हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १९ – कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता युद्ध अहंकार का…।)

☆ शशि साहित्य # १९ ☆

? कविता – युद्ध अहंकार का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

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बादलों के नरम आगोश में पलकें मूंदे,

चांद मुस्कुरा रहा था,

तेज रोशनी निगल गई,

उसकी इस खुशगवारी को,

हड़बड़ा कर आंखें खोले,

देख रहा जलती धरती को

धरती कांप रही है डर से,

कैसे रक्षित करे,

लाखों जिंदगानी को,

खून के आंसू बहा रही है,

धधकता, देख अपने आंचल को,

कोई तो, कैसे तो, खत्म करे,

भीषण युद्ध की विभीषिका को,

चांद भी रोने लगा, चित्कारता देख पृथ्वी को..

विचलित हो गया, भविष्य अपना देख कर..

धिक्कार रहा है मानवता को,

कैसे रोके मनुष्य की इस आवाजाही को..

हश्र उसका भी निश्चित है,

खा जाएगा, खत्म कर देगा मानव अहंकार,

उसकी शीतल सुंदरता को..

सब दुआ करो….

इंसानियत खत्म करे, इस कलंकित कृत्य को..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – तार-तार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – तार-तार ? ?

तार-तार चिथड़ों में लिपटी थी

काली कोठरियों में जा छिपती थी,

अकस्मात अंधेरे की

रंगीनियों ने दबोच लिया,

अब दिन तो दिन

उसकी रातें भी उजली थी

पर एक तस्वीर

अब भी नहीं बदली थी,

तार-तार गुरबत

तब उसकी म़ज़बूरी थी

तार-तार अस्मत

खुशहाली के लिये

अब ज़रूरी थी!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९३ ☆ गीत – वेदमय जीवन बनाओ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९३ ☆ 

☆ गीत – वेदमय जीवन बनाओ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

वेद का हो गान हर-दिशि,

प्रभु हमें वरदान  दे  दो।

हर  बुराई  दूर   करके,

चेतनामय प्राण दे  दो।

 **

सत्य-पथ से मैं न भटकूँ,

वेदमय जीवन बनाओ।

छल, कपट से दूर रख कर,

प्रेम की  गंगा  बहाओ।

 *

धैर्य  का  अवलंब  देकर,

शांति का तुम दान दे दो।

 **

आज मानव है भटकता ,

खो रहा अब चैन है।

भागता-फिरता निरंतर,

जागता दिन-रैन है।

 *

बन सके इंसान प्रभु ये,

माधुरी मुस्कान दे दो।

 **

पंचतत्वों को बचा दो,

आज दूषित हो रहे हैं।

शिष्टता का ओढ़ चोला,

लोग भूषित हो रहे हैं।

 *

देश की गरिमा बढ़ाकर,

तुम नई पहचान दे दो।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४१ ☆ प्यास ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्यास” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४१ ☆ प्यास ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

यहाँ कितना बह गया

पानी नदी में

प्यास घाटों की मगर

बुझती नहीं है ।

 

समुंदर के पास

जाकर रुक गई है

अनवरत् सा सफ़र

मंजिल चुक गई है

 

डूबते विश्वास पर

ले नाव अपनी

छल रही है कामना

रुकती नहीं है ।

 

डूबते तटबंध

साँसों की कहानी

पर्वतों के रौद्र

रूपों की ज़ुबानी

 

तड़पती श्रद्धा

विकल हैं आस्थाएँ

पर ध्वजाएँ कर्म की

झुकती नहीं हैं ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४६ ☆ दुनिया सँवारने की शिकायत नहीं मुझे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “दुनिया सँवारने की शिकायत नहीं मुझे“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४६ ☆

✍ दुनिया सँवारने की शिकायत नहीं मुझे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

क़द से किसी की आप न औकात देखिए

तहजीब उसकी देखिए जज़्बात देखिए

 *

दुनिया सँवारने की शिकायत नहीं मुझे

अय दोस्त पहले घर के तो हालात देखिए

 *

मतलब से रोज़ लड़ते हैं संसद में बेसबब

इन ख़ादिमों की आप भी ख़िदमात देखिए

 *

तस्कीन दूर क़ुर्ब में घुटती है साँस-साँस

अपनों की दिल के हाथ में सौग़ात देखिए

 *

इक सम्त रहनुमा है तो इक सम्त है अवाम

शतरंज की विसात पै शह मात देखिए

 *

अय शाहे वक़्त!वक़्त जरा सा निकाल कर

मज़दूर के ग़रीब के सदमात देखिये

 *

जब से अरुण हुई है इनायत हुज़ूर की

थमती नहीं है ख़ुशियों की बरसात देखिये

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कवित्व ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कवित्व ? ?

वह बाँच लेती है

मेरे शब्दोेंं में

अपना नाम,

मेरी कलम का

कवित्व

निखरने लगा है या

उसकी आँंख में

कवित्व उतरने लगा है,

…पता नहीं!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५१ – हमें इल्म ही न था… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम रचना – हमें इल्म ही न था।)

☆ हेमंत साहित्य # ५१ ☆

✍ हमें इल्म ही न था… ☆ श्री हेमंत तारे  

हमें मालूम ही न था, कि बेज़ार हैं लोग

ग़लत समझे थे हम, कि ग़मगुसार हैं लोग

हमें इल्म ही न था ‘बेगाना-ए-अलम’ रहकर

कि लोमड़ी की ख़ाल में, रंगे सियार हैं लोग

*

मकीं तो मुंतज़िर हैं, कि कोई घर को मेरे आए

सुना है इन दिनों मगर, खुद-हिसार हैं लोग

*

ज़रूरत के वक्त जब, इमदाद न मिल सकी

तब जाना कि दिखावे के लिए दिलदार हैं लोग

*

पैकर की चमक तो, महज़ भुलावा है मेरे यार

अपनों से ही कटकर, बड़े लाचार हैं लोग

*

शिकवों के बोझ तले, दबे रहते हैं इस कदर

कि रिश्तों की हरारत से, बेख़बर हैं लोग

 *

‘हेमंत’ इस दौर में, कोई अपना नहीं दिखता

अब आसां रहा न कहना, कि वफ़ादार हैं लोग

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६० ☆ कविता – कवि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम कविता – “कवि“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६० ☆

✍ कविता – कवि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कवि

क्या एक ही राग गाओगे

किसलिए

किसके लिए गाओगे!

सत्य के लिए?

सत्य जानकर

हम क्या करेंगे ।

 

कवि आपबीती सुनाओ

सब कुशल है

तुम्हारे यहां

खाना पीना सब ठीक

बच्चों की पढ़ाई लिखाई

सब ठीक

तो इसी पर गाओ

कैसे हैं यह ठीक।

 

शीर्ष शिखर की बात

क्या तुम जानते हो

कैसे?

माध्यमों की खबर

सब जानते हैं

तुम क्या सुनाओगे?

कवि क्या एक ही राग

गाओगे।

 

कल्पना तो हम भी

कर सकते हैं

गाए हुए गान की तान

हम भी भर सकते हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४४ – बुन्देली कविता – ”सब लरका गुनमान निकर गय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सब लरका गुनमान निकर गय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४४ ☆

☆  बुन्देली कविता – सब लरका गुनमान निकर गय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सब लरका गुनमान निकर गय

देख-देख कइ जरुआ जर गय

*

दारू, गाँजा छोड़ दओ है

जिज्जी, अब नन्देउ सुधर गय

*

तन्नक देर भई परसन में

ससुर हमाये आज भुकर गय

*

उठा लओ घर पूरो सिर पै

तनक मूड़ के बार उघर गय

*

कोउ टहूका टारत नइयाँ

खा-पी खें बे उतइ पसर गय

*

घल गय खीबइ लातें-जूता

उनके सारे नसा उतर गय

*

‘भगवत’ के मों फूले रत ते

उनके चूले न्यारे धर गय

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शाँति-दूतों के नाम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक समसामयिक परिप्रेक्ष्य को संदर्भित रचना – शाँति-दूतों के नाम…! 

☆ ॥ कविता॥ शाँति-दूतों के नाम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

  

त्राहिमाम, त्राहिमाम, त्राहिमाम,

हुई जा रही है  जहां की अवाम।

*

सागर में लहरें नाश की उठ रहीं,

यत्न सब हुए जा रहे हैं नाकाम।

*

खूनी  खुद को सही ठहरा रहे हैं,

बली उनके हुए जा रहे बेलगाम।

*

चौधरी आपस में लड़-मर रहे हैं,

प्रगति के पहिए हुए जाते जाम।

*

यदि ऐसे ही जंग चलती रही तो,

सबका हो जाएगा काम तमाम।

*

स्वर्ग की चाहे जितनी बातें करो,

किंतु इस भू से नहीं है अभिराम।

*

कोई  पहुँचा  सके, तो पहुँचा दे,

शाँति दूतों के नाम मेरा कलाम।

 

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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