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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 39 – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। मनोज साहित्य # 39 – मनोज के दोहे ☆ ताल हुए बेताल अब, नीर गया है सूख। सूरज की गर्मी विकट, उजड़ रहे हैं रूख।।   नदी हुई अब बावली, पकड़ी सकरी राह। सूना तट यह देखता, जीवन की फिर चाह।।   पोखर दिखते घाव से, तड़प रहे हैं जीव। उपचारों के नाम से, खड़ी कर रहे नीव।।   झील हुई ओझल अभी, नाव सो रही रेत। तरबूजे सब्जी उगीं, झील हो गई  खेत।।   हरियाली गुम हो रही, सूरज करता दाह। प्यासे झरने हैं खड़े, दर्शक भूले राह।।   ©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002 मो  94258 62550 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 168 ☆ लघुकथा – इच्छा मृत्यु… ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा – इच्छा मृत्यु … ।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 168 ☆ लघुकथा – इच्छा मृत्यु …  राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे. किंतु सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि राज्य का उत्तराधिकारी सत्यवती का पुत्र ही हो. अपने पिता की सत्यवती से विवाह की प्रबल इच्छा को पूरा करने के लिए गंगा पुत्र भीष्म ने अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली. पिता के प्रति प्रेम के इस अद्भुत त्याग से प्रसन्न हो, उन्होने भीष्म को इच्छा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 128 – लघुकथा – चुनावी कशमकश… ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाती सशक्त लघुकथा  “चुनावी कशमकश …”। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 128 ☆ ☆ लघुकथा – चुनावी कशमकश ☆ गाँव में चुनाव का माहौल बना हुआ था। घर- घर जाकर प्रत्याशी अपनी-अपनी योजना और लाभ का विवरण दे रहे थे। चुनाव कार्यालय से लगा हुआ छोटा सा मकान जिसमें अपने माता-पिता के साथ रूपा रहती थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। चाह कर भी रूपा पढ़ाई नहीं कर सकी। लेकिन सिलाई का कोर्स पूरा कर पूरे घर का खर्च चलाती थी। माँ बेचारी दिहाड़ी मजदूरी का काम करती थी और पिताजी पैर से लाचार होने के कारण ज्यादा कुछ नहीं कर पाते परंतु अपना स्वयं का खर्च किसी तरह काम करके निकाल लेते थे। चुनाव के झंडे, बैनर सिलने के लिए रूपा को दिया गया।...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राजा और रजवाड़े ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार (श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख – “राजा और रजवाड़े”।) ☆ आलेख ☆ राजा और रजवाड़े ☆ श्री राकेश कुमार ☆ हमारे देश के राजवाड़े तो आज़ादी के बाद से ही समाप्त हो गए थे। उनको मिलने वाला गुजारा भत्ता( प्रिवीपर्स) भी बंद हुए कई दशक हो गए।            आज़ादी से पूर्व हमारे मालिक इंग्लैंड जिनके राज्य में सूर्यास्त भी नहीं हुआ करता था, अब थोड़े से में सिमट कर रह गए हैं। पुरानी बात है "राज चला गया पर शान नहीं गई"। वहां अभी भी प्रतीक के रूप में राज तंत्र विद्यमान हैं।      वहां की महारानी एलिजाबेथ की वर्ष 1952 में ताज पोशी हुई थी। उसकी सत्तरवी...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #144 ☆ रडला पाउस… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 144 ☆ रडला पाउस… ☆ आकाशाने पंख झटकले पडला पाउस तिच्या नि माझ्या प्रेमासाठी भिजला पाउस   भेटीसाठी झाडांच्या तो नित्य यायचा वृक्षतोडही झाली म्हणुनी चिडला पाउस   सत्तेला या कळकळ नाही कधी वाटली शेतकऱ्यांचा फास पाहुनी रडला पाउस   नांगरलेल्या ढेकळास ह्या मिठी मारुनी कोंबासोबत हसता हसता रुजला पाउस   रात्री त्याने कहरच केला बरसत गेला शांत जाहला बहुधा होता थकला पाउस   आकाशाच्या पटलावरती किती मनोहर इंद्रधनुष्या सोबत होता नटला पाउस   गळून पडले फुलातील या पराग तरिही तुझ्या नि माझ्या प्रीतीचा मी जपला पाउस   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८ ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈ ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 94 – गीत – ओ शीशे की राजकुमारी ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ (संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपका एक अप्रतिम गीत – ओ शीशे की राजकुमारी…।)   साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 94 – गीत – ओ शीशे की राजकुमारी… बिखर बिखर कर गिरो नहीं तो तुमको हाथ लगा देखूँ पावन नदी कंठ तक आई अपनी प्यास जगा देखूँ।   ऐसी देह दमकती जैसे कोई निर्मल दरपन  हो ऐसी ठंडी आग कि जिसमें  जलता मन भी चंदन हो ।   ओ शीशे की राजकुमारी ,छूकर देखूँ देह तुम्हारी   देह धर्म का दरवाजा है ऐसा लोग कहा करते संयम की साँकल में बँधकर कितने लोग रहा करते?   एक सुद्र माटी का पुतला कब तक नेम निभाएगा बाँहो के राहों में बोलो रथ रूपम कब आएगा।   ओ फूलों की राजकुमारी, छूकर देखूँ देह तुम्हारी ओ यादों  की राजकुमारी, छूकर देखूँ देह तुम्हारी।। © डॉ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत # 96 – “कहाँ रहेगी माँ, यह भय है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी (प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “कहाँ रहेगी माँ, यह भय है…”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 96 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆ ☆ || “कहाँ रहेगी माँ, यह भय है…”|| ☆ जितने बेटे, उतने कमरे कहाँ रहेगी माँ, यह भय है बेशक यह बूढ़ी अम्मा का सुविधा वंचित कठिन समय है   माता जो निश्चेष्ट बैठकर देख रही सारी गतिविधियाँ क्या ग्यारस, रविवार काटने दौड़ा करते वासर-तिथियाँ   जिन बहुओं के होने का वह गर्व सदा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 143 ☆ चिंतन – मेरी-आपकी कहानी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक अविस्मरणीय एवं विचारणीय आलेख  “चिंतन - मेरी-आपकी कहानी”।)   ☆ आलेख # 143☆ चिंतन - मेरी-आपकी कहानी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ वियतनाम युद्ध से वापस अमेरिका लौटे एक सैनिक के बारे में यह कहानी प्रचलित है। लौटते ही उसने सैन-फ्रांसिस्को से अपने घर फोन किया। "हाँ पापा, मैं वापस अमेरिका आ गया हूँ, थोड़े ही दिनों में घर आ जाऊंगा पर मेरी कुछ समस्या है. मेरा एक दोस्त मेरे साथ है, मैं उसे घर लाना चाहता हूँ। " "बिलकुल ला सकते हो. अच्छा लगेगा तुम्हारे दोस्त से मिलकर...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 87 ☆ # बात ही कुछ और है # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे (श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है पितृ दिवस पर आपकी एक भावप्रवण कविता “# बात ही कुछ और है #”)  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 87 ☆ ☆ # बात ही कुछ और है # ☆  अंबर पर छाई घटा ये घनघोर है दीवाने बादलों पर किसका ज़ोर है ना जाने किसको तरसा दे ना जाने किस पर बरसा दे तुम भी आ जाओ वर्षा में खो जाओ पहले प्यार में डूबने की या पहले बारिश में भीगने की बात ही कुछ और है   वर्षा की ऋतू आई है संग रिमझिम फुहारें लाई है बूँद बूँद में प्यास है धरती से मिलने की आस है वसुंधरा झूम रही है फुहारों को चूम रही है इस अनोखे मिलन की तो बात ही कुछ और है   पेड़ पौधे, चर-अचर सब उन्माद में डूबे हैं बूंदों को आगोश में लेकर प्रणय में भीगे हैं कण कण में तरूनाई आई है वसुंधरा पर हरियाली छाई है जंगल में नाचते मयूर की तो बात ही कुछ...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हे शब्द अंतरीचे # 86 ☆ नम्रता असावी … ☆ महंत कवी राज शास्त्री ☆

महंत कवी राज शास्त्री   हे शब्द अंतरीचे # 86   ☆  नम्रता असावी… ☆ अभंग ईश्वरा, मागणे मागतो सदैव चिंतीतो, साह्य तुझे...!!   तुझा सहवास, मला प्राप्त व्हावा माझ्यातला जावा, अहंकार...!!   नम्रता असावी, माझ्या वागण्यात अर्थ जगण्यात, सापडावा...!!   तुझे सूत्र देवा, आचार घडावा देह हा पडावा, तुझ्या द्वारी...!!   कवी राज म्हणे, आगाधा अनंता तूच माय पिता, जगतिया...!!   © कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री. श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005 मोबाईल ~9405403117, ~8390345500 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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