हिंदी साहित्य – यात्रा-वृत्तांत ☆ काशी चली किंगस्टन! – भाग – 11 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।

 ☆ यात्रा-वृत्तांत ☆ धारावाहिक उपन्यास – काशी चली किंगस्टन! – भाग – 11 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(हमें  प्रसन्नता है कि हम आदरणीय डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी के अत्यंत रोचक यात्रा-वृत्तांत – “काशी चली किंगस्टन !” को धारावाहिक उपन्यास के रूप में अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास कर रहे हैं। कृपया आत्मसात कीजिये।)

अंबुनाथ का दरबार

कल चलेंगे वापस किंग्सटन। आज सुबह सुबह चारों चले मेरिनलैंड घूमने। यहाँ तरह तरह के सामुद्रिक जीव रक्खे गये हैं। साथ में चिम्पांजी वगैरह कुछ स्थल के जंतु भी हैं। यह एक पिकनिक स्पॉट है। बच्चों को लेकर आइये। उनके लिए तरह तरह के राइड्स् और खेल हैं। ऊपर से नीचे गिरो – धड़ाम्। चक्कर चर्खी में घूमते घूमते ऊपर नीचे हो लो। ऐसे ही सब। हिम्मत हो तो आजमाओ। अगर सीने में हो दम, तब यहाँ पर कम !

झूम ने ऑन लाइन टिकट कटवा लिया था। कार पार्क करके हम अंदर दाखिल हो गये। यहाँ टिकट ‘चेकरिन’ से लेकर ‘गार्डिन’ वगैरह सभी जगह स्त्री शक्ति विराजमान हैं। मजे में पानी बरसने लगा था। एक चीज देखकर मेरा मन बारंबार आह्लादित हो उठता है, और वो है कि कार पार्क करते समय रुपाई स्टियरिंग लॉक अवश्य लगाता है। मेरे मन में अपार हर्ष होता है। क्यों? अरे भाई सब बनारसे को बदनाम करते हैं कि वो ठग नगरी है। यहाँ भी तो उनके मौसेरे भाई रहते हैं।

कार पार्किंग से जब तक रुपाई गेट तक आता, मैं ने देखा मेरिनलैंड की दीवार के पास झाड़ियों पर फालसा जैसे छोटे छोटे फल लगे हैं। जरा चख तो लें। एक कड़ुवा निकला, मगर बाकी? अरे वाह! खट्टा मीठा लाल लाल, पानी लेके धौड़ी आवऽ। इंद्रदेव ने दामाद की नजरों से मेरी रक्षा कर ली।

यहाँ आप एक टिकट से एक ही शो को कई बार देख सकते हैं। कोई रोक टोक नहीं। कल वाले रेनकोट पहनते हुए हम सबसे पहले एक्वेरियम में दाखिल हो गये। कई सील मछलियाँ तैर रही हैं। डुबकी लगा रही हैं। इसी सरोवर को नीचे से भी देखा जा सकता है। वहाँ से और कई रंगीन मछलियां दिखाई देती हैं। ऊपर एम्फिथियेटर जैसा दर्शक दीर्घा बना हुआ है। जो बूढ़े सज्जन वहाँ खड़े थे, ताकि कोई बच्चा रेलिंग पर से टैंक में न झुके, उन्होंने बताया,‘ये सब रिटायर्ड सील हैं। एक सील की उमर औसतन पचास की होती है। तो ये सब चालीस पैंतालीस की हो गई हैं।’

जरा सोचिए, अवसर प्राप्त करने के बाद भी बाकायदा उनकी देखभाल हो रही है। और बुद्ध की जन्मभूमि में जहाँ अहिंसा का नारा बुलन्द किया जाता है, वहाँ क्या होता है? अब तो सरकारी नौकरियों में भी पेंशन गायब हो रहे हैं।

पौने बारह बजे दूसरे बड़े ऑडिटोरियम में शुरू हुआ सी-लायन, डॉल्फिन, बेलुगा व्हेल और वालरस का शो। सबकुछ अद्भुत। उनके कारनामों को देख हम तो बस चकित ही रह गये। ये लोग इन जीवों से कितना प्यार करते हैं, जो उनसे ये करतब करवा लेते हैं। वैसे पशु प्रेमी लोग यह इल्जाम लगाते हैं कि ये उन्हें सिखाने के लिए यातना भी देते हैं। मगर ऐसा नहीं लगता। सर्कस में पशुराज को जैसे हंटर का डर दिखाकर उससे सारे करतब करवाये जाते हैं, यहाँ का माहौल तो उसके बिलकुल विपरीत है। कुछ समझ में नहीं आता। डॉलफिन आदि तो ऐसे ही इन्सानों से प्यार करते हैं। कुत्ते और घोड़ों की तरह।

खैर, सबसे पहले सी लायन का खेल शुरू हुआ। वे फर्श पर घसीटते घसीटते मंच पर आ रहे हैं। फिर ट्रेनर के इशारे पर पानी में छलाँग लगा रहे हैं। एक दूसरे को रिंग पहना रहे हैं। कमर हिला कर नाच रहे हैं। ट्रेनर जब हाथ हिला कर बाई कर रहा है या ताली बजा रहा है, वे अपने फिन्स या पंखों से वही कर रहे हैं। प्रशिक्षक के साथ स्विमिंग पुल में चक्कर काट रहे हैं। सामने घाट पर उठ कर उसे चूम रहे हैं। और हाँ, हर आइटेम के बाद उन्हें उनका मेहनताना चाहिए। यानी, भैया, मुझे मछली दो! और वो देनी पड़ती है। हाथों हाथ। हाँ, ध्यान रहे कि मछली को उनके मुँह में डालते समय उसका मुँह नीचे रहे, यानी मछली की पूँछ ऊपर की ओर हो। वरना सी लायन के गले में खरौंच आ सकती है।

अगला आइटेम है बेलुगा व्हेल का। मुँह से पानी का फव्वारा छोड़ते हुए दो सफेद बेलुगा व्हेल का प्रवेश। ये सिर्फ आर्कटिक महासागरीय अंचल में ही पाये जाते हैं। यानी कनाडा, उत्तर अमेरीका और रूस जैसे देशों के समुद्री तटों के पास। अपने ट्रेनर को थूथन पर उठा कर वे तैर रहे हैं। सवारी करवा रहे हैं। फिर मछली – परितोष एवं पुरस्कार। साथ ही साथ ऑडिटोरियम से उल्लास की ध्वनि आकाश में गूँजने लगती है। सारे बच्चे खुश होकर झूम रहे हैं। बार बार मां का चेहरा अपनी ओर खींच कर कह रहे हैं, ‘मम्मी , वो देखो।’  

उसी तरह कई डॉलफिन मिल कर खेल दिखलाने लगे। पानी के ऊपर छलाँग लगाना, चक्कर खा कर वापस पानी में गिरना। और जाने क्या क्या। वाह भई मजा आ गया। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि इनके कई शो ये एकसाथ समूह में करते हैं। सिन्क्रोनाइज्ड परफॉर्मेंस! जैसे ओलम्पिक में दो तैराक एकसाथ डाइव देते हैं और दूसरे करतब दिखाते हैं, ठीक वैसे। और हमारी शोबाजी क्या हो रही थी ? हम तो बस दांतों तले उँगलियां दबाते रहे।

शो के अंतिम चरण में आविर्भाव हुआ राजा साहब का। वालरस। विशालकाय, भूरा रंग, दो बड़े बड़े दाँत। रूप तेरा मस्ताना। उतने बड़े शरीर को ट्रेनर के साथ साथ मंच के फर्श पर घसीट कर ले जाना ही तो बड़ी बात है। आखिर ये प्राणी तो आर्कटिक अंचल की बर्फ पर ही न रहते हैं।

अयोध्याकांड में भरत कहते हैं न ? ‘पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।’ भले ही बंदर आदि पशु नाचे और तोते सीताराम सीताराम करें, मगर उनको ये गुण नचानेवाले और पाठ पढ़ानेवाले ही सीखाते हैं।

दोपहर की उदरारती के लिए रुपाई हमें लेकर वहीं मेरीनलैंड के एक रेस्तोरॉ में पहुँचा। वहाँ देखा कई किशोर सर्विस में लगे हुए हैं। रुपाई ने कहा, ‘ये बच्चे स्वरोजगार के लिए छुट्टी के दिनों यहाँ काम करने के लिए आते हैं।’ बाहर रिमझिम बारिश हो रही है। पेट के साथ साथ नेत्रों से भी रसास्वादन होने लगा।

मेरी लाडो आखिर बनारस की बेटी है,‘माँ, मैं जरा झूले पर चढ़ने जा रही हूँ। तुम दोनों वहीं एक्वारियम के ऑडिटोरियम में बैठे रहना।’

‘झूम, सँभाल के। ज्यादा एडवेंचर करने की जरूरत नहीं। चक्कर आने लगेंगे।’ माँ को तो मना करना ही है। रुपाई गया उसके साथ। उनके बचपन में जब मैं बेटी और बेटे को तैराकी सिखाने के लिए गंगा पार ले जाया करता था तो बीच गंगा में ही चिल्लाता रहता,‘चलो मेरे शेर, कूद जाओ।’

ऑडिटोरियम में काफी देर तक बैठे बैठे हम बोर होने लगे थे। हाँ, रुपाई के कहने पर हम लोगों ने बेलुगा व्हेल आदि का दूसरा शो फिर से देख लिया था। वे मेरिन लैंड का चिड़ियाघर देख कर लौटे। इधर हम दोनों दूसरे दो तल्ले के एक टैंक में जाकर किलर व्हेल और दूसरे बेलुगा व्हेल देख आये। अरे जनाब, बेचारे किलर व्हेल को उसके नाम के कारण बदनाम न करें। वे काफी शरीफ प्राणी होते हैं। शिकारी विकारी नहीं। काले नील शरीर पर सफेद आँखे। हाँ दोस्त, तेरा रूप ही जानलेवा है, तू नहीं!  

ऊपर वाले टैंक के पास वही खट्टे मीठे फल। मन ललचा गया। वहाँ के स्टाफ हँसने लगीं,‘ये चेरी के छोटे भाई हैं।’

अब देखिए झूम की मांई की विश्वासघातकता। खुद तो डाल से बिन बिन कर खा रही थी, ‘लीजिए फोटो खींचिए न।’

मगर मैं ने जब हाथ बढ़ाया तो,‘अरे रुपाई नाराज हो जायेगा। पता नहीं कौन सा फल हैं ये।’

किसने लिखा है – नारी तुम केवल श्रद्धा हो (कामायनी)? अरे शेक्सपीयर ने तो काफी पहले ही हैमलेट में लिख दिया था – ‘फ्रेल्टी दाई नेम इज वुमैन!’ विश्वासघात, ऐ नागिनी, क्या तेरा नाम है कामिनी?’ पवित्र बाईबिल की कहानी याद है ? शैतान सेब के फल में कीड़ा बनकर घुस आया और उसने हौवा को बहकाया। हौवा के कहने पर आदम ने उस सेब को खाया, तो लो बच्चू, बेचारे को स्वर्ग से निष्कासित होना पड़ा। क्यों ?

जामाता के सामने मेरी ‘वो’ बिलकुल कौशल्या यशोदा बनी रहती हैं। और मैं ही ठहरा मूढ़ ससुर।

दिन भर बारिश होती रही। मेरिन लैंड में स्कूली बच्चे भी आये हुए थे। उनके मैडम और वे बेचारे भींग रहे थे। नायाग्रा दर्शन वाले रेन कोट भले ही पतले प्लास्टिक के हों, मगर उनसे हम काफी हद तक बचते रहे।   

रात को पहुँचे फिर नायाग्रा से मिलने। वहाँ की आतिशबाजी देखकर तो यही लग रहा था कि रात के अँधेरे को सजाने सितारे आकाश से जमीं पर उतर आ रहे हैं। विद्यापति की एक पंक्ति को रवीन्द्रनाथ ने कहीं लिखा है – जनम अवधि हम रूप निहारल नयन ने तिरपित भेल ……

उनके नूर के दीदार में सारी उम्र्र लगी थी जाने /नजरों की हसरत बुझी न थी, वे चल दी फिर प्यास बुझाने!

अगली सुबह बैक टू किंग्सटन। चलो मन गंगा जमुना तीर …..    

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी 

संपर्क:  सी, 26/35-40. रामकटोरा, वाराणसी . 221001. मो. (0) 9455168359, (0) 9140214489 दूरभाष- (0542) 2204504.

ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार # 84 – स्वयं को पहचाने ☆ श्री आशीष कुमार ☆

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #84 – स्वयं को पहचाने ☆ श्री आशीष कुमार

एक बार स्वामी विवेकानंद के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला “स्वामी जी! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं, मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा-लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।”

स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा-सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा ‘‘तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।’’

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी-खासी सैर कराकर जब वह व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहूँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हांफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि  “यह कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ-सुथरे और बिना थके दिख रहे हो|”

तो व्यक्ति ने कहा “मैं तो सीधा-साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन यह कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसलिए यह थक गया है।”

स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा  “यही तुम्हारे सभी प्रश्रों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आसपास ही है वह ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो।”

यही बात लगभग हम सब पर लागू होती है। प्रायः अधिकांश लोग हमेशा दूसरों की गलतीयों की निंदा-चर्चा करने, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या-द्वेष करने, और अपने अल्प ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय अहंकारग्रस्त हो कर दूसरों पर रौब झाड़ने में ही रह जाते हैं।

अंततः इसी सोच की वजह से हम अपना बहुमूल्य समय और क्षमता दोनों खो बैठते हैं, और जीवन एक संघर्ष मात्र बनकर रह जाता है।

दूसरों से होड़ मत कीजिये, और अपनी मंजिल खुद बनाइये।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – यात्रा-वृत्तांत ☆ काशी चली किंगस्टन! – भाग – 9 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।

 ☆ यात्रा-वृत्तांत ☆ धारावाहिक उपन्यास – काशी चली किंगस्टन! – भाग – 9 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(हमें  प्रसन्नता है कि हम आदरणीय डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी के अत्यंत रोचक यात्रा-वृत्तांत – “काशी चली किंगस्टन !” को धारावाहिक उपन्यास के रूप में अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास कर रहे हैं। कृपया आत्मसात कीजिये।)

प्रपात के पीछे

यानी सबसे पहले आज बिहाइंड द फॉल देखने जायेंगे। मालूम हुआ हम तीनों को वहाँ नायाग्रा के किनारे तक छोड़ कर वापस आकर रुपाई यहाँ की लाइब्रेरी में बैठकर अपना पेपर पूरा करेगा।

कल दिनभर पिज्जा वगैरह खाने के कारण आज प्रातःकाल पेट कुछ बेअदब हो गया। मेरी सरहज टिपटॉप, सुबह से ही फुलस्टॉप। फिर भी प्रयास जारी रखना, यार। नहा धोकर निकला तो देखा माखनचोर गोपाल के सामने झूम ने केले के दो टुकड़े और एक बड़ी बोतल में पानी रख दिया है। वह जहाँ कहीं भी जाती इस गोपाल की मूर्ति को साथ ले चलती है। बनारस में भी जब आती है तो माखनचोर उसकी गोद में ही रहते हैं। वहाँ हमारे घर के ठाकुर घर में रामकृष्ण परमहंस, शारदा मां, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, महादेव, ससुरजी एवं उनके महाराज, मेरे नाना नानी, बाबा माँ, यानी झूमके दादा दादी और माँ काली आदि के साथ विराजमान हो जाते हैं। मॉन्ट्रीयल के यूल एअरपोर्ट में भी तो गोपाल हम नाना नानी को रीसिव करने आये थे।

मेरा मन भारी होने लगा। हे विश्वद्रष्टा, तुम कब हमारी बात सुनोगे? कब मेरी गुड़िया की गोद में आकर खेलोगे? माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा / करिअ सिसु लीला अति प्रियसीला यह रूप परम अनूपा (बालकांड)! जब शिशु रामचंद्र माता कौशल्या को अपना दिव्य रूप दिखाने लगे तो माँ को वह उतना पसंद क्यों आये ? तो :- माँ कौशल्या हाथ जोड़कर / बोली, ‘खेलो बच्चा बनकर।/देवरूप तो नहीं सुहाता/किलकारी में मन सुख पाता!’  यही तो जीवन का परम सत्य है ! इसी में जीवन का अमृत रस है!

मैं ने हँस कर बेटी से कहा,‘अरे जननी, इतनी बड़ी बोतल में पानी दिया है। बेचारा दिन भर सब कुछ भिंगाता रहेगा।’

अम्मां बोली,‘एक साथ पीने को किसने कहा है? एक एक घूँट पीकर रख दे।’

पहले पेट पूजन, फिर हरि दर्शन। नाश्ते के बाद हम चल पड़े।

जलप्रपात की ओर सड़क की ढलान बिलकुल नीचे चली गई है। नजदीक से नायाग्रा का दीदार करने करीब दस बजे तक हम तीनों वहाँ पहुँच गये। कैसिनो की लंबी इमारत के सामने से सड़क पार करके हम सीढ़ी उतर गये। पहले टिकट, फिर लिफ्ट से नीचे जाओ। फिर एक जगह पीले रंग के पतला सा रेनकोट लो। आगे बढ़ते ही,‘ऐ भाई जरा रुक के चलो।’ वहाँ फोटो खींचा जा रहा है। मैं ने सोचा कि शायद यह फोटो उठाकर मुसाफिर दर्शकों की सूची बना रहे हैं। अरे नहीं मूरख। वापस आते समय वे इसे बेचेंगे। शायद बीस डालर की एक फोटो। कौन लेगा ? खैर, हम अब लिफ्ट के जरिए पहुँचे ठीक जलप्रपात के पीछे बनी सुरंग में। सुरंग के भीतर फर्श पानी पानी जरूर है, मगर फिसलन कहीं नहीं। इसे कहते हैं मेंटेनेंस।

नायाग्रा नदी आकर यहाँ दो भागों में बहती है। पूरब की ओर यूएसए वाला हिस्सा। और इस पार घोड़े के नाल की शक्ल में कनाडावाला। तो जमीन से करीब 56 मीटर नीचे जाकर प्रपात के पीछे बनी सुरंग में खड़े होकर हम झरने को देख रहे हैं। प्रकृति की अद्भुत महफिल सजी हुई है। सामने लाखों मृदंगों की थापों के साथ करोड़ों उर्वशी और रंभायें नाच रही हैं। सारा ब्रह्मांड मदमस्त है। इस दिव्य रूप को देखते जाओ। इसके आगे रोजमर्रे की सारी शिकायतें बिलकुल तुच्छ जान पड़ती है। नायाग्रा जलप्रपात ने अपने ध्रुपद संगीत का ऐसा समाँ बांधा है कि मानो कह रहा हो :-‘ऐ इन्सानों, मेरी इन लहरों की तरह सब एक दूसरे के हाथों में हाथ डालकर चलते रहो। एक दूसरे का साथ न छोड़ो। गले लगालो सबको। अपने मुहल्लेवालों को, अपने शहरवालों को, अपने देशवासिओं को, अपने पड़ोसी मुल्क के लोगों को। तुम्हारे हृदय की धड़कन सुनाई दे सारे विश्ववासियों के सीने में -!’  

सुरंग के अंदर कतार आगे बढ़ रही है। दीवाल पर यहीं के तरह तरह के पुराने फोटोग्राफ लगे हैं। कैसे सुरंग बनी, कैसे एक सुरंग बनते बनते रह गई, कैसे नायाग्रा से हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर का उत्पादन आरंभ हुआ, कौन कौन से विख्यात व्यक्ति इसे देखने यहाँ आये हुए थे, वगैरह। पानी के परदे के उस पार कुछ नहीं दिख रहा है। कुछ नहीं। समझ में आता है कितना बड़ा सत्य छिपा है इस कथन में :- गिरा अनयन नयन बिनु बानी (बालकाण्ड)। वाणी नहीं नैनों के पास/दृष्टि बिन जीभ सारी उदास।

यहाँ भी मनौती की रकम बिखरी पड़ी थी प्रपात धारा के ठीक पीछे, पत्थरों पर। हर जगह भगवान को खुश करने के लिए हम यही उपाय क्यों चुनते हैं? शायद वेदों से ही इसका शुभारंभ है। हे इन्द्र, हे अग्नि, हवि ग्रहण करो, और मुझे यह दो, वह दो! वामन शिवराम आप्टे ने हवः के अर्थ में आहुति, यज्ञ, आवाहन, आदेश से लेकर चुनौती या ललकार तक दिया है। हवनम् का एक अर्थ तो युद्ध के लिए ललकार तक है।

स्वामी जगदीश्वरानंद अनूदित बांग्ला ऋग्वेद के चतुर्थ सुक्त के नौवें श्लोक में है :-(हे इंद्र), धनप्राप्ति के लिए हम आपको हवि के रूप में अन्नदान करते हैं। उसी पुस्तक में है – मार्कंडेय पुराण में देवी लक्ष्मी से कहा गया है – हे चंचला, आप हमारे गृह में पधारिए। आपके प्रसाद से हम ढेर सारा सोना, गायें, पुत्र, पौत्र, दास और दासियां प्राप्त होंगे!(तां म आवहो जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गाबो दास्यो विन्देयं पुरुषानहम्। श्लोक सं. 15)

साथ ही साथ सैमुयेल बटलर (1835-1902) अनूदित होमर का महाकाव्य इलियाड से एक कहानी, इसी विषय पर …….। होमर का दूसरा महाकाव्य ओडिसी को आप इसीका दूसरा खंड कह सकते हैं। एक में अगर ट्राय युद्ध का वर्णन है, तो अगले में है योद्धाओं की घर वापसी।

अब औरत को लेकर झमेला एवं जंग तो रामायण की सीता से लेकर इलियाड की हेलेन ऑफ ट्रॉय तक होते ही आये हैं। नारी महामारी। खैर, जब ट्रॉय का राजकुमार पेरिस स्पार्टा की रानी एवं राजा मेनेलाउस की पत्नी हेलेन को चुरा ले गया तो ट्रॉय के खिलाफ एचियन ग्रीकों ने युद्ध छेड़ दिया। अब जरा अंदर की बात। यहाँ तक पढ़ लेने के पश्चात प्रसिद्ध बाल साहित्यकार श्रीप्रसादजी की बहू डा0 उषा लगी मुझे डाँटने,‘अरे ट्रॉय की कहानी को तो बताना चाहिए। आप भी न बस्स….’। अब पाठकों को क्या मालूम कि हम जैसे चवन्निया लेखकों को जाने कहाँ कहाँ और कितनी बार समालोचनाओं से शराहत होना पड़ता है! और हम तो कोई ‘कलम के अशर्फिया रण बाँकुरे’ नहीं न हैं। हाय अदब, फिर भी हम आते हैं तेरी गलिओं में पत्थरों से लोहा लेने। नश्शए कलम वो है कि छूटता ही नहीं। सो इलियाड से यह कहानी पहले …..

तो स्पार्टा की रानी हेलेन विश्व विख्यात सुंदरी थी। जाने कितने थे उसके चाहनेवाले। रूप ऐसा कि मानो उसी के लिए किसी ने लिखा है – आँखों ने मए हुस्न पिलाई थी एक रोज़, अँगड़ाइयाँ लेता हूँ अभी तक खुमार में! उधर ट्रॉय के राजा प्रियाम और रानी हेकुबा के दो बेटे थे। बड़ा हेक्टर और छोटा पेरिस या आलेक्जांडर। पेरिस भी बला का खूबसूरत था। पेरिस कभी स्पार्टा घूमने गया था। और मौका पाते ही वह हेलेन को अपने संग उड़ा ले आया। ग्रीक योद्धा जहाजों पर सवार होकर ट्रॉय के तट पर आ धमके,‘मेनेलाउस की पत्नी को वापस करो!’

मगर वहाँ भी वही दशानन की तरह जवाब मिला,‘हिम्मत है तो लड़ कर ले जा!’

दस साल तक चला यह युद्ध! कितने योद्धा रणभूमि में खेत रहे। मगर नतीजा जीरो बटा सन्नाटा। आखिर ग्रीक सेनापति ओडिसियस को एक तरकीब सूझी,‘हम एक लकड़ी का खोखला घोड़ा बनायें। उसके अंदर हमारे चुने हुए सिपाही रहेंगे। उस लकड़ी के घोड़े को ट्रॉय के सिंहद्वार के पास छोड़ कर हम जहाज लेकर दूर हट जायें। उन्हें लगेगा कि हम पराजय स्वीकार कर युद्धभूमि से लौट चले हैं। वे उस घोड़े को नगर के अंदर ले जायेंगे तो रात के अँधेरे में हमारे सिपाही घोड़े के पेट से निकल कर ट्रॉय का मुख्यद्वार खोल देगा और हम तब तक वापस आकर अंदर पहुँच जायेंगे।’

बस यही हुआ। घोड़े के पेट पर लिखा था – देवी एथिना के लिए ग्रीकों की भेंट! क्योंकि जंग के दौरान ग्रीकों ने एथिना के मंदिर को तहस नहस कर दिया था। ट्रोजान (ट्रॉय निवासी) पुरोहित लाओकून ने सबको होशियार किया,‘अरे उस घोड़े को फाटक के अंदर मत लाओ। इसमें जरूर ग्रीकों की कोई चाल है।’

मगर उस मौके पर कौन किसका सुनता? ‘ग्रीक भाग गये। हम जंग जीत गये!’कहते हुए ट्रोजान वीर उसे सिंहद्वार के अंदर लेते आये और उसी रात…..अँधेरे में ……..। ग्रीक अपने जहाजी बेड़े को दिन के उजाले में तो दूर ले गये थे, मगर रात तक सब वापस आ चुके थे। और फिर शुरू हो गयी मार काट। बहुत हुआ खून खराबा। अनेकानेक घटनाओं के बाद हेलेन मेनेलाउस को मिल गयी।

अब चढ़ावे की यह कहानी है तब की जब ग्रीकों ने ट्रॉय के बाहर समुद्री तट पर अपने जहाजी बेड़े को खड़ा कर रक्खा था। यानी इलियाड के आरम्भ में। यह उनके अंदरूनी झगड़े की गाथा है। उनके पुरोहित क्राइसेस की बेटी क्राइसिस को ग्रीक सेनापति अगामेनन ने रखैल बनाकर अपने पास रख लिया। क्राइसेस दौलत लेकर गया अगामेनन के पास,‘इसे लेकर मेरी बेटी को छोड़ दो।’

मगर वह इंकार कर गया। पुरोहित क्राइसेस की प्रार्थना से ईश्वर अपेलो अपने चाँदी के धनुष लेकर आये और उनके जहाज पर तीर की वर्षा करने लगे। तो ग्रीक वीर एकिलिस ने सबको बुलाकर कहा,‘अरे इस तरह तो हम सब मारे जायेंगे। जरा पुरोहितों से पूछो कि आखिर फिबस अपेलो हम पर इतना क्रुद्ध क्यों हैं? क्या हमने कोई प्रतिज्ञा तोड़ी है या उन्हें जो ‘हेकाटॉम्ब’ (भेंट) देने की बात कही थी उससे हम मुकर गये?’

प्राचीन ग्रीस में एक हेकाटन का मतलब होता था सौ अच्छे नस्ल के साँड़ों की सौगात। वैसे बारह से भी काम चल जाते। फिर देखिए सौदेबाजी। चेंबर्स में ‘हेकाटॉम्ब’ के अर्थों में लिखा है – शिकारों की एक बड़ी संख्या। ध्यान दीजिए हम भी तो माँ काली को प्रसन्न करने के लिए उनके सामने बलि चढ़ाते हैं। बंगाल में डाकात काली के सामने नरबलि तक होता था। इन्सान अपने लालच में माँ के नाम पर भी कीचड़ उछालने में पीछे नहीं हटता। किसी माँ को क्या अपनी संतान या किसी भी जीव का बलि चाहिए ? बकरीद का अर्थ अब क्या होकर रह गया है? इब्राहीम ने तो अल्लाह के रास्ते पर चलते हुए अपनी सबसे प्यारी वस्तु अपनी औलाद की भी कुरबानी देनी चाही थी। मगर अब -? तो कहानी पर लौटें …….

आगे एकिलिस फिर पूछता है,‘अगर हम उन्हें भेंड़ और बकरिओं का चढ़ावा चढ़ायें तो क्या वे हमें माफ कर देंगे ?’

फिर यहाँ से शुरू होता है ग्रीकों का आपस में मतभेद, मनमुटाव। अब अगामेनन एकिलिस की रखैल ब्राइसिस की माँग करने लगता है। एक हाथ से दो, दूसरे हाथ से लो। वाह! खैर, तो चढ़ावा या मनौती का इतिहास वहाँ भी है। तो आगे……

फिर हम सब सुरंग से निकल आये। लौटते समय हम दोबारा उसमें पहुँचे थे। सीढ़ी से उतरते समय ऊपर लिखा है – जर्नी बिहाइंड द फॉल। तो बाहर प्रपात की बगल में एक छतनुमा घेरे में खड़े होकर चंद्रमौलि पर गंगावतरण का साक्षात दर्शन। शायद इसी ध्वनि से प्राचीन ऋषियों ने हर हर शब्द का निर्माण किया था। हर हर हर हर…… हे कनाडा की गंगा, बस इसी तरह निरंतर बहती जाओ। तुमसे शिकायत रह गयी कि पानी के कतरों में इन्द्रधनुष नहीं दिखा। जो हमने जगदलपुर के चित्रकूट में देखा था। आज आसमां में बादल जो छाये थे।

‘नर्मदा के अमृत’, नंदलाल वसु का शिष्य, चित्रकार एवं लेखक जबलपुर निवासी अमृतलाल वेगड़ ने कहा है,‘जब कोलाहल नहीं रहता, कलरव तभी सुनाई देता है।’ चारों ओर कितनी भाषाओं के पंछी पंख फैलाकर उड़ रहे हैं। कहाँ कहाँ से लोग नहीं आये हैं! शायद अरब, इराक और इज्रायल (सिर पर वही चपटी टोपी, साफ मूँछें और बढ़ी हुई दाढ़ी देख कर कह रहा हूँ।)। उधर जापान, कोरिया और पता नहीं चीन के भी हैं या नहीं। फ्रेंच तो जरूर होंगे। आज भी तो कनाडा में फ्रेंच और अंग्रेजी की तू तू मैं मैं जारी है। उधर अंडाकार चेहरेवाली डच बालायें, तो अफ्रीकी या द0 अमेरिकी भी। मगर कहाँ हैं इस माटी के सच्चे मालिक? एकदिन यहाँ की समूची धरती जिनकी थी। रेड इंडियन ? उनका क्या हुआ ? यहाँ सेंट लारेंस के किनारे की इरोक्विन भाषा में कनाता का अर्थ है गांव या बस्ती। 1763 में उसी से कनाडा का प्रचलन हुआ। आज यहाँ दस प्रदेश हैं। गोरे अगर 76.7 फीसदी हैं, तो एशियन 14.2, अश्वेत 2.9 और आदिवासी सिर्फ 4.3 प्रतिशत। यहाँ के मिलिट्री तमगे पर लैटिन में लिखा होता हैः- ए मारी उस्कू एड मारे। यानी सागर से सागर तक। अर्थात अटलांटिक से प्रशांत महासागर तक साम्राज्य हो! यहाँ का राष्ट्रगान अगर ‘ओ कनाडा’ है, तो राजकीय गान है ‘गॉड सेव द क्वीन’! यानी ग्रेट ब्रिटेन की रानी के प्रति श्रद्धा प्रदर्शन!

इतिहास बहुत निर्मम है। कोलम्बस द्वारा अमरीका की खोज के पश्चात जहाज में बैठकर फ्रेंच और अंग्रेजों का यहाँ आगमन – और फिर? आह! वे रेड इंडियन दौड़ रहे हैं। केवल तीर चलाकर वे कैसे इन बंदूकों का सामना करते? ओह! उस जमाने में तो उनके पास घोड़े भी नहीं थे। घोड़े तो यूरोपियों के साथ ही यहाँ आये। मानो वह समूचा दृश्य आँखों के सामने से गुजर रहा है। बच्चे माँ की छाती से चिपक कर रो रहे हैं। मायें चिल्ला चिल्ला कर अपने ईश्वर को बुला रही हैं। कनाडा की धरती लाल हो उठी है। कैटारकी, सेन्ट लॉरेन्स नदियाँ, ईरी से लेकर ऑन्टारिओ झील – सबकुछ रक्तिम हो गया।

नायाग्रा, तुम्हारी इस गर्जन में उस दिन जाने कितने प्रतिवाद के स्वर मुखर हुये होंगे। हे भगीरथ, आओ, अपना शंख शंख फूँको! इस प्रपात की धारा से इस धरा से सारी कालिमा मिटा कर चिता की राखों से एक नये प्राण का आह्वान कर नहीं सकते ? इन तमाम कुटिल द्वन्द्वों और संघर्षों के बीच अमृत मंथन कर नया जीवन संचार कर नहीं सकते? मगर आज ……

हो हो हो …… सबकी उन्मुक्त हँसी मानो गगन को छू रही है। कोई बच्चे को बुला रहा है, कोई पत्नी या प्रेयसी को। एक दोस्त दूसरे से अनर्गल बातें किया जा रहा है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मगर शब्द को समझने की जरूरत क्या है ? उनकी भावना की स्निग्ध धारा से हमारा तन मन भी तो सिक्त हो गया। मुक्त हँसी से आ गयी, गुदौलिया (काशी की हृदय स्थली स्थित चौराहा।) की याद। जीअ र’जा, मजा लऽ गुरू, हो आनंद आबाद !

वापसी में एक जगह लिखा था पर्यावरण की रक्षा के लिए प्लास्टिक के रेनकोट को यहीं त्यागते जाइये। अरे नहीं भाई। यहाँ के मौसम का मिजाज समझना बहुत कठिन है। अचानक बारिश होने लगती है। तो इन्हें सँभाल कर ही रक्खा जाए। फिर उन फोटोग्राफरों का सवाल,‘यादगार के लिए अपनी फोटो तो लेते जाइये।’ उनलोगों ने बाकायदा कमरे के अंदर खिंची गयी फोटो के बैकग्राउंड में नायाग्रा की धारा को फिट कर दिया है। वाह भई, फोटोग्राफी के जादू।

आगे बढ़ा तो हमें एक गिफ्ट सेंटर के बीच से होकर निकलना पड़ा। वहाँ एक बड़े हिरण जैसा प्राणी मूस खड़ा है। यानी एक तरह की मूर्ति ही समझिये। उत्तरी यूरोप और एशिया में इसी प्राणी को एल्क कहते हैं। हमे कुछ खरीदना नहीं है भैया। भागो…….भागो………

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी 

संपर्क:  सी, 26/35-40. रामकटोरा, वाराणसी . 221001. मो. (0) 9455168359, (0) 9140214489 दूरभाष- (0542) 2204504.

ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – यात्रा-वृत्तांत ☆ काशी चली किंगस्टन! – भाग – 8 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।

 ☆ यात्रा-वृत्तांत ☆ धारावाहिक उपन्यास – काशी चली किंगस्टन! – भाग – 8 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(हमें  प्रसन्नता है कि हम आदरणीय डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी के अत्यंत रोचक यात्रा-वृत्तांत – “काशी चली किंगस्टन !” को धारावाहिक उपन्यास के रूप में अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास कर रहे हैं। कृपया आत्मसात कीजिये।)

नायाग्रा जलप्रपात

शाम की चाय रुम में ही हो गई। फिर चले नियाग्रा का दिव्य दर्शन करने। सारी दुनिया से लोग तो इसे ही देखने आते हैं। नारीग्रा, क्याउगा और गहनावेहटा यानी तीन झरनों को एकसाथ आज नायाग्रा ही कहते हैं। ये सब इनके आदिम आदिवासी नाम हैं। इनमें सबसे बड़ा हार्स शू फॉल कनाडावाले हिस्से में है। और दो, यानी अमेरिकन फॉल्स और ब्राइडल फॉल्स उस पार न्यूयार्क की तरफ। यह प्रपात 2600 फीट चौड़ा है। यहाँ पानी 167 से 173 फीट की ऊँचाई नीचे गिरता है। रुपाई बता रहा था वेनेजुएला का एंजेल वाटरफॉल ही दुनिया का सबसे ऊँचा जल प्रपात है।

बस, कार पार्किंग में जो परेशानी हुई। यहाँ नहीं वहाँ। आगे जाओ। झमेला अपरम्पार। खैर घोड़े को अस्तबल मिल गया। हम दाहिनी ओर आगे बढ़े। आगे सड़क। बायें जाकर दो हिस्सों में बँट गई। दाहिने वाले से सीधे वापस ऊपर सड़क पर चले जाओ। बायें से नायाग्रा के किनारे किनारे – इतनी ऊँचाई से उसे जी भर कर देख लो। विहंगम दृश्य। अमां, क्या रूप है! गंगावतरण के लिए अपनी जटाओं को खोलकर नटराज नृत्य कर रहे हैं! रास्ते पर ठट्ट ठठ्ठ भीड़। कोई बच्चों की  फोटो खींच रहा है, तो कोई प्रिया की, या फिर सेल्फी। वहीं काफी आगे दाहिने लेक ईरी से निकल कर यह झरना पूरब की ओर जा रहा है। मंजिल है लेक अॅन्टारियो। उस पार पूरब की ओर अमेरीका वाला हिस्सा दिख रहा है। हरा पानी नीचे छलाँग लगा रहा है। दाहिने कनाडा वाला भाग घोड़े के नाल की तरह अर्द्धचंद्राकार शक्ल में मुड़ा हुआ है। मानो ऊपर से नीचे हरी हरी जलकन्याओं का झुंड सफेद पंखों को हिलाते हुए अटखेलियां करती हुईं नीचे उतर रही हैं। सी-गल पक्षियां उनसे पूछ रहे हैं, ‘कहो नीरबाला, नीचे पहुँच गयीं?’

उधर से आती हवा से पानी की छींटें यहां सड़क तक आ रही हैं। सब दौड़ रहे हैं – भाई, बचके! मगर यहाँ छत्रधारी है कौन ? सब एक दूसरे से लिपट कर मानो बौछार से बच जायेंगे। बिन बारिश की बरसात।

आगे जहाँ से नायाग्रा झरना नीचे छलाँग लगाता है वहाँ परिन्दों की महफिल जमीं हुई है। ‘क्याओं क्याओं! खाने वाने का कुछ लाये हो?’ अपने हल्के बादामी डैनों को हिलाते हुए झुंड के झुंड सफेद सीगल लगे पूछने। कई बच्चे और दूसरे लोग उन्हे ब्रेड वगैरह कुछ खिला रहे थे। और एक काबिले तवज्जुह यानी ध्यान देने योग्य बात – यहाँ ढेर सारी गौरैया भी उड़ उड़ कर दाना चुग रही थीं। हमारे यहाँ तो ये आँगन में, या खिड़कियों पर दिखती ही नहीं। क्यों? मोबाइल टावर को कोसा जाता है। तो वो तो यहाँ भी है कि नहीं ?राम जाने भैया। विज्ञान का अविज्ञान।

सामने बहती धारा में देखा कि पत्थरों पर मनौती के पैसे गिरे पड़े हैं। यहाँ भी यह खूब चलता है। बनारस के घाटों पर पड़े सिक्कों को उठाने के लिए तो मल्लाह के बच्चे गोते लगाते रहते हैं। यहाँ डुबकी लगाने की हिम्मत किसे होगी ?

घड़ी की सूई तो चल चल कर थक गई होगी। मगर संध्या अभी अपनी मंजिल से काफी दूर थी। मानो मायके से ससुराल आना ही नहीं चाहती है। कनाडा में तो नौ के बाद ही संध्या संगीत का आलाप आरंभ होता है।

लोहे की रेलिंग के पास खड़े हम मंत्रमुग्ध होकर झरने को देख रहे हैं। यह कैसा दृश्य है! विंदुसर के तटपर जाने कितने वर्ष की घोर तपस्या के पश्चात भगीरथ के आह्वान पर जब गंगा स्वर्ग से धरा पर उतरीं, तो नजारा कुछ ऐसा ही रहा होगा। नीचे गंगावतरण के लिए विश्व बंधु शंकर थे खड़े – अपनी जटाओं को बंधन मुक्त कर,‘आओ, हे देवापगा! तुम्हारी प्रचंड धारा को मैं अपने मस्तक पर बांध लूँगा। आओ सुरसरि, धरा पर उतर आओ।’  

चारों ओर निनाद हो रहा है। महादेव का डमरू बज रहा है। प्यासी है धरती, आओ उसकी प्यास बुझाओ। बूँद बूँद पानी के कतरे – एक कुहासा – सामने नीचे धुँध। उसीमें जा रहे हैं कनाडा और यूएसए के जहाज- यात्रिओं को लेकर। उनको कहा जाता है – मेड ऑफ द मिस्ट, कोहरे की कन्या।

शायद प्रकृति भी कोहासे के घूँघट में इस अनूठे रूप को छुपाना चाहती है। नदी पार करते समय वेदव्यास का पिता पराशर ऋशि ने जब मत्स्यगंधा को बांहों में भर लिया था, तो शायद ऐसे ही कोहरे का पर्दा उन्होंने बना लिया था।  

और इतने ऊपर जहाँ हम सारे टूरिस्ट खड़े हैं वहाँ तक आ रही है पानी की फुहार। सावन की रिम झिम। अरे भाई, अपना कैमरा सँभालो। लेंस में पानी लग गया तो सारा खेल चौपट। कैमरे की बैटरी में चार्ज कितना बचा है? अरे, यह तो बस आखिरी साँस ले रही है। धर्मपत्नी से पूछा,‘किंग्सटन से बैटरी चार्जर ले आयी हो न?’

‘वो तो तुम्हारे (बंगाली वधुयें आप नहीं कहतीं) बैग में ही रह गया।’

साफ जवाब सुनकर मेरा मुखड़ा हो गया मेघमय। मुझे भी क्यों नहीं भूल आयी ? हे प्रभु, एकबार पाणिग्रहण में इतनी पीड़ा! अजपुत्र दशरथ की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तीन तीन बार बलि का बकरा बन गये।

और अर्जुन! सार्थक तीरन्दाज! उनके तो अनेकों नाम हैं। उनमें से एक है सव्यसाची। दाहिने बायें दोनों हाथों से तीर चलाने में समान रूप से कुशल जो थे। अमिताभ बच्चन तो सिर्फ बायें हाथ से रिवाल्वर चलाते हैं। मगर अर्जुन को नैनों के तीर चलाने में भी महारत हासिल थी। द्रौपदी को तो छोड़िए, वो तो सिर्फ बिसमिल्लाह थीं। फिर कन्हैया को पटाकर सुभद्रा, मणिपुर की चित्रांगदा, सागर कन्या उलूपी और जाने कौन कौन। इतनों का भरण पोषण तो छोड़िये, सिर्फ मोबाइल पर हाल चाल लेने में ही तो अपना सारा बैलेन्स बिगड़ जायेगा। वाह रे धनुर्द्धर! अनंग तीर छोड़ने वाले!

हाँ तो इस समय कनाडा में यामिनी की ड्यूटी काफी कम है। शाम के नौ बजे के बाद ही क्षितिज अपने नैनों में काजल लगाना शुरु करता है। अब अँधेरा होने लगा। साढ़े नौ बज गये। वापस होटल चलो। सुबह पाँच बजे तक दिवाकर अपना प्रकाश सजाकर हाजिर हो जाते हैं। तो चलो, होटल में अब रात गुजारो।

अरे यार, क्या बिस्तर है। देह में गुदगुदी, मन में गुदगुदी। फूलों की सेज भी इसके आगे कमतर। मेरी इतनी औकात कहाँ कि ऐसे होटल में कदम भी धरूँ? यह सब तो केयर ऑफ जामाता है। हाँ, वेताल पंच विंशति की वो कहानी याद आ रही है। सवाल था कई कन्यायों में कौन कितनी कोमलांगी है ? उनमें से एक कन्या को सात परतों के शाही बिस्तर पर लेटकर भी केवल इस लिए नींद नहीं आ रही थी, क्योंकि सातवीं तोशक के नीचे एक बाल था। वाह रे नाजुक बदन !

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी 

संपर्क:  सी, 26/35-40. रामकटोरा, वाराणसी . 221001. मो. (0) 9455168359, (0) 9140214489 दूरभाष- (0542) 2204504.

ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #110 – बाल कथा – लू की आत्मकथा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर बाल कथा – “लू की आत्मकथा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 110 ☆

☆ बाल कथा – लू की आत्मकथा ☆ 

मैं लू हूं. लू यानी गरम हवा. गरमी में जब गरम हवा चलती है तब इसे ही लू चलना कहते हैं. क्या आप मुझे जानते हो ? नहीं ना ? तो चलो, मैं आज अपने बारे में बता कर आप को अपनी आत्मकथा सुनाती हूं.

अकसर गरमी के दिनों में गरम हवा चलती है. इसे ही लू चलना कहते हैं. इस वक्त वातावरण का तापमान 40 डिग्री से अधिक हो जाता है. यह तापमान आप के शरीर के तापमान 37 डिग्री से ​अधिक होता है.

इस ताप पर शरीर की स्वनियंत्रित तापमान प्रणाली शरीर का काम ठीकठाक ढंग से  करती है. इस का काम शरीर का तापमान 37 डिग्री बनाए रखना होता है. यदि वातावरण का तापमान इस ताप से ज्यादा हो जात है और आप लोग गरमी में बाहर निकल कर खेलते हैं तो तब तुम्हारे शरीर की यह प्रणाली सक्रिय हो जाती है. इस वकत् यह शरीर से पसीना बाहर निकालती रहती है  तुम्हारे शरीर का तापमान 37 डिग्री बनाए रखा जा सकें.

पसीना आने से शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है. पसीना हवा से सूख जाता है. इस से शरीर में पानी की कमी होने लगती है. इस वकत आप को प्यास लगने लगती है.यदि आप समयसमय पर पानी पीते हो तो शरीर में पानी की पूर्ति हो जाती है.

कभीकभी इस का उल्टा हो जाता हैत. आप समयसमय पर पानी नहीं पीते हो तो शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इस दौरान धूप में खेलने या गरम हवा के संपर्क में आने से शरीर में पानी की कमी होने से वह अपने सामान्य तापमान को बनाए रखने के लिए अधिक पसीना निकाल नहीं पाता है. इस के कारण शरीर का तापमान बढ़ जाता है. शरीर के इस तरह तापमान बढ़ने को लू लगना कहते हैं.

लू लगने का आशय आप के शरीर का तापमान अधिक बढ़ जाना होता है. इस दौरान शरीर अपने तापमान को बनाए रखने में असमर्थ हो जाता है. इस से शरीर को बहुत नुकसान होता हैं. शरीर में पानी की कमी हो जाती है. इस से आप का खून गाढ़ा हो जाता है. जिस से रक्त संचरण में रूकावट आती है. इस रूकावट की वजह से चक्कर आना, उल्टी होना, बेहोशी होना, आंखे जलना जैसी शिकायत होने लगती है. यह सब लू लगने के लक्षण होते हैं.

यदि लू लगने के बाद भी धूप में रहा जाए तो कभीकभी इनसान की मृत्यु हो जाती है. इस कारण गरमी में लू की वजह से कई जनहानि होती रहती है. मगर, आप सोच रहे होंगे कि मैं यानी लू बहुत खतरनाक होती हूं. नहीं भाई, आप का यह सोचना गलत है. मेरे चलने से ही समुद्र के पानी का वाष्पन होता है. इसी की वजह से बरसात आने की संभावना पैदा होती हैं. यदि मैं न होऊं तो आप बहुत सारे काम रूक जाए.

वैसे आप कुछ सावधानियां रख कर मुझे से बच सकते हो. आप चाहते हो कि मैं आप को नुकसान नहीं पहुंचाऊं तो आप को कुछ बातों का ध्यान रखना होगा. गरमी के दिनों में खूब पानी पी कर बाहर खेलना चाहिए. जब भी बाहर जाओ तब सिर पर सफेद कपड़ा या टोपी लगा कर बाहर जाओं. दिन के समय सीधी धूप में न रहो. खूब पानी या तरल पदार्थ पी कर तुम मुझ से और मेरे प्रभाव से बच सकते हो.

बस ! यही मेरी छोटीसी आत्मकथा हैं. यह तुम्हें अच्छी लगी होगी. मैं समझती हूं कि अब आप मुझे अच्छी तरह से समझ गए होंगे. मैं ठीक कह रही हूं ना ?

हां. अब ज्यादा गरदन मत हिलाओं. मैं समझ गई हूं कि तुम समझ गए हो. इसलिए अब मैं चलती हूं. मुझे अपने जिम्मे के कई काम करना हैं. कहते हुए लू तेजी से चली गई.

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

13/05/2019

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा- फीनिक्स ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – लघुकथा- फीनिक्स  ??

भीषण अग्निकांड में सब कुछ जलकर खाक हो गया। अच्छी बात यह रही कि जान की हानि नहीं हुई पर इमारत में रहने वाला हरेक फूट-फूटकर बिलख रहा था। किसी ने राख हाथ में लेकर कहा, ‘सब कुछ खत्म हो गया!’ किसी ने राख उछालकर कहा, ‘उद्ध्वस्त, उद्ध्वस्त!’ किसी को राख के गुबार के आगे कुछ नहीं सूझ रहा था। कोई शून्य में घूर रहा था। कोई अर्द्धमूर्च्छा में था तो कोई पूरी तरह बेहोश था।

एक लड़के ने ठंडी पड़ चुकी राख के ढेर पर अपनी अंगुली से उड़ते फीनिक्स का चित्र बनाया। समय साक्षी है कि आगे चलकर उस लड़के ने इसी जगह पर एक आलीशान इमारत बनवाई।

©  संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆  ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – यात्रा-वृत्तांत ☆ काशी चली किंगस्टन! – भाग – 7 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।

 ☆ यात्रा-वृत्तांत ☆ धारावाहिक उपन्यास – काशी चली किंगस्टन! – भाग – 7 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(हमें  प्रसन्नता है कि हम आज से आदरणीय डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी के अत्यंत रोचक यात्रा-वृत्तांत – “काशी चली किंगस्टन !” को धारावाहिक उपन्यास के रूप में अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास कर रहे हैं। कृपया आत्मसात कीजिये।)

नायाग्रा 

मंगलवार का दिन था। नायाग्रा शहर के एक आलीशान होटल में जामाता ने पहले से ही तीन दिन के लिए बुक करवा लिया था। अंग्रेजी में लिखते समय तो नियागारा लिखते हैं। शहर का नाम भी नायाग्रा, और उस अनोखे जलप्रपात का नाम भी नायाग्रा। 

नाश्ता करके हम चारों सुबह ही निकल पड़े। रुपाई वहाँ तक जाने आने के लिए कल शाम को ही एक चमाचम फक् सफेद गाड़ी किराये पर ले आया था। क्या नाम है? चार्जर डज् !

हम टोरॉन्टो की ओर चल पड़े। चौड़ी सड़क और उसकी बगल की हरियाली की प्रशंसा कितनी करें? वैसे तो कॉमनवेल्थ नेशन होने के बावजूद कनाडा में दायें से चलने का ही ट्राफिक रूल है। तो जाहिर है ड्राइवर सीट बांयी तरफ होती है। हमारे देश में उल्टा – राइट हैंड ड्राइविंग। यानी कीप लेफ्ट। खैर एक चीज मैं ने देखी – यहाँ हाईवे पर कोई चौराहा नहीं है। बस सीधी सड़क नाक बराबर। अगर कहीं बायें की किसी जगह वापस जाना है, तो पहले दाहिने के मोड़ से आगे जाओ, फिर ब्रिज पार करके इधर आओ।

एक जगह सड़क किनारे ऑनरूट पर गाड़ी थमते ही ……..

‘वो रहीं तीन बुढ़िया। मोटर साईकिल से उतर कर क्या खूब आ रही हैं।’ हम दंग रह गये। वे कॉफी और स्नैक्स वगैरह लेकर और अपनी अपनी बाइक पर सवार हो गयीं। मन में हमारे देश के उम्रदराज मर्द और औरतों के चेहरे उभर आये। बार बार यही सवाल सामने आ खड़ा हो जाता है – हमारे यहाँ हर मायने में यह दुर्दशा क्यों? यहाँ तो जिन्दगी खिलखिलाती है, जबकि वहाँ तो बाल सफेद होने के पहले ही सब कहते हैं,‘अरे अब क्या रक्खा है जिंदगी में ? बस प्रभु जल्द से जल्द उठा लें, तो बड़ी कृपा होगी।’

जबकि हमारे देश का दर्शन तो आनन्द का ही अन्वेषण है। सन्यासियों के सन्यास जीवन के नाम में भी आनन्द शब्द लगे होते हैं – जैसे विवेकानन्द को ही ले लीजिए। फिर गाजीपुर में जन्मे ब्रिटिश जमाने में किसान आंदोलन से जुड़े स्वामी सहजानन्द सरस्वती आदि। वे ऑल इंडिया किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष थे (लखनऊ,11अप्रैल,1936)। भारत सेवाश्रम संघ के प्रतिष्ठाता स्वामी प्रणवानन्दजी के नाम में भी तो आनन्द है।

रोज लाखों नही तो हज्जारों अधिकारी एवं नेता जनता के पैसों से इन देशों में आते होंगे। राम जाने उनमें से कितने तयशुदा कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, और कितने कुछ सीखने का प्रयास करते हैं ? मादरे हिन्दुस्तान का चेहरा बदलता क्यों नहीं ? किसी वजीरे आ’ला ने कहा था अपनी रियासत की सड़क को किसी नाजनीं सितारे के गालों जैसा बना देंगे। वो सड़क क्या उनकी बेटर हाफ यानी अर्द्धांगिनी के पीहर में बनी है ? तभी उनका श्यालक अपने जीजा को आये दिन ठेंगा दिखाता रहता है?

हमरे बनारस में एक डी एम आये हैं। हाथ में मोबाइल थामे उनकी फोटू प्रायः अखबार में छपती है। जनता के पैसे से दो इंच सड़क पर सवा इंच का डिवाइडर बना दिये। यानी फिलपांव वाले पैरों में चाँदी की पायल! आदमी चले तो कैसे ? कई मुहल्लों में एक तरफ का रास्ता ही गायब है। है तो राहे-खंडहर। फिर हीरो/नेताओं की दादागिरी। आप बायें से चल रहे हैं, अचानक आपके सामने से दनदनाती हुई बाइक आ गयी। यानी उनका आगमन राइट साइड से – मगर राइट एंट्री नहीं, गलत एंट्री। अब आप ? -‘जान प्यारी हो तो हट जा, वरना -!’

वहाँ आये दिन प्रादेशिक सड़क मंत्री अखबार के पन्नों पर अपनी दाढ़ी को बसंत के सूखे पत्तों की तरह बिखेड़ते हुए आविर्भूत होते रहते हैं। वे एकसाथ दो दो दर्जन शिलान्यास के पत्थरों को उद्घाटित कर देते हैं। मगर सड़क? दृष्टि से परे – अदृश्य! वाह रे सिक्सटी फोर्टी का खेल! कितने दुख से अहमद फराज (पाकिस्तान) ने लिखा होगा -‘यही कहा था मेरी आँख देख सकती है/ तो मुझ पर टूट पड़ा सारा शहर नबीना।’

नव उपनिवेशवाद, बाजारवाद, साम्राज्यवाद, समाजवाद, विकासशील देश या तीसरी दुनिया – आप जैसी मर्जी व्याख्या प्रस्तुत कर लें। कनाडा की राजसत्ता भी कोई दूध से धोये तुलसी के पत्तों के हाथों नहीं है। तो फिर क्यों यहाँ हो सकता है, और हमारे यहाँ नहीं ? ज़िन्दगी में सवाल तो ढेर सारे होते हैं मगर उनके जवाबों को कौन ढूँढ़ेगा? और कैसे?

टोरॅन्टो को बांये रखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। दूर से दिख रहे थे टोरॅन्टो का डाउन टाउन। अचानक सामने से आते एक वैन के पीछे देखा तो दंग रह गया। क्या बात है भाई! एक छोटा सा समूचा कॉटेज गाड़ी के पीछे लदा है। वे इसे कहीं प्रतिस्थापित करेंगे और रहेंगे। अच्छा तो बिजली या सीवर कनेक्शन का क्या होता होगा? यहाँ ऐसी ही घरनुमा गाड़ी भी किराये पर मिलती है। आर वी यानी रिक्रियेशन वेहिक्ल। आनंद यान। स्वदेश फिल्म में शाहरूख जिस पर दिल्ली से रवाना हुआ था। एक जगह ब्रिज पर एक माल गाड़ी पर एक दो-कमरेवाला कॉटेज को भी ले जाते देखा। चलायमान संसार।

करीब दो बजे तक हम नायाग्रा पहुँचे। दाहिने फोर्ट ईरी की सड़क। मन में गुदगुदी हुई यह देखकर कि यूएसए पहुँचने के मार्ग का नम्बर है 420 एक्जिट। दूर से दीख रहा है नायाग्रा अॅबजर्वेशन टावर। शहर में घुसने के पहले एक द्वारनुमा बना है, जिस पर एक कट आउट लगा है। उस पर एक युद्ध की तस्वीर। 25 जुलाई, 1814, लुन्डिस लेन बैटल फील्ड की। 

बेस्ट वेस्टन ग्रुप के कॉयर्न क्रॅफ्ट् होटल में हम ठहरनेवाले हैं। तीन बजे तक हमें रूम मिलेगा। सामने श्वेत डज को पार्क कर दिया गया। रूपाई जाकर काउंटर में बात कर आया, ‘चलिए, तब तक सामने के रेस्तोरॉ से लंच कर लें।’

‘ओ.के.। भूख तो लगी ही है।’ हमने लॉबी में सामान रख दिया।

सामने चालीस पचास फीट चौड़ी सड़क। दोनों किनारे फुटपाथ पर जगह जगह गुलजार। हरी हरी घास चारों तरफ से उनकी आरती उतार रही हैं। होटल के सामने एक खंभे पर फूल का गमला लटक रहा है। ताज्जुब की बात है कि पौधों के नीचे खालिस मिट्टी दिखाई नहीं दे रही है। लकड़ी की खुरचनों से उनके नीचे की जमीन ढकी हुई है। पता नहीं मिट्टी बह ना जाये इसलिए या और कोई वजह है? चारों तरफ एक ही नजारा। इनकी देखभाल करता कौन है ? हाँ, किंग्सटन में राह चलते मैं ने एक महिला को अपने मकान के सामने फूलों की क्यारियों पर पानी छिड़कते देखा था। कहीं कोई ग्रास कटर से ही घास काट रहा है। न कहीं पान की पीक की ललामी, न और कुछ। क्या इनकी सड़कों पर गाय, सांड़ या सारमेय आदि नहीं घूमते ? आप कल्पना कर सकते हैं कि काशी में घर के बाहर या सड़क पर ऐसे फूल खिले हों और कितने मांई के लाल हैं जो अपने हाथों का इस्तेमाल न करके आगे बढ़ जाएँ ?

हाँ, हमारे देश में भी अरुणाचल, गोवा या दार्जिलिंग में मैंने घर के बाहर ऐसे ही फूलों को निर्भय होकर खिलते देखा। कोई रावण उन सीताओं को हाथ तक नहीं लगाता है। बस -‘राह किनारे हैं खिले, सेंक लो यार आँख। घर ले जा क्या करोगे ? शुक्रिया लाख लाख!’ दोहा कैसा रहा ?

बिलकुल सामने सड़क पार वेन्डिज रेस्तोरॉ में जाने के लिए हमें पहले बायें काफी दूर तक चलना पड़ा। फिर जेब्रा लाइन से ही पारापार करना। अब लंच की तालिका – मैदे की रोटी में एक टुकड़ा चिकन मोड़ कर चिकन रैप और लंबे लंबे आलू की फ्रेंच फ्राई यानी पौटीन। पता नहीं वर्तनी या उच्चारण ठीक है कि नहीं। शीशे की दीवार के पास ही रुपाई ने हमारा आसन लगा दिया था। बाहर देखा तो कॉयर्न क्रॅफ्ट् वाले फुटपाथ पर ही आगे मैकडोनाल्ड का आउटलेट है। और उसकी बगल में ‘डॉलोरॉमा’ यानी हर माल बीस आना – एक कनाडियन डलार।

नायग्रा में सभी घूमने आते हैं। कार के पीछे साइकिल स्टैंड पर दो तीन साइकिल लाद कर लोग आ रहे हैं। यहाँ रहकर नायाग्रा तक और आसपास वे उसी पर घूमेंगे। बिन मडगार्ड की साइकिल किंग्सटन में भी मैं ने खूब देखी है। लोग हर समय या तो दौड़ रहे हैं, या साइकिल चला रहे हैं। और साइकिल चलाते समय भी अधिकतर लोग हेडगियर या हेलमेट लगाया करते हैं। और एक बात, चाहे दौड़ रहे हों, चाहे साइकिल चला रहे हों, हाथ में या साइकिल के हैंडिल में कॉफी का मग जरूर रहता है।

आते समय सामने से एक चमचमाती नीली बस चली गई। उसके सामने भी साइकिल रखने के स्टैंड बने हैं। इसका नाम है वी गो। यहाँ आये टूरिस्ट भी इनका इस्तेमाल करते हैं।

कॉयर्न क्रॉफ्ट् वापस आकर होटल के बाथरूम में हाथ मुँह धोने पहुँचा। घुसते ही दायें बेसिन, बायें बाथ टब और सामने तख्ते ताऊस यानी कोमोड। वहीं दीवार पर लिखा है :- प्रिय अतिथि, हर रोज हजारों गैलन पानी टॉवेल धोने में बर्बाद होता है। हैंगर पर टॉवेल रहने का मतलब है आप उसे फिर से इस्तेमाल करेंगे। फर्श पर पड़े रहने का मतलब है, उसे साफ करना है। अब आप ही को तय करना है कि धरती की प्राकृतिक संपदाओं को हम कैसे बचायें। धन्यवाद! 

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी 

संपर्क:  सी, 26/35-40. रामकटोरा, वाराणसी . 221001. मो. (0) 9455168359, (0) 9140214489 दूरभाष- (0542) 2204504.

ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 101 ☆ बुंदेलखंड की कहानियाँ # 12 – घर में कबहुँ ना मिलैं… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

श्री अरुण डनायक जी ने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर कई कहानियों की रचना की हैं। इन कहानियों में आप बुंदेलखंड की कहावतें और लोकोक्तियों की झलक ही नहीं अपितु, वहां के रहन-सहन से भी रूबरू हो सकेंगे। आप प्रत्येक सप्ताह बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ बुंदेलखंड की कहानियाँ आत्मसात कर सकेंगे।)

बुंदेलखंड कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है। यहां के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय कृषि कार्य ही रहा है। यह कृषि वर्षा आधारित रही है। पथरीली जमीन, सिंचाई के न्यूनतम साधन, फसल की बुवाई से लेकर उसके पकनें तक प्रकृति की मेहरबानी का आश्रय ऊबड़ खाबड़ वन प्रांतर, जंगली जानवरों व पशु-पक्षियों से फसल को बचाना बहुत मेहनत के काम रहे हैं। और इन्ही कठिनाइयों से उपजी बुन्देली कहावतें और लोकोक्तियाँ। भले चाहे कृषि के मशीनीकरण और रासायनिक खाद के प्रचुर प्रयोग ने कृषि के सदियों पुराने स्वरूप में कुछ बदलाव किए हैं पर आज भी अनुभव-जन्य बुन्देली कृषि कहावतें उपयोगी हैं और कृषकों को खेती किसानी करते रहने की प्रेरणा देती रहती हैं। तो ऐसी ही कुछ कृषि आधारित कहावतों और लोकोक्तियों का एक सुंदर गुलदस्ता है यह कहानी, आप भी आनंद लीजिए।

☆ कथा-कहानी # 101 – बुंदेलखंड की कहानियाँ – 12 – घर में कबहुँ ना मिलैं… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

अथ श्री पाण्डे कथा (2)

घर में कबहुँ ना मिलैं, नाम मान नौं निद्धि ।

जब ही जाय बिदेस नर, पाय मान अरु सिद्धि ॥

शाब्दिक अर्थ :- प्राय: अपने घर- गाँव में रहकर आदमी को मान-सम्मान और समृद्धि प्राप्त नहीं होती है। जब आदमी अपना घर छोड़कर परदेश चला जाता है, तब उसे वहाँ पर्याप्त मान-सम्मान और सफलता प्राप्त हो जाती है

ऐसा नहीं है कि सजीवन पांडे शुरू से ही विपन्न थे। उनके पिता रामायण पांडे निवासी थे महोबा के और जब सजीवन पांडे 2-3 वर्ष के रहे होंगे तब खेजरा आ बसे। हुआ यों कि रामायण पांडे अपनी पत्नी और बेटे को लेकर तीर्थ यात्रा करने जगन्नाथ पुरी गए। अंग्रेजों के जमाने में दमोह के जंगल बहुत थे व  बड़े घने थे। इमारती लकड़ी के लिए सागौन, साज, सलईया आदि बहुतायत में थे तो हर्र, बहेरा, आँवला, लाख और खैर  जैसी वनोपज़ भी दमोह के जंगलों से निकलती। खेती किसानी के लिए सुनार नदी की घाटी का उपजाऊ काली मिट्टी वाला हवेली क्षेत्र तो दो फ़सली खेती के लिए ब्यारमा घाटी प्रसिद्ध थी। इसी वनोपज़ और खेती से रुपया कमाने की लालच में बहुत से अंग्रेज भी दमोह आ बसे। रामायण पांडे ने दमोह की ख्याति अपने सहयात्रियों से सुनी और  लौटते में अकारण ही दमोह उतर गए सोचा देखते हैं कोई काम धंधा नौकरी  मिल जाये। रात उन तीनों ने स्टेशन के प्लेटफार्म पर गुजारी और सुबह सबेरे स्नान ध्यान कर  धवल धोती व अंग वस्त्र धारण कर अपने उन्नत ललाट  को सुंदर  त्रिपुंड सुसज्जित कर रामायाण दमोह का चक्कर लगाने निकल पड़े। स्टेशन से बाहर निकल उन्होने सीधी सड़क पकड़ी और बस स्टैंड होते हुये बेला ताल के आगे निकल जटाशंकर स्थित शंकरजी के मंदिर  पहुँच गए। जटाशंकर की पहाड़ी व हरियाली ने रामायण का मन मोह लिया और भोले शंकर के मंदिर के सामने बैठ वे सस्वर में लिंगाष्टक स्त्रोतम का पाठ करने लगे। उनके  मधुर सुर व संस्कृत के  उच्चारण से प्रभावित अनेक भक्तगण रामायण पांडे को घेर कर बैठ गए व ईशभक्ति सुन  भाव विभोर हो उठे। भजन पूजन कर रामायण जटाशंकर की पहाड़ी से बाहर निकले ही थे की बेलाताल के पास निर्जन स्थान पर कुछ लठैतों ने उन्हे घेर लिया और अता पता पूंछ डाला।

रामायण बोले कि  भैया हम तो महोबे के रहने वाले हैं और काम धंधा की तलाश में दमोह आए हैं।

लठैतों में से एक ने पूंछा तो इतने सजधज कर जटाशंकर काय आए और ज़ोर ज़ोर से भजन काय गा  रय हते।

घाट घाट का पानी पिये रामायण समझ गए कि दाल में कुछ काला है और उन्होने मधुरता से जबाब दिया भैया हम तो कौनौ काम धन्धा मिल जाय जा प्रार्थना ले के भोले के दरबार में आए हते।

रामायण की बात पर लठैत को भरोसा न हुआ उसने पूंछा कि मंदिरन में पुजारी बनबे की इच्छा तो नई आए।

रामायण ने उन्हे भलीभांति संतुष्ट कर सीधे स्टेशन की ओर रुख किया और दमोह के किसी अन्य मंदिर में पुजारी बनने का सपना छोड़ दिया।

शाम को रामायण ने गल्ला मंडी के ओर रुख किया। रास्ते में वे हनुमान गढ़ी के मंदिर जाना न भूले पर भगवान से मन ही मन प्रार्थना की और उच्च स्वर में हनुमान चालीसा पढ़ने की हिम्मत न जुटा पाये।  गल्ला मंडी में रोजगार के दो ही साधन थे पल्लेदारी जो रामायण के बस की न थी और दूसरी मुनीमी जिसके लिए आढ़तिया अंग्रेजी भाषा का जानकार चाहते थे और अंग्रेजी में तो  रामायण ‘करिया अच्छर भैंस बिरोबर थे। हताश और निराश रामायण अंधेरा होने के पहले ही स्टेशन लौट आए।

दूसरे दिन दोपहर में रामायण ने  स्टेशन के पास स्थित कुछ लकड़ी के टालों की ओर रुख किया। इमारती लकड़ी और वनोपज़ के ठेकेदार जात से खत्री थे और दमोह में  रेल्वे लाइन आने के बाद लखनऊ से आ बसे थे। खत्री ठेकेदार ने रामायण को बड़े अदब से कुर्सी पर बैठा कर पूंछा-

‘प्रोहितजी क्या चाहिये, कहाँ से आना हुआ।‘

‘सेठजी हम महोबे के रहने वाले हैं रोजगार की तलाश में दमोह आए हैं।‘ रामायण ने उत्तर दिया।

‘क्या काम कर सकते हो।‘ ठेकेदार ने पूंछा

‘सेठजी हिन्दी, संस्कृत और गणित का ज्ञान है मुनीमी की नौकरी मिल जाये तो कृपा होगी।‘

‘प्रोहितजी हमारा धंधा तो अंग्रेजों से चलता है, उनसे अंग्रेजी में लिखापढ़ी करने वाला मुनीम चाहिये।‘

‘सेठजी मुझे अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं आती। बच्चों तो पढ़ाने का काम ही दे दो।‘ रामायण बोले

‘प्रोहितजी बच्चे भी अब अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं उन्हे हिन्दी और संस्कृत पढ़ाने से क्या लाभ।‘

‘सेठजी कोई काम आप ही बताओ जो मैं कर सकता हूँ।‘ कातर स्वर में रामायण बोले

‘प्रोहितजी जंगल से हमारा माल आता है वहाँ हिसाब किताब रखने के काम में अंग्रेजी की जरूरत नहीं है। आप वो काम करने लगो। दस रुपया महीना पगार दूंगा पर रहना जंगल में पड़ेगा।‘ ठेकेदार ने कहा। 

 ‘सेठजी मेरा बच्चा छोटा है और पंडिताइन को दमोह में किसके भरोसे छोडुंगा।  मैं तो अब निराश हो गया हूँ। कल वापस महोबा चला जाऊँगा।‘ ऐसा कह कर रामायण बड़े दुखी मन से स्टेशन वापस आ गए।

रामायण स्टेशन पहुँचे ही थे की पंडिताइन का रोना धोना चालू हो गया। बड़ी मुश्किल से उन्होने बताया  ‘तुमाए निकरबे के बाद टेशन मास्टर के दो आदमी आए रहे और धमका के गए हैं की जा जागा खाली कर देओ।‘

रामायण ने पूंछा ‘गाली गलोज तो नई करी।‘

पंडिताइन के सिर हिलाने  पर वे तुरंत ही स्टेशन मास्टर के कक्ष की ओर चल पड़े।

स्टेशन मास्टर के कक्ष की ओर जाते जाते रामायण को बार बार पंडिताइन का रोना याद आ रहा था। हालांकि गाली गलोज की बात पर पंडिताइन ने कुछ स्पष्ट नहीं कहा था फिर भी उन्होने अंदाज़ तो लगा ही लिया कि सरकारी नौकर बिना ऊल जलूल बोले सरकारी फरमान नहीं सुनाते। एक बार तो उनकी इच्छा हुयी कि स्टेशन मास्टर को खरी खोटी सुनाये और उसके दोनों आदमियों की भालिभांति ठुकाई कर दें पर अपनी विपन्नता और परदेश का ध्यान कर उन्होने चित्त को शांत किया, आँखे पोंछी और आगे चल दिये।

स्टेशन मास्टर का नाम गया प्रसाद चौबे है और वे मथुरा के रहने वाले हैं इतना जान रामायण की थोड़ी आशा बंधी और वे दरवाजा खटखटा कर स्टेशन मास्टर के कक्ष में घुसे और सबसे पहले स्वस्ति वाचन कर गया प्रसाद चौबे का अभिवादन किया।

चौबे जी उनके संस्कृत उच्चारण से प्रसन्न हुये और आने का कारण पूंछा। रामायण ने अपनी पूरी व्यथा उन्हे बताई , पर पंडिताइन के साथ हुयी घटना को बड़ी खूबी से छुपा लिया,  और कोई नौकरी देने का आग्रह किया।

‘महराज अभी तो स्टेशन में कोई जगह खाली है नहीं, हाँ एक काम पर आपको रखा जा सकता हैं।‘

‘बताइए साहब बताइए’ थोड़े से आशान्वित रामायण बोले

‘अभी आप स्टेशन में कुछ साहबों के घर पीने का पानी भरने लगो।‘ चौबेजी बोले

‘महराज हम तो पंडिताई करने वाले हैं हमे आप पानी पांडे न बनाओ।‘ रामायण थोड़े अनमने होकर बोले

‘पंडितजी पानी भरने के साथ साथ स्टेशन के बाहर बनी शंकरजी की मड़ैया में पूजा भी करना।‘ 

‘इतने में नई जगह कहाँ गुजर बसर हो पाएगी  साहब।‘ रामायण ने प्रत्युत्तर में कहा

‘अरे भाई महीने के पाँच रुपये हम स्टेशन से दे देंगे और कुछ साहब लोग दे देंगे फिर शंकरजी की मड़ैया में पूजा से कुछ दान दक्षिणा भी मिलती रहेगी।‘ चौबेजी ने आश्वस्त करने की कोशिश करी।

‘हुज़ूर पक्की नौकरी का बंदोबस्त हो जाता तो अच्छा रहता।‘ रामायण ने लगभग चिरौरी करते हुये कहा।

‘पंडितजी अभी पानी भरने का काम करो फिर कभी कोई बड़ा गोरा साहब स्टेशन पर आयेगा तो उनसे पक्की नौकरी की भी बात करेंगे। अंग्रेज साहब भी अच्छी संस्कृत सुन कर खुश हो जाते हैं।‘ चौबेजी बोले

इस बात से रामायण को भविष्य की आशा बंधी और उन्होने हाँ कर दी। अब महोबा के पंडित रामायण पांडे दमोह रेल्वे स्टेशन पर पानी पांडे कहलाने लगे। भजन गाते गाते स्टेशन और दो तीन साहबों के घर पीने का पानी भरते और रेल गाड़ी का समय होने पर शंकरजी की मड़ैया पर बैठ आने जाने वाले यात्रियों आशीर्वाद देते बदले में दान दक्षिणा पाते।

समय बीतता गया और छह माह बाद महा शिवरात्रि आयी। रामायण पांडे ने  दमोह रेल्वे स्टेशन पर पानी पांडे का अपना दायित्व झटपट सुबह सबेरे ही पूरा किया और  शंकरजी की मड़ैया को, पंडिताइन की मदद से,  गाय के गोबर से लीपा, छुई मिट्टी से पोता, फूल पत्ती से सजाया और फिर स्नान कर त्रिपुंड लगा कर शंकरजी की पूजा करने बैठ गये। उनके भजन और मंत्रोच्चारण ने लोगों को आकर्षित किया और देखते ही देखते  भक्तों की अच्छी खासी भीड़  शंकरजी की मड़ैया  पर एकत्रित हो गई और दोपहर होते होते भंडारे की व्यवस्था भी जन सहयोग से हो गई।

दूसरे दिन सुबह सुबह दो तीन ग्रामीण रामायण पांडे से मिलने स्टेशन आ पहुँचे और हिरदेपुर के ठाकुर साहब का बुलौआ का समाचार उन्हे दिया। रामायण पांडे अपना काम निपटा कर जब हिरदेपुर पहुँचे

‘आइये पंडितजी महाराज पायँ लागी’ कहकर ठाकुर साहब ने  रामायण पांडे का स्वागत किया।

रामायण ने भी ‘खुसी  रहा का’ आशीर्वाद दिया, स्वस्ति वाचन किया और बुलाने का कारण पूंछा।

‘पंडितजी महराज ऐसों है की काल हमने आपके दर्शन टेशन पर शंकर जी की मड़ैया पर करे हते। हमाएं इते भी पुरखन को बनवाओं एक मंदर है और उसे लगी मंदर के नाव 10 एकड़ खेती की जमीन। हम चाहत हैं की हमाए पुरखन के मंदर की पूजा पाठ आप संभालो।‘ ठाकुर साहब बड़ी अदब से बोले।

रामायण मन ही मन प्रसन्न होकर बोले ‘जा बताओं आप कौन क्षत्री  हो, पेले हमे मंदर भी दिखा देओ।‘

ठाकुर साहब बोले ‘हम ओरें बुंदेला हैं और महाराजा छत्रसाल ने जब बाँसा पे आक्रमण कर उते के जागीरदार केशव राव दाँगी को हराओ तब जा गाँव हम ओरन के पुरखन की बीरता के कारन बक्शीश में  दओ रहो।‘

रामायण पांडे ने मंदिर का मुआयना किया हामी भरी और लौट कर स्टेशन मास्टर गया प्रसाद चौबे को सारा हाल सुनाया और हिरदेपुर के मंदिर में  पुजारी का काम करने के कारण स्टेशन पर पानी पाण्डे के दायित्व से मुक्ति माँगी। चौबे जी भी खुश हुये। अब रामायण पांडे दो मंदिरों की पूजा करने लगे। 10 एकड़ जमीन से जो आमदनी होती उससे मंदिर का और घर ग्रहस्ती का खर्चा चल जाता। धीरे धीरे रामायण पांडे की ख्याति आसपास के गांवों में भी फैल गई, अच्छी दान दक्षिणा मिलने लगी, पंडिताइन के गले, हांथ  और पैरों में चांदी के आभूषण शोभित होने लगे और उनकी पंडिताई चल निकली। इसलिए भाइयो यह कहावत बहुत प्रचलित है  ‘गाँव को जोगी जोगड़ा आन गाँव कौ सिद्ध।‘

 

 ©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 24 – असहमत और पुलिस अंकल : 2 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे।  उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आप प्रत्येक बुधवार साप्ताहिक स्तम्भ  में असहमत के किस्से आत्मसात कर सकेंगे।)   

☆ कथा – कहानी # 24 – असहमत और पुलिस अंकल : 2 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव 

पुलिस अंकल जॉनी जनार्दन का ट्रांसफर तो हुआ पर प्रमोशन पर. जाना तो था ही और गये भी पर पहचान वालों को ये भरोसा देकर गये कि चंद महीनों की बात है. बापू ने चाहा तो जुगाड़ लग ही जायेगा भले ही “बापू” बेहिसाब लग जायें. यह बात असहमत द्वारा इस कदर प्रचारित की गई कि टीवी चैनल वालों की ब्रेकिंग न्यूज़ भी शर्म से पानी पानी हो जाय और कम से कम उन तक तो जरूर पहुंचे जो असहमत की तैयार लिस्ट में चमक रहे थे. समय धीरे धीरे हर घाव भर देता है. वो जलवे जो टेंपरेरी रहते हैं और व्यक्ति को गुब्बारे के समान फुला देते हैं, धीरे धीरे अपनी सामान्य अवस्था में येन केन प्रकारेण ला ही देते हैं. असहमत की लिस्ट के चयनित लोग भी सब कुछ हर होली के साथ भूलते गये और उनके और असहमत के संबंध सामान्य होते गये पर फिर भी असहमत के दिल में पुराने जल्वों की कसक बनी रही. पुलिस अंकल का इंतजार होता रहा पर वो आये नहीं और जब आये भी तो जनार्दन अंकल के नये रंग में जो असहमत के मोहभंग के लिए पर्याप्त था. दरअसल ये नया रूप सेवानिवृत्ति के बाद का था जब व्यक्ति माया, मोह, लिप्सा, घमंड जैसी भौतिक सुविधाओं को छोड़कर आध्यात्मिक होने के बजाय छद्म कर्मकांड के पाखंड में उलझता है और धार्मिक होने का भाव और भ्रम पाल लेता है. आध्यात्मिकता की यात्रा, अध्ययन, विश्लेषण, विश्वास, प्रेम, सहभागिता, सरलता और विनम्रता के पड़ाव पार करती है. ये प्रकृत्ति और स्वभाव का बोध है जो जीवन में पल दर पल विकसित होता है, ये ऐसी अवस्था नहीं है जो रिटायरमेंट के बाद प्राप्त होती है. दूसरी स्थिति छद्मवेशी धर्म से जुड़े कर्मकांड की होती है. व्यक्ति अपने सेवाकाल में सरकारी खर्चों और उचित/अनुचित सुविधाओं का उपभोग कर विभिन्न तीर्थों की यात्राओं का आनंद लेता है और रिटायरमेंट के बाद, मोक्षप्राप्ति के शार्टकट “बाबाओं” की शरण लेता है.

आस्तिकता का आचरण अलग होता है, मोक्ष या पापों के प्रायश्चित की प्रक्रिया में शार्टकट नहीं होता. ये जिज्ञासु के धैर्य, समर्पण और आत्मशुद्धि की सतत जारी परीक्षा है, नफरत, अहंकार और असुरक्षा इसमें अवरोधक और पथभ्रष्टता का काम करते हैं. नफरत है मतलब प्रतिहिंसात्मक प्रवृत्तियों का पोषण हो रहा है.

घर बनाने की वह प्रक्रिया जब गृहनिर्माण के कीमत निर्धारण सहित सारे फैसले बिल्डर करता है और बदले में आपको पैसे के अलावा किसी बात की चिंता नहीं करने की लफ्फाजी करता है, ये घर पाने का शार्टकट है. इसी तरह का काम बहुत सारे धर्म गुरु भी करते हैं जो आपको, पाप मुक्ति, आत्मशुद्धि और मोक्षप्राप्ति के छलावे में उलझाते हैं और स्वयं, बिल्डर के समान संपन्नता और विलासिता का उपभोग करते हैं. जनसेवा का साइनबोर्ड दोनों जगह पाया जाता है और भयभीत कर शोषण का फार्मूला भी.

जनार्दन अंकल जब लौटे तो रंग नया था, रूप नया था. भौंहों के खिंचाव की जगह माथे के तिलक ने ले ली थी. शान का प्रतीक मूंछें वापस तरकश में जा चुकी थीं. जब इस बार सपने और योजनाओं के टूटने से दुखित असहमत ने बहुत धीरे से “नमस्ते अंकल” कहा तो प्रत्युत्तर में धुप्पल की जगह, “खुश रहो बच्चा” का खुशनुमा एहसास पाया. चाल ढाल बातचीत का लहज़ा, वेशभूषा सब बदल गया था. बातों के टॉपिक विभाग की खबरों और शहर के असामाजिक तत्वों की जगह, बाबाजी के गुणगान पर केंद्रित हो गये थे.

असहमत की जिज्ञासा और बोलने की निर्भीकता ने फिर जिस वार्तालाप को जन्म दिया वो प्रस्तुत है.

“जनार्दन अंकल, पहले जब आप से मिलता था तो आपकी शान से मुझमें भी साहस और निर्भयता का संचार होता था. पर अब तो आपका ये नया रूप मुझे भी यह अनुभव कराने लगा है कि मैं भी पापी हूँ.”

अंकल की भंवे, भृकुटि बनते बनते बचीं पर अट्टाहास की प्रवीणता का पूरा उपयोग करते हुये कहा “जब जागो तभी सबेरा. बाबाजी ने मुझे सारी चिंताओं से मुक्त कर दिया है. उनकी शरण में जाने से मैं निश्चिंत हूँ कि उनके पुण्य प्रताप से मुझे पापों से मुक्ति मिलेगी, मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होगा. उनके प्रवचनों से मुझे शांति मिलती है वह बिल्कुल वैसी है जो किसी दुर्दांत अपराधी को पकड़ने से मिलती थी. पहले मैं भी इन असामाजिक तत्वों से निपटते निपटते कठोर बन गया था. तर्क कुतर्क को डंडे से डील करता था पर कभी कभी मेरे वरिष्ठों या नेताओं के आदेश मुझे विचलित कर देते थे पर ली गई शपथ और अनुशासन के नाम पर बंध जाता था. अब तो मैं मुक्त हूँ, बाबाजी की शरण ही मेरी अंतरात्मा को शुद्ध करेगी और सन्मार्ग याने मोक्ष की प्राप्ति की ओर। ले जायेगी.”

असहमत ने फ्राड करने वाले बिल्डरों का उदाहरण देते हुये, डरते डरते फिर एक सवाल दाग ही दिया “अंकल, अगर ये बाबाजी भी फ्राड निकले तो क्या होगा?”

जनार्दन अंकल “साले की ऐसी तैसी कर दूंगा, पुलिस की नौकरी से रिटायर्ड हूँ पर अगर मुझे धोखा दिया तो वो ठुकाई होगी कि उसकी सात पुश्तें बाबागिरी का नाम नहीं लेंगी.”

असहमत का आखिरी सवाल, हमेशा की तरह बहुत खतरनाक था जिसका जवाब नहीं था.

“अंकल, बाबाजी तो वो प्रोडक्ट बेच रहे हैं जो उनके पास है ही नहीं.”

शायद इस सवाल के बाद, कुछ और लिखने की जरूरत नहीं है. समझने वाले समझ जायेंगे और नासमझ इस सवाल को ही या भी नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ जायेंगे..

 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – यात्रा-वृत्तांत ☆ काशी चली किंगस्टन! – भाग – 6 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।

 ☆ यात्रा-वृत्तांत ☆ धारावाहिक उपन्यास – काशी चली किंगस्टन! – भाग – 6 ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(हमें  प्रसन्नता है कि हम आज से आदरणीय डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी के अत्यंत रोचक यात्रा-वृत्तांत – “काशी चली किंगस्टन !” को धारावाहिक उपन्यास के रूप में अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास कर रहे हैं। कृपया आत्मसात कीजिये।)

किंग्सटन

अगले दिन सुबह से ही शुरू हो गया मेरा रूट मार्च। रुपाई निकल गया यूनिवर्सिटी। तो मैं ने झूम से पूछा,‘अम्मां, इस लेक के किनारे किनारे चले जाएँ न? पासपोर्ट वगैरह तो साथ रखने की जरूरत नहीं?’

‘अरे नहीं, बाबा। आप भी न -। यह हरीवाली चाबी रखिए अपने पास। उसीसे मेन गेट खुल जायेगा।’

‘ओ के योर हाईनेस।’ एपार्टमेंट से निकल कर मैं रूटमार्च करता हुआ आगे बढ़ गया। इनका एपार्टमेंट है किंग स्ट्रीट ईस्ट में। मुख्य सड़क से सीधे समकोण बनाते हुए सिमको स्ट्रीट निकली है, उसी पर। मैं पश्चिम की ओर चला। अॅन्टारिओ झील के किनारे किनारे। यहाँ की सुंदर सड़कें इसी तरह एक दूसरे को बाई करते हुए करीब समकोण पर ही निकलती हैं। दोनों ओर प्राचीन गोथिक शैली में बनी हुई अठारहवीं या उन्नीसवीं सदी की इमारतें। ऊपर त्रिकोण छत। लंबी लंबी खिड़कियाँ। उन पर शीशे जड़े हैं। पुरानी बिल्डिंगें स्थानीय चूने पत्थर से ही बने हैं। इसीलिए किंग्सटन का और एक नाम है लाइमस्टोन सिटी। चूने पत्थर की नगरी। काशी को काशी कह लो या बनारस, या शिव की नगरी, या फिर सिटी ऑफ टेम्पलस।

कल शाम हम कुछ पूरब की ओर चलकर पहुँचे थे सिटी या कनफेडरेशन हॉल। आज की यात्रा विपरीत दिशा में। पूर्वी अॅन्टारियो स्टेट में स्थित यह शहर कैटारॅकी नदी के मुहाने पर बसा है। पूरब में मॉन्ट्रीयल और पच्छिम में टोरन्टो के बीचोंबीच। किंग्सटन को कनाडा प्रांत की पहली राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।15 फरवरी 1841 में यहाँ के गवर्नर लार्ड सिन्डेनहैम ने यह घोषणा की थी। सेंट लारेन्स और कैटारॅकी नदी के संगम पर स्थित होने के कारण सत्रहवीं सदी में व्यापार करने आये यूरोपियनों के जहाज यहाँ खूब लँगर डालने लगे। वे यहाँ के आदिवासियों या जनजातियों के नजदीक डेरा डालकर उनसे व्यापार करना चाहते थे। यानी वस्तुओं के लेन देन का बार्टर सिस्टम। तुम मुझसे नमक ले लो, और बदले में तुम्हारे अयस्क और तुम्हारे जंगली जंतुओं की खाल दे दो! और इसी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के चलते फ्रांसीसियों ने 1673 ई. में यहाँ फोर्ट फ्रंटिनैक का निर्माण किया। आज यहाँ 1.24.000 लोग रहते हैं।

राह में कई जगह देखा – मार्ग के संगम पर लिखा है – स्टप – कर्टसी क्रासिंग। यानी, हे राहगीर, वाहन चालक से नैन मिलाकर ही सड़क पार करना ! बाकी सड़कों की तरह उस जगह जेब्रा क्रासिंग नहीं बना है। हर ड्राइवर वहाँ अपने आप कार को स्लो कर दे रहा है। वाह रे तहजीबे अख्लाक! नागरिक उत्तरदायित्व की नफासत।

बायीं ओर सागर जैसा छल छल पानी देखकर तो छोरा गंगा किनारेवाला का मन तैरने के लिए मचलने लगा। यहाँ के टिकट कटवाते समय बिटिया से व्हाट्स ऐप पर लिखित बातचीत हो रही थी। मैं ने पूछा था, ‘तुम्हारे घर के सामने उतनी बड़ी झील है। तो, उसमें जरूर तैरूँगा। मजा आयेगा।’

‘बाबा, उसके लिए तो फिर स्विमिंग कस्ट्यूम चाहिए।’

‘अरे मैं यहीं चेतगंज से एक फूलवाले प्रिन्ट का लंगोट ले लूँगा। वही है हमारा राष्ट्रीय स्विमिंग कस्ट्यूम।’

‘बाबा – । ऐसा मत कीजिए।’

रुपाई जरा ज्यादा ही डिसिप्लीन पसंद है। हर वख्त कानून सर आँखों पर। बेचारे को इस उजड्ड ससुर को लेकर कई बार कई तरह से झेलना पड़ा। मैं भी क्या करता? उतर गया था एकदिन उस पानी में एक जगह। मजा आ गया था। मगर रूपाई झूम को मत बताइयेगा। उन्हें अभी तक पता नहीं है। वरना रूपाई मुझे त्याज्य ससुर कर देगा।

तीन चार जगह लंबी लकड़ी के खंभे पर लगे हैं सूचना पट्ट। वाटर फ्रन्ट रेगुलेशन। यहाँ आप अपने रिस्क पर ही तैर सकते हैं। यहाँ कोई बचाव कर्मी तैनात नहीं है। पानी में कूदना मना है। स्केटिंग करना मुनासिब न होगा। जहाँ लोग नहाते हैं वहाँ कुत्तों को लेकर प्रवेश वर्जित है। इमर्जेन्सी में मदद के लिए इस नंबर पर फोन करें 911। सूचना के नीचे एक जोगिया रंग का ट्यूब लटक रहा है। लिखा भी है जीवन बचाने वाली चीजों का गलत इस्तेमाल करना दंडनीय अपराध है। हमारे दशाश्वमेध की पुलिस चौकी में जो बैठे रहते हैं, उनमें शायद ही किसीको तैरना आता है। ठीक उन्हीं की नाक के नीचे तो आतंकवादियों ने बम धमाका किया था। हमारे देश में तो हर साल जाने कितनी नावें डूबती रहती हैं। उनमें ठसाठस आदमी जो भरे होते हैं। कौन है देखने सुननेवाला ?

चलते चलते एक बात और – हमारे यहाँ सड़क पर खड़े बिजली और टेलिफोन खंभे जैसे लोहे के बने होते हैं, यहाँ वे सब लकड़ी से बने खंभे हैं।

हरे हरे गलीचे के बीच कई जगह गुलचमन। हरी घासों पर कनाडियन गीस (बत्तख) बीन बीन कर कुछ खा रहे हैं। घासां की जड़ से कुछ या कीड़े मकोड़े। वहीं एक किनारे एक पत्थर पर अंकित – देखिए इतिहास की एक झलक –

25 अगस्त सन 1758 को अंग्रेज कलोनेल ब्रैडस्ट्रीट अपने 3100 फौजिओं के साथ नदी किनारे उतरे थे। आज उस जगह का नाम है कॉलिंगवुड स्ट्रीट। मर्नी पॉयेन्ट से नदी के किनारे किनारे मिस्सिसौगा पॉयेन्ट होते हुए वह दस्ता जा पहुंचा फोर्ट फ्रॉन्टिनैक। उनलोगों ने फ्रांसिसी किले की घेराबंदी कर दी।

उन्ही दिनों हिन्दुस्तान की तस्वीर क्या रही होगी? उन दिनों मुर्शिदाबाद सूबे बंगाल की राजधानी थी। 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद से 53 कि.मी. दक्षिण मे स्थित प्लासी के आमबागान में रबार्ट क्लाइव के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज ने नवाब सिराजद्दौल्ला की सेना को परास्त कर इंग्लैंड का झंडा भारत में गाड़ दिया था। क्लाइव की चालबाजी, उनकी दी हुई रिश्वत और मीरजाफर की दगाबाजी से हिन्दुस्तान की सरजमीं पर 1858 ई. में प्रतिष्ठित  हुआ मलिकाए इंग्लैंड विक्टोरिया का शासन। सिराज के टुकड़ों पर पलनेवाला महम्मदी बेग ने ही क्लाइव के बहकावे में आकर सिराजद्दौल्ला की छाती पर भोंक दिया था छुरा।

दो दिन तक घेरेबंदी में फँसे रहने के बाद फोर्ट फ्रॉन्टिनैक के किलेदार ड्य न्यॉन समझ गये कि जंग को जारी रखना मौत को बेवजह न्योता देना होगा। सो संधिवार्ता हो गई। जितने पादरी थे, किले में रहने वाले जो दूसरे लोग थे – सबको सुरक्षित जगह जाने की छूट दे दी गई। फिलहाल लड़ाई खतम हुई।

फिर 1760। अंग्रेज मेजर रॉबर्ट रॅजर अपनी टुकड़ी लेकर पहुँचे और फोर्ट फ्रॉन्टिनैक को तहस नहस कर दिया। अब समझ रहे हैं न कि फ्रांसिसी और अंग्रेजों के टकराव और संघर्षों की दास्तान की जड़ कितनी गहरी है ? उधर और भी नाटक होते रहे। मेजर वुल्फ (जिनके नाम पर वुल्फ द्वीप है) को 13 सितम्बर 1759 में अब्राहाम की घाटी में विजय मिली। 1760 में मॉन्ट्रीयल भी अंग्रेजों का होकर रह गया। इसी तरह कनाडा के न्यू फ्रांस की तकदीर ही बदल कर रह गई। और 1763 में पेरिस संधिपत्र पर हस्ताक्षर हो गये। कनाडा में अंग्रेजों का वर्चस्व कायम हो गया।

झूम के एपार्टमेंट से निकलते ही सिटी पार्क में एक आदमकद मूर्ति दिखाई देती है। नीचे लिखा है मैं ब्रिटिश प्रजा की हैसियत से पैदा हुआ हूँ। और उसी हैसियत से मरना पसंद करूँगा। वह मूर्ति है कनाडा कनफेडरेशन के जनक एवं यहाँ के प्रथम प्रधानमंत्री सर जॉन आलेक्जांडर मैकडोनाल्ड की। वह खुद को किंग्सटन का नागरिक ही कहलाना पसन्द करते थे। जबकि वे पैदा तो हुए थे स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में और यहीं कनाडा के ओटावा (अंटारिओ) में उनका देहान्त हुआ। जनाब, जरा हमारे तथाकथित नेताओं को बतलाने का कष्ट करें कि इनकी बहुमत की सरकार छह बार चुनी गई थी। वे कन्जर्वेटिव पार्टी का प्रतिनिधित्व करते थे, मगर थे भविष्यदृष्टा पुरुष। उन्होंने कनाडा के पूरब को पश्चिम से जोड़ने के लिए रेलवे लाइन की शुरुआत की। कई जगह उन्होंने वन्य प्राणी संरक्षण के लिए अभय अरण्य भी बनवाये। हमारे यहाँ जो राष्ट्रीय उद्यान बने भी हैं, उनकी दुर्दशा किसे अवगत नहीं है ? अविगत गति कछु कहत न आवे। खैर, 2015 में, यानी इसी साल उनकी द्विशत जन्म शताब्दी मनायी जा रही है। लोग उन्हें प्यार से सर जॉन ए. के नाम से पुकारते हैं। ईस्ट किंग्स स्ट्रीट में स्थित उनके मकान को अब उनके नाम से पब्लिक हाउस बनाया गया है। यानी हमारे बिटिया जामाता के पड़ोसी।                 

एक सर्पिल रास्ता झील के किनारे किनारे आगे तक चला गया है। मैं उसी पर चला जा रहा था। उधर मुख्य सड़क यानी किंग्स स्ट्रीट (पश्चिम) पर स्थित है किंग्सटन जेनरल हास्पिटल। यहाँ अचानक किसी की तबियत खराब हो जाए, तो जरा मुसीबत होती है। हर चीज के लिए प्रायर अपायनमेंट चाहिए। हाँ, बड़े बूढ़ों के लिए एम्बुलेंस सेवा सुलभ है। सड़क पर कई दंत चिकित्सकों के बोर्ड तो दिखाई पड़े, मगर जेनरल फिजिशियन या ऐसे डाक्टर एक भी नहीं। तो किसी की सांस फूलने लगे या तेज बुखार हो तो वह बेचारा कहाँ जायेगा ?

1832 में किंग्सटन जेनरल हॉस्पिटल की पहली इमारत बनकर तैयार हो गई थी। मगर 1838 में ही पहली दफा यहाँ मरीजों की भर्ती हो सकी थी। और वे थे बीस अमरीकी विद्रोही। जिन्हें बैटल ऑफ विन्डमिल में गिरफ्तार कर लिया गया था (1837 ई.)। खैर, 1841 से ’44 तक यहाँ कनाडा संसद के सर्वप्रथम अधिवेशन होते रहे। यह अस्पताल क्वीन्स यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन से सम्बद्ध है।

दोनों ओर की हरी घास के गलीचों के बीच एक पतला सा रास्ता निकल गया है। उसके बायें झील तो दायें मैदान के पार मुख्य सड़क – किंग स्ट्रीट पश्चिम। बीच के हरे मैदान पर जगह जगह बेंच लगे हैं। बैठ कर बात करो, पानी का नजारा देखो। न कहीं पान की पीक की छींटें, न कहीं गोबर इत्यादि के अनचाहा प्रसाद। एक जगह तो शतरंज की बिसात बनी है। आप आराम से बैठकर दोस्त के साथ बुद्धि युद्ध करें। हमारे गंगाघाट के किनारे ऐसा नहीं हो सकता क्या ? अपने बल पर शतरंज की बाजी तो वहाँ घाट किनारे या गलियों के चौतरे पर लगती ही हैं, मगर बाकी ये सब……?

झूम ने एक प्लास्टिक में भर कर जेब में चेरी फल दे दिया था। बड़े ही स्वादिष्ट। अब तक तो सब खतम हो चुके थे। टेम भी काफी हो गैल रहल। तो चलो वापस।

चारों ओर के लाल पीले बैगनी नीले नारंगी आदि रंगीन गुलजारों को देखकर मुनव्वर राना याद आ रहे थे :- ‘मुझे बस इसलिए अच्छी बहार लगती है/ कि ये भी मां की तरह खुशगवार लगती है।’

मगर एपार्टमेंट पहुँच कर एक अलग मुसीबत। उसके मेन एन्ट्रेंस पर दो शीशे के दरवाजे हैं। कोई गार्ड वगैरह नहीं। पहलावाला ऑटोमेटिक दरवाजा बिन चाभी के भी खुल सकता है। मगर मुझे क्या मालूम? मैं दरवाजे पर बने होल में चाबी से प्रयास करता रहा। परंतु असफलता ही हाथ लगी। अब ? वही हाल है भीतर के मेन दरवाजे का। तो उस समय मैं घूम कर एपार्टमेंट के पीछे बेसमेंट की तरफ चला गया। सौभाग्य से उस समय किसी ने दरवाजा खोला था। मैं भी उसका हम सफर बन गया। फिर लिफ्टेण ऊर्ध्वगमणः।

खैर, घर जाकर पता चला कि हर दरवाजे की बगल में दीवार पर की-होल बना हुआ है। उसमें चाबी डालनी है। न कि दरवाजे के बीचोबीच। कृष्णसखा पार्थ याद आने लगे। गुरु द्रोणाचार्य ने जब उनकी परीक्षा लेनी चाही, तो शरसंधान करते समय उन्होंने केवल चिड़िया की एक आँख पर ही अपने लक्ष्य को स्थिर रक्खा था। मैं ने स्वयम् को हड़काया – सदैव एक ही बिन्दु पर लक्ष्य स्थिर रखने से हर समय सफलता हाथ नहीं लगती, मियां। तनि इधर उधर भी ताक झाँक कर लिया करो। अजी, इस उमर में -?

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी 

संपर्क:  सी, 26/35-40. रामकटोरा, वाराणसी . 221001. मो. (0) 9455168359, (0) 9140214489 दूरभाष- (0542) 2204504.

ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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