हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ कुछ अग्निधर्मा क्षणिकाएं… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कुछ अग्निधर्मा क्षणिकाएं… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

☆

🌹रोग

*

कौन कहता है

आत्ममुग्धता एक रोग है

बला है।

निरंतर विज्ञापित होते रहना

भी तो एक कला है।।

*

🌹अध्यात्म

*

मौतों से

विचलित नहीं होते

पत्थर

वे अगले ही पल

शान से वाॅक

कर सकते  हैं

रैम्प पर।।

*

🌹आसमां

*

आसमां छुआ जा

सकता है

बाँटने की फितरत न हो

तो जमीं पर

रहकर भी

आसमां हुआ जा सकता है।।

*

🌹आमद

*

ए आई की आमद पर

नाचो गाओ जश्न मनाओ

अंग्रेजी की खातिर

हिन्दी दिवस

मनाओ।।

*

🌹मावस

*

दिन का भेष बदलकर

आई है रात मावस की

उसने जमा लिया है

डेरा

दिल जलाकर उजाला करो

फैला है

घुप्प अंधेरा।।

*

🌹दुहाई

*

देखते ही देखते

मौत भी आदत बन गई

कुछ कीजिएगा

लोकतंत्र की दुहाई

नहीं दीजिएगा।।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४४ – कविता – ख़्वाहिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ख़्वाहिश…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४४ ?

? कविता – ख़्वाहिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

चादर बड़ी करूँ मैं या ख़्वाहिश दफ़न करूँ

फाक़ाकशी में कैसे मैं पूरे सपन करूँ

=2=

हौसला इतना मुझे परवरदिगार दे

ले ज़ान हथेली पे मैं सर पे कफ़न करूँ

=3=

मन मेरा मेहताब सा ठण्डक लिए रहे

दिल में हमेशा आफ़ताब सी तपन करूँ

=4=

देश की माटी की हिफ़ाज़त के वास्ते

मैं बर्फ़ खुद को तो कभी खुद को अगन करूँ

=5=

जो मुझको ज़ख्म दे मैं लगाऊँ उसे गले

ये भूल बार-बार मैं तो आदतन करूँ

=6=

लीज में तुम मुझको अपना दिल ये सौंप दो

ताकि यारा प्यार का मैं उत्खनन करूँ

=7=

आने की तेरे दिल में जो गली है तंग है

मैं चाहकर भी किस तरह आवागमन करूँ

=8=

जिस माटी में जन्मे पले बढ़े बड़े हुए

उस मादरे वतन को मैं निश-दिन नमन करूँ ll

=9=

‘राजेश’ अपनी ग़लतियाँ दोहराऊँ न कभी

मुझसे न दिल दुखे किसी का, ये जतन करूँ ll

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१८ ☆ मुक्तक – ।। हो गये साठ के पार अभी असली इम्तिहान बाकी है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१८ ☆

☆ मुक्तक ।। हो गये साठ के पार अभी असली इम्तिहान बाकी है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

सफर जारी पर अभी तो आने को मुकाम बाकी है।

किया जा चुका बहुत कुछ पर अभी काम बाकी है।।

साठ   के   पार    हो   चुके    तो  कोई  बात   नहीं।

अभी तो नापी है ज़मीं अभी  आसमान   बाकी है।।

=2=

अभी अदा करने को शुक्रिया वह हर इन्सान बाकी है।

पूरे  जो  कर  नहीं  पाए  वह  हर  अरमान  बाकी  है।।

अभी  तो  शुरू  ही   हुई  है  जीवन  की  दूसरी  पारी।

जान लो कि  जिन्दगी का असली इम्तिहान बाकी है।।

=3=

अभी  भी  दुनियादारी  का  कुछ   लगान   बाकी  है।

कर नहीं पाए इस्तेमाल वह साजो सामान बाकी है।।

रुकना  नहीं   थमना  नहीं  तुम्हें  इस बीच   दौड़  में।

अभी  भी   जीतने   को   हर  तीर  कमान   बाकी  है।।

=4=

सेवा निवृत हो गए पर अभी अनुभव का सम्मान बाकी है।

कुछ नया करने सीखने को जज्बा और तूफ़ान बाकी है।।

अब  तो  वरिष्ठ  नागरिक  का  दायित्व  भी  है  कंधों पर।

अभी  देखने  घूमने  को  भी  पूरा    जहान   बाकी   है।।

=5=

चुप  रह  गई  जो  अब  तक  अभी   वह  जुबान बाकी है।

ऊपरवाले ने भी दिए काम  अभी  वह फरमान बाकी है।।

पूरा  करना  है  हर  काम   इसी   एक  ही  जिन्दगी   में।

भागते रहे जिंदगी भर अब जरा सा चैन आराम बाकी है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १६ – !! नटखट कान्हा !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! नटखट कान्हा !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १६ ☆

☆ !! नटखट कान्हा !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

लेकर बालक माथ, पार की यमुना सारी।

नंद गाँव में आज, मना है उत्सव भारी।।

मातृ गोद की चाह, धरा पर माधव आए।

धन्य यशोदा भाग्य, नाथ को गोद खिलाए।।

* 

नटखट कान्हा रोज, गाँव में फोड़े मटकी।

देते ताना लोग, बात ये माँ को खटकी।।

लेकर रस्सी आज, बाँध मै दूंगी तुझको।

खाता माखन चोर, लाज है आती मुझको।।

* 

लेकर रस्सी हाथ, लाल को बांधे माता।

तीन लोक का नाथ, श्याम वो खेल दिखाता।।

घटती रस्सी देख, मातु को अचरज भारी।

कर के लीला बंद, खड़े थे फिर बनवारी।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पगडंडी… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पगडंडी… ? ?

🌻📖🖊️🌻

 कुछ राजपथ

कुछ स्वर्णपथ

मद-भोग के मार्ग

विलास के कुछ पथ,

चमचमाती कुछ सड़कें

विकास के ‘एलेवेटेड रास्ते‘,

चमक, चमचमाहट की भीड़ में

शेष बची संकरी पगडंडी-

जिससे बची हुई हैं

माटी की आकांक्षाएँ

और जिससे बनी हुई हैं

घास उगने की संभावनाएँ,

बार-बार, हर बार

मन की सुनी मैंने

हर बार, हर मोड़ पर

पगडंडी चुनी मैंने,

मेरी एकाकी यात्रा पर

अहर्निश हँसनेवालो!

राजपथ, स्वर्णपथ

विलासपथ चुननेवालो!

तुम्हें एक रोज

लौटना होगा मेरे पास

जैसे ऊँचा उड़ता पंछी

दाना चुगने, प्यास बुझाने

लौटता है धरती के पास,

कितना ही उड़ लो,

कितना ही बढ़ लो

रहो कितना ही मदमस्त,

माटी में पार्थिव का क्षरण

और घास की शरण

है अंतिम सत्य!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११० – गीत – सौदाई… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – सौदाई..।

? रचना संसार # ११० ?

☆ गीत – सौदाई…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

कलकंठी के स्वर भूले सब,

भूले दोहा चौपाई।

मधुवन भूले वृंदावन का,

हृदय उदासी बौराई।।

*

शाखा कटती है बरगद की,

भीषण लौकिक तम छाया।

चलभाषों ने रिश्ते तोड़े,

गूगल की फैली माया।।

आशाओं की चादर कटती,

प्रीति बनी है सौदाई।

*

मन के आँगन निर्दय निर्मम,

सूखी संवेदन क्यारी।

बिना मोल के सपने बिखरे,

द्वेष-घृणा की किलकारी।।

आती पाती छलनाओं की,

आघातों की दौराई।

*

चोंच बढ़ाते बगुले लोभी,

बाबुल की भीगी अँखियाँ।

चीख कौन सुनता बेटी की,

रोती बचपन की सखियाँ।।

चले मिसाइल अपनों पर ही,

बिलख रही है भौजाई।

*

आश्वासन की झोली खाली,

हँसते हैं सभी  शिकारी।

गुणा भाग चलता सत्ता का,

पिसती जनता बेचारी।।

सभी विधायक सांसद लगते,

जग में मौसेरे भाई।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३७ ☆ भावना के दोहे – साधना ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – साधना।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – साधना ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

 मन के द्वारे तू बसा, लगा रही आवाज़।

घड़ी मिलन की आ गई, आ जाओ तुम आज।।

 *

समय आज है साथ में, नहीं करो कल बात।

अभी मिलन का योग है, बीत न जाए रात।।

 *

मन सुरभित होने लगा, छाया है मधुमास।

लगी टकटकी द्वार पर, बस तेरी है आस।।

 *

मेरी ऐसी साधना, मिलता नहीं विराम।

आतुर मेरे चक्षु हैं, कब? आए आराम।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१८ ☆ एक बुंदेली पूर्णिका – खूब करो  विस्वास… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक बुंदेली पूर्णिका – खूब करो  विस्वास… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१८ ☆

☆ एक बुंदेली पूर्णिका – खूब करो  विस्वास… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

तुमने    झूठी     दई     दुहाई

लुटिआ  प्रेम की  खूब  डुबाई

*

तुम   कांटों की  बात करो मत

चोट   फूल   की  हमने  खाई 

*

धोखा  बहुतई  खा  लये हमने

देब  तुमहि  ने  कोई   बुराई

*

जोन  खों समझो हमने अपनों

हो     गई    देखो   वोई  पराई

*

खूब करो  विस्वास  सबई  पै

दुनियादारी  समझ  ने   पाई

*

झूठ-कपट  को  ओढ़  लबादा

तुमने   ऐसी  नीत   निभाई

*

भोलो  सो “संतोष” तुम्हे   जा

बात   समझ  में  देर सें आई

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २४ ☆ कविता – ।। श्री गणेश ।। ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपकी कविता ।। श्री गणेश ।।)

☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆

? कविता – ।। श्री गणेश ।। ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

-1-

पहले नाम गणेश का, लेना बारम्बार l

सहज सफल सब कामना, फिर होगा उद्धार ll

-2-

प्रेरक नेक गणेश हैं, नमन करूँ सौ बार l

देव अनुज दानव सभी, करते हैं स्वीकार ll

-3-

गजानना गौरी प्रिया, रिद्धि सिद्धि के नाथ l

विश्वरूप हे गजमुखा, आओ मेरे साथ ll

-4-

वक्र तुंड सुत शंकरा, जग भर पूज्य गणेश l

मूषक वाहन देव जी, सफल करो विघ्नेश ll

-5-

मांगलमूर्ति गजवदना, भवन पधारो आप l

एकदन्त गौरीसुता, मिलकर कर लें जाप ll

-6-

तू सद्गुरु ओंकार है, लम्ब उदर गणराज l

ज्ञान बुद्धि के देवता, गणाध्यक्ष सरताज ll

-7-

गजानना हे गजवदन, मृत्युंजय हो आप l

कोटी सूर्य सम तेज से, हरो सकल जन पाप ll

-8-

गण के साधक शिव बनें, प्रेरक रहे गणेश l

प्रथम पूज्य के हैं पिता, कहते जिन्हें महेश ll

-9-

नमन करूँ सद्भाव से, गौरी पुत्र गणेश l

भूल चूक को माफ कर, हर लो शीघ्र कलेश ll

-10-

मेरे ईश गणेश जी, करती रोज प्रणाम l

वंदन करती आप को, होते हैं सब काम ll

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३८ – कविता – अविकारी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘अविकारी…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३८ ☆

? कविता – अविकारी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

कंटीले बबूल को सौंप दी, बगिया की पहरेदारी,

फिर कभी खिल ना सकी, कोई फूलों की क्यारी…

*

रेत पर बने नक्शे कदम पर चलने की तैयारी,

और सौंप दी समुद्र को संरक्षण की जिम्मेदारी…

*

कहां निभाऊं, कहां खर्च करूं, अपनी उर्जा सारी,

पौधों को सहला रहे, हाथ में रखकर आरी…

*

इठलाती, बलखाती, दीवानी ने खो दी मिठास सारी…

अब ढूंढ रही है “एक कतरा अस्तित्व”  नदी बिचारी…

*

वादा किया है होठों पर, मुस्कान रहेगी तारी…

शर्त यह है कि आंखों से, अश्रु की धार रहे जारी…

*

कोशिश थी कि दीप जलाकर, दूर करें अंधियारी,

साथ बवंडर लिए फिरते हैं, कैसे हो उजियारी…

*

सभी स्वार्थ में डूब गए हैं, कैसे निभे यहां यारी,

मधुर वचन की आस लिए हम, उनके मुंह दो धारी…

*

सब कुछ आजमा लिया..!! देख रहा है “अविकारी”

हाथ जोड़कर समक्ष उसके, सौंप दी सारी जिम्मेदारी…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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