(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “अंतिम साँसें…“।)
अभी अभी # 721 ⇒ गद्य क्षणिका – अंतिम साँसें श्री प्रदीप शर्मा
वे बिस्तर पर अंतिम साँसें गिन रहे थे। कर्कशा पत्नी उनकी स्थिति से अनजान थी। पत्नी चिल्लाई, क्या कर रहे हो ? वे गिनती भूल गए। दोनों की जान में जान आई..!!
(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री संदीप तोमर जी का स्वागत। आपके 4 कविता संग्रह , 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह , एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित। प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में बतौर सह-संपादक/अतिथि संपादक सहयोग। प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में सतत रचनाओं का प्रकाशन। दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका इत्यादि समाचार-पत्रों में रचनाएँ प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा, आलोचना, व साहित्यिक-सामाजिक आलेख प्रकाशित। तेलुगु, उड़िया, कन्नड़, नेपाली, इत्यादि भाषाओँ में रचनाएँ अनुदित। रामदरश मिश्र, ममता कालिया, दीप्ति गुप्ता सहित विभिन्न साहित्यिक हस्तियों के साक्षात्कार प्रकाशित।)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा – फूस का मकबरा…)
☆ कथा – कहानी ☆ फूस का मकबरा… ☆ श्री सन्दीप तोमर ☆
उसकी स्मृति में यह बात अंदर तक समाहित है कि लगातार तीन-तीन बार जुड़वा बच्चे जनने और उनके जिंदा न रहने के बाद अपनी माँ की इकलौती जिंदा संतान होने के कारण उसे घरवालों से हक़ से ज्यादा ही स्नेह मिला। जब वह पैदा हुई तब भी जुड़वा बच्चे ही हुए थे, लेकिन दूसरा बच्चा हफ्ते भर में ही चला बसा था। माँ को एक साल की होने तक भी चिंता रहती कि वह भी बचेगी या नहीं। उसके पीछे कोई और भी पैदा हो माँ और पिताजी दोनों ही के प्रयास रहे लेकिन उसके भाग्य में इकलौता रहना जैसे नियति ने लिख दिया था।
पिता कॉलेज में प्रवक्ता थे, माँ भी नौकरी करती थी। आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहद ऊँचे पायदान पर खड़े उसके परिवार के पास उसे देने को तमाम तरह की सुख-सुविधाएं थी। दुनिया भर की खुशियों के बीच माँ उस पर सब कुछ लुटा देना चाहती थी, बहुत प्यार करती। पिता की शख्त-मिज़ाजी के बावजूद उसे उसके हिस्से का प्यार मिलता ही रहा।
स्कूल जाती थी तो माँ के शिक्षिका होने के चलते उसे लड़का-लड़की जैसा फर्क भी नहीं महसूस हुआ। उसके पढ़ने-लिखने में कोई रुकावट नहीं आई। कई बार किताबों के फट जाने पर दोबारा किताबें मिल जाती, जबकि अन्य सहपाठियों के केस में ऐसा नहीं होता था। जिनके पास किताब खरीदने को पैसे नहीं होते, वह उन सहपाठियों को किताब या अन्य सामान दे देती। कई बार यह भी होता कि अपना खाना किसी सहेली को खिला लंच के समय माँ के पास स्टाफ़रूम में जाकर कहती- “माँ! भूख लगी है। खाना दो।” माँ कहती- ‘सुबह जो लंचबॉक्स दिया, उसका क्या हुआ?’ वह बड़ी मासूमियत से कह देती- ‘वो संध्या है न उसके पास खाना नहीं था तो उसने खा लिया।’ उसकी परवरिश इस तरह हो रही थी कि उसकी निगाह में बेटी होना अपराध जैसा न होकर समानता का ही पर्याय था। वह जो कुछ भी करना चाहती उसके सामने सारे रास्ते खुले थे।
जब वह दस साल की हुई, उसको माँ के स्कूल से निकलकर माध्यमिक विद्यालय में जाना पड़ा। अनुकूल परिस्थितियों में भी उससे सेकंड क्लास में हाईस्कूल पास हुई। पिताजी उसे विज्ञान के विषय पढ़ा कर डॉक्टर बनाने के पक्ष में थे लेकिन उसकी ऐसी कोई इच्छा न थी।
इंटर करने के बाद कॉलेज में बीए में दाख़िला ले तो लिया पर अब पिता की तरफ से शादी का दबाव बढ़ने लगा। उसने अपने पिता से तीन साल की मोहलत माँगी कि उसके बाद जो चाहो कर लेना, अभी मुझे कुछ कर लेने दिया जाय। पिता को भी लगा कि तीन साल में बी.ए. हो जाएगी तब बेटी के हाथ पीले कर देंगे। अंतत: उसकी बात मान ली गई। कॉलेज में सांस्कृतिक गतिविधियों में वह हिस्सा लेने लगी। कविता लेखन के लिए उसे पुरस्कृत भी किया गया लेकिन पिता की इन सबमें कोई रूचि न थी, न ही वे इन खबरों से खुश ही होते।
कॉलेज में एनएसएस थी, उसने फॉर्म भरा और नामाँकन करा लिया। समाजसेवा का उसका यह पहला अवसर था। जिसे उसने अच्छे से उपयोग किया, शिमला में कैम्प के लिए उसका भी सिलेक्शन हो गया लगा। पिता लड़की को अकेले बाहर भेजने के पक्ष में नहीं थे लेकिन माँ ने पिता से हामी भरवा ली।
गेहुंए रंग के आकर्षक दिखने वाले लड़के से इसी कैंप में मुलाकात हुई। पहली नज़र में ही वह आकर्षक लगा। शाम को कैंप फ़ायर के समय उसने एक प्रेम कविता सुनाकर खूब तालियाँ बटोरी थी। उसके हाथ भी तो अनायास ही न चाहते हुए भी तालियों के लिए उठ गये थे। हालाँकि उसकी कविता को भी कम तालियाँ नहीं मिली थी, ये कविता उसने नारी-सशक्तिकरण पर सुनाई थी, उस पल कामकाजी माँ की छवि उसकी नज़रों में थी। शिखर पर पहुँचने के बाद माँ के आत्मविश्वास से वह रोज रूबरू होती, उसके मन में अपनी माँ के प्रति सम्मान बढ़ गयकी साथ ही माँ के जैसा बनने कि इच्छा भी बलवती हुई। कैसे-कैसे कष्ट सहते हुए उसे माँ का समर्थन हासिल हुआ, यहाँ तक पहुँचाने में कब-कब माँ को पिता के कोप का भाजन बनना पड़ा, सब उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूम गया। उसे यह अहसास भी हुआ कि वह इस जीवन में खुद कुछ कर सकती है, अपने सपनो को साकार कर सकती है।
कैंप में उसका प्रदर्शन देखते हुए एनएसएस की तरफ से उसे अन्य अभियानों में शामिल किया जाने लगा। उसका चयन सेक्स वर्कर्स को स्वास्थ्य सेवाएँ देने वाली टीम में बतौर टीम-लीडर हुआ, जल्दी ही यह अभियान स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ बन गया। माँ को लगा कि इस अभियान में कुछ ऐसा है जो महत्वपूर्ण है लेकिन पिता ने जब समाचार-पत्र में पढ़ा तो आग-बबूला हुए लेकिन वह अभियान के लिए उत्साहपूर्वक तैयारियों में जुटी रही। गेहुएं रंग वाले लड़के से भी इस प्रोजेक्ट के दौरान मुलाकातें होती रही। लड़का प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिखने का माहिर था, अधिकांश फाइल्स के काम वही करता।
सेक्स वर्कर को स्वास्थ्य सेवाएँ दिलाने के लिए उसे सामान्य चिकित्सा केंद्र से लेकर टी.बी. केन्द्रों तक भी जाना पड़ता, वहीँ उसे यौन संचारित रोगों के बारे में जानकारी मिली। उसने जाना कि सेक्स वर्कर्स में एसटीआई होने का खतरा सामान्य आबादी से ज़्यादा होता है। इनमें एचआईवी, गोनोरिया, क्लैमाइडिया, सिफ़िलिस, और हर्पीज़ जैसे रोग सबसे अधिक पाए गए। सेक्स वर्कर्स को कई तरह के कैंसर होने का खतरा दिखा, जिनमें सर्विक्स कैंसर के केस सबसे ज़्यादा मिले। इतना होता तो भी वह ज्यादा परेशान न होती, यहाँ तो सेक्स वर्कर्स में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी देखा गया, गरीबी, वित्तीय कठिनाइयां, अनैच्छिक सेक्स वर्क, और वित्तीय दलालों पर निर्भरता मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए जोखिम भरे कारक उसे लगे। वह जितनी भी सेक्स वर्कर्स से बात करती वे उसे बताती- एक डर सा लगा रहता है, अगर ग्राहक न आये या अगर ग्राहक को हमारे रोगों का रत्ती भर भी आभास हुआ तो हमारा धंधा चौपट हो जायेगा, हम अब इस स्थिति में हैं कि हमें कोई और काम न मिल सकता, न ही सुहाएगा।
सेक्स वर्कर्स को स्वास्थ्य समस्याओं का निपटान करने में उसे कई तरह की दिक्कतें आती हैं, जैसे- कलंक और पूर्वाग्रह के कारण, सेक्स वर्कर्स को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचाना उसके लिए मुश्किल होता। उनको एचआईवी परीक्षण और उपचार जैसे स्वास्थ्य उपचार मिलने में दिक्कत होती। जब वह उनको स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चिकित्सा केंद्र लेकर जाती तो उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता या उन्हें सेवाएं देने से ही मना कर दिया जाता, ऐसे में उसके कई बार झगडे भी हुए, कई बार पुलिस-थाने तक की नौबत आई। लेकिन उसने जो भी काम जिम्मे लिया उस पूरा करने का ठान ही लिया। ऐसा भी हुआ जब उसका नाम अचानक प्रोजेक्ट से हटा दिया गया और अंततः वह अभियान से बाहर भी कर दी गई। उसने हार नहीं मानी, उसे जानकारी मिली कि सामाजिक न्याय ढांचे के तहत व्यापक यौन स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए पेशेवरों को तैयार किये जाने हेतु प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं, उसे ऐसे ही एक कोर्स का पता चला जिसे ऑनलाइन माध्यम से कराया जाता है, जिसमें इच्छुक पेशेवरों को व्यापक यौन स्वास्थ्य शिक्षा और प्रशिक्षण में उत्कृष्टता प्रदान की जाती है। इस एडवांस कोर्स के लिए उसने अप्लाई कर दिया, लेकिन उसके पास इसे करने के लिए पंद्रह हजार रुपये फीस न थी, घर पर इतने पैसे होते हुए भी उसकी इन्हें माँगने की हिम्मत न थी, उसके मन में ख्याल आये- क्यों न मैं भी कुछ दिन… अगले ही पल उसने इस घिनौने विचार को झटक दिया, किस्मत से उन दिनों एक साहित्यिक संस्था द्वारा एक कहानी प्रतियोगिता हुई, जिसे उसके प्रोजक्ट के साथी ने जीत लिया, उसे इनाम में बीस हज़ार रुपये मिले जो उसने अपनी दोस्त के हाथ में रख दिए। वह मदद लेना भी नहीं चाहती थी लेकिन हालात ऐसे थे कि और कोई चारा भी उसके पास नहीं था, उसने कहा- “मैं एक बार सेटल हो जाऊं, तुम्हारे सारे पैसे लौटा दूँगी।”
“देखो! न ही मैं कहीं भागा जा रहा हूँ, न ही ये पैसे ही कहीं भागे जा रहे। तुम इत्मिनान से कोर्स करो, वैसे भी ये पार्टटाइम कोर्स है, तो काम के साथ साथ भी कर पाओगी।”
उसने एक स्कूल में पढाना शुरू किया जो सेक्स वर्कर्स के बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करता था। साथ-साथ कोर्स चल रहा था, इस कोर्स के दौरान ही उसे कितनी ही क़ानूनी जानकारियां हासिल हुई, जिनके माध्यम से वह यौन कर्मियों की लडाई खुद के दम पर भी लड़ सकती है।
कोर्स के दौरान उसका आत्मविश्वास जैसे नयी ऊँचाइयों को छूने लगा। उसे यह स्पष्ट हो गया था कि यौन कर्मियों की समस्याएँ केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कानूनी, सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी बेहद गहरी हैं। अब वह उनके लिए केवल एक ‘टीम-लीडर’ नहीं थी, बल्कि एक आवाज़ बन चुकी थी— एक मुखर और जागरूक प्रतिनिधि।
एक दिन उसके पास एक यौनकर्मी रोते हुए आई। उसका बेटा स्कूल में दाखिला लेना चाहता था, लेकिन स्कूल प्रशासन ने यह कहकर मना कर दिया कि ‘ऐसे’ लोगों के बच्चों के लिए यह जगह नहीं है। उसने उस माँ का हाथ थामते हुए कहा, “अब किसी को यह कहने का हक नहीं कि तुम इंसान नहीं हो।” उसी शाम उसने शिक्षा विभाग में एक पत्र भेजा—कानूनी भाषा में, ठोस तथ्यों के साथ। सप्ताह भर में उस बच्चे को उसी स्कूल में दाखिला मिला और उस यौनकर्मी ने पहली बार उसकी आंखों में आकर कहा, “तू भगवान नहीं, तू हमारी अपनी बिटिया है।”
उसका अभियान अब व्यक्तिगत स्तर से बढ़कर सामूहिक संघर्ष में बदल चुका था। उसके काम को देखते हुए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने उसे फेलोशिप ऑफर की। यह एक साल की ट्रेनिंग थी— स्वीडन में। अब चुनौती थी— वहाँ तक पहुँचने की, वीज़ा, पासपोर्ट, जाने-आने का खर्च, और सबसे ज़रूरी—पिता की अनुमति। माँ अब भी चुपचाप उसका साथ देती, लेकिन इस बार कुछ कहने से पहले ही पिता ने झल्लाकर कहा, “अगर तुम्हें वही करना है, जो घर की इज़्ज़त को नीलाम करे, तो इस घर से चली जाओ।”
उसी रात उसने अपना सामान समेटा, माँ के पैर छुए और कहा— “माँ, एक दिन बताऊंगी कि ये इज़्ज़त क्या होती है। अभी के लिए मुझे जाना होगा।” माँ की आँखें छलछला गईं लेकिन होंठों पर कोई विरोध न था। माँ जानती थी कि यह विद्रोह नहीं, संकल्प है।
स्वीडन जाने से पहले जब वह दिल्ली में वीज़ा इंटरव्यू की तैयारी में लगी थी, एक दिन अचानक वही लड़का मिलने आ गया। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी, जिसमें कैंप की कविताएँ थीं।
“तुमने कभी पूछा नहीं कि मैंने वो पैसे क्यों दिए थे?” उसने धीमे स्वर में कहा।
वह चौंकी, पर संयमित रही, “क्योंकि तुम अच्छे इंसान हो।”
लड़का मुस्कराया, “मैं शायद प्रेम करता था… या करता हूँ… पर कभी ज़ाहिर नहीं किया क्योंकि तुम्हारे सपनों की ऊँचाई से मैं खुद को छोटा नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था तुम उड़ो, तुम्हारे परों में कोई मेरी आकांक्षा का बोझ न हो।”
उसने पहली बार उसकी आँखों में झाँक कर देखा। उसे वो वाक्य याद आया जो सेक्स वर्कर की बेटी ने एक बार स्कूल में लिखा था—“प्यार वो है जो राह में कांटे न बिछाए, चुपचाप झाड़ दे।”
स्वीडन में बिताया गया वह एक साल उसके जीवन का नया आधार बन गया। वहाँ उसे एक नई दुनिया मिली— जहाँ मुद्दे पर बात होती थी, व्यक्ति पर नहीं। जहाँ समाज सुधार की बातें फॉर्मल मीटिंग्स में नहीं, ज़मीनी काम से होती थीं। वहीं पर उसने पहली बार यह महसूस किया कि उसका जीवन तो बस एक शुरुआत है, उसे अब रुकना नहीं है।
भारत लौटने के बाद उसने एक संगठन की नींव रखी— “माटी की बेटी”। इस संगठन ने सेक्स वर्कर्स के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालयों की शुरुआत की, स्वास्थ्य शिविरों का संचालन किया और सबसे बढ़कर— यौनकर्मियों के पुनर्वास पर ध्यान दिया। कई महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार से जोड़ा गया।
स्वीडन से लौटने पर जब उसने अपना संगठन शुरू किया, तो सबसे पहला व्यक्ति जो उसका साथ देने आया, वही गेहुँए रंग वाला लड़का था। उसने संगठन की वेबसाइट बनाई, डोक्यूमेंटेशन सम्भाला, प्रेज़ेंटेशन तैयार किए। जब उसके काम को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली, तो मंच पर उसका नाम कभी नहीं आया, पर वह हमेशा दर्शकों में बैठा मुस्कराता रहा।
एक रात नायिका ने उससे पूछा, “तुम अब तक क्यों रुके हो मेरे साथ?”
उसने कहा— “क्योंकि तुम्हारी लड़ाई में मुझे अपने भीतर की हर कायरता जलती दिखाई दी। और जब कोई और तुम्हारी पीठ पर हाथ रखता है, तो मुझे ईर्ष्या नहीं होती, गर्व होता है— क्योंकि मैं जानता हूँ तुम मेरी नहीं हो, लेकिन मैं तुम्हारे होने की गवाही में शामिल हूँ।”
वह न रोई, न हँसी। बस चुपचाप हाथ बढ़ा दिया— “तुम मेरे संगठन के सह-संस्थापक हो, अब से काग़ज़ों में भी। रिश्तों में नहीं तो इतिहास में तो तुम्हारा नाम होना चाहिए।”
वह गेहुएँ रंग वाला लड़का अब संगठन का अहम् हिस्सा है, लेकिन दोनों ने जीवन को स्नेह से आगे कभी बढ़ने न दिया। शायद एक छाया हमेशा उनके रिश्ते में बनी रही— उस मकसद की छाया, जिसे वे दोनों साझा करते थे।
एक दिन वह पुराने मोहल्ले में एक सेमिनार के सिलसिले में गई। वहीं से गुजरते हुए देखा कि उसके पुराने घर की दीवारें अब फूस की छत से ढँकी थीं। पता चला— पिता के रिटायर होते ही माँ की तबियत बिगड़ गई थी, और धीरे-धीरे सारी संपत्ति बिक गई। माँ अब भी उसी छत के नीचे रहती थी, लेकिन अब न चुप थीं न कमज़ोर। उसने बेटी को गले लगाया और कहा, “जिसे तू छोड़कर गई थी, वो ‘इज़्ज़त’ मैंने अब जाना है।”
वह मुस्कराई, आँसू पोंछे और माँ का हाथ थाम लिया।
आज उसके संगठन की शाखाएँ पाँच राज्यों में थीं। फेलोशिप, सम्मान, भाषण— सब उसके हिस्से आए, लेकिन जब किसी ने मंच से उसे ‘मसीहा’ कहा तो वह मुस्कराकर बोली—
“मैं कोई मसीहा नहीं, एक ईंट हूँ उस फूस के मकबरे की, जिसे तुमने इज्ज़त के नाम पर खड़ा किया था। अब मैं उसे तोड़कर, नई नींव रखने आई हूँ—जहाँ इंसान की पहचान उसके काम से हो, कर्म से हो, शरीर से नहीं।”
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक ऐतिहासिक लघुकथा — वीरांगना ऊदा देवी। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 151 ☆
☆ ऐतिहासिक लघुकथा — वीरांगना ऊदा देवी☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
16 नवंबर 1857 की बात है अंग्रेजों को पता चला कि लगभग दो हजार विद्रोही भारतीय सैनिक लखनऊ के सिकंदरबाग में ठहरे हुए हैं। अंग्रेज चिनहट की हार से बौखलाए हुए थे और भारतीयों से बदला लेने की फिराक में थे। अंग्रेज अधिकारी कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में सैनिकों ने सिकंदरबाग़ को घेर लिया। देश के लिए मर मिटनेवाले भारतीय सैनिक आने वाले संकट से अनजान थे।
अवध के छठे बादशाह वाजिदअली शाह ने महल में रानियों की सुरक्षा के लिए स्त्रियों की एक सेना बनाई थी। ऊदा देवी इस सेना की सदस्य थीं, अपने साहस और बुद्धिबल से जल्दी ही नवाब की बेगम हज़रतमहल की महिला सेना की प्रमुख बना दी गईं। साहसी ऊदा जुझारू स्वभाव की थीं, डरना तो उसने जाना ही नहीं था और निर्णय लेने में तो वह एक पल भी ना गंवाती थीं। सिकंदरबाग में अंग्रेज सैनिक भारतीय सैनिकों के लिए काल बनकर आ रहे थे, वीरांगना ऊदा देवी हमले के वक्त वहीं थीं। देश के लिए जान न्यौछावर करनेवाले इन वीर जवानों को वे अपनी आँखों के सामने मरते नहीं देख सकती थीं। उसने पुरुषों के कपडे पहने, हाथ में बंदूक ली और गोला-बारूद लेकर वह पीपल के पेड़ पर चढ़ गईं। पेड़ पर से लगातार गोलियों से हमलाकर उसने अंग्रेज़ सैनिकों को सिकंदरबाग़ में प्रवेश नहीं करने दिया, दरवाजे पर ही रोके रखा। ऊदा देवी ने अकेले ही ब्रिटिश सेना के दो बड़े अधिकारियों और 36 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। यह देखकर अंग्रेजी अधिकारी बौखला गए वे समझ ही नहीं सके कि कौन और कहाँ से उनके सैनिकों को मार रहा है। तभी एक अंग्रेज सैनिक की निगाह पीपल के पेड़ पर गई। उसने देखा कि पेड़ की डाली पर छिपा बैठा कोई लगातार गोलियां बरसा रहा है। बस फिर क्या था, अंग्रेज़ सैनिकों ने निशाना साधकर उस पर गोलियों की बौछार कर दी। एक गोली ऊदा देवी को लगी और वह पेड़ से नीचे गिर पड़ीं।
अँग्रेज़ अधिकारियों को बाद में पता चला कि सैनिक के वेश में वह भारतीय सैनिक कोई और नहीं बल्कि वीरांगना ऊदा देवी थी।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका कथा – “|| राम कथा || “।)
अभी अभी # 719 ⇒ || राम कथा || श्री प्रदीप शर्मा
कथा और कहानी में अंतर होता है। किसी के मुख से कही जाए, वह कथा और जो स्वयं अपनी ही व्यथा का बयान करे, वह रामकहानी। यहां कथा से आशय “वह जो कही जाय” अर्थात् ‘बात’। यह मेरे एक मित्र की ऐसी रामकहानी है, जो आज मौजूद नहीं है। इसे महज संयोग ही कहेंगे कि मेरे इस मित्र का नाम भी राम ही था, और मैं उसकी कहानी आपको सुना रहा हूं, इसलिए इसे राम कथा कहा गया है।
मेरा यह राम अयोध्या का नहीं, मेरे शहर के कमाठीपुरे का निवासी था। इसके पिता दशरथ नहीं, खियाराम थे। इसके भी दो भाई भरत और लक्ष्मण थे। यह मेरा सहपाठी तो था ही, इसकी एक साइकिल की दुकान भी थी, जिसका नाम राम साइकिल स्टार्स था। स्कूल के बाद का इसका अधिकांश समय साइकिल की दुकान पर ही बीतता था। ।
साइकिल की दुकान पर साइकिल किराए से दी जाती थी और साइकिल सुधारी भी जाती थी। एक रजिस्टर होता था, जिसमें साइकिल किराए से लेने वाले का नाम, पता और साइकिल देने का समय नोट किया जाता था। साइकिल प्रति घंटे के हिसाब से किराए पर दी जाती थी। कुछ लोग सुबह साइकिल ले जाते और शाम को वापस लाते थे।
साइकिल लेडीज, जेंट्स और बच्चों की भी होती थी।
तब शहर आज जितना व्यस्त नहीं थे। कार स्कूटर की बात छोड़िए, तब अधिकांश घरों में तो साइकिल भी नहीं होती थी। छोटे शहर में जरूरी काम हेतु साइकिल किराए से लेना अधिक सस्ता पड़ता था। दस जगह रुके, अपना काम किया और वापस।
मुझे साइकिल कॉलेज जाते समय मिली थी, उसके पहले पैदल ही स्कूल जाना पड़ता था। ।
अपने पिताजी के साये में मेरा मित्र राम, राजा की तरह रहा। बीच बाजार में मालिक की तरह वह शान से साइकिल की दुकान पर बैठता था। अच्छा मिलनसार था मेरा दोस्त।
उसके रहते मुझे कभी साइकिल की कमी महसूस नहीं हुई। स्कूल जाते वक्त वह घर आता, आवाज लगाता, हम साथ साथ स्कूल जाते।
एक आम इंसान की तरह राम का भी विवाह हुआ, उसके भी बाल बच्चे हुए। अचानक पिताजी के अवसान से कॉलेज की पढ़ाई छूटी, और उसे पुश्तैनी साइकिल की दुकान को संभालना पड़ा। दोनों छोटे भाई सिर्फ नाम के ही भरत और लक्ष्मण थे। बहुत जल्द दोनों भाइयों ने साइकिल की दुकान को ऑटो गैरेज में बदल दिया और अपने बड़े भाई को पास के ही एक कोने में साड़ी फॉल बेचने पर बाध्य कर दिया। ।
ईश्वर भी राम पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहा। बहनों की शादी के बाद, तीन तीन कन्या रत्नों के विवाह का बोझ भी उसके ही कन्धों पर आ पड़ा। फिर भी उसने दोस्तों से मिलना जुलना और मुस्कुराना बंद नहीं किया। एकमात्र जीजाजी संकटमोचक की तरह हर आर्थिक परेशानी में काम आते रहे, लेकिन आखिर कब तक।
मैं लंगोटिया ना सही, फिर भी बचपन का दोस्त और सुख दुःख का साथी था, इसलिए हालात से पूरी तरह वाकिफ था और वक्तन फ़वक्तन छोटी मोटी जरूरतें भी पूरी करता रहता था। लेकिन मुसीबतों का पहाड़ था, जो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ।
मरता क्या न करता, यार दोस्तों, रिश्तेदारों, बाजार और बैंक सभी का वह कर्जदार होता चला गया, जिससे उसकी साख भी घट गई और छोटा मोटा जो धंधा था, वह भी चौपट हो गया। लेकिन फिर भी राम ने हार नहीं मानी और घरेलू सफाई के उत्पाद, एसिड फ़िनाइल इत्यादि घर घर जाकर सप्लाय करने लगा।
इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी मैने उसे कभी विचलित नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक कांतिहीन शांति थी। हो सकता हो, अंदर से वह जड़वत हो गया हो। मैने कई बार उसे कुरेदने की कोशिश की, लेकिन मैं हार गया। कई बार मैने खुद को उसकी जगह रखने की कोशिश की, तो अपने आपको इतना कायर पाया कि सिर्फ आत्महत्या का ही खयाल आया। ।
उसकी हालत बिगड़ती गई, लेकिन मेरी नजरों में वह महान होता चला गया। पारिवारिक परेशानी, आर्थिक तंगी और बदनामी से बेअसर, क्या जिजीविषा इतनी प्रबल होती है कि आत्म सम्मान और स्वाभिमान के अभाव में भी इंसान परिस्थितियों से जूझता रह सकता है।
फिर आखिरकार वही हुआ, जो होना था, मेरा प्रिय दोस्त राम चुपचाप चल बसा। अपने पीछे वह सिर्फ यादें ही छोड़ गया है। हमारी दोस्ती की सुनहरी यादें। मेरे लिए मेरे दोस्त की रामकहानी, किसी राम कथा से कम नहीं। राम का स्मरण ही मेरा नाम स्मरण है। आंसू तो उसके भी सूख चुके थे, हां लेकिन मेरी आँखें नम जरूर हैं।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम कथा – “चतुराई धरी रह गई!” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 217 ☆
☆ कथा कहानी – चतुराई धरी रह गई!☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
चतुरसिंह के पिता का देहांत हो चुका था. उस ने अपने छोटे भाई कोमलसिंह को बंटवारा करने के लिए बुलाया, “बंटवारे के पहले खाना खा लेते है. ” खाने परोसते हुए चतुरसिंह ने कोमलसिंह से कहा.
कोमलसिंह ने जवाब दिया, “ भैया ! बंटवारा आप ही कर लेते. मुझे अपना हिस्सा दे देते. बाकि आप रख लेते. मुझे बुलाने की क्या जरुरत थी ?”
“नहीं भाई. मै यह सुनना बरदाश्त नहीं कर सकता हूँ कि बड़े भाई ने छोटे भाई का हिस्सा मार लिया, ” कहते हुए चतुरसिंह ने भोजन की दो थाली परोस कर सामने रख दी.
एक थाली में मिठाई ज्यादा थी. इस वजह से वह थाली खालीखाली नजर आ रही थी. दूसरी थाली में पापड़, चावल, भुजिए ज्यादा थे. वह ज्यादा भरी हुई नज़र आ रही थी. मिठाई वाली थाली में दूधपाक, मलाईबरफी व अन्य कीमती मिठाइयाँ रखी थी.
“ जैसा भी खाना चाहो, वैसी थाली उठा लो, ” चतुरसिंह ने कहा, वह यह जानना चाहता था कि बंटवारे के समय कोमलसिंह किस बात को तवज्जो देता है. ज्यादा मॉल लेना पसंद करता है या कम.
चूँकि कोमलसिंह को मीठा कम पसंद था. इसलिए उस ने पापड़भुजिए वाली थाली उठा ली, “भैया मुझे यह खाना पसंद है, ” कहते हुए कोमलसिंह खाना खाने लगा.
चतुरसिंह समझ गया कि कोमलसिंह को ज्यादा मल चाहिए. वह लालची है. इस कारण उस ने ज्यादा खाना भरी हुई थाली ली है. इसे इस का मज़ा चखाना चाहिए. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने बंटवारे के लिए नई तरकीब सोच ली.
खाना खा कर दोनों भाई कमरे में पहुंचे. चतुरसिंह ने घर के सामान के दो हिस्से कर रखे थे.
“ इन सामान में से कौनसा सामान चाहिए ?” चतुरसिंह ने सामने रखे हुए सामान की ओर इशारा किया.
एक ओर फ्रीज़, पंखें, वाशिंग मशीन रखी थी. दूसरी ओर ढेर सारे बरतन रखे थे. चुंकि कोमलसिंह के पास फ्रीज़, पंखे, वाशिंग मशीन थी. उस ने सोचा कि भाई साहब के पास यह चीज़ नहीं है. इसलिए ये चीज़ भाई साहब के पास रहना चाहिए.
यह सोचते हुए कोमलसिंह ने बड़े ढेर की ओर इशारा कर के कहा, “मुझे यह बड़ा वाला ढेर चाहिए. ”
चतुरसिंह मुस्कराया, “ जैसी तेरी मरजी. यूँ मत कहना कि बड़े भाई ने बंटवारा ठीक से नहीं किया, ” चतुरसिंह अपनी चतुराई पर मंदमंद मुस्कराता हुआ बोला. जब कि वह जानता था कि उसे ज्यादा कीमती सामान प्राप्त हुआ है.
कोमलसिंह खुश था. वह अपने बड़े भाई की मदद कर रहा था.
“अब इन दोनों ढेर में से कौनसा ढेर लेना पसंद करोगे ?” चतुरसिंह ने अपने माता की जेवरात की दो पोटली दिखाते हुए कहा.
कोमलसिंह ने बारीबारी दोनों पोटली का निरिक्षण किया, एक पोटली भारी थी, दूसरी हल्की व छोटी. उस ने सोचा कि चतुरसिंह बड़े भाई है. इसलिए उन्हें ज्यादा हिस्सा चाहिए.
“ भैया ! आप बड़े है. आप का परिवार बड़ा है, इसलिए आप बड़ी पोटली रखिए, ” कोमलसिंह ने छोटी पोटली उठा ली, “यह छोटी पोटली मेरी है. ”
“ नहींनहीं भाई, तुम बड़ी पोटली लो, “ चतुरसिंह ने बड़ी पोटली कोमलसिंह के सामने रखते हुए कहा.
“ नहीं भैया, आप बड़े है, बड़ी चीज़ पर आप का हक बनता है, ” कहते हुए कोमलसिंह ने छोटी पोटली रख ली.
चतुरसिंह चकित रह गया. उस ने बड़ी पोटली में चांदी के जेवरात रखे थे. छोटी पोटली में सोने के जेवरात थे. वह जानता था कि कोमलसिंह लालच में आ कर बड़ी पोटली लेगा. जिस में उस के पास चांदी के जेवरात चले जाएँगे और वह सोने के जेवरात ले लेगा.
मगर, यहाँ उल्टा हो गया था.
अब की बार चतुरसिंह ने चतुराई की, “ कोमलसिंह इस बार तू बंटवारा करना. नहीं तो लोग कहेंगे कि बड़े भाई ने बंटवारा कर के छोटे भाई को ठग लिया, “ चतुरसिंह ने कोमलसिंह को ठगने के लिए योजना बनाई.
कोमलसिंह कोमल ह्रदय था. वह बड़े भाई साहब का हित चाहता था. बड़े भाई के ज्यादा बच्चे थे. इसलिए वह चाहता था कि जमीन का ज्यादा हिस्सा बड़े भाई साहब को मिले. इसलिए वह चतुरसिंह को अपने पैतृक घर पर ले गया.
“भाई साहब ! यह अपने पैतृक मकान है. पिताजी ने आप के जाने के बाद इसे बनाया था, ” कोमलसिंह ने कहा.
चतुरसिंह ने देखा कि एक ओर दो मकान और तीन मंजिल भवन खड़ा है, दूसरी ओर एक दुकान के पास से अन्दर जाने का गेट है. यानि एक ओर बहुमंज़िल भवन के साथ दो दुकान बनी हुई थी. दूसरी ओर एक दुकान और पीछे जाने का गेट था.
चतुरसिंह नहीं चाहता था कि जेवरात की तरह ठगा जाए इसलिए उस ने कहा, “ कोमलसिंह तुम ही बताओ. मुझे कौनसा हिस्सा लेना चाहिए ?”
“ भाई साहब, मेरी रॉय में तो आप दूसरा हिस्सा ले लेना चाहिए, ” कोमलसिंह ने कहा तो चतुरसिंह चकित रह गया.
छोटा भाई हो कर बड़े भाई को ठगना चाहता है. खुद बहुमंजिल मकान और दो दुकान हडप करना चाहता है. मुझे एक दुकान और छोटासा बाड़ा देना चाहता है. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमलसिंह, मेरा परिवार बड़ा है, इसलिए मै चाहता हूँ कि यह बहुमंजिल मकान वाला हिस्सा में ले लूँ. ”
इस पर कोमलसिंह ने कहा, “ भैया ! आप हिस्सा लेने से पहले यह दूसरा हिस्सा देख ले. ” कोमलसिंह ने चतुरसिंह से कहा. वह चाहता था कि बड़े भाई को ज्यादा हिस्सा मिलें. क्यों कि दूसरे हिस्से के अंदर १० मकान और लंबाचौडा खेत था, साथ ही बहुत सारे मवेशी भी थे.
मगर, चतुरसिंह ने सोचा कि छोटा भाई उसे ठगना चाहता है. इसलिए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमल, मुझे कुछ नहीं देखना है, यह दूसरा हिस्सा तेरे रहा, पहला हिस्सा मेरे पास रहेगा. ”
“भैया ! एक बार और सोच लो, ” कोमलसिंह ने कहा, “ आप को ज्यादा हिस्सा चाहिए, इसलिए आप यह दूसरा हिस्सा ले लें. ”
चतुरसिंह जानता था कि खाली जमीन के ज्यादा हिस्से से उस का यह बहुमंजिल मकान अच्छा है. इसलिए उस ने छोटे भाई की बात नहीं मानी. सभी पंचो के सामने अपनेअपने हिस्से का बंटवारा लिख लिया.
“ भैया. एक बार मेरा हिस्सा भी देख लेते,” कहते हुए कोमलसिंह चतुरसिंह को अपना हिस्सा दिखने के लिए दुकान के पास वाले गेट से अंदर गया.
आगेआगे कोमलसिंह था, पीछेपीछे चतुरसिंह चल रह था. जैसे ही वे गेट के अंदर गए, उन्हें गेट के पीछे लम्बाचौड़ा खेत नजर आया. सामने की तरफ १० भवन बने हुए था. कई मवेशी चर रहे थे.
यह देख कर चतुरसिंह ढंग रह गया, “कोमल यह हिस्सा पापाजी ने कब खरीदा था ?”
“ भैया ! आप के जाने के बाद,” कोमलसिंह ने बताया, “इसीलिए मै आप से कहा रहा था कि आप बड़े है, आप को बड़ा हिस्सा चाहिए, मगर, आप माने नहीं,”
मगर, अब चतुरसिंह क्या करता ? उस की चतुराई की वजह से वह स्वयम ठगाया जा चूका था. वह चुप हो गया.
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– टोना टोटकी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # 67 — टोना टोटकी —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
चौराहे पर दो मृत कबूतर पड़े हुए थे। लोग सनक में घिरे यह तो अपने गाँव के हर आदमी की आत्मा को झकझोर जाने वाली टोना टोटकी है। तब तो अपने गाँव में दुर्भिक्ष आएगा और यहाँ तक कि घरों से मुर्दे उठेंगे। तभी एक बिल्ली ने इस शंका का समाधान कर दिया। बिल्ली ने कहीं से आ कर दोनों कबूतरों को एक साथ अपने जबड़ों में दबाया और चलते बनी। उसी ने दोनों कबूतरों का शिकार किया था।
श्वेता को एम.ए. करने के तुरंत बाद विश्वविद्यालय में तदर्थ व्याख्याता के रूप में नौकरी मिल गई। उसने न तो नेट पास किया था और न ही एमफिल। उसने पीएचडी शब्द के बारे में भी नहीं सुना था। दरअसल, उसके पिता शिक्षा सचिव के निजी सहायक थे और उन्होंने ही श्वेता को यह नौकरी दिलाने की सिफारिश की थी। श्वेता की अन्य सहेलियाँ पैमी और सुखी उससे ईर्ष्या करती थीं। एक दिन श्वेता ने पैमी से पूछा, “सभी शिक्षकों के नेम-प्लेटों पर उनके नाम के आगे ‘डॉक्टर’ क्यों लिखा हुआ है?” पैमी ने बताया कि “उन सभी के पास डॉक्टरेट की डिग्री है, इसलिए… ” फिर पैमी ने उसे पीएचडी के बारे में विस्तृत जानकारी दी। सुखी भी पास ही बैठी थी। लेकिन वह पैमी को एक तरफ ले गई और बोली, “इसका कुछ नहीं होगा।” तो पैमी ने तुरंत कहा, “देखना, इसका ही कुछ होगा, हम जैसे रह जाएंगे।” शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति के लिए साक्षात्कार शुरू हुए, जिसमें श्वेता विजयी रही और पैमी व सुखी को ‘डॉक्टर’ होने के बावजूद निराशा ही हाथ लगी। पैमी ने सुखी को याद दिलाया, “मैंने तुमसे कहा था ना कि यह बहुत बड़ी चीज़ है!”
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “लाल बत्ती”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
मैं आज अपनी कार में बेटी को यूनिवर्सिटी छोड़ने जा रहा था। आमतौर पर अपनी सरकारी लाल बत्ती वाली चमचमाती गाड़ी में छोड़ने जाता हूँ। लाल बत्ती देखते ही सिक्युरिटी पर तैनात सिपाही सैल्यूट ठोकना नहीं भूलते। पर आज ड्राइवर छुट्टी पर था। मैंने सोचा कि मैं ही अपनी कार में बेटी को छोड़ आता हूँ।
जैसे ही मेन गेट पर कार पहुंची, सिक्युरिटी वालों ने हाथ देकर रुकने का इशारा किया। मैं हैरान! जो मुझे देखे बिना सैल्यूट ठोकते थे, आज चैकिंग के लिए पूछ रहे थे क्योंकि आज लाल बत्ती वाली गाड़ी जो नहीं थी !
मैंने बताने की कोशिश की कि मैं वही हूँ, जिसे आप बिना देखे सलाम करते हो लेकिन वे मानने को तैयार न थे! तो क्या लाल बत्ती ही मेरी पहचान है, मैं नहीं? और मैं आईकार्ड ढूंढने लगा!
☆ कथा-कहानी ☆ ~ होनहार की तस्वीर ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
अखिलेश के पास न अब सोचने के लिए समय था और न ही करने के लिए कोई काम था। नौकरी की तलाश में वह अहमदाबाद जरूर आ गया, लेकिन अहमदाबाद उसे रास नहीं आया।
कागज़ के गत्तो से कार्टन बनाने वाली एक फैक्ट्री में गत्ते की चादर पर लेटे अखिलेश को रोटी भी चबाते नहीं बन रही थी। कई दिनों की बटोरी रोटियाँ, धूप में सुख कर ककटी हो गई थी तभी मानस उसके पीछे आया और धीरे से बोला।
अखिलेश..अखिलेश इधर आना। अखिलेश बुरी तरह से डर गया। उसे लगा कि कोई और आफत फिर आकर खड़ी हो गई। पीछे मुड़कर देखा तो मानस खड़ा था।
अबे, सुन बे इधर आ!
कागज की गिलास में भरे चाय को अखिलेश को पकड़ाते हुए मानस इस तेजी से पीछे की तरफ भाग लिया कि कोई उसे देखना ले। चाय की गिलास में डूबी हुई रोटी है, अब जाकर थोड़ी सी मुलायम हो रही थी। अखिलेश को कई दिनों बाद पहली बार इतना स्वादिष्ट भोजन मिला था।
जिंदगी में धुली कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी।
अखिलेश बड़ी शिद्दत और मेहनत से उस कंपनी में काम करता था। जितना सब लोग काम करते थे, अखिलेश उनसे कई गुना काम निकाल देता था, लेकिन न जाने क्या हुआ एक दिन उसे क्या सूझी। कंपनी में गत्तों को पैक करने वाले छोटे छोटे दो तीन पिन अखिलेश ने उसे अपने पॉकेट में डाल लिए।
मेटल डिटेक्टर की घंटी बजी, तो गार्ड ने उसे किनारे खड़ा होने के लिए कहा। अखिलेश को यह नहीं समझ में आया कि आखिर उसे किनारे क्यों खड़ा किया जा रहा है।
तलाशी में उसके पाकेट से वे छोटे- छोटे दो तीन पिन निकले तो कंपनी के लिए बड़ा अपराध हो गया। कंपनी ने उसे एक हफ्ते ले लिए काम करने से मना कर दिया।
अखिलेश की कहानी जहां से शुरू हुई थी, वहीं समाप्त हो गयी। वह अपने साथियों से दूर नहीं जा सकता था और इससे अधिक मेहनत का काम भी नहीं कर सकता था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले अखिलेश को बेरोजगारी का मार झेलना पड़ रहा था। इस पढ़ाई के बाद उसे किसी प्रकार का संतोषजनक जॉब नहीं मिला। ऊपर से परिवार के तानों की मार बढ़ गई, तो मजबूरन उसे भाग कर अहमदाबाद पड़ा।
यहां खोजते खोजते काम मिला तो गत्ते की फैक्ट्री में गत्तों के बॉक्स बनाने का काम मिला।
जिंदगी का सूरज अभी ठीक से चमक भी नहीं पाया था कि घनघोर काले बादलों ने उसे ढक लिया।
चाय के साथ रोटी खाने से उसके मन को तृप्ति मिली तो बड़े दिनों बाद उसे गहरी नींद भी आयी।
वह वहीं गत्ते पर लेट गया।
रात का वक्त था इधर अचानक फैक्ट्री में अफरा तफरी मच गई थी। इलेक्ट्रिक जनरेट करने वाली टरबाइन में कोई खराबी आ गई, तो पूरा सिस्टम इस शट डाउन हो गया। कंपनी के इंजीनियर उसको बनाने में जुटे पड़े थे। एक पैनल का काम किसी को समझ में नहीं आ रहा। शायद फाल्ट भी उधर ही कहीं छिपा था। फैक्ट्री को रात में ही चलाना जरूरी था, क्योंकि कंपनी ने एक बहुत बड़ा ऑर्डर ले रखा था। जिसके माल की सप्लाई अगले दिन 11:00 बजे तक हर हाल में करनी थी। इंजीनियरों के पसीने छूट रहे। कंपनी का चीफ इंजीनियर अपने मातहतों को इस तरह से डांट रहा था, मानो वे उसके घरेलू नौकर हो। चीफ इंजीनियर को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। ऊपर से फैक्ट्री के मालिक का फोन उसके खोपड़ी को हिलाये दे रहा था।
काफी हिम्मत करके मानस चीफ इंजीनियर के बगल में जा पहुंचा और धीरे से बोला।
साहब… आपसे एक बात कहनी है।
अबे तू कौन? क्या बात करनी है तुमको?
मानस डर गया। डरते डरते बोला।
साहब! हमारी कंपनी में एक लड़का है, वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है, लेकिन गत्ते का कार्टन बनाता है।
कहां है वह? बताओ? चीफ इंजीनियर ने अपनी गर्दन पीछे घुमाते हुए कहा।
साहब, है तो, लेकिन उसे निकाल दिया गया।
अबे साले…अब तक, क्या – क्या पहाड़ पढ़ रहा है।
लड़का है, इंजीनियर है, मजदूर है, निकाल दिया गया है। यह सब अनाप-शनाप क्या बक रहा है।
मानस ने एक बार और हिम्मत करके अपनी उंगली से अखिलेश की तरफ इशारा किया। अखिलेश अभी भी कार्टून के रद्दी गत्तों पर इस तरह से लेटा पड़ा था।
ठीक है उसे बुलाओ..
इंजीनियर का इतना कहना था कि मानस दौड़े दौड़े अखिलेश के पास पहुंचा।
अबे साले, उठ चल चल। कंपनी के एक मशीन खराब है बना देगा तो इंजीनियर बन जाएगा।
इंजीनियर बन जाएगा। अखिलेश कान में गयी ये आवाज उसे गाली जैसी लग रही थी। आंखें मिजते हुए अखिलेश उठा और सीधे टरबाइन के इलेक्ट्रिकल पैनल के पास पहुंच गया। इंजीनियर ने ऊपर से नीचे तक उसका हुलिया निहारा तो एक बार उसे लगा कि यह क्या मैं करने जा रहा हूँ।
लेकिन पता नहीं क्या इंजीनियर के दिमाग में आया कि चलो एक बार इस लड़के को भी अजामा लेते हैं।
उसके दिमाग में कहीं से आया कि न जाने किस भेष में नारायण मिल जाए।
मशीन को प्रणाम कर, जरूरी सेफ्टी गार्डस पहन, हाथ में कुछ टूल्स लेकर अखिलेश टरबाइन मशीन के यार्ड में चला गया।
चीफ इंजीनियर की न समझी पर, उसकेअधीन के असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्निशियनस एक जगह खड़े होकर उसका मजाक उड़ाने लगे। यह बॉस भी पागल हो गया है। हम लोग इतने देर से इस फाल्ट को ढूंढ रहे हैं, हम सबसे तो मिला नहीं। यह मजदूर ढूंढ के निकलेगा … ऐसा कहते हुए सभी ठहाका मार कर हंस पड़े।
इधर ठहाको की आवाज चीफ इंजीनियर के कान में गई, उधर पैनल की बत्ती लाल से ग्रीन हो गयी।
टरबाइन के इलेक्ट्रिकल सेक्शन से बाहर निकलकर, अखिलेश के चीफ इंजीनियर से कहा..
सर.. एक बार फिर स्टार्ट करवाइए, मुझे पूरा यकीन है की मशीन स्टार्ट हो जाएगी और इस बार ट्रिप नहीं होगी।
मशीन का स्विच दबाया गया, सिस्टम ऑन हुआ और मशीन चल पड़ी। इस बार मशीन चली तो दुबारा रुकने का नाम नहीं लिया। वहां खड़े सभी लोगों ने ख़ुशी से तालियां बजाई तो बगल में खड़े असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्नीशियन भी खुद को ताली बजाने से रोक नहीं सके।
उन्हें नहीं समझ में आया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, उन लोगों ने अपनी ताली रोकी और एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। इधर चीफ इंजीनियर उनकी तरफ घूर करके देख रहा था, अब अखिलेश इंजीनियर की बाहों में था
इंजीनियर ने उसे बच्चों को प्रेम से अपने बाहों में लपेट लिया।
अगले दिन की सुबह अखिलेश के लिए खास सुबह थी।
चीफ इंजिनियर : अपने डॉक्यूमेंट मेरे सामने रखो। कहां से बीटेक किया है ?
अखिलेश : सर..जबलपुर से।
चीफ इंजिनियर : प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कहां से किया था ?
अखिलेश : सर..एनटीपीसी ऊंचाहार से।
एनटीपीसी ऊंचाहार का नाम आते ही चीफ इंजीनियर चेहरे की रंगती बदल गई। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।
चीफ इंजिनियर : किस ईयर में तुमने प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की थी ?
अखिलेश : सर.. 2017, में।
वर्ष 2016 सुनते ही चीफ इंजीनियर, अखिलेश को गौर से देखने लगा।
चीफ इंजिनियर : किसके अंडर में तुमने इंटर्नशिप की थी।
अखिलेश : सर.. आपके ही अंडर में तो की थी।
यह कहते हुए अखिलेश की आंखों से झर झर आंसू गिरने लगे,
चीफ इंजीनियर ने अपनी मेमोरी रिकॉल की, तो उन्हें उस होनहार की तस्वीर अखिलेश चेहरे में नजर आई जिसे वह उसे बैच का सबसे होनहार और समझदार अप्रेंटिस स्टूडेंट मानता बहुत था।
अगले दिन अखिलेश अपने केबिन में बैठा था, तो चीफ इंजीनियर अखिलेश के केबिन के सामने से यह कहते हुए गुजरे …
कहो, इंजीनियर अखिलेश कैसे हो?
सर मैं ठीक हूं कहते हुए अखिलेश अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। उसके बगल में बैठा हुआ मानस भी उठ खड़ा हुआ।
अखिलेश ने मानस की तरफ इशारा करते हुए, चीफ इंजीनियर से बड़े ही स्नेहिल भाव से कहा।
सर…यह मानस है, इसने भी आईटीआई किया है। इसे भी टेक्नशियन के पद पर रख लीजिए न।
चीफ इंजीनियर ने मुस्कुराते हुए.. यस..यस कहते हुए गर्दन हिलाई, जिसमे उनकी मौन स्वीकृति झलक रही थी।
अखिलेश और मानव दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, दोनों के चेहरों पर खुशियों के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।
श्रुति और आकाश अलग-अलग कॉलेजों में प्रोफेसर थे। घर पहुंचने पर दोनों ने अपने-अपने हिसाब से सारे कामों को बांटा हुआ था। अक्सर आकाश को सब्जियां लाने और बाजार के कामों की जिम्मेदारी मिली हुई थी, जबकि श्रुति खाना बनाने और चाय-नाश्ता का ध्यान रखती थी। उन्होंने बर्तन साफ करने और कपड़े धोने के लिए एक नौकरानी रखी थी। आकाश जब भी घर से सब्जी खरीदने निकलता तो अक्सर दुकान पर जाकर अपनी पत्नी को फोन पर पूछता, “क्या लाऊं?” आटा गूंथती हुई पत्नी खीझकर बोलती, “मैं क्या जानूं? दुकान पर तो तुम खड़े हो। जो पसंद हो, जो अच्छा हो, ले आओ।” बेचारा आकाश, असहाय होकर, जो भी सब्जियाँ मिल जातीं, ले आता और जब वह घर पहुँचता, तो अपनी पत्नी के ताना सुनता, “ओह, क्या ले आए हो तुम! कितनी बासी सब्जियाँ हैं ये सब! मिर्चें और धनिया नहीं लाए क्या?” आकाश चुपचाप सब कुछ विवश होकर सुनता रहता। श्रुति की बातों का उसके पास कोई जवाब नहीं था।
एक दिन पति-पत्नी दोनों शहर से बाहर कहीं गये हुए थे। घर लौटने से पहले वे सब्जी वगैरह खरीदने बाज़ार चले गए। आकाश कार में ही बैठा रहा, क्योंकि उसे कार पार्क करने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिल रहा था, और उसे यह भी डर था कि अगर वे दोनों कार से बाहर निकल गए, तो नगर निगम वाले कहीं कार को उठाकर ले ना जाएं, क्योंकि कार सही जगह पर पार्क नहीं की गई थी। यह घटना उसके साथ पहले भी घटित हो चुकी थी। खैर…सब्जी वाले के पास जाकर श्रुति ने अपने पति को फोन किया और पूछा, “क्या लाऊं, मुझे तो कुछ समझ नहीं आता।” अब आकाश के पास उसके तानों का साफ जवाब था, “मुझे क्या पता, सब्जी वाले के पास तो तुम खड़ी हो! जो अच्छा लगे, ले आओ…”