हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०९ ☆ मैं, मैं और सिर्फ़ मैं… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मैं, मैं और सिर्फ़ मैं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०९ ☆

मैं, मैं और सिर्फ़ मैं… ☆

‘कोई भी इंसान खुश रह सकता है, बशर्ते वह ‘मैं, मैं और सिर्फ़ मैं’ कहना छोड़ दे और स्वार्थी न बने’ मैथ्यू आर्नल्ड का यह कथन इस ओर इंगित करता है कि मानव को कभी फ़ुरसत में अपनी कमियों पर अवश्य ग़ौर करना चाहिए; दूसरों को आईना भी दिखाने की आदत स्वत: छूट जाएगी।

मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझ आजीवन दूसरों के दोष-अवगुण खोजने में व्यस्त रहता है। उसे अपने अंतर्मन में झांकने का समय ही कहां मिलता है? वह स्वयं को ही नहीं, अपने परिवारजनों को भी सबसे अधिक विद्वान, बुद्धिमान अर्थात् ख़ुदा से कम नहीं आंकता। सो! उसके परिवार-जन सदैव दोषारोपण करना ही अपने जीवन का लक्ष्य स्वीकारते हैं। इसलिए न परिवार में सामंजस्यता की स्थिति आ सकती है;  न ही समाज में समरसता। चारों ओर विश्रृंखलता व विषमता का दबदबा रहता है, क्योंकि मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में लिप्त रहता है और अपनी अहंनिष्ठता के कारण वह सबकी नज़रों से गिर जाता है। आपाधापी भरे युग में मानव एक-दूसरे को पीछे धकेल आगे बढ़ जाना चाहता है; भले ही उसे दूसरों की भावनाओं को रौंद कर आगे ही क्यों न आगे बढ़ना पड़े? सो! उसे दूसरों के अधिकारों के हनन से कोई सरोकार नहीं होता। वह निपट स्वार्थांध मानव केवल अपने हित के बारे में सोचता है और अपने अधिकारों के प्रति सजग व अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ दूसरों को उपेक्षा भाव से देखता है, जबकि अन्य के अधिकार तभी आरक्षित व सुरक्षित रह सकते हैं; जब वह अपने कर्त्तव्य व दायित्वों का सहर्ष निर्वहन करे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं की भावना से आप्लावित मानव आत्मकेंद्रित होता है। वह केवल अपनी अहंतुष्टि करना चाहता है तथा उसके लिए वह अपने संबंधों व पारिवारिक दायित्वों को तिलांजलि देकर निरंतर आगे बढ़ता चला जाता है; जहां उसकी काम- वासनाओं का अंत नहीं होता… और संबंध व सामाजिक सरोकारों से निस्पृह मानव एक दिन स्वयं को नितांत अकेला अनुभव करता है और ‘मैं’ ‘मैं’ के दायरे व चक्रव्यूह से बाहर आना चाहता है; स्वयं में स्थित होना चाहता है और प्रायश्चित करना चाहता है…परंतु अब किसी को उसकी व उसकी करुणा-कृपा की ज़रूरत नहीं होती।

इस दौर में वह अपनी कमियों पर ग़ौर करके अपने अंतर्मन मेंं झांकना व आत्मावलोकन करना चाहता है। परंतु उसे अपने भीतर अवगुण, दोष व बुराइयों का पिटारा दिखाई पड़ता है और वह स्वयं को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में लिप्त पाता है। इन विषम परिस्थितियों में वह उस स्वनिर्मित जाल से बाहर निकल, संबंध व सरोकारों का महत्व समझ कर लौट जाना चाहता है; उन अपनों में; अपने आत्मजों में, परिजनों में… जो अब उसकी अहमियत नहीं स्वीकारते, क्योंकि उन्हें उससे कोई अपेक्षा नहीं रहती। वैसे भी ज़िंदगी मांग व पूर्ति के सिद्धांत पर निर्भर है। हमें भूख लगने पर भोजन तथा प्यास लगने पर पानी की दरक़ार  होती है और यथासमय स्नेह, प्रेम, सहयोग व सौहार्द की। सो! बचपन में उसे माता के स्नेह व पिता के सुरक्षा-दायरे की ज़रूरत व उनके सानिध्य की अपेक्षा रहती है। युवावस्था में उसे अपने जीवन- साथी, दोस्तों व केवल अपने परिवारजनों की अपेक्षा रहती है; माता-पिता के संरक्षण की नहीं। सो! अपेक्षा व उपेक्षा भाव दोनों सुख-दु:ख की मानिंद एक स्थान पर नहीं रह सकते, क्योंकि प्रथम भाव है, तो द्वितीय अभाव और इनमें सामंजस्य ही जीवन की मांग है।

जीवन जहां संघर्ष का पर्याय है; वहीं समझौता भी है, क्योंकि संघर्ष से हम वह सब नहीं प्राप्त कर पाते; जो प्रेम द्वारा पल-भर में प्राप्त कर सकते हैं। आपका मधुर व्यवहार ही आपकी सफलता की कसौटी है, जिसके बल पर आप लाखों लोगों के प्रिय बन कर उनके हृदय पर आधिपत्य स्थापित कर सकते हैं। विनम्रता हमें नमन सिखाती है; शालीनता का पाठ पढ़ाती है, और विनम्र व्यक्ति विपदा-आपदा के समय पर अपना मानसिक संतुलन नहीं खोता… सदैव धैर्य बनाए रखता है। अहं उसके निकट जाकर भी उसे छूने का साहस नहीं जुटा पाता अर्थात् वह ‘मैं, मैं और सिर्फ़ मैं’ के शिकंजे से सदैव मुक्त रहता है और आत्मावलोकन कर ख़ुद में सुधार लाने की डगर पर चल पड़ता है। वह अपनी कमियों को दूर करने का भरसक प्रयास करता है और कबीरदास जी की भांति ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसों बुरा न कोय’ अर्थात् पूरे संसार में उसे ख़ुद से बुरा व कुटिल कोई अन्य दिखाई नहीं पड़ता। इसी प्रकार सूर, तुलसी आदि को भी स्वयं से बड़ा पातकी ढूंढने पर भी दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि ऐसे लोग स्वयं को बदलते हैं; संसार को बदलने की अपेक्षा नहीं रखते।

कंटकों से आच्छादित मार्ग से सभी कांटो को चुनना अत्यंत दुष्कर कार्य है। हां! आत्मरक्षा के लिए पांवों में चप्पल पहन कर चलना अधिक सुविधाजनक व कारग़र है। सो! समस्या का समाधान खोजिए; ख़ुद मेंं बदलाव लाइए और दूसरों को बदलने में अपनी ऊर्जा नष्ट मत कीजिए। जब आपकी सोच व दुनिया को देखने का नज़रिया बदल जाएगा; आपको किसी में कोई भी दोष नज़र नहीं आयेगा और आप उस स्थिति में पहुंच जाएंगे… जहां आपको अनुभव होगा कि जब परमात्मा की कृपा के बिना एक पत्ता तक भी नहीं हिल सकता, तो व्यक्ति किसी का बुरा करने की बात सोच भी कैसे सकता है? सृष्टि-नियंता ही मानव से सब कुछ कराता है… इसलिए वह दोषी कैसे हुआ? इस स्थिति में उसे दूसरों को आईना दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

मानव ग़लतियों का पुतला है। यदि आप अपने जैसा दूसरा ढूंढने को निकलेंगे, तो अकेले रह जाएंगे। इसलिए दूसरों को उनकी कमियों के साथ स्वीकारना सीखिये … यही जीवन जीने का सही अंदाज़ है। वैसे भी आपको जीवन में जो भी अच्छा लगे, उसे सहेज व संजोकर रखिए और शेष को छोड़ दीजिए। इस संदर्भ में आपकी ज़रूरत ही महत्वपूर्ण है और ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ तथा ‘जहां चाह, वहां राह… यह है जीने का सही राह।’ यदि मानव दृढ़-प्रतिज्ञ व आत्मविश्वासी है, तो वह नवीन राह ढूंढ ही लेता है और उस स्थिति में उसका मंज़िल पर पहुंचना अवश्यंभावी हो जाता है। सो! साहस व धैर्य का दामन थामे रखिए; मंज़िल अवश्य प्राप्त हो जाएगी।

हां! अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपको सत्य की राह पर चलना होगा, क्योंकि सत्य ही शिव है, कल्याणकारी है…और जो मंगलकारी है, वह सुंदर तो अवश्य ही होगा। इसलिए सत्य की राह सर्वोत्तम है। सुख-दु:ख तो मेहमान की भांति आते-जाते रहते हैं। एक की अनुपस्थिति में ही दूसरा दस्तक देता है। सो! इनसे घबराना व डरना कैसा? इसलिए ‘जो हम चाहते हैं, वह होता नहीं और जो ज़िंदगी में होता है, हमें भाता नहीं’… वही हमारे दु:खों का मूल कारण है।’ जिस दिन हम दूसरों को बदलने की भावना को त्याग कर ख़ुद में सुधार लाने का मन बना लेंगे, दु:ख, पीड़ा, अवमानना, आलोचना, तिरस्कार आदि अवगुण-दोष सदैव के लिए जीवन से नदारद हो जाएंगे। इसलिए ‘परखिए नहीं, समझिए’ … यही जीने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। इसका दूसरा पक्ष यह है कि ‘जब चुभने लगें, ज़माने की नज़रों मेंं/ तो समझ लेना तुम्हारी चमक बढ़ रही है’ अर्थात् महान् व बुद्धिमान मनुष्य की सदैव आलोचना व निंदा होती है और वे सामान्य लोगों की नज़रों में काँटा बन कर खटकने लगते हैं। इस स्थिति में मानव को कभी भी निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रसन्नता से स्वयं को ग़ौरवान्वित अनुभव करना चाहिए कि ‘आपकी बढ़ती चमक व प्रसिद्धि देख लोग आपसे ईर्ष्या करने लगेंगे, परंतु आपको निरंतर उसी राह पर अग्रसर होते रहना चाहिए।’

ज़िंदगी जहां हर पल नया इम्तहान लेती है, वहीं  एक सुहाना सफ़र है। कौन जानता है, अगले पल क्या होने वाला है? इसलिए चिंता, तनाव व अवसाद में स्वयं को झोंक कर अपना जीवन नष्ट नहीं करने का संदेश प्रेषित है। स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों में–’उठो! आगे बढ़ो और तब तक न रुको; जब तक आप मंज़िल को नहीं प्राप्त कर लेते। उस स्थिति में मन में केवल वही विचार रखें, जो तुम जो पाना चाहते हैं और केवल उसे ही हर दिन दोहराओ…आपको उस लक्ष्य के प्राप्ति अवश्य हो जाएगी।’

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि ‘सिर्फ़ मैं’ के भाव का दंभ मत भरें; आत्मावलोकन कर अपने अंतर्मन में झांकें व दोष-दर्शन कर अपनी कमियों को सुधारने में प्रयासरत रहें… आप स्वयं को अवगुणों की खान अनुभव करेंगे। दूसरों से अपेक्षा मत करें और जब आपके हृदय में दैवीय गुण विकसित हो जाएं और आप लोगों की नज़रों में खटकने लगें, तो सोचें कि आपका जीवन, आपका स्वभाव व आपके कर्म उत्तम हैं, श्रेष्ठ हैं, अनुकरणीय हैं। सो! आप जीवन में अपेक्षा-उपेक्षा के जंजाल से मुक्त रहें…कोई बाधा आपकी राह नहीं रोक पाएगी। यही खुश रहने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। परंतु यह तभी संभव होगा, जब आप स्व-पर से ऊपर उठ कर, नि:स्वार्थ भाव से पर-हित के कार्यों में स्वयं को लिप्त कर, उन्हें दु:खों से मुक्ति दिलाकर सुक़ून अनुभव करने लगेंगे। सो! दूसरों से उम्मीद रखने की अपेक्षा ख़ुद से उम्मीद रखना श्रेयस्कर है, क्योंकि इससे निराशा नहीं, आनंदोपलब्धि होगी और मानव-मात्र के सब मनोरथ पूरे होंगे।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८१ – नवगीत – परदेशी साजन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – परदेशी साजन

? रचना संसार # ८१ – गीत – परदेशी साजन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

आजा सजन बने परदेशी ,

 बरखा करे पुकार।

पावस ऋतु मनभावन आई,

 रिमझिम बरसे प्यार।।

 

नभ में गरज रहे बादल अब,

वन में नाचे मोर।

रिमझिम बूंदे शोर मचातीं,

मनवा भाव विभोर।।

श्यामल मेघ में चपला चमके,

भ्रमर करेंं गुंजार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

 

ढ़ोल नगाड़े गगन बजाता,

बादल गाते गीत।

साज संगीत नहीं सुहाता,

भूले सजना प्रीत।।

कोयल कू कू पीर बढ़ाती

छूटा है शृंगार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

 

अंग -अंग पुलकित धरती का,

जागा है अनुराग ।

ओढ़ हरी चुनरिया सजी है,

प्रियतम अब तो जाग।।

हँसी ठिठोली सखियों की अब,

चुभती है भरतार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९१ ☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९१ ☆

बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों☆ श्री संतोष नेमा ☆

प्रेम भरा जिसने जीवन में, गुरु पद उन खों दें हों

राधे राधे जपा कृष्ण ने, मैं भी अब जप लें हों

जाकी शरण सबहिं जन चाहें, शरण तिहारी जें हों

पूजा पाठ भजन न जानू, प्रेमहिं मन भर लें हों

जब भी मिल हैं श्याम सलोने, देखत ही हरषे हों

भटक रहा है मन माया में, ओखों अब समझें हों

मन “संतोष” धन्य दर्शन से, जनम सफल कर लें हों

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ११ – कविता – राधा कृष्ण प्रीत… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘राधा कृष्ण प्रीत।)

☆ शशि साहित्य # ११ ☆

? कविता – राधा कृष्ण प्रीत…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

कृष्ण तुम मीत हो,

राधा तुम  प्रीत हो,

जग में चहुं ओर,

फिर प्रेम की रीत हो,

निस्वार्थ भाव की,

जीत ही जीत हो,,

बज उठे मधुर तरंग,

प्रेम भरे गीत हों,,

दूरी भी कोई ना,

दिल को प्रतीत हो,,

सारे भाव ही अंतस,

से पूर्ण समर्पित हो,,

तुम मे मैं, और मुझमें ,

तुम परावर्तित हो,,

मन के प्रेम मंदिर में,

मूरत तुम्हारी प्रतिष्ठित हो,,

हर क्षण में सम्मिलित तुम,

ऐसा समय व्यतीत हो,,

कृष्ण तुम मीत हो,

संग राधा की प्रीत हो…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८१ – मनमीत…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८१ – विजय साहित्य ?

☆ मनमीत…!

प्रेमाचे नाते,गुलाब जोडी

प्रेम देवता, वाढवी गोडी.

*

उत्कट उर्जा, असे केशरी

आकर्षणाची, प्रथम पायरी..!

*

मैत्री,आनंद, पिवळ्या‌ रंगी

वेलीवरती, नवीन ढंगी…!

*

कृतज्ञतेने आनंद वाटी

रंग गुलाबी,हृदयी दाटी…!

*

समर्पणाचा, लाल गुलाब

देई वचने, नसे रूबाब…!

*

श्वेत पांढरा, लक्ष वेधतो

शुद्ध भावना, नाते जपतो..!

*

उत्साह इच्छा, उत्कट भाव

रंग नारिंगी, वसवी गाव..!

*

आदर आणि,गूढ भावना

रंग जांभळा, पूर्ण कामना..!

*

सुख समृद्धी, प्रेम लाजरे

हिरव्या रंगी, होय साजरे…!

*

गुलाब काळा,दडून राही

वैर भावना, मनात‌ साही..!

*

गुलाब रंगी, मने सांडली

प्रेम भावना, तिथे नांदली..!

*

रंगामधूनी, उमले प्रीत

देई‌ शोधून, हा मनमीत…!

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ७ … ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ७ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

साधकांना उपदेश

संत तुकाराम महाराजांनी सगुण भक्ती करता करता त्यांच्या समवेत असलेल्या साधकांना परमेश्वराच्या भक्तीसंबंधी आपल्या अभंगांतून अमोलिक उपदेश केला आहे.

तुकारामांच्या गाथेचा अभ्यास करताना या अभंगांचा विचार करणे आवश्यक आहे असे मला वाटते.

भक्तीचा सोपा उपाय ते साधकांना सांगतात.

शांती परते नाही सुख/ येर अवघेची दुःख//

म्हणवुनी शांती धरा / उतराल पैलतीरा//

खवळलीया काम क्रोधी/ अंगी भरती आधि व्याधी//

*तुका म्हणे त्रिविधताप/ मग जाती आपोआप//

शांतीचे महत्त्व सांगताना महाराज म्हणतात, “

या जगात चित्ताची शांती ही श्रेष्ठ सिद्धी आहे. सर्व सुख तेथेच आहे, बाकी सर्वत्र दुःख आहे. म्हणून नेहमी मन शांत ठेवावे. त्यामुळे संसार सागरापासून पैलतीरी जाणे सोपे होते. काम, क्रोध खवळले तर अनेक व्याधींचा उगम होतो. एकदा आपल्या देहात, मनात शांती स्थिर झाली की आध्यात्मिक, आधिभौतीक आणि आधि दैविक हे त्रिविध ताप आपोआप निघून जातात. “

भक्तीचा सोपा उपाय तुकाराम महाराज सामान्यांना सांगतात.

सोपे वर्म आम्हा/ सांगितले संती/

टाळ दिंडी हाती/ घेऊनी नाचा//

समाधी सुख सांडा/ ओवाळूनी//

अशा या कीर्तनी ब्रह्म रस/

तुका म्हणे मन पावोनी विश्रांती/

त्रिविध नासती ताप क्षणी//

हातात टाळ घेऊन आणि दिंडीमध्ये विठ्ठल नामाचा गजर करत तल्लीन होऊन नाचल्याने

तुमचे त्रिविध ताप क्षणार्धात नाहीसे होतील आणि समाधी लागल्याचे समाधान मिळेल.

पुढे जाऊन तुकाराम महाराज भक्तांना सांगतात की देखाव्याच्या तीन जाती/(देवाला पाहण्याचे तीन प्रकार आहेत.

जैसा भाव तैसे फळ

स्वाती तोय एक जळ*

तुमचा देवाप्रती जसा भाव असेल त्याप्रमाणे तो तुम्हाला दिसेल.

जसे, स्वाती नक्षत्रात पडणारे पाणी एकच असते, परंतु ते शिंपल्यात पडले तर त्याचा मोती होतो, कपाशीच्या पिकावर पडले, तर पिकाचा नाश होतो आणि जर ते सापाच्या मुखी पडले तर त्याचे विष होते. म्हणून जसा भाव तसेच फळ मिळते.

तुका म्हणे हिरा/ पारखिया मुढा गारा//

जो रत्नपारखी आहे, त्यालाच हिरा कळतो, जो मूर्ख, अज्ञानी आहे त्याच्या नजरेत हिरा आणि गारा सारख्याच असतात.

साधकांना तुकाराम महाराज भक्तीचा सोपा उपाय सांगतात.

सर्वसाधनांचे सार/ भव सिंधू उतरी पार/

योगायोग तपे/ केली तयाने अमूपे/

तुका म्हणे जपा/ मंत्र त्रि अक्षरी सोपा//

या अभंगात विठ्ठल नामाच्या चिंतनाचे महत्त्व तुकाराम महाराज साधकांना सांगत आहेत. चिंतनाने सर्व काही प्राप्त होते. विठ्ठल चिंतन हे सर्व साधनांचे सार आहे. भवसागर तरुन जाण्यास त्याची मदत होते. असंख्य व्रतवैकल्ये, तप, यज्ञ याग केल्याचे पुण्य या एका चिंतनाने मिळते. म्हणून साधकहो, विठ्ठल हा तीन अक्षरी नामजप तुम्ही श्रद्धेने आणि भक्ती भावाने करा. भक्ती मार्ग कसा अत्यंत सोपा आहे हे साधकांना महाराज सांगतात.

न लगे देश काळ/ मंत्र विधान सकळ/

करुनी करुणा भाकावी//

भक्तीतली आर्तता पाहूनच देव स्वतःहून भक्ताजवळ येतो.

*येतो बैसलिया ठाया/ आसने व्यापी देवराया/

निर्मल ते काया / अधिष्ठान तयाचे//

कल्पनेचा साक्षी/ तरी आदरेची लक्षी/

आवडीने भक्षी/ कोरडे धान्य मटामटा//

भक्ताच्या ठिकाणी भगवंताबद्दल जो आदर असतो, तो देवाला कळतो आणि भक्ताने प्रेमाने दिलेले अन्न तो मटामटा खातो.

घेणे तरी भाव/ लक्ष्मी दासाचा उपाव/

तुका म्हणे जीव/ जीवी मेळवील अनंत//

परमेश्वर दासाचा भक्तीभाव जाणून त्याचे रक्षण करतो आणि शेवटी भक्ताला आपल्या स्वरूपाशी मिळवून घेतो.

वाटा घेई लवकरी/ मागे अंतरसी दूरी/

केली भरोवरी/ सार नेती आणिक//

ऐसी भांबावली किती/ काय जाणो नेणो/

किती समय नेणती/ माता भार वाहुनी//

नाही सरले तोवरी/ धाव घेई वेग करी/

घेतले पदरी/ पावले ते आपुले//

फटलंडी म्हणे तुका/ एक सहावे धक्का/

तरीच या सुखा / मग कैसा पावसी//

सामान्य प्रापंचिकाला महाराज या वरील अभंगातून काय सांगतात? ते म्हणतात की अरे परमार्थाचा वाटा लवकर घे, नाहीतर तुला तो मिळणार नाही. नंतर तू कितीही खटाटोप केलास, तरी दुसरेच लोक सार घेऊन जातील. संसाराच्या भ्रमात अडकलेली अशी किती माणसे आहेत, याची गणतीच नाही. निष्कारण प्रपंचाचा भार डोक्यावर घेऊन नरजन्माची सुसंधी वाया घालवतात, म्हणून आयुष्य असेपर्यंत हे साधका, तू संतांकडे धाव घे. संतांकडून मिळणारे ज्ञान साधनेने लवकर आत्मसात कर.

भगवंताला भक्त किती प्रिय आहे हे तुकाराम महाराज साधकांना पुराणातील कथांचा आधार घेऊन सांगतात.

मानी भक्तांचे उपकार/ ऋणिया म्हणवी निरंतर/

केला निर्गुणी आकार/ कीर्ती मुखे वर्णिता//

म्हणोनी जया जे वासना/ ते पुरवितो पंढरी राणा//

अंबऋषी कारणे/ जन्म घेतले नारायणे/

एवढे भक्तीचे लाहाणे/ दास्य करी दासाचे//

भावभक्तीचा अंकित/ नाम साजे दीनानाथ/

म्हणोनी राहिला निवांत/ तुका चरण धरुनी//

भक्तासाठी भगवंत सगुण रूप घेऊन त्याच्या मागे मागे सतत असतो. भक्ताला सर्वकाळ सर्व दिशा शुभच असतात. अखंड हरिनामाने तो शुचिर्भूत झालेला असतो. ज्या ठिकाणी नारायणाचे अखंड चिंतन चालू असते ते स्थळ

उत्तमच असते, मग तो एकांतवास असो, अथवा घर असो. नारायणाची कृपा हे महद्भाग्य आहे.

या ठिकाणी महाराज एक कथा सांगतात.

महाबळ नावाचा एक भट कृष्णाचे पारिपत्य करण्यासाठी गोकुळात आला होता. त्याला कंसाने पाठवले होते. आपण त्रिकालज्ञ ज्योतिषी आहोत असे भासवून त्याने नंद व यशोदेला मोहित केले होते. जेव्हा यशोदा व नंद यांनी त्याला कृष्णाचे भविष्य विचारले, तेव्हा त्याने मुद्दामच विपरीत भविष्य सांगण्यास सुरुवात केली. त्यावेळी कृष्णाच्या मायेने त्या ब्राह्मणाला बसावयास दिलेला पाटच उडला आणि त्या ब्राह्मणाच्या पाठीत बसला. त्याचा खोटेपणा कृष्णाला सहन झाला नाही. असत्याचे, पापाचे फळ मिळाल्याशिवाय राहत नाही हे भक्तांना सांगण्यासाठी तुकाराम महाराजांनी ही कथा त्यांच्या अभंगात वर्णन केली आहे.

भक्तीचे महात्म्य सांगताना वेळोवेळी त्यांनी अशा प्रकारच्या रूपकात्मक कथांचा उपयोग केला आहे. कधी त्यांची भाषा परखड, तर कधी अति रसाळ आणि मधाळ वाणी त्यांच्या अभंगातून आपल्याला दिसून येते.

वेळोवेळी येणाऱ्या अभंगातून आपण याचा परामर्श घेणारच आहोत.

क्रमशः… ७ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… जुनं ते सोनं  भाग – ७७ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… जुनं ते सोनं – भाग – ७७ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

जुनं ते सोनं 

वास्तविक मी, आमच्यावेळी असे काही नव्हते बाई! असे म्हणणार्‍या सदरातील व्यक्ती नाहीच. मला बदल आवडतात. जे जे नवीन ते संपूर्णपणे स्वीकारले नाही तरी त्यांची ओळख असावी असे मला वाटते. तरुण पिढीबरोबर तसे माझे चांगले जमते. त्यांची बदललेली भाषा, बदललेली जीवनपद्धती, त्यांची वस्त्रसंस्कृती, खाद्यसंस्कृती, अत्याधुनिक तांत्रिकतेशी त्यांची असलेली निस्सीम मैत्री, याविषयी मला प्रचंड कुतुहल असते. खरोखरच जग किती बदलले याचे विलक्षण नवल वाटते.

पण तरीही ऐंशीच्या उंबरठ्यावर अनुभवाचा अधिकार गाजवून, सतत त्यांना धोक्याच्या सूचना देण्यात मला काही कर्तव्य बजावल्याचा आनंद होत नसतो. काळाप्रमाणे बदल हे होणारच.

अगदी त्यांच्या हातात हात घालून नाही शकलो तरी त्यांच्या पाठीमागे, कधी सोबतीने, कधी बरोबर जायला हवे असे मला वाटते.

माझ्या आयुष्याचा, मागे वळून जेव्हां मी मागोवा घेते, तेव्हा मला जाणवते की मीही बदललेच आहे की! लहानपणी मी पाटे वरवंटे, उखळ, जाते, चूल, शेगडी,

बंब या वस्तुंसोबत वाढले, ते सारे मला सोडून गेलेच की! का मी त्यांना सोडले? (पण आता ते अँटीक पीसेस म्हणून माझ्या घराचे डेकॉर आहेत.)

आता माझ्या घरात सगळी ईलेक्ट्राॅनीक गॅझेट्स आहेत आणि त्या केवळ चैनीच्या वस्तु नसून माझ्या आयुष्याच्या गरजाच बनल्या आहेत. मग हे नेमकं कधी झालं, कां झालं, या प्रश्नांच्या भानगडीत मी तरी कुठे पडले? ई मेल्स, व्हाॅट्सॲप, फेसबुक या परिवारात मीही पार बुडालेली आहे. किती बदलले मी? मी सुखी आहे का? आनंदी आहे का? निदान मजेत तरी आहे का याचा विचार तरी मी करते कां?

पण त्यादिवशी, एक गंमत झाली.

कुरीअरवाल्याने, एक सफेद रंगाचा, गुळगुळीत लिफाफा माझ्या हातात ठेवला. तो जेव्हां मी उघडला तेव्हां त्यात, रेघा असलेल्या कागदावर सुंदर अक्षरात लिहिलेले, माझ्या बहिणीचे पत्र होते. खरं सांगू! इतक्या वर्षांनी आलेले, धाकट्या बहिणीचे ते स्वअक्षरातले पत्र पाहून एक अनामिक आनंदाची लाट फुटली. वाचण्याआधीच

डोळे पाणावले. कितीतरी वेळ मी तिच्या अक्षरांवर नुसता हात फिरवत राहिले. एक प्रचंड उर्जा होती त्यात. ते निर्जीव नव्हते. उबदार होते. आणि मग जाणवले,

शेवटी, “जुनं तेच सोनं!”

ओहायोला मुलीकडे असताना, जवळच राहणार्‍या तिच्या मैत्रीणीने आम्हाला जेवायला बोलावले होते. अत्याधुनिक

पद्धतीने सजवलेले तिचे घर सुंदरच

होते. मात्र माझ्या लक्षात राहिले ते

तिच्या मुख्य दरवाजाजवळचे तुळशी वृंदावन! घरात शिरतानाच दिसलेली कोनाड्यातली गणपतीची मंगलमूर्ती!

जेवणाचा तर अगदी साग्रसंगीत बेत होता. शिवाय चकचकीत स्टीलची ताटे, वाट्या, चमचे, पेले यांची सुरेख मांडलेली पंगत! टेबलावर का असेना,

त्यात जुन्या आठवणी जपलेल्या होत्या.

श्रीखंडपुरी, बटाट्याची पिवळी भाजी, नारळाची चटणी, मसालेभात असा पक्का महाराष्ट्रीयन बेत. सर्वच तिने खपून केले होते. मला वाटले, माझ्या सारख्या जुन्या पिढीच्या प्रतिनिधीला आमंत्रित केल्यामुळे तिने हे सारे केले असावे. पण जेवताना तीच म्हणाली,

“काकू मला हे फार आवडतं. या परंपरा इथे वाढणार्‍या माझ्या मुलांनाही कळायला हव्यात ना? शेवटी ना काकू ते काय म्हणतात ना, जुनं ते सोनं, तेच खरं! “

बरं वाटलं मला. कुठेतरी धागे अतूट

असल्यासारखे वाटले.

दरवर्षी आम्ही आमच्या गावी जातोच. खानदेशातले एक खेडेवजा शहर. तसा आता जुना वाडा राहिला नाही. तिथे राहणार्‍या भावांनी नव्या पद्धतीचे घर बांधले. अधुनिकीकरण केले. मात्र नवे जुने गळ्यात गळे घालून आहेत.

आम्ही गेलो की माझी जाऊ अंगणात मस्त चूल पेटवते. भांड्याला मातीचं बुड लावून, त्यात एखादा सणसणीत रस्सा बनवते. लोखंडी तव्यावरच्या, चुलीच्या जाळावर शेकलेल्या, खरपूस गरम भाकर्‍या आणि खास लाकडी बडगीत ठेचलेला हिरव्या मिर्चीचा

ठेचा! तोडच नाही त्याला. आणखी एक.

चकचकीत घासलेल्या तांब्याच्या बंबातल्या कडथ पाण्याचे स्नान! सारेच अपूर्व!

गावात फेरफटका मारताना कुणी,

“राम राम पावनं! “म्हणताना ऐकले की,

हाय, हॅलो, व्हाट्सप, चि… ल, हे शब्द किती पोकळ वाटतात! गावरान शब्दातला गोडवाच न्यारा!

कोरोनाच्या काळात, सुरक्षित अंतर ठेवा, या नियमाचे पालन करताना आवर्जून सांगितले गेले, नको शेकहँड, नको मिठ्या, नको मुके. हात जुळवून केलेला नमस्कारच पुरे. मग ही तर भारतीयांची पूर्वापार चालत आलेली संस्कृती.

बाहेरुन आलेल्या माणसाने

घरात येण्यापूर्वी परसातल्या नळाखाली पाय धुवूनच यायचे.. अशा कितीतरी

जुन्या विचारांची दारे पुन्हा उघडली आणि त्यातून सुवर्णमयी वारे वाहू लागले. ”जुने जाऊद्या मरणालागूनी”

असे म्हणायच्या ऐवजी तेच जुने सोन्यासारखे वाटू लागले.

काल लेकीने व्हाॅट्सॲपवर फोटो पाठवले होते.

दोन शुष्क झाडाची खोडे, शंकुच्या आकारात बार्बेक्यु ट्रेवर बाहेरच्या डेकवर ठेवली होती. त्यांना फुलापानांनी सजवले

होते. नारळ बांधला होता. पायाशी रांगोळी रेखाटली होती. होळीपूजनासाठी

तबक सजवले होते. पुरणपोळीचा नेवैद्य दाखवला होता.

त्या पेटत्या नाविन्यपूर्ण होळीची चित्रं पाहताना मला खूप मजा वाटली.

खाली कॅप्शन होती.

“आमची अमेरिकन बार्बेक्यु होळी! “

हे विडंबन नव्हतं. एक गोड आनंदमयी अर्थपूर्ण संकेताचं ते पालन होतं.

अधुनिकतेत जुने सांभाळण्याची धडपड होती. मला खूप छान वाटले.

आयुष्याची, जुन्या नव्याची ही मिसळही मला खमंग रस्सेदार वाटली.

सृष्टीचाच नियम आहे. काहीच नाश

पावत नाही. होते ते फक्त स्थित्यंतर.

जुने—नवे—जुने हे एक चक्र आहे.

जुन्यातून नवे अन् नव्यातून पुन्हा जुनेच.

आणि मग आपण सहज म्हणतो,

“जुनं तेच सोनं! “

 क्रमशः…

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ४३ आणि ४४ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ४३ आणि ४४ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले 

।। श्री नारद उवाच ।। 

नारद भक्तिसूत्रे ४३

दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः ॥ ४३ ॥

अर्थ : दुष्ट संग हा सर्व प्रकारे (अंतर्बाह्य) टाकला पाहिजे.

विवेचन:- संतांची संगत करताना काही पथ्ये ही पाळली पाहिजेत. काही गोष्टींचा संग प्रयत्नपूर्वक टाळला पाहिजे. पुढील तीन सूत्रात नारद महाराज आपल्याला कोणत्या गोष्टींचा त्याग करायचा हे सांगत आहेत.

मनुष्य हा समाजप्रिय प्राणी आहे हे सर्वमान्य आहे. त्यामुळे तो एकटा राहूच शकत नाही. त्याला सतत कोणीतरी सोबतीला, संगतीला हवे असते. प्रत्येकाच्या आयुष्यात नेहमीच चांगली माणसे येतील असे होत नाही. जशी भेटतील ती माणसे स्वीकारून मनुष्याला जीवन जगावे लागते. त्यामुळे रोजच्या जीवनात त्याला बरेवाईट अनुभव येत असतात. साधक पक्का होत नाही तोपर्यंत याचा त्याला कमीअधिक प्रमाणात त्रास होत असतो. संत तुकाराम महाराज एका अभंगात आपल्याला सांगतात,

*”मान अपमान गोवे । अवघे गुंडूनी ठेवावे ॥१॥हेंचि देवाचें दर्शन । सदा राहे समाधान ॥२॥शांतीची वसती । तेथें खुंटे काळगती ॥३॥आली ऊर्मी साहे । तुका म्हणे||४||”*

.. (अभंग क्रमांक ८४, सार्थ तुकाराम गाथा धार्मिक प्रकाशन संस्था)

संसारातही संग असतोच व परमार्थातही सत्संग आवश्यक आहेच हे मागील सूत्रांतून स्पष्ट झालेच आहे. पण ती सत्संगती प्राप्त होण्याला प्रतिकूल अशी दुःसंगती असते. अनादि संसारात नित्य विषयसेवनाचेच संस्कार साचलेले असतात. इंद्रिय-तादात्म्य, विकार हे त्या दुःसंगाचे प्रेरक असतात. जोपर्यंत त्या दुःसंगात साधक असतो तोपर्यंत त्याची सत्संगाकडे प्रवृत्ती होत नाही. कदाचित झाली तरी तिचा उपयोग होऊ शकत नाही. म्हणून प्रथम त्या दुःसंगाचा त्याग करावयास नारद सांगतात. कित्येक वेळी दुःसंगाचे काही अनिष्ट परिणाम भोगावयास मिळाले असता काही दुःसंग टाकले जातात असे दिसून येते. पण तो खरा त्याग नव्हे. एका प्रकारचा टाकला तर अन्य प्रकारचा राहतोच. कारण दुःसंग एकच प्रकारचा नसतो. म्हणून सूत्रात ‘सर्वथैव’ असे महत्त्वाचे पद घातले आहे. संगाचा चांगलेपणा व वाईटणा त्या संगाच्या विषयावर अवलंबून असतो. दुःसंग हा बाह्य व आंतर असा दोन प्रकारचा आहे. निषिद्ध शब्द स्पर्शादि पंचविषय हे बाह्य असतात, पण ते तमोगुण कार्य म्हणून मोहशक्तीने युक्त असतात. अनादिकालीन विषय इंद्रियतादात्म्यामुळे विषयाचे ठिकाणी अनुकूल बुद्धी निर्माण होते. अंतःकरण राग व द्वेषयुक्त असते, त्यामुळे ते सहज विषयाकडे प्रवृत्त होते. पण ते परिणामी किती बाधक असतात याचे विवेचन मागे सूत्र पस्तीसमध्ये आलेच आहे. सर्व संतांनी पर धन, परस्त्रीचा त्याग करायला सांगितले आहे. परस्त्री माते समान मानावी असे सांगितले आहे.

साधकांस स्त्रीसंगया बाधक होतो याचे अनेक दाखले देता येतील. मोठे तपस्वीही या संगात अडकून पडले असल्याचे आपल्या लक्ष्यात येईल.

दैनंदिन व्यवहार करताना मनुष्य त्याच्या इंद्रिद्वारे करीत असतों. ज्याला भगवतांची प्राप्ती करून घ्यायची आहे, त्याने सर्व इंद्रिये, मन, देह निव्वळ शुद्ध करुन चालणार नाही, तर पवित्र करणे तितकेच आवश्यक आहे. संत तुकाराम महाराज प्रापंचिक लोकांसाठी विशेष आदर्शवत असे आहेत. साधनेच्या प्रत्येक टप्प्यातील स्थितीवर त्यांनी मार्मिक अभंग लिहिले आहेत. एका अभंगात ते म्हणतात,

*”पापाची वासना नको दावू डोळा । त्याहुनि अंधळा बराच मी ॥१॥ निंदेचे श्रवण नको माझे कानी । बधिर करोनि ठेवी देवा ॥२॥ अपवित्र वाणी नको माझ्या मुखा ।त्याजहुनि मुका बराच मी ॥३॥ नको मज कधी परस्त्रीसंगति । जनातुन माती उठता भली ॥४॥ तुका म्हणे मज अवघ्याचा कंटाळा । तू एक गोपाळा आवडसी ॥५॥”*

 – संत तुकाराम

‘मनुष्य संतांच्या संगतीत राहील तर तो तसाच बनतो. असंताच्या संगाने असंत, तपस्व्याच्या संगतीत तपस्वी व चोराच्या संगतीत चोर बनतो, वस्त्राला जो रंग द्यावा तो चढतो तसेच माणसाचे आहे. ‘ म्हणून बुद्धिमान पुरुषाने दुष्टांची संगती टाकून देऊन संतांची संगती धरावी. संत हे आपल्या संगतीत असणार्‍याच्या मनातील विषयासक्तीचा आपल्या अमृतमय वाणीने नाश करतात.’

अशा रीतीने दुःसंग सर्वथा त्यागावा हे सांगितले. पण त्याचा त्याग का करावा? तर तो सर्वथा जीवाचा सर्वनाश करणारा आहे. तो कशा कशा प्रकारे मानवाचा सर्वनाश करण्यास कारण होतो हे सांगण्याकरिता पुढील सूत्राची रचना केली आहे.

जय जय रघुवीर समर्थ || 

नारद भक्तिसूत्रे ४४

कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात् ॥४४॥

अर्थ : दु:संग हा भोगवासना, राग आणि मोह निर्माण करून स्मृतिनाश करतो, तसेच विवेक नष्ट करून मनुष्याच्या सर्वनाशास कारणीभूत होतो.

म्हणून साधकाने दु:संग प्रयत्नपूर्वक टाळावा.

विवरण : मागील सूत्रात दुःसंग हा सर्व प्रकारे त्याज्य आहे व तो दुःसंग अंतर व बाह्य असा दोन प्रकारचा आहे असे म्हटले होते. मनुष्याच्या मनात येणारे वाईट विचार आणि त्याच्या हातून घडणारी कृति, या दोन्हीचा परिमाण मनुष्यावर होत असतो.

संग करणे म्हणजे त्या गोष्टीच्या सहवासात रहाणे. कामक्रोधादी सहा विकार मनुष्याला त्याच्या मूळ ध्येयापासून दूर नेत असतात. म्हणून त्यांच्या त्याग करावा असे आपल्याकडे सांगितले जाते. श्री. गोंदवलेकर महाराज इथे व्यावहारिक बाजू लक्षात घेऊन हाच विषय थोड्या वेगळ्या पद्धतीने मांडतात. ते म्हणतात, की विकार भगवंताने निर्माण केले आहेत, त्यामुळे त्यांना आपल्या दैनंदिन व्यवहारात निश्चित असे स्थान असले पाहिजे. स्वयंपाक करताना नुसते तिखट वापरले, किंवा नुसती हळद वापरली तर स्वयंपाक स्वादिष्ट होण्याची शक्यता अगदीच कमी. स्वयंपाक स्वादिष्ट होण्यासाठी हळद, तिखट आणि इतर जिन्नस योग्य त्या प्रमाणात त्यात घातले पाहिजेत. हेचं सूत्र आपल्याला आपल्या दैनंदिन जीवनात उपयोगी पडते. ह्या सहा विकारांचा विवेकाने विनियोग करता आला तर मनुष्य, साधक त्यांच्या सहाय्याने प्रगती करू शकतो. उदा. आपल्याला राग येतो, याचा मनुष्याला राग आला पाहिजे. साधना करण्याचा कंटाळा न येता, साधना करताना येणाऱ्या कंटाळ्याचा कंटाळा मनुष्याला आला पाहिजे… , पटतंय ना?

अनेक संत स्त्रीसंग करू नये असे म्हणतात. यातील मर्म नीट समजून घेतले गेले नाही तर संभ्रम होऊ शकतो. एकटी स्त्री अथवा स्त्रिया काहीही करू शकत नाहीत. पण स्त्रीकडे पाहण्याचा दृष्टिकोन मातृत्वाचा नसेल तर मात्र गोष्टी बिघडू शकतात, असे सर्व संताना सुचवायचे असावे.

कित्येकाना असे वाटते की, ईश्वरच सर्व कर्माचा प्रेरक असल्याने ईश्वरप्रेरणेनेच पाप होते. कित्येकाची अविवेकमूलक भावना अशी असते की अदृष्टाने पाप होते. ईश्वर जर पापप्रेरक होईल तर त्याचेवर विषमता व क्रूरता हे दोष येतील. ज्या ईश्वराच्या कृपेने जीव उद्धरून जातो तो ईश्वर जीवास पाप करावयास कसे लावील? तसेच अदृष्टही पापास प्रेरक नाही. अदृष्ट हे भोगाला नियामक आहे. सुखदुःखादि भोग अदृष्टजन्य असतात.

कर्म करण्यात जीव स्वतंत्र आहे. ‘स्वतंत्र कर्ता’ असे पाणिनीचे सूत्र आहे. शुभसंस्काराने सद्‌बुद्धीचा जीव अंगीकार करतो तेव्हा त्याच्याकडून पुण्यकर्म होते व अशुभ संस्कार, दुर्बुद्धी व विकाराच्या स्वाधीन झालेला मानव पापकर्मात प्रवृत्त होतो म्हणून श्रीकृष्ण अर्जुनास सांगतात,

*”काम हा आणि क्रोध हा घडीला जो रजोगुणे |*

*मोठा खाादाड पापिष्ट तो वैरी जाण तूं इथे ||”*

(गीताई. ३. ३७)

काम-क्रोधाच्या आधीन झालेल्या माणसास जरी काही पूर्वसंस्कार परमार्थाचे असले तरी मोहाने ते झाकले जातात हा मोहाचा प्रभाव आहे. या स्मृतिभ्रंशाच्या पुढची पायरी ‘बुद्धिनाश’ ही आहे. बुद्धिनाश म्हणजे दुसर्‍या अध्यायात गीतेमध्ये जी सद्‌बुद्धी म्हणून सांगितली आहे किंवा गीतेच्या अठराव्या अध्यायात तीन प्रकारची सात्त्विक, राजस, तामस, अशी बुद्धी सांगितली आहे त्यात ‘प्रवृत्ती-निवृत्ती, कार्य-अकार्य, भय-अभय, बंध-मोक्ष यांना यथार्थ रूपाने जी जाणते ती सात्त्विक बुद्धी होय. ‘ असे श्रीकृष्णानी अर्जुनास सांगितले आहे. अशी आपल्या हिताला जी बुद्धी जाणत नाही तोच तिचा नाश होय. कारण वर सांगितलेली बुद्धी हीच मानवाना उद्धारास अनुकूल आहे, हिलाच सद्‍बुद्धी असे म्हणतात. अशा या बुद्धीचा नाश झाला म्हणजे पुढची पायरी सर्वनाशाचीच आहे असे नारद म्हणतात.

‘अंतःकरणात विषयांची नुसती आठवण असेल तरीही संग टाकलेल्यासही पुन्हा विषयासक्ती येऊन चिकटते व त्यामुळे विषयेच्छा प्रगट होते. जेथे काम उत्पन्न होतो तेथे क्रोधाने आपले बिर्‍हाड आधीच ठेवलेले असते, व जेथे क्रोध आला तेथे कार्याकार्याविषयी अविचार ठेवलेला आहेच. ज्याप्रमाणे सोसाट्याच्या वार्‍याने दिवा नाहीसा होतो त्याप्रमाणे संमोह प्रगट झाल्यावर स्मृती नाश पावते. किंवा सूर्य मावळायच्या वेळेला रात्र सूर्यतेजाला ज्याप्रमाणे गिळून टाकते त्याप्रमाणे स्मृतिभ्रंश झाला असता प्राण्याची दशा होते. मग सर्वत्र केवळ अज्ञानाचा अंधार होतो व त्याचेच आवरण सर्वांवर पडते, अशा वेळी हृदयात बुद्धी व्याकुळ होते. त्यामुळे जेवढे म्हणून ज्ञान आहे तेवढे समूळ नष्ट होते. प्राण निघून गेले असता शरीराची जशी दशा होते त्याप्रमाणे बुद्धीचा नाश झाला असता पुरुषाची स्थिती होते. ‘ 

श्रीनारद महाराज या दोन सूत्रातून त्याचा त्याग व बाधकता सांगून गेले. पुढील पंचेचाळीसाव्या सूत्रात आणखी एका दृष्टीने या कामक्रोधादिकांची बाधकता दृष्टान्त द्वारा पटवून देतात.

जय जय रघुवीर समर्थ || 

नारद महाराज की जय!!!

– भक्ती सूत्र क्र. ४३ आणि ४४.

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०० ☆ आलेख – “रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य परंपरा के आधार प्रतिनिधि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०० ☆

?  आलेख – रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य परंपरा के आधार प्रतिनिधि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य साहित्य की उस गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि लेखक हैं, जिन्होंने व्यंग्य को केवल हास्य या चुटकुलेबाजी का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक आलोचना, आत्मपरीक्षण और सांस्कृतिक विमर्श का गम्भीर औजार बनाया। उनका व्यंग्य हँसाता कम है, चौंकाता ज्यादा है । वह पाठक को भीतर तक झकझोरता है और अपने ही समाज की विडंबनाओं के आईने में उसका चेहरा दिखाता है। त्यागी जी का व्यंग्य लेखन , विशुद्ध मनोरंजन के विरुद्ध एक विद्रोह है। वह मनोरंजन के बहाने व्यक्ति की सामाजिक और मानसिक जड़ताओं से, रूढ़ियों से, पाखंडों से और कभी-कभी स्वयं लेखक की ही आत्ममुग्धता से मुक्ति का मार्ग खोजते हैं ।

रवीन्द्रनाथ त्यागी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वे व्यंग्य को शब्दों की बाजीगरी नहीं मानते। उनके लिए व्यंग्य यथार्थ को देखने की, उसे समझने की और फिर उसे इस तरह से पाठक के सामने प्रस्तुत करने की एक दृष्टि है, कि वह मुस्कराए भी, लज्जित भी हो, और कहीं न कहीं अपने भीतर झाँकने के लिए विवश हो जाए। उनकी रचनाओं में कोई अतिरिक्त अलंकरण नहीं है, न ही बनावटी गढ़े गए हास्यप्रसंग हैं। वे घटनाओं और

पात्रों के माध्यम से सामाजिक स्थितियों की तह तक पहुँचते हैं। उनकी शैली में सहजता है, लेकिन वह सहजता एक लंबे अनुभव और गंभीर आत्मचिंतन से उपजी है।

त्यागी जी की रचनाओं में भाषा एक अलग ही जीवित पात्र की तरह व्यवहार करती है। वे शुद्ध साहित्यिक हिंदी का आग्रह नहीं रखते, न ही प्रचलित बाजारू भाषा की ओर झुकते हैं। उनकी भाषा वह लोक भाषा है जो गाँव , कस्बों और नगरों के बीच सामाजिक सरोकारों से जुड़ती है। वे आम बोलचाल के शब्दों का इस तरह से प्रयोग करते हैं कि वे विश्लेषण और व्यंग्य के माध्यम बन जाते हैं। ‘मैं और मेरा समाज’ या ‘टंच माल’ जैसी रचनाओं में हम देखते हैं कि एक ही शब्द या वाक्यांश कितनी बार कितने अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होकर पाठक को गहरे व्यंग्यबोध की स्थिति में पहुँचा देता है। यह शब्दों की नहीं, उनकी लेखकीय सोच की चतुराई है।

त्यागी जी के व्यंग्य की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता उनका आत्म-रूपांतरण है। वे अपने पात्रों में स्वयं को शामिल करते हैं। यानी वह ‘मैं’ जो लेखक का है, अक्सर उतना ही दोषी, उलझा हुआ और मजेदार होता है , जितना कि कोई दूसरा पात्र। यह ईमानदारी, यह आत्मव्यंग्य की क्षमता उन्हें विशेष बनाती है। वे अपने पाठकों पर ऊँगली नहीं उठाते, बल्कि खुद के जरिए उन्हें यह अनुभव कराते हैं कि समाज का हर हिस्सा, हर व्यक्ति किसी न किसी विडंबना का हिस्सा है, उनके हास्य की शुरुआत आत्म-स्वीकृति से ही होती है।

उनका व्यंग्य एक तरह से ‘भीतर से बाहर’ जाने वाली प्रक्रिया है। जहाँ आज के कई व्यंग्यकार समाज को बाहर से देखकर उस पर तंज कसते हैं, वहीं त्यागी जी का व्यंग्य समाज के भीतर उतर कर, उसके छोटे-छोटे अनुभवों को समेट कर उभरता है। वे डॉक्टर, प्रोफेसर, बाबू, नेता, लेखक. गृहणी, पंडित सबको अपने ही रंग में दिखाते हैं, लेकिन न तो किसी को खलनायक बनाते हैं, न ही किसी को देवता। उनका हास्य ‘करुणा’ से निकला है, उपहास से नहीं।

व्यंग्य में विचारशीलता का होना, और वह भी बिना बोझिल हुए, रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की रचनाशीलता की विशेष उपलब्धि है। उनके लेखों में विचार पाठक के ऊपर लादा नहीं जाता, बल्कि वह कहानी और संवाद के बीच से धीरे-धीरे रिसता है। पाठक को पता भी नहीं चलता और वह किसी गूढ़ सामाजिक सच्चाई से साक्षात्कार कर बैठता है। जैसे ‘संपादक जी’ या ‘ठलुआ क्लब’ जैसी रचनाएँ पढ़ते समय हम हँसते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर यह भी समझते हैं कि यह समाज कैसे धीरे-धीरे आत्म-मुग्धता और सुविधा-प्रियता के जाल में फंसता जा रहा है।

रवीन्द्रनाथ त्यागी का व्यंग्य एक तरह से समय का सामाजिक दस्तावेज है। उन्होंने अपने समय की नौकरशाही, साहित्यिक दुनिया, शिक्षा व्यवस्था, मध्यमवर्गीय नैतिकता और राजनीतिक पाखंड को बड़े ही प्रभावी तरीके से उजागर किया है। वे किसी वाद या प्रचार की भाषा नहीं बोलते, बल्कि उनकी लेखनी पाठक को इस स्थिति में खड़ा करती है,  जहाँ वह हँसते-हँसते अपनी ही भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाने लगता है। यह शक्ति सामान्य व्यंग्यकारों में नहीं पाई जाती।

त्यागी जी की शैली में कथा और निबंध का ऐसा अद्भुत मेल मिलता है, जहाँ एक ओर अनुभवजन्य घटनाएँ पाठक को बांधती हैं. वहीं दूसरी ओर लेखक की टिप्पणी, कटाक्ष और मूल्यांकन उसे वैचारिक स्तर पर भी झकझोरते हैं। वे एक साथ कथाकार, निबंधकार और टीकाकार की भूमिका निभाते हैं, लेकिन इस तरह से कि कोई भूमिका दूसरी पर भारी नहीं पड़ती। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि हम किसी साहित्यिक कथा का आनंद ले रहे हैं, लेकिन अगले ही पल एक गहरा व्यंग्य वाक्य हमें उस कल्पना से बाहर खींच कर सामाजिक यथार्थ के कठोर धरातल पर ले आता है।

त्यागी जी की रचनाओं में विसंगति पकड़ने की अद्भुत दृष्टि है। वे समाज की उस दरार को भी देख लेते हैं जो सामान्य दृष्टि से छिपी रहती है। फिर वह दरार चाहे भाषायी हो, नैतिक हो, या मानसिक। ‘कहानी का संकट’ जैसे लेखों में हम देख सकते हैं कि वे कैसे भाषा, शैली और कथ्य के कृत्रिमता की ओर संकेत करते हैं। उनका व्यंग्य साहित्यिक आत्ममुग्धता पर भी उतना ही प्रहार करता है जितना वह सामाजिक पाखंड पर करता है। यह संतुलन उन्हें एक संपूर्ण व्यंग्यकार बनाता है।

त्यागी जी की रचनाएँ समकालीन हैं, लेकिन उनकी दृष्टि कालातीत है। वे किसी विशेष घटना या व्यक्ति से बँधे नहीं है, बल्कि प्रवृत्तियों को पकड़ते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं जितनी अपने समय में थीं। वे न तो केवल ‘क्लासिक’ बन गए हैं, न ही ‘समाचार’। वे उस मध्यधारा में हैं जहाँ साहित्य जीवन से संवाद करता है, जीवन पर टिप्पणी करता है और कभी-कभी उसकी दिशा भी बदलता है।

त्यागी जी के व्यंग्य में ‘संवेदना’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्त्व है। वे केवल हँसी नहीं पैदा करते, बल्कि उस हँसी के पीछे छिपे दर्द, असहायता, विडंबना और थकावट को भी महसूस कराते हैं। पाठक उनके लेखों को पढ़कर केवल ‘हँसता’ नहीं, बल्कि सोचने लगता है, कभी खुद के बारे में, कभी समाज के बारे में, और कभी-कभी लेखक के बारे में भी। उनका व्यंग्य कोई निर्णय नहीं सुनाता, बल्कि प्रश्न छोड़ता है। शायद यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि वे व्यंग्य को समाधान नहीं, संवाद बनाते हैं।

आज के व्यंग्य साहित्य में जहाँ तीखापन और आक्रोश अधिक है, वहाँ रवीन्द्रनाथ त्यागी एक सधे हुए संतुलन की मिसाल हैं। उनका व्यंग्य न गाली है, न ताली । वह आइना है, साफ, खरा और कभी-कभी चुभता हुआ। वह हमें यह नहीं बताता कि हम गलत हैं, वह केवल इतना करता है कि हमें हमारी तस्वीर दिखा देता है और फिर छोड़ देता है कि हम खुद ही तय करें कि हमें बदलना है या नहीं। यह व्यंग्य की पराकाष्ठा है और रवीन्द्रनाथ त्यागी इस शिखर पर स्थिर और प्रतिष्ठित दिखाई देते हैं।

इस दृष्टि से देखें तो रवीन्द्रनाथ त्यागी केवल व्यंग्यकार नहीं हैं, वे हिंदी समाज के भीतर बैठे उस ‘स्व’ की आलोचना हैं जो कभी स्वयं पर हँसना नहीं जानता था। उन्होंने व्यंग्य को आत्म साक्षात्कार का माध्यम बनाया। वे हमारे समय के दर्पणकार हैं जिन्होंने हमें हमसे मिलवाया, और यह सबसे बड़ा साहित्यिक योगदान है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७७ ☆ महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७७ ☆ महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆ ॐ नमः शिवाय ☆

भोले भंडारी भरें, भक्तों के भंडार ।

भस्म लगा धूनी रमा, कैलाशी सरकार ।।

*

शिव सह गौरा सोहतीं, कार्तिकेय, गणराज ।

बाघम्बर धारण किए, बाजे डमरू साज ।।

*

बम- बम भोले बोलिए, शिव शम्भू कैलाश।

सच्चे मन से प्रार्थना, रोके सभी विनाश।।

*

शीष विराजे चंद्रमा, केशों गंगा धार ।

भस्म रमा धूनी सहित, गले सर्प का हार।।

*

शिव शंकर जग मोहते, माॅं गौरा के साथ।

अपने भक्तों पर कृपा, करते  दीना नाथ।।

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में युवा मन अक्सर बाहर की दुनिया में उलझा रहता है—कैरियर, स्क्रीन, प्रतिस्पर्धा और लगातार बदलती अपेक्षाएँ। ऐसे समय में महाशिवरात्रि हमें एक सरल लेकिन गहरा संदेश देती है: बाहर नहीं, भीतर लौटो। शिव किसी दूर बैठे देवता नहीं, बल्कि हमारे भीतर की स्थिरता, संतुलन और सजगता का नाम हैं।

अध्यात्म का अर्थ दुनिया से भागना नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए भी अपने मन को स्पष्ट और शांत रखना है। यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए और भी ज़रूरी है। महाशिवरात्रि की रात हमें याद दिलाती है कि थोड़ी देर रुककर, मोबाइल की स्क्रीन से नज़र हटाकर, अपने भीतर झाँकना भी उतना ही ज़रूरी है जितना आगे बढ़ना।

शिव की पूजा में प्रयुक्त वस्तुएँ—बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल,फल, दूध, दही,घी, शहद, भस्म, धूप,दीप—सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़े रहने का सुंदर प्रतीक हैं। ये चीज़ें सरल हैं, सहज हैं और हमें “ग्रीन मोटिवेशन” देती हैं कि जीवन की मूल ज़रूरतें दिखावे में नहीं, सादगी में पूरी होती हैं। प्रकृति के साथ यह तालमेल ही असल में शिव का संदेश है—संतुलन, संयम और स्वीकार।

आज का युवा अगर शिव को इस रूप में समझे—एक आंतरिक शक्ति, एक स्थिर चेतना और प्रकृति से जुड़ा जीवन-दर्शन—तो महाशिवरात्रि सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर दिशा देने का अवसर बन सकती है। क्योंकि जब भीतर स्थिरता आती है, तभी बाहर की दुनिया भी सही मायनों में सँवरती है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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