(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका शिक्षक दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख ‘नमस्ते के नंबर…’।)
☆ आलेख – नमस्ते के नंबर… ☆ श्री अजीत सिंह ☆
जम्मू यूनिवर्सिटी में एम कॉम की पढ़ाई कर रहा मेरा बेटा एक दिन अपने एक सेमेस्टर की परीक्षा का रिपोर्ट कार्ड लेकर आया। मैंने कार्ड देखा और पूछा कि एक सब्जेक्ट में उसके मार्क्स कम क्यूं थे। उसने कहा कि वह प्रो वर्मा का सब्जेक्ट था जो ढंग से नहीं पढ़ाते और अक्सर कंप्यूटर पर शेयर मार्केट में बिजी रहते थे। वह पहले भी प्रो वर्मा के बारे में शिकायत करता रहता था।
फिर मैने पूछा कि एक दूसरे सब्जेक्ट में उसके काफ़ी अच्छे नंबर हैं तो उसने कहा, डैडी ये तो नमस्ते के नंबर हैं।
मैने कहा कि वह प्रो वर्मा को नमस्ते कर अच्छे नंबर क्यूं नहीं प्राप्त कर लेता।
बेटा बोला कि उनसे तो सभी विद्यार्थी कन्नी काटते हैं। उनके पास कोई नहीं जाता, बस कहीं यूं ही मिल जाएं तो गुड मॉर्निंग वगैरा कह कर निकल जाते हैं।
मैने समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि आदरपूर्ण नमस्ते या गुडमॉर्निंग कहने का अर्थ है कि आप उस प्रोफेसर का सम्मान करते हैं और इसका सीधा प्रभाव आपके अंकों पर पड़ता है। आप टीचर का सम्मान करेंगे तो उसके विषय का सम्मान भी हो जाएगा।
इसका सीधा सा अर्थ यह है कि पढ़ाई में अच्छे स्कोर के लिए अध्यापक का सम्मान पहली शर्त है। सम्मान के अभाव में आपका स्कोर भी अच्छा नहीं होगा।
यह मामला सिर्फ स्कोर तक सीमित नहीं रहा। जब एम कॉम फाइनल एग्जाम का वाइवा हुआ तो इसे लेने गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर जम्मू यूनिवर्सिटी आए थे। उन्होंने आते ही प्रो शर्मा से कहा कि कुछ दिन पहले उनके यहां इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ की टीम आई थी और उसने उनके एम बी ए के पांच विद्यार्थियों को मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए चुना था। उन में से चार ने जॉब ज्वाइन कर ली और एक ने नहीं की। उन्होंने प्रो शर्मा से कहा कि क्या वे उन्हें अपने किसी एक विद्यार्थी का नाम बता सकते हैं जिसका वे गहन इंटरव्यू करने के बाद उसका नाम चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस को भेज देंगे।
प्रो शर्मा ने नमस्ते करने वाले मेरे बेटे का नाम सुझाया। अमृतसर से आए प्रोफेसर ने गहन परीक्षा ली और उसे योग्य पाए जाने के बाद आखिर में पूछा कि क्या वो नौकरी करना चाहता है। बेटे ने फट से हां कह दी। प्रोफेसर साहिब ने परीक्षा के बाद उसे एक चिट्ठी इंडियन एक्सप्रेस के एच आर हेड के नाम दे दी और इस तरह मेरे बेटे को उसकी पहली नौकरी मिल गई ।
कहानी का निष्कर्ष यह है कि अध्यापक का सम्मान आपको न केवल पढ़ाई में अच्छे मार्क्स दिला सकता है बल्कि आपके रोज़गार का रास्ता भी साफ कर सकता है। हर विद्यार्थी को अपने अध्यापक का सम्मान करना चाहिए। माता पिता को भी अपने बच्चों के अध्यापकों का सम्मान करना चाहिए और बच्चों में ऐसे संस्कार पैदा करने चाहिएं कि वे अध्यापकों का सम्मान करें।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक…“।)
अभी अभी # ७७७ ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक श्री प्रदीप शर्मा
विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।
पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।
चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।
एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक ! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।
आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।
हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।
आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ…“।)
अभी अभी # ७७६ ⇒ आलेख – फुटपाथ श्री प्रदीप शर्मा
पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।
हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ(फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।
फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है। ।
एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।
जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी।
शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो। ।
बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?
आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।
वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है। ।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख कोरोना और भूख। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९१ ☆
☆ कोरोना और भूख… ☆
कोरोना बाहर नहीं जाने देता और भूख भीतर नहीं रहने देती। आजकल हर इंसान दहशत के साये में जी रहा है। उसे कल क्या, अगले पल की भी खबर नहीं। अब तो कोरोना भी इतना शातिर हो गया है कि वह इंसान को अपनी उपस्थिति की खबर ही नहीं लगने देता। वह दबे पांव दस्तक देता है और मानव शरीर पर कब्ज़ा कर बैठ जाता है। उस स्थिति में मानव की दशा उस मृग के समान होती है, जो रेगिस्तान में सूर्य की चमकती किरणों को जल समझ कर दौड़ता चला जाता है और वह बावरा मानव परमात्मा की तलाश में इत-उत भटकता रहता है। अंत में उसके हाथ निराशा ही लगती है, क्योंकि परमात्मा तो आत्मा के भीतर बसता है। वह अजर, अमर, अविनाशी है। उसी प्रकार कोरोना भी शहंशाह की भांति हमारे शरीर में बसता है, जिससे सब अनभिज्ञ होते हैं। वह चुपचाप वार करता है और जब तक मानव को उक्त रोग की खबर मिलती है; वह लाइलाज घोषित कर दिया जाता है। घर से बाहर अस्पताल में क्वारेंटाइन कर दिया जाता है और आइसोलेशन में परिवारजनों को भी उससे मिलने भी नहीं दिया जाता। तक़दीर से यदि वह ठीक हो जाता है, तो उसकी घर-वापसी हो जाती है, अन्यथा उसका दाह-संस्कार करने का दारोमदार भी सरकार पर होता है। आपको उसके अंतिम दर्शन भी प्राप्त नहीं हो सकते। वास्तव में यही है– जीते जी मुक्ति। कोरोना आपको इस मायावी संसार ले दूर जाता है। उसके बाद कोई नहीं जानता कि क्या हो रहा है आपके साथ… कितनी आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है आपको… और अंत में किसी से मोह-ममता व लगाव नहीं; उसी परमात्मा का ख्याल … है न यह उस सृष्टि- नियंता तक पहुंचने का सुगम साधन व कारग़र उपाय। यदि कोई आपके प्रति प्रेम जताना भी चाहता है, तो वह भी संभव नहीं, क्योंकि आप उन सबसे दूर जा चुके होते हो।
परंतु भूख दो प्रकार की होती है… शारीरिक व मानसिक। जहां तक शारीरिक भूख का संबंध है, भ्रूण रूप से मानव उससे जुड़ जाता है और अंतिम सांस तक उसका पेट कभी नहीं भरता। मानव उदर-पूर्ति हेतु आजीवन ग़लत काम करता रहता है और चोरी-डकैती, फ़िरौती, लूटपाट, हत्या आदि करने से भी ग़ुरेज़ नहीं करता। बड़े-बड़े महल बनाता है सुरक्षित रहने के लिए, परंतु मृत्यु उसे बड़े-बड़े किलों की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे से भी ढूंढ निकालती है। सो! कोरोना भी काल के समान है, कहीं भी, किसी भी पल किसी को भी दबोच लेता है। फिर उससे घबराना व डरना कैसा? जिस अपरिहार्य परिस्थिति पर आपका अंकुश नहीं है; उसके सम्मुख नतमस्तक होना ही बेहतर है। सो! आत्मनिर्भर हो जाइए; डर-डर कर जीना भी कोई ज़िंदगी है। शत्रु को ललकारिए–परंतु सावधानीपूर्वक। इसलिए एक-दूसरे से दो गज़ की दूरी बनाए रखिए, परंतु मन से दूरियां मत बनाइए। इसमें कठिनाई क्या है? वैसे भी तो आजकल सब अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हैं… एक छत के नीचे रहते हुए अजनबीपन का एहसास लिए…संबंध-सरोकारों से बहुत ऊपर। सो! कोरोना तो आपके लिए वरदान है। ख़ुद में ख़ुद को तलाशने व मुलाकात करने का स्वर्णिम अवसर है, जो आपको राग-द्वेष व स्व-पर के बंधनों से ऊपर उठाता है। इसलिए स्वयं को पहचानें व उत्सव मनाएं। कोरोना ने आपको अवसर प्रदान किया है, निस्पृह भाव से जीने का; अपने-पराये को समान समझने का… फिर देर किस बात की है। अपने परिवार के साथ प्रसन्नता से रहिए। मोबाइल व फोन के नियंत्रण से मुक्त रहिए, क्योंकि जब आप किसी के लिए कुछ कर नहीं सकते, तो चिन्ता किस बात की और तनाव क्यों? घर ही अब आपका मंदिर है, उसे स्वर्ग मान कर प्रसन्न रहिए। इसी में आप सबका हित है। यही है ‘सर्वेभवंतु सुखिनः’ का मूल, जिसमें आप भरपूर योगदान दे सकते हैं। सो! अपने घर की लक्ष्मण-रेखा न पार कर के, अपने घर में ही अलौकिक सुख पाने का प्रयास कीजिए। लौट आइए! अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर। तनिक चिंतन कीजिए–कैसे ऋषि-मुनि वर्षों तक जप-तप करते थे। उन्हें न भूख सताती थी; न ही प्यास। आप भी तो ऋषियों की संतान हैं। ध्यान-समाधि लगाइए– शारीरिक भूख-प्यास आप के निकट आने का साहस भी नहीं जुटा पाएगी और आप मानसिक भूख पर स्वतः विजय प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे।
आधुनिक युग में आपके बुज़ुर्ग माता-पिता तो वैसे भी परिवार की धुरी में नहीं आते। बच्चों के साथ खुश रहिए। एक-दूसरे पर दोषारोपण कर घर की सुख-शांति में सेंध मत लगाइए। पत्नी और बच्चों पर क़हर मत बरसाइए, क्योंकि इस दशा के लिए दोषी वे नहीं हैं। कोरोना तो विश्वव्यापी समस्या है। उसका डटकर मुकाबला कीजिए। अपनी इच्छाओं को सीमित कर ‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ में मस्त रहिए। वैसे भी पत्नी तो सदैव बुद्धिहीन अथवा दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है। सो! उस निर्बल व मूर्ख पर अकारण क्रोध व प्रहार क्यों? बच्चे तो निश्छल व मासूम होते हैं। उन पर क्रोध करने से क्या लाभ? उनके साथ हंस-बोल कर अपने बचपन में लौट जाइए, क्योंकि यह सुहाना समय है…खुश रहने व आनंदोत्सव मनाने का। ज़रा! देखो तो सदियों बाद कोरोना ने सबकी साध पूरी की है… ‘कितना अच्छा हो, घर बैठे तनख्वाह मिल जाए… रोज़ की भीड़ के धक्के खाने से मुक्ति प्राप्त हो जाए…बॉस की डांट-फटकार का भी डर न हो और हम अपने घर में आनंद से रहें।’ लो! सदियों बाद आप सबको मनचाहा प्राप्त हो गया…परंतु बावरा मन कहां संतुष्ट रह पाता है, एक स्थिति में…वह तो चंचल है। परिवर्तनशीलता सृष्टि का नियम है। मानव अब तथाकथित स्थिति में छटपटाने लगा है और उस से तुरंत मुक्ति पाना चाहता है। परंतु आधुनिक परिस्थितियां मानव के नियंत्रण में नहीं हैं। अब तो समझौता करने में ही उसका हित है। सो! मोबाइल फोन को अपना साथी बनाइए और भावनाओं पर नियंत्रण रखिए, क्योंकि तुम असहाय हो और तुम्हारी पुकार सुनने वाला कोई नहीं। तुम्हारी आवाज़ तो दीवारों से टकराकर लौट आएगी।
औरत की भांति हर विषम परिस्थिति में ओंठ सी कर व मौन रह कर खुश रहना सीखिए और सर्वस्व समर्पण कर सुक़ून की ज़िंदगी गुज़ारिए। यहां तुम्हारी पुकार सुनने वाला कोई नहीं। अब सृष्टि-नियंता की कारगुज़ारियों को साक्षी भाव से देखिए, क्योंकि तुमने मनमानी कर धन की लालसा में प्रकृति से खिलवाड़ कर पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है– यहां तक कि अब तो हवा भी सांस लेने योग्य नहीं रह गयी है। पोखर, तालाब नदी-नालों पर कब्ज़ा कर उस भूमि पर कंकरीट की इमारतें बना दी हैं। इसलिए मानव को बाढ़, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, भू-स्खलन आदि का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। जब इस पर भी मानव सचेत नहीं हुआ, तो प्रकृति ने कोरोना के रूप में दस्तक दी है।
इसलिए कोरोना, अब काहे का रोना। इसमें दोष तुम्हारा है। अब भी संभल जाओ, अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब सृष्टि में पुनः प्रलय आ जाएगी और विनाश ही विनाश चहुंओर प्रतिभासित होगा। इसलिए गीता के संदेश को अपना कर निष्काम कर्म करें। मानव इस संसार में खाली हाथ आया है और खाली हाथ उसे जाना है। इस नश्वर संसार में अपना कुछ नहीं है। इसलिए प्रेम व नि:स्वार्थ भाव से सबकी सेवा करो। न जाने! कौन-सी सांस आखिरी सांस हो जाए।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ…“।)
अभी अभी # ७७५ ⇒ आलेख – फुटपाथ श्री प्रदीप शर्मा
पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।
हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ(फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।
फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है। ।
एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।
जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी।
शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो। ।
बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?
आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।
वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है।।
मित्रता दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच का एक स्नेहपूर्ण बंधन है| यह एक ऐसा अक्षय पात्र है, जिसमें प्रेम, विश्वास और अपनेपन की भावनाएं भरी हैं| यह शक्ति आपकी संकटमोचक बनकर हर आपत्ति में आपकी रक्षा करती है| प्रकृति का दान यज्ञ आदिकाल से शुरू है| सूर्य जिस प्रकार अपनी ऊर्जा और प्रकाश देता है, पेड़ जिस तरह धूप से त्रस्त पथिक को शीतल छाया देते हैं, या नदी जिस तरह प्यासे को जल प्रदान करती है, ठीक उसी प्रकार मित्रता भी निरपेक्ष भाव से की जाती है| यहाँ किसी शर्त या स्वार्थ के लिए स्थान नहीं होता|
“जौ चाहत, चटकन घटे, मैलो होई न मित्त।
राज राजसु न छुवाइ तौ, नेह चीकन चित्त।।“
अर्थ- इस दोहे में कवि बिहारी जी कहते हैं कि,यदि आप चाहते हैं कि मित्रता की चटक / चमक ना घटे और मित्रता मैली ना हो, तो अपने मन में अभिमान, अहंकार और दिखावे की धूल मत जमने दो| जिस प्रकार तेल लगी हुई वस्तु की सतह चिकनी हो जाती है और उसपर धूल के स्पर्श मात्र से भी उसकी चमक घट कर वह मैली हो जाती है, उसी प्रकार अभिमान और दिखावे से मित्रता में दरार आ जाती है। आप अपने
रिश्तेदारों का चयन नहीं कर सकते| परन्तु समाजप्रिय इंसान मित्र का चयन अपने आप करता है| एक बार मित्रता का बीज तो बोया, परन्तु उसे परम विश्वास के जल, श्रद्धा की खाद और प्रेम का सूर्यप्रकाश न मिले तो वह अंकुरित नहीं होगा| धन-दौलत, जाति, धर्म, शिक्षा, लिंग जैसे अंतर मित्रता के अंतर्मन को छू नहीं पाते| आखिर माता पिता, भाई बहन पत्नी, पुत्र पुत्री और अन्य कई सम्बन्धी जनों से हम घिरे होकर और उनका प्रेम पाकर भी हम सच्चे मितवा की खोज में क्यों कर निकल पड़ते हैं? वह इसलिए कि मन की गहराई में छुपे हर विचार और भावनाओं को हम अपने सम्बन्धियों से बंधन में उलझने के कारण प्रकट नहीं कर पाते| हमें समझने वाला एक मित्र ही होता है| इसलिए अगर एक भी सच्चा मित्र जीवन में में प्राप्त हो तो हमें मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है| मित्र हमारी कमियों को नजरअंदाज करके हमें हमारी त्रुटियों सहित गले लगाता है| उसे पता है कि सुन्दर गुलाब के साथ उसे एकाध बार कांटे भी चुभेंगे|
फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस)
इसकी उत्पत्ति का सबसे प्रचलित कारण प्रथम विश्व युद्ध के बाद की निराशाजनक स्थिति से उबरने हेतु और मित्रता के माध्यम से वैश्विक एकता, मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध और शांति को प्रोत्साहित करने की इच्छा के साथ जोड़ा जाता रहा है। हॉलमार्क कार्ड्स के संस्थापक जॉयस हॉल ने १९१९ में अगस्त माह के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस) मनाने का विचार दिया था, ताकि लोग एक-दूसरे को धन्यवाद कह सकें और दोस्ती का जश्न मना सकें|१९३५ में अमेरिकी कांग्रेस ने इस दिन को ‘राष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे’ घोषित किया था| वैसे भी सप्ताह का अंतिम दिन जश्न मनाने के लिए एकदम उपयुक्त ही है, जो समय के साथ एक लोकप्रिय संस्कृति बन गई है| हमारे देश में भी यह दिन मित्रों के प्रति आत्मीयता प्रकट करने के लिए बड़े उत्साह से मनाया जाता है|
आज की तारीख में हम भले ही वर्ष के एक दिन मित्रता दिवस मनाते हैं, परन्तु मित्रता मानव की सामाजिक प्रवृत्ति एवं संस्कृति रही है| सच्ची मित्रता में कई सिद्धांत लागू होते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हैं, पारस्परिक विश्वास और निष्ठा, आपसी समझ, सम्मान, सही दिशा का समर्थन और सहानुभूति! प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु (३८४- ३२२ ईसा पूर्व) के अनुसार, मित्रता तीन प्रकार की होती है: उपयोगिता, आनंद और सद्गुण। उपयोगिता पर आधारित मित्रता लाभ और फायदे पर आधारित होती है, जैसे स्कूल के सहपाठी या कार्यस्थल के सहकर्मी की मित्रता| आनंद पर आधारित मित्रता एक-दूसरे की संगति का आनंद लेने पर आधारित होती है, जैसे कि साथ में पिकनिक मनाना और सैर सपाटा में मौज-मस्ती करना! सद्गुण पर आधारित मित्रता सर्वोत्कृष्ट एवं स्थायी होती है, क्योंकि यह एक-दूसरे के चरित्र के प्रति पारस्परिक सम्मान और प्रशंसा पर आधारित होती है। यह सबसे उत्कृष्ट प्रकार की मित्रता मानी जाती है क्योंकि इसमें दोनों मित्र एक-दूसरे के व्यक्तित्व को और अधिक निखारने में मदद करते हैं। अरस्तू का मानना था कि सद्गुण मित्रता दुर्लभ है, क्योंकि इसके लिए उच्च कोटि के चरित्र और सद्गुणों की आवश्यकता होती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में सच्ची मित्रता के कई अनुकरणीय उदाहरण हैं| चिरंतन महाकाव्य रामायण को ही लें तो पुरुषोत्तम राम की मित्रता किसी जाति विशेष या कुल की मर्यादा से परे है| राम के वनवास के काल में उनके प्रिय मित्र ऋंगवेरपुर के राजा निषाद राज आदिवासी समाज के थे| वे अपना समूचा राज्य राम को अर्पण करना चाहते थे| पंचवटी में रावण ने जब सीता का अपहरण किया तब सर्वप्रथम रावण से युद्ध करने वाले गिद्ध पक्षीराज जटायु महाराज दशरथ के परममित्र थे| इस संघर्ष में जटायु ने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए| किष्किंधा के युवराज वानर सुग्रीव ने सीता की खोज में निकले श्रीराम से मित्रता की| इसके बदले में राम ने अपनी मित्रता का मोल चुकाने के लिए बाली और सुग्रीव के द्वंदयुद्ध में सुग्रीव को पिछड़ता देख वृक्ष की ओट से तीर मारा| अपनी मित्रता को निभाने हेतु अपने निष्कलंक चरित्र पर इस लांछन का कलंक उन्होंने बड़े ही आनंद से स्वीकार किया| दयानिधान राम ने रावण के अनुज विभीषण से मित्रता की और ‘यह घर का भेदी लंका को ढह गया’| स्वर्णिम लंका के सिंहासन पर श्रीराम को बिठाने के लिए आतुर विभीषण को श्रीराम ने ऐसा करने से मना किया|
महाभारत में मित्रता के कई पहलू हैं| कृष्ण चरित्र में कृष्ण और उनके गुरु बंधु सुदामा की मित्रता बहुत प्रचलित है| दरिद्री ब्राह्मण सुदामा के मुट्ठीभर चावल के एवज में द्वारकाधीश कृष्ण अपने बालसखा को राजमहल एवं समस्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं| कृष्ण और अर्जुन समवयस्क हैं, बंधु कम और सखा अधिक! श्रीकृष्ण अपने सखा की बात मान कर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के सारथी बन जाते हैं| भावनाओं के उद्रेक में में बह कर जब अर्जुन कुरुक्षेत्र में अपने सगे सम्बन्धियों को समक्ष देख अपने शस्त्र डाल देता है, तब उसके परम मित्र कृष्ण उन्हें ‘गीता’ का अमर उपदेश कर युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं| पितामह भीष्म को अर्जुन से अधिक प्रभावशाली होते देख अपनी प्रतिज्ञा तोड़ रथ का चक्का उठाकर वे भीष्म को मारने दौड़ते हैं| वे अर्जुन द्वारा कुशलतापूर्वक जयद्रथ का वध करवाते है, एवं निःशस्त्र भीष्म और कर्ण का वध करने को प्रेरित करते हैं| यह दिव्य मित्रता वे आजीवन निभाते हैं| कृष्णसखी कृष्णा यानि श्यामला द्रौपदी का कृष्ण के साथ रिश्ता स्त्री और पुरुष के उत्कट भावनात्मक अशरीरी और अपार स्नेहिल के नाते का अनुपम उदाहरण है| द्रौपदी वस्त्रहरण के प्रसंग पर श्रीकृष्ण ने ही उस पर आये संकट का निवारण किया| जब बाद में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से पूछा कि उसने आने में इतनी देर क्यों लगा दी, तो श्रीकृष्ण ने उससे कहा, “तुमने जैसे ही बुलाया, वैसे ही मैं आया”| लज्जा से बोझिल द्रौपदी को याद आया कि, उसे अपने पतियों, हस्तिनापुर दरबार में बैठे महाराज धृतराष्ट्र, गुरुजन एवं समस्त योद्धाओं से की प्रार्थना विफल होने के पश्चात् ही सबसे अंत में सखा कृष्ण का स्मरण हुआ| महाभारत में घनिष्ट स्वार्थी मित्रता का एक अन्य उदाहरण हमें अलग ही सीख देता है| दुर्योधन अपने स्वार्थ के लिए सूतपुत्र का लांछन लगे हुए कर्ण को अंगदेश का राजमुकुट पहना देता है| इसी उपकार के तले दबकर अच्छा स्वभाव और सद्गुणों के होते हुए भी दानवीर कर्ण दुर्योधन के गलत पक्ष का हर बार समर्थन करता है| वह दुर्योधन की मित्रता में अँधा होकर दुर्योधन की हर कुटिल योजना, यहाँ तक कि द्रौपदी वस्त्रहरण के घृणास्पद प्रसंग में भी सहभागी होता है| श्रीकृष्ण एवं कर्ण की माता कुंती कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताते हैं कि, वह जेष्ठ पांडव है और उसे पांडवों के पक्ष में आना चाहिए| लेकिन उसके लिए दुर्योधन से मित्रता सर्वोपरि है| इसी कुसंगति के कारण अंत में वह जेष्ठ पांडव होकर भी अपने ही अनुज अर्जुन के हाथों मारा जाता है|
इन दो महाकाव्यों के अतिरिक्त मुझे दो ग्रन्थ याद आते हैं, ईसप नीति और पंचतंत्र! उनमें पशु पक्षियों की अनोखी मित्रता की कई नैतिक कहानियां हैं| ईसप नीति की एक शेर और मानव की मित्रता की कहानी मुझे बहुत ही अच्छी लगती है| एक गुलाम एंड्रोक्लीज़ अपने मालिक से भागकर जंगल में छिप जाता है। वहां उसे एक घायल शेर मिलता है। एंड्रोक्लीज़ शेर के पैर से कांटा निकालता है। बाद में एंड्रोक्लीज़ पकड़ा जाता है और उसे एक शेर के सामने मरने के लिए अखाड़े में फेंक दिया जाता है। सभी को आश्चर्यचकित करते हुए शेर एंड्रोक्लीज़ को पहचान लेता है, कि यह वही इंसान है, जिसने उसकी मदद की थी और उससे प्रेम से लिपट जाता है| सम्राट यह अनोखी मित्रता देखकर द्रवित हो जाता है और एंड्रोक्लीज़ और शेर दोनों को मुक्त कर देता है|
प्रिय पाठकगण, हमें अपने मित्र के स्नेह को एक हीरे जवाहरात से भरी संदूक की भांति सहेजकर रखना चाहिए| हीरे जवाहरात चोरी हो गए तो शायद वापस मिल जाएंगे, लेकिन एक बार किसी भी कारणवश आपका मित्र आपसे दूर चला जाए तो वापस नहीं आएगा|
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परी जाय।”
अर्थ- प्रेम का धागा महीन होता है, उसे झटका देकर नहीं तोड़ना चाहिए। यदि वह टूट गया तो फिर जुड़ता नहीं और जुड़ भी जाए तो गांठ पड़ जाती है।”
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – “मुख्य धारा के व्यंग्य लेखन में अधिनायकवादी वर्चस्व का प्रतिरोध” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६८ ☆
आलेख – मुख्य धारा के व्यंग्य लेखन में अधिनायकवादी वर्चस्व का प्रतिरोध श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
“मुख्यधारा” की परिभाषा क्या है? क्या वह है जो सरकारी पुरस्कार पाती है और बड़े अखबारों की सुर्खियाँ बनती है? या वह है जो जनता के बीच सीधे संवाद करती है, पाठकों के दिलों में उतरती है और एक सूक्ष्म परंतु दीर्घकालिक परिवर्तन की ओर ले जाती है? क्या वह लेखन जो नएपन के नाम पर या यथार्थ के नाम पर समाज के स्याह हिस्से को विषय बनाकर लिखने में विशिष्ट होने का दंभ भरते दिखता है?
साहित्य में वास्तविक प्रतिरोध हमेशा से कथित मुख्यधारा की चकाचौंध से ज्यादा उसकी परिधियों पर ही पनपा और प्रभावी हुआ है। आज भी ऐसा ही है। जब उस प्रतिरोध का प्रभाव परिलक्षित होता है, तब ही वह स्वयं केंद्र में आ पाता है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदि इसी तरह की यात्रा से पनपे है। हिंदी लेखन में नई लकीरें खींचने का साहस मौजूद है, बस उसे समझने के लिए मुख्यधारा के परे भी देखने की आवश्यकता है। व्यंग्य, ललित निबंध, लघुकथा, आदि विधाएं कभी हाशिए पर थी, पाठकों ने समय के संग उन्हें साहित्य की मुख्य धारा में स्थापित किया। अनुवाद, व्यंग्य, अकविता, नाटक, एकांकी, समीक्षा आदि के लिए अब स्वतंत्र पुरस्कार दिखते हैं, ज्यादा पुरानी बात नहीं जब ये सब किनारे ही उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं।
वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य और साहित्य की भूमिका पर गहन चिंतन आवश्यक है। विश्व अधिनायकवादी और विस्तारवादी ताकतों के दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे परिदृश्य में, साहित्य का एक मूलभूत दायित्व शोषित को जगाना है। प्रतिरोध का मार्ग स्वतंत्र लेखन की विवशता कहा जा सकता है। एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो स्थापित सत्ता तंत्रों, सरकारी संस्थानों, पुरस्कार समितियों, मीडिया घरानों आदि से जुड़ाव रखता है। यह जुड़ाव एक ‘सुविधा-क्षेत्र’ (Comfort Zone) बना देता है, जो उनके साहित्य को विभ्रमित करता है। ऐसे रचनाकारों में
विवादों और असहमति से बचने की प्रवृत्ति देखी जाती है। सीधा विरोध करने के बजाय, प्रतीकों, रूपकों और इतिहास के पन्नों में छिपकर बात करने की प्रवृत्ति होती है। यह एक साहित्यिक व्यंग्य तकनीक भी है, कई बार यह सुविधा का ही रूपक बन जाती है। साहित्य जगत भी वैचारिक खेमों में बंटा है। कई बार प्रतिरोध ‘दूसरे खेमे’ के विरोध तक सीमित हो जाता है, न कि मूलभूत अधिनायक वादी सत्ता के ढांचे के प्रश्नों पर केंद्रित रह पाता है। यह कहना पूरी तरह से अन्याय होगा कि सभी लेखक सुविधा के पथ पर हैं।
मुख्यधारा के प्रकाशन तंत्र से इतर, सोशल मीडिया, छोटे स्वतंत्र प्रकाशन, लिटफेस्ट और वेब पत्रिकाओं ने एक नई तरह की बेबाकी के लिए जगह बनाई है। यहाँ युवा और वरिष्ठ, दोनों तरह के रचनाकार सीधे और बिना लाग लपेट के अपनी बात कह रहे हैं। उपन्यास, कविताएँ और नाटक ऐसे भी लिखे जा रहे हैं जो सीधे तौर पर वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों की पड़ताल करते हैं। ये रचनाएँ मीडिया की सुर्खियाँ भले नहीं बनतीं, पर साहित्यिक चर्चा में अपनी जगह बनाती हैं। आज के दौर में बेबाक होने का मतलब है सोशल मीडिया पर हेट कैम्पेन, मानहानि के मुकदमे, और सांस्थानिक उपेक्षा का सामना करना। ऐसे में जो लेखक अपनी बात कह रहे हैं, वे निजी जोखिम उठा रहे हैं।
इस प्रकार हिंदी साहित्य में प्रतिरोध की एक मजबूत, सक्रिय और जीवंत धारा मौजूद है। यह धारा हमेशा संगम में लुप्त सरस्वती सी उपस्थित रहती है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मिच्छामि दुक्कड़म…“।)
अभी अभी # ७७४ ⇒ आलेख – मिच्छामि दुक्कड़म श्री प्रदीप शर्मा
तपस्या और आत्मशुद्धि का पर्व पर्युषण पर्व कहलाता है। आप चाहें तो इसे संतों का चातुर्मास भी कह सकते हैं। मन, वचन और कर्म की शुद्धि के बिना आत्म शुद्धि संभव नहीं। संस्कारों की ही शुद्धि को आत्म शुद्धि से जोड़ा गया है।
मनुष्य गलतियों का पुतला है। Man is a bundle of mistakes. गलती करना मनुष्य का काम, क्षमा करे सो भगवान ! To err is human. हम सुबह अपना मुंह तो आईने में देख लेते हैं, लेकिन हमारा आचरण हम किस आईने में देखें।
जब भी हम ज्ञान बांटने की कोशिश करते हैं, कबीर साहब जरूर बीच में आ टपकते हैं ;
बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा ना मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा ना कोय।।
आज का मनोविज्ञान तो कुछ और ही कहता है।
व्यक्तित्व निर्माण और मोटिवेशनल स्पीच में तो आपको अपनी खूबियों का ही प्रदर्शन करना है, अपनी कमजोरियां अगर किसी को जाहिर हो गई तो समझो हो गया इंटरव्यू !
आदमी गलतियों से महान बनता है, लेकिन एक बार महान बन जाने के बाद उसकी गलतियों का भी महिमा मंडन होने लगता है।
जो कार्य हमें अकेले में करने में संकोच होता हो, अगर वह सामूहिक रूप से किया जाए तो हमारा उत्साह तो बढ़ता ही है, हमारा संकोच भी टूट जाता है। अकेले सड़क पर झंडा लेकर कौन नारा लगाता है। जिंदाबाद मुर्दाबाद भी अकेले में नहीं होता। समूह में जान है वर्ना इंसान बेजान है।।
अक्सर हम वही करते हैं, जो हमसे बड़े करते हैं, क्योंकि हम सीखते तो उनसे ही हैं। कुछ पर्व और उत्सव मिलने जुलने के होते हैं तो कुछ गिले शिकवे दूर करने के। बुरा न मानो होली है। आओ साल भर के करे कराए पर पानी फेरें। भैया, होली पर तो गले मिल लो। एक प्यार का रंग सभी रंगों पर भारी होता है।
बचपन में हमें बात बात पर डांट पड़ती थी। स्कूल में किसी ने मास्टर जी से चुगली कर दी तो मार भी खाओ और माफी भी मांगो। बड़े छोटे में घर में झगड़ा हुआ, तो गलती छोटे की ही मानी जाती थी। मांगो माफी। दफ्तर में थोड़ी अनियमितता हुई अथवा देर से पहुंचे तो say sorry !
वैसे आजकल बोलचाल की भाषा में सॉरी इतना आम हो गया है कि लोग छींकने, डकारने और खांसने पर भी सॉरी बोलने लग गए हैं। लेकिन हमारे अहं पर चोट तब पहुंचती है जब हमें बिना कारण कभी कभी माफी मांगने पर बाध्य होना पड़ता है।
कभी अपने किये पर, तो कभी अपने कहे पर। अगर हमें अपनी गलती का अहसास हुआ तो शायद हम माफी मांग भी लें, वर्ना अपमान का घूंट पीना कौन पसंद करता है।
राजनीति में मानहानि और माफीनामे बहुत चलते हैं।
आम आदमी का अहं ऐसे भी इतना बड़ा नहीं होता। उसकी तो पूरी जिंदगी ही माफी मांगने और माफ करने में गुजर जाती है।।
जिंदगी के लेखा जोखा की हम बात नहीं करते, लेकिन साल भर का लेखा जोखा तो एक व्यापारी भी रखता है। साल में एक बार लोग इनकम टैक्स का रिटर्न भी फाइल करते हैं। आय व्यय और लाभ हानि जीवन के हर क्षेत्र में होती है। साल भर में कम से कम एक बार घर की सफाई, दिवाली के बहाने ही, हो ही जाती है। हमारी उपलब्धियों का भी लेखा जोखा हमारे पास होता है, लेकिन क्या गलतियों का भी कुछ हिसाब किताब रखा जाता है अथवा सब गंगा जी में बहा दिया जाता है।
देखिए साहब हम धार्मिक भी हैं और समय के हिसाब से ईमानदार भी। दान पुण्य भी हैसियत के हिसाब से कर ही लेते हैं।
बाकी भूल चूक लेनी देनी तो चलती ही रहती है जीवन में। बस यही समझकर अगर इस पर्युषण पर्व पर सबसे माफी मांग ली जाए तो क्या बुरा है।।
माफी मांगना भी गंगा नहाने जैसा ही है। अगर चित्त ही मलिन हो तो कैसा गंगा स्नान ! जिस गलती को ईसाई चर्च में कन्फेशन बॉक्स में जाकर कुबूल करते हैं, हम उसे खुले आम स्वीकार कर, उसके लिए माफी मांगते हैं। जाने अनजाने में हमसे कई गलतियां होती हैं, सबका सामूहिक माफीनामा है मिच्छामि दुक्कड़म।
आत्म शुद्धि से बड़ा कोई पर्व नहीं। हमारे सभी समुदायों के पर्व यही संदेश देते हैं। रिद्धि सिद्धि के प्रदाता गजानन श्रीगणेश की दस दिन तक समारोह पूर्वक पूजा अर्चना, पूर्वजों को समर्पित श्राद्ध कर्म, और नवरात्रि में माता की आराधना भी हमारी आत्म शुद्धि का प्रयास ही है। आइए, माफ करें, और माफी मांगें। मिच्छामि दुक्कड़म।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कांच और कैमरा…“।)
अभी अभी # ७७३ ⇒ आलेख – कांच और कैमरा श्री प्रदीप शर्मा
जिसे दुनिया आइना, शीशा अथवा दर्पण कहती है, हमारे घर में उसे कांच कहा जाता था। तब साधारण घरों में आईने वाली स्टील की आलमारी और दहेज वाली, कांच लगी, ड्रेसिंग टेबल भी नहीं होती थी, ना तो कोई अटैच बाथ होता था और ना ही कोई बैडरूम। हां घरों के आले में एक जगह कांच, कंघा और एक छोटी लोहे की डब्बी, अथवा कांच की शीशी में खोपरे का तेल रखा जाता था। ठंड में खोपरे का तेल ठरक जाता था, यानी जम जाता था। स्कूल जाने की जल्दी में उसे नहाने के गर्म पानी में डुबकी दी जाती थी, वह बेचारा, इस उपकार के फलस्वरूप, अंदर से पिघल जाता था। कभी कभी आपातकाल में सरसों का तेल ही बालों में चुपड़ लिया जाता था। कुछ संपन्न घरों में दीवारों पर फ्रेम में किसी तस्वीर की तरह टंगा, आइना भी नजर आ जाता था।
मुझे कैमरे का शौक ना तब था, न आज है। एक समय था, जब अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन आते थे, जापानी कैमरा, वीपीपी डाक से मंगाइए, मात्र ५० रुपए में।
सत्तर और अस्सी के दशक में शादियों के एल्बम धड़ाधड़ बनते थे। जिसके घर भी मिलने जाओ, वह शादी का एल्बम जरूर चाव से दिखाता था। कुछ श्वेत श्याम तस्वीरें तो बाबा आदम के जमाने की लगती थी। लेकिन कितना रंगीन होता था न, शादी का एल्बम। ।
गर्मी की छुट्टियां हों अथवा एलटीसी लिया हो, शिमला मसूरी के साथ साथ तीरथ भी हो जाता था। बहती गंगा में कौन हाथ नहीं धोता। बैडिंग अथवा होल्डाल के साथ साथ एक अदद कैमरे की व्यवस्था भी की जाती थी। बाद में तो कैमरे के रोल भी रंगीन मिलने लग गए थे। यात्रा के बाद कैमरे के रोल धुलवाने पड़ते थे, अच्छा खासा इंतजार हुआ करता था। आज की तरह नहीं कि, लिया मोबाइल और खचाखच बीस पच्चीस एक जैसी तस्वीर खींच डाली। कुछ प्रिंट खराब भी निकल जाती थी। यानी बड़ा महंगा शौक था, फोटोग्राफी का।
कुछ टूरिस्ट स्पॉट्स पर तो पेशेवर फोटोग्राफर घूमा करते थे, आपके फोटो खींचकर बाद में डाक से भिजवा दिया करते थे।
अब तो खुदखेंच का जमाना है, आप चाहो तो मोदी जी के साथ सेल्फी हो जाए।।
अगर दर्पण झूठ नहीं बोलता, तो कैमरा भी कड़वा सच नहीं छुपाता। कुछ दिनों से मुझे अपना चेहरा बदला बदला, और सिर के बाल उड़े उड़े, यानी उजाड़ फसल, और बचे खुचे बाल, मानो धूप में सफेद किये हुए, नजर आने लगे हैं।
अपनों से तो आप नजर छुपा सकते हो, लेकिन अपने आपको कैसे छुपाओगे। कैमरा तो दर्पण का भी बाप है। अगर खुद की सूरत से इतना ही प्यार है, तो बालों को डाई करो, अमिताभ की तरह दाढ़ी रख लो, सफेदी वरदान बन जाएगी। ।
यही तो फर्क है, सूरत और सीरत में। पुरानी मशहूर अभिनेत्रियों को ही देख लीजिए, कहां गया उन हूरों का नूर। लेकिन सब कितनी मशहूर। जीवन का अध्यात्म अपने अंदर झांकने में है, आईने और कैमरे से शिकायत करने में नहीं। बाहर सब कांच ही कांच है, असली हीरा तो हमारे अंदर ही मौजूद है।
शैलेन्द्र ने शायद आज से बहत्तर वर्ष पूर्व, यानी सन् १९५३ में ही मेरे लिए यह गीत लिखा होगा, फिल्म शिकस्त का, जो मुझे आज भी प्रेरणा दे रहा है, मेरी आंखें खोल रहा है ;
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १४५ ☆ देश-परदेश – माननीय हमारी भी सुनो लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆
देश के सर्वोच्च न्यायालय के कुत्तों के मामले में यू टर्न लेकर जो साहसिक निर्णय लिया है, पूरे विश्व भर के कुत्ते उसकी “तारीफ़ के पुल” बांध रहें हैं। हालांकि इन पुलों के नीचे देश भर की लाखों बिल्लियां दब गई है। उनकी आवाज़ भी सुननी चाहिए। बढ़ती हुई कुत्तों की आबादी ने इन कोमल और कमसिन बिल्लियों का जीना तक दूभर कर रखा हैं।
बिल्लियों की कम संख्या से कबूतरों की मौज हैं। उनकी आबादी ने तो पूरा आसमान ही पाट दिया हैं। कबूतरों को बचाने में बहुत से धर्मांबली भी आगे आए हैं। बढ़ते हुए कबूतरों से हमारे देश के डॉक्टर बहुत प्रसन्न हैं, रोगियों की संख्या बढ़ाने में कबूतरों के सहयोग को नकारा नहीं जा सकता हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने कुत्तों के बाद हाथियों पर हो रहे अन्याय पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। कुत्तों और हाथी का पुराना संबंध है, सड़क पर जब हाथी मस्ती भरी चाल से निकलता है, तो ये गली के कुत्ते उस पर खूब भौंकते है, मगर क्या मजाल अकेले हाथी पर उसका कोई प्रभाव पड़ता हो। ये भी हो सकता है, इन गली के कुत्तों ने सर्वोच्च न्यायालय से इस बाबत कोई शिकायत की होगी, कि दस कुत्तों के झुंड से भी हाथी उनकी बात नहीं सुनता है, हाथी के कान सर्वोच्च न्यायालय को खींचने चाहिए।
देश का न्यायालय जितनी तत्परता से मानव प्राणी को छोड़ कर अन्य जीवों के लिए साहसिक कदम उठा रहा है, बहुत जल्दी अन्य प्राणियों जैसे कि हजारों वर्षों से मंद बुद्धि (अपमान) का घूंट पीकर कर जीवन व्यतीत कर रहे गधे, गन्दगी के प्रतीक माने जाने वाले सुअर, उछल कूद की पहचान बन चुके बन्दर आदि के लिए भी कुछ साहसिक कदम लेकर निर्णय सुनाए जाएंगे।