उत्सव है लोकतंत्र का ।।2।।   सजग नागरिक बन करके, देश के पहरेदार बनो। मत घायल होने दो भारत मां को, पीड़ा सह लो दिलदार बनो। लघु प्रयास मतदाता का , अपना रंग दिखायेगा । जब प्रत्याशी योग्य चुनोगे तुम फिर लोकतंत्र जी जायेगा। ।। ये उत्सव है लोकतंत्र का ।।3।।   उदासीनता यदि बरती तो, नहीं किया गर तुमने मतदान । फिर चोटिल होगी भारत मां फिर...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 25 ☆ किसी पावन तत्व से है भरा यह ब्रह्मांड सारा ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  (आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की एक भावप्रवण कविता  “किसी पावन तत्व से है भरा यह ब्रह्मांड सारा“।  हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 25 ☆ ☆ किसी पावन तत्व से है भरा यह ब्रह्मांड सारा ☆ किसी पावन तत्व से है भरा यह ब्रह्मांड सारा इसी की नियमित कृपा से चल रहा जीवन हमारा   आज पर बढ़ते करोना कष्ट से सब डर रहे हैं लोग कितने विश्व में उपचार के बिन मर रहे हैं   स्वार्थी संसार का जनहित विरोधी आचरण है विचारों और कर्म से दूषित सकल वातावरण है   नाम सेवा का बताकर हो रहा है स्वार्थ साधन इसी अनुचित नीति कर रखा तन मन धन अपावन   शुद्धता शुचिता सरलता का अनादर दिख रहा है इसी से दुख से भरा इतिहास यह युग लिख रहा है   आज जग को प्रेम और विश्वास का व्यवहार चहिए त्रस्त जीवन को परस्पर शांति सुख हित प्यार चहिए   किंतु सीधी राह को...
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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ – भाग -5 – सुश्री शिल्पा मैंदर्गी ☆ प्रस्तुति – सौ. विद्या श्रीनिवास बेल्लारी

सुश्री शिल्पा मैंदर्गी (आदरणीया सुश्री शिल्पा मैंदर्गी जी हम सबके लिए प्रेरणास्रोत हैं। आपने यह सिद्ध कर दिया है कि जीवन में किसी भी उम्र में कोई भी कठिनाई हमें हमारी सफलता के मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। नेत्रहीन होने के पश्चात भी आपमें अद्भुत प्रतिभा है। आपने बी ए (मराठी) एवं एम ए (भरतनाट्यम) की उपाधि प्राप्त की है।) ☆ जीवन यात्रा ☆ मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ – भाग -5 – सुश्री शिल्पा मैंदर्गी  ☆ प्रस्तुति – सौ. विद्या श्रीनिवास बेल्लारी☆  (सौ विद्या श्रीनिवास बेल्लारी) (सुश्री शिल्पा मैंदर्गी  के जीवन पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ “माझी वाटचाल…. मी अजून लढते आहे” (“मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ”) का ई-अभिव्यक्ति (मराठी) में सतत प्रकाशन हो रहा है। इस अविस्मरणीय एवं प्रेरणास्पद कार्य हेतु आदरणीया सौ. अंजली दिलीप गोखले जी का साधुवाद । वे सुश्री शिल्पा जी की वाणी को मराठी में लिपिबद्ध कर रहीं हैं और उसका  हिंदी भावानुवाद “मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ”, सौ विद्या श्रीनिवास बेल्लारी जी कर रहीं हैं। इस श्रंखला को आप प्रत्येक शनिवार पढ़ सकते हैं । )   जब मेरे घर मेरे...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 78 ☆ भाग्य बनाम कर्म ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख भाग्य बनाम कर्म।  यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 78 ☆ ☆ भाग्य बनाम कर्म ☆ 'भाग्य पर नहीं, कर्म पर उम्मीद रखिए। कर्म उम्मीदों को दुगुन्ना कर देता है।' सो! हौंसला व रुतबा बनाए रखिए... अच्छे दिन तो आते-जाते रहते हैं। संबंध इंद्रधनुष की भांति हैं, जो दिलों में उमंग-तरंग व आनंदोल्लास जाग्रत करते हैं … अर्थात् प्रेम, खुशी, उल्लास, सत्य व विश्वास उत्पन्न करते हैं– जिसका मूल उद्देश्य है...सम्मान देना। सो!...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 77 ☆ मकर संक्रांति – भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  मकरणक्रान्ति पर्व पर “भावना के दोहे”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 77 – साहित्य निकुंज ☆ ☆ मकर संक्रांति - भावना के दोहे ☆ उत्तरायणी पर्व का, होता है आगाज। मकर राशि पर आ गए, सूर्य प्रभाकर आज ।।   आसमान को घेरकर, उड़ने लगी पतंग। कनकौयें भी भिड़ गये, लड़ते जैसे जंग ।।   लहर-लहर आकाश में,उ ड़ने लगी पतंग। छलक रहा उल्लास अति, बाल सखा के संग।।   अलग-अलग त्योहार है, रंग अनेकों भ्रांति। कहीं पर्व पोंगल कहीं, मने मकर संक्रांति।।   पर्व मकर संक्रांति का, तिल-गुड़ का त्यौहार। मिलजुल कर सब रहे, दावत का व्यवहार।।   गंगा में डुबकी लगा, करें आचमन नीर महिमा है संक्रांति की, निर्मल करे शरीर   बीत गया पतझड़ अभी, आने लगा बसंत। अच्छे दिन अब आ गए, हुआ शीत का...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 67 ☆ स्वामी विवेकानंद जयंती – संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष” (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 67 ☆ ☆ स्वामी विवेकानंद जयंती - संतोष के दोहे  ☆ विवेक और आनन्द का, जिनमें अद्भुत कोष सत्य,संस्कृति के लिए, किया बहुत जय घोष   नव युवकों को जगा कर, दिया नया उत्साह उठो चलो आगे बढ़ो, उनकी थी यह चाह   जिनके तन-मन में रचा, राष्ट्र प्रेम महान चले साथ लेकर सदा, धर्म और विज्ञान   संस्कारी सनातनी, जप-तप और ध्यान सकल सृष्टि में गूंजता,उ नका ही जय गान   कर राष्ट्र आराधना,...
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