हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६८ ☆ लघुकथा – कबिरा आप ठगाइए… ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘कबिरा आप ठगाइए…। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६८ ☆

☆ लघुकथा – कबिरा आप ठगाइए… ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

गरीब किसानों की आत्महत्या की खबर उसे द्रवित कर देती थी| अपनी माँगों के लिए किसानों के देशव्यापी आंदोलन में भी कई किसान मारे गए। नेताओं के कोरे वादे किसानों को आश्वस्त नहीं कर पाए। आत्महत्या का सिलसिला नहीं थमा। वह कई बार सोचता कि क्या कर सकता हूँ इनके लिए ? पैसों से हाथ तंग है, बस किसी तरह दाल – रोटी चल रही है परिवार की। क्या करूँ कि किसी किसान परिवार की कुछ तो मदद कर सकूँ। यही सोच-विचार करता हुआ वह घर से सब्जी लेने के लिए निकल पड़ा।

सब्जी मंडी बड़े किसानों और व्यापारियों से भरी पड़ी थी। भीड़ में किनारे एक बुढ़िया बैठी दिखाई दी, जिसके सामने थोड़े टमाटर और एक-दो सब्जियाँ रखी थीं। वह उसी की तरफ बढ़ गया और पास जाकर बोला—

“सब्जी ताजी है ना माई ?” 

बुढ़िया ने बड़ी आशा से पूछा- “ हाँ,का चाही बेटवा!” 

जमीन पर बिछाए बोरे पर रखे टमाटर के ढेर पर नजर डालकर वह बोला – “ ऐसा करो ये सारे टमाटर दे दो, कितने हैं ये ?”

बुढ़िया ने तराजू के एक पलड़े पर बटखरा रखा और दूसरे पलड़े पर बोरे पर रखे हुए टमाटर उलट दिए, बोली – “अभी तौल देते हैं भैया। ” तराजू के काँटे को देखती हुई बोली – “दो किलो हैं।”

“किलो का क्या भाव लगाया माई ? “

“चालीस रुपया ” 

“चालीस रुपया किलो ?” एकबारगी वह चौंक गया। कीमत तो ज्यादा थी ही, टमाटर भी ताजे नहीं थे। सब्जी बिना मोल भाव के वह नहीं खरीदता था। यह तो घाटे का सौदा है ? तभी उसकी नजर बुढ़िया के चेहरे पर पड़ी जो बिक्री होने की आस से खुश नजर आ रही थी। उसने और कुछ सोचे बिना टमाटर थैले में डलवा लिए और चल दिया।

वह गुनगुना रहा था- ‘कबिरा आप ठगाइए…‘

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # ३०३ ☆ आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०३ ☆

☆ आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय…

एक नीम, एक घर और स्मृतियों का संसार

रास्ते में चलते हुए कभी-कभी कोई दृश्य हमारी गति को धीमा कर देता है। दूर तक फैली हरियाली के बीच खिले कप के आकार जैसे पीले फूल, सड़क के दोनों ओर खड़े वृक्ष और कहीं अपनी जड़ों को धरती के ऊपर उतारते बरगद। प्रकृति के ऐसे दृश्य मन को किसी अनकही शांति से भर देते हैं। लगता है, सुकून की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं; वह हमारे आसपास ही बिखरा है। बस, उसे देखने के लिए मन का कुछ देर ठहरना जरूरी है।

ऐसे ही किसी रास्ते पर जब नीम दिखाई देता है, तो मेरी दृष्टि कुछ पल उसके साथ ठहर जाती है। उस क्षण मैं केवल सामने खड़े वृक्ष को नहीं देखती, मेरा मन अपने घर के आँगन तक पहुँच जाता है।

हमारा घर पुश्तैनी है। उसकी कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रही है। पिता ने अपने पिता से सुना था कि जब इस घर को लिया गया, तब भी आँगन के बीचोंबीच नीम का वृक्ष मौजूद था। घर के पास कभी एक तालाब हुआ करता था। समय के साथ आसपास का परिवेश बदला, घर में लोग आए और पीढ़ियाँ आगे बढ़ती रहीं, लेकिन नीम वहीं बना रहा। घर की संरचना भी कुछ इस तरह रही कि वह आँगन के केंद्र में अपना स्थान बनाए रख सका। मानो घर ने अपने विस्तार में इस वृक्ष के लिए जगह नहीं छोड़ी, बल्कि उसी को केंद्र मानकर अपना संसार रचा हो।

मेरे जन्म से पहले का यह नीम मेरे बचपन का सहज साथी रहा है। उसके होने को मैंने कभी किसी विशेष घटना की तरह नहीं देखा। वह घर में उतना ही स्वाभाविक था, जितनी सुबह आँगन में उतरती धूप। शायद आत्मीयता इसी तरह जन्म लेती है—बिना किसी घोषणा के, हमारे जीवन में चुपचाप जगह बनाती हुई।

आज जब कहीं रास्ते में नीम दिखाई देता है, तो उसकी पत्तियाँ जैसे मुझे अपनी ओर बुलाती हैं। मन में एक परिचित-सा भाव जागता है, जिसे किसी एक शब्द में व्यक्त करना कठिन है। क्या वह बचपन की स्मृति है, घर की गंध है या उस समय का आकर्षण, जो बीत जाने के बाद भी हमारे भीतर जीवित रहता है? शायद इन सबका मिला-जुला रूप है। इतना अवश्य जानती हूँ कि किसी अनजान रास्ते पर दिखाई देने वाला नीम भी मुझे मेरे अपने नीम तक पहुँचा देता है।

समय के साथ मनुष्य का जीवन बदलता है। घरों में रहने वाले लोग बदलते हैं, उनकी दिनचर्याएँ बदलती हैं और नई स्मृतियाँ पुरानी स्मृतियों की जगह बनाती हैं। लेकिन कुछ उपस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनका हमारे जीवन में होना ही एक स्थिरता देता है। हमारे घर का नीम मेरे लिए ऐसी ही उपस्थिति है। वह पीढ़ियों के बदलते जीवन के बीच अपनी जगह बनाए रहा। शायद इसी निरंतरता ने उसके साथ मेरे संबंध को इतना गहरा किया कि आज उसकी पत्तियों में भी घर की पुकार सुनाई देती है।

अब समझ में आता है कि कुछ वृक्ष केवल धरती में जड़ें नहीं जमाते, वे हमारे जीवन में भी अपनी जड़ें उतार देते हैं। हम उनसे जुड़ते कब हैं, इसका कोई निश्चित क्षण नहीं होता। एक दिन बस इतना महसूस होता है कि उनसे दूर होकर भी हम उनसे अलग नहीं हुए हैं।

मेरे लिए नीम का वृक्ष आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय है — समय, जो पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ता रहा, लेकिन जिसकी छाया में मेरा बचपन आज भी कहीं सुरक्षित है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३६ ☆ यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना में राष्ट्रीयता और लोक-संवेदना ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३६ ☆

?  आलेख – यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना में राष्ट्रीयता और लोक-संवेदना ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

राष्ट्रीयता केवल भौगोलिक सीमाओं, कोरे अतीत के गौरव या सतही उत्सवधर्मी उद्घोषों से अधिक उस देश के जनजीवन, सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक आकांक्षाओं और सामूहिक भविष्य के प्रति पूरी तरह सजग रहना है।

हिंदी नवगीत की सशक्त परंपरा के हस्ताक्षर यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में आकार लेती है। उनके गीत केवल निजी भावनाओं की सुकुमार अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने समय की विसंगतियों, व्यवस्था की नब्ज़ और मनुष्य की जिजीविषा को स्वर देते हैं। उनके राष्ट्रीयता के स्वर राष्ट्रप्रेम के भावुक धरातल से आगे बढ़कर एक प्रखर ‘राष्ट्रबोध’ और सामाजिक उत्तरदायित्व में दृष्टव्य है।

इस राष्ट्रबोध का तीखा और जीवंत रूप उनकी बहुचर्चित रचना ‘आ रहा है ज्वार देखो!’ में उभरता है। कविता का आरंभ ही पाठक को सतही दृश्यों से परे देखने की चेतावनी देता है, जब कवि आगाह करता है कि “लहर की अठखेलियों पर भूल मत जाओ हक़ीक़त है अभी सोया समुन्दर आ रहा है ज्वार देखो!”।

यहाँ समुद्र और ज्वार महज़ प्राकृतिक उपादान नहीं हैं, बल्कि यह उस जनमानस की अदम्य ऊर्जा और परिवर्तन की संभावना का प्रतीक हैं जिसे सत्ताएँ अक्सर निष्क्रिय मान लेती हैं। इसी क्रम में, कविता जब यह व्यंग्य कसती है कि “नाम सेवा का लिया था मिल गयी जागीरदारी”, तो वह सीधे तौर पर उन विडंबनाओं को बेनकाब करती है जहाँ जनसेवा का पाखंड विशेषाधिकारों और सत्ता-सुख में बदल जाता है। राही की राष्ट्रीय चेतना का आधार अंधसमर्थन कतई नहीं है । उनकी निष्ठा हमेशा सत्ता के बजाय जनहित के साथ है, जो तंत्र को उसके मूल उत्तरदायित्व का स्मरण कराती है। संकट और धुएँ के अंधेरे के बीच ज्वार का यह रूपक इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविता निराशा का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत संकटों से जूझने की सामूहिक जिजीविषा का दस्तावेज है।

किंतु राष्ट्र केवल राजनीतिक तंत्र या इतिहास की सीमाओं तक सीमित नहीं होता। उसकी वास्तविक और जीवंत आत्मा गाँवों, कस्बों, लोकभाषाओं, श्रम-संस्कृति और पीढ़ियों से संचित स्मृतियों में बसती है। राही की कविता ‘यादें’ इस सांस्कृतिक आयाम को बेहद आत्मीयता से उजागर करती है। अमराइयों, चौपालों, घरेलू लोकाचार और खेतों-मेड़ों के दृश्य केवल अतीत के सुंदर चित्र भर नहीं हैं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक संसार के पुनर्सृजन हैं जिसने भारतीय समाज को सींचा है। भारत की बहुलता ही उसकी शक्ति है। अलग-अलग बोलियाँ, रीति-रिवाज और जीवन-पद्धतियाँ मिलकर राष्ट्रीय संस्कृति का ताना-बाना बुनती हैं। राही की कविता में अतीत की स्मृति और वर्तमान की चुनौती के बीच एक सुंदर संतुलन दिखाई देता है। स्मृति मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखती है, जबकि वर्तमान उसे समकालीन विडंबनाओं से टकराने की शक्ति देता है।

इसी वैचारिक स्वायत्तता को उनकी एक अन्य रचना ‘भोगा और जिया’ और अधिक स्पष्ट करती है। परंपरा का अर्थ उनके लिए पुराने मूल्यों का अंधानुकरण करना नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से गुजरकर उन्हें नए संदर्भों में परखना है। आधुनिकता का आशय भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाना नहीं है। इसी प्रसंग में उनकी यह पंक्ति अत्यंत गहरी दृष्टि रखती है—

“किसी ध्वजा की छत्र-छाँव में रथ यह नहीं रुका है।” यह एक स्वतंत्र रचनाकार का उद्घोष है जो किसी एक संकीर्ण राजनीतिक आग्रह या वैचारिक दबाव के आगे अपनी विवेकशीलता और आलोचनात्मक दृष्टि का समर्पण नहीं करता। लोकतांत्रिक समाज में असहमति, सवाल पूछना और संवाद करना ही राष्ट्र को जीवंत रखता है।

शिल्प के स्तर पर भी राही के नवगीत इस वैचारिक गहराई को अत्यंत प्रभावी बनाते हैं। लंबी बहसों या नारों के स्थान पर वे आग, धुआँ, क्षितिज, समुद्र और लोक-स्मृतियों के सघन बिंबों का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जो सीधे पाठक की संवेदना को झकझोरता है।

यतींद्रनाथ राही का काव्य हमें यह बताता है कि राष्ट्र से सच्चा प्रेम करना केवल उसकी जय-जयकार करना मात्र नहीं होता, बल्कि उसकी वास्तविकताओं को पहचानना, उसकी सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना, व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाना और उसके बेहतर भविष्य के प्रति ईमानदार रहना है। उनकी राष्ट्रीय चेतना संकीर्णता से मुक्त होकर मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय के विशाल फलक पर सार्थक होती है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३१४ ☆ गीत – एक रहें हम, नेक बनें हम… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३१४ ☆ 

☆ गीत – एक रहें हम, नेक बनें हम…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

हम हिन्दू हैं, हमी आर्य हैं,

जग नव निर्माण करें।

एक रहें हम, नेक बनें हम,

सबका कल्याण करें।

* 

हम हिन्दू हैं, हमी आर्य हैं।

हम हिन्दू हैं, हमी आर्य हैं।

 **

बँटना नहीं जातियों में अब,

बँटना ही तो घातक है।

आस्तीन में साँप पल रहे,

और दृष्टि भी पातक है।

 *

हम सनातनी, हम वैदिक हैं,

ईश्वर से सदा डरें।

 **

जब-जब बँटे देश में हम तो,

अरि ने प्रबल प्रहार किए।

लाख-करोड़ों कटे-मरे फिर,

अनगिन नर-संहार किए।

 *

पढ़ें वेद, गीता ग्रंथों को,

निज पहचान करें।

 **

यदि अब भी नहीं सँभलते,

तो अस्तित्व गँवा बैठेंगे।

देर से शादी, देर से बच्चे,

जोड़ी दौलत दे देंगे।

 *

ऋण से हम उऋण हो जाएँ,

ऊँची हम शान करें।

 **

राम-कृष्ण को पढ़ें नित्य हम,

दुष्टों के जो काल बने।

चक्र-सुदर्शन,धनुष बाण से,

दुश्मन का जंजाल बने।

 *

माला-भाला साथ-साथ हों,

साथी संधान करें।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६४ ☆ पर्व कहाँ ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पर्व कहाँ ?” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६४ ☆

☆ पर्व कहाँ ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

(दशहरे के अवसर पर एक नवगीत)

☆

 पर्व कहाँ हैं

आडम्बर हैं

या हैं केवल

दंभ कथाएँ।

 

शरशैया पर

भीष्म मरण की

करें प्रतीक्षा

रावण जिंदा

है सीता की

अग्नि परीक्षा

 

अर्जुन का

गांडीव टूटता

बिकी राम की

मर्यादाएँ ।

 

बिछी हुई

चौसर बाजी पर

अब भी नारी

धर्मराज की

सत्य-झूठ में

हिस्सेदारी

 

पत्थर हुई

अहल्या फिर से

उद्धारों में

छिपी व्यथाएँ ।

 

उजियारे की

कोख पल रहे

अँधियारे हैं

दीप धरूँ किस

द्वारे रक्तिम

गलियारे हैं

 

मैली सरयू

डरी अयोध्या

मूक बधिर सी

आशंकाएँ ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७५ – संसार का सबसे पुराना सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – संसार का सबसे पुराना सत्य…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७५ ☆

✍ संसार का सबसे पुराना सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

यहाँ कुछ भी रहता नहीं

अनंत काल तक।

 

जब उठेगी दृष्टि, पीछे की ओर

तो सम्मुख होगा शाश्वत सत्य

कि,

बीता हुआ कल,

उसके पहले का कल,

या अभी- अभी बीता पल

अलग था

उससे जो दिख रहा है आईने में अभी।

 

क्या अमीबा ने सोचा होगा कभी

कि, उसके एककोषीय दुर्बल शरीर से

जन्म लेंगे कभी

जिराफ, हाथी, मगरमच्छ, अजगर

और घड़ियाल।

 

जीवन की इसी अनवरत यात्रा में

आदम की जात भी आई

उसी

एककोषीय जीवन से,

सतत बदलते रहने की

उस पुरातन परंपरा से।

 

कुछ भी नहीं बचा

जो रह गया हो

जैसा का तैसा।

विराट पहाड़ भी

किसी भूगर्भीय हलचल की

संतान हैं।

 

फिर,

आज का बवंडर

या सामने खड़ा तूफ़ान,

किसी की दहाड़

या आँखों की तपिश

इनका भी क्या ठिकाना?

 

सृष्टि के विराट क्रम में

उथल-पुथल भी क्षणिक है

तो शांति भी।

 

तूफ़ान आते हैं,

गुज़रने के लिए;

क्यूंकि

समय बदलता है करवट,

पल-पल।

 

यही तो है

संसार का सबसे पुराना सत्य

कि

यहाँ कुछ भी

नही है सदा के लिए।

 ☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १७१ ☆ अब तक हो पहेली की तरह… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “अब तक हो पहेली की तरह…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १७१ ☆

✍ अब तक हो पहेली की तरह… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

दौलत का न दे काम पिटारा कभी कभी

पानी को पी पी दिन है गुज़ारा कभी कभी

*

आया न बचाने को ज़रूरत पै कोई फ़िर

इमदाद परखने जो पुकारा कभी कभी

*

सूली पे चढ़ा दूँ उसे क्या इतनी ख़ता पर

दिल पर है दिया ठेस जो प्यारा कभी कभी

*

गर्दिश में पड़ा कबसे निकलता नहीं मेरा

किस्मत का सुना पलटे सितारा कभी कभी

*

सब इश्क़ के ये सूदो-ज़िया जानता हूँ मैं

मैंने भी उठाया है खसारा कभी कभी

*

बे-अज़्म को आसान नहीं पाना हो सका

जो पास नज़र आया किनारा कभी कभी

*

बर्बादी का इल्जाम मेरी वक़्त पर मगर

लेते हैं बशर नाम तुम्हारा कभी कभी

*

अब तक हो पहेली की तरह एक तुम मुझे

होता नहीं बर्ताव गँवारा कभी कभी

*

दिलकश है फ़लक पर ये धनक आप देखिए

क़ुदरत ये दिखाती है नज़ारा कभी कभी

*

मिलने पे लगी हद से ज़ियादा ही बंदिशें

महताब को मैं छत पे उतारा कभी कभी

*

तौबा किये हैं जिससे बशर मानते नहीं

करते हैं मुहब्बत को दुबारा कभी कभी

*

हम उसको अरुण दोस्त कहें या कि मतलबी

देता वो नहीं साथ हमारा कभी कभी

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८३ ☆ कविता – दृष्टि दोष… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “दृष्टि दोष…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८३ ☆

✍ कविता ☆ दृष्टि दोष… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

पता नहीं क्यों

सुबह से जेह्न में गूँज रही हैं

प्रभु यीशु की पंक्तियाँ

प्रभु इन्हें माफ कर देना

ये नहीं जानते कि

ये क्या कर रहे हैं।

 

पता नहीं क्यों

हर चेहरे पर ये पंक्तियाँ

चिपकी हुई सी

दिखाई देती हैं

और चेहरा भयावह

हिंसा में सना।

 

जो स्वयं को विद्वान

निरूपित करते हैं

उनके चेहरे तो

और भी अजीब

दिखते हैं।

 

हे प्रभु

मेरा दृष्टि दोष

दूर करो।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३३ – मुखौटा ! ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मुखौटा !)

☆ लघुकथा # १३३ – मुखौटा ! ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“हर साल रावण जलता है, फिर भी उसका कारोबार फल-फूल रहा है!” मोहन ने मैदान की ओर देखते हुए कहा।

सोहन हँसा, “माँग है, तभी तो आपूर्ति है!”

“बिल्कुल! कोई रिश्वत से जेब भर रहा है, कोई पद की आड़ में तिजोरी। पुतला बेचारे की बदनामी मुफ्त में हो रही है।”

सोहन ने चुटकी ली, “तो क्या दशहरा मनाना छोड़ दें?”

“क्यों? फोटो खिंचवाने, तालियाँ बटोरने और भाषण देने का इतना बढ़िया अवसर जो है!”

“तुम्हें तो हर आयोजन में खोट नजर आता है!”

“खोट नहीं, खाता नजर आता है। अच्छाई का हिसाब भाषणों में चुकता, लोभ का बहीखाता व्यवहार में चालू!”

सोहन ठहाका मारकर बोला, “फिर तो रावण अमर है!”

मोहन ने मुस्कराकर कहा, “जब तक दूसरों की बुराई गिनकर अपनी करतूतों पर पर्दा डालते रहेंगे, उसे मरने की जरूरत ही क्या है?”

तभी रावण के पुतले में आग लगी। भीड़ तालियाँ बजाने लगी।

सोहन ने प्रसन्न होकर कहा, “देखो, बुराई का अंत हो गया!”

मोहन ने उसकी ओर देखा, “हाँ, अब कल से फिर वही ईमानदारी की बातें और बेईमानी के काम।”

इस बार सोहन के होंठ खुले, मगर हँसी बाहर नहीं आई।

उसने कहा चलो दोस्त हम दोनों एक-एक मुखौटा खरीद के लगा लेते हैं सबने राम का लगाया हम रावण का खरीदे।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३३४ ☆ आराधना… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३३४ ?

☆ आराधना… ☆  प्रभा सोनवणे ☆

☆

 कशी सांग आता करू अर्चना

करावी कशी सांग आराधना

*

तुझी मूर्त आहे मनीमानसी

असे प्रीत माझी खरी साधना

*

करू मी कशाला व्रते ,याचना

असे श्वास माझा तुझी प्रार्थना

*

 भवानी तुला काय मागू पुन्हा

तुला माहिती नेमक्या भावना

*

 असे स्वामिनी तू कुळाची सदा

  वसे नित्य देही तुझी चेतना

*

तुझी सेविका मी तुझी बालिका

महामाय, रक्षी अशा बंधना

*

उभा जन्म लाभो तुझी सावली

अखेरीस स्वीकार ही वंदना !!

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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