हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बोधिवृक्ष ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बोधिवृक्ष ? ?

बोधिवृक्ष

जो हरे-भरे रहे हैं,

अब ठूँठ से खड़े हैं,

संभवत: धरती से

जुड़े रहने का

दण्ड मिला है,

जंगली बेलें-

धरती से ऊपर पनपती,

बोधि के वक्ष पर फुदकती,

इठला रही हैं,

परजीवी हैं,

बोधि की जड़ो को

खा रही हैं,

बुद्धिमानी के

सरकारी तमगे पा रही हैं,

बोधि बंजर हो चुके,

जंगली बेलें

सौभाग्यवती हैं,

हमारे समय की

यही विसंगति है!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ – कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भयानक“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ ?

? कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

द्वेष  ईर्ष्या  कपट  भयानक

गर्म-गर्म  लू-लपट भयानक

=2=

शेर    मारने,    चूहे  निकले

मिल रई ऐसी रपट भयानक

=3=

शिष्य  गुरु  पर  हावी  हैं उफ़

अब वो डाँट न डपट भयानक

=4=

बाहर    ख़ामोशी   है   किन्तु

भीतर शोर है विकट भयानक

=5=

दंगे-तिकड़म-हुड़दंग   ‘राजेश’

करवाती यह  टिकट भयानक

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ – मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मानव अब तो जाग. )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ ☆

☆ मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

नभ से हर पल गिर रही, लपटें बनकर आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

दिनकर निकले भोर में, मोहक लगता रूप।

भरी दुपहरी में लगे, लपट बनी यह धूप।।

शहर सकल वीरान यह, मनुज रहे सब भाग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

सघन वनों को काट कर, बनते खूब मकान।

बढ़ता पारा देख अब, विकल हुए इंसान।।

सब जन मिलकर गा रहे, गहन तपन का राग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

बचना है यदि ताप से, जन-जन करे प्रयास।

तरुवर हर इक द्वार हो, हरी-भरी सी घास।।

रिम-झिम प्रभु बरसात कर, मिट जाए यह आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०८ ☆ दोहा छंद – ।। बाल काल बचपन नटखटपन ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०८ ☆

☆ दोहा छंद ।। बाल काल बचपन नटखटपन ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

1

कभी बाल्यकाल गुम नहीं हो,   बचपन की   उम्र में।

नटखटपन कभी गुम नहीं, हो छोटे चंचल मन में।।

2

चाचा नेहरू जयंती मनाई जाती, ले बाल दिवस रूप।

बच्चों को मोबाइल से दूर, खेलने दो वर्षा और धूप।।

3

बालपन मासूमपन बना रहे, हमेशा मुन्ना-मुनिया में।

बचपन को सुरक्षित रखोहमेशा   ही दुनिया में।।

4

बचपन कच्ची मिट्टी    सा ,जैसा बनाएं बन जाएगा।

परिवार पहली पाठशाला ,जैसा बनाएंगे बन आएगा।।

5

बच्चों को खाने को दें ,पौष्टिक आहार ही   सदा।

फास्ट फूड की लत न हो, खाएं केवल यदा-कदा।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७१ ☆ कविता – महाराणा प्रताप… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – महाराणा प्रताप। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७१ ☆  

☆ महाराणा प्रताप…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अपनी त्याग तपस्या प्रण का स्मारक जो आप है

वह इतिहास पुरुष भारत का अनुपम वीर प्रताप है।।

*

गीत लिखे है बलिदानों के उसने हल्दी घाटी में

खुशबू है उसके विश्वासों की चित्तौड़ी माटी में।।

*

आती है ध्वनि अब भी चेतक के विश्वासी टापों की

सुन पड़ती आवाजें दम्भी अकबर के संतापों की ।।

*

भामाशाह की भावनाओं के चित्र नजर जो आते हैं

हर पढ़ने वाले की आंखों में आंसू भर आते हैं।।

*

पढ़ते जब भी पृष्ठ युद्ध के पुस्तक में इतिहासों की

रुक सी जाती गति पढ़ने वाले भावुक की सांसों की ।।

*

कैसा था प्रताप वह जिसकी वन में कटी जवानी थी।

और संग में जिसके भूखी बिटिया थी औ’ रानी थी।।

*

कैसी सुदृढ़ भावना थी गहरी मन में उस राणा की

सभी सुखों को लात मार जिसने चिन्ता की बाना की।।

*

अकबर भी भौंचक था उसकी सोच समझ कुर्बानी पर

थी जिसकी दुनियां न्यौछावर मातृभूमि के पानी पर।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९९ – गीत – शारदे प्यार दो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – शारदे प्यार दो

? रचना संसार # ९९ ?

? गीत – शारदे प्यार दो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

है विनय,आपसे,भक्त को तार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

ज्ञान हो,ध्यान हो,वेद की साधना।

हम करें,नित्य ही,मातु आराधना।।

तेज हो,सूर्य सा,कर कृपा हैं शरण।

नंदिता,पूजिता,हैं गिरे हम चरण।।

मीत हो,जीत का,आप उपहार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

राह हम,जो चलें,सत्य का पाथ हो।

द्वेष मन,में न हो, श्रेष्ठ का साथ हो।।

हो हृदय,भी विमल,मातु भयहारिणी।

मंत्र हो,प्रेम का,हो जगततारिणी।।

कंठ पे,नाम हो,माँ अमिय धार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

यह धरा,देश की,मातु है पावनी।

ताज हो,सिर सदा,शांति की आसनी।।

हम सदा,हों सफल,पूर्ण हर काम हो।

ओम ही,ओम हो,माँ अमर नाम हो।।।

पाप का,नाश हो,हाथ तलवार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

पाठ हम,तो पढ़े,मातु बस प्रीति का।

हो सृजन,आप ही,छंद हो गीतिका।।

बुद्धि दो,शुद्धि दो,हाथ माँ थामना।

सब सुखद, हो सरस,बस यही कामना।।

लेखनी,को सदा,आप विस्तार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२०) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२०) ? ?

तुम्हारी चुप्पी में

शब्दों की

गूँज होती है,

मैं निर्निमेष

देख रहा हूँ

बिलोने की ध्वनि में

अंतर्भूत

माखन की अनुगूँज!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018,  प्रातः 9:39 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२६ ☆ पानी की आस ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण रचना  पानी की आस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ पानी की आस ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

गगरी बाला भर रही, बीच नदी की धार।

देख उसे मन डर रहा, गिरे नहीं वो  पार।।

सूख स्रोत सारे गए, हमको होती  पीर।

चट्टानों से जल दिखा, बहता नदिया नीर।

 *

लड़की प्यासी हो रही, कूप नीर की आस।

मटके में पानी भरे, उसे लगी जब प्यास।।

 *

संकट के इस दौर में, आई तेरे पास।

जोखिम कितना है बड़ा, बस पानी की आस।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०८ ☆ कविता – माँ… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – माँ आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०८ ☆

कविता – माँ☆ श्री संतोष नेमा ☆

जिसने मुझको खुद लिखा, उसे लिखूं क्या आज |

मेरी हर इक सांस में, करती माँ ही राज ||

*

पोथी पोथी पढ़ गए, मिला एक यह ज्ञान।

इस सारे संसार से, माँ है बड़ी महान।।

*

नैनन में है जल भरा, आँचल में बस प्यार |

तुमसा दूजा कौन माँ, रखता प्रेम दुलार ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆ नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  नभ से ओझल होते खग।)

☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆

? कविता – नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

आज फिर लगा कि वे दिन जल्द लौटेंगे

जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l

कि फिर खिड़की पर टुकटुक करती चिड़िया दिखेगी l

मुड मुड, उड़ उड़ जोर जोर से

शीशे से लड़ती दिखेगी l

खो चुकी हैं चहचहाटें जिंदगी की रफ़्तार में l

जहाँ तहाँ मोबाईल टॉवर, पेड़ कट रहे अंधाधुंध l

खामोश हो गये सारे खग संघर्ष के तूफान में ll

एक समय ऐसा भी था जब लौट आते थे पंछी घरोंदो में अपने l

पर आज फिर शाम होते ही वहाँ भी बंजर वसुधा मिली l

सूरज की लाली उषा से मिलकर प्रातः बातें आज भी करती हैं l

पुष्कर की झिलमिल बूंदे पुष्प कमल की पंखुड़ियों पर मोती आज भी जड़ती है l

मंद मंद इठलाती शीतल हवा कानों में आज भी कुछ कहती है l

 

पर प्रातः काल के नील गगन से खग ओझल हो रहे हैं l

ये देख मन उद्विग्न हुआ और फिर अंतर्मन से आवाज आई कि वे दिन जल्द ही लौटेंगे जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares