(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सुलगती रात” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “मेरे पापा मिले क्या?“।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सारा कमाल इश्क़ का…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बहेलिया…।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)
श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।
सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।
पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—
“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”
चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ३२ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
गीतांजलीतील मृत्यूची परिकल्पना…
गीतांजलीतील बहुसंख्य कवितांमध्ये मृत्यूचा उल्लेख या ना त्या प्रकारे आलेला दिसतो. याचं कारण शोधण्याचा प्रयत्न केला तर दोन शक्यता आढळतात.
पहिली शक्यता ही की, रविंद्रनाथांनी त्यांच्या तरुणपणीच, त्यांच्या अगदी जवळच्या, प्रिय व्यक्तींचे मृत्यू फार जवळून पाहिले किंवा अनुभवले म्हटलं तरी चालेल. ते फक्त १३ वर्षांचे असताना त्यांचं मातृछत्र हरपले. नंतर ते २२ वर्षांचे असताना त्यांची जिवलग मैत्रीण, त्यांचे प्रेरणास्थान असलेली, त्यांच्या साहित्याची प्रथम वाचक, श्रोता व टीकाकार असलेली त्यांची समवयस्क वहिनी, कादंबरी देवींचा अनपेक्षित व अनैसर्गिक मृत्यू रविंद्रनाथांना उध्वस्त करून गेला.
यानंतर तर काळाची वक्रदृष्टीच त्यांच्या कुटुंबावर पडली असं म्हटलं तर अतिशयोक्ती होणार नाही. त्यांची पत्नी मृणालिनी देवी ऐन तारुण्यात, पाच मुले मागे सोडून, १९०२ साली त्यांना एकटं करून गेल्या. या धक्क्यातून बाहेर येण्यापूर्वीच फक्त ९ महिन्यांच्या अंतरालानंतर, त्यांची मुलगी रेणुका टी बी च्या संसर्गामुळे अवघ्या १३ व्या वर्षी मृत्यू पावली. त्यानंतर एक वर्षाच्या आतच रविंद्रनाथांच्या वडिलांचा मृत्यू (१९०५) झाला. त्यांचा धाकटा मुलगा समींद्रनाथ ११ वर्षांचा असताना कॉलरा होऊन देवाघरी गेला (१९०७). पाठोपाठ सतीशचंद्र नावाचा त्यांचा तरूण, बुद्धिमान सहकारी, जो कलकत्त्यातील आपलं सगळं वैभव सोडून शांतिनिकेतनाच्या कार्यात रविंद्रनाथांना मदत करण्यासाठी आला होता तो अचानक वारला. अशा प्रकारे १९०२ ते १९०८ या सहा वर्षांत त्यांनी पाच जवळच्या व्यक्तींना गमावलं. यानंतर १९२३ साली बंधू सत्येंद्रनाथ व १९२५ ला बंधू ज्योतिरिंद्रनाथ स्वर्गवासी झाले.
रविंद्रनाथांना मृत्यूविषयी वाटणारा जिव्हाळा, जो त्यांच्या गीतांजलीतील कवितांमधून जाणवतो त्याचं दुसरं कारण असू शकतं, ते म्हणजे त्यांचा प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञानाचा अभ्यास! या अभ्यासामुळे आत्मा अमर आहे व एक शरीर नष्ट झालं तरी दुसरं शरीर धारण करून तो पृथ्वीवर येतच असतो; या जन्ममृत्यूच्या चक्रावर त्यांचा दृढ विश्वास होता व म्हणूनच या चक्राचा उल्लेख अगदी पहिल्याच कविते पासून गीतांजलीत वारंवार आलेला दिसतो.
त्यांच्यातला कवी मृत्यूला कधी घाबरत नाही किंवा टाळण्याची इच्छाही व्यक्त करत नाही, उलट तो मृत्यूचं स्वागत करताना दिसतो.
ते म्हणतात, मृत्यूला का भ्यायचं? मरण म्हणजे दोन जन्मांमधली फक्त छोटीशी विश्रांतीच तर आहे.
आपण जन्म घेऊन जसे या जगात आलो, तसेच मृत्यू नंतर दुसऱ्या जगात प्रवेश करणार असतो. ते जग आपल्याला अनोळखी असतं म्हणून भीती वाटते म्हणावं तर जन्माआधी आपल्याला हे जग तरी कुठे माहीत होतं!
ज्या परमात्म्याच्या भेटीसाठी आपण जन्मभर तळमळतो, मृत्यूनंतर त्याचा चिरंतन सहवास आपल्याला मिळू शकतो, त्याच्याशी एकरूप होण्याची संधी आपल्याला मिळू शकते. या मर्त्य जगातून त्याच्या अमर्त्य जगात आपल्याला प्रवेश मिळतो. या सगळ्याचा टागोरांना अतिशय आनंद होतो. पतीगृही निघालेल्या नव्या नवरी प्रमाणे त्यांना त्या अमर्त्य जगाबद्दल प्रचंड उत्सुकता आहे. तिकडे जाण्याबद्दल आतुरता आहे.
तरूण वयातच मृत्यूच्या तांडवामुळे भावविश्वाच्या चिंध्या झाल्यानंतर, रविंद्रनाथांच्या जीवनात मोठी पोकळी निर्माण झाली, पण मृत्यूच्या या अनुभवानेच त्यांना मृत्यू विषयी विचार करायला भाग पाडले असणार आणि मग त्यांचा मृत्यू कडे बघण्याचा दृष्टीकोनच पूर्णपणे बदलला असावा. प्रियजनांच्या कायमच्या वियोगामुळं, त्यांचं लौकिक गोष्टीत गुंतलेलं मन मुक्त झालं आणि त्यांना पटलं की मृत्यूच्या चष्म्यातून जीवनाकडं बघायला हवं तरच जीवनाचं सत्य लक्षात
येईल.
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☆ गीत : ९४ ☆
AT this time of my parting, wish me good luck, my friends! The sky is flushed with the
dawn and my path lies beautiful.
Ask not what I have with me to take there. I start on my journey with empty hands and
expectant heart.
I shall put on my wedding garland. Mine is not the red-brown dress of the traveller, and though there are dangers on the way I have no fear in my mind.
The evening star will come out when my voyage is done and the plaintive notes of the
twilight melodies be struck up from the King’s gateway.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९३ ☆
☆ – सूरज नहीं दिया… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
कब्रगाहों में सुरक्षित रखा जा रहा है
एक जिन्दा और भरा-पूरा देश ।
शीऽऽशी, आहिस्ता बोलो,
शोर करोगे तो
कब्रिस्तान में मंडरा रहे गिद्ध
पहिन लेंगे बगुलों के वस्त्र
और देने लगेंगे
अजान…
हे भगवान !
शबनमी इलाके में
शोले चहलकदमी कर रहे हैं।
भेड़ियों की पदचापों से
गुलाबों के खेत-दर-खेत
उजड़ रहे हैं।
बारूद की गद्दीनशीनी पर
कर दिया गया है
अगरुगंध को निष्कासित,
और आँसुओं में डूबे दिल
हो रहे हैं
जड़ यंत्र द्वारा शासित ।
आखिर क्या है
इस मुश्किल का हल,
क्या कोई भी उपाय
नहीं हो सकता सफल ?
तो आओ,
हम सहयोगी बनें
और करें इस साजिश को विफल,
मगर, यह तब होगा
जबकि हिमालय
हिमालय रहे
न हो पाये ‘विन्ध्याचल‘।
☆
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “अश्रु जल का विरल सा...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “अश्रु जल का विरल सा...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “कुछ कुछ होता है का मतलब”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२ ☆
व्यंग्य ☆ “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
मैं रात्रि का भोजन करके पान खाने झब्बूलाल की दुकान पहुंचा। दुकान बंद होने का समय था इक्का दुक्का ग्राहक थे। दुकान में गाना बज रहा था
“तुम पास आए, यूं मुस्कुराए
तुमने न जाने क्या सपने दिखाए।
अब तो मेरा दिल जागे न सोता है।
क्या करूं हाए, कुछ कुछ होता है…
मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्ते भाई साहब कहते हुए एक पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पान मुंह के हवाले किया ही था कि झब्बू ने प्रश्न दाग दिया – भाई साहब, “ये कुछ कुछ होता है” का मतलब आखिर क्या होता है ? मैंने कहा झब्बू फालतू की बात मत छेड़ो, मुझे घर जाकर अभी एक लेख लिखना है। झब्बू बोला – भैया फालतू बात नहीं कर रहा। जब जब ये गाना सुनता हूँ देर तक सोचता रहता हूं कि आखिर ये “कुछ – कुछ” है क्या ? आप पत्रकार हैं। आप नहीं बताएंगे तो कौन बता पाएगा? मैंने कहा – प्यारे भाई पत्रकार क्या सब कुछ जानता है ?
झब्बू ने मेरी ओर लम्बी मुस्कान फेंकते हुए कहा – भैया में तो ऐसा ही समझता हूं। पत्रकार चोरी, डकैती, खून के बारे में पुलिस से ज्यादा, बजट के बारे में वित्त मंत्री और अर्थशास्त्रियों से ज्यादा, विदेश नीति के बारे में विदेश मंत्री और देश की सुरक्षा के बारे में रक्षा एवं गृह मंत्री व सेना से ज्यादा जानता है। अभी राम मंदिर में चंदा चोरी पर समाचार पत्रों को पढ़कर लग रहा है कि जैसे पत्रकार इस मामले में भी जांच अधिकारियों से ज्यादा जानते – समझते हैं। खेल पत्रकार तो क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन जैसे बड़े खेलों तक में यह बता देते हैं कि जीतने के लिए किस खिलाड़ी को कैसे खेलना चाहिए। शायद इसी कारण से लोग पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते, पत्रकारों से बचने की कोशिश करते हैं। मैंने झब्बूलाल से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा भाई मुझे माफ करो मैं सादा पत्रकार हूं, खोजी या खेल पत्रकार नहीं और वापस लौटने लगा। झब्बू ने आवाज दी भाई साहब ये भाभी जी का पान तो लेते जाएं। मैं वापस मुड़ और पान की पुड़िया ली। झब्बू ने मार्मिक शब्दों में कहा, भैया आपने मेरी शंका का समाधान नहीं किया। अब मुझे रात भर नींद नहीं आएगी। सोचता रहूंगा कि आखिर “कुछ कुछ होता है” का मतलब क्या होने से है।
मैंने कहा देखो भाई झब्बू – “कुछ कुछ होने” का कोई एक मतलब नहीं है। इसके हजार मतलब हैं जो अलग – अलग परिस्थितियों में अलग – अलग होते हैं। शाहरुख खान, काजोल, रानी मुखर्जी को जो “कुछ कुछ” हुआ था वह अलग था। किसी राष्ट्राध्यक्ष को टॉफ़ी पाकर और झुमके पहनने से किसी राष्ट्राध्यक्ष को जो “कुछ कुछ” हुआ वह अलग था, भारत की तरक्की देखकर चीन, पाकिस्तान और अमेरिका को जो “कुछ कुछ” हो रहा है वह अलग है, ईरान युद्ध में फंस कर ट्रंप को और यूक्रेन युद्ध में फंस कर पुतिन को होने वाला “कुछ कुछ” अलग है। इसी तरह बंगाल चुनाव हारकर ममता को और जीतकर भाजपा नेताओं को होने वाला “कुछ कुछ” भी अलग – अलग है। प्रियंका और राहुल को होने वाले “कुछ कुछ” की तुलना, बराबरी या समानता भी किसी दूसरे के “कुछ कुछ” से नहीं की जा सकती। मेरी बात से झब्बू के चेहरे पर समाधान के भाव उभरते देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मैं वापस लौटने लगा तो झब्बू ने टोका, बोला – भाई साहब, मुझे पता था कि पत्रकार के पास हर बात का जवाब होता है, वह अति दूरदर्शी होता है तभी तो जब चंद्रशेखर जी प्रधान मंत्री थे तब एक बार उन्होंने कहा था कि अब पत्रकारिता इतने आगे बढ़ गई है कि मुझे सुबह समाचार पत्र पढ़कर पता चलता है कि मैंने कल रात क्या सोचा अथवा मैं आगे क्या करने वाला हूं। पत्रकारों पर झब्बू की बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था।